भक्ति जीवन मे कैसे स्थिर होगी|Shree Hita Ambarish Ji
1. Full Transcript In Hindi (पूरा प्रतिलेख हिंदी में)
परसों मैंने आपसे कहा था कि यह प्रभु का प्रण है - सनमुख होई जीव मोहि जब, जन्म कोटि अग नासहीं तब ही। आप जब सत्संग में आते हो, आप जब कथा में आते हो, तो अपने मन में यह विश्वास लेकर आइए भाई यहाँ प्रभु विराजमान हैं। बस प्रभु के सन्मुख मुझे, मुझे प्रभु का होकर जाना है। इसलिए मैंने आपको कहा था थोड़े दिन इस भाव का अभ्यास करिए कि आगे-पीछे जो है वह तो आगे-पीछे होता ही रहेगा।
एक बार श्री रामकृष्ण परमहंस अपने कुछ शिष्यों के साथ ऐसे तालाब के किनारे टहल रहे थे। मछली पकड़ने वाले ने जाल डाला। अब जो जाल में मछली फँसी ना, उसमें कुछ तो ऐसी थी जो छटपटा रही थी, कुछ ऐसी थी जो बिल्कुल निस्पंद पड़ी थी, और कुछ एक-दो ऐसी भी थी जो प्रयास करके जाल से बाहर निकल गई।
अब श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने अपने शिष्यों की ओर देखा और मुस्कुराते हुए पूछा—बोल क्या समझे? मैं अभी आपको यही कह रहा था ना, जिसको सीखना है वह तो आसपास घटने वाली घटना से भी सीखेगा। जो शिष्य हो गया है ना, माने जिसको सीखना आ गया है, जो सीखने को तत्पर है, जो श्रद्धावान है, वह तो इस अस्तित्व में घटने वाली एक-एक घटना से सीख लेगा। जो आपको दिखाई पड़ रहा है, जो आपको सुनाई पड़ रहा है—बहुत ध्यान से सुनना—जो आपको दिखाई पड़ रहा है, जो आपको सुनाई पड़ रहा है, उसके पीछे कोई कारण है। आपको वह क्यों दिखाया जा रहा है, आपको वह क्यों सुनाया जा रहा है, उसका कोई कारण है। उस कारण का विचार करिए। कोई विशेष प्रकार की परिस्थिति यदि आपके जीवन में आई है, तो आप ही के जीवन में क्यों आई है? अरे कोई कारण होगा, महापुरुष कहते हैं—अरे कोई कारण होगा!
तो श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों से पूछा—बोले हाँ भाई बताओ, क्या समझे? एक जो शिष्य था वह बड़ा प्रज्ञावान था। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि तीन प्रकार के जीव इस संसार में होते हैं। तीन प्रकार की मछलियाँ थी। एक बिल्कुल निस्पंद पड़ी थी, माने जिन्होंने संसार का बंधन स्वीकार कर लिया है। जैसे आप कह देते हो ना—अब महाराज जी हम क्या करें, हम तो गृहस्थ हैं, हमारे भाग्य में तो यह रोना-धोना ही लिखा है, हम तो खाएँगे-पिएँगे और सोएँगे, और रोग से, चिंता से ग्रस्त होकर, शोक से त्रस्त होकर एक दिन मर जाएँगे, यही हमारा जीवन है। फिर गधा, कुकर, सुकर होकर फिर जन्म लेंगे, हम तो इसको स्वीकार करके बैठे हैं क्योंकि हम तो गृहस्थ हैं।
एक यह विचार पता है आपको कितना दुर्बल कर देता है भीतर से? क्यों? क्योंकि इस विचार के मूल में अज्ञान है, अविद्या है। यहाँ ना कोई विरक्त है, ना कोई गृहस्थ। जीव प्रभु का है, हम प्रभु के हैं। कितना उत्साह भर जाता है जीवन में इस विचार का पुनः-पुनः विचार करने से! भाई हम प्रभु के हैं, और कोई झूठी बात थोड़ी है, कौन झुठला देगा इसको कि आप प्रभु के नहीं हैं? आप प्रभु के ही तो हैं। सच्ची बातें ही तो आपको कही जा रही हैं। झूठ तो वह है जो आपने पकड़ रखा है, जिसको आप छोड़ने को तैयार नहीं हो, जिसके कारण इतना कष्ट पा रहे हो लेकिन छोड़ने को तैयार नहीं हो। दुख तो वह है। यह तो सीधी-सच्ची बात है भाई—आप प्रभु के हो, प्रभु आपके हैं।
