Thursday, March 23, 2023

युवावस्था में भक्ति करें या career सम्भालें? Bhagavad Gita Part 32 (Shlok 9.27) by Swami Mukundanand

युवावस्था में भक्ति करें या career सम्भालें? Bhagavad Gita Part 32 (Shlok 9.27) by Swami Mukundanand


https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c

Full Text  1  श्लोक नंबर 9.27: जब भक्ति की बात आती है तो लोगों को लगता है कि भक्ति अलग है, और हमारा सांसारिक पारिवारिक जीवन, कर्तव्य, यह अलग है, या तो भक्ति करो या कर्म करो, इसलिए लोग अपने जीवन को partition कर देते हैं, आधा घंटा भक्ति करनी है, ड्यूटी पूरी हो गई, उसके बाद कर्म करना हैं,  तो भक्ति मन लगा के करो लेकिन उसके बाद चालाकी, 420, मक्कारी दम लगा के करो, यह दोनों का कोई संबंध नहीं है, ऐसा नहीं है, यह भक्ति का संबंध हमारे जीवन के प्रत्येक कर्म से है,  हमको कुछ partition करने की आवश्यकता नहीं है, स्वामी विवेकानंद ने कहा था no work is secular, all work is devotion & worship, तुमको कोई कार्य को सांसारिक नहीं समझना है अपने प्रत्येक कार्य को भक्तिमय बना दो तो फिर प्रत्येक कार्य से भक्ति होगी  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=70  2  तो यह विडंबना (irony) जो होती है लोगों के मन में स्वामी जी, वो भक्ति तो retire होकर करनी होती है, अभी थोड़ी कोई age है भक्ति करने की ? अच्छा, retire होकर तुम कर पाओगे, इसकी कोई गारंटी है ? जब शरीर में ही शक्ति नहीं रहेगी, तो भक्ति क्या करोगे ? “verse”  यह कहा गया है कि अगर घर में आग लग गई उस समय कुँआ खोदने का लाभ नहीं, पहले खोदना चाहिए था, ऐसे ही जब शरीर में बुढ़ापा रूपी आग लग गई, तो तब हम कल्याण के लिए try करें ? तुम ज्यादा late कर दिए, भक्ति पहले शुरू करना चाहिए था  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=171  3  प्रहलाद महाराज ने कहा था “verse” ये भक्ति बाल काल में ही शुरू कर दो क्योंकि Hirankashypu ने प्रहलाद से प्रश्न किया था कि तुम पाँच साल के हो, यह कोई आयु है भक्ति करने की ? जब व्यक्ति बूढ़े हो जाते हैं, कुछ करने धरने को नहीं होता है, सब शरीर बेकार हो जाता है, उस समय भगवान का नाम लो, यह कोई time है क्या ?  तो प्रहलाद ने कहा, पिताजी, बुढ़ापे की परिभाषा क्या है ? किस को हम वृद्ध कहें ? जो मृत्यु के निकट है उसको वृद्ध कहा जाएगा, अब मेरी मृत्यु कब निर्धारित है यह तो ना आप जानते हैं ना मैं जानता हूं,  हो सकता है कि मैं कल ही मर जाऊं तो हो सकता है मैं भी मृत्यु के निकट हूं, उस दृष्टिकोण से मैं भी वृद्ध ही हूं, तो प्रहलाद ने कहा था कि बाल्यावस्था में ही भक्ति शुरू कर दो  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=253  4  यह भक्ति बुढ़ापे के लिए postpone नहीं करनी है, बल्कि नींव तो बचपन में डलती है, उस समय अगर आप लापरवाह रहे, बाद में कहें, स्वामी जी, हमारे बच्चे को कुछ समझाइए, अरे आपका बच्चा है, आप समझाओ, कुछ नहीं समझता, यह कलयुग के बच्चे ऐसे ही हैं, अच्छा तो आपका बच्चा नहीं है, कलयुग का बच्चा है ?  