कभी व्यर्थ नहीं जाती ये औषधि | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 4 | Shree Hita Ambrish Ji
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00:00:24 शौनकादि ऋषियों ने श्री सूत जी को श्रेष्ठ आसन पर विराजमान
00:00:44 किया और फिर अत्यंत विनयावनत होकर उनसे निवेदन किया कि भगवान की कथा सुनाइए। 00:00:53 कल यहीं पर हमने चर्चा को विराम दिया था कि क्योंकि सब 00:01:08 ऋषि एक बड़े दीर्घकालीन यज्ञ का अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं, पर उनका संकल्प पवित्र है। वह पुरुषार्थ कर 00:01:18 रहे हैं किसलिए? कि सर्वात्मा भगवान प्रसन्न हो जाएं। 00:01:25 इसी पवित्र संकल्प के कारण इस शुभेच्छा का उदय हुआ कि भाई कोई 00:01:30 कोई मिले जो हमें भगवान की कथा सुनाए, भगवान का यश सुनाए। संत वाणी में कहते 00:01:39 हैं कि साधो कौन जुगती अब कीजै, जाते दुरमति सगल बिनासै, राम भगति मन 00:01:54 भीजै। क्या युक्ति करें, ऐसी कौन सी विधि 00:01:59 जिससे दुरमति का नाश हो? दुरमति क्या है? कई बार हम चर्चा करते हैं ना कि भाई भगवान का भजन 00:02:06 तो करते हैं, लेकिन संतों की पूरी-पूरी बात नहीं मान पाते हैं। पूरी बात मानें जब संत कहते हैं ना— 00:02:12 'सब तजि भजिए नंद कुमार'। भगवान का भजन तो करते हैं, पर सबको छोड़ नहीं पाते। वह जो बंधन आशा का, 00:02:21 ममता का संसार से बंधा है, उसके मूल में क्या है? उसके मूल में दुरमति ही है। 00:02:29 दुरमति माने स्वार्थ। मैं सदा से आपसे कहता आया हूं कि जीवन जीने की दो ही विधियां हैं—स्वार्थ है 00:02:37 और परमार्थ है। 00:02:40 स्वार्थी दुरमति है—मुझे सुख मिले, यहां से मिले, वहां से मिले। जबकि जीव अपने स्वरूप का विचार करे, 00:02:51 तो भगवान कह रहे हैं—'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'। जीव अपने स्वरूप का विचार करे, 00:03:02 तो भाई वह तो 'चेतन अमल सहज सुख रासी'। वह तो चेतन है, निर्मल है, सहज ही सुख की राशि 00:03:11 है। उसे किसी से मांगने की आवश्यकता क्या है? उसे किसी से याचना करने की आवश्यकता क्या है? यदि इस 00:03:17 बात का जीव मन में सदा विचार करे कि भाई मैं तो प्रभु का हूं, प्रभु मेरे हैं, फिर तो 00:03:23 तन, मन, प्राण तृप्त हो जाते हैं। और जो तृप्त है, वह तो बांटता है, वह तो देता है। 00:03:31 जब व्यक्ति तृप्त हो जाता है, तब इच्छा होती है देने की। इसीलिए मैं कई बार आपसे कहता हूं, जैसे 00:03:37 प्रेम स्पर्श करेगा, आपकी इच्छा होगी कि भाई अब दें, अब बांटें। क्योंकि प्रेम तृप्त करेगा। 'यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, 00:03:46 तृप्तो भवति'। नारद जी कह रहे हैं—'यत्प्राप्य' जिसको पाकर फिर 'न किञ्चिद् वाञ्छति' कुछ नहीं 00:03:58 चाहता। 00:04:01 'यत्प्राप्य न किञ्चिद् वाञ्छति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति'। प्रेम तृप्त कर जाता है, 00:04:10 दौड़ समाप्त हो जाती है। इसीलिए तो संतों ने प्रेम को परम विश्राम कहा है। तृप्त कर देता है प्रेम। 00:04:19 और जब कोई तृप्त होता है, तब उसकी इच्छा होती है कि अब मैं दूं, अब मैं बांटूं। जैसे हित का 00:04:26 भाव हृदय को स्पर्श करता है, तो एक हितोपासक 00:04:29 क्या कहता है?