तो उसने कहा कि भाई देखो, एक मछली तो ऐसी है जिसने जाल से बाहर निकलने की चेष्टा ही नहीं की। उसने तो बंधन स्वीकार कर लिया, उसने तो कहा भाई ठीक है, अब गए, अब तो हम मर ही गए। पर एक ऐसी है जो फड़फड़ा तो रही है लेकिन जाल से निकल नहीं पा रही है। और एक ऐसी है जो प्रयास करके जाल से निकल ही गई।
अब आप सोचो, जिनका शिष्य ऐसा प्रज्ञावान है वह गुरु कैसे होंगे! श्री रामकृष्ण परमहंस का एक शिष्य था जिसने उत्तर दिया श्री रामकृष्ण परमहंस के पूछने पर। अब देखो क्या घटना घट रही है—मछली पकड़ने वाला अपनी मछली पकड़ रहा है और आप उस शिष्य की प्रज्ञा देखिए! अब जब यह सब बात उसने श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस से कह दी, तो परमहंस मुस्कुराने लगे और कहने लगे—एक मछली और भी होती है। अब शिष्यों ने कहा वह कौन सी? बोले वह जाल के निकट आती ही नहीं। जो जाल के निकट ही नहीं आती! ऐसे भगवान के कुछ नित्य सिद्ध जन भी होते हैं ना, जो निवृत्ति परायण ही होते हैं, जो इस संसार में केवल संसार का कल्याण करने के लिए आते हैं। वह इस दुस्तर भव-सिंधु के बहाव में नहीं बह जाते।
पर बाकी आपके-मेरे में तो तीन प्रकार के जीव हैं। गोस्वामी जी ने भी तीन प्रकार के जीव कहा —विषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिविध जीव जग वेद बखाने॥ तो एक तो ऐसा व्यक्ति है भाई जिसने बंधन स्वीकार ही कर लिया है, वह तो प्रयास भी नहीं कर रहा है। एक है जो प्रयास कर रहा है लेकिन उसका प्रयास सफल नहीं हो रहा है, क्यों? क्योंकि उसके प्रयास में उत्साह नहीं है और धैर्य नहीं है, उसके प्रयास में सातत्य नहीं है, उसके प्रयास में निरंतरता नहीं है। इसलिए आपको कुछ क्षण पहले मैंने कहा कि प्रैक्टिकल बात मैं आपसे कह रहा हूँ। केवल भाव के धरातल पर मैं यहाँ से कुछ कह दूँ, आप कुछ समझ लें, तो उससे ना मेरा कुछ काम बनेगा ना आपका। यहाँ से तो भाई सीधी-सच्ची बात कहनी चाहिए जो हो सके वही बात यहाँ से कही जाए ना। तो अभ्यास में, साधन में निरंतरता बनाकर रखनी पड़ेगी।
तो कुछ मछलियाँ जो थोड़ी देर के लिए फड़फड़ाईं फिर वह भी शांत हो गईं, उन्होंने भी उस बंधन को स्वीकार कर लिया। पर कुछ ऐसी थीं जो जब तक निकल नहीं गईं तब तक सतत प्रयास करती रहीं। और परमहंस कहते हैं—एक मछली और भी होती है जो जाल में फँसती नहीं, वह जाल के निकट ही नहीं आती। और ऐसे निवृत्ति-परायण महापुरुष भी आते हैं इस संसार में, वह भगवान के भेजे आते हैं, वह भगवान के धाम से ही नित्य-मुक्त होकर ही आए हैं। उनको संसार का बंधन नहीं बाँधता, वह माया-मुक्त ही हैं। पर बाकी तीन प्रकार के जीव हैं।
अब घर जाकर इसका विचार करना कि हम तीनों में से कौन से हैं? हमारा, हम कौन से प्रकार के हैं? पहले हैं कि भाई अब क्या करें, हम तो ऐसे ही हैं, हम तो ऐसे ही आए हैं ऐसे ही मर जाएँगे? थोड़ा सा भजन-सत्संग का सुख भी ले लेते हैं और थोड़ा संसार का गाना-बजाना हो जाए तो भी कोई बुरी बात नहीं है, वह भी कर लेते हैं, थोड़ा यहाँ भी हाथ-पैर मार लेते हैं, थोड़ा वहाँ भी चले जाते हैं, वहाँ भी देख लेते हैं संसार में क्या हो रहा है।
