Saturday, August 1, 2026

कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji |

कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji | 

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given

1. हरि भक्ति की संजीवनी और सत्संग की महिमा The Life-Giving Power of Hari Bhakti and Satsang 2. भवसागर पार करने का एकमात्र उपाय: हरि भजन The Only Way to Cross the Ocean of Worldly Existence: Hari Bhajan https://www.youtube.com/watch?v=azHpbv6BXgg [00:18] श्रद्धा की औषधि: गुरु द्वारा दी गई हरि भक्ति की संजीवनी जड़ी को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए। The Medicine of Faith: The life-giving herb of Hari Bhakti given by the Guru should be received with complete faith and trust. [01:23] मन की निर्मलता: करोड़ों यत्न करने के बाद भी मन तब तक निर्मल नहीं होता जब तक प्रभु की कृपा और सच्चे संत का मार्गदर्शन न मिले। Purity of the Mind: Even after making millions of efforts, the mind does not become pure until one receives the grace of the Lord and the guidance of a true saint. [02:49] भजन का महत्व: अम्बरीष जी स्पष्ट करते हैं कि बिना हरि के भजन के जीवन के क्लेश और कष्ट कभी समाप्त नहीं हो सकते। The Importance of Bhajan: Ambrish Ji clearly explains that the troubles and sufferings of life can never come to an end without Hari Bhajan. [06:26] राम कथा और मर्यादा: डोंगरे जी महाराज का प्रसंग सुनाते हुए वे कहते हैं कि कृष्ण कथा का अधिकारी बनने के लिए पहले राम कथा के संयम और मर्यादा को अपनाना आवश्यक है। Ram Katha and Discipline: While narrating an incident involving Dongre Ji Maharaj, he explains that to become qualified to hear Krishna Katha, one must first adopt the restraint and discipline taught through Ram Katha. [12:49] असंभव को संभव: कागभुशुण्डि जी कहते हैं कि जल मथने से घी निकलना या बालू से तेल निकलना भले ही संभव हो जाए, पर हरि भजन के बिना भवसागर पार करना असंभव है। Making the Impossible Possible: Kakbhushundi Ji says that churning water to produce ghee or extracting oil from sand may somehow become possible, but crossing the ocean of worldly existence without Hari Bhajan is impossible. [16:47] भक्त का दैन्य भाव: भगवान का सच्चा भक्त अत्यंत विनम्र होता है। कागभुशुण्डि जी स्वयं को 'अधम पक्षी' कहकर अपनी विनम्रता और प्रभु की असीम कृपा को दर्शाते हैं। The Humility of a Devotee: A true devotee of God is extremely humble. Kakbhushundi Ji calls himself an 'inferior bird,' expressing his humility and acknowledging the Lord's infinite grace. [25:05] सत्संग की महिमा: शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि सत्संग के समान जगत में दूसरा कोई लाभ नहीं है, और यह केवल हरि की कृपा से ही सुलभ होता है। The Glory of Satsang: Lord Shiva tells Mother Parvati that there is no greater benefit in the world than Satsang, and it is accessible only through the grace of Hari. [32:04] गुरु के प्रति कृतज्ञता: गरुड़ जी कागभुशुण्डि जी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वे उनका ऋण कभी नहीं चुका सकते, बस उनके चरणों में बार-बार प्रणाम कर सकते हैं। Gratitude Toward the Guru: Garuda Ji expresses his gratitude toward Kakbhushundi Ji, saying that he can never repay his debt to him and can only repeatedly offer obeisances at his feet. https://www.youtube.com/watch?v=azHpbv6BXgg -----

