Sunday, August 2, 2026

माया का The End – सिर्फ एक Simple तरीका! | भगवत तत्त्व - 12/16 | Jagadguru Shri Kripalu Ji Pravachan:

माया का The End – सिर्फ एक Simple तरीका! | भगवत तत्त्व - 12/16 | Jagadguru Shri Kripalu Ji Pravachan:

https://www.youtube.com/live/xRtsEgyhwTw
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08:12 प्रत्येक जीव का चरम लक्ष्य परमानंद प्राप्त करना है, जो केवल भगवान की प्राप्ति से ही संभव है। 09:39 भगवान इंद्रियों, मन और बुद्धि से परे हैं, इसलिए उन्हें केवल उनकी कृपा के माध्यम से ही जाना जा सकता है। 10:44 कर्म मार्ग के नियम अत्यंत कठिन हैं और इसका फल केवल क्षणिक स्वर्ग है, जिससे माया और दुखों का पूर्ण नाश नहीं होता। 11:46 ज्ञान मार्ग का अधिकार पाना अत्यंत दुष्कर है, जिससे केवल आत्मज्ञान हो सकता है किंतु पूर्ण भगवत प्राप्ति या मोक्ष नहीं। 13:19 वेदों और उपनिषदों के अनुसार भगवान एवं गुरु के प्रति अनन्य निष्काम भक्ति ही माया से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। 17:19 भगवान केवल भक्त के शुद्ध प्रेम और मिलने की आंतरिक व्याकुलता (भाव) से ही रीझते हैं। 19:46 समस्त वेद-मंत्र यह सिद्ध करते हैं कि केवल और केवल भक्ति मार्ग के द्वारा ही जीव भगवान को प्राप्त कर सकता है। ---- Full Transcript :
00:00:01 बरह 00:00:04 पीम 00:00:07 नटबर बरबु करणयो 00:00:16 करणकारिकम 00:00:25 विभवा 00:00:32 कनक कपिशम 00:00:38 ब जयंत 00:00:46 चमाला 00:00:53 रणो 00:00:59 रध सुधया 00:01:03 पूयन 00:01:08 गो वृंद 00:01:15 वृंदाण्यम 00:01:21 स्वपद रमणम 00:01:26 प्रा 00:01:31 गीत की 00:01:37 धम 00:01:41 सदा परिभवघ्नमभ 00:01:47 दोम 00:01:54 तीस पदम शिव बिन 00:02:03 चिनतम 00:02:06 शरण्यम 00:02:13 भत्याहम 00:02:19 प्रणत पाल भवापो 00:02:28 म वंदे महापुरुषते 00:02:38 चरणारविंदम 00:02:49 नमः कमलनाथ 00:02:57 भय 00:03:06 नमः कमल माने 00:03:18 नमः कमल पा 00:03:24 ाय 00:03:29 नमस्ते कमले क्षण यो ब्रह्माम विदधा पूर्वम जोव वेदा प्रहणो तस्मै त्व देवत्म बुद्धि प्रकाशम मुमुक्षु शरणमहम प्रपद 00:04:01 वेद वेदांत वेद वृंदारक वृंद वंद आनंद कंद सच्चिदानंद श्री कृष्ण चंद्र चरणारविंद मकरंद मिलिंद महानुभाव नियमानुसार थोड़ी देर हरि 00:04:18 नाम संकीर्तन कर लीजिए पश्चात विषय का उपसंहार किया जाएगा भजो गिरधर 00:04:34 गोविंद 00:04:37 गोपाला 00:04:55 भजो गिरधर 00:05:00 गोविंद 00:05:03 गोपाल 00:05:08 भजो 00:05:13 गोविंद 00:05:16 गोपाला 00:05:21 भजो गिरधर 00:05:26 गोविंद गोपाला 00:05:34 भजो 00:05:38 गोविंद 00:05:41 गोपाल 00:05:46 और भजो मेरे गिरिधर गोविंद 00:05:54 गोपाला 00:06:04 गोविंद 00:06:07 गोपाल 00:06:11 भजो गिरधर 00:06:16 गोविंद 00:06:19 गोपाला 00:06:26 राधे गोविंद गोपाल 00:06:35 भजो गिरधर 00:06:40 गोविंद गोपाला 00:06:51 गोविंद गोपाल 00:06:58 बोलिए लाडली लाल की जय 00:07:05 अब आप लोग सावधान हो जाए 00:07:13 आज बहुत भी महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डाला जाएगा किंतु 00:07:25 किसी विषय का विस्तार नहीं किया जा सकता 00:07:32 समय की न्यूनता के कारण संक्षेप में ही अनेक विषयों पर प्रकाश डाला जाएगा अत बहुत सावधान होकर सुनेंगे 00:07:49 सुनहु करहु जो तुम सुहाई 00:07:56 सुन लीजिए फिर करना आपके हाथ में है सेंट परसेंट कीजिए 50% कीजिए जीरो पर आ जाइए ये सब आपकी 00:08:12 इच्छा पर रहेगा हां प्रत्येक जीव का लक्ष्य है परमानंद प्राप्ति 00:08:31 जीव ब्रह्म माया तीन तत्व अनाद अनंत सनातन है 00:08:43 किंतु जीव अनादि काल से मायाबद्ध होने के कारण अनंत दुखों से युक्त होकर 84 लाख में घुमाया जा रहा 00:08:58 है 00:09:01 वह जीव आनंद चाहता है और आनंद की परिभाषा भी बताई गई आनंद अनंत मात्रा का होता है अनंत काल 00:09:19 के लिए होता है ऐसा अनिर्वचनीय अपरिमेय अपौरुषेय दिव्यानंद भगवान की प्राप्ति से ही प्राप्त हो सकता है 00:09:36 भगवान 00:09:39 के विषय में बहुत लंबी चौड़ी विस्तृत मीमांसा की गई कि यद्यपि भगवान हमारी इंद्रिय मन बुद्धि से परे है 00:09:56 किंतु वह जिस पर कृपा कर देता है वह उन भगवान को पा लेता है और सदा के लिए मालामाल 00:10:08 हो जाता है यह भी बताया गया कि उनकी कृपा से ही उनको जाना जा सकता है किंतु उनकी कृपा 00:10:20 की कुछ शर्तें हैं कुछ आधार है वह शर्त पूरा करने वाले पर ही कृपा होती है उस पर भी 00:10:31 विचार किया गया कि शास्त्रों वेदों में तीन मार्ग बताए गए हैं कर्म ज्ञान भक्ति एक एक मार्ग पर विचार 00:10:44 करते हुए आपको बताया गया कि कर्म धर्म के नियम अत्यंत कठिन है और यदि कोई कर भी ले तो 00:10:56 उसका फल स्वर्ग है स्वर्ग माया के अंतर्गत है वहां भी काम क्रोध लोभ मोह का आधिपत्य है और वह 00:11:07 भी कुछ दिन के लिए मिलता है अत धर्म से ना हमारे दुख की अत्यंतिक निवृत्ति हो सकती है ना 00:11:19 माया का अत्यंताभाव हो सकता है ना त्रिगुण त्रिकर्म त्रिदोष पंच क्लेश पंचकोष का अत्यंताभाव हो सकता है और ना 00:11:31 दिव्यानंद ही मिल सकता है अत ज्ञान मार्ग पर विचार किया गया और बताया गया कि किसी भी ज्ञान के 00:11:46 साधन से कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता पहले तो ज्ञान का अधिकारित्व ही अत्यंत कठिन है निर्भ 00:12:02 नाम ज्ञान योग भागवत में कहा गया 11व स्कंध के 20व अध्याय का सातवा श्लोक जो चार साधनों से संपन्न 00:12:16 हो वो ज्ञान मार्ग का अधिकारी होता है और चार साधनों में पहला आपको बताया गया था मन पर कंट्रोल 00:12:30 ये सब असंभव बातें हैं कलयुग में तो कल्पना भी करना गलत है और यदि कोई ज्ञान मार्ग की अंतिम 00:12:41 सीमा पर भी पहुंच जाए तो केवल आत्मक ज्ञान हो सकता है ब्रह्म ज्ञान नहीं हो सकता और बिना ब्रह्म 00:12:53 ज्ञान के माया नहीं जा सकती मोक्ष नहीं मिल सकता जो ज्ञानियों का लक्ष्य है अत ज्ञान मार्ग भी हमारे 00:13:05 लिए उपयोगी नहीं है अब एक मार्ग बचा भक्ति मार्ग उस पर विचार करना है पहले वेदों में चलिए यस 00:13:19 देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरु तसते कथिता यथा प्रकाशते महात्म प्रकाशते महात्म श्वेता चतुरोपनिषद छठव अध्याय का 23वा 00:13:38 मंत्र यह मंत्र कह रहा है कि जिस जीव की भक्ति भगवान के प्रति 00:13:53 अनन्य हो और जैसी भक्ति भगवान के प्रति हो वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति भी हो उसकी माया निवृत्ति 00:14:09 हो सकती है परमानंद प्राप्ति हो सकती है 00:14:16 मुंडकोपनिषद आया उसने कहा हमारी भी सुनो कहिए उपासते पुरुषम जे जकामास्ते शुक्रमेत दति बरत धीरा तीसरे मुंडक के दूसरे 00:14:31 खंड का पहला मंत्र ये मंत्र कह रहा है कि समस्त कामनाओं को छोड़कर जो भगवान की भक्ति करता है 00:14:44 वह इस माया से उत्तीर्ण हो सकता है उसको परमानंद मिल सकता है ठीक वही जो श्वेता चतुरोपनिषद कह रहा 00:14:54 है वही मुंडकोपनिषद भी कह रहा है 00:15:01 और आगे चलिए क्षरम प्रधानमताक्षर हरक्षरत्मा देव तस्या विद्याना योजनात तत्व भावात भूते विश्व माया निवत्त श्वेता चतुरोपनिषद पहले अध्याय 00:15:21 का दसवा मंत्र ये मंत्र कह रहा है देखो जी एक भगवान है एक माया है और एक तुम हो 00:15:33 अर्थात जीव अब यह जीव या तो भगवान की ओर जाएगा या तो माया की ओर जाएगा तीसरी कोई चीज 00:15:44 है ही नहीं तो अगर भगवान के प्रति कोई शरणागत होता है उनकी भक्ति करता है तो उसकी माया निवृत्ति 00:15:56 हो जाएगी परमानंद मिल जाएगा और कोई मार्ग नहीं है तो उसके लिए तीन शब्द लिखा वेद में अभ्याना 00:16:10 योना तत्व भावात उनका ध्यान करने से और निरंतर ध्यान करने से मन के द्वारा और लीन हो जाने से 00:16:26 इतना प्यार हो जाए ये विश्व माया निवत्ति माया का अत्यता भाव हो जाएगा 00:16:38 यो ब्रह्मा विदधा पूर्वम जो वेद प्रो तस्मै तंग देव बुद्ध प्रकाशम मुक्षव शरणम प्रपदे छठवे अध्याय का श्वतापनिषद 18वा 00:16:56 मंत्र ये मंत्र कह रहा है जो भगवान के शरणापन्न होगा सेंट परसेंट उसकी माया निवृत्ति हो जाएगी भगवत प्राप्ति 00:17:09 हो जाएगी अत आनंद प्राप्ति हो जाएगी तप प्रभाववा देव प्रसादाच 00:17:19 श्वेतापनिषद छठव अध्याय का 21वा मंत्र ये कहता है कि भगवान के वियोग में जो तपे उनके बिरहाग में ऐसी 00:17:35 भक्ति करें तो उस पर भगवत कृपा होगी और उसको आनंद मिल जाएगा दुख निवृत्ति हो जाएगी भाव ग्राह्य मनी 00:17:48 डाख्यम भावा भाव करम शिवम 00:17:56 पांचव अध्याय का श्वेता शतरोपनिषद 14वा मंत्र है यह कह रहा है कि देखो भगवान को पाने के लिए कर्म 00:18:08 धर्म की तरह तमाम नियम नहीं ज्ञान मार्ग की तरह तमाम मन को बस में करने वगैरह का शर्त नहीं 00:18:18 कुछ भाव ग्राहजम केवल भाव से तुम उनसे मिलने को व्याकुल हो जाओ बस वे भी तुमसे मिलने को व्याकुल 00:18:32 हो जाएंगे 00:18:36 बहुत भोले बनकर 00:18:43 फिर ऋग्वेद कहता है आद्या गम श्रव शणीभूति भी अरे मनुष्यों भगवान तो तुम्हारे हैं और बड़े दयालु हैं तुम 00:18:58 रो कर पुकारो वह हजारों शक्तियों के साथ भागे हुए आएंगे 00:19:06 अर्चा सक्राय शाकिने ऋग्वेद भर्गो देवस्य धीमहि ऋग्वेद त्र्यंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम उर्वकम बंधन मृत्य मुखी यमामृतात ऋग्वेद जो देव 00:19:26 मुक्तवंत मुसाते सनातनम अथर्व वेद कसून कतस्या नाम मनामहे चारु देवस नाम ऋग्वेद अग्न वयं प्रथमस्या नाम मनामहे चारु देवस 00:19:46 नाम ऋग्वेद तमस्माकम तवस्मस तवस्मस ऋग्वेद महस्ते विष्णु सुमति भजामहे ऋग्वेद ये तमाम वेद मंत्र कह रहे हैं कि भक्ति 00:20:04 रेवेनम नयति भक्ति रेवन पश्चति भक्ति रेवेनम दर्शति भक्ति रेम गमयति भक्ति वस पुरुष भक्ति रे भूसी माठर श्रति ये 00:20:20 वेद मंत्र कह रहा है भक्ति से ही ए शब्द बार-बार लगाया जा रहा है ए माने ही केवल भक्ति 00:20:30 से ही भगवान मिलेंगे 00:20:36 और कोई मार्ग नहीं 00:20:44 अब शास्त्रों में आइए