अरे भाई, तुमको उसको समझाना चाहिए था, तुमने कितना समय निकाला उसको आध्यात्मिक ज्ञान देने के लिए, उस समय तो kitty party etc. में व्यस्त थे, और बाद में कहती हो हमारा बच्चा आवारा हो गया तो इसलिए हमें भक्ति अभी करनी है  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=329  5  एक व्यक्ति अमावस में समुद्र स्नान के लिए गया, उसने सुना था कि अमावस के समय समुद्र स्नान करें विशेष लाभ मिलेगा, अब वह बैठ गया समुद्र के सामने तो बैठे बैठे चार घंटे हो गए, एक साधु ने कहा आप किस लिए बैठे हैं ? स्नान करने के लिए, तो फिर प्रवेश क्यों नहीं करते,  नहीं, मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं कि समुद्र शांत हो जाए फिर मैं स्नान करूं, साधु ने कहा यह समुद्र कभी शांत नहीं होगा, इसी में डुबकी लगानी होगी,  “न कभी रुकेंगीं हवाएं, न कभी बुझेगें चिराग, चलते रहो, यह तमाशा तो रात भर का है”  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=385  6  यह जीवन में ऐसा ही होता है, आप कहे कि अनुकूल परिस्थिति आए, तब भक्ति करें, अरे एक प्रतिकूलता से दूसरी से तीसरी से चौथी, यही जीवन है, हमको अभी वर्तमान में भक्ति करनी है और कैसे करनी है ? श्री कृष्ण बता रहे हैं कि प्रत्येक कर्म से भक्ति करो, प्रत्येक कर्म भगवान की खुशी के लिए करो, उनको समर्पित करो, यह विचार करने की बात है  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=436  7  मैं भोगता हूं, अगर यह चेतना है, तो प्रत्येक कर्म स्वयं को समर्पित होगा मगर यदि मैं सेवक हूं, यह चेतना है, तो प्रत्येक कर्म भगवान की खुशी के लिए किया जाएगा  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=472  8  जैसे छत्रपति शिवाजी का आख्यान (किस्सा) बताया जाता है कि उनके गुरु उनकी राजधानी से निकल रहे थे, “भिक्षाम देही, भिक्षाम देही”, छत्रपति शिवाजी ने अपने महल के verandah से गुरुजी को देखा, उन्होने कहा, यह शोभा नहीं देता, मैं राजा और मेरे गुरु इस प्रकार से भिखारी बनकर घूम रहे हैं, तो उनको एक विचार आया एक पर्ची लिख दी और नीचे उतर के गुरुजी सड़क पर जा रहे थे उनके कमंडल में पर्ची डाल दी,  गुरु जी ने पर्ची को खोला, उसमें लिखा हुआ था कि “मैं अपना संपूर्ण राज्य भिक्षा में आपको समर्पित करता हूं, आपका शिष्य शिवा” तो समर्थ रामदास पढ़ के मुस्कुराए, उन्होंने कहा, बेटा मैं तो सन्यासी हूं, यह राज्य से मैं क्या करूंगा, मैं इसलिए भिक्षा करता हूं कि गृहस्थियों से मिलने का अवसर मिल जाता है, इसी बहाने उनके कल्याण का समय मिलता है, इसीलिए मैं भिक्षा करने