Saturday, August 1, 2026

मन के रोग और उनकी औषधि | The Diseases of the Mind and Their Remedy by Shri Hit Ambrish ji

मन के रोग और उनकी औषधि | The Diseases of the Mind and Their Remedy by Shri Hit Ambrish ji

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given
1. मन के रोगों से मुक्ति का एकमात्र उपाय | The Only Remedy for the Diseases of the Mind 2. राम कृपा और सद्गुरु की औषधि | The Remedy of Rama's Grace and the Sadguru
https://www.youtube.com/watch?v=DZ_L5fVr508 [00:00] - [01:30] तन बीमार हो तो भी भक्ति संभव है, लेकिन यदि मन रोगी हो जाए, तो आध्यात्मिक मार्ग पर चलना असंभव हो जाता है। Even if the body is ill, devotion is still possible, but if the mind becomes diseased, it becomes impossible to walk on the spiritual path. [01:38] - [03:00] काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और राग-द्वेष को मन के रोग बताया गया है। यज्ञ, तप, दान आदि से भी ये रोग पूरी तरह नष्ट नहीं होते। Lust, anger, greed, attachment, jealousy, and attraction-aversion are described as diseases of the mind. Even sacrifices, austerities, charity, and similar practices do not completely destroy these diseases. [04:15] - [05:30] मनोरोगी कभी स्वीकार नहीं करता कि वह बीमार है। बाहरी लाभ-हानि के चक्कर में अपने भीतर के मन को मैला नहीं करना चाहिए। A person suffering from a mental disease never accepts that he is ill. One should not pollute the inner mind while becoming caught up in external gain and loss. [06:56] - [08:10] बिखरे हुए मन को समेटना राई के दानों को समेटने जैसा कठिन है। भजन के लिए मन का स्वस्थ और शांत होना अनिवार्य है। Gathering a scattered mind is as difficult as gathering mustard seeds. For devotion, it is essential that the mind be healthy and peaceful. [08:14] - [10:30] संसार की वस्तुओं से सुख की इच्छा ही मन को दुर्बल बनाती है। महाराज जी 'मनोरथ' इच्छाओं को हृदय में गड़ा हुआ कांटा बताते हैं। The desire for happiness from worldly objects is what makes the mind weak. Maharaj Ji describes 'Manorath', or desires, as thorns embedded in the heart. [11:40] - [14:30] जो भाग्य में लिखा है उसे कोई नहीं बदल सकता। "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" के भाव को अपनाने से ही शांति मिलती है। No one can change what is written in one's destiny. Peace comes only by adopting the feeling expressed in "Hoihi Soi Jo Ram Rachi Rakha." [18:20] - [20:00] सत्संग के माध्यम से ही व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को पहचान पाता है। दोष दूर करने के लिए प्रभु के सामने छटपटाना और रोना आवश्यक है। It is through Satsang that a person is able to recognize the faults within oneself. To remove these faults, one must yearn before the Lord and cry out to Him. [31:00] - [33:00] राम कृपा ही एकमात्र औषधि है। इसके लिए 'सद्गुरु' रूपी वैद्य की आवश्यकता है और उनकी वाणी वचन पर अटूट विश्वास ही इलाज है। The grace of Lord Rama is the only remedy. For this, a physician in the form of a Sadguru is needed, and unwavering faith in their words is the treatment. [33:50] - [36:00] औषधि के साथ परहेज जरूरी है। यहाँ परहेज का अर्थ है—सांसारिक विषयों से सुख की आशा का त्याग करना। Along with the medicine, restraint is necessary. Here, restraint means giving up the expectation of happiness from worldly objects. https://www.youtube.com/watch?v=DZ_L5fVr508 ---
Full Transcript