तुमको भगवान् पकड़ेंगे - तुम कभी नहीं गिरोगे | भगवत् प्राप्ति का साधन - 6/6 | Jagadguru Shri Kripaluji

तुमको भगवान् पकड़ेंगे - तुम कभी नहीं गिरोगे | भगवत् प्राप्ति का साधन - 6/6 | Jagadguru Shri Kripaluji

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00:00:01 भगवान को पाने का एकमात्र साधन निष्काम एवं अनन्य भक्ति है, तप या अन्य मार्ग नहीं। 00:01:46 गीता के अनुसार जो भी जीव अनन्य भाव से भगवान की शरण में आता है, उसका कभी पतन नहीं होता। 00:04:33 गीता का परम गोपनीय उपदेश यही है कि अपनी मन और बुद्धि को पूरी तरह भगवान को समर्पित कर दो। 00:05:15 शरणागति स्वीकार करने वाले भक्त के समस्त पापों को भगवान स्वयं नष्ट कर देते हैं। 00:07:41 भगवान से सांसारिक सुख या मुक्ति मांगने के बजाय केवल उनका निष्काम प्रेम मांगना चाहिए। 00:10:41 अन्य देवी-देवताओं के चक्कर छोड़कर केवल राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति और निरंतर स्मरण करना पर्याप्त है। 00:16:41 साधना को कल पर न टालकर तत्काल निष्कपट और सरल बालक बनकर भगवान को पुकारना शुरू कर देना चाहिए।
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00:01 गीता कहती है भक्त तन्यया शक्त एवं विधुन अर्जुन केवल भक्ति से मैं मिलूंगा ना वेद न तपसा न दानेन  00:20 न चेया कोई मार्ग नहीं है मुझे पकड़ने के योग्य केवल भक्ति से मैं हार जाता हूं  00:33 अनन्या तो माम जे परपासते ते नित्याभक्त नाम योगक्षम नौवे अध्याय का 22वा श्लोक अनन्य भक्ति से मैं मिलता हूं  00:51 पत्रम पुष्पम फलम तो जोक्त प्रति तद भक्त प्रत नौवे अध्याय का 26वा श्लोक भक्ति युक्त होकर पत्ता दे दो  01:08 पानी दे दो कुछ ना हो तो मैं ले लूंगा  01:15 अपचे सुदुराचारो भजते मामंद भाग साधु समंत महा पाप किए हो कोई करोड़ों ब्रह्म हत्या घोर दुराचारी और मेरी शरण  01:32 में आ जाए मैं सब क्षमा कर दूंगा नौवे अध्याय का 30वा श्लोक भगवान ने गीता में चैलेंज किया है  01:46 एक जगह एक श्लोक में भवती धर्मत्मा सश निगच्छति कौन ते प्रति जानी नमे भक्त प्रणसति मेरी प्रतिज्ञा है अर्जुन  02:04 मेरे भक्त का पतन नहीं हो सकता मैं ठेका लेता हूं नौव अध्याय का 31वा श्लोक मा पार्थ पाप  02:19 स्त वैथा शद्रा तेज परत कोई हो पुरुष नपुंसक नारी नर कोई जीव हो जो मेरी शरण में आ जाएगा  02:36 मेरी भक्ति कर लेगा बस उसी को मैं मिलता हूं  02:45 अनन्य चेता सततम माम स्मरति नित्यसा तस्या सुलभ पार्थ मैं बड़ा आसान हूं लेकिन भक्ति के द्वारा और किसी मार्ग  02:58 से नहीं 18 अध्याय का लेक्चर हुआ अर्जुन बेमनी से सिर हिलाता गया हम हम  03:12 घुसा नहीं कुछ उसके दिमाग में वो बीम बीमारी बनी है कि इनको मारूंगा इनकी स्त्रियां विधवा होंगी यह पाप  03:23 ये मैं नहीं करता ऐसा राज्य नहीं चाहिए हमको  03:29 भगवान ने छहों दर्शनों का वेदांत न्याय सांख्य मीमांसा सुना दिया भगवान परेशान हो गए 18 अध्याय में भगवान ने  03:45 अंत में कहा सर्व गुतम भूण में परम बचा अर्जुन बस सुन मैं आखरी बात बोल रहा हूं अब मैं  03:59 इसके आगे नहीं बोलूंगा रथ छोड़ के मैं चला जाऊंगा  04:07 अर्जुन होशियार हो गया और देख ये जो मैं बोलने जा रहा हूं ना ये प्राइवेट में प्राइवेट में प्राइवेट  04:15 बात है गुह्य माने प्राइवेट गुहतर माने प्राइवेट में प्राइवेट और गुहतम माने सबसे प्राइवेट और सर्व गुहतम और लगा  04:28 दिया  04:33 18 अध्याय का 64वा श्लोक महाराज क्या है प्राइवेट में प्राइवेट में प्राइवेट बात मन मना मत भक्तो मत जामा  04:46 नमस् गुरु तू अपनी मन बुद्धि मुझको दे दे मैं जो कहूं कर बुद्धि मत लगा ये बार-बार महाराज आप  04:57 यही कहते हैं मन बुद्धि ना लगा ना लगा आखिर पाप होगा नहीं आपने तो वेद में कहा है मा  05:06 हिंसत सर्वा भूतानी एक मक्खी को भी ना मारो पाप है  05:15 भगवान ने कहा अच्छा सुन 18व अध्याय के 66व श्लोक में अंतिम सर्व धर्मान परित्यजमाकम शरणम ब्रज तू सब धर्मों  05:29 को छोड़ के मेरी शरण में आजा तो अहम सर्व पापे मोक्ष्याम जो पाप की तू बात करता है ना  05:41 वो मैं ही तो पाप का दंड देता हूं तो मेरा यह कानून है कि अगर कोई मेरी शरण में  05:50 आ जाता है तो फिर उसको पाप नहीं लगता चाहे समस्त ब्रह्मांड को मार डाले  06:00 क्योंकि मंत्र मेरे पास रहेगा मन ही से तो कर्म माना जाता है ये अंतिम श्लोक सुन के अर्जुन ने  06:11 कहा अरे तो ये पहले ही बता देते महाराज कि हम सब पापों से बरी कर देंगे ये पाप से  06:19 तो मैं डर रहा था तो शरणागति का मतलब है कि मेरे सर्वस्व है श्याम सुंदर ऐसी भक्ति जिसमें कोई  06:36 कामना ना हो ध्यान दीजिए इस point पर हमारे देश में बड़ी भक्ति दिखाई पड़ती है दिखाई पड़ती है और  06:50 मेला लगता है कुंभ है 20 करोड़ आदमी प्रयाग में और चले जा रहे हैं वैष्णो देवी द्वारिका भद्रिका आश्रम  07:10 इनसे पूछो कि ये क्या करते हो क्यों करते हो हां जी ऐसा करने से मरने के बाद बैकुंठ जाएंगे  07:23 बड़े भोले हो भगवान को तुम बेवकूफ बनाना चाहते हो अरे भगवान तो कह रहे हैं वेद से ले रामायण  07:34 तक भक्ति के बिना कुछ नहीं काम देगी चालाकी  07:41 भक्ति से ही काम बनेगा और कोई मार्ग नहीं है कोई कामना लेके मत जाओ अरे दो ही कामना है  07:54 संसार की और संसार से मुक्ति की वो भी खतरनाक कामना है हमको तार दो महाराज हमको तार दो हमको  08:09 तार दो मोक्ष दो ये मुक्ति तो और बड़ी डाकिनी है जिसको लग जाए छोड़े ना भगवान का प्रेम मांगो  08:24 बस और कुछ ना मांगो राधा कृष्ण का प्रेम उनकी सेवा करेंगे उनके प्रेम से देना सीखो लेना बंद करो  08:43 कामना रहित होकर सदा सर्वत्र उनको अपने साथ मानते हुए संसार में कर्म करो तेन तक्त भजी था वेद कहता  08:58 है माध कस सिद्धम कर्म योग करो संसार का कर्म करो फिजिकल मन भगवान में रहे और संसार ना मांगो  09:13 भगवान से  09:16 अरे अगर संसार मांग रहे हो तो यह नहीं सोचा कि भगवान में आनंद है कि संसार में भगवान में  09:26 तो फिर संसार क्यों मांगते हो मिठाई की दुकान पर कोई चप्पल मांगे हैं दो जोड़ी चप्पल बांध दे अरे  09:38 पागल हुआ है चप्पल कोई मिठाई का नाम है क्या नहीं नहीं जो पैर में पहनते हैं अरे तो ये  09:45 मिठाई की दुकान तू अंधा है भगवान से संसार मांगता है और संसार से भगवान मांगेगा अरे ऐसा कैसा है  09:58 भाई अगर संसार ही मांगना है तो भगवान के पास क्यों जाते हो नास्तिक रहो  10:07 तो कोई कामना ना रख के रूप ध्यान करते हुए आंसू बहाकर भगवान से उनका दर्शन मांगो प्रेम मांगो बस  10:22 और कुछ ना मांगो सदा रियलाइज करो हमारे अंदर बैठे हैं और इसी खुशी में मतवाले रहो अनंत कोटि ब्रह्मांड  10:35 नायक भगवान हमारे हृदय में रहते हैं  10:41 और यह भी ध्यान रखो कि तमाम देवी देवताओं के पास ना जाओ पेड़ की जड़ में पानी डालो वह  10:54 डाल उपशाखा पत्र पुष्प फल सबको जल मिल जाएगा अलग-अलग पानी डालने की जरूरत नहीं येतो हर तरपितान जगप रजते  11:11 जंतरा जंगमाप भगवान की भक्ति कर लो सबकी भक्ति हो गई ये भगवान ने मान लिया  11:25 कोई देवी देवता की हिम्मत नहीं है जो आंख उठा के देखे भक्त की ओर अनन्य भक्ति ये मतलब मेरा  11:35 है और हम लोग क्या करते हैं देवी जी को भी देवता को भी वहां भी जा रहे हैं एक  11:45 कब्रिस्तान है वहां भी जा रहे हैं ये क्या कर रहे हो केवल राधा कृष्ण की भक्ति करो और अनन्य  11:57 भक्ति हो और निष्काम भक्ति हो और मन से भक्ति हो बस इतना सा ज्ञान रखो बाकी सब भूल जाओ  12:09 और सब जगह भगवान को रियलाइज करो मंदिर में ही नहीं सब जगह जहां भी जाओ वो हमारे साथ है  12:24 हमारी हर क्रिया को नोट करते हैं यह वेद कह रहा है फथ करो विश्वास करो बार-बार बार-बार चिंतन के  12:34 द्वारा दृढ़ करो तो अंतःकरण की शुद्धि होगी अंतःकरण की शुद्धि करना ही बस मनुष्य का अंतिम कर्म है इसके  12:51 आगे हमारा कोई काम नहीं हमारी छुट्टी अब गुरु और भगवान करेंगे आगे क्या करेंगे वो हमारी इंद्रिय मन बुद्धि  13:02 को दिव्य बनाएंगे और दिव्य ज्ञान दिव्य प्रेम दिव्य आनंद दिव्य भगवत दर्शन ये सब कराएंगे वो  13:16 फिर वो माया भागेगी त्रिगुण भागेंगे तीनों कर्म भस्म हो जाएंगे पंच कक्लेश समाप्त हो जाएंगे पंचकोष जल जाएंगे और  13:31 हम सदा के लिए सदा पश्यंतु सूर त विष्णु परम पदम सोते सर्मान सह ब्रहणा विपश्चिता वेद मंत्र के अनुसार  13:46 सदा के लिए भगवान के लोक में आनंदमय रहेंगे और जब भगवान आज्ञा करेंगे जाओ मृत्यु लोक में और जीवो  13:56 को लाओ हमारे पास तो हम आएंगे लेकिन हमारे ऊपर माया का अधिकार नहीं हो सकता हम माया के ऊपर  14:07 शासन करते हुए संसार में रहेंगे और फिर भगवान के धाम को चले जाएंगे ये सब बातें आगे की हैं  14:16 हां नष्ट उपासी कल करेंगे कल करेंगे यह मत छोड़ो मत बोलो मत सोचो अभी करो तुरंत करो एक छोटा  14:34 सा कथानक बताएं एक बार युधिष्ठिर के राज्य में एक ब्राह्मण आया और उसने कहा कि लड़की की शादी है  14:45 10 तोला सोना दे दो तो युधिष्ठिर ने कहा भाई आज जड़ा मैं बहुत व्यस्त हूं कल आना भीमसेन खड़े  14:56 थे उनको बड़ा बुरा लगा कि कल क्यों कहा इन्होंने हमसे कह देते कि भीम जाओ दिला दो सोना भीमसेन  15:08 ने मजाक किया उन्होंने प्राइम मिनिस्टर को बुलाया और कहा आज खुशी मनाओ सारे शहर में बहुत बड़ी चीज हुई  15:17 है आप प्राइम मिनिस्टर को क्या राजा का आर्डर हो गया उसके भाई कह रहे हैं होने लगी खुशी की  15:29 बातें आतिशबाजी वगैरह युधिष्ठिर ने कहा भाई आज क्या है ना जन्माष्टमी है ना रामनवमी है बात क्या है प्राइम  15:39 मिनिस्टर को बुलाया उन्होंने कहा साहब आपके भाई साहब ने कहा भीमसेन को बुलाया क्यों भाई क्या बात है उन्होंने  15:47 कहा भैया आज तो जो आज तक नहीं हुआ वो हो गया अरे क्या हो गया बोल ना भैया भैया  15:57 आपने काल को जीत लिया मैंने काल को जीत लिया क्या हुआ है तुझको पागल तो नहीं हो गया अरे  16:07 भैया आपने कहा ना उस ब्राह्मण से कल आना इसका मतलब आपके पास पक्का ये लिखा पढ़ी का हिसाब है  16:16 कि कल तक हम रहेंगे अरे हां है मोटा लेकिन अकल पतली है इसकी तो उन्होंने कहा बुलाओ बुलाओ उस  16:28 ब्राह्मण को हम क्षमा मांगेंगे उससे तो उद्धार नहीं करो उद्धार करते करते तो अनंत जन्म बीत गए  16:41 इसलिए साधना तत्काल प्रारंभ कर देना है और उसमें कुछ नियम कायदा कानून नहीं है कहां बैठे नहा के करें  16:52 कैसे करें बस प्यार करना है तुमने बचपन से मां से प्यार किया बाप से प्यार किया कोई नहा धो  17:03 के किया सब जगह मन से स्मरण करना बस मन से स्मरण करना  17:15 आलो सर्व शास्त्र विचार पुनः पुनः सुनष्पन धो नारायणो हरि वेदभ्यास ने स्कंद पुराण में कहा कि हमने सब शास्त्रों  17:31 वेदों का मंथन किया और एक निष्कर्ष निकाला है भगवान का निरंतर स्मरण करो और कुछ नहीं ब्रह्मा कहता है  17:45 भगवान ब्रह्म कारने त्रिक्ष मनीषया तवसत कुटो अतिरात्मन यथा भवेत मैंने तीन बार वेदों को मथा है ब्रह्मा कह रहा  18:01 है और एक निर्णय निकाला है राधा कृष्ण की भक्ति करो मन से और तमाम ज्ञान भूल जाओ ऐसे वैसे  18:16 तरकीब तिकड़म छल कपट ये सब कुछ नहीं भोले भोले बालक बनकर जैसे पैदा हुए थे वैसे ही फिर बन  18:28 जाओ और भोले बालक बनकर भगवान के आगे रोकर पुकारो बस यही शास्त्र वेद का सार है इसके आगे कोई  18:40 कुछ बोले कृपालु के पास ले आओ लाडली लाल की