के लिए निकलता हूं,  अब तुमने अपना संपूर्ण राज्य मुझको सौंप दिया, तो ठीक है, अब यह मेरा हो गया लेकिन मैं इस पर शासन नहीं करूंगा, तुम ही शासन करना मगर इस भावना से कि यह राज्य मेरा नहीं है यह तो भगवान का और मेरे गुरु का है और मैं उनका दास बनके उनकी सेवा के रूप में ये राज कार्य संभाल रहा हूँ, यानी यद्यपि तुम राज सिंहासन पर तो बैठोगे, लेकिन भीतर की भावना सेवक की होगी  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=486  9  यही वार्तालाप हुआ था चंद्रगुप्त और चाणक्य के बीच में, चंद्रगुप्त ने पूछा चाणक्य से कि वैदिक दृष्टिकोण से राजा की प्रजा के सामने क्या स्थिति है ? तो चाणक्य ने कहा, राजा प्रजा के सेवक के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, यानी वह कोई भी हो उसका धर्म सेवा ही है  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=610  10  आजकल जो लोग Management Theory जानते हों, आजकल यह servant leadership की theory विकसित हो रही है, कोई बड़ी कंपनी का CEO, President, Chairman जो भी हो, उसको यह नहीं सोचना है कि मैं इतने सारे लोगों का अध्यक्ष हूं, उसको सोचना है कि इस पदवी पर बैठ के मैं दूसरों की सेवा कर रहा हूं,  गुरु भी सेवा करते हैं, उनका यह लक्ष्य होता है कि कैसे हम अपने शिष्यों की सेवा करें, अब सेवा के लिए उनको ऊपर बैठना पड़ता है ताकि शिष्य लोग सम्मान करना सीखें, वह बात अलग है बाहर से कैसे भी हो, भीतर सेवा भाव ही रहता है, तो वह सेवा भाव भगवान के प्रति हो जाए फिर हम प्रत्येक कार्य उनकी खुशी के लिए करें  https://www.youtube.com/watch?v=H0NuPjWD_5c&t=645  Transcript 1:10 श्लोक नंबर 9.27  जब भक्ति की बात आती 1:32 है तो लोगों को लगता है कि भक्ति अलग है 1:37 और हमारा सांसारिक पारिवारिक जीवन कर्तव्य 1:43 यह अलग 1:45 है या तो भक्ति करो या कर्म करो इसलिए लोग 1:51 उसको अपने जीवन को partition कर 1:55 देते हैं आधा घंटा भक्ति करनी है ड्यूटी पूरी 2:00 हो गई उसके बाद कर्म करना हैं तो भक्ति मन लगा 2:04 के करो लेकिन उसके बाद चलासी चालाकी 420 2:07 मक्कारी दम लगा के 2:11 करो यह दोनों का कोई संबंध नहीं 2:15 है ऐसा नहीं है यह भक्ति का संबंध हमारे 2:21 जीवन के प्रत्येक कर्म से 2:25 है हमको कुछ partition करने की आवश्यकता नहीं 2:30 है स्वामी विवेकानंद ने कहा था no work is secular, all work is devotion & worship  तुमको 2:41 कोई कार्य को सांसारिक नहीं समझना है अपने 2:45 प्रत्येक कार्य को भक्तिमय बना दो तो फिर 2:51 प्रत्येक कार्य से भक्ति होगी तो यह 2:54 विडंबना जो होती है लोगों के मन में 2:58 स्वामी जी वो भक्ति तो retire होकर करनी 3:01 होती है अभी थोड़ी कोई age है 3:03 भक्ति करने 3:04 की अच्छा retire होकर तुम कर पाओगे इसकी 3:08 कोई गारंटी है 3:11 क्या जब