आपको स्मरण हो, मैं पहले आपसे कभी कहा करता था—जिसको संसार में ही सुख है, जिसको अभी विषय का ही रस अच्छा लग रहा है, मीठा लग रहा है, उसको तो सत्संग कभी-न-कभी प्रिय लगेगा। उसको तो कभी-न-कभी सत्संग प्रिय लगेगा क्योंकि सत्संग का रस उस विषय-रस से ऊँचा रस है, श्रेष्ठ रस है, गाढ़ा रस है, अधिक मधुर है, दीर्घकालिक है, इसका प्रभाव दीर्घकालिक है। पर ध्यान रखना, एक बार यदि सत्संग का रस मिल गया है, एक बार यदि सत्संग का रस आपने चख लिया है, फिर संसार का रस प्रिय नहीं लग सकता। अगर लग रहा है—और ईमानदार रहना—अगर लग रहा है तो समझ लेना कि अभी सत्संग का रस मिला नहीं, रस विशेष तिन्ह जाना नाही। अभी यह रस मिला नहीं, मिल जाएगा फिर संसार का रस प्रिय लग नहीं सकता। रमा विलास राम अनुरागी। तजत वमन... सत्संग का जो रस है वह तो विषय-रस में वमनवत प्रतीति कराता है, और ऐसा ही होता है।
इसलिए सत्संग का वास्तविक रस मिले इसके लिए प्रयास करना। इस विचार से अपने आप को दुर्बल नहीं करना—भाई हम तो घर-गृहस्थी में पड़े हुए लोग हैं, हम क्या कर सकते हैं? इस विचार से अपने आप को दुर्बल नहीं करना, यह विचार आपको कमजोर कर देगा। हम ना गृहस्थ हैं ना विरक्त हैं, हम ना इधर के हैं ना उधर के हैं, हम भाई प्रभु के हैं।
और जैसा अभी मैं आपसे कह रहा था ना, जो कुछ आपको सुनाया जा रहा है, जो कुछ आपको दिखाया जा रहा है, उसका कोई कारण है। क्यों आया जीवन में यह क्षण जब मैं यह कह रहा हूँ आप यह सुन रहे हैं, हम यहाँ यह कथन-श्रवण कर रहे हैं, क्यों आया हमारे जीवन में यह क्षण? संसार में देखो व्यक्ति कहाँ-कहाँ भटक रहा है इस समय, कोई सिनेमा देख रहा होगा, कोई बढ़िया खा-पी रहा होगा, कोई कहीं डोल रहा होगा। हमको प्रभु ने यहाँ लाकर बैठाया है, अरे कोई कारण होगा! मैं यह कह रहा हूँ आप सुन रहे हैं, क्यों? कोई कारण होगा!
तो बंधन स्वीकार मत करिए। छटपटाइए, तो छटपटाने का अर्थ क्या है? प्रयास तो करिए। अपनी जो सामर्थ्य में हो—वैसे तो प्रयास सामर्थ्य से अधिक किया जाना चाहिए—पर कम से कम सामर्थ्य से कम प्रयास तो मत करिए! जितना सामर्थ्य प्रभु ने दिया है, कम से कम उतने को तो ईमानदारी से साधन में लगाइए।
तो भगवान का दर्शन करके वहाँ एकदम जैसे आनंद की बाढ़ सी आ गई। अब देखो, अभी कथा आरंभ नहीं हुई, अभी तो केवल कथा की महिमा ही कही जा रही है, कथा आरंभ नहीं हुई उससे पहले ही भगवान आकर वहाँ पर खड़े हो गए। भगवान को केवल भक्ति प्यारी है—कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानऊँ एक भगति कर नाता॥ अभी बताओ यह सीधा-सीधा भक्ति का पक्षपात हुआ कि नहीं? भक्ति का पक्षपात है! भगवान ने कहा—भाई सब साधन ठीक हैं अपनी जगह पर हैं, पर मानऊँ एक भगति कर नाता।