—'चिरजीवौ भूतल यह जोरी। नव निकुंज अभिराम श्याम संग नीको बन्यौ समाज। जय श्री हित 00:04:37 हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राज।' अभी बसंत आएगा और महाप्रभु बसंत गाते हैं और क्या कहते हैं?—'जय 00:04:45 श्री हित हरिवंश हंस-हंसिनी समाज। ऐसे ही करौ मिलि जुग-जुग 00:04:57 राज।' कोई तृप्त हृदय 00:04:59 ऐसा कह सकता है। 00:05:03 दौड़ समाप्त हो जाती है। जैसे प्रेम छू लेता है, जैसे हित का भाव स्पर्श करेगा, आप दे देना 00:05:13 चाहेंगे। संत कह रहे हैं—कौन सी युक्ति ऐसी करें, जाते दुरमति सगल बिनासै? यह जो हमारी स्वार्थ बुद्धि 00:05:21 है, यह नष्ट हो जाए। हमारे भीतर परमार्थ के उस परम मंगलमय भाव का उदय हो। 00:05:30 आस्तिक भाव की वृद्धि हो। 'जाते दुरमति सगल बिनासै, राम भगति मन भीजै'। हम कई बार बात करते हैं 00:05:40 ना कि भाई थोड़ा घना भाव तो हमारे जीवन में भी है, थोड़ी बहुत भक्ति भावना हमारे जीवन में भी 00:05:48 है, पर हमारी स्थिति एकरस नहीं रहती, हमारा भाव एकरस नहीं रहता, हमारा सुख, हमारा आनंद सदा बना नहीं रहता। 00:05:57 अभी हमारा मन जो है ना, वह 00:05:59 भीगा नहीं है भक्ति में, भीगा नहीं। कह रहे हैं—ऐसी कौन सी युक्ति करें कि दुरमति सदा के लिए नष्ट हो 00:06:05 जाए और राम भगति मन भीजै? संत की वाणी संकेत कर रही है कि जब तक स्वार्थ है, तब तक 00:06:13 मन भीगेगा नहीं। और वहां हमारे श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—'आवत जात न जानिए जैसे छां और धूप'। 00:06:20 रे तब तक उसको उपलब्धि मानना नहीं जब तक वह भाव आता-जाता रहे, जब बना रहे। इसलिए अनेक-अनेक 00:06:29 बार मैं आपको कहता हूं भाई मन सुधर जाए, यह एक बात है, फिर मन सुधरा भी तो रहे। सुधर-सुधर 00:06:35 के बिगड़ता है मन। थोड़ी देर के लिए, थोड़े दिन के लिए आपको लगेगा कि भाई सुधर गया मन, अब 00:06:44 तो मन कहीं नहीं जाता है, अब तो टिक गया, अब तो टिक गया, अब नहीं चाहिए हमको कुछ। और 00:06:48 कभी-कभी व्यक्ति क्या करता है, उसी आवेश में, उसी आवेश में सब छोड़कर चल देता है। लेकिन वह छोड़कर चल 00:06:54 देता है, चार कदम आगे चलता है, मन फिर वैसा का वैसा। फिर-फिर जीवन में वही संग्रह होने लगता 00:06:59 वस्तुओं का, व्यक्तियों का, यह देखने में आता है। यह तो बहुतायत से देखने में आता है। नहीं तो शास्त्र 00:07:07 कहता है कि जिस वस्तु को आपने संकल्प पूर्वक त्याग दिया है, जिस वस्तु को, जिस भाव को आपने संकल्प 00:07:16 पूर्वक त्याग दिया है, उसका पुनः स्पर्श करने पर सारा पुण्य क्षीण हो जाता 00:07:24 है। असत्य भाषण करने से पुण्य क्षय होता है, दिया हुआ वचन 00:07:29 पूरा न करने से आपका पुण्य क्षय होता 00:07:35 है। आप देखिए हमारे यहां हम सदा से सुनते आए हैं—कैसे हमारे श्री रघुनाथ जी हैं, कह रहे—'रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाहुं बरु बचनु न जाई'। जीवन में किसी भी प्रकार से असत्य न आ 00:07:54 जाए। लेकिन हम तो बहुतायत से देख रहे हैं, जो-जो वस्तु 00:08:00 छोड़कर व्यक्ति चलता है, चार-छह महीने बाद, साल-दो साल बाद आप देखते हैं उस व्यक्ति के