Wednesday, March 22, 2023

अंतःकरण की शुद्धि का रहस्य | The Secret to Inner Purification | Bhagavad Gita Part 37 (Shlok 9.31) by Swami Mukundanand

अंतःकरण की शुद्धि का रहस्य | The Secret to Inner Purification | Bhagavad Gita Part 37 (Shlok 9.31) by Swami Mukundanand

https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME

Full Text  1  *Gita Shloka* 9.31  श्री कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन वो जिसने सही संकल्प ले लिया, यह संकल्प नहीं कि हम हनुमान जी के मंदिर जाएं तो हमारा बेटा ठीक हो जाए, ये तो सकाम संकल्प है, मुझे भगवान से निष्काम प्रेम करना है यह संकल्प ले लें, आप सब लोग ले सकते हैं,  तो श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन बस यदि यही सही संकल्प ले लिया, अब कोई ज्यादा जल्दी चलेगा कोई धीरे चलेगा, स्पीड सबकी अलग अलग होगी (मगर अंतःकरण शुद्ध हो जाएगा), अंतःकरण को शुद्ध करना यह हम सबका लक्ष्य है  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=35  2  अंतःकरण कैसे शुद्ध हो इसमें जो शड रिपु (मन के छह शत्रु, जो हैं - काम (वासना), क्रोध, लोभ (लालच), मोह (लगाव), मद (अहंकार) और मत्सर (ईर्ष्या) हैं काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ईर्षा राग द्वेष पाखंड यह सब कैसे जाएं, अब यह सबसे important बात है कि अंतःकरण कितना शुद्ध हुआ ये bottom line है,  अजी हम इतना जप किए, इतने तीर्थों की मार्चिंग किए, इतना दान किए, इतने व्रत रखे, ठीक है मगर bottom line है कि आपका अंतःकरण कितना शुद्ध हुआ ? जी, वो तो अभी तक गुस्सा वैसा ही बना हुआ है, काम क्रोध लोभ वैसे ही हैं, तो फिर आपने साधना की ही नहीं,  अंतःकरण की शुद्धि होनी चाहिए, वह अंतःकरण की शुद्धि भक्ति से होती है, विशुद्ध भक्ति, निष्काम भक्ति करें  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=138  3  इसलिए वेद व्यास जी कहते हैं “verse”, वेद व्यास जी ने पूरी महाभारत लिख डाली ,वेदांत दर्शन लिख डाले, चारों वेद, जो सनातन है, उनको भी लिखित रूप में कर दिया, और 17 पुराण लिख डाले, तो इसमें धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि सबका वर्णन किया लेकिन वो कहते हैं कि  मैं तो भुजाएं उठा के चिल्ला चिल्ला के पुकार रहा हूं सबको, कि धर्म करो, अर्थ, मोक्ष, ज्ञान, तपस्या मगर फिर भी लोगों के चित्त पर प्रभाव नहीं पड़ रहा, मामला क्या है ?  तो नारद जी आए, नारद जी ने कहा, वेदव्यास जी, आपने ज्ञान भी बताया, तपस्या भी बताई, कर्म धर्म भी बताया, कर्म कांड आदि लेकिन आपने विशुद्धा भक्ति नहीं बताई, यह जो विशुद्धा भक्ति है,  इसी का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि एक तो भगवान की ओर चित्त आकर्षित हो जाता है, जीवों को रस मिलता है और वो रस के माध्यम से खिंचे चले जाते हैं और फिर उसी विशुद्धा भक्ति से अंतःकरण की शुद्धि भी होती है  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=202  4  रामायण कहती है, “प्रेम भगति जल बिन रघुराई, अभि अंतर मल कब हुन जाई”, भाई, देखो तुलसीदास जी कह रहे हैं कि जब तक भक्ति के निर्मल जल में अंतःकरण को धोओगे