मन और माया की मिली-भगत - जो करती है आपको fail || Jagadguru Kripalu Ji Pravachan

मन और माया की मिली-भगत - जो करती है आपको fail || Jagadguru Kripalu Ji Pravachan

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00:00 मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष (सुख और दुःख) का मूल कारण है।  01:59 वेदों और शास्त्रों के अनुसार, हमारे सभी कर्मों का असली कर्ता केवल मन ही है, इंद्रियां नहीं।  13:56 इंद्रियों के बिना भी मन स्वतंत्र रूप से स्वप्न की तरह हर प्रकार का अनुभव और कर्म कर सकता है।  16:58 जब मन संसार और भौतिक वस्तुओं में सुख खोजता है, तो वह जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र और दुःखों की ओर ले जाता है।  18:36 वही मन जब गुरु के सानिध्य में भगवान की भक्ति और चिंतन में लगता है, तो जीव को गोलोक और मुक्ति दिला देता है।  20:47 इस प्रकार सही दिशा मिलने पर मन सबसे बड़ा मित्र है और गलत दिशा में भटकने पर सबसे बड़ा शत्रु है।
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01:06 अनंत दुख  01:10 बंधन से होता है कर्म बंधन  01:20 कर्म बंधन जन्म से होता है जन्म कर्म से होता है कर्म जन्म से होता है अनादि धारा है ये  01:37 हम अनादि हैं और मायाबद्ध हैं इसलिए हमारे जन्म भी अनंत हैं इसलिए हमारे कर्म भी अनंत हैं  01:59 यह जन्म और कर्म ये दोनों का कर्ता कौन है भगवान तो हो नहीं सकते भगवान तो परम कारुणिक हैं  02:18 दयालु हैं वो भला ऐसा क्यों करेंगे  02:26 और फिर संसार में भी कोई किसी से दुश्मनी करता है तो उसका रीजन होता है कारण होता है बिना  02:41 कारण के कोई किसी से दुश्मनी नहीं करता और कारण एक ही हो सकता है कि हमारा कोई अपकार कर  02:55 रहा हो हानि कर रहा हो  03:01 हमारा नुकसान कर रहा हो उससे हमारी दुश्मनी होती है तो भगवान का कोई नुकसान तो कर नहीं सकता अरे  03:14 वो दिखाई ही नहीं पड़ेगा तो नुकसान क्या करेगा और फिर लिमिटेड का नुकसान होता है सीमित वस्तु का नुकसान  03:31 हुआ करता है जैसे हमारे पास 1 लाख है उसमें से किसी ने 1000 छीन लिया तो कम हो गया  03:45 1000  03:49 और जिसके पास अनंत हो तो अनंत से तो अनंत निकालो तो भी अनंत बचेगा  04:07 तो भगवान से कोई कुछ छीन ले यही असंभव और अगर छीनने भी तो कुछ कमी नहीं होगी वो तो  04:22 ऐसा है भगवान कि पूर्णस पूर्ण माधाय पूर्ण मेवा वशिष्यते वेद कहता है पूर्ण से पूर्ण निकाल लो तो भी  04:37 पूर्ण बचेगा  04:41 इसलिए भगवान का कोई नुकसान कर ही नहीं सकता  04:48 अरे नुकसान तो बलवान करता है संसार में भी जब उसके बराबर कोई नहीं है न तत समस्याभ्यधिक दृश्यते श्वेतापनिषद  05:05 छ आठ वेद कह रहा है उसके समान ही कोई नहीं है बड़ा क्या होगा नत समोस कुतो ये गीता  05:21 कह रही है स्वयं तो साम्य अतिशय  05:28 भागवत कह रही है निरस्त साम्या अतिशय नराधसा भागवत कह रही है तो फिर उसके नुकसान का सवाल ही नहीं  05:40 तो फिर उसका कोई शत्रु हो इसका प्रश्न ही नहीं है तो यह मन जो है यह है कौन यह  05:53 माया का पुत्र है  06:00 माया जड़ वस्तु है ना माइक को आप देखते ही हैं यह संसार माइक है यह पृथ्वी जल तेज वायु  06:14 आकाश इसके पांच विशेष तत्व हैं अरे आपका शरीर ही बना है पंचमहाभूत का बाहर क्यों जाएं अरे इसमें एक  06:33 भगवान का अंश आ गया तो यह चेतन का काम कर रहा है जब वह निकल जाता है जिसको आप  06:43 कहते हैं मर गया तो तो यह अपने असली रूप में आ जाता है अर्थात माया का तो ऐसे ही  06:58 मन है माया का  07:04 तो माया का सामान  07:10 दो विरोधी शक्तियों का दो विरोधी कार्यों का करता है हां बंधन का भी मोक्ष का भी आनंद का भी  07:26 दुख का भी ब्रह्म बिंदु उपनिषद का मंत्र है ये  07:34 और यह मंत्र त्रिपुरा तापनीयोपनिषद में भी है पांचवें अध्याय का तीसरा मंत्र यह मंत्र मैत्रायनी उपनिषद में भी है  07:50 छठवें अध्याय का 34वां मंत्र और यह मंत्र साठ्यायनी उपनिषद में भी है साठ्यायनी उपनिषद का पहला मंत्र  08:07 और इसी अर्थ में फिर वेद कहता है चित्त मेंव ही संसारा  08:18 चित्त ही संसार है  08:22 महोपनिषद ने चौथे अध्याय का 66वां मंत्र  08:33 चित्त मेंव संसारा मैत्रेय उपनिषद का यह पहले अध्याय का पांचवा मंत्र है साठ्यायनी उपनिषद का यह तीसरा मंत्र है  08:51 चित्त मेंव संसारा मैत्रायणी उपनिषद का छठवें अध्याय का 34वा मंत्र है  09:05 और इसी से मिलताजुलता फिर दूसरा मंत्र है मन एवह संसारा यह तेजो बिंदु उपनिषद के पांचवे अध्याय का 98  09:21 बेवा मंत्र है  09:28 इसे वेद मंत्र कह रहे हैं कि मन ही हमको गोलोक पहुंचा दे और मन ही नरक पहुंचा दे यह  09:42 जो लोग गोलोक चले गए हैं जिनको हम महात्मा संत महापुरुष कहते हैं ये मन ने इनके ऊपर कृपा की  09:55 है और जो नरक में निवास कर रहे हैं हमारे भाई लोग भाई माने जीव  10:07 उनको भी मन ने पहुंचाया है  10:15 भागवत भी कहती है चेत खलवस बंधाय मुक्तय चात्म मनो मतम इस आत्मा को गोलोक पहुंचाने वाला नरक पहुंचाने वाला  10:33 स्वर्ग पहुंचाने वाला यह चित्त है मन है  10:43 तीन 25 15 फिर भागवत कहती है मन परम कारण मामनंत मन ही प्रत्येक कर्म का कर्ता है आप गोलोक  10:59 जाने वाला कर्म करे मन गोलोक पहुंचा देगा आपको आपको आत्मा को और अगर यही मन पाप कर्म करे तो  11:14 नरक पहुंचा देगा आपको  11:21 11 23 43 नारद पुराण में भी यह मंत्र है मन एव मनुष्यणाम कारणम बंध मोक्षयो पंचदशी में भी यह  11:35 मंत्र है मनो मनुष्यणाम कारणम बंध मोक्षयो आप लोग इन नंबरों के द्वारा इनको वेदों में भागवत में सर्वत्र मिला  11:51 के देख लेना मैं गप नहीं झोंक रहा हूं चैलेंज कर रहा हूं  12:03 तुम मैं नहीं शत्रु है हमको पाप कर्म करके नरक भेज दे वेद कहता है पुण्यन पुण्यम लोकम नयति पापेन  12:25 पापम उभा्या में मनुष्य लोकम  12:38 तो यह मन  12:42 प्रत्येक कर्म का करता है आत्मा कुछ नहीं करता इंद्रियां और जो है मन के अलावा वे भी कुछ नहीं  12:55 करती  12:58 इंद्रियों से तो करवाता है मन अपने आप इंद्रियां कुछ नहीं पाप पुण्य या भक्ति कुछ नहीं कर सकती  13:15 बिना इंद्रियों के मन कर्म करता है ना  13:21 इंद्रियों से कर्म इंद्रियों को लेकर ध्यान दो इंद्रियों को लेकर मन मन करता है जागृत अवस्था में इस समय  13:37 आप लोग देख रहे हैं आंख से  13:44 यह मन कर रहा है लेकिन आंख की हेल्प ले रहा है कान की हेल्प ले रहा है लेकिन अगर  13:56 आंख कान नाक रसना आदि सब चैलेंज कर दे मन को वो भी चैलेंज एडमिट कर लेता है ठीक है  14:07 तुम लोगों की जरूरत नहीं हमको हमारे पास सब कुछ है  14:15 बिना हमारे यानी आंख कहती है बिना हमारे तुम देख सकते हो  14:26 हां  14:30 हम नहीं मानते नहीं मानते अच्छा तुम सो जाते हो जब तो सपना देखते हो ना हां देखते हैं तो  14:42 सपने में क्या इन आंखों से देखते हैं  14:49 ये तो रजाई के अंदर बंद रहता  14:54 और कितना संसार आप देखते हैं सपने में अरे जागृत में आप उतना नहीं देख सकते  15:06 एक जंप करके आकाश पहुंच जाते हैं आप सपने में जागृत में तो जंप करके आप 10 फुट भी नहीं  15:15 उछल सकते  15:21 आप देखते हैं सुनते हैं सूंघते हैं रसगुल्ला खाते हैं हंसते हैं रोते हैं डरते हैं सब कुछ करते हैं  15:32 सपने में बिना इंद्रियों के अब मान गए ना इंद्रियों से जुक्त होके भी मन ही करता है बिना इंद्रियों  15:48 के भी मन करता है देखो मन से भगवान का चिंतन करके अनंत जीव महापुरुष बन गए भगवान के लोक  16:03 चले गए  16:08 मुख से कुछ नहीं बोले  16:12 आंख बबी बंद कर लिया था मन से केवल ध्यान किया  16:24 चिंतन मन का काम चिंतन  16:30 बड़ा कमाल है मन में यही मन वहां पहुंचा