ज्ञान अनुभव तो करा सकता है, दर्शन भी करा सकता है। महाराज जी, मैंने ऐसा भी देखा कि एक-दो ब्रह्मज्ञानी महात्माओं को भी भगवद्-दर्शन हुआ। माने उनका मार्ग ज्ञान का है, लेकिन उनके अत्यंत शुद्ध अंतःकरण के कारण उनको भगवद्-दर्शन भी हुआ। तो ज्ञान अनुभव भी करा देता है, ज्ञान दर्शन भी करा देता है, लेकिन जिसको भगवती श्रुति 'रसौ वै सः' कहती है, उस रस-मूर्ति का, उस परम फल का आस्वादन भक्ति कराती है, उस फल को चखाती भक्ति है। मैंने देखा कि उन महात्माओं को भगवद्-दर्शन हुआ, लेकिन भगवद्-दर्शन हो जाने के बाद भी वह पुनः आकर अपनी उसी ज्ञान-अवस्था में ही आरूढ़ हुए। ऐसा होता है ना महाराज जी, ऐसा हुआ है! ऐसे महापुरुषों का चरित्र मिलता है कि वह ज्ञान-मार्ग के साधक हैं, उनको श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ, श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद भी उनकी वृत्ति अपने उसी भाव में आरूढ़ रही, वही स्थित रही।
तो इसलिए कोई पूछता है ना कि पुराणों में लिखा है कि इतना करोड़ नाम-जप करने से भगवान का दर्शन होता है तो क्या होता है? अवश्य होता है भाई, पुराणों में झूठ नहीं लिखा है। पर मैं आपको एक बात और निवेदन कर दूँ—कहीं भी यह नहीं लिखा है कि इतना जप या इतना साधन करने से भगवान में प्रेम होता है। भगवान में प्रेम केवल भगवान के प्रेमी के संग से होता है, भगवान में प्रेम केवल भगवान के प्रेमी के अनुग्रह से होता है। इस बात का सबसे ज्वलंत उदाहरण श्री उद्धव जी हैं। वह तो ज्ञान, कर्म, भक्ति सबका रहस्य जानते हैं, क्या है जो वह नहीं जानते! लेकिन वह जो आँख में आँसू आया ना—कृष्ण नाम कान में पड़े और हृदय विगलित हो जाए—जिसकी याचना चैतन्य महाप्रभु कर रहे हैं— नयनं गलदश्रुधारया गद्गदुरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥
कैसी भक्ति चाहता हूँ? उससे पहले क्या कह रहे हैं—न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद्भक्तिरहेतुकी त्वयि॥ ना धन चाहिए, ना जन चाहिए, ना सुंदरी, और वह तो यहाँ तक कहते हैं 'कवितां वा जगदीश कामये'—मैं कोई श्रेष्ठ-श्रेष्ठ रचनाएँ करके इस संसार में यशस्वी भी नहीं होना चाहता। 'मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहेतुकी'—जन्म-जन्म में आपकी अहेतुकी भक्ति!
अब भगवान ने पूछा—भाई कैसी भक्ति चाहते हो? क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि में भक्ति का अर्थ अलग-अलग है ना, पीपल को डोरा बाँधने वाला वह भी यह समझता है मैं भक्ति कर रहा हूँ, उससे पूछो क्या कर रहे हो, बोले भगवान की भक्ति कर रहे हैं। तो भक्ति का अर्थ तो सबके मन में अलग-अलग है। तो भगवान ने पूछा कैसी भक्ति चाहते हो? तो कहते हैं—नयनं गलदश्रुधारया कि मेरे नेत्रों से अविरल अश्रु-प्रवाह होता रहे, कंठ का स्वर प्रेम के भार से भारी हो जाए, और रोम-रोम पुलकित हो, और ऐसा कब हो? बस आपका नाम लेते ही ऐसा हो जाए, ऐसी भक्ति मुझे प्रदान करिए। आपका नाम लेते ही ऐसी दशा हो जाए, ऐसी भक्ति हमको प्रदान करिए। मन क्रम वचन तुम्हारी आशा। ऐसी भक्ति करै रिदास॥