जीवन में उन्हीं 00:08:08 वस्तुओं का संग्रह फिर से होने लगता है। छोड़े हुए का तो स्वीकार फिर नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि मन 00:08:15 ने छोड़ा ही नहीं था, वह एक भावावेश था। इसीलिए मैं आपको कहता हूं—धीरज धरना धर्म का पहला 00:08:21 लक्षण है, धृति, धैर्य धरना। अपने मन को खूब देर तक देखना, आप देखोगे मन सुधर-सुधर के 00:08:29 बिगड़ेगा, सुधरेगा फिर बिगड़ेगा, सुधरेगा फिर बिगड़ेगा। अरे हमारे महाप्रभु जी तो कह रहे—अंत तक इसका विश्वास नहीं करना—'ना जानौं छिन अंत कवन बुद्धि घटै 00:08:42 प्रकाश'। जिसको आज छोड़ रहा है, कल फिर पकड़ेगा। आज नहीं लग रहा है कोई अच्छा, कल अच्छा लगने लगेगा। 00:08:50 आज कोई बुरा लग रहा है, कल वही भला लगने लगेगा। आज भला लग रहा है, कल बुरा लगने 00:08:58 लगेगा। 00:09:00 तो मन सुधरा भी तो रहे, सुधर तो जाए पर मन सुधरा रहे। और हमको तो भाई छोटी सी बात 00:09:06 समझ में आई कि सत्संग से ही मन सुधरेगा भी और सत्संग से ही मन सुधरा भी रहेगा। इसीलिए आपको 00:09:15 कहता हूं कुछ भी छूटे, साधु का संग नहीं छूटना चाहिए। कहिए—'कीजै साधु संगति सोई'। 00:09:31 साधु 00:09:35 संगति... जो-जो बुधजन इस बात को जान गए, इस बात का मर्म समझ 00:09:45 गए, उन्होंने इस पंक्ति के रहस्य को जाना कि क्यों त्रिलोकीनाथ भगवान शंकर भगवान से यह बात कह रहे हैं—'पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग'। 00:10:00 हमारे श्री महाप्रभु जी प्रिया-लाल का दर्शन कर रहे हैं। प्रिया-लाल का दर्शन करते-करते क्या कह रहे हैं?—'साधु संगति करौं अनुदिन राती'। यही एक व्यवस्था है, मन सुधरा रहे यही एक व्यवस्था है—दुरमति नष्ट हो और फिर लौटकर 00:10:22 न आए। देखो कोई रोग हुआ, आपने जाकर 00:10:29 औषधि ली, रोग ठीक हो गया। डॉक्टर आपको एक बार रोग को ठीक करने की औषधि दे सकता है, लेकिन 00:10:37 संसार का कोई भी डॉक्टर, संसार का कोई भी वैद्य आपको यह लिखकर नहीं दे सकता है कि रोग आपको 00:10:42 फिर से नहीं होगा। यह कोई व्यवस्था नहीं है, चार दिन बाद फिर हो जाएगा। मन भी ऐसा ही है। 00:10:50 रोग न हो कभी, कभी रोग न हो इसके लिए तो भाई अच्छा आहार लीजिए—'युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु'। अच्छा आहार-विहार हो, नियमित, संयमित आपकी दिनचर्या हो, आपके जीवन में परिश्रम हो, प्रकृति के नियमों 00:11:08 का आप आदर करते हों, प्रकृति की अवहेलना न हो। सदा स्वस्थ रहने की तो यह युक्ति हमारे ऋषि-मुनियों 00:11:13 ने बताई है। ऐसे ही मन को भी अगर चाहते हैं ना मन सदा स्वस्थ रहे, पहले तो रोगी है 00:11:18 ही मन, पहले तो जाइए सदगुरु वैद्य और तुलसी बाबा कह रहे—'बचन बिस्वासा'। पहले तो सदगुरु रूपी वैद्य के 00:11:28 वचन पर 00:11:29 विश्वास करिए। 'औषध खाए पथ्य करे ताकि वेदन जाए'। पहले तो गुरु ने जो औषधि दी है उसका सेवन करिए, 00:11:37 कुपथ्य से बचिए। और मैं औषधि के सेवन से भी ज्यादा बल देता हूं—कुपथ्य से बचिए, कुपथ्य न हो 00:11:44 जीवन में। Do's and Don'ts होते हैं ना कुछ, जो नहीं करना वह नहीं करना है, जो करना है उसको 00:11:53 करने में थोड़ी ढिलाई हो भी जाए कोई बात नहीं, लेकिन जो नहीं करना है वह नहीं करना है। 