देता है अगर कोई गुरु की शरण में होकर भगवान की  16:43 भक्ति करता है  16:50 भगवान से प्यार करता है  16:58 और वही मन अगर संसार से प्यार करता है तो संसार अपना फल दे देता है अरे भाई एक लड़की  17:13 है दो बहनें हैं एक बहन ने एक लड़के को चुना  17:28 वह भी बीए एलएलबी था दूसरे ने चुना वो भी बीए एलएलबी था लेकिन एक लड़की का चुना हुआ लड़का  17:44 आईएएस में आ गया वो कलेक्टर कमिश्नर हो गया उसकी बीवी को सारी जनता मैम साहब कहने लगी  18:04 अपन गवार बीवी को भी सलाम करने लगे बड़े-बड़े  18:13 दूसरी लड़की ने जिसको चुना वो किसी कंपटीशन में नहीं आया शराबी हो गया यहां वहां पड़ा रहता है उसकी  18:29 बीवी भिखारिन हो गई  18:36 ऐसे ही यह मन है अगर इसने यह डिसाइड कर लिया डिसाइड पक्का निश्चय भगवान में ही आनंद है जो  18:54 आत्मा चाहती है और भिड़ गया भगवान की ओर जाने में उसने आत्मा को भगवान के पास पहुंचा दिया मन  19:11 माया का पहुंचा दिया दिव्य भगवान के पास कमाल देखो  19:20 माया का मन जिसका चिंतन मायिक उसने दिला दिया दिव्य भगवान को  19:35 और जिसने संसार में आनंद डिसाइड किया पक्का निश्चय किया यहां आनंद है हमको नहीं मिला यह बात अलग है  19:51 हमारी मां खराब है हमारा बाप खराब है हमारी बीवी हमारा पति खराब है लेकिन आनंद है  20:04 पढ़े चलो और संसार इकट्ठा करो और इकट्ठा करो तो आनंद मिलेगा  20:18 एक दिन सुरपति इंद्र हो गया मान लो फिर भी आनंद नहीं मिला क्योंकि उसने दिव्य भगवान को नहीं चुना  20:31 उसके मन ने मायिक जगत के सामानों में आनंद चुना उसको वही मिला  20:43 वो भिखारी रह  20:47 अत मन ही सबसे बड़ा शत्रु है मन ही सबसे बड़ा मित्र है यह इस दोहे का भावार्थ है थैंक  21:01 यू

कैसे जानूँ कि मैं कौन हूँ? किसका हूँ? Who am I? Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कैसे जानूँ कि मैं कौन हूँ? किसका हूँ? Who am I? Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

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https://youtu.be/2BNRwabK5dc

00:22 माया के प्रभाव और अज्ञान के कारण जीव अनंत जन्मों से यह भूल चुका है कि वह वास्तव में कौन है और उसका वास्तविक संबंधी कौन है। 04:19 मायाबद्ध होने के कारण मनुष्य स्वयं यह सत्य नहीं जान सकता, इसलिए केवल निर्दोष और प्रामाणिक वेद-वाणी ही इस रहस्य को स्पष्ट करती है। 08:16 वेद और शास्त्र प्रमाणित करते हैं कि प्रत्येक जीव परमात्मा का ही नित्य अंश, पुत्र और उनकी शक्ति है। 11:25 भौतिक संसार और माया पूरी तरह 'जड़' हैं, जबकि जीव 'चेतन' है; अतः चेतन जीव का सच्चा संबंध केवल परम चेतन भगवान से ही हो सकता है। 14:21 भगवान ही जीव के एकमात्र निस्वार्थ सखा हैं, जो हर जन्म में साथ रहकर बिना किसी स्वार्थ के हमें शक्ति और कर्मफल प्रदान करते हैं। 16:46 जिस प्रकार समुद्र की तरंगें समुद्र से ही उत्पन्न होती हैं और उसी में लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार जीव का शाश्वत अस्तित्व केवल भगवान से ही जुड़ा है।

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00:02 राधे  00:07 मैं किसका हूं मेरा कौन है  00:18 यह बात  00:22 अनंत जन्म बीट जान पर भी मैंने नहीं समझी  00:31 मेरा कौन है मैं किसका हूं कहां से आया हूं और  00:52 जानू स्वयं असंभव क्योंकि मेरे ऊपर  01:11 अंधकार  01:15 अग्न्यानेना अमृतम ज्ञानम  01:21 समस्त जीवन पर माया का अधिकार है भयम द्वितीय  01:35 दिशा  01:41 मिलती  01:45 माया के करण माटी विप्राज्य हो गया है बुद्धि का ज्ञान चला गया है मैं कौन हूं मेरा कौन है  02:01 मैं किसका हूं सब भूल गया  02:14 इसको कौन बताया किसी जीव पर तो हम विश्वास करेंगे नहीं क्योंकि  02:38 लोग कहते हैं तुलसीदास सूरदास मीरा कबीर नानक तुकाराम ये सब संत है इनमें आज्ञा नहीं हुई खबर है उड़ी  02:53 पड़ी खबर है लिखी पड़ी खबर है हमारा हृदय हमारी बुद्धि कैसे स्वीकार कर ले भगवान अगर का दे मैं  03:11 किसका हूं मेरा कौन है वो बता दे अगर तो हम मां लेंगे क्योंकि भगवान के ऊपर माया का अधिकार  03:20 नहीं हो सकता है  03:38 जमाना  03:56 ही अधिकार सूरज के समाज श्री कृष्णा है प्रकाशक स्वरूप भेड़ हमें तम पुरुष महानतम आधिक्य वर्ण आदित्य वर्णन तमाशा  04:14 परस्तात  04:19 भगवान कहां से आएंगे बताने के लिए फिर हम कैसे जान हम किसके हैं हमारा कौन है  04:33 एक रास्ता है वेद  04:40 निष्ठा  04:43 है भगवान की वाणी है जाति सहज स्वास्थ्य प्यारी  04:57 भेद वाणी गलत नहीं हो शक्ति मिथ्या नहीं हो शक्ति  05:13 जो माया बद्दू में दोष होता है आज्ञा वगैरा यह सब वेद में नहीं है वह भेड़ ब्रह्मात्मा विषय  05:33 इमेज  05:38 अध्याय का 35वां श्लोक वेद ब्रह्म के समाज है जैसे ब्रह्म मायतित है मायाधीस है नित्य शुद्ध मुक्त आत्मा है  05:59 परमात्मा ऐसे ही वेद  06:08 लेकिन  06:11 वेद को भी जानना यह मायावती जी के लिए असंभव है यहां तक की ब्रह्मा के लिए असंभव था जब  06:30 वेद प्रकट हुए प्रकट हुए जैसे ब्रह्मा प्रकट हुए नाही से ऐसे विश्वास से वेद प्रकट हुए  06:48 बनाया नहीं गए लिखे नहीं गए  06:55 तो ब्रह्मा ने देखा वेदों को नहीं समझ सका  07:03 क्योंकि अलौकिक वाणी है वेद कल नाश्ता कर ले वाणी वेद संगीत  07:25 ब्रह्मा को मैंने बताया प्रकट किया  07:40 तो भगवान ने अपनी योग माया की शक्ति से ब्रह्मा की बुद्धि में प्रवेश करके उसको वेद का ज्ञान कराया  07:58 इसलिए वेद विशुद्ध और निर्दोष निर्भरण कोई डाउट नहीं उससे पता चलेगा उसे वेद को जन वालों के द्वारा हम  08:16 किसके हैं तो वेद कहता है  08:25 की हम  08:30 भगवान के हैं अमृता सवाई पुत्र वधू  08:41 सब उसके अंश है  08:54 ओम सक्रीतम सब उसके अंश है उसके पुत्र है उसकी शक्ति है जिसे गीता कहा  09:54 यह  10:14 मैं जीवन का सब कुछ और कोई नहीं है जीव का रिश्तेदार केवल मैं हूं केवल मैं यह बात जो  10:29 जान लेट है वो वेदव्यास लिख रहा है  11:25 और माया यह जड़ है जैसे तकिया जड़ मैं उसके शरीर है ना इंद्रिय है ना मां है ना बुद्धि  11:36 है कुछ नहीं  11:44 तो जड़ से तो हमारा कोई नाता हुई नहीं सकता क्योंकि हम उसके उल्टा है चेतन और चेतन भगवान के  11:54 शिव और कोई है नहीं तत्व तो है इसलिए हमारा संबंधी केवल भगवान ही है माया हो ही नहीं सकती  12:09 और माया का कोई समान भी नहीं हो सकता  12:20 इसलिए  12:38 यानी भगवान से हमारा  12:43 साझट संबंध सक्षम बंधन  13:36 एक ही जगह दोनों  13:41 और सजा के साथ  13:53 शाखा मैन पापा निवारण  14:00 हिताय जो हमारा हितेषी हो बिना उपकार चाहे  14:09 निस्वार्थ भाव से जो हमारा  14:21 इतनी चिंता करते हैं की मां के पेट में डालने से लेकर और सदा जहां हम गए हमारे साथ रहकर  14:38 हमारी इंद्रियों में मां में बुद्धि में त-तक कर्म करने की शक्ति लगातार दे रहे हैं जहां तक आत्मा में  14:51 भी चेतन शक्ति वेद देते रहते हैं जी यानी में हम जाते हैं वो साथ रहते हैं हमारे अनंत जनों  15:04 के कर्मों का हिसाब रखते हैं उसका फल देते हैं वर्तमान जन्म के कर्म का भी हिसाब रखते हैं ये  15:20 सब बिना कहे ऐसा हमारा शाखा  15:28 अब सज्जाद से संबंध भी है वो भी चेतन है हम भी चेतन है  15:39 जो अक्षर  15:44 हम इस में रहते हैं  15:51 यहां तक वेदों ने का दिया  16:14 रिश्तेदारी  16:17 जो हम लोग एक्टिंग में कहते हैं मम्मी पापा बीबी पति से जोकरी करते हैं ना हम लोग हम दोनों  16:29 एक है  16:35 समुद्र की तरंग से जो रिश्तेदारियां  16:46 कोई तरंग समुद्र से भिन्न नहीं पैदा होती और नलिन होती है  16:56 तरंग पैदा होगी समुद्र में ली होगी ऐसे ही तो भाई मेरी भूतनी जयंती