Full Transcript


कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji |  00:00:00 रघुपति भगति सजीवन 00:00:07 मूरी अनु पान श्रद्धा मति पूरी आइए श्री रघुनाथ जी की भक्ति यही संजीवनी जड़ी है जो गुरु ने दी 00:00:18 है श्रद्धा के साथ इसका पान करना है य औषधि श्रद्धा के साथ लेनी है मैं तो कई बार आपको 00:00:28 कहता हूं भाई प्रभु की हमसे मिलने की इच्छा नहीं होती तो हमारे जीवन में मानक बनता ही कैसे हम 00:00:36 कोई ऐसे भारी पुण्य आत्मा है जो अपने पुण्य के बल से यहां पहुंच गए कोई है जो यहां तक 00:00:45 लाया है और जो यहां तक लाया है जोर से बोलो वो आगे भी लेकर जाएगा क्योंकि वो पूर्ण है 00:00:57 जो भी कार्य करता है पूर्ण ही करता है 00:01:03 जो गुरु ने व जो हरि भक्ति की संजीवनी जड़ी दी है गुरु के वचन पर विश्वास करके श्रद्धा सहित 00:01:11 नित्य निरंतर उस औषधि का पान करना है यही विधि भले सो रोग न 00:01:23 साही नात जतन कोटि नहीं जा कह रहे गरु सावधान क्योंकि आप बड़े ज्ञानी है आप आप समर्थ है आप 00:01:37 भगवान के पार्षद है पर फिर भी ध्यान रखिए क ही विधि भले ही सरोग न साई ऐसे तो भले 00:01:46 यह रोग नष्ट हो जाए बोले नहीं तो जतन कोटि नहीं नहीं तो कोटि जत्न करने से भी मन स्वस्थ 00:01:54 नहीं होता मन निर्मल नहीं होता नहीं होता इसलिए तो कहते भाई यह गुण साधन ते नहीं हुई क श 00:02:06 श्री रघुनाथ जी की कृपा हो कोई सच्चा संत मिल जाए और फिर सच्चा संत भी मिले और उसके वचन 00:02:11 में विश्वास भी हो जाए श्रद्धा भी हो जाए तभी नारद जी भक्ति सूत्र में कह रहे मत संगस तु 00:02:18 दुर्लभ हो फिर कह र अगम्य अमोग कहने से पहले यह दो बातें कही है पहले तो दुर्लभ है मिलेगा 00:02:26 ही नहीं अग मिल भी जाए तो व्यक्ति अपनी ता से अपनी मूर्ता से संत को पहचानता नहीं है संत 00:02:34 मिल भी जाए तो उसके वचन में श्रद्धा नहीं होती विश्वास नहीं 00:02:40 होता हम तो भाई देखो कहीं से भी आरंभ करें आपको बात तो एक ही बताएंगे बिन हरि भजन न 00:02:49 जाही 00:02:52 कलेसा बिन हरि 00:02:58 भजन 00:03:03 और फिर अंत में क्योंकि अब चर्चा को विश्राम की ओर ले जाना है फिर कागस जी अंत में कह 00:03:12 रहे हैं सब करमत खग नायक यहा आरंभ में क्या कहा था निज अनुभव अब कह खगे सा हरि भजन 00:03:31 न जाही कले हा हा गाओ गाओ बिन हरि 00:03:44 भजन बस रोज अपने मन को भी सुनाते रहना यह बात रोज आप अपने मन को भी सुनाते रहना कि 00:03:52 बिन हरि भजन न जाही कलेसा आरंभ में यह कहा था और फिर अब क्या कह रहे हैं सब कमत 00:04:02 खग नायक 00:04:06 यहा करय राम पद पंकज नेहा करि राम पद पंकज श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहा श्रुति पुराण 00:04:35 सब रघुपति भगति बिना सुख 00:04:43 नाही 00:04:48 भ ये दो चौपाई याद कर लो निज अनुभव अब कह खगे सा 00:05:06 बिन हरि भजन न जाही 00:05:12 कलेसा 00:05:18 ह श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहा 00:05:28 हीरा 00:05:32 बहारी रघुपति भगति बिना सुख नाही 00:05:46 ख राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:05:59 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजाराम राम राम जय 00:06:13 सीताराम राम राम जयीता राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम एक 00:06:26 बार प्रात स्मरणीय श्री डोंगरे जी महाराज बंबई कथा कहने के लिए गए श्रीमद् भागवत की कथा होनी थी पांडाल 00:06:37 में पहुंचे व्यासपीठ पर विराजमान 00:06:42 हुए और ऐसा विशुद्ध संत शताब्दियों में कभी एक बार आता है इस धरा धाम को पवित्र करने के लिए 00:06:51 और उने राम कथा आरंभ कर दी अब जो यजमान थे उन्होंने स कथा के बाद पूछा कथा तो भागवत 00:07:05 जी की होनी थी आपने राम कथा आरंभ कर दी उन्होने उत्तर दिया कि भागवत में अगली बार कहूंगा यहां 00:07:18 के जन समूह को देखकर मुझे लगा पहले इनको राम कथा सुननी चाहिए फिर मैं आकर इनको कृष्ण कथा सुनाऊ 00:07:26 श्रीमद् भागवत में भी कृष्ण के पावन चरित्र से पहले श्री रघुनाथ जी का चरित्र 00:07:35 है जब तक जब तक ऐसी मर्यादा ऐसा संयम ऐसा आचरण ना हो तब तक जीव कृष्ण कथा का अधिकारी 00:07:47 नहीं है दुख होता है कभी मैं देखता हूं कल ही मुझे कौन दिखा रहा था किसी विश्व प्रसिद्ध संस्था 00:07:59 का एक सन्यासी जो अपने आप को वैष्णव कहते हैं मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता यहां से विश्व 00:08:08 प्रसिद्ध वह संस्था है और उसका एक सन्यासी और जब व श्री कृष्ण और गोपियों की बात कर रहा है 00:08:16 तो क्या उदाहरण दे रहा है गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड यही वो लोगों को सिखा रहा है लोग भी बैठकर ताली 00:08:23 पीट रहे हैं इसलिए इसलिए कहा है कि भाई अधिकारी से बात ना करें अनाधिकार स चर्चा ना करें श्रीमद् 00:08:36 भागवत के प्रत्येक अध्याय के विश्राम के समय लिखा य परम हंसों की संगिता है यह तो परम हंसों का 00:08:45 चिंतनीय विषय है जो अमला अपमा जन है व वो पुनः पुनः इस पावन चरित्र का चिंतन करते हैं और 00:08:51 मैं देख रहा हूं माथे पर वैष्णव तिलक है गले में तुलसी की कंठी है विश्व प्रसिद्ध वो संस्था उसका 00:08:57 वो सन्यासी और देखा मैंने बड़ा प्रसिद्ध भी है और जब श्री कृष्ण और गोपियों की बात कर रहा है 00:09:03 तो यह उदाहरण दे रहा है यह 00:09:10 उदाहरण तो मुझे बड़ा दुख हुआ मुझे बड़ी पीड़ा हुई और फिर धीरे धीरे संतों का सिद्धांत हृदयम हो रहा 00:09:20 है देखो भाई राम कथा हो या कृष्ण कथा है तो हरि की कथा ना मन को निर्मल पावन करने 00:09:28 वाली पर अनेक अनेक सिद्धांत श्री राम कथा में ऐसे हैं जो हमारी भक्ति की भाव की जो भूमिका है 00:09:39 उसको सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है परम आवश्यक है और फिर आज तो जैसा अब भाई समय की गति 00:09:47 है जैसा हो रहा है अब तो मैं तो बहुत स संकोच बोलता हूं कि भाई क्या कहना चाहिए क्या 00:09:55 नहीं कहना चाहिए क्यों क्योंकि हमको संत सावधान कर चुके हैं कि अधिकारी से बात करे तो रस आप जाए 00:10:02 अंतर परे निसंदेह कल से यहां श्रीमद् भागवत की चर्चा आरंभ होगी और मैंने कहा यह परम हंसों की संगीता 00:10:13 है केवल आचार्यों की गुरुजनों की कृपा का बल लेकर 00:10:20 ही हम इस पावन अनुष्ठान में प्रवेश कर सकते 00:10:27 हैं मैं तो फिर भी सब सब विचार कर अंत में अंत में धन्यवाद देता हूं प्रभु का कि उसके 00:10:34 गुण उपकार का पा सकू नहीं पा य श्री काग बसु जी ने कहा ना कि श्री रघुनाथ जी की 00:10:43 कृपा और संयोग बन जाए ऐसे यहां हम पर लाड़ली लाल की कृपा हुई और यह संयोग बन गया है 00:10:51 य संयोग बन 00:10:55 गया राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:11:07 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम हरे रामा रामा 00:11:19 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:11:33 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:11:47 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:12:01 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:12:14 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:12:28 राम रामा रामा राम सीता राम राम राम बारी मथे गृत हो बरु सताते 00:12:49 बरते श काग ब सुंडी जी कह रहे बोले जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए जो 00:12:59 किसी भी काल में असंभव है क भले ऐसा हो जाए बारी मथे गृत 00:13:12 होई और कह बालू को पेरने से भले तेल कोई निकाल ले यह तो हो सकता है हो सकता है 00:13:21 कासुंडी कह र भले यह हो जाए 00:13:26 पर बारी मथे त होई ब सताते 00:13:38 रुते बिन हरि भजन न भव तरिए यह सिद्धांत अपे यह सिद्धांत कले बर्फ से अग्नि प्रकट हो जाए ये 00:13:57 सब अनहोनी बातें हो जाए हो जाए शी श्री राम जी से विमुख होकर कोई सुखी नहीं हो सकता बिन 00:14:05 हरि भजन ना भव तरिए यह सिद्धांत 00:14:12 अपे मस कहीं करई रंच प्रभु अजही म सकते 00:14:23 ही और सावधान कर रहे गरुड़ जी को क्योंकि गरुड़ जी जाएंगे शुभकामना दे रहे हैं बड़ी विनम्रता पूर्वक गणु 00:14:34 जी ध्यान 00:14:38 रखिए य जो प्रभु है क मस कही कर रंच प्रभु मसक माने मच्छर बोले प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर 00:14:51 दे और ब्रह्मा को नहीं ब्रह्मा को मच्छर 00:14:58 नहीं 00:15:02 तुलसी बाबा तो तुलसी बाबा है कर मस कही करई बिरंचि प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर दे और ब्रह्मा को 00:15:10 अजही मसक ते हीन और बोले उसको मच्छर से भी हीन कर सकते हैं एक क्षण में अस विचार तज 00:15:20 संशय कह रहे दोबारा ऐसा संशय ना करना प्रभु को नाग पाश में बंदे देखकर ही तो आपको मोह हुआ 00:15:27 था अरे वो करतु करतु मन्य था तु कुछ भी कर सकते हैं भाई इसलिए जो भी हो रहा हो 00:15:33 उसको देखकर तेरी माया का ना पाया कोई पार के लीला तेरी तू ही जाने तेरी माया का ना पाया 00:15:55 कोई पर भाई प्रभु कृपा करते हैं जब किसी को अपने ऐसे स्वरूप का अनुभव कराते हैं सोई जाने ही 00:16:05 देहु जनाई सोही जाने जो प्रभु की कृपा से प्रभु को जानता है और जिसको प्रभु समझाना चाहते हैं इसको 00:16:17 दिखाते हैं प्रभु अपना निज स्वरूप अपना विशुद्ध स्वरूप का बसु जी बड़भागी है इसलिए कह रहे कि हे गरुड़ 00:16:26 जी सचा तज 00:16:32 संशय राम ही भज 00:16:37 प्रवी राम ही भज और अंत में श्री काग ब सुंडी जी ने अपने लिए जो कहा है व यह 00:16:47 बताता है कि भगवान की भक्ति कैसा दैन्य प्रसाद स्वरूप देती है भगवान का भक्त कितना दीन कितना विनम्र होता 00:16:55 है आप देखिए हमने चर्चा आरंभ की थी कहां से कि महादेव 00:17:05 देवादित्य में क्या कहते हैं देख गरुड़ निज हृदय 00:17:15 विचारी मैं रघुवीर भजन अधिकारी रे गरुड़ जी आप अपने मन में विचार करके देखिए कि क्या मैं किसी भी 00:17:30 प्रकार से भगवान के भजन का अधिकारी हूं सकुना धम अरे पहले तो पक्षी हूं और पक्षियों में भी पक्षियों 00:17:42 में भी अधम हूं सकुना 00:17:57 धम 00:18:03 सखु ना धम सब भाति 00:18:10 अवन प्रभु मोहि की विदित 00:18:27 जग सकुना धम सब भाति 00:18:38 अवन प्रभु मोहि की विदित जग पा देखो एक तो मैं अधम पक्षी सब भाति अपवित्र और देखो कैसे प्रभु 00:18:51 ने मुझे जगत को पावन करने वाला प्रसिद्ध कर दिया महादेव मेरी स्तुति करते हैं आप कहते हैं और मैं 00:19:00 मन में यह विचार करता हूं कि किसी भी प्रकार से क्या मैं किसी भी प्रकार से श्री रघुनाथ जी 00:19:07 के भजन का अधिकारी हूं अ आप ही विचार करिए देख गरुड़ निज हृदय बचारी का बुी जी के शब्द 00:19:18 बता रहे भगवान का भक्त कैसा होता है कैसा भक्त का हृदय होता है कैसे भक्त सदा प्रभु के निकट 00:19:27 रहते हैं 00:19:34 बड़ा ना जाने पाए हैं साहिब के 00:19:44 दरबार द्वारे ही पे लागी है सहजो मोटी मा यही तो कल मैं आपको कह रहा था भाई संत मिले 00:20:00 जिसमें संत 00:20:05 हो भगवान का भक्त जिसको भगवत सत्ता की अनुभूति है जो अनुभव प्राप्त है व तो भाई किसी भी प्रकार 00:20:13 से कोई श्रेय कोई प्रतिष्ठा कोई सम्मान स्वीकार नहीं कर सकता है कर ही नहीं सकता 00:20:22 है आप देखो गरुड़ जी कौन है भगवान के पार्षद उनको मोह उनके मोह को दूर काग बु सुंडी ने 00:20:30 किया है कैसी सामर्थ्य श्री काग बु सुंडी जी की मैं कई बार विचार करता हूं जब श्री विठल दास 00:20:37 जी ने एक विषय राजा को अपने रोम रोम में वृंदावन का दर्शन करवा दिया दर्शन करा 00:20:47 दिया और जब राजा ने कहा कि मैं आपके शरणागत हूं तो श्री विठ्ठल दास क्या कहते हैं कि मेरे 00:20:57 गुरुदेव विराजमान ने शरण ग्रहण करनी हो तो उन्हीं की ग्रहण करिए आप देखो विठ्ठल दास जी समर्थ है तभी 00:21:03 तो उस राजा को दर्शन करा दिया जो वस्तु का दर्शन करा रहा है साधिकारथा होगी और उनके हृदय का 00:21:12] ैन्य देखिए कि हम तो उनके उनके चरणों के सेवक हैं आपको शरण ग्रहण करनी है तो फिर हमारे स्वामी 00:21:21 की ग्रहण करिए गरुड़ जी के मोह का नाश श्री काग बसु जी ने अपनी वाणी से किया है गुरु 00:21:29 की सामर्थ्य है इसीलिए इसीलिए पहले ही श्री गरुड़ जी ने कागी जी को गुरु के स्थान पर बैठा दिया 00:21:35 और बड़ी विनम्रता पूर्वक य सब प्रश्न पूछा है शास्त्र का विधान तो यही कहता है बिना गुरु