हम अगले जन्म में क्या बनेंगे ? Bhagavad Gita Part 31 (Shlok 9.25-26) by Swami Mukundanand
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Full Text
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9.25 वां श्लोक तो अब श्री कृष्ण बड़ी simple theory बताते हैं इतना simple वे कहते हैं, अर्जुन, जिसकी भक्ति करेगा, जिसमें मन को लगाएगा, मरने के बाद उसी को प्राप्त करेगा, इतना simple, जैसे train है, जहां engine जाएगा, डब्बे भी वहां पर चले जाएंगें,
अगर हम मन को भगवान में लगाएंगे, मरने के बाद उनके लोक जाएंगे, अगर हम स्वर्ग के देवी देवताओं में लगाएंगे, मरने के बाद हम स्वर्ग जाएंगे, पुण्य क्षीण होने पर वहां से लौटेंगे, अगर हम मन को मनुष्यों में लगायेगें, तो वापस मृत्यु लोक में आएंगे और अगर भूत प्रेत की आराधना करेंगे, जैसे कुछ तांत्रिक आदि करते हैं, तो मरने के बाद हम भी भूत प्रेत की योनि में चले जाएंगे, इतनी simple philosophy अब हम decide कर ले हमको चाहिए क्या
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एक बाप के बेटियां थीं, तो एक का विवाह उसने एक शराबी से किया, वह बेचारा शराब में सब गंवा के भिखारी बन गया, उसकी पत्नी की उपाधि पड़ी भिखारिन,
दूसरी लड़की का विवाह graduate से किया, वह कहीं पर clerk बाबू बन गया तो पत्नी का नाम पड़ा बबुआइन,
तीसरी का विवाह जो हुआ, वो बड़े brilliant लड़के से हुआ, वो IAS में आके Collector बना तो उसकी पत्नी की उपाधि मिली मेम साहब,
अब वो लड़कियां झगड़ा करती हैं, पिताजी, ये क्या हम सब आपकी बेटियां हैं मगर मेरी बहने एक बबुआन है, एक मेम साहिब है, और मैं भिखारिन हूं, ये मामला क्या है ? अरे बेटी, वो ऐसा ही है, भाग्य में जैसा था, जिससे विवाह हुआ, बस उसी की सामग्री मिल गई, तो यह सब विभिन्न सामग्रियां है विभिन्न लोग, विभिन्न persons, personalities
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तो श्री कृष्ण fundamental clear कर रहे हैं, देख अर्जुन, इतनी सी बात है, अगर तू चाहता है, भगवत प्राप्ति करना, तो फिर याद रख, तुझे मन का लगाव, भगवान में ही करना होगा
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9.26 वा श्लोक “verse” तो भगवान की भक्ति कैसे करें कहते हैं ? किसी भी प्रकार से, चिंता ही मत करो, तुम्हारे पास पैसा नहीं है, to एक फूल ले लो और वह फूल मुझे अर्पित कर दो,
कोई फूल नहीं दिख रहा, फल तो होगा, फल लेकर अर्पित कर दो, फल भी सब सूख गए हैं सड़ गए हैं, अरे पत्ता ही दे दो, पत्ते भी झड़ गए हैं, चिंता मत करो, “तोयम”, यानी जल तो होगा, जल अर्पित कर दो,
अगर तुम भक्ति के साथ करोगे, श्री कृष्ण कहते हैं, मैं स्वीकार करूंगा क्यों, इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारा उपहार नहीं देखता, तुम्हारे भाव को देखता हूं, भगवान “भाव ग्राही जनार्दन” हैं, भगवान को वस्तु से मतलब नहीं है, उनको हमारे भाव से मतलब है,
क्योंकि उनको किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं है, वे तो सर्वशक्तिमान हैं, सर्व समर्थ हैं, आत्माराम हैं, पूर्ण काम हैं, परम निष्काम हैं, निर् ग्रंथ हैं, ऐसी Supreme Personality of Godhead को हम क्या दे सकते हैं ?