Saturday, August 1, 2026

मन के रोग और उनकी औषधि | The Diseases of the Mind and Their Remedy by Shri Hit Ambrish ji

मन के रोग और उनकी औषधि | The Diseases of the Mind and Their Remedy by Shri Hit Ambrish ji

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given
1. मन के रोगों से मुक्ति का एकमात्र उपाय | The Only Remedy for the Diseases of the Mind 2. राम कृपा और सद्गुरु की औषधि | The Remedy of Rama's Grace and the Sadguru
https://www.youtube.com/watch?v=DZ_L5fVr508 [00:00] - [01:30] तन बीमार हो तो भी भक्ति संभव है, लेकिन यदि मन रोगी हो जाए, तो आध्यात्मिक मार्ग पर चलना असंभव हो जाता है। Even if the body is ill, devotion is still possible, but if the mind becomes diseased, it becomes impossible to walk on the spiritual path. [01:38] - [03:00] काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और राग-द्वेष को मन के रोग बताया गया है। यज्ञ, तप, दान आदि से भी ये रोग पूरी तरह नष्ट नहीं होते। Lust, anger, greed, attachment, jealousy, and attraction-aversion are described as diseases of the mind. Even sacrifices, austerities, charity, and similar practices do not completely destroy these diseases. [04:15] - [05:30] मनोरोगी कभी स्वीकार नहीं करता कि वह बीमार है। बाहरी लाभ-हानि के चक्कर में अपने भीतर के मन को मैला नहीं करना चाहिए। A person suffering from a mental disease never accepts that he is ill. One should not pollute the inner mind while becoming caught up in external gain and loss. [06:56] - [08:10] बिखरे हुए मन को समेटना राई के दानों को समेटने जैसा कठिन है। भजन के लिए मन का स्वस्थ और शांत होना अनिवार्य है। Gathering a scattered mind is as difficult as gathering mustard seeds. For devotion, it is essential that the mind be healthy and peaceful. [08:14] - [10:30] संसार की वस्तुओं से सुख की इच्छा ही मन को दुर्बल बनाती है। महाराज जी 'मनोरथ' इच्छाओं को हृदय में गड़ा हुआ कांटा बताते हैं। The desire for happiness from worldly objects is what makes the mind weak. Maharaj Ji describes 'Manorath', or desires, as thorns embedded in the heart. [11:40] - [14:30] जो भाग्य में लिखा है उसे कोई नहीं बदल सकता। "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" के भाव को अपनाने से ही शांति मिलती है। No one can change what is written in one's destiny. Peace comes only by adopting the feeling expressed in "Hoihi Soi Jo Ram Rachi Rakha." [18:20] - [20:00] सत्संग के माध्यम से ही व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को पहचान पाता है। दोष दूर करने के लिए प्रभु के सामने छटपटाना और रोना आवश्यक है। It is through Satsang that a person is able to recognize the faults within oneself. To remove these faults, one must yearn before the Lord and cry out to Him. [31:00] - [33:00] राम कृपा ही एकमात्र औषधि है। इसके लिए 'सद्गुरु' रूपी वैद्य की आवश्यकता है और उनकी वाणी वचन पर अटूट विश्वास ही इलाज है। The grace of Lord Rama is the only remedy. For this, a physician in the form of a Sadguru is needed, and unwavering faith in their words is the treatment. [33:50] - [36:00] औषधि के साथ परहेज जरूरी है। यहाँ परहेज का अर्थ है—सांसारिक विषयों से सुख की आशा का त्याग करना। Along with the medicine, restraint is necessary. Here, restraint means giving up the expectation of happiness from worldly objects. https://www.youtube.com/watch?v=DZ_L5fVr508 ---
Full Transcript