बुद्धि के 00:21:41 प्रश्न नहीं करना चाहिए आपको स्मरण हो तो मैंने गत सत्र में निवेदन किया था पहले पहले गरुड़ जी श्रोता 00:21:50 बन के कथा सुनते रहे पर फिर फिर उन्होने श्री काग बसु जी को गरुड़ गुरु के स्थान पर बैठाया 00:21:58 स्वयं शिष्य के स्थान पर बैठे तो काग बुजी जी गुरु है और किसके गुरु गरुड़ जी के गुरु हो 00:22:03 गए काग बुजी उनके उनके मोह का नाश कर दिया अपने शब्द से अपनी वाणी से य तो गुरु का 00:22:10 ही लक्षण है ना महा मोह तम पुंज जहा सु वचन रवि कर बंद गुरु पद कंज और कृपा सिंधु 00:22:18 नर रूप हरि और व काग बसु अब कथा विश्राम हुई है अब यह संवाद विश्राम की ओर जा रहा 00:22:27 है 00:22:30 राई के दाने जितना भी श्रे लेने को तैयार नहीं है गरुड़ जी बारबार प्रणाम कर रहे हैं और वह 00:22:35 कह रहे हैं देख गरुड़ निज हृदय विचारी मैं रघुवीर भजन अधिका सकुना धम सब भाति अवर प्रभु मोही की 00:23:01 विदित जग पा और इससे पहले गरुड़ जी कुछ कहते कासुंडी जी ने दोनों हाथ जोड़ लिए भाई कथा तो 00:23:09 पूरी हो गई अपने आसन से उतर आए हैं आज धन्य में धन्य अति जदपि सब विधि हीन निज जन 00:23:22 जानी राम मोही संत समा 00:23:31 संत समागम यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन हू और एक और बात जिनका मन लीन है हरि भक्ति में 00:23:46 लीन है उनके लिए श्री सेवक जी महाराज कह रहे हरिवंश नाम लीन जे अजात शत्रु ते सदा प्रपंच दंभ 00:23:54 आदि द तहा कछु न पखी ये सब बातें तो हम लोग भी कभी कभी कहते हैं पर हम लोगों 00:24:01 का कहना दंब मात्र है जब भक्त कह रहा है तो वैसा ही अनुभव कर रहा है व वैसा ही 00:24:08 अनुभव कर रहा है तभी कह रहा है संत वही तो है ना जिसकी जिसकी कथनी करनी एक हो मनस्य 00:24:15 एकम वस्य एकम कर्मण्य एकम स साधु जिसकी कथनी करनी एक हो वही तो साधु है इनकी कथनी करनी एक 00:24:24 है वो कह रहे हैं यद मैं सब विधि जद सब विधि हीन निज जन जानी राम मोही संत समागम 00:24:41 दी संत समागम य तो प्रभु ने केवल मुझ पर कृपा की है मुझे अपना जन जान के सत्संग दिया 00:24:51 है संत समागम दीन आगे महादेव कहेंगे गिरिजा संत समा समना लाभ 00:25:05 कछुआ संतो की कृपा से गुरु कृपा से मन अनुभव करता है मैं अपनी बात कहूं मन अनुभव करता है 00:25:14 कि गिरिजा संत समागम समन लाभ कचुवा पर क्या करू मेरे पास वैसी वाणी वैसे शब्द नहीं है जो मैं 00:25:20 आपको बता सकू समझा सकू कैसा लाभ है य कैसा सुख है संत मिलन सम सुख जग नाही जन्म जन्म 00:25:29 का अनादि काल से भटकता हुआ जीव सदमा पर आ जाता है यह यह सत्संग का फल है तभी ध्रुव 00:25:38 दस जी ने कहा मोल तोल सब फिर गयो और पायो नाम फुलेल कहान होई सत्संग देखो तिल और तेल 00:25:47 कहा जन्म जन्म से भटक भटक रहे थे हम संत मिला सद मार्ग मिल गया मोल तोल सब बदल जाता 00:25:57 है किसकी महिमा है सत्संग की महिमा है गिरिजा संत समागम समना लाभ 00:26:11 कछुवा बिन हरि कृपा ना होई सो गाव ही वेद पुराण गाव ही वेद पुराण शिव अज पूज्य चरण 00:26:35 रघुराई मो पर कृपा परम मृदु लाई अस सुभव कह सुन ना देख केही खगे रघुपति समले कैसी अपने इष्ट 00:26:57 के प्रति भावना हो ऐसा दर्शन य तुलसी बाबा करा रहे हैं जिन श्री रघुनाथ जी के चरण शिवजी और 00:27:04 ब्रह्मा जी के द्वारा पूज्य हैं उनकी मुझ पर ऐसी ऐसी कोमल करुणा है ऐसी कृपा है कह रहे हे 00:27:13 गरुड़ जी मेरे श्री रघुनाथ जी जैसा स्वभाव ना तो मैंने कभी देखा है और ना मैंने कभी सुना है 00:27:23 सुन भूसुंडी के वचन शुभ देख राम पद ने बोले प्रेम सहित गिरा गरुड़ विगत 00:27:42 संदे तब गरुड़ जी बोले श कासुंडी जी का व दिव्य प्रेम वैभव देखकर प्रेम का भी तो अपना एक 00:27:50 वैभव होता है वो प्रेम वैभव देखकर श्री गरुड़ जी बोले मैं कृत कृत्य य तब बानी सुन रघुवीर भगति 00:28:05 रस सानी राम चरण नूतन रती भई माया जनित विपत सब गई य मेरी नवीन प्रीति हो गई है प्रभु 00:28:22 के चरणों में तो इसी कारण जो नित्य बना रहता है ना सत्संग में उसका प्रेम उसका अनुराग उसका भाव 00:28:32 भी नित्य नवाय मान रहता है एक बार मुझसे किसी ने पूछा था बोले वही तो कथा है मैंने क 00:28:42 गैया वही दूध तो देती है रोज देखने में एक जैसा ही होता है स्वाद भी एक जैसा है और 00:28:48 उसका नित्य पान करने से पोषण तो नित्य नवीन प्राप्त होता है ऐसे ही भगवान की कथा है ऐसे ही 00:28:54 भगवत चरित्र है पर जब कोई प्रणाम करता है त आशीर्वाद देना चाहिए गरुड़ जी ने प्रणाम किया है कागस 00:29:06 आशीर्वाद भी देते हैं तो देखो कैसे भगवान का भक्त कैसा है कैसी उसकी चेष्टा है कैसे उसका कैसा उसका 00:29:15 एक एक आचरण 00:29:21 है जा सु नाम भव भेषज हरण 00:29:31 यस जिनका नाम जन्म मरण रूपी रोग की औषध और आदि दैविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की भयंकर 00:29:42 पीड़ा और ताप को हरने वाला है कासुंडी आशीर्वाद दे रहे हैं गरुड़ जी प्रणाम कर रहे हैं और व 00:29:51 व्यासपीठ पर भी बैठे हैं पर कैसे दे रहे हैं आशीर्वाद ज सु नाम भव भे सज हरण घोर त्रय 00:30:03 सूल सो कृपाल मोहितो पर सदा रह अनुकूल सदा रह अनुक वो श्री रघुनाथ जी पहले तो मुझ पर मैं 00:30:22 दीन हीन हूं मैं कृपा पात्र हूं पहले मुझ पर और फिर आप पर भी सदा अनुकूल रहे हैं ऐसा 00:30:29 आशीर्वाद काग ब सुंडी दे रहे मुझे मुझे इतना आनंद हुआ जब ये पंक्ति मैंने पढ़ी कि काग बसु आशीर्वाद 00:30:37 देरहे पर कैसे बोले श्री रघुनाथ जी पहले तो मुझ पर अनुकूल हो और फिर आप पर अनुकूल रहे 00:30:48 हैं मुझसे कोई पूछे कि एक शब्द बताइए इस मानस का सार क्या है एक शब्द तो जैसे श्री गोसाई 00:30:57 विट्ठलनाथ जी कहते ना हे गोकुलेश आपकी कृपा का हेतु एक मात्र दैन्य है वो दैन्य इस मानस का सार 00:31:04 है अंतिम बात मेरे तुलसी बाबा यही कह रहे हैं मोसम दीन न दीन हित तुम समान 00:31:18 रघुवीर अस विचार रघुवंश मणि हर भ 00:31:37 भीर फिर गरु जी अंत में कह रहे हैं मो पही होईना प्रति 00:31:56 उपकाराची प्रति उपकार करो का तोरा मैं आपका ऋण तो नहीं चुका सकता सदा सदा आपका आपका ऋणी हूं बस 00:32:04 बंदे तब पद 12 ही बारा बस बार बार बार बार बार बार आपके चरणों में प्रणाम करता हूं यही 00:32:13 मैं आपको सदा कहता हूं भाई गुरु को बस ऐसे भाव से प्रणाम ही तो किया जा सकता है और 00:32:17 क्या ही निवेदन करेंगे 00:32:22 उसको जिसने मन को स्वस्थ किया है जिसने दुरंत मोह का भंजन किया है जिसने इस जीवन को प्रभु के 00:32:32 योग्य बनाया है जिसकी कृपा से प्रभु अनुकूल हुए हैं उसको क्या निवेदन किया जाएगा इन संतों का इन भक्तों 00:32:41 का इन भागव तों का आचरण आपको मुझे बता रहा है कह रहे गरुड़ जी मो पही होई ना प्रति 00:32:55 उपकाप बारही 00:33:01 इसलिए श्री हरदास जी कहते हैं कहे कथा और अर्थ 00:33:11 विचारे आप तरे औरन को 00:33:25 तारे कहर मिले 00:33:40 हरिदासा जनम जनम की पूरी 00:33:54 आशा क्या कहकर गरुड़ जी विदा ले जीवन जन्म सुफल मम 00:34:07 भय सफल मम भय तब प्रसाद सब संशय गय जाने ह सदा मोहि निज किंक पुनि पुनी उमा 00:34:31 महादेव मां भवानी से कह रहे हैं यह कहकर गरुड़ जी प्रस्थान किए हैं हे नाथ मैं आपका ऋण तो 00:34:40 नहीं चुका सकता प्रति उपकार तो नहीं कर सकता बस इतना ही आपको निवेदन करके प्रस्थान करता हूं कि आप 00:34:50 सदा सदा के लिए मुझे अपना सेवक जानिए देखो जो नारायण के पर् वो नारायण स्वरूपी होते हैं जो भगवत 00:35:01 पार्षद है वो भगवत स्वरूपी हैं गरुड़ जी भगवत पार्षद 00:35:10 है यहां इस लीला के माध्यम से अंतिम सिद्धांत भगवान क्या प्रतिष्ठित कर रहे हैं राम ते अधिक राम करि 00:35:24 दासा राम ते अधिक राम करि दासा दासु चरण सिर नाय कर प्रेम सहित मति धीर गय गरुड़ बैकुंठ तब 00:35:43 हृदय राख रघुवीर महादेव कह रहे भाई इसके बाद गरुड़ जी बैकुंठ को गए और मां भवानी ने कहा हमसे 00:35:53 भी आप कुछ कह दीजिए काग बुस जी ने कथा के अंत में एक सिद्धांत कहा ना कि बिन हरि 00:36:01 भजन न भव तरी यह सिद्धांत अपेल आपने भी हमको कथा सुनाई है आप भी अंत में हमको कोई एक 00:36:06 बात कह दीजिए महादेव मुस्कुराकर क्या बात कह रहे हैं गिरिजा संत समागम समना लाभ कछु आन बिन हरि कृपा 00:36:22 ना होई सो गाव ही वे पुराण गाव ही वेद पुराण कहा कि हे गिरजे संत समागम के समान कोई 00:36:39 दूसरा लाभ नहीं है प्रभु जब अनुकूल होते हैं विशुद्ध कृपा भगवान की होती है तब कोई ऐसा संत मिलता 00:36:48 है तब ऐसा कोई संयोग बनता है सार की बात एक बार पुनः आपको निवेदन करूं भु सुंडी जी सावधान 00:36:58 करते हुए कह रहे भाई ये मानस रोग अनेक अनेक अनेक प्रकार की औषधियां युक्तियां करने पर भी समूल नष्ट 00:37:05 नहीं होते और कह रहे बड़े-बड़े मुनियों के मन में फिर विषय सुख और उसकी संभावना अंकुरित हो जाती है 00:37:14 तो बेचारा मनुष्य क्या है मनुष्य की गिनती किसम है यह शब्द तुलसी बाबा ने प्रयोग किया का नर बापुरे 00:37:22 बेचारा मनुष्य क्या करेगा जो बड़े-बड़े धीर मती मुनि है तपस्वी है उनके मन में भी विषय सुख की कामना 00:37:32 अंकुरित हो जाती 00:37:36 है तो जब गरुड़ जी थोड़े निराश हुए भाई फिर करें क्या बोले राम की कृपा हो राम कृपा से 00:37:43 बोले संयोग बन जाए सदगुरु बैद वचन 00:37:50 विश्वासा गुरु के पहले तो गुरु मिल जाए और फिर गुरु के वचन पर विश्वास हो जाए तब ये तब 00:38:00 रोग नष्ट होता है और एक और बात कही है भूलना नहीं इस विधि भले हो जाए तो हो जाए 00:38:07 जैसे श्री नाभादास जी महाराज जब श्री महाप्रभु जी का परिचय देते हैं तो क व्यास सुवन पथ अनुसरे सोई 00:38:15 भले पहचान ये जो भले कहा है ना माने इस पथ पर चलने वाला तो भले पहचान ले तो पहचान 00:38:21 ले ऐसे अंत में कह रहे हैं बोले हरि की कृपा से भले येय मन निर्मल हो जाए तो हो 00:38:27 जाए भले अन्यथा अन्यथा तो कोई साधन नहीं है कोई युक्ति नहीं ये मन हो निर्मल तुम्हारी कृपा से इसे 00:38:43 शुद्ध करने में हम तोहे हारे अगर नाथ 00:38:56 देखो 00:39:14 माए तो हम कैसे भव से लगेंगे 00:39:23 किनाए ये पावन चरित्र प्रभु की कृपा से प्रभु की प्रेरणा से प्रभु के प्रसाद से कहकर सुनकर हम यहां 00:39:35 प्रभु के चरणों में निवेदन करते हैं ऐसे तो यह भाव जगत की बात है कहने की बात नहीं है 00:39:41 फिर भी मैं कह रहा हूं कि जैसा मैंने आपको कहा था इस जीवन में इस जन्म में इस जीवन 00:39:52 में मेरा पहला परिचय श्री रामचरित मानस जी से हुआ इसलिए मैं प्रथम प्रणाम इन्हीं को निवेदन करता हूं और 00:40:04 जब संतों की कृपा से इस स्थान पर बैठने को मिला तो मैंने सबसे पहली कथा श्री हनुमान जी को 00:40:11 लक्ष्य करके सुनाई थी मेरे जन्म स्थान में हनुमान जी का एक सिद्ध स्थान है वही श्री हनुमान जी को 00:40:19 लक्ष्य करके मैंने भक्त माल की कथा सुनाई थी और तब से लेकर आज के दिन तक इस क्षण तक 00:40:31 उनकी कृपा उनका आशीर्वाद किसी ना किसी प्रकार से मुझे सदा मिलता रहा है ज मैंने यह प्रसंग आरंभ किया 00:40:39 था तो मन ही मन भाव से उनको निवेदन किया था पहली बात तो प्रभु चरित्र सुनि वे को रसिया 00:40:50 राम लखन सीता मन बसिया आपकी कृपा से आप अनुग्रह से ही कोई पवित्र अनुष्ठान सफल होता है यहां काग 00:41:02 बसु जी जैसे वक्ता है यहां महादेव जैसे वक्ता है यहां तुलसी बाबा जैसे वक्ता है वही बात मुझे कहनी 00:41:11 है प्रथम दिन मैंने भाव से उनको निवेदन किया था कि आप आप कृपा करके यहां पर विराजमान रहना आपकी 00:41:19 सन्निधि रहेगी तो हम हम हम कुछ कह सुन पाएंगे यहां कुछ कुछ यहां पर प्राप्त कर पाएंगे ऐसे तो 00:41:26 उनको निमंत्रण दे आवश्यकता नहीं होती जहां मंगल करण कलि मल हरण तुलसी कथा रघुनाथ की जहां यह पावन रघुनाथ 00:41:35 गाथा गाई जाती है वहां वह स्वत आकर विराजमान हो जाते हैं पर बीच में दो बार ऐसा श्री हनुमान 00:41:44 जी महाराज ने मुझे अपनी अपनी उपस्थिति का अनुभव कराया उनकी कृपा से ही मैं जो कह पाया उनकी कृपा 00:41:52 से कह पाया हूं कि यह कहना सुनना जो भी है इसके मूल में केवल केवल केवल आचार्यों की गुरुजनों 00:41:58 की संतों की कृपा है जो भी कहा गया इसमें जो सुंदर है वह भगवान का यश है और जो 00:42:04 त्रुटियां है वो मेरी है यही कहकर आज की चर्चा में लाली लाल जी के चरणों में निवेदन करता हूं 00:42:09 महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हृदयस्पर्शी