संतों ने वह जो कठिन-कठिन बातें लिखी हैं ना, उनको सरल करके बताया है। मुझे क्यों मीरा, कबीर, तुलसी, नानक प्राणाधिक प्रिय हैं? क्योंकि वह वेद-शास्त्रों की जो कठिन-कठिन बातें हैं, क्लिष्ट-क्लिष्ट बातें हैं, वह इन्होंने बहुत सरल-सहज करके बताई हैं। और मुझे लगता है कि बिना साधु-संग कोई साधु बन तो सकता है... साधु होने के तो अनेक कारण हो सकते हैं ना, जैसे भगवान का भजन अनेक-अनेक कारणों से करते हैं। भगवान के भक्तों में आर्त भी हैं, अर्थार्थी भी हैं, जिज्ञासु भी हैं, ज्ञानी भी हैं।
कल भी मुझे चलते-चलते किसी ने पत्र दिया था ना, वह है यहाँ पर जिसने कल पत्र दिया था? नहीं है? तो सज्जन ने ऐसा लिखा था कि आप कहते हैं कि भय से भी भक्ति होती है, पर मैं आपकी यह थ्योरी नहीं मानता क्योंकि भक्ति तो ऐसे होती है, वैसे होती है। तो मैंने कहा मैं तो वैसे भी थ्योरी मनवाने के लिए नहीं कहता हूँ, मैं तो सदा ही कहता हूँ भाई—मैं कह रहा हूँ, आपको अच्छी लगे आप सुन लो, नहीं लगे छोड़ दो। पर मैं स्पष्ट कर दूँ—क्योंकि थोड़ा सावधान होकर सुनना चाहिए, उन्होंने टोपी और मास्क लगाया था ना तो हो सकता है ठीक से सुना नहीं हो—तो मैंने यह नहीं कहा कि भय में भी भक्ति होती है, मैंने कहा भय से भी भक्ति होती है! अर्थात संसार के भय से भयभीत होकर भी तो कोई भगवान की शरण में जाता है, और जाता ही है, और जाना चाहिए। मैं तो कल आपसे यही तो कह रहा था, आचार्य का वाक्य ही है—'डर ही डरप', हरिवंश महाप्रभु जी इस त्रिगुण के इस पसारे से, इस माया के प्रपंच से भयभीत होने के लिए तो कह रहे हैं भाई, इससे डरकर भगवान की शरण में जाओ।
तो भय में भक्ति नहीं, पर भय से भक्ति तो होती है। तो अनेक-अनेक कारणों से कोई भगवान का भजन करता है, उसमें आर्त भी है, अर्थार्थी भी है, जिज्ञासु भी है, और ज्ञानी भी है। तो ऐसे साधु भी अनेक-अनेक कारणों से हुआ जा सकता है। पर मैं समझता हूँ कि बिना साधु-संग के कोई साधु हो तो सकता है, बिना साधु-संग के कोई साधु बन तो सकता है, पर बिना साधु-संग के कोई साधु रह नहीं सकता! यदि कोई चाहे ना जीवन में साधुता रहे, फिर तो साधु के संग रहना पड़ेगा। साधु-संग के बिना जीवन में साधुता रह नहीं सकती, आ तो जाएगी पर स्थिर नहीं रहेगी।
जो बात मीराबाई कह रही हैं, पहले कितनी-कितनी बात कहती हैं कि—शील संतोष धरूँ घट भीतर समता पकड़ रहूँगी, जाको नाम निरंजन कहिए ताको ध्यान धरूँगी। गुरु के ज्ञान रंगूँ तन कपड़ा मन मुद्रा पहनूँगी, और प्रेम प्रीत सू हरि गुण गाऊँ चरणन लिपट रहूँगी। या तन की मैं करूँ किंगरी रसना नाम रटूंगी... फिर अंत में विचार करके कहती हैं भाई—यह सब हो जाएगा जब साधा संग रहूँगी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर संतन संग रहूँगी, साधा संग रहूँगी।
मुझे तो अब तक इतनी सी बात समझ में आई और मुझे लगता है कि इतनी सी बात से अपना काम बन जाएगा। इतनी सी बात समझ में आई कि प्रयासपूर्वक, प्रार्थना से काम बने तो प्रार्थना से करिए, पुरुषार्थ से बने तो पुरुषार्थ से करिए, और प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों ही इस दिशा में लगाइए, और किसी प्रकार से बस प्रभु से यह कहला लीजिए कि तुम्हारे जीवन में सत्संग सदा बना रहे! इतनी सी बात मेरी तो समझ में आई।