00:12:03 फिर इसके बाद में एक बात और भी कहूंगा—जो नहीं करना है उसको नहीं करने की शक्ति, उसको 00:12:09 नहीं करने का बल कैसे आएगा? जो करना है वह करें, भजन करेंगे तभी तो आत्मबल बढ़ेगा। शायद मैंने 00:12:18 आपको कभी कहा था, एक महापुरुष का एक-एक लिखा हुआ एक वाक्य मेरे जीवन पर, मेरे मन पर, 00:12:25 मेरे चित्त पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला। महापुरुष 00:12:28 उसने एक बात कही कि मैंने जीवन में कभी वह नहीं किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था। मैंने वह 00:12:36 नहीं किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था। देखो महापुरुष बड़ी विनम्रता पूर्वक अपनी बात कहते हैं, वह यह नहीं 00:12:42 कह रहे कि हमने जीवन भर भजन किया। महापुरुष का वह जो कहना था, वह कहना ही मुझे बड़ा प्रिय 00:12:50 लगा। किस युक्ति से महापुरुष अपनी बात कह रहे हैं, यह नहीं कह रहे हैं कि मैंने जीवन भर भजन 00:12:56 किया है, मैंने जीवन भर सत्कर्म किया है, केवल 00:12:58 इतना कह रहे हैं विनम्रता पूर्वक—भाई वह नहीं किया जो हमको नहीं करना चाहिए था। इस एक बात में सब 00:13:03 बात आ गई। अर्थात आपने सदा बड़ी निष्ठा से वह किया है जो आपको करना चाहिए था, तभी तो यह 00:13:08 बल मिला, तभी तो यह शक्ति मिली कि जो न करने योग्य था उससे आप दूर रहे, उससे आप बचे 00:13:16 रहे। विपरीत में मन का आकर्षण सदा से रहा है, क्योंकि मन अविद्या से ग्रस्त है, जीव जो है वह 00:13:23 अविद्या से ग्रस्त है। इसी को दुरमति कहा है संतों ने, यही अज्ञान 00:13:28 है। और उस अज्ञान के कारण मन सदा, मन सदा जो-जो हित से विपरीत है, उसमें मन आकर्षित 00:13:37 होता 00:13:40 है। इस बात का कभी विचार ही नहीं करने देता है कि हमको यह शरीर मिला किसलिए है? शास्त्रीय 00:13:47 व्याख्या जो शरीर की है ना, क्या है शरीर? किसको कहते हैं? शास्त्र क्या कहता है? कहता है—'हिताहितप्राप्तिपरिहारानुकूला क्रिया चेष्टाश्रयं शरीरम्'। 00:13:59 बोले जो हित है उसकी प्राप्ति और जो अहित है उसका परिहार करने के लिए परमात्मा ने आपको अवसर दिया 00:14:06 है शरीर का। हिताहितप्राप्तिपरिहारानुकूला क्रिया चेष्टाश्रयं शरीरम्, इसके लिए शरीर मिला है। हित की प्राप्ति की 00:14:15 जाए और जो-जो अहितकारक है उसका परिहार किया जाए माने उसका त्याग किया जाए। इसी को सरल शब्दों 00:14:21 में कभी मैंने आपसे कहा था, जो-जो हमारे लिए, हमारे भीतर अच्छा है, जो हमारे भीतर कोई गुण है, 00:14:27 उसका हमको विकास 00:14:28 करना है और जो दोष है उसका मार्जन करना है। इसी का नाम साधना है, इसी का नाम तो साधना 00:14:36 है, इसी के लिए शरीर मिला है। कभी मन इस बात का विचार ही नहीं करता है। 