गुरु से परे कोई तत्व नहीं है | गुरु तत्त्व क्या है? - 1 /3 Jagadguru Shri Kripalu Ji

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00:03:00 प्रवचन की शुरुआत हरि नाम संकीर्तन और गुरु तत्व की महिमा का परिचय देकर की गई है। 00:06:44 वेदव्यास जी के कथनानुसार गुरु से परे कोई तत्व नहीं है, जबकि वेदों में परब्रह्म श्री कृष्ण को ही सर्वोत्तम बताया गया है। 00:08:22 उपनिषदों के अनुसार सृष्टि में ब्रह्म, जीव और माया—ये तीन अनादि, अनंत एवं शाश्वत तत्व विद्यमान हैं। 00:12:44 भगवान श्री कृष्ण की माया से मुक्ति केवल उनकी और गुरु की शरणागति एवं कृपा से ही संभव है। 00:14:17 ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप 'आनंद' है और प्रत्येक जीवात्मा उसी आनंद का अंश होने के कारण सदैव केवल सुख की ही खोज करती है। 00:19:36 तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार जब तक जीवात्मा उस परम आनंद (ईश्वर) को प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक उसे वास्तविक सुख नहीं मिल सकता। Https://www.youtube.com/live/pPhHilwAuAE Full Transcript :

00:00:01 के 00:00:05 धरपण मारजनम 00:00:13 भव महा 00:00:17 दावा 00:00:21 अग्नि निर्वापणम 00:00:29 श्रेय कव चंद्रिका वितरणम 00:00:40 विद्या बधु जीवनम 00:00:52 आंदा 00:00:58 बुद्धि वर्धनम प्रतिपदम 00:01:05 पूर्णता 00:01:10 स्वाधनम 00:01:16 सर्वात्मपनम 00:01:20 परम विजयते 00:01:26 श्री कृष्ण संकीर्तनम 00:01:38 नमः कमलना 00:01:54 नमः कमल माने 00:02:05 नमः कमल पाय 00:02:16 नमस्ते कमले क्षण यो ब्रह्माम विधा पूर्वम जो वेदा प्रहणो तस्मै त देवात्म बुद्ध प्रकाशम मुमुक्षुर शरणमह प्रपदे 00:02:42 वृंदारक वृंद बंद आनंद कंद सच्चिदानंद श्री कृष्ण चंद्र चरणारविंद मकरंद मिलिंद महानुभाव थोड़ी देर हरि नाम संकीर्तन कर लीजिए 00:02:57 पश्चात 00:03:00 गुरु तत्व पर कुछ प्रकाश डाला जाएगा भजो गिरधर 00:03:10 गोविंद गोपाला 00:03:21 गोविंद गोपाल 00:03:29 जो गिरधर 00:03:34 गोविंद गोपाला 00:03:45 गोविंद गोपाला 00:03:53 भज 00:03:58 गोविंद गोपाला 00:04:08 गोविंद गोपाल 00:04:16 भजो गिरधर गोविंद गोपाला 00:04:32 गोविंद गोपाल 00:04:39 भज गिरध 00:04:43 गोविंद गोपाला 00:04:53 गोविंद गोपाला 00:04:59 भज गिरिधर 00:05:04 गोविंद गोपाला 00:05:13 गोविंद गोपाला 00:05:19 बोलिए वृषभान नंदिनी राधा रानी की जय 00:05:27 अब आप लोग सावधान हो हो जाए आप लोग इसी आशा से आए होंगे कि गुरु तत्व पर कुछ प्रकाश 00:05:38 डाला जाएगा 00:05:43 किंतु गुरु तत्व पर प्रकाश डालने की सामर्थ्य केवल श्रोतय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष के पास ही है और कोई गुरु तत्व 00:06:01 पर प्रकाश नहीं डाल सकता फिर भी जब आप लोगों की इच्छा है तो हमको सेवा करना है कुछ ऐणा 00:06:12 बहणा जो कुछ होगा आपके सामने प्रस्तुत करेंगे 00:06:20 सबसे बड़ी अथॉरिटी वेदभ्यास है वेद के ज्ञाता 00:06:30 और 4 लाख श्लोक के रचयिता वेदांत के रचयिता गीता के रचयिता 18 पुराण के रचयिता उन वेदव्यास ने कहा 00:06:44 है नास्त तत्वम गुरु परम बड़ा भयानक वाक्य है गुरु से परे कोई तत्व नहीं 00:07:00 अब कोई ऐसे कैसे कह दे कि वेदव्यास भांग पी के ले गए होंगे अरे भगवान के अवतार हैं वेदव्यास 00:07:13 थोड़ा विचार करें इस पर ऐसा क्यों लिखा क्यों इसलिए कि समस्त वेद उपनिषद कहते हैं कि परात पर तो 00:07:24 ब्रह्म है श्री कृष्ण उससे परे और कोई नहीं है देखो वेद कह रहा है कि तीन तत्व हैं संजुक्त 00:07:37 में ततक्षर व्यक्तम भरते विश्व अनीष्यात्मा बते भोक्त भावा ज्ञात्वा देवम मुते सर्वपाश श्वेताकरोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा का यह उपनिषद 00:08:01 है 00:08:04 यह पहले अध्याय का आठवां मंत्र है अर्थात तीन तत्व हैं एक वो एक मैं एक ये वह माने ब्रह्म 00:08:22 भगवान परमात्मा अनेक नाम और मैं माने जीव आत्मा और यह माने माया ये तीन तत्व अनाद अनंत शाश्वत हैं 00:08:40 इन तीनों में किसी ने किसी को बनाया नहीं और कोई किसी का नाश नहीं कर सकता 00:08:49 कहने को तो माया जड़ है लेकिन है अनाध्य अनंत भगवान उसको समाप्त नहीं कर सकते अगर कर सकते होते 00:09:03 तो हम सब लोगों का क्या सौभाग्य होता आनंदमय हो जाते 00:09:11 तो यह तीन तत्व अनादि है इसके आगे फिर कहा श्वेतापनिषद ने ज्ञजा भीष भजा हेका भोक्त भोग्यार्थ युक्त अनंतत्मा 00:09:30 विश्व रूप्ता त्रयं जदा ब्रह्म में तत ये श्वतापनिषद का पहले अध्याय का नौवा मंत्र है इसमें कहा एक ज्ञ 00:09:46 है ज्ञ माने सर्वज्ञ और एक अज्ञ है सर्वज्ञ भगवान और अज्ञ जीव और एक माया है वो जड़ है 00:10:03 ये जीव उसका उपभोग करती है जीवात्मा उस माया का उपभोग करती है यानी संसार का भगवान नहीं करते वह 00:10:16 दृष्टा है देखते रहते हैं और जीवात्मा भोगता है और आगे चलिए क्षरम प्रधानमता क्षरम हर क्षरात्मते देव एक तस्याना 00:10:34 जो तत्व भावात भूते विश्व माया निवत्त ये भी श्वेता उपनिषद का मंत्र है पहले अध्याय का दवां मंत्र यह 00:10:49 भी कहता है एक क्षर है माया प्रधान भी कहते हैं उसको और अमृताक्षरम हर और अमृत अक्षर जो है 00:11:00 वो जीव है 00:11:04 और इन दोनों का जो शासक है गवर्नर नियामक वह भगवान है तीसरा तत्व और आगे स्पष्ट किया एतम नित्यवा 00:11:21 संस्थ ना परम वेदव्यम कििंचित भोक्ता भोग्यम प्रेरित्वा सर्वम प्रोक्तम त्रिविध ब्रह्म में तत ये श्वेतापनिषद का है ये पहले 00:11:38 अध्याय का 12वा मंत्र है इसमें कहते हैं देखो भाई बस तीन तत्व को जान लो और कुछ जानना नहीं 00:11:49 वही तीन तत्व ब्रह्म जीव माया तीनों को ब्रह्म कहा वेद ने त्रिविध ब्रह्म में तत ये तीन प्रकार का 00:12:02 ब्रह्म है अनादि है शाश्वत है कहने को तो माया जड़ है और बहुत से तो सर फिरों ने कहा 00:12:11 है मिथ्या है यहां तक कह दिया है लेकिन दवी हे गुणमई मम माया दुरतया मामेव ये प्रपद्यते माया मेंता 00:12:27 तरते गीता सातव अध्याय का 14वा श्लोक ये मेरी दैवी माया मेरी माया है मेरी ध्यान मेरी माया है बिना 00:12:44 मेरी शरणागति के बिना मेरी कृपा के कोई भी योगी ऋषि मुनि तपस्वी माया से उत्तीर्ण नहीं हो सकता स्वर्ण 00:12:58 अक्षरों में लिख लो कोई हो ब्रह्मा विष्णु शंकर भी क्यों ना हो बिना मेरी शरणागति और मेरी कृपा के 00:13:12 ना माया निवृत्ति होगी ना मुझको कोई जान सकता है ना मुझको कोई पा सकता है 00:13:22 तो तीन तत्व है इन्हीं को जान लेना है बस इतनी सी बात है और इन तीन में दो तत्व 00:13:31 ऐसे हैं जो शास्त्र है और एक तत्व है शासक नियामक भगवान जीव और माया पर नियामन करते हैं शासन 00:13:45 करते हैं 00:13:49 क्यों जी इन तीनों को जानने से लाभ क्या है क्यों जाने हम इन तीनों को तो वेद ने कहा 00:14:02 आनंदो ब्रह्मानात आनंदा देव खलमान भूतानी जायंते आनंद जातानी जीवती आनंदम प्रयंतम विषती वो जो है वो जिसको हम कह 00:14:17 रहे हैं ब्रह्म भगवान परमात्मा उसका एक खास नाम है आनंद पर्यायवाची है वो आनंद कहो चाहे भगवान कहो चाहे 00:14:28 परमात्मा कहो गॉड कहो कुछ कहो उस सुप्रीम पावर का नाम है आनंद बस तो हम उसके अंश हैं इसलिए 00:14:42 नेचुरल आनंद चाहते हैं विश्व में भले ही हजारों मत चल रहे हैं आस्तिकों के भी नास्तिकों के भी भौतिकवादियों 00:14:56 के भी अध्यात्मवादियों के भी लेकिन इसमें दो मत नहीं है कि हम आनंद नहीं चाहते ऐसा कोई कहने को 00:15:08 तैयार नहीं क्यों देखो किसी दो व्यक्ति की शक्ल नहीं मिलती अकल क्या मिलेगी अंगूठा छाप नहीं मिलता लेकिन इस 00:15:21 मामले में एक चींटी से ले ब्रह्मा तक सब एक रहा है आनंद चाहिए सुखम में भूयात दुखम में माभूत 00:15:32 हमको सुख मिले दुख ना मिले और प्रैक्टिकल रूप से भी जब हम मां के पेट से नीचे गिरे तो 00:15:43 पहला काम क्या किया नारा लगाया नारा हां रोए रोने का अभिप्राय क्या भले ही मां विभोर रो रही है 00:15:57 हां जिंदा है बच्चा बड़ा अच्छा हुआ लेकिन बच्चे को क्या दुख मिल रहा है पैदा होने का जो कष्ट 00:16:07 मिल रहा है उसको निकाल कर रोकर निकाल रहा है और यह कह रहा है कि मुझे दुख नहीं चाहिए 00:16:17 ये क्या मुसीबत संसार में आने आते ही मुसीबत दुख दबाव में दुख होता है वो दुख भूल गए होंगे 00:16:27 आप लोग बहुत बड़ा दुख होता है लेकिन मां खुशी मनाती है बाप खुशी मनाता है और तमाम प्रकार के 00:16:37 ढोल बजते हैं बच्चा रोता रहे तो हमने पैदा होते ही यह बताया संसार को कि हमको आनंद चाहिए दुख 00:16:51 नहीं चाहिए तब से पूरी लाइफ आनंद आनंद कैसे मिले किसी ने कहा ऐसे हो ऐसे मिल जाएगा उधर गए 00:17:03 नहीं मिला इन कहा अरे वो बेवकूफ है इधर आओ इधर गए नहीं मिला सब जगह चप्पल जूते मिले दुख 00:17:11 मिला अशांति मिली अतृप्ति मिली अपूर्णता मिली बड़ी-बड़ी पोस्ट पर गए प्राइम मिनिस्टर हो गए बड़े-बड़े पैसे कमाने में गेट 00:17:24 वगैरह हो गए लेकिन अंदर अशांति टेंशन नींद की गोली खा के तो नींद आती है 00:17:37 लेकिन हम भाग रहे हैं उसी तरफ देख लो इसके पास 10 कार है 10 कोठी है तो अगर मेरे 00:17:45 हो जाए तो तो क्या होगा इससे जरा पूछ लो क्यों भाई तुम्हारा क्या हाल है अरे पहले पूछ लो 00:17:53 इसकी जल्दी क्या है भागने की नो नो दिख रहा है क्या पूछे अजी सुख दिखता नहीं है वो तो 00:18:02 रियलाइज किया जाता है फीलिंग में आता है इसकी क्या फीलिंग है ये तुम देख कर नहीं जान सकते ये 00:18:10 तो आदत है सबकी कहो भाई क्या हाल है ऑल राइट एक भी राइट नहीं है सब रॉन्ग है और 00:18:18 बकबक करता है ऑल राइट सभ्यता है ऐसा बोलने की बोल दिया किसी से हाथ मिलाया मुस्कुरा दिया माने सब 00:18:29 ठीक है तो हम केवल आनंद चाहते हैं क्यों हो क्यों ये सब एक मत क्यों है इसलिए कि हम 00:18:41 भगवान के आनंद के अंश है 00:18:47 ये वेद कह रहा है आनंद ब्रह्मजाना 00:18:57 रसो वैसा ये उपनिषद कह रहा है तैत उपनिषद दूसरी बल्ली का सातवां मंत्र है ये रसोव स बड़ा इंपॉर्टेंट 00:19:13 मंत्र है रसो वैसा आनंद वो है उसमें तुम्हें आनंद है नहीं कह रहा है वेद रसो व स नहीं 00:19:23 तो कहता रसो व तस्मिन ऐसा नहीं कहा वह रस है वह आनंद है और रसग्वम हेवयं उसको प्राप्त करके 00:19:36 ही लगा दिया एव अम ये जीवात्मा आनंदमय हो सकता है बस एक उपाय है 00:19:51 और फिर वेद यह भी कहता है कि देखो भाई वो जो ब्रह्म है उससे परे कुछ नहीं है यस्मात 00:20:04 परम ना परमस्त कििंचित यस्म नाणियों नजयोस्त कश्चित श्वेता शतरोपनिषद के तीसरे अध्याय का नौवा मंत्र है 00:20:24 कोई पर तत्व इसके आगे नहीं है गुरु कहां से आठ अफक पड़ा वेद कह रहा है कि उससे परे 00:20:30 कोई तत्व नहीं अरे गीता तो आप लोगों ने पढ़ी होगी मत परम्य किंचित धनंजय अर्जुन मुझसे परे कुछ नहीं 00:20:42 है सातवें अध्याय का सातवां मंत्र श्लोक तो भगवान से परे कोई तत्व नहीं है फिर ने