हमने नंददास जी का भ्रमरगीत गाया, वहाँ भी अंत में यही बात मिली। पूरा भ्रमरगीत गाने के बाद श्री नंददास जी अंत में एक ही बात कहते हैं भाई—सबको कहने का फल क्या है? इतनी बात समझ लीजिए कि साधु-संग ही सर्वोपरि लाभ है। किसी कारण से, किसी प्रकार से आपके जीवन में सद्गुण आ भी गया, पर वह सत्संग के बिना जीवन में टिकेगा नहीं। मैं यह कहना चाह रहा हूँ, स्थिर नहीं रहेगा। यदि आप चाहें कि भक्ति स्थिर रहे—जब मानस में गोस्वामी जी कहते हैं ना भगति सदा सत्संग—तो जो 'सदा' शब्द है ना, वह भक्ति के लिए भी कहा गया है और सत्संग के लिए भी कहा गया है। यह कवि का काव्य-कौशल है कि उस शब्द को मध्य में रखकर वह शब्द दोनों के लिए कहा गया है। यदि कोई चाहे कि जीवन में सदा भक्ति रहे, फिर सदा सत्संग रहना पड़ेगा, निरंतर-निरंतर, इसमें प्रमाद ना करे, इसमें भूल नहीं हो जाए।
और कल मैं आपसे कह रहा था ना भाई, काल तो घात लगाकर बैठा ही है, और ऐसा महापुरुषों का मत है—# fq काल फिरत सर सांधे और चढ़्यो रहत है कांधे। और हरि का ऐसा ही सब खेल, बिगड़ते-बिगड़ते बात बन जाती है, बनते-बनते बिगड़ जाती है। बिगड़ते-बिगड़ते बन जाएगी, बनते-बनते बिगड़ जाएगी, अब कौन कहेगा भाई मैंने बनाई या मैंने बिगाड़ी? जो राम रचि राखा। यह तो ऐसा ही खेल है भाई, इसीलिए इस पर बहुत ज्यादा आश्रित हुए नहीं हैं महापुरुष। आपके शब्दों में कहूँ तो इस पर बहुत ज्यादा रिलाई (rely) मत करिए, इस पर बहुत ज्यादा आश्रित नहीं। यह तो ठीक है, हो रहा है, बस आवश्यकता से थोड़ा कम ही संबंध रखा है महापुरुषों ने, बुद्धिजीवियों ने जिनका विवेक जग गया है उन्होंने आवश्यकता से भी थोड़ा कम संबंध रखा है, कम से कम में जितने में काम चल जाए बस उतना, कम से कम।
तो इतनी बात यहाँ पर समझ में आई कि जहाँ संत होंगे वहाँ हरि की कथा होगी, और जहाँ संतों के मुख से प्रवाहमान हरि की कथा होगी, श्री हरि भी वहीं पर होंगे, अन्यत्र नहीं। फिर भगवान को यदि खोजने जाना भी हो तो फिर कहाँ जाएँ? हम तो ऐसा कहते हैं जिधर तुम छिपे हो उधर देखना है, पर यहाँ तो भगवान कहते हैं भाई जिधर हम खड़े हैं उधर देखिए ना! जिधर छिपे नहीं हैं, जिधर हम खड़े हैं। भगवान का श्रीमुख वाक्य है—मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद। नारद से कह रहे हैं भगवान जी। तो जिधर हम खड़े हैं उधर देखिए।
यह जो बार-बार, बार-बार सहस्रों-सहस्रों उदाहरण देकर आपको सत्संग की महिमा कही जा रही है, इसलिए नहीं कि आप यहाँ आते रहें, इसलिए नहीं कही जा रही है क्योंकि भाई यही सच्ची-अच्छी बात है। हर बात कहकर यहीं आना है, जैसे गीत में 'सम' होता है ना, बार-बार उस सम पर आता है गाने वाला, ऐसे ही हर बात कहकर आना यहीं पर है—राधावल्लभ भजत भज भली भली सब होय। इसलिए कहा जा रहा है ताकि हम इसके लिए प्रयासरत हों, प्रयासरत रहें, थक ना जाएँ।
पुनः दोहराता हूँ मैं—बाहर उत्साह और भीतर धैर्य, यह बना रहे। बाहर उत्साह भी बना रहे, माने बुझ ना जाए, जीवन ऐसे बुझा-बुझा सा ना हो जाए। और जो वैराग्य है ना, उसमें कहीं भी उदासी नहीं है। जिनके वैराग्य में उदासीनता है, माने वह सहज वैराग्य नहीं है। सहज वैराग्य में तो अप्रतिम आनंद है, सहज वैराग्य में तो अप्रतिम आनंद है!