नहीं, तब तक उसकी मैल नहीं जाएगी, और वेदव्यास जब आखिर में भागवत लिखे,  उनके अंतिम ग्रंथ, उसमें कहते हैं “verse” वो धर्म जो सत्य और दया से युक्त है यह सर्वश्रेष्ठ धर्म है, वह ज्ञान जो तपस्या से युक्त है यह सर्वोच्च ज्ञान है, किंतु यह दोनों भी अंतःकरण को पूर्ण रूपेण शुद्ध करने में समर्थ नहीं हैं  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=294  5  उस कक्षा का धर्म, उस कक्षा का ज्ञान तो भक्ति है, जो भगवान की कृपा को आकर्षित करती है और उनकी करुणा कारणी शक्ति, योग माया शक्ति, तमो, फिर रजोगुण, फिर सत्व गुण को नष्ट कर देती है, और जब तीनों को नष्ट कर देती है  तो जीव के अंतःकरण को दिव्य बना देती है, जब जीव का अंतःकरण दिव्य हो गया, दिव्य आकार कृष्णमय, अब वो जीव माया को चैलेंज करता है, तुलसीदास जी कह रहे हैं कि अब “मैं तो ही जानो संसार”, अरे माया, मैंने तुझे जान लिया है, अब तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती “verse” हे माया तू किसी भी प्रकार का कपट करके तू मुझे बांध नहीं सकती है, क्यों ? क्योंकि अब मुझे हरि का बल मिल गया है  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=374  6  तो बिना भक्ति के, आप चाहे कर्म, धर्म करें, चाहे ज्ञान, तपस्या, योग, यज्ञ, अंतःकरण की शुद्धि पूर्ण रूपेण नहीं होगी क्योंकि सत्व गुण बना रहेगा और यदि एक भी गुण है जैसे कि सत्व गुण, वो वापस रजोगुण तमोगुण को कभी भी बुला सकता है, तो ये तीन गुण सब जाएं / मिटें, तब छुट्टी मिले  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=446  7  तो जो भक्ति में लग गया है, अर्जुन, वो तो जल्द धर्मात्मा बन जाएगा, क्योंकि अंतःकरण शुद्ध हो जाएगा, तो अंतःकरण शुद्धि का उपाय है भक्ति, श्री कृष्ण कह रहे हैं, अर्जुन, जिसने “पले दिल” (किसी व्यक्ति के प्रति गहरी और भावनात्मक लगाव या प्रेम) भक्ति कर ली, निष्काम, वो अंतःकरण शुद्ध हो गया, अब वो धर्म का सही सही पालन करेगा, सनातन शांति प्राप्त कर लेगा, “verse”, अर्जुन घोषणा कर दे कि “मेरे भक्त का पतन नहीं होगा”  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=469  8  अर्जुन घोषणा कर दे, स्वयं क्यों नहीं घोषणा करते हो, श्री कृष्ण ? अर्जुन को क्यों बोल रहे हो, श्री कृष्ण? आप ही घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का पतन नहीं होगा,  “नहीं, नहीं, मैं नहीं करूंगा, अर्जुन करेगा, अर्जुन, तू घोषणा कर”, अरे महाराज, ऐसा क्यों? पूरी गीता तो आप बोल रहे हैं और अर्जुन को बोलते हैं, अर्जुन, तू घोषणा कर, इसीलिए कि भगवान कभी-कभी अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ भी देते हैं, जैसे भीष्म के लिए तोड़ी थी,  भगवान ने प्रतिज्ञा की और भीष्म ने प्रतिज्ञा की, भीष्म की प्रतिज्ञा “verse” थी कि अगर मैंने आज श्री कृष्ण से शस्त्र नहीं उठवाए, तो मैं गंगा और शांतनु का पुत्र नहीं हूं, यह भीष्म की प्रतिज्ञा थी, अब श्री कृष्ण की प्रतिज्ञा थी कि मैं महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊंगा, भीष्म कहते हैं आपकी प्रतिज्ञा भाड़ में जाए, अब हमने प्रतिज्ञा की है,  तो श्री कृष्ण काफी देर तक तो टिके रहे, लेकिन फिर