00:14:45 क्यों? क्योंकि दुरमति के, अविद्या के अंधकार में पड़ा है। जब कभी कृपा होती है प्रभु की और सद्विचार का 00:14:57 उदय होता है, इसीलिए 00:14:58 मैं कल आपसे कह रहा था—ध्यान रखना भाई, संग न बिगड़े। संग बिगड़ेगा तो विचार बिगड़ जाएगा। क्यों संत 00:15:05 बहुत बल देकर कह रहे हैं? कह रहे—'दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः'। नारद जी भक्ति सूत्र में कह रहे हैं, कह रहे—सर्वथा 00:15:12 त्याग कर देना चाहिए कुसंग का, सर्वथा। अरे गोस्वामी जी ने तो यहां तक कह दिया कि 'तजिए ताहि कोटि बैरी सम जदपि परम सनेही'। आपको लगता हो हमारा परम स्नेही है, परम सुहृद है, 00:15:29 अगर उसके कारण सत्संग से 00:15:36 विमुखता आती है, भजन-भाव में बाधा होती है, मन से तो उसका त्याग कर ही दिया जाए। प्रारब्धवशात् यदि उसके निकट, उसके आसपास रहना भी पड़े, 00:15:46 पर मन से तो उसका त्याग कर ही देना चाहिए। गरज कर कहा है ध्रुवदास जी ने—'वृंदावन के वास को जिनके नाही हुलास। माता मित्र सुतादि तिय तज ध्रुव तिनको 00:16:06 पास।' 00:16:08 जाते दुरमति सगल बिनासै, राम भगति मन भीजै। फिर कहते हैं— 00:16:16 भए दयाल 00:16:18 कृपालु 00:16:21 संत जन 00:16:25 तब यह 00:16:27 बात बता 00:16:31 ई। 00:16:33 सरब धरम 00:16:36 मानौ 00:16:38 तिन की 00:16:40 ए, 00:16:41 जिन हरि 00:16:43 कीरति 00:16:45 गा 00:16:46 ई। 00:16:47 संत दयालु हुए, संतों को हम पर दया आई, उन्होंने हमको जो सब साधनों का सार है, वह साधन 00:16:55 बताया। उसने सब धर्म कर लिए, उसने सब 00:16:58 कर्म कर लिए जिसने हरि का जस गा लिया। इसलिए हमारे सूरदास कहते हैं, सरल शब्दों में बड़ी बात संत 00:17:09 कह देते हैं— 00:17:12 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:17:18 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:17:25 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:17:37 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:17:42 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:17:48 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:17:54 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:17:59 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:18:05 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:18:10 मैं कई बार सोचता हूं कि जब संत यह बात कहते हैं, जब संत यह बात कहते हैं, तो यह बात ही सुनने में कितनी मीठी लगती 00:18:21 है। देखो अभी देखो हम चर्चा कर रहे थे सूरदास जी की, एक बात मुझे याद आई मैंने कही। 00:18:29 कैसे मन में एक आनंद की लहर दौड़ जाती है ना यह बात सुनकर? अभी तो सूरदास जी की बात 00:18:33 मैं आपसे कह रहा हूं, वह काम हमने किया नहीं है, अभी काम करना तो बाकी है। तो काम सूरदास 00:18:40 जी करने को कह रहे हैं— 00:18:44 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:18:49 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:18:54 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:19:00 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:19:05 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:10 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:15 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:20 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:25 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:30 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:35 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:41 