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तो भगवान की, यह जीव भला सेवा कर ही कैसे सकता है ? जीव तो अल्पज्ञ है, अशक्त है, जबकि भगवान सर्वज्ञ हैं और सशक्त हैं, तो क्या एक बच्चा, नवजात शिशु, मां की सेवा करता है ? नहीं , मां बच्चे की सेवा करती है,
इसलिए श्री कृष्ण ने कहा, “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्”
“As all surrender unto Me, I reward them accordingly. Everyone follows My path in all respects, O son of Pṛthā”.
https://vedabase.io/en/library/bg/4/11/
जीव को तो शरणागत होना है और यह भजन मैं करूंगा, भजन माने सेवा, मैं सेवा करूंगा,
जीव को तो बस मुझे शरणागत होना है, श्री कृष्ण कह रहे हैं कि अर्जुन, भगवान को तुम पत्र, पुष्प, फल, फूल, जल कुछ भी दो, अगर प्रेम से दोगे, तो स्वीकार करेंगे
लेकिन वह प्रेम का स्वरूप ऐसा है कि उसमें देने देने की भावना निहित होती हो, तो भगवान जानबूझ के जीव से देना देना कराते, वे कहते हैं जीव तुम मेरे लिए कुछ करो
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अब जीव बेचारा वो सोचता है, भाई मैं तो भिखारी हूं, मैं क्या करूं भगवान के लिए ? वह (भगवान) करें मेरे लिए, इसलिए स्कंद पुराण कहता है, Verse, तुम ने जो न्याय पूर्वक कमाया है, उसका दसवां अंश भगवान को दे दो, भगवान कोई कंजूस नहीं हैं, वह अनंत गुणा करके तुमको लौटा देंगे,
लेकिन तुम्हारे स्वयं के कल्याण के लिए तुमको देना देना सीखना होगा और वो यथा शक्ति होगा (as per your individual capacity), पत्र, पुष्प, फल, फूल सबको श्री कृष्ण कह रहे हैं यहां पर वे स्वीकार करेंगे
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Transcript
1:14 9.25 वा श्लोक तो अब श्री कृष्ण बड़ी सिंपल थ्योरी 1:40 बताते हैं इतना 1:43 सिंपल वे कहते हैं अर्जुन जिसकी भक्ति करेगा 1:48 जिसमें मन को लगाएगा उसी को प्राप्त करेगा 1:53 मरने के बाद इतना सिंपल जैसे ट्रेन है ना 1:58 जहां engine जाएगा डब्बे भी वहां पर चले 2:03 जाएंगें अगर हम मन को भगवान में 2:08 लगाएंगे मरने के बाद उनके लोक 2:14 जाएंगे अगर हम स्वर्ग के देवी देवताओं में 2:19 लगाएंगे मरने के बाद हम स्वर्ग जाएंगे 2:23 पुण्य क्षीण होने पर वहां से लौटेंगे अगर 2:27 हम मन को मनुष्यों में लगायेगें 2:31 तो वापस मृत्यु लोक में 2:34 आएंगे और अगर भूत प्रेत की आराधना करेंगे 2:39 जैसे कुछ तांत्रिक आदि करते हैं तो मरने 2:43 के बाद हम भी भूत प्रेत की योनि में चले 2:46 जाएंगे इतनी सिंपल फिलोसोफी अब हम डिसाइड 2:51 कर ले हमको चाहिए 2:54 क्या एक बाप के बेटियां थीं 3:00 तो एक का विवाह उसने एक शराबी से 3:05 किया वह बेचारा शराब में सब गंवा के भिखारी 3:10 बन गया उसकी पत्नी की उपाधि पड़ी भिखारिन 3:15 दूसरी लड़की का विवाह ग्रेजुएट से तो किया 3:18 वह कहीं पर क्लर्क बाबू बन गया तो पत्नी 3:22 का नाम पड़ा बबुआइन तीसरी का विवाह जो 3:27 हुआ वो बड़े ब्रिलियंट लड़के से हुआ वो 3:32 आईएएस में आके कलेक्टर बना तो उसकी पत्नी 3:36 की उपाधि मिली मेम साहब अब वो लड़कियां 3:41 झगड़ा करती हैं पिताजी ये क्या हम सब आपकी 3:46 बेटियां मेरी बहने एक