मुझसे एक बार ऋषिकेश की बात है, हम गंगा किनारे बैठे थे। वहाँ शायद एकादश स्कंध पर ही चर्चा हुई थी कुछ साल पहले। तो कथा के बाद हम शाम को चले जाते थे, तो गंगा किनारे बैठे थे। तो एक महात्मा मेरे पास आकर बैठ गए, अच्छे महात्मा थे, कुछ अच्छी चर्चा उन्होंने की, एक-आध अच्छी बात हमको भी सुनने-सीखने को मिली। पर उनका एक विशेष आग्रह था, उनका आग्रह यह था कि—आपने इस रंग के वस्त्र क्यों पहने हैं? आप तो साधु हैं, आप तो विरक्त हैं, आप इस रंग के वस्त्र क्यों पहने हैं? मैंने उनसे तो कुछ नहीं कहा, बड़े थे और बड़ों की बात मौन होकर सुन लेनी चाहिए, उनसे तो मैंने कुछ नहीं कहा, पर मैंने अपने मन से यह बात उसी समय कही थी—एक पतिव्रता स्त्री जब श्रृंगार करती है, तो वह ऐसा श्रृंगार नहीं करती जो उसको प्रिय लगे, वह ऐसा श्रृंगार करती है जो उसके पति को प्रिय लगे।
गोपी श्रृंगार कैसा करती है? जैसा श्रीकृष्ण को प्रिय है। जब उद्धव गए तो गोपियाँ बड़ा सुंदर श्रृंगार किए बैठी हैं, नेत्रों में अश्रु हैं, कंपित गात है, पर श्रृंगार किए बैठी हैं। उद्धव जी के मन में प्रश्न हुआ—भाई यह तो प्रेम-वैरागियों की स्थिति नहीं होनी चाहिए! फिर गोपियाँ कहती हैं—श्यामसुंदर को हम ऐसी अच्छी लगती हैं। यदि हमारा जर्जर गात देखेंगे तो उनको बड़ा कष्ट होगा, बड़े कोमल हृदय हैं वह! तू जिस कृष्ण को जानता है वह होगा पूर्णकाम, आपका काम निर्लिप्त-निष्पक्ष, पर हमारा सांवरा-सलोना ऐसा नहीं है, हमारा श्यामसुंदर ऐसा नहीं है। हम जानती हैं उसको क्या प्रिय लगता है। उस समय भी वह श्रृंगार किए बैठी हैं, किसलिए? क्योंकि वह श्यामसुंदर को प्रिय है।
तो पतिव्रता का जो श्रृंगार है वह केवल पति को सुख देने के लिए है, पति को कैसा श्रृंगार प्रिय है। तो मैंने कहा भाई यह तो महात्मा हैं, संन्यासी महात्मा हैं, इनको तो यह सब कहना ठीक नहीं है, पर मैंने उनमें कहा... मैंने कहा भाई आपने पूछा यह रंग क्यों पहना है, मैंने कहा हमारे इनको अच्छा लगता है, बस इसीलिए पहना है और कोई उत्तर नहीं है। जिन्ह भेसां महाराज रीझे सो ही भेष धरूँगी। इसलिए थोड़ी पहना है कि कोई हमको साधु माने, माने ना माने, नहीं माने नहीं माने। हम इनको अपना मानें, यह हमको अपना मानें। पर जो कर रहे हैं वह इसीलिए तो कर रहे हैं—पहली बात भी यही है, बीच में भी यही है और अंत में भी यही है, हम इनको अपना मानें और यह हमको अपना मानें।
पर आज की बात को यहीं विराम देते हुए कि भाई कहीं से भी आरंभ करें, पर जीवन में सद्गुण-सद्भाव यदि स्थिर रहेगा तो केवल सत्संग की ही कृपा से रहेगा। आज की वार्ता श्री जी के चरणों में निवेदन करते हैं, महाराज श्री के चरणों में प्रणाम, आप सबके हृदय-स्थित प्रभु को नमन।