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:46 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:19:50 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:19:55 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:00 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:05 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:10 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:15 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:20 सूरदास गिरिधर जस... 00:20:26 संग फिरत है काल भ्रमत नित शीश पर, 00:20:34 यह तन अति छिनभंग धुआं को धौरहर। 00:20:42 ताते दुर्लभ काल न वृथा गमाइए, 00:20:51 ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। 00:20:58 मैं तो कहता हूं भाई, उसी दिन, उसी क्षण कल्याण हो जाता है जिस दिन जीव की संत में श्रद्धा 00:21:04 हो जाती है कि भाई यह हमारे हितैषी हैं, जो कह रहे हैं हमारे हित की बात कह रहे 00:21:10 हैं। और वैसे भी देखो, 00:21:16 विचारो, श्री कबीर जी कह रहे हैं—'सतगुरु सम को है सगा, बिन सतगुरु अपना न कोई। जो यह राह बताए...' जिस दिन जीव की इस-इस बात में श्रद्धा पक्की हो जाए, पूरी हो 00:21:40 जाए, श्रद्धा पूरी हो जाए इस बात में कि संत हितैषी हैं 00:21:48 हमारे। मैं, मेरा तो कभी-कभी इन-इन संतों के शब्द, इनकी वाणी पढ़कर मन आनंद से भर जाता है। कितनी 00:21:55 कृपा पूर्वक, अनुग्रह पूर्वक... 00:21:58 मैं तो आपसे कई बार कहता हूं ना भाई, इनको क्या लेना-देना है हम भजन करें न करें, उनका 00:22:03 काम तो बन ही गया है, उनकी तो कार्य सिद्धि हो चुकी है। फिर भी लगे हैं—'परमारथ के कारणे लियो संत अवतार'। जीव को नरक से उबारने के लिए संत स्वयं जननी के गर्भ में आ जाता है। गर्भ 00:22:24 वास नरक वास है, फिर आता है संत उसमें, आप पर 00:22:28 मुझ पर दया करके, कृपा करके। पर उपकार देह धरणम्। ताते दुर्लभ काल न वृथा गमाइए। पैसा-कौड़ी बचाता-बचाता 00:22:44 जीव मर जाता है, देखो क्या-क्या गति होती है धन बचाने वाले की, क्या गति होती है। धन अधिक 00:22:50 हो जाए, धन का संग्रह अधिक हो जाए ना, तो पता है क्या होता है? वह जो आसपास वाले हैं, 00:22:59 वही मन में मनोरथ करने लगते हैं, बोले—कब मरेगा और यह सब सामान हमको मिलेगा। जो अपने सगे, अपने 00:23:08 स्नेही हैं, वही अपने शत्रु हो जाते 00:23:14 हैं। आप देखिए, विचार करना चाहिए कि जिन श्री भगवान के चरण चिन्हों का दर्शन करके अक्रूर जी भाव-विभोर 00:23:26 हो गए थे, प्रेम में 00:23:28 मगन हो गए थे जब-जब ब्रज में आए और श्री ठाकुर जी के चरण चिन्हों का दर्शन किया ना, 00:23:35 लोटपोट हो गए वह अक्रूर जी रज में। क्या सुंदर स्तुति अक्रूर जी भगवान की करते हैं, प्रेम मगन हृदय 00:23:46 उनका। और वही स्यमंतक मणि के प्रसंग में उन्हीं अक्रूर जी का भगवान पर विश्वास नहीं रहा। देखो कितना बड़ा 00:23:56 अनर्थ है यह! यह जिसको 00:23:57 आप अर्थ कहते हो, वस्तुतः कितना बड़ा अनर्थ है। भाई-भाई का शत्रु हो जाता 00:24:08 है। कोई भी युग हो, कोई भी युग हो, सत्य युग हो, वहां देखो ध्रुव जी की सौतेली माता कि 00:24:19 'मेरा पुत्र बैठेगा इस-इस-इस राज सिंहासन पर, मेरा पुत्र बैठेगा'। धन ही तो है। 