कलयुग में श्रीराम नाम की सबसे गोपनीय महिमा - Indresh ji Maharaj

कलयुग में श्रीराम नाम की सबसे गोपनीय महिमा | indresh maharaj katha | indresh ji maharaj

Https://youtu.be/9KyvtKKJeaE 
First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given कलयुग में श्रीराम नाम की महिमा  1. The Secret Glory of Lord Ram's Name & The Law of Nature कलयुग में श्रीराम नाम की गुप्त महिमा और प्रकृति का न्याय 2. Swami Ramanandacharya’s Divine Test: Why Vengeance is Demonic स्वामी रामानंदाचार्य की राम-नाम परीक्षा: बदला लेना राक्षसत्व क्यों है? https://youtu.be/9KyvtKKJeaE  [00:00] स्वामी रामानंदाचार्य जी के बाल्यकाल की घटना का प्रारंभ और प्रवचन में "राम जी के भरोसे रहने" की बात सुनना। [00:53] महाराज जी द्वारा स्पष्टीकरण कि सामान्य कर्तव्य (नौकरी, भोजन, प्यास) करते रहना चाहिए, केवल अनावश्यक चिंताएं ईश्वर पर छोड़नी चाहिए। [01:30] बालक रामानंदाचार्य जी का व्यास जी से तर्क करना और व्यास जी का क्रोध में आकर कहना कि "राम नाम रोटी भी खिला देगा"। [02:13] रामानंदाचार्य जी की प्रतिज्ञा—24 घंटे बिना प्रयास के भोजन मिलने पर जीवनभर श्री राम का गुलाम बनने का संकल्प। [03:09] एक अज्ञात स्थान पर जाकर बरगद के पेड़ पर बैठकर निरंतर "राम-राम" नाम जप करना। [03:32] तीर्थयात्रियों का नदी किनारे आना, भोजन (पूरी, सब्जी, गुलाब जामुन) निकालना और डाकुओं का आक्रमण। [04:52] डाकुओं के सरदार को भोजन में जहर होने का संदेह होना और पेड़ पर बैठे रामानंदाचार्य जी को देखना। [05:35] डाकुओं द्वारा उन्हें गुप्तचर मानकर पकड़ना और हाथ-पैर बांधकर जबरदस्ती सारा भोजन उनके मुंह में ठूंसना। [06:34] रामानंदाचार्य जी का रोना और राम नाम की महिमा को स्वीकार करना कि राम जी हाथ-पांव बांधकर भोजन कराते हैं। [07:33] रामानंदाचार्य जी का संपूर्ण जीवन प्रभु श्री राम एवं राम नाम को समर्पित करना। [09:11] श्रीमद्भागवत कथा का प्रारंभ, वेदव्यास जी द्वारा रचना और राजा परीक्षित-सुखदेव जी का प्रसंग। [10:00] महाभारत युद्ध का अंत, दुर्योधन का पतन और उसके मन में उपजी बदले (Revenge) की भावना। [11:09] सनातन धर्म में बदला लेने की मनाही का सिद्धांत—बदला मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति (पंचमहाभूत) लेती है। [12:03] बदला लेने की सोच को राक्षसत्व (राक्षसी प्रवृत्ति) और ईर्ष्या का लक्षण बताना। [15:34] समाज में अपराध (स्त्री, बालक, बुजुर्गों पर अत्याचार) और सामान्य व्यक्तिगत घटनाओं में अंतर समझाना। [17:40] कुछ लोगों में सहनशीलता बिल्कुल नहीं होती। रात को नींद नहीं आती कि कैसे इसका बदला लूं।  रावण और शूर्पणखा का उदाहरण—बदले की भावना के कारण पूरी लंका का विनाश होना। [22:08] सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप—अपराध पर दंड देना धर्म है, पर व्यक्तिगत अहंकार में बदला न लेकर आगे बढ़ना ही साधुता है। https://youtu.be/9KyvtKKJeaE 