00:00:00 छह प्रश्नों के बाद सातवां प्रश्न श्री गरुड़ जी ने पूछा है मानस रोग कह ह समझा 00:00:11 आई क्योंकि श्री गरुड़ जी स्वयं भी इसी मानस रोग से ही पीड़ित होकर आए थे तन तो स्वस्थ था 00:00:18 मन रोगी हो गया था मन अस्वस्थ हो गया था और यह मार्ग ऐसा है 00:00:30 कि तन स्वस्थ हो तो उत्तम ना 00:00:37 हो तो भी व्यक्ति साधन में प्रवृत्त रह सकता है पर मन अस्वस्थ हो जाए मन रोगी हो जाए फिर 00:00:48 इस मार्ग पर गति संभव नहीं है हाथ में माला हो कोई और कार्य हो पर ध्यान रखना सेवा स्मरण 00:01:00 का कार्य मुख्य रूप से तो मन ही कर रहा है मन ही करता है और मन के किए ही 00:01:05 होता है तो तन प्रारब्ध वसाद रुग्ण हो भी जाए तो भी साधन संभव है पर मन रोगी हो जाए 00:01:18 तो साधन संभव नहीं है एक क्षण के लिए भी संभव नहीं है तो गरुड़ जी को भी मन का 00:01:25 ही रोग हुआ था 00:01:30 में गरुड़ जी ने बात पूछी मानस रोग कहु समझाई श्री गरुड़ जी ने पूछा कि मानस रोग कितने हैं 00:01:38 कैसे हैं तो श्री गोस्वामी जी ने कहा भाई ऐसे काम है क्रोध है लोभ है मोह है ईर्ष है 00:01:45 राग है द्वेष है हर्ष है विषाद है ऐसे अनेक अनेक रोग श्री गोस्वामी जी ने गिना दिए फिर अंत 00:01:51 में क्या कह रहे हैं नेम धर्म आचार तप ज्ञान जप 00:01:59 जप दान भेषज पुनि कोटिन नहीं रोग जाही हरि जा क नियम धर्म आचार तप ज्ञान यज्ञ जप दान 00:02:23 क और भी करोड़ों औषधियां है प्रका बसन जी कह रहे हे गरुड़ जी लेकिन उनसे 00:02:29 य रोग जाते नहीं सार की बात यहां यहां गोस्वामी जी कह रहे कि अनेक अनेक मानस रोग है अनेक 00:02:38 अनेक विकृतियां है क कितनी कहू आपसे अनेक अनेक रोग है पर कय जितने भी सब साधन है अब देखो 00:02:46 एक प्रकार से सभी कुछ तो कह दिया श्री काग सुंडी जी ने कहा कि नियम धर्म आचार तप ज्ञान 00:02:55 यज्ञ जप दान और और भी जितनी औषधिया है 00:02:59 लीजिए तो क भाई उनसे यह रोग जाते नहीं 00:03:05 फिर कैसे जाते हैं यही विधि सकल जीव जग रोगी शोक हरस भय प्रीति वियोगी मानस रोग क छुक 00:03:25 में गाए हो ही सबके 00:03:32 लखर एक प्रश्न खड़ा होता है गरुड़ जी ने पूछा क्यों यह प्रश्न मानस रोग समझा कर कहिए और फिर 00:03:40 क्या कह रहे हैं गरुड़ जी मानस रोग कह समझाई मुझे समझाकर कहिए उसका कारण है कि आप में हम 00:03:49 सब हमारा शरीर भले स्वस्थ हो पर जो हमारा मन मानस है ना वह तो अस्वस्थ ही है जितने जीव 00:03:57 है सब किसी ना किसी मानसिक व्याधि 00:03:59 से किसी ना किसी मानसिक रोग से पीड़ित है इसीलिए कह रहे ही विधि सकल जीव जग रोगी सभी रोगी 00:04:08 है अच्छा और मन का रोग जिसको होता है ना उसकी विडंबना क्या है कि जो मनोरोगी होता है व 00:04:15 सबसे पहले तो अपने आप को रोगी मानता नहीं आप ऐसे भी आप किसी में ऐसा कोई लक्षण देखो और 00:04:24 आप कहो कि चलो तुम्हें एक मनो चिकित्सक के पास लेकर जाते हैं वो आपको मारने दौड़ेगा कि अच्छा आप 00:04:29 हमें पागल समझते हैं पागल हूं क्या मैं मैं क्यों जाऊंगा मैं मन के डॉक्टर के पास क्यों जाऊं मैं कोई पागल 00:04:36 हूं वो आपको मारने दौड़ेगा मनोरोग की यही विडंबना है कि जिसको मनोरोग होगा वोह कभी अपने आप को रोगी 00:04:46 मानेगा ही नहीं औषधि से दूर भागेगा चिकित्सक उसको औषधि देगा वो औषधि से ही दूर भागेगा इसलिए भाई यहां 00:04:57 संत कह रहे हैं कि तन रोगी हो जाए 00:04:59 तो चिंता नहीं करना औषधि करना स्वस्थ हो जाओगे पर ध्यान रखना मन रोगी नहीं हो जाए कभी आपसे पहले 00:05:06 भी मैंने कहा था भाई बाहर कुछ बनाने के लिए भीतर का खेल बिगाड़ मत बैठना बाहर के हानि लाभ 00:05:13 को देखते हुए कहीं कहीं अपना मन ना बिगाड़ बैठना मन मलीन ना हो जाए मन मैला ना हो जाए 00:05:19 कल भी हम इसी बात पर चर्चा कर रहे थे ऐसा कुछ ना हो जाए कि हमारा मन ही भजन 00:05:24 के योग्य ना रहे बाहर की सारी क्षति पूर्ति हो जाएगी 00:05:29 और एक और बात बाहर जो भी लाभ और हानि है ना वो आपके मेरे हाथ में नहीं है सुनहु 00:05:38 भरत भावी प्रबल बहसी कहहु मुनि ना हानि लाभ जीवन मरण जस अप जैस विधि हाथ जैस अप जैस 00:06:01 सुने भरत भावी प्रबल बहसी कहे मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ अपनी ओर से तो 00:06:12 भाई अपनी हानि का इंतजाम कोई नहीं करता फिर भी हानि होती है मैं तो कहता ही हूं कि सीख 00:06:21 सको तो अपने आसपास होने वाली घटनाओं से सीखो देखो कि जिस बुद्धि से व्यक्ति कमाता है उसी बुद्धि के 00:06:29 द्वारा लिए गए किसी निर्णय से व्यक्ति गवा भी देता है अपने हाथ में नहीं है महादेव तो यहां तक 00:06:36 कह रहे हैं जिही जस जग रघुपति करही सोते ही छिन तस हुई तो बाहर का लाभ बाहर की हानि 00:06:46 इसके लिए भाई अपनी वास्तविक हानि ना करा बैठना और ध्यान रखना बिखर मन सिमट नहीं बिखर मन सिमट नहीं 00:06:56 आपको एक उदाहरण दिया था मैंने याद है आपको 00:06:59 कि राई के दानों की पोटली बांधी उनको बिखेर दीजिए उस पोटली को बिखेर देने में कितना समय लगा एक 00:07:08 क्षण अब कोई कहे आपसे भाई इसको समेट लो समेटना सरल नहीं है और पूरा पूरा तो कोई समेट भी 00:07:17 नहीं पाएगा समेटना सरल भी नहीं है बहुत कठिन है और पूरा पूरा तो मुझे लगता है समेट पाना लगभग 00:07:24 असंभव ही है कोई ना कोई दाना छूट ही जाएगा कोई ना कोई दाना रह जाएगा 00:07:30 क बिखर मन सिमट नहीं तो भाई देखना मन ना बिखर जाए मन की हानि ना हो जाए मन अस्वस्थ 00:07:37 ना हो जाए यही बात तो श्री ध्रुव जी की मां ने कही ध्रुव जी से जब जा रहे थे 00:07:41 भजन करने कहा बेटा पहले अपनी छोटी मां को प्रणाम करके जाना अगर उसके लिए मन में कोई अभाव लेकर 00:07:47 जाता है अगर उसकी अवहेलना का कोई भाव तेरे मन में रहा तो तू इस मार्ग पर चल नहीं पाएगा 00:07:52 कोई कांटा मन में गड़ा रहा फय ये ये मार्ग फिर तेरे लिए सहज सुगम नहीं होगा उसको प्रणाम कर 00:07:59 कर जा अपना मन स्वस्थ करके जा स्वस्थ मन से भजन होता है स्वस्थ मन से साधन होता 00:08:07 है मन को दुर्बल कौन बनाता है य बड़ी सुंदर बात गोस्वामी जी कह रहे हैं क जो विषय की 00:08:14 इच्छा है मुझे अमुक व्यक्ति से सुख मिल जाए ये जो कल्पना है मन की है केवल कल्पना इसीलिए इसको 00:08:23 माया जाल कहते हैं ये कैसा माया जाल केवल कल्पना है 00:08:29 अमुक व्यक्ति से सुख मिल जाए यह वस्तु हमारे पास आ जाए तो हम थोड़े शायद सुखी हो जाएं कहीं 00:08:35 वहां चले जाए तो सुखी हो जाएं ऐसे य जो मन कल्पना करता है ना यह क्या करता है य 00:08:40 आपकी आपके मन को दुर्बल करता है कभी मैंने आपसे कहा था य जो व्यर्थ का चिंतन है य आपकी 00:08:45 शक्ति का अपव्यय कराता है अब एक और आप भजन करते हो साधन करते हो थोड़ा बल संचय करते हो 00:08:52 आप और फिर दूसरी ओर क्या होता है व्यर्थ का चिंतन भी चलता रहता है उससे शक्ति का अपव्यय होता 00:08:58 है 00:08:59 इसलिए गति नहीं होती एक कदम आगे नहीं बढ़ पाते हैं कम से कम इस मार्ग पर चलना है तो 00:09:07 सबसे पहले एक प्रबंध तो आप अपने लिए करिए इस बात को समझ लीजिए भाई हुई जो राम रच राखा 00:09:16 को कर तर्क बढ़ाव साखा गा गाकर संत समझा रहे हैं हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाद को 00:09:25 न काऊ सुख दुख कर दाता निज कृत कर्म भोग 00:09:29 भ्राता कितनी बात तो संत कह रहे हैं कि भाई जहां हो अब वहीं पर एक बार संतोष 00:09:40 करो कितने करो मनोरथ माला गोस्वामी जी ने मनोरथ को कांटा बताया लिए मनोरथ कांटा है शूल है यह कांटा 00:09:52 गड़ा हो जहां पग रोगे वही पीड़ा होगी व्यास जी ने कहा ना 00:10:01 व्यास राधिका रमण बिन कहू न पायो सुख डारन डारन में फिरो पात पात दुख कांटा गड़ा है भीतर जहां 00:10:09 पैर रखोगे फूल बिछे हु आपके मार्ग पर लेकिन पांव के भीतर अगर कांटा है हजारों फूल आपके मार्ग पर 00:10:17 बिछे हो पर वो पांव में गड़ा हुआ कांटा आपको चैन नहीं लेने देगा आपका एक एक पग आपको पीड़ा 00:10:24 की अनुभूति कराएगा क्योंकि भीतर कांटा गड़ा है ऐसे मनोरथ को गोस्वामी जी काटा 00:10:29 बता रहे फि ये कांटा है इस कांटे को निकालिए कैसे निकलेगा संत की बात सुनिए वह आपको यही विवेक 00:10:38 देने का प्रयास कर रहा है आप गलत जगह पर परिश्रम कर रहे हैं यहां तो भाई ई जो राम 00:10:43 रचि राखा संत कह रहे हैं कितने करो मनोरथ 00:10:53 माला पर भावी पर परदा 00:11:03 अरे बुद्ध जन तो कहते हैं त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम दव न जानाति कुतो मनुष्य भाग्य में क्या लिखा है 00:11:13 बो तो देवता भी नहीं जानते मनुष्य कैसे जानेगा आप पहुंच जाते हो पंडित जी के पास जन्म कुंडली लेकर 00:11:22 देखो बताओ हमारा क्या होगा अरे तुम्हारा वही होगा जो तुमने किया है 00:11:29 और क्या होगा दूसरा कोई क्या करेगा इसमें जो जस कर तस फल खा जो करके आए हो भाई बोया 00:11:38 पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए कौन बदल देगा भाग्य के खे को कौन बदलेगा ध्यान रखना कान 00:11:46 खोलकर सुन लो पहली बात तो कोई बता नहीं सकता पर भावी पर पर्दा काला सृष्टि को बनाने वाले ब्रह्मा 00:11:56 जी वो विधाता है उनका लिखा 00:11:59 लेख कोई मिटा नहीं सकता केवल महादेव मिटा सकते हैं ऐसा गोस्वामी जी कह रहे भावी मेट स कही त्रिपुरारी 00:12:08 अब ब्रह्मा जी को अपने भाग्य में क्या लिखा पता नहीं है चले ठाकुर जी की परीक्षा लेने उनको पता 00:12:15 नहीं मेरे साथ में क्या होने वाला है अगले एक वर्ष तक क्या चकरघिन्नी मेरी बनेगी उनको यह पता नहीं 00:12:21 है विधाता को नहीं पता मेरे साथ अगले पल क्या हो जाए आगे कहे गोस्वामी जी मच्छर को 00:12:29 एक क्षण में ब्रह्मा