00:24:28 त्रेता हो, तो कैकेयी की बुद्धि बिगड़ गई—'चले जाएं राम वन में, भरत को राज सिंहासन 00:24:40 मिले'। आज तो यह घर-घर की कथा है, कितना बड़ा अनर्थ है यह! उसका संचय करने में व्यक्ति लगा 00:24:50 रहता है, यह दुरमति तो है, यह कुमति तो है। 00:24:57 इसी से संत निकालता है। ब्रह्मर्षि स्वामी श्री सप्तानंद जी महाराज कहते हैं, बड़े सुंदर शब्द हैं—'कुमति कूप में पतन था, पकड़ निकाला हाथ'। हां, हम तो इस कुमति के कूप में, इस कुएं में, अंधे कुएं में गिरे थे, पकड़ 00:25:19 निकाला 00:25:24 हाथ। संत बताता है—जिसको धन 00:25:27 समझ रहे हो, जिसको अर्थ समझ रहे हो, वह तो अनर्थ है। जीवन की निधि, जीवन की संपत्ति क्या है?— 00:25:33 ताते दुर्लभ काल न वृथा 00:25:39 गमाइए, ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन 00:25:48 गाइए। अब मैं तो उस दिन भी आपसे कह रहा था भाई, इकट्ठा वह करता है जिसको प्रभु पर भरोसा 00:25:53 नहीं होता, जिसको प्रभु पर 00:25:57 विश्वास नहीं है, वह-वह यहां-वहां संग्रह करता रहेगा। शायद कभी आपको सुनाया था ना मैंने, किसी ने दो 00:26:05 पंक्तियां कही हैं, बहुत अच्छी, काम की बात है— 'अगर वह है, तो फिर फिक्र क्यों, और नहीं है, तो फिर उसका जिक्र क्यों?' अगर वह नहीं है, फिर किसकी बात करते हो? क्यों बात करते हो? है 00:26:24 और नहीं के बीच में तो कुछ नहीं होता है ना, या तो है या नहीं 00:26:31 अगर नहीं है, फिर उसका जिक्र क्यों है? और अगर है, तो फिर बंदे तुझे फिक्र क्यों 00:26:41 है? आप और मैं यहां उसका जिक्र करने के लिए आते हैं रोज। अभी हम कहां खड़े हैं? जिक्र भी 00:26:49 है और फिक्र भी है। होती है ना चिंता? होती है ना? ईमानदारी से बताओ, हो जाती है ना चिंता? 00:26:54 हो जाती है। कब होगा, 00:26:57 क्या होगा, कैसे होगा, होगा कि नहीं होगा। जबकि संत युक्ति दे रहे हैं—अरे, 'चरण पर रख दिया जब माथ तो किस बात की चिंता'। अगर चिंता करनी है, तो बस जो समय जा रहा है ना व्यर्थ, इसकी 00:27:21 चिंता करिए। यह नहीं आएगा, यह लौटकर नहीं आएगा। 'पत्ता टूटा डार सौं बहुरि न लागे बार'। 00:27:29 ताते दुर्लभ काल न वृथा 00:27:35 गमाइए, ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन... हरि भक्तन के संग सदा सुख पाइए। सब 00:27:55 कहिए—हरि भक्तन के संग 00:27:57 सदा सुख पाइए। ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। और अब संत कह 00:28:13 रहे हैं तो फिर गाइए— कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:28:28 कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। राधा गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, राधा गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:28:50 गोविंद गोविंद गोपाल 00:28:58 नंदलाल, राधा गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल। 00:29:19 गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, गोपाल नंदलाल, गोपाल नंदलाल। 00:29:27 हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल। कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:29:48 कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल 00:29:57 नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:30:17 कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल।2. सत्संग और भक्ति की शक्ति - The Power of Satsang and Devotion