भक्त की प्रतिज्ञा के सामने हार मान ली अर्थात भगवान कभी कभी अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते हैं, लेकिन उन्होंने भीष्म की प्रतिज्ञा को नहीं टूटने दिया, यह उनकी महानता है, तो भगवान कहते हैं, “देखो, मैं अपने भक्त की प्रतिज्ञा नहीं टूटने दूंगा”, तो अर्जुन, तू घोषणा कर कि “मैं अपने भक्त की रक्षा अवश्य करूंगा”  https://www.youtube.com/watch?v=eSgKduz9OME&t=516  Transcript: 0:35 Gita Shloka 9.31 तो श्री कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन 1:36 वो जिसने सही संकल्प ले लिया यह संकल्प नहीं कि हम हनुमान जी के 1:44 मंदिर जाए तो हमारा बेटा ठीक हो जाए ये तो सकाम संकल्प है मुझे भगवान से 1:53 निष्काम प्रेम करना है यह संकल्प ले ले 2:00 आप सब लोग ले सकते हैं तो श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन बस संकल्प ले लिया ना अब 2:05 ज्यादा जल्दी चलेगा कोई धीरे चलेगा स्पीड सबकी अलग अलग 2:10 अंतःकरण को शुद्ध करना यह हम सबका लक्ष्य है हमारा   2:18 अंतःकरण कैसे शुद्ध हो इसमें जो शड रिपु (मन के छह शत्रु, जो हैं - काम (वासना), क्रोध, लोभ (लालच), मोह (लगाव), मद (अहंकार) और मत्सर (ईर्ष्या) हैं काम क्रोध लोभ मोह 2:28 अहंकार ईर्षा राग द्वेष पाखंड यह सब कैसे जाएं अब यह इंपॉर्टेंट बात है सबसे 2:38 इंपॉर्टेंट बात अंतःकरण कितना शुद्ध हुआ ये बॉटम लाइन अजी हम इतना जप किए इतने 2:48 तीर्थों की मार्चिंग किए इतना दान किए इतने व्रत रखे ठीक है बॉटम लाइन आपका 2:54 अंतःकरण कितना शुद्ध हुआ, जी वो तो अभी तक गुस्सा वैसा ही बना हुआ है,  काम क्रोध लोभ वैसे 3:01 ही हैं तो फिर आपने साधना की ही नहीं अंतःकरण की शुद्धि होनी 3:11 चाहिए वह अंतःकरण की शुद्धि भक्ति से होती है विशुद्ध भक्ति निष्काम भक्ति करें   3:22 इसलिए वेद व्यास जी कहते हैं “verse” वेद व्यास जी पूरी महाभारत लिख 3:42 डाले वेदांत दर्शन लिख डाले चारों वेद जो सनातन है उनको भी लिखित रूप में कर दिया 3:50 और 17 पुराण लिख डाले तो इसमें धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि सबका वर्णन 3:58 किए लेकिन वो कहते हैं कि मैं तो भुजाएं उठा के चिल्ला चिल्ला के पुकार रहा हूं 4:05 सबको धर्म करो अर्थ मोक्ष ज्ञान तपस्या लोगों के चित पर प्रभाव नहीं पड़ 4:15 रहा मामला क्या है तो नारद जी आए नारद जी ने कहा वेदव्यास 4:23 जी आपने ज्ञान भी बताया तपस्या भी बताई कर्म धर्म भी बताया कर्म कांड आदि लेकिन 4:30 आपने विशुद्धा भक्ति नहीं बताई यह जो विशुद्धा भक्ति है इसी का ऐसा 4:39 प्रभाव पड़ता है कि एक तो चित्त आकर्षित हो जाता है भगवान की ओर जीवों को रस मिलता है 4:46 और वो रस के माध्यम से वोह खींचे चले जाते हैं और फिर उसी विशुद्धा भक्ति से अंतःकरण 4:54 की शुद्धि भी होती है  रामायण कहती है प्रेम भगति जल बिन 5:01 रघुराई अभि अंतर मल कब हुन जाई भाई देखो तुलसीदास जी कह रहे जब तक भक्ति के निर्मल 5:13 जल में अंतःकरण को धोओगे नहीं तब तक उसकी मैल नहीं 5:19 जाएगी और वेदव्यास जब लास्ट में फिर भागवत लिखे उनका अंतिम ग्रंथ उसमें कहते हैं 5:26 “verse” 5:37 वो धर्म जो सत्य और दया से युक्त है यह सर्वश्रेष्ठ धर्म 5:45 है वह