बबुआन है एक मेम 3:50 साहिब है और मैं भिखारिन हूं ये मामला 3:54 क्या 3:54 है अरे बेटी वो ऐसा ही है भाग्य में जैसा 3:59 था जिससे विवाह हुआ बस उसी की सामग्री मिल 4:06 गई तो यह सब विभिन्न सामग्रियां है 4:10 विभिन्न पर्सनालिटी 4:13 तो श्री 4:15 कृष्ण फंडामेंटल क्लियर कर रहे हैं देख 4:19 अर्जुन इतनी सी बात अगर तू चाहता है भगवत 4:23 प्राप्ति करना तो फिर याद रख तुझे मन का 4:28 लगाव भगवान में ही करना होगा 26 वा 4:33 श्लोक “verse” 4:51 तो भगवान की भक्ति कैसे करें कहते हैं 4:56 किसी भी प्रकार से चिंता ही मत करो 5:01 तुम्हारे 5:02 पास पैसा नहीं 5:05 है एक फूल ले लो और वह फूल मुझे अर्पित कर 5:10 दो कोई फूल नहीं दिख रहा फल तो होगा फल 5:16 लेकर अर्पित कर 5:19 दो फल भी सब सूख गए हैं सड़ गए हैं अरे 5:24 पत्ता ही दे 5:26 दो पत्ते भी झड़ गए हैं 5:30 चिंता मत करो तोयं जल तो होगा ना जल 5:34 अर्पित कर दो अगर तुम भक्ति के साथ करोगे 5:40 श्री कृष्ण कहते हैं मैं स्वीकार करूंगा 5:44 क्यों इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारा उपहार 5:48 नहीं 5:49 देखता तुम्हारे भाव को देखता हूं “भाव 5:54 ग्राही जनार्दन” भगवान को इससे मतलब नहीं 5:59 है 6:00 उनको हमारे भाव से मतलब है क्योंकि उनको 6:04 किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं है वे तो 6:08 सर्वशक्तिमान हैं सर्व समर्थ हैं आत्माराम 6:12 हैं पूर्ण काम हैं परम निष्काम हैं निर् 6:15 ग्रंथ 6:17 हैं ऐसी पर्सनालिटी को हम क्या दे सकते हैं 6:22 तो भगवान की यह जीव भला सेवा कर ही कैसे 6:27 सकता है 6:29 जीव तो अल्पज्ञ है अशक्त है भगवान सर्वज्ञ 6:33 है और सशक्त है तो क्या बच्चा नवजात शिशु 6:41 मां की सेवा 6:43 करता है ? मां बच्चे की सेवा 6:46 करती है इसलिए श्री कृष्ण ने कहा ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् As all surrender unto Me, I reward them accordingly. Everyone follows My path in all respects, O son of Pṛthā. https://vedabase.io/en/library/bg/4/11/ जीव को तो शरणागत होना है और यह भजन मैं 6:57 करूंगा भजन माने सेवा मैं सेवा करूंगा जीव 7:02 को शरणागत होना है तो श्री कृष्ण 7:06 कह रहे हैं कि अर्जुन भगवान को तुम पत्र 7:10 पुष्प फल फूल कुछ भी दो अगर प्रेम से दोगे 7:14 तो स्वीकार करेंगे लेकिन वह प्रेम का 7:18 स्वरूप ऐसा है कि उसमें देने देने की 7:22 भावना निहित होती तो भगवान जानबूझ के जीव 7:28 से 7:30 देना देना 7:31 कराते वे कहते हैं जीव तुम हमारे लिए कुछ 7:35 करो अब जीव बेचारा वो सोचता है भाई मैं तो 7:39 भिखारी हूं मैं क्या करूं भगवान के लिए वह (भगवान) 7:42 करें मेरे लिए इसलिए स्कंद पुराण कहता है 7:49 Verse तुम ने जो 8:00 न्याय पूर्वक कमाया है उसका दसवां अंश भगवान 8:04 को दे दो भगवान 8:08 कोई कंजूस नहीं हैं वह अनंत गुणा करके 8:12 तुमको लौटा देंगे लेकिन तुम्हारे कल्याण 8:16 के लिए तुमको देना देना सीखना होगा और वो 8:22 यथा शक्ति होगा पत्र पुष्प फल फूल सबको 8:27 श्री कृष्ण कह रहे हैं यहां पर वे स्वीकार 8:30 करेंगे
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