https://youtu.be/0p2Qh9-EEkE
[00:01] - [02:28] | सूत जी का सत्कार और ऋषियों का प्रश्न: शौनकादि ऋषियों ने सूत जी का दिव्य आसन पर सत्कार किया और भगवान की कथा सुनने का निवेदन किया ताकि 'दुरमति' (बुरी बुद्धि) का नाश हो सके।
[02:29] - [05:20] | स्वार्थ बनाम परमार्थ: स्वामी जी बताते हैं कि स्वार्थ ही दुरमति है। जब जीव स्वयं को ईश्वर का अंश मानकर तृप्त हो जाता है, तब उसके भीतर प्रेम और 'हित' का भाव जागता है।
[05:21] - [09:14] | मन की चंचलता और सुधार: मन अक्सर सुधर कर फिर बिगड़ जाता है। संतों के अनुसार, जब तक भक्ति में मन पूरी तरह भीग न जाए, तब तक उसकी स्थिरता पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
[09:15] - [13:40] | सत्संग की औषधि: सत्संग ही वह औषधि है जो मन को स्वस्थ रखती है। गुरु के वचनों पर विश्वास और 'कुपथ' (गलत संगति) से परहेज करना साधना का मुख्य हिस्सा है।
[13:41] - [17:00] | शरीर का उद्देश्य: मानव शरीर केवल हित की प्राप्ति और अहित के त्याग के लिए मिला है। दोषों को दूर करना और गुणों का विकास करना ही असली साधना है।
[17:01] - [22:40] | संतों की महिमा: सूरदास जी के पदों के माध्यम से समझाया गया है कि संतों का संग और भगवान के लीला गुणों का श्रवण ही इस दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनाने का एकमात्र मार्ग है।
[22:41] - [28:10] | धन का अनर्थ और समय की बर्बादी: संसार में धन का संग्रह अक्सर अनर्थ और आपसी कलह का कारण बनता है। दुर्लभ समय को व्यर्थ की चिंता के बजाय प्रभु सिमरन में लगाना चाहिए।
[28:11] - [30:46] | संकीर्तन: वीडियो के अंत में 'कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल' के मधुर संकीर्तन के माध्यम से भक्ति का रस प्रवाहित किया गया है।
1. The discourse emphasizes that the primary purpose of the human body is to distinguish between what is beneficial ('Hit') and harmful ('Ahit') for the soul.
2. It explains that 'Durmati' or corrupted intellect arises from selfishness, and it can only be cured through the medicine of Satsang (spiritual company) and the grace of a Guru.
3. The speaker highlights that a person’s mind is unpredictable and prone to falling back into old habits; hence, constant association with saints is necessary to keep the mind steady.
4. Material wealth is often described as a source of conflict ('Anarth') that leads to spiritual decline, whereas the real wealth is the remembrance of God's name.
5. The session concludes by teaching that instead of worrying about the future, one should surrender to the Divine and utilize every precious moment in chanting and devotion.
https://youtu.be/0p2Qh9-EEkE