शरीर में ही शक्ति नहीं 3:15 रहेगी तो भक्ति क्या 3:18 करोगे “verse”  3:50  यह कहा गया कि अगर घर में आग लग 3:56 गई उस समय कुँआ खोदने का लाभ नहीं पहले खोदना 4:03 चाहिए ऐसे जब शरीर में बुढ़ापा रूपी आग लग 4:07 गई अब हम कल्याण के लिए try करें तुम 4:12 ज्यादा late 4:13 कर दिए पहले शुरू करना चाहिए था ना प्रहलाद 4:17 महाराज ने कहा था “verse” 4:26 ये भक्ति बाल काल में ही शुरू कर दो क्योंकि Hirankashypu 4:31 ने प्रश्न किया था प्रहलाद से कि 4:35 तुम पाँच साल के हो यह कोई आयु है भक्ति 4:39 करने की जब व्यक्ति बूढ़े हो जाते हैं कुछ 4:43 करने धरने को नहीं होता है सब शरीर 4:47 बेकार हो जाता है उस समय भगवान का नाम लो 4:50 यह कोई टाइम है 4:52 क्या तो प्रहलाद ने कहा पिताजी बुढ़ापे की 4:57 परिभाषा क्या है किस को हम वृद्ध कहें जो 5:02 मृत्यु के निकट है उसको वृद्ध कहा 5:07 जाएगा अब मेरी मृत्यु कब निर्धारित है यह 5:11 तो ना आप जानते हैं ना मैं जानता 5:15 हूं हो सकता है मैं कल मर जाऊं तो हो सकता 5:20 है मैं भी मृत्यु के निकट हूं उस 5:23 दृष्टिकोण से मैं भी वृद्ध ही हूं तो वो 5:27 प्रहलाद ने कहा बाल्यावस्था 5:29 में भक्ति शुरू करो तो यह भक्ति जो है यह 5:33 बुढ़ापे के लिए postpone नहीं करनी 5:37 है बल्कि नींव तो बचपन में डलती है ना उस समय 5:43 अगर आप लापरवाह रहे बाद में कहें स्वामी जी 5:49 हमारे बच्चे को कुछ 5:52 समझाइए अरे आपका बच्चा है आप समझाओ कुछ 5:57 नहीं समझता यह कलयुग के बच्चे ऐसे ही हैं 6:01 अच्छा तो आपका बच्चा नहीं है कलयुग का 6:05 बच्चा है अरे भाई तुमको उसको समझाना चाहिए था 6:11 तुमने कितना समय निकाला उसको आध्यात्मिक 6:14 ज्ञान देने के लिए उस समय तो kitty party etc. 6:18 में व्यस्त थे और बाद में कहती हो 6:21 हमारा बच्चा आवारा हो गया तो हमें भक्ति 6:25 अभी करनी है, एक व्यक्ति अमावास में समुद्र 6:30 स्नान के लिए 6:32 गया उसने सुना था कि अमावास के समय 6:36 समुद्र स्नान करें विशेष लाभ मिलेगा अब वह 6:39 बैठ गया समुद्र के सामने तो बैठे बैठे चार 6:44 घंटे हो गए एक साधु ने कहा आप किस लिए 6:48 बैठे हैं स्नान करने के लिए तो फिर प्रवेश 6:52 क्यों नहीं करते नहीं मैं प्रतीक्षा कर 6:55 रहा हूं कि समुद्र शांत हो जाए फिर मैं 6:58 स्नान करूं साधु ने कहा यह समुद्र कभी शांत 7:02 नहीं होगा इसी में डुबकी लगानी होगी ना 7:06 कभी रुकेंगीं 7:08 हवाएं न कभी बुझेगें चिराग चलते रहो यह तमाशा 7:14 तो रात भर का 7:16 है” यह जीवन में ऐसा ही होता है आप कहे अनुकूल 7:20 परिस्थिति आए तब भक्ति करें अरे एक 7:23 प्रतिकूलता से दूसरी से तीसरी से चौथी यही 7:27 जीवन है हमको अभी वर्तमान में भक्ति करनी 7:32 और कैसे करनी है श्री कृष्ण बता रहे हैं 7:37 प्रत्येक कर्म से भक्ति 7:41 करो प्रत्येक कर्म भगवान की खुशी के लिए 