और ब्रह्मा को मच्छर से भी हीन कर देने वाले प्रभु बोले जीव की मूर्ता देखो 00:12:35 ऐसे समर्थ स्वामी को छोड़कर जाने किसकिस का भजन करता है कहां कहा सुख खोजता है पहली बात तो कोई 00:12:43 बता नहीं सकता बता भी दे अनुमान भले कोई लगा ले पर बता नहीं सकता और बता भी दे तो 00:12:51 बदल नहीं सकता पहली बात तो बता नहीं सकता है कोई भावी नहीं बता सकता है 00:13:00 और बता भी दे तो बदल नहीं सकता है पुराणों में कितनी कथाएं आती है देवऋषि नारद पहुंचे पर्वतराज हिमाचल 00:13:09 के यहां बता दिया तुम्हारी कन्या का विवाह ऐसे होगा और बड़े चिंता में पड़ 00:13:19 गए व तो कोई अवधूत होगा उसके तन पर वस्त्र भी नहीं होगा सर्प बिच्छू के आभूषण होंगे ऐसा उसका 00:13:25 वेश होगा सब नारद जी ने बता दिया 00:13:31 अब उन्होंने पूछा बोले इस विपत्ति से बचने का कोई उपाय है बो नहीं बचने का कोई उपाय नहीं हम 00:13:36 तो बता रहे हैं ऐसा होगा इसको कोई मिटा नहीं सकता है हुई जो राम रच राखा को कर तर्क 00:13:52 बढ़ाव सा तब संत कह रहे कितने करो 00:14:00 मनोरथ माला पर भावी पर परदा काला तब कहते हैं सुजन सयाने राम की बातें राम ही जाने राम की 00:14:27 बातें 00:14:28 नाम ही 00:14:35 जाने अब क्या है ना मन अपने रथ पर सवार होकर दौड़ता रहता है दसों दिशाओ में यहां गया वहां 00:14:42 गया चैन पाता 00:14:46 नहीं इसी को कहते हैं मन का भटकना मनोरथ में ही तो मन भटकता है इसी को कहते हैं मन 00:14:54 का भटकना यहां गया वहां गया यहां दौड़ा वहां दौड़ा सुख की कल्पना में जल 00:14:58 कना में दौड़ रहा है भाग रहा है भटक रहा है इसलिए तो कह रहे हैं संत सच्चे संत की 00:15:05 शरण में बैठ मिले विश्राम संत आएगा ना संतोष लेकर आएगा और संतोष का प्रसाद देगा व मन को इस 00:15:18 माया जाल से मुक्त करेगा व आपको वो आपको वो विवेक देगा जिसमें आप देख पाएंगे कि भाई इस अस्तित्व 00:15:27 का वास्तविक सत्य 00:15:28 है क्या अरे जो प्रभु की इच्छा है वो हो रहा है और आगे भी होगा क्यों नहीं हम भगवान 00:15:34 की इच्छा में अपनी इच्छा मिला दे और कल मैं आपसे कह रहा था कि भाई अपने ऊपर तो आपने 00:15:41 बहुत बार बाजी लगाकर देखी है एक बार एक बार प्रभु पर विश्वास करके देख लो ईमानदारी से एक बार 00:15:50 भगवान का भरोसा करके 00:15:56 देखो एक पंक्ति कहीं मैंने पढ़ी थी 00:15:58 बहुत अच्छी लगी थी किसी ने कहा कि अधिक मैं मांगता नहीं और कम वो देता 00:16:08 नहीं कम वो देता नहीं अरे प्रभु तो ऐसे हैं कि वो तो मांगने का अवसर ही नहीं आने देते 00:16:19 हमने प्रभु से कुछ नहीं मांगा इसमें हमारी बड़ाई नहीं है प्रभु ने कभी मांगने का अवसर ही नहीं आने 00:16:25 दिया कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी तो मांगते कैसे 00:16:29 बिन बोलिया सब कुछ जान द बिन बोलिया सब कुछ जान किस आग की ज 00:16:50 अरदास बिन बोलिया सब कुछ जाने पहली बात तो मा 00:16:58 कभी पढ़ा ही नहीं मैं यहां से कभी भी एक भी शब्द अपने अनुभव की परिधि से बाहर जाकर आपको 00:17:09 नहीं सुनाऊंगा जो कहूंगा वह गुरु कृपा से संत कृपा से मेरे जीवन में घटता देखा है इसलिए बड़े विश्वास 00:17:17 से आपको कहता हूं मांगने कहा तो प्रभु अवसर ही नहीं आने देते कल यही तो आपको कह रहा था 00:17:24 भाई कि जो सोचा था वो काम भी बना और जो नहीं सोचा था 00:17:28 वो भी बन गया और बनता ही गया एक बार प्रभु पर भरोसा करके देखो संतोष आएगा जीवन में संतोष 00:17:37 आएगा तो इस मार्ग पर एक पैर आप आगे बढ़ा पाओगे लगा रहा मनोरथ का कांटा भीतर जहां पैर धरो 00:17:44 ग वही पीड़ा है डारन डारन में फिरो और पात पात दुख और फिर यहां श्री काग ब सुंडी जी 00:17:52 कह रहे हैं नेम धर्म आचार तप ज्ञान जग जप दान 00:17:59 भेज पुनि कोटिन नहीं रोग जाही हरि जान भाई ऐसी करोड़ों करोड़ों औषधिया है पर क इन सबके कर लेने 00:18:11 से भी य जो मन के रोग है य जाते नहीं है और ही विधि सकल जीव जग रोगी और 00:18:19 सब इन मानस रोगों से पीड़ित है पर एक बात यहां बड़ी अच्छी कही है बोले मानस रोग कचक में 00:18:26 गाए गरु जी तो कुछ मानस 00:18:28 रोग मैंने आपको आपके पूछने पर कहे हैं पर हुई सब के लखी बरले न पाए बोले होते सबको है 00:18:35 पर कोई बिरला अपने मन के रोग को पहचान पाता है कल इसी बात पर हम चर्चा कर रहे थे 00:18:41 ना सत्संग करोगे अपना दोष दिखाई पड़ेगा और जब दोष दिखाई पड़े तो फिर और सत्संग करना और निष्ठा से 00:18:50 भजन में लगना और उस दोष को समूल नष्ट करने का प्रयास करना प्रभु कृपा करेंगे आपके प्रयास करने 00:18:58 दोष दूर नहीं होगा एक और बात महत्त्वपूर्ण है हमारे प्रयास करने से दोष दूर नहीं होगा लेकिन हमारे प्रयास 00:19:08 करने से प्रभु कृपा करेंगे प्रभु कृपा करेंगे जब हमको देखेंगे छटपटाते हुए भाई बालक भी रोता है तो मां 00:19:16 दूध देती है ना बालक अपनी भूख कैसे व्यक्त करता है बोल तो सकता नहीं दुध मुआ बालक है व 00:19:25 जो अपनी भूख है वो बोलकर तो कह नहीं सकता 00:19:28 रो देता है अरे कम से कम अपने दोष को देखकर रोइए तो प्रभु के सन्मुख जाकर अपने दोष से 00:19:36 पीड़ित तो होईए अपने अपने दोष के कारण जो पीड़ा जो वेदना होनी चाहिए हमारे जीवन में तो उसका भी 00:19:42 अभाव है हमको दोष दोष लगता ही नहीं तभी तो कह रहे हो ही सबके बोले मानस रोग है सभी 00:19:48 को सब इन रोगों से रोगी है दुखी है पर लख बरले न पाए कोई बिरला होता है जो इनको 00:19:54 देख पाता है जो अपने मन के रोग को पहचान 00:19:58 पाता कोई विरला होता है जाने ते ीज कछु पापी नास ना पाव जन 00:20:20 परिता अब अनुभवी श्री काग ब सुंडी जी एक बात कह रहे हैं और बोले प्रयास करके इनकी 00:20:28 औषधि करके इन रोगों को कोई दूर करने का प्रयास भी करें तो क भाई थोड़ी देर के लिए दूर 00:20:35 हो जाते हैं कल जो मैं आपसे कह रहा था ना मन स्वस्थ हो जाए और फिर मन स्वस्थ बना 00:20:42 रहे मन को स्वस्थ करने से कहीं कठिन है मन को स्वस्थ बनाए रखना आप बीमार हुए आपने दवा ली 00:20:51 दो चार दिन आपने परहेज भी किया आप स्वस्थ हो गए पर क्या फिर बीमार नहीं पड़े फिर बीमार हो 00:20:57 गए 00:20:58 शरीर फिर फिर रोगी होता 00:21:06 है जैसे कभी किसी 00:21:11 को किडनी में पत्थर हो जाए ना बड़ी भयंकर पीड़ा होती है 00:21:19 उसकी जब पीड़ा होती है उस समय तो व्यक्ति कहता है भाई 00:21:28 हमसे खाना है लिखा लो भगवान कृपा करें एक बार मैं स्वस्थ हो जाऊं एक बार स्वस्थ हो जाऊ आज 00:21:34 के बाद कभी कुपथ नहीं करूंगा आज के बाद ऐसा नहीं करूंगा आज के बाद वैसा नहीं करूंगा ठीक है 00:21:40 भाई डॉक्टर दवा दारू करता है ज्यादा करता है तो एक इंजेक्शन लगा देता है थोड़ी देर में दर्द ठीक 00:21:48 हो जाता है जब दर्द ठीक हो जाता है फ ति सब भूल जाता है थोड़े दिन के बाद तो 00:21:53 फिर वही कुपथ करने लगता है बस यही यही दशा सबकी है 00:21:58 किसी बात को लेकर मन दुखी हुआ पीड़ित हुआ अब ऐसा नहीं करेंगे अब वैसा नहीं करेंगे ठीक है मन 00:22:04 स्वस्थ हो गया थोड़ी देर के लिए स्वस्थ हुआ फिर वही कुपथ किया तो कहरे भाई यह सब साधन करने 00:22:11 से थोड़ी देर के लिए यय मन के रोग आपको लगे कि भाई अब नष्ट हो गए अब हमारा मन 00:22:16 स्वस्थ हो गया पर विषय को पथ पाई अंकुरे बोले विषय का 00:22:28 कुपथ प्राप्त करके फिर अंकुरित हो जाते हैं और यह स्थिति किसकी है मुनि ह हृदय का नर बा जी 00:22:39 कह रहे भाई बड़े बड़े ज्ञानियों की बड़े बड़े मुनियों की यह दशा है मनुष्य बेचारा किस गिनती में यही 00:22:45 शब्द शि काग बसु जी कह रहे बोले बड़े बड़े ऋषि मुनियों की यह स्थिति है कि फिर फिर उनके 00:22:52 मन में यह पाप का बीज अंकुरित होता है तभी श्री महाप्रभु जी कह रहे पारा सरसर 00:22:58 कलप कामिनी मन फ्या परे देह दुख द्वंद कौन क्रम काल नि अरे भाई बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी तपस्वी मोहित 00:23:08 हो जाते हैं मनुष्य की गिनती किसम है उसकी गिनती कौन करे अब थोड़े गरुड़ जी निराश होने लगे बोले 00:23:18 भाई देखो एक तो यह कह रहे हैं सभी इन रोगों से रोगी है और कुछ किए से रोग दूर 00:23:23 नहीं होते और अगर कोई बढ़िया बड़ा परिश्रम करके बड़ा 00:23:28 करके इनकी औषधि कर भी ले तो कर थोड़ी देर के लिए रोग दूर होता है फिर वह बीज अंकुरित 00:23:33 होता है तो गरु जी थोड़ा निराश होने लगे बोले भाई फिर उस उस रोग का क्या निदान जिसकी कोई 00:23:41 औषधि ना हो और हो भी और अगर औषधि कोई हो भी बोले थोड़ी देर के लिए व लाभ देती 00:23:48 हो और फिर रोग के हो जाने की आशंका हो व्यक्ति जाए कहां फिर किसके पास जाए किसकी शरण में 00:23:56 जाए 00:24:00 फिर अंत में काग ब सुंडी जी कह रहे हैं अब अब यह चर्चा विश्राम की ओर है अंत में 00:24:05 काग ब सुंडी कह रहे राम कृपा ना सही सब रोगा जो यही भाति बने 00:24:24 संजोगा नहीं एक एक युक्ति है जिससे यह रो 00:24:28 सदा सदा के लिए समूल नष्ट हो जाते हैं और भगवान कृपा करें और ऐसा संयोग बन जाए और व 00:24:34 संयोग क्या है ब्रम भूल में भटकते उदय हुए जब भा मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की ला 00:25:00 संयोग बने और संयोग क्या है बोले राम कृपा और राम कृपा होती है तो क्या होता है अब मोही 00:25:07 भाव भरोस 00:25:11 हनुमंता बिन हरि कृपा मिल नहीं 00:25:19 संता दो दिन से मैं आपको यही तो निवेदन कर रहा हूं भाई अपना आंचल फैलाकर 00:25:31 कर जोड़ कर मस्तक झुका कर सजल नेत्र बार-बार एक बार नहीं बार-बार बस प्रभु से यही कहिए प्रभु अपने 00:25:39 किसी अपने किसी प्रिय जन का अपने किसी निज जन का हमको संग दीजिए हमारे जीवन में कोई