ज्ञान जो तपस्या से युक्त है यह सर्वोच्च ज्ञान है  किंतु यह दोनों भी अंतःकरण को पूर्ण रूपेण शुद्ध करने में समर्थ नहीं है   6:14 उस कक्षा का धर्म उस कक्षा का ज्ञान यह तो भक्ति है जो भगवान की कृपा को आकर्षित 6:23 करती है और उनकी करुणा कारणी शक्ति योग माया शक्ति तमो फिर रजोगुण फिर सत्व गुण 6:31 को नष्ट कर देती है और जब तीनों को नष्ट कर देती है तो जीव के अंतःकरण को दिव्य बना 6:40 देती है जब जीव का अंतःकरण दिव्य हो गया दिव्या आकार कृष्णमय अब वो जीव माया को 6:50 चैलेंज करता तुलसीदास जी कह रहे हैं अब मैं तो ही जानो संसार 6:59 अरे माया मैंने तुझे जान लिया अब तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती “verse” 7:18 हे माया तू किसी भी प्रकार का कपट कर तू मुझे 7:26 नहीं बांध सकती है क्यों क्योंकि अब मुझे हरि का बल मिल गया  तो 7:33 बिना भक्ति के आप चाहे कर्म धर्म करें चाहे ज्ञान तपस्या योग यज्ञ अंतःकरण की 7:42 शुद्धि पूर्ण रूपेण नहीं होगी क्योंकि सत्व गुण बना रहेगा और एक भी गुण है सत्व गुण वो 7:49 वापस रजोगुण तमोगुण को कभी भी बुला सकता तो ये तीन गुण सब जाएं तब छुट्टी मिले  तो 7:59 जो भक्ति में लग गया है अर्जुन वो तो जल्द धर्मात्मा बन जाएगा अंतःकरण शुद्ध हो 8:07 जाएगा ना तो अंतःकरण शुद्धि का उपाय है भक्ति श्री कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन जिसने पले 8:17 दिल भक्ति कर ली निष्काम वो अंतःकरण शुद्ध हो गया अब वो धर्म का सही सही पालन करेगा 8:25 सनातन शांति प्राप्त कर “verse” अर्जुन घोषणा कर 8:36 दे मेरे भक्त का पतन नहीं होगा  अर्जुन घोषणा कर 8:45 दे स्वयं क्यों नहीं घोषणा करते हो श्री कृष्ण अर्जुन को क्यों बोल 8:49 रहे हो श्री कृष्ण आप घोषणा कर दो मेरे भक्त का पतन नहीं होगा नहीं नहीं नहीं मैं नहीं 8:56 करूंगा अर्जुन करेगा अर्जुन तू घोषणा कर अरे महाराज ऐसा क्यों पूरी गीता तो आप बोल 9:03 रहे हैं और अर्जुन को बोलते हैं अर्जुन तू घोषणा 9:07 कर इसीलिए कि भगवान कभी-कभी अपनी प्रतिज्ञा 9:14 को तोड़ भी देते हैं जैसे भीष्म के लिए तोड़ी थी ना भगवान 9:21 ने प्रतिज्ञा की और भीष्म ने प्रतिज्ञा की भीष्म की प्रतिज्ञा “verse” अगर मैंने आज श्री कृष्ण से शस्त्र 9:53 नहीं उठाए तो मैं गंगा और शांतनु का पुत्र नहीं हूं यह भीष्म की 10:01 प्रतिज्ञा अब श्री कृष्ण की प्रतिज्ञा थी कि मैं महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं 10:09 उठाऊंगा भीष्म कहते हैं आपकी प्रतिज्ञा भाड़ में जाए हमने प्रतिज्ञा की 10:15 है तो श्री कृष्ण काफी देर तक तो टिके रहे लेकिन फिर भक्त की प्रतिज्ञा के सामने हार 10:26 मान ली अर्थात भगवान कभी कभी अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते हैं लेकिन उन्होंने 10:34 भीष्म की प्रतिज्ञा को नहीं टूटने दिया यह उनकी 10:40 महानता है तो भगवान कहते हैं देखो मैं अपने भक्त की प्रतिज्ञा नहीं टूटने दूंगा तो 10:46 अर्जुन तू प्रतिज्ञा कर कि मैं अपने भक्त की रक्षा अवश्य करूंगा  Standby link (in case youtube link does not work): अंतःकरण की शुद्धि का रहस्य The Secret to Inner Purification Bhagavad Gita Part 37 (Shlok 9.31).mp4