7:46 करो उनको समर्पित करो यह सोचने की बात 7:52 है मैं भोगता हूं अगर यह चेतना है तो 7:57 प्रत्येक कर्म स्वयं को समर्पित होगा मैं 8:02 सेवक हूं यह चेतना है तो प्रत्येक कर्म 8:06 भगवान की खुशी के लिए किया जाएगा जैसे 8:10 छत्रपति शिवाजी का आख्यान बताया जाता है 8:13 कि उनके गुरु उनके राजधानी से निकल रहे थे 8:17 भिक्षाम देही भिक्षाम 8:21 देही छत्रपति शिवाजी ने अपने महल के verandah 8:25 से देखा गुरुजी को उन्होने कहा यह शोभा 8:28 नहीं देता 8:29 मैं राजा और मेरे गुरु इस प्रकार से 8:32 भिखारी बनकर घूम रहे 8:34 हैं तो उनको एक विचार आया एक पर्ची लिख दी 8:41 और नीचे उतर के गुरुजी सड़क पर जा रहे थे 8:45 उनके कमंडल में पर्ची डाल दी गुरु जी ने 8:48 पर्ची को 8:50 खोला उसमें लिखा हुआ 8:53 था मैं अपना संपूर्ण राज्य भिक्षा में 8:58 आपको समर्पित करता हूं आपका शिष्य 9:04 शिवा तो समर्थ रामदास पढ़ के मुस्कुराए 9:09 उन्होंने कहा बेटा मैं तो सन्यासी हूं यह राज्य 9:14 से मैं क्या 9:15 करूंगा मैं इसलिए भिक्षा करता हूं कि 9:18 गृहस्थियों से मिलने का अवसर मिल जाता है इसी 9:22 बहाने उनके कल्याण का समय मिलता है इसीलिए 9:26 मैं भिक्षा करने के लिए निकलता हूं 9:31 अब तुमने अपना संपूर्ण राज्य मुझको सौंप 9:35 दिया तो ठीक है अब यह मेरा हो गया लेकिन 9:41 मैं इस पर शासन नहीं करूंगा तुम ही शासन 9:45 करना इस भावना से कि यह राज्य मेरा नहीं 9:49 है यह तो भगवान का और मेरे गुरु का है और 9:53 मैं उनका दास बनके उनकी सेवा के रूप में ये  9:58 राज कार्य संभाल रहा हूँ तो यद्यपि तुम राज 10:03 सिंहासन पर तो बैठोगे लेकिन भीतर की भावना 10:08 सेवक की 10:10 होगी यही वार्तालाप हुआ था चंद्रगुप्त और 10:14 चाणक्य के बीच 10:16 में चंद्रगुप्त ने पूछा चाणक्य से कि 10:20 वैदिक दृष्टिकोण से राजा की प्रजा के 10:26 सामने क्या स्थिति है 10:30 तो चाणक्य ने कहा राजा प्रजा के सेवक के 10:35 अतिरिक्त और कुछ भी नहीं 10:38 है यानी वह कोई भी हो उसका धर्म सेवा ही 10:45 है आजकल जो लोग Management Theory जानते हों 10:50 तो आजकल यह  10:54 servant leadership की theory विकसित हो रही है कोई 10:59 बड़ी कंपनी का सीईओ प्रेसिडेंट चेयरमैन जो 11:03 भी हो उसको यह नहीं सोचना है कि मैं इतने 11:07 सारे लोगों का अध्यक्ष हूं उसको सोचना है 11:11 कि इस पदवी पर बैठ के मैं दूसरों की सेवा 11:15 कर रहा 11:17 हूं तो गुरु भी सेवा करते हैं उनका यह 11:22 लक्ष्य होता है कैसे हम अपने शिष्यों की 11:25 सेवा 11:26 करें अब वो सेवा के लिए उनको ऊपर बैठना 11:30 पड़ता है ताकि शिष्य लोग सम्मान करना सीखें 11:34 वह बात अलग है बाहर से कैसे भी हो भीतर 11:38 सेवा भाव ही 11:40 रहता है तो वह सेवा भाव भगवान के प्रति हो 11:45 जाए फिर हम प्रत्येक कार्य उनकी खुशी के 11:50 लिए करें