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00:00] जगदाचार्य कौन? श्री रामानंदाचार्य।  00:04] रामानंद संप्रदाय के प्रवर्तक और उनको प्रभु श्री राम का ही अवतार माना जाता है। तो श्री रामानंदाचार्य जी जब अपने बाल्यकाल में थे, अपनी युवा अवस्था में थे (बहुत ध्यान से सुनिएगा, जब भक्ति के बीजारोपण नहीं हुए थे उनके में), उस समय की बात है नगर में कोई प्रवचन चल रहा था और श्री रामानंदाचार्य जी बैठकर के सुन रहे थे।  00:33] तो प्रवचनकर्ता ने कहा— "राम के भरोसे बैठ जाओ, राम जी सब आनंद करा देंगे।" जैसे अभी हम कह रहे हैं, ठाकुर जी पर छोड़ो सारी इच्छाएं, ऐसे ही कोई वक्ता कह रहे थे कि राम जी के भरोसे हो जाओ, राम जी सब करेंगे।  00:53] अच्छा, एक बात सुनिएगा। कई लोग यहां बैठे हुए कहीं ऐसा अनुमान मत लगा लेना कि हाथ पर हाथ धर के बैठे रहो, सब आलसी बन जाओ, सब काम राम जी करेंगे। ऐसा नहीं कह रहे हम। सामान्य कर्तव्यों का निर्वहन आपको करना है—प्यास लगेगी पानी पीना है, भूख लगेगी भोजन करना है, कर्म करते हो तो अपने दफ्तर जाना, हॉस्पिटल जाना, क्लीनिक जाना, इधर जाना, उधर जाना... ये सब करना है। एक्स्ट्रा जो इच्छाएं आपके चित्त में प्रकट होती हैं, जिसकी वजह से आप ओवरथिंक करते हो, वो सब खत्म करनी हैं, वो सब ठाकुर जी पर छोड़नी हैं।  01:30] लेकिन यहां पर रामानंदाचार्य जी ने यही अर्थ लगा लिया कि राम-राम करो तो राम जी पूरा जीवन पालन करा देंगे। तो रामानंदाचार्य जी ने जाकर के उन व्यास जी से कहा— "भगवान, आप व्यास मंच पर बैठे हैं, हम आपसे कुछ कह तो नहीं सकते, आपकी सारी बातें स्वीकार रहे हैं। पर आप कह रहे हैं राम जी के भरोसे बैठ जाओ, राम जी रोटी खवा देंगे क्या?"  01:52] तो व्यास जी थोड़े से क्रोध में आ गए और क्रोध में आकर उन्होंने कहा— "हां! अगर राम जी के बस में आ जाए तो राम जी रोटी भी खवा देंगे, तुमको कोई कुछ नहीं करना पड़ेगा। राम-राम जपो बस, राम जी रोटी भी खवा देंगे।"  02:13] रामानंदाचार्य जी ने सारे गांव के लोगों को बुलाया— "भैया देखो, हमारी बात सुनो। मैं अपने गांव से कोसों दूर एकांत, एक अज्ञात स्थान पर जा रहा हूं। ना रोटी लेकर जाऊंगा, ना दाल, कुछ नहीं लेकर जाऊंगा अपने साथ। केवल राम-राम जपूंगा। 24 घंटे के अंदर अगर राम जी ने मुझको रोटी खवा दी, तो मैं स्वयं आप सबके सामने वचन लेता हूं कि जीवन भर राम नाम और प्रभु श्री राम का गुलाम बन के रहूंगा। लेकिन शर्त यह है, 24 घंटा में रोटी राम जी खिला जाएं। मैं कोई प्रयास नहीं करूंगा, मैं केवल राम-राम जपूंगा अज्ञात जगह जाकर, ताकि कोई परिचित पहुंच ना जाए, कहीं व्यास जी पहुंच ना जाएं, कोई व्यवस्था मेरे लिए भोजन की ना कर दे।"  03:09] रामानंदाचार्य जी चले गए और कहीं दूर पहाड़ों के पास, नदी के किनारे पहुंचे। वहां पर एक विशाल वट का वृक्ष था। उस घने वृक्ष के अंदर चले गए, ऊपर बैठ गए और ऊपर बैठकर के राम-राम-राम-राम जपने लगे।  03:32] जपते-जपते थोड़े ही घंटे बीते, इतने में ही कोई तीर्थयात्री आए। तीर्थयात्रियों ने आकर के नदी में स्नान किया, स्नान आदि करके अपना झोला रखा, वस्त्रादि पहने और कहा— "भैया, बहुत भूख लगी है। पिछले गांव से कुछ प्रसादी लेकर के आए हैं, उसको पा लें यहीं पर, फिर आगे चलेंगे।"  03:56] तीर्थयात्रियों ने प्रसाद खोला, उसमें पूरी, सब्जी, गुलाब जामुन आदि सब था जो गांव के लोगों ने दिया था। प्रसाद खोल के सामने रखा ही था, इतने में ही एक डाकू आ गया। डाकू अपनी सेना के साथ आया और आकर बोला— "इन सबको बंदी बनाओ, इनके पास जो कुछ हो सब कुछ लूट लो।"  04:21] वे बेचारे खा भी नहीं पाए, हाथ ऊपर करके खड़े हो गए। झोला आदि देखा तो उसमें कुछ कपड़े, दक्षिणा, ग्रंथ मिले। तभी एक सिपाही बोला— "महाराज, छप्पन भोग भी है। आपकी आज्ञा हो तो पा लें? बढ़िया गुलाब जामुन, पूरी, सब्जी सब दिख रही है।" डाकू बोला— "हां-हां, बैठो सब लोग उड़ाना शुरू करो।"  04:52] सब लोग जैसे ही बैठे, इतने में ही डाकुओं के सरदार ने कहा— "रुको-रुको! 1 मिनट, थोड़ा जांच कर लो कि ये प्रसाद में कहीं जहर तो नहीं है? टटोल लो व्यवस्थित, कहीं ऐसा तो नहीं हमको मारने के लिए किसी ने षड्यंत्र किया हो?"  05:11] पूछने पर तीर्थयात्रियों ने कहा— "नहीं-नहीं महाराज, कुछ नहीं है, आप प्रेम से पाओ।" डाकू बोला— "नहीं, मुझे तो कुछ गड़बड़ लगती है।" उसने जैसे ही ऊपर देखा, पेड़ पर रामानंदाचार्य जी बैठकर राम-राम कर रहे थे और नीचे देख रहे थे।  05:35] डाकू बोला— "मिल गया षड्यंत्रकारी! इसको नीचे उतार के लाओ।" नीचे उतार कर लाए, रामानंदाचार्य जी हाथ जोड़े राम-राम जप रहे थे। डाकू बोला— "यह इसी की चाल है। यह किसी राजा का गुप्तचर है, इसने हमारे लिए विषैला भोजन रखवा दिया ताकि हम खाएं और मर जाएं या बेहोश हो जाएं।"  06:03] डाकू ने कहा— "इसके हाथ-पैर बांधो और जबरदस्ती इसी को खिलाओ।" दो सिपाहियों ने पांव बांध दिए, दो ने हाथ बांध दिए। रामानंदाचार्य जी का कीर्तन चल रहा था। डाकुओं ने जबरदस्ती मुंह खोला और गुलाब जामुन, पूरी, सब्जी, कचौड़ी, रायता सब ठूंस दिया।  06:34] रामानंदाचार्य जी के आंसू आ गए, बोले— "भैया, राम नाम केवल खिलाता नहीं है, जबरदस्ती हाथ-पांव बांध के खिलाता है! यह राम नाम का प्रभाव है।"  07:01] डाकुओं ने देखा कि इन्हें कुछ नहीं हुआ, तो उन्होंने भी प्रसाद पाया और हाथ-पैर खोल दिए। पूछा— "तुम ऊपर क्यों बैठे थे?" उन्होंने कहा— "मैं राम नाम के अधीन बैठा था कि बिना प्रयास के भोजन मिलता है या नहीं, और आप लोगों ने मुझे पवा दिया।" उसी क्षण रामानंदाचार्य जी ने पूरा जीवन राम नाम को अर्पित कर दिया।  07:52] महाराज जी समझाते हैं कि राम नाम में इतनी सामर्थ्य है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि घर बैठकर आलसी हो जाओ। भगवत नाम और कथा की कृपा से ही सब पोषण और आनंद है।  09:11] इसके बाद श्रीमद्भागवत जी की रचना (वेदव्यास जी द्वारा) और सुखदेव जी महाराज द्वारा राजा परीक्षित को कथा सुनाने का प्रसंग आता है।  10:00] महाभारत का युद्ध अंतिम पड़ाव पर था, भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ दी। दुर्योधन बदले की आग में जलने लगा।  11:09] महाराज जी बताते हैं कि हमारे सनातन धर्म में बदला (Tit for Tat) नहीं लिया जाता; बदला व्यक्ति नहीं, प्रकृति (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) लेती है। बदला लेने की इच्छा रखना राक्षसत्व का लक्षण है।  13:03] वैष्णव का स्वभाव बदला लेना नहीं होता, वह घटना को भगवत इच्छा मानकर प्रकृति पर छोड़ देता है।  15:34] हालांकि, बालकों, महिलाओं या वृद्धों पर अत्याचार/पाप होने की स्थिति में शांत बैठना मना है; वहां action लेना धर्म है। लेकिन सामान्य व्यक्तिगत अपमान या छोटी बातों को 'लेट गो' (छोड़ देना) चाहिए।  17:40] कुछ लोगों में सहनशीलता बिल्कुल नहीं होती। रात को नींद नहीं आती कि कैसे इसका बदला लूं।  उदाहरण के लिए रावण का विनाश बदले की भावना (शूर्पणखा के प्रसंग) के कारण ही हुआ। शूर्पणखा की गलती होने पर भी रावण ने बिना सोचे-समझे बदला लेने की कोशिश की और पूरी लंका का नाश करवा बैठा।  22:08] निष्कर्ष: पाप और अपराध पर दंड देना सनातन धर्म का लक्षण है, परंतु व्यक्तिगत अहंकार में बदला लेना राक्षसत्व है।