संत आए 00:25:47 हो कोई ऐसो रे भेटे 00:25:54 सं मेरी ला है 00:25:57 ली चिंत ठाकुर सयो मेरो रंग 00:26:08 ला हो कोई ऐसो रे 00:26:14 सुखदाई जिन हरि की कथा सुनाई इस भेटे गति हो 00:26:26 हवा 00:26:28 आपने कितनी कितनी बातें प्रभु के सन्मुख जाकर कही होगी पर कहने योग्य बात एक है मांगने योग्य वस्तु तो 00:26:34 यह एक वस्तु है एक वस्तु यह मांगना चाहिए प्रभु से और इसको मांगने के लिए संत आज्ञा दे रहे 00:26:43 हैं अ एक बार नहीं बार बार बर मा बार बार मांग रहा हूं प्रभु में हरख देहु 00:26:56 श्रीरंग 00:26:57 पद सरोज अन पायनी भक्ति सदा 00:27:12 सत्संग इसलिए मैं भी नित्य गाता हूं और आपसे भी गवाता हूं देखो हमारे शब्दों में तो ऐसी सामर्थ्य नहीं 00:27:19 है प्रभु के कान तक पहुंचे पर ये तो संतों की वाणी है ना ये तो संतों की वाणी 00:27:29 लाश का पत्ता भी निज मंदिर में पहुंच जाता है कमल के पुष्प के संग ऐसे संतों की वाणी है 00:27:36 हम भी अपना स्वर अपना थोड़ा भाव इसमें मिलाए तो यह यह शब्द प्रभु के कान तक पहुंचते हैं प्रभु 00:27:42 सुनते हैं स्वीकारते हैं इसलिए कह रहे बार बार बरमा जन के चरण बस मेरे हीय रे जन 00:27:57 के चरण बस मेरे हीय रे संग पुनीता 00:28:11 देई संग पुनीता देही सब कहिए जन के चरण बस में रही है रेन के चरण 00:28:31 बही संग पुनीता 00:28:39 देही संग गुनीना दे जनकी धूर देहु कृपानिधि जनकी दूर 00:28:58 कृपानिधि नानक के सुख 00:29:07 ही नानक के सुख ही नानक के सुख 00:29:20 ही नानक के 00:29:26 सुख 00:29:27 जिनके चरण बस में रही हैरे जिनके चरण बस में रही संग पुनीता 00:29:47 देही संग पुनीता देही जनकी धूर 00:29:57 देहु कृपा निधी चन की दूर देहु कृपा नानक के सुख 00:30:14 ही नानक के सुख यही नानक के सुख ही 00:30:28 नानक के 00:30:32 सुख जन के चरण बस मेरे ही है रे जन के चरण बस में रही है जन के चरण बस 00:30:51 में रही हैन के चरण 00:31:03 राम कृपा ना सही सब रोगा और राम की कृपा क्या है ऐसा कोई संत मिले ठाकुर से मेरो रंग 00:31:14 लावे और फिर कह रहे ऐसा संत मिले तो सदगुरु बैद वचन 00:31:26 विश्वासा 00:31:27 ध्यान दीजिए चर्चा जहां से आरंभ हुई थी वहीं जा रही है जब श्री गरुड़ जी गए थे ब्रह्मा जी 00:31:35 के पास तो ब्रह्मा जी जान गए कि इनको मन का रोग हो गया है और मन के रोग की 00:31:41 औषधि केवल गुरु के ही पास में होती है तभी गरुड़ जी से कहा था कि यहां से सीधे कैलाश 00:31:48 पर जाना देवाधि देव महादेव के चरणों में अपने मन की ये व्यथा निवेदन करना और उनके अतिरिक्त किसी और 00:31:56 से ना कहना 00:31:58 उन्हीं से जाकर कहना मन के रोग का वैद तो गुरु ही है क भगवान कृपा करें यह संयोग मिले 00:32:08 और सदगुरु रूपी वैद मिल जाए सदगुरु वैद औषधि क्या है वचन विश्वासा जो गुरु के मुख से नाम श्रवण 00:32:23 किया है ना उसका उसका भरोसा उसका उसका विश्वास 00:32:29 गुरु के मुख से जो नाम श्रवण किया है गुरु की जो वाणी है गुरु का जो शब्द है उसका 00:32:35 विश्वास सदगुरु वैद वचन 00:32:43 विश्वासा पर कबीर कहते हैं कि राम नाम की औषधि सतगुरु दई बताए औषध खाए और पथ करे ताकि वेदन 00:32:56 जाए 00:32:57 सदगुरु वैद वचन विश्वासा पर जब वैद औषधि देता है तो कुछ परहेज भी तो बताता है और मुझे ऐसा 00:33:07 लगता है कि जितना कार्य औषधि करती है उतना ही कार्य परहेज भी करता है संयम भी उतना ही कार्य 00:33:14 करता है औषधि लेते रहो और कुपथ भी करते रहो तो तो रोग नहीं जाता है और कभी-कभी यह भी 00:33:22 देखने में आता है औषधि ना करो और 00:33:27 केवल आप अपने आप को कुपथ से बचा लो तो जो हमारी जीवनी शक्ति है वो थोड़ी थोड़े से काल 00:33:34 में शरीर को फिर स्वस्थ कर देती है भगवान ने भगवान ने तो आपको मुझे सारी व्यवस्था करके भेजा 00:33:45 है सारी व्यवस्था तो कहरे सदगुरु वैद वचन विश्वासा एक परहेज भी बताया है सन 00:33:56 संजम यह ना विषय के आसा संजम यह ना विषय के आस आपको याद हो कभी हमने यहां चर्चा की 00:34:12 थी कि हम आदि बात मानते हैं महापुरुषों की सूरदास जब क सब तज भजिए नंद कुमार नंद कुमार का 00:34:23 भजन तो करेंगे पर सबको छोड़ते नहीं मदास कहते 00:34:27 मैं अपना मन हरिस जोर हरि स जोर सबन स तोर यहां कह रहे बोले परहेज क्या है संयम क्या 00:34:35 रखना है क संयम ने यह ना विषय के आसा गुरु के चरणों में अपना मस्तक रखा गुरु से नाम 00:34:44 जैसी अमोलक वस्तु पाई चिंतामणि हरि नाम है सफल करे सब काम गुरु ने आपको चिंतामणि दिया है उसके बाद 00:34:53 फिर संसार के विषय से सुख की आशा ना रखिए 00:34:57 यह कार्य आपको करना पड़ेगा अपने मन को यह बात समझा पड़ेगी अपने मन को यह बोध देना पड़ेगा झंझोट 00:35:03 कर कि भाई अब मेरे सुख का विधान प्रभु करेंगे जो भाग्य का लिखा है व आता जाता रहेगा उसके 00:35:11 लिए कुछ करना नहीं है जो सुख दुख लग रहे देहस व तो आते जाते 00:35:20 रहेंगे कान खोलकर सुन लेना भाई ना बुलाने से सुख आता है ना भगाने से दुख जाता है 00:35:27 बुलाने से सुख आता नहीं और भगाने से दुख जाता नहीं तो प्रारब्ध का है लिखा है जो उसका समय 00:35:34 नियत है आएगा भी और जाएगा भी आप कितना रोते बिल बिलाते रहो कितना नाचते कूदते रहो रती घटे ना 00:35:43 तिल बढ़े जो लिख दी करता ना घटेगा ना बढ़ेगा कितना बड़ा आश्चर्य है जहां हमारे करने से कुछ नहीं 00:35:56 हो ररहा है वहां हम अपनी सारी शक्ति लगाए जा रहे हैं और जहां पुरुषार्थ करने से मनुष्य सदा के 00:36:06 लिए सुखी हो जाता है वहां से वहां से जीव विमुख रहता है यह माया श्री कृष्ण की मोयो सब 00:36:16 संसार जहां पुरुषार्थ बिल्कुल व्यर्थ है जो भूमि बंजर है जहां पर कुछ है नहीं संभावना वहां सारा परिश्रम कर 00:36:26 रहा 00:36:31 और जहां राई के सम भजन को मानत मेरु समान वहां से जीव विमुख रहता है यही भगवान की माया 00:36:42 है और इस माया ने मोयो सब संसार व काक ब सुंडी कह रहे हैं बो बड़े बड़े ऋषि मुनि 00:36:49 इससे पीड़ित है भाई नर बिचारा मनुष्य विचारा क्या करेगा तो क भगवान कृपा 00:36:56 करें सदगुरु मिले और फिर उससे बड़ी कृपा क्या है सदगुरु वैद वचन विश्वा भाई डॉक्टर की बात माननी भी 00:37:07 तो पड़ेगी आप संसार के सबसे श्रेष्ठ डॉक्टर से औषधि ले आओ केवल सबसे श्रेष्ठ डॉक्टर से औषधि लेने से 00:37:18 थोड़ी ठीक हो जाओगे भाई समय पर औषधि का सेवन भी करना पड़ेगा पत्थ कुपथ का विचार भी तो करना 00:37:25 पड़ेगा 00:37:29 क सदगुरु बैद सदगुरु रूपी वैद मिले और फिर उसके वचन पर विश्वास हो अ साथ साथ में एक परहेज 00:37:38 भी करना है संयम यह ना विषय के आसा यही कपट हम करते हैं भगवान से हम यही कपट सदा 00:37:49 सदा निरंतर करते हैं भगवान से और वो कह रहे मो कपट छल छिद्र न भावा हम यही कपट करते 00:37:55 हैं हमको सुख की आशा 00:37:56 है कहीं से यहां से वहां से इससे उससे भाई यह देगा हमें कुछ य ऐसा करेगा हम सुखी हो 00:38:04 जाएंगे इससे कुछ मिलेगा हम सुखी हो जाएंगे यह परहेज करना है भाई यह संयम रहे और मैंने आपको कहा 00:38:13 इसका अभ्यास करना पड़ेगा झंझोट झंझोट कर अपने मन को आपको समझाना पड़ेगा कि ना नहीं मिलेगा यहां सुख और 00:38:21 मिल भी जाए और यदि मिलता भी हो तो बने तो 00:38:26 रघुवर पे बने और बिगड़े तो भरपूर जो रघुवर को ना रुच वा बन बे में धू एक बार मैं 00:38:43 कह रहा हूं एक बार यह बाजी ऐसे भी खेल कर देखो और मान लो हमारी बात आनंद आएगा आपको 00:38:50 निश्चिंत हो जाओगे निर्भर हो जाओगे आप भी देखोगे कि पतवार के 00:38:56 बिना ही मेरी नाव चल रही है और हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है चरण कमल बंद हरि 00:39:12 राई चरण कमल 00:39:19 बंद जा की कृपा पंगु गिरि लंग 00:39:34 रंक चले सिर छत्र 00:39:47 धराई चरण कमल बंदो हरि राई 00:40:03 आजकल जैसे लोग पैसा देकर जाते हैं मोटिवेशनल स्पीकर्स की स्पीच सुनने के लिए रुपया देकर जाते हैं यह तो 00:40:13 ऐसा हुआ जैसे कोई उत्साह खरीदने जा रहा हो जसे कोई शांति खरीदने जाते हैं आजकल लोग सोते वहां जाएंगे 00:40:19 शं शांति हो जाएगी मन शांत हो जाएगा जैसे यहां जाते हैं लोग 00:40:26 ऐसा लगता हैसे उत्साह खरीदने जा रहा हो जैसे दुकान में उत्साह बट रहा 00:40:32 हो हालांकि देख रहे हैं वह मोटिवेशनल स्पीकर्स की आज क्या दशा हो रही है व बेचारे खुद कहां 00:40:44 है हमको भी जीवन में मोटिवेशन मिला हमको भी जीवन में उत्साह मिला पर हमारे मोटिवेशनल स्पीकर्स तो यह संत 00:40:55 थे जो यह कह 00:40:56 कहते हैं नीच ऊच करे मेरा गोविंद नीच ही ऊच प्र मेरा गोविंद 00:41:25 हु 00:41:28 हमको यहां से उत्साह मिला हम भी निराश हुए 00:41:33 थे कभी बड़ी विचित्र परिस्थितियां आ गई थी अब कहां देखें अब किसकी ओर देखें कोई भी एक पग साथ 00:41:43 चलने को तैयार नहीं है तब नीचे ऊंच करे मेरा गोविंद और काह पे ना डरे ऐसी लाल तुझ बिन 00:41:53 कौन करे 00:41:56 ऐसी 00:42:00 लाल गरीब निवाज गु सैया मेरो गरीब निवाज गु सैया मेरो गरीब निवाज गु सैया मेरा माथ है 00:42:26 छतर 00:42:29 धर ऐसी लाल तुझ बिन कौ करे ऐसी 00:42:43 लाल एक बार बस आशा एक राम जी से एक राम जी से अब कोई कहेगा क्या सिखा रहे हैं 00:42:52 आप कुछ नहीं करें हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाए एक बार भगवान का भरोसा 00:42:56 करके तो देखो जहां की कृपा पंगु गिरी लंग है जब कोई भरोसा करता है तो फिर उसके रथ का 00:43:02 सारथी वो स्वयं होकर बैठता है और सामने समुद्र के जैसी दस्तर सेना हो उसको भी पार करा के अंत 00:43:09 में विजय श्री का प्रसाद देता है एक बार करके तो देखिए 00:43:18 आप बस संजम यह ना विषय क्या 00:43:25 आसा