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Monday, July 6, 2026

Radha Chalisa with word by word meanings

Radha Chalisa with word by word meanings

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https://www.youtube.com/watch?v=CpXSeob2UWM 2 https://www.youtube.com/watch?v=aPuszfH-i68 Radha Chalisa words : https://www.astromantra.com/radha-chalisa/ दोहा श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।   वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारम्बार ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधे = राधारानी   - वृषभानुजा = वृषभानु की पुत्री   - भक्तनि = भक्तों की   - प्राणाधार = प्राणों का आधार   - वृन्दाविपिन विहारिणी = वृन्दावन के वन में विहार करने वाली   - प्रणवौं = मैं नमस्कार करता हूँ   - बारम्बार = बार-बार भावार्थ:   मैं श्री राधारानी को बार-बार प्रणाम करता हूँ, जो वृषभानु की पुत्री हैं, भक्तों के जीवन-प्राण हैं और वृन्दावन में दिव्य विहार करने वाली हैं। 1 पहला पद जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।   चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥ शब्दार्थ:   - जैसो तैसो = जैसी भी हूँ   - रावरौ = आपकी   - कृष्ण प्रिया = श्रीकृष्ण को प्रिय   - सुखधाम = सुख का धाम   - चरण शरण = चरणों की शरण   - निज दीजिये = अपना दीजिए   - सुन्दर सुखद ललाम = सुंदर, सुख देने वाली, श्रेष्ठ भावार्थ:   हे राधे! मैं जैसा भी हूँ, मैं आपका ही हूँ। आप कृष्ण की प्रिया और परम सुख देने वाली हैं। कृपा करके मुझे अपने चरणों की शरण दीजिए। 2 दूसरा पद जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।   कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥ शब्दार्थ:   - जय = जय हो   - वृषभान कुँवरी = वृषभानु की कन्या   - श्री श्यामा = श्री श्यामा राधा   - कीरति नंदिनी = कीर्ति देवी की पुत्री   - शोभा धामा = शोभा का धाम भावार्थ:   श्री श्यामा राधारानी की जय हो, जो वृषभानु की कन्या और कीर्ति देवी की पुत्री हैं तथा सौंदर्य की साक्षात् मूर्ति हैं। 3  तीसरा पद नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।   अमित मोद मंगल दातारा ॥ शब्दार्थ:   - नित्य विहारिनि = सदा विहार करने वाली   - श्याम अधारा = श्रीकृष्ण का आश्रय   - अमित = अपार   - मोद = आनंद   - मंगल = शुभता   - दातारा = देने वाली भावार्थ:   राधारानी सदा कृष्ण के साथ दिव्य विहार करती हैं और अपार आनंद तथा कल्याण प्रदान करती हैं। 4 चौथा पद रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।   सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥ शब्दार्थ:   - रास विलासिनि = रास-लीला में विहार करने वाली   - रस विस्तारिनि = भक्ति-रस बढ़ाने वाली   - सहचरि = सखियों के साथ रहने वाली   - सुभग = सुंदर   - यूथ = समूह   - मन भावनि = मन को भाने वाली भावार्थ:   राधारानी रास-लीला की शोभा बढ़ाने वाली, भक्ति-रस का विस्तार करने वाली और सखियों के समूह को आनंद देने वाली हैं। 5 पाँचवाँ पद नित्य किशोरी राधा गोरी ।   श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥ शब्दार्थ:   - नित्य किशोरी = सदा किशोरी रूप वाली   - राधा गोरी = उज्ज्वल, सुंदर राधा   - श्याम प्राणधन = श्यामसुंदर के प्राणधन   - अति जिय भोरी = हृदय में अत्यंत प्रिय भावार्थ:   राधारानी सदा किशोरी रूप में विराजती हैं। वे श्रीकृष्ण के प्राणों की धन हैं और उनके हृदय में अत्यंत प्रिय हैं। 6 छठा पद करुणा सागर हिय उमंगिनी ।   ललितादिक सखियन की संगिनी ॥ शब्दार्थ:   - करुणा सागर = करुणा का समुद्र   - हिय उमंगिनी = हृदय में उमंग उत्पन्न करने वाली   - ललितादिक = ललिता आदि   - सखियन की संगिनी = सखियों की संगिनी, साथिन भावार्थ:   राधारानी करुणा से भरी हुई हैं और हृदय में आनंद जगाने वाली हैं। वे ललिता आदि सखियों के साथ सदा रहती हैं। 7 सातवाँ पद दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।   कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥ शब्दार्थ:   - दिनकर कन्या = सूर्य की पुत्री   - कूल विहारिनि = कुल में विहार करने वाली   - कृष्ण प्राण प्रिय = कृष्ण को प्राणों से प्रिय   - हिय हुलसावनि = हृदय को हर्षित करने वाली भावार्थ:   राधारानी सूर्यवंश में प्रकट होकर विहार करती हैं और श्रीकृष्ण के हृदय को आनंदित करती हैं। 8 आठवाँ पद नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।   राधा राधा कहि हरषावैं ॥ शब्दार्थ:   - नित्य = सदा   - श्याम = श्रीकृष्ण   - तुमरौ = आपका   - गुण गावैं = गुण गाते हैं   - हरषावैं = हर्षित होते हैं भावार्थ:   जो श्रीकृष्ण सदा आपके गुण गाते हैं और “राधा राधा” कहकर आनंदित होते हैं, वे धन्य हैं। 9 नवाँ पद मुरली में नित नाम उचारें ।   तुव कारण लीला वपु धारें ॥ शब्दार्थ:   - मुरली में = बांसुरी में   - नित = निरंतर   - नाम उचारें = नाम उच्चारण करें   - तुव कारण = आपके कारण   - लीला वपु = लीला-शरीर   - धारें = धारण करते हैं भावार्थ:   श्रीकृष्ण बांसुरी पर निरंतर आपका नाम उच्चारण करते हैं और आपकी लीला के लिए ही दिव्य रूप धारण करते हैं। 10 दसवाँ पद प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।   श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥ शब्दार्थ:   - प्रेम स्वरूपिणि = प्रेम का स्वरूप   - अति सुकुमारी = बहुत कोमल   - श्याम प्रिया = कृष्ण को प्रिय   - वृषभानु दुलारी = वृषभानु की लाड़ली भावार्थ:   राधारानी स्वयं प्रेम का स्वरूप हैं, अत्यंत कोमल हैं, कृष्ण को प्रिय हैं और वृषभानु की प्यारी पुत्री हैं। 11 नवल किशोरी अति छवि धामा ।   द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥ शब्दार्थ:   - नवल किशोरी = नई-नई किशोरी, सदा तरोताज़ा यौवन वाली   - अति छवि धामा = अत्यंत सुंदर रूप का धाम   - द्युति = कान्ति, चमक   - लघु लगै = छोटी लगे   - कोटि = करोड़ों   - रति कामा = कामदेव की रति, सौंदर्य भावार्थ:   राधारानी इतनी सुंदर हैं कि उनके सौंदर्य के सामने करोड़ों कामदेवों का सौंदर्य भी तुच्छ लगने लगता है। वे दिव्य छवि का साक्षात् धाम हैं। [youtube] 12 गौरांगी शशि निंदक बदना ।   सुभग चपल अनियारे नयना ॥ शब्दार्थ:   - गौरांगी = गौर वर्ण वाली   - शशि निंदक = चंद्रमा को लज्जित करने वाली   - बदना = मुख   - सुभग = सुंदर, सौभाग्यशाली   - चपल = चंचल   - अनियारे = अनूठे, विशेष   - नयना = नेत्र भावार्थ:   राधारानी का मुख चंद्रमा से भी अधिक सुंदर है। उनके नेत्र चंचल, मोहक और अत्यंत अनोखे हैं।  13 जावक युत युग पंकज चरना ।   नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥ शब्दार्थ:   - जावक युत = लाक्षारस से युक्त   - युग पंकज चरना = दोनों कमल-सदृश चरण   - नूपुर धुनि = पायल की ध्वनि   - प्रीतम मन हरना = प्रियतम का मन हरने वाली भावार्थ:   राधारानी के दोनों चरण कमल जैसे हैं और उन पर लाक्षारस की शोभा है। उनकी पायल की मधुर ध्वनि श्रीकृष्ण के मन को मोहित कर लेती है। 14 संतत सहचरि सेवा करहीं ।   महा मोद मंगल मन भरहीं ॥ शब्दार्थ:   - संतत = निरंतर   - सहचरि = सखियाँ   - सेवा करहीं = सेवा करती हैं   - महा मोद = अत्यंत आनंद   - मंगल = शुभता   - मन भरहीं = मन भर देती हैं भावार्थ:   राधारानी की सखियाँ सदा उनकी सेवा में लगी रहती हैं, और उनके साथ रहने से मन आनंद और मंगल से भर जाता है।  15 रसिकन जीवन प्राण अधारा ।   राधा नाम सकल सुख सारा ॥ शब्दार्थ:   - रसिकन = रसिक भक्तों के   - जीवन प्राण अधारा = जीवन का आधार, प्राण   - सकल सुख सारा = सभी सुखों का सार भावार्थ:   रसिक भक्तों के लिए राधारानी ही जीवन और प्राण का आधार हैं। उनका नाम ही सभी सुखों का सार है।  16 अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।   ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥ शब्दार्थ:   - अगम = जिन तक पहुँचना कठिन   - अगोचर = इंद्रियों से परे   - नित्य स्वरूपा = सदा रहने वाला दिव्य स्वरूप   - ध्यान धरत = ध्यान करते हैं   - निशिदिन = दिन-रात   - ब्रज भूपा = ब्रज के स्वामी, श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधारानी का स्वरूप इंद्रियों से परे और समझ से परे है। ब्रज के स्वामी श्रीकृष्ण भी दिन-रात उनका ध्यान करते हैं।  17 उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।   कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥ शब्दार्थ:   - उपजेउ = उत्पन्न हुए   - जासु अंश = जिनके अंश से   - गुण खानी = गुणों की खान   - कोटिन = करोड़ों   - उमा रमा ब्रह्मानी = उमा, लक्ष्मी, ब्रह्माणी आदि भावार्थ:   राधारानी के अंश से ही अनेक दिव्य शक्तियाँ प्रकट होती हैं। उमा, रमा, ब्रह्माणी जैसी करोड़ों देवियाँ भी उनके सामने गौण हैं।  18 नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।   जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥ शब्दार्थ:   - नित्य धाम = शाश्वत धाम   - गोलोक विहारिणि = गोलोक में विहार करने वाली   - जन रक्षक = भक्तों की रक्षक   - दुख दोष नसावनि = दुख और दोष नष्ट करने वाली भावार्थ:   राधारानी गोलोक की नित्य विहारिणी हैं और अपने भक्तों की रक्षा करके उनके दुख-दोष मिटा देती हैं। 19 शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।   पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥ शब्दार्थ:   - शिव अज मुनि = शिव, ब्रह्मा आदि ऋषि   - सनकादिक = सनक, सनंदन आदि   - नारद = नारद मुनि   - पार न पाँइ = अंत नहीं पा सके   - शेष अरु शारद = शेषनाग और सरस्वती भावार्थ:   शिव, ब्रह्मा, सनकादिक, नारद, शेष और सरस्वती भी राधारानी के गुणों की सीमा नहीं पा सके। 20 राधा शुभ गुण रूप उजारी ।   निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥ शब्दार्थ:   - शुभ गुण रूप उजारी = शुभ गुणों और सुंदर रूप से प्रकाशित   - निरखि = देखकर   - प्रसन्न होत = प्रसन्न होते हैं   - बनवारी = श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधारानी के दिव्य गुणों और सुंदर रूप को देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। 21 ब्रज जीवन धन राधा रानी ।   महिमा अमित न जाय बखानी ॥ शब्दार्थ:   - ब्रज जीवन धन = ब्रजवासियों का जीवन-धन   - महिमा अमित = अपार महिमा   - न जाय बखानी = वर्णन नहीं की जा सकती भावार्थ:   राधारानी ब्रजवासियों के जीवन की अमूल्य निधि हैं। उनकी महिमा का पूरा वर्णन करना असंभव है। 22 प्रीतम संग देइ गलबाँही । बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥ शब्दार्थ: प्रीतम = प्रियतम श्रीकृष्ण संग = साथ देइ = देकर गलबाँही = गले लगाना, आलिंगन बिहरत = विहार करती हैं नित = सदा वृन्दावन माँही = वृन्दावन में भावार्थ: राधारानी अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ आलिंगन करती हुई सदा वृन्दावन में दिव्य विहार करती हैं। उनका प्रेम अत्यंत आत्मीय और माधुर्यपूर्ण है। 23 राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा । एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥ शब्दार्थ: राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा = राधा और कृष्ण एक-दूसरे का नाम लेते हैं एक रूप = एक ही स्वरूप जैसे दोउ = दोनों प्रीति अगाधा = गहरी, असीम प्रेम भावार्थ: राधा और कृष्ण एक-दूसरे के नाम में ही लीन रहते हैं। दोनों का प्रेम इतना गहरा है कि वे दो होते हुए भी प्रेम की दृष्टि से एक ही प्रतीत होते हैं। 24 श्री राधा मोहन मन हरनी । जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥ शब्दार्थ: श्री राधा मोहन = राधा जी और मोहन श्रीकृष्ण मन हरनी = मन को हरने वाली जन = भक्तों के सुख दायक = सुख देने वाली प्रफुलित बदनी = प्रसन्न मुख वाली भावार्थ: राधा और मोहन दोनों भक्तों के मन को मोहित करने वाले हैं। राधारानी प्रसन्न मुख से भक्तों को सुख प्रदान करती हैं।[bhaktibharat] 25 कोटिक रूप धरें नंद नंदा । दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥ शब्दार्थ: कोटिक रूप = करोड़ों रूप धरें = धारण करें नंद नंदा = नंदलाल श्रीकृष्ण दर्शन करन हित = दर्शन देने के लिए गोकुल चंदा = गोकुल के चंद्रमा भावार्थ: गोकुल के चंद्रमा श्रीकृष्ण भक्तों को दर्शन देने के लिए अनेक रूप धारण करते हैं। वे प्रेमवश अपने भक्तों के लिए स्वयं को विविध रूपों में प्रकट करते हैं। 26 रास केलि करि तुम्हें रिझावें । मान करौ जब अति दुःख पावें ॥ शब्दार्थ: रास केलि = रास-लीला करि = करके तुम्हें रिझावें = आपको प्रसन्न करते हैं मान करौ = जब आप रूठती हैं अति दुःख पावें = बहुत दुःख पाते हैं भावार्थ: श्रीकृष्ण रास-लीला करके राधारानी को प्रसन्न करते हैं। जब राधा जी रुष्ट हो जाती हैं, तब श्रीकृष्ण बहुत दुखी हो जाते हैं और उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं। 27 प्रफुलित होत दर्श जब पावें । विविध भांति नित विनय सुनावें ॥ शब्दार्थ: प्रफुलित होत = अत्यंत प्रसन्न होते हैं दर्श = दर्शन जब पावें = जब पाते हैं विविध भांति = अनेक प्रकार से नित = सदा विनय सुनावें = विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं भावार्थ: जब श्रीकृष्ण राधारानी के दर्शन पाते हैं, तब वे अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और सदा उनके सामने विनम्रतापूर्वक अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। 28 वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा । नाम लेत पूरण सब कामा ॥ शब्दार्थ: वृन्दारण्य = वृन्दावन का वन विहारिणि = विहार करने वाली श्यामा = श्यामवर्णी राधा नाम लेत = नाम लेते ही पूरण = पूर्ण होते हैं सब कामा = सभी कार्य, इच्छाएँ भावार्थ: श्यामा राधारानी वृन्दावन के वन में विहार करती हैं। उनका नाम लेने मात्र से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। 29 कोटिन यज्ञ तपस्या करहु । विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥ शब्दार्थ: कोटिन = करोड़ों यज्ञ तपस्या = यज्ञ और तप करहु = करें विविध नेम व्रत = अनेक नियम और व्रत हिय में धरहु = हृदय में धारण करें भावार्थ: चाहे कोई करोड़ों यज्ञ, तपस्या, नियम और व्रत कर ले, फिर भी यदि राधा नाम की भक्ति न हो तो पूर्ण फल नहीं मिलता। बाहरी साधनाओं से अधिक महत्वपूर्ण राधा-भक्ति है। 30 तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें । जब लगि राधा नाम न गावें ॥ शब्दार्थ: तऊ न = तब भी नहीं श्याम = श्रीकृष्ण भक्तहिं = भक्त को अपनावें = अपनाते हैं जब लगि = जब तक राधा नाम न गावें = राधा नाम का गान न करे भावार्थ: जब तक भक्त राधा नाम का गान नहीं करता, तब तक श्रीकृष्ण भी उसे अपने प्रेम में पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करते। राधा-नाम कृष्ण-प्राप्ति की कुंजी है। 31 वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा । लीला वपु तब अमित अगाधा ॥ शब्दार्थ: वृन्दाविपिन स्वामिनी = वृन्दावन वन की स्वामिनी राधा = राधारानी लीला वपु = लीला-शरीर तब = तब उनका अमित = असीम अगाधा = गहरा, अथाह भावार्थ: राधारानी वृन्दावन वन की स्वामिनी हैं। उनका लीला-स्वरूप असीम और गूढ़ है, जिसे पूरी तरह समझ पाना कठिन है। 32 स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।   और तुम्हें को जानन हारा ॥ शब्दार्थ:   - स्वयं कृष्ण = श्रीकृष्ण स्वयं   - पावैं नहिं पारा = पूर्णतः पा नहीं सकते, अंत नहीं पा सकते   - और = अन्य   - तुम्हें = आपको   - को जानन हारा = कौन जान सकता है भावार्थ:   राधारानी की महिमा इतनी गहरी है कि स्वयं श्रीकृष्ण भी उनके स्वरूप की सीमा नहीं पा सकते। फिर अन्य कोई उन्हें पूरी तरह कैसे जान सकता है।  33 श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।   सादर गान करत नित वेदा ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधा रस = राधा-भाव, राधा का प्रेम-रस   - प्रीति अभेदा = प्रेम से अभिन्न   - सादर = आदरपूर्वक   - गान करत = गान करते हैं   - नित = निरंतर   - वेदा = वेद भावार्थ:   राधारानी का प्रेम-रस और प्रीति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। वेद भी आदरपूर्वक उनकी महिमा का गान करते रहते हैं।  34 राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।   ते सपनेहुँ जग जलधि न तरिहैं ॥ शब्दार्थ:   - त्यागि = छोड़कर   - भजिहैं = भजन करेंगे   - सपनेहुँ = स्वप्न में भी   - जग जलधि = संसार-सागर   - न तरिहैं = पार नहीं कर पाएँगे भावार्थ:   जो लोग राधा को छोड़कर केवल कृष्ण-भजन करना चाहते हैं, वे संसार-सागर से पार नहीं हो सकते। राधा-भक्ति के बिना भक्ति अधूरी मानी गई है।  35 कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।   सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥ शब्दार्थ:   - कीरति कुँवरि = कीर्ति देवी की पुत्री   - लाड़िली = अत्यंत प्रिय   - सुमिरत = स्मरण करने से   - सकल = सब   - भव बाधा = संसार की बाधाएँ भावार्थ:   कीर्ति देवी की प्यारी पुत्री राधारानी का स्मरण करने से जीवन की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं। 36 नाम अमंगल मूल नसावन ।   त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥ शब्दार्थ:   - नाम = नाम   - अमंगल मूल = अशुभ का मूल   - नसावन = नष्ट करने वाला   - त्रिविध ताप = तीन प्रकार के दुःख   - हर = हरने वाले   - हरि मनभावन = हरि को प्रिय भावार्थ:   राधा नाम अशुभताओं के मूल को नष्ट कर देता है और तीनों प्रकार के तापों का नाश करता है। यह नाम भगवान हरि को भी अत्यंत प्रिय है।  37 राधा नाम लेइ जो कोई ।   सहजहि दामोदर बस होई ॥ शब्दार्थ:   - लेइ = लेता है   - जो कोई = जो भी   - सहजहि = सहज रूप से   - दामोदर बस होई = भगवान कृष्ण के वश में हो जाता है भावार्थ:   जो भी राधा नाम लेता है, वह सहज ही श्रीकृष्ण के प्रेम-आकर्षण में आ जाता है।  38 राधा नाम परम सुखदाई ।   भजतहि कृपा करहिं यदुराई ॥ शब्दार्थ:   - परम सुखदाई = परम सुख देने वाला   - भजतहि = भजन करने वालों पर   - कृपा करहिं = कृपा करते हैं   - यदुराई = यदुवंश के स्वामी, श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधा नाम सबसे बड़ा सुख देने वाला है। जो इसका भजन करता है, उस पर श्रीकृष्ण कृपा करते हैं। 39 यशुमति नंदन पीछे फिरिहैं ।   जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥ शब्दार्थ:   - यशुमति नंदन = श्रीकृष्ण   - पीछे फिरिहैं = पीछे-पीछे चलेंगे   - जो कोऊ = जो कोई   - सुमिरिहैं = स्मरण करेगा भावार्थ:   जो व्यक्ति राधा नाम का स्मरण करता है, श्रीकृष्ण उसके पीछे-पीछे चलते हैं। यह राधा-नाम की महिमा बताता है। 40 रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।   करहु कृपा बरसाने वारी ॥ शब्दार्थ:   - रास विहारिणि = रास में विहार करने वाली   - श्यामा प्यारी = प्यारी श्यामा राधा   - करहु कृपा = कृपा कीजिए   - बरसाने वारी = बरसाने वाली राधा भावार्थ:   हे रास-विहारिणी श्यामा, हे बरसाने की प्यारी राधे, हम पर कृपा कीजिए। [astromantra](https://www.astromantra.com/radha-chalisa/) 41 वृन्दावन है शरण तिहारी ।   जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥ शब्दार्थ:   - वृन्दावन = वृन्दावन धाम   - शरण तिहारी = आपकी शरण   - जय जय जय = बार-बार जय   - वृषभानु दुलारी = वृषभानु की प्यारी पुत्री भावार्थ:   वृन्दावन आपकी शरण है। हे वृषभानु की प्रिय राधे, आपकी बार-बार जय हो।  42 श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।   करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधा सर्वेश्वरी = राधारानी, जो सबकी ईश्वरी हैं   - रसिकेश्वर = रसिकों के ईश्वर   - धनश्याम = श्रीकृष्ण   - करहुँ = करूँ   - निरंतर = सदा   - बास = निवास   - श्री वृन्दावन धाम = पवित्र वृन्दावन धाम भावार्थ:   हे श्री राधारानी, आप समस्त शक्तियों की अधीश्वरी हैं, और श्रीकृष्ण रसिकों के स्वामी हैं। मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा निवास सदा श्री वृन्दावन धाम में रहे।    समापन ॥ इति श्री राधा चालीसा ॥


Radha Chalisa - only Dohas (no meaning):
श्री राधा चालीसा

॥ दोहा ॥
श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारम्बार ॥

जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥

॥ चौपाई ॥
जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।
कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥

नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।
अमित मोद मंगल दातारा ॥

रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।
सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥

नित्य किशोरी राधा गोरी ।
श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥

करुणा सागर हिय उमंगिनी ।
ललितादिक सखियन की संगिनी ॥

दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।
कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥

नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।
राधा राधा कहि हरषावैं ॥

मुरली में नित नाम उचारें ।
तुव कारण लीला वपु धारें ॥

प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।
श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥

नवल किशोरी अति छवि धामा ।
द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥१०॥

गौरांगी शशि निंदक बदना ।
सुभग चपल अनियारे नयना ॥

जावक युत युग पंकज चरना ।
नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥

संतत सहचरि सेवा करहीं ।
महा मोद मंगल मन भरहीं ॥

रसिकन जीवन प्राण अधारा ।
राधा नाम सकल सुख सारा ॥

अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।
ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥

उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।
कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥

नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।
जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥

शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।
पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥

राधा शुभ गुण रूप उजारी ।
निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥

ब्रज जीवन धन राधा रानी ।
महिमा अमित न जाय बखानी ॥२०॥

प्रीतम संग देइ गलबाँही ।
बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥

राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा ।
एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥

श्री राधा मोहन मन हरनी ।
जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥

कोटिक रूप धरें नंद नंदा ।
दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥

रास केलि करि तुम्हें रिझावें ।
मान करौ जब अति दुःख पावें ॥

प्रफुलित होत दर्श जब पावें ।
विविध भांति नित विनय सुनावें ॥

वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा ।
नाम लेत पूरण सब कामा ॥

कोटिन यज्ञ तपस्या करहु ।
विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥

तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें ।
जब लगि राधा नाम न गावें ॥

वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा ।
लीला वपु तब अमित अगाधा ॥३०॥

स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।
और तुम्हें को जानन हारा ॥

श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।
सादर गान करत नित वेदा ॥

राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।
ते सपनेहुँ जग जलधि न तरिहैं ॥

कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।
सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥

नाम अमंगल मूल नसावन ।
त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥

राधा नाम लेइ जो कोई ।
सहजहि दामोदर बस होई ॥

राधा नाम परम सुखदाई ।
भजतहि कृपा करहिं यदुराई ॥

यशुमति नंदन पीछे फिरिहैं ।
जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥

रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।
करहु कृपा बरसाने वारी ॥

वृन्दावन है शरण तिहारी ।
जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥४०॥

॥ दोहा ॥
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥

॥ इति श्री राधा चालीसा ॥

Jagannath Ji's Sacred Bath: The Ancient Mystery of Deva Snana Purnima | Puri Snana Yatra Explained

Jagannath Ji's Sacred Bath: The Ancient Mystery of Deva Snana Purnima | Puri Snana Yatra Explained

https://www.youtube.com/shorts/M0Wk983VsaQ Every year, on the full moon of Jyeshtha — the peak of Indian summer — something extraordinary happens in Puri, Odisha. The doors of the most ancient and sacred temple in the land open wide, the air fills with the sound of conch shells, cymbals and kahali, and Lord Jagannath — the Lord of the Universe — steps out from his sanctum in a grand swaying procession called the Pahandi. Today, he will take his royal bath. Today is Deva Snana Purnima — and this single day carries within it over a thousand years of mythology, astronomy, Ayurveda, and devotion. This is not just a festival. This is a cosmic event. WHY THIS DAY? THE SCIENCE BEHIND JYESHTHA PURNIMA Jyeshtha Purnima is the last full moon before the monsoon arrives. The month of Jyeshtha itself means "the greatest, the most ancient" — and in the Vishnu Sahasranama, Lord Vishnu is called Jyeshtha Shreshtha Prajapita. Astronomically, on this day the Moon sits in the Jyeshtha Nakshatra — a position ancient rishis linked to power, transformation, and divine purification. This is also the tithi when Ganga descended to earth, when Savitri defeated death itself, and when the cosmos stands at the precise threshold between the blazing summer sun and the life-giving monsoon rains. The Lord's bath on this day is not accidental — it is a cosmic transition ceremony, a ritual that mirrors the earth's own renewal. THE STORY BEHIND THE FIRST SNANA PURNIMA The Skanda Purana and the Odia religious treatise Niladri Mahodaya both record the same origin story. King Indradyumna — a great devotee of Vishnu — searched across the earth for the mysterious Nila Madhava, a deity worshipped in secret by a tribal chief of the Sabara people in a forest near Puri. After the deity disappeared and revealed himself instead as a sacred neem log washed ashore from the ocean, Vishwakarma himself descended in human form to carve the idols. But the work was left unfinished when the king broke the divine condition and entered too soon. The result? Three idols with large eyes, stump-like arms, no separately carved hands or feet — an "incomplete" form that became the most worshipped form in all of Odia civilization. The very first act after the installation of these idols was the Snana Yatra — the bathing ceremony — organized by King Indradyumna himself. That first sacred bath, thousands of years ago, is what we reenact every Jyeshtha Purnima. THE 108 POTS — AND WHY THIS NUMBER IS NOT RANDOM On Snana Purnima, Lord Jagannath is bathed with water drawn from the temple's sacred Suna Kua — the Golden Well — mixed with sandalwood paste, fragrant herbs and camphor, and poured in exactly 108 gold vessels. Jagannath receives 35 pots, Balabhadra 33, Subhadra 22, and Sudarshana Chakra 1. The number 108 is not arbitrary. It appears in the distance between the Sun and the Earth measured in solar diameters, in the 108 beads of a Japa mala, in the 108 Upanishads, in the 108 names of every major Hindu deity. Every single pour is accompanied by sacred mantras. This is not bathing — this is a full-scale cosmic consecration. THE MYSTERY OF GAJANANA VESHA — WHY JAGANNATH BECOMES GANESHA As the sun begins to set on Snana Purnima, the Lord undergoes one final, breathtaking transformation. Jagannath and Balabhadra are adorned with ornate elephant-head crowns, becoming the living image of Lord Ganesha — this form is called Gajanana Vesha or Hati Vesha. The story behind it is as beautiful as the vesha itself. Centuries ago, a great scholar named Ganapati Bhatta came to Puri — a man who worshipped only Ganesha and could not conceive of divinity in any other form. He stood on the Snana Bedi and looked for his Ganesha, but could not find him. Lord Jagannath — who lives in the hearts of all his devotees — saw the longing of this man and transformed himself into the very form the devotee was seeking. Since that day, this vesha is observed every single year. The symbolism runs even deeper: Ganesha is the remover of obstacles, always invoked before any great beginning — and the Rath Yatra is coming. The Gajanana Vesha is the Lord's cosmic declaration: all obstacles on the sacred path ahead have been removed. Watch till the end — because after this divine bath, something unexpected happens to the Lord. And that story is even more ancient, even more mysterious than everything you've seen today.