00:00:00 छह प्रश्नों के बाद सातवां प्रश्न श्री गरुड़ जी ने पूछा है मानस रोग कह ह समझा 00:00:11 आई क्योंकि श्री गरुड़ जी स्वयं भी इसी मानस रोग से ही पीड़ित होकर आए थे तन तो स्वस्थ था 00:00:18 मन रोगी हो गया था मन अस्वस्थ हो गया था और यह मार्ग ऐसा है 00:00:30 कि तन स्वस्थ हो तो उत्तम ना 00:00:37 हो तो भी व्यक्ति साधन में प्रवृत्त रह सकता है पर मन अस्वस्थ हो जाए मन रोगी हो जाए फिर 00:00:48 इस मार्ग पर गति संभव नहीं है हाथ में माला हो कोई और कार्य हो पर ध्यान रखना सेवा स्मरण 00:01:00 का कार्य मुख्य रूप से तो मन ही कर रहा है मन ही करता है और मन के किए ही 00:01:05 होता है तो तन प्रारब्ध वसाद रुग्ण हो भी जाए तो भी साधन संभव है पर मन रोगी हो जाए 00:01:18 तो साधन संभव नहीं है एक क्षण के लिए भी संभव नहीं है तो गरुड़ जी को भी मन का 00:01:25 ही रोग हुआ था 00:01:30 में गरुड़ जी ने बात पूछी मानस रोग कहु समझाई श्री गरुड़ जी ने पूछा कि मानस रोग कितने हैं 00:01:38 कैसे हैं तो श्री गोस्वामी जी ने कहा भाई ऐसे काम है क्रोध है लोभ है मोह है ईर्ष है 00:01:45 राग है द्वेष है हर्ष है विषाद है ऐसे अनेक अनेक रोग श्री गोस्वामी जी ने गिना दिए फिर अंत 00:01:51 में क्या कह रहे हैं नेम धर्म आचार तप ज्ञान जप 00:01:59 जप दान भेषज पुनि कोटिन नहीं रोग जाही हरि जा क नियम धर्म आचार तप ज्ञान यज्ञ जप दान 00:02:23 क और भी करोड़ों औषधियां है प्रका बसन जी कह रहे हे गरुड़ जी लेकिन उनसे 00:02:29 य रोग जाते नहीं सार की बात यहां यहां गोस्वामी जी कह रहे कि अनेक अनेक मानस रोग है अनेक 00:02:38 अनेक विकृतियां है क कितनी कहू आपसे अनेक अनेक रोग है पर कय जितने भी सब साधन है अब देखो 00:02:46 एक प्रकार से सभी कुछ तो कह दिया श्री काग सुंडी जी ने कहा कि नियम धर्म आचार तप ज्ञान 00:02:55 यज्ञ जप दान और और भी जितनी औषधिया है 00:02:59 लीजिए तो क भाई उनसे यह रोग जाते नहीं 00:03:05 फिर कैसे जाते हैं यही विधि सकल जीव जग रोगी शोक हरस भय प्रीति वियोगी मानस रोग क छुक 00:03:25 में गाए हो ही सबके 00:03:32 लखर एक प्रश्न खड़ा होता है गरुड़ जी ने पूछा क्यों यह प्रश्न मानस रोग समझा कर कहिए और फिर 00:03:40 क्या कह रहे हैं गरुड़ जी मानस रोग कह समझाई मुझे समझाकर कहिए उसका कारण है कि आप में हम 00:03:49 सब हमारा शरीर भले स्वस्थ हो पर जो हमारा मन मानस है ना वह तो अस्वस्थ ही है जितने जीव 00:03:57 है सब किसी ना किसी मानसिक व्याधि 00:03:59 से किसी ना किसी मानसिक रोग से पीड़ित है इसीलिए कह रहे ही विधि सकल जीव जग रोगी सभी रोगी 00:04:08 है अच्छा और मन का रोग जिसको होता है ना उसकी विडंबना क्या है कि जो मनोरोगी होता है व 00:04:15 सबसे पहले तो अपने आप को रोगी मानता नहीं आप ऐसे भी आप किसी में ऐसा कोई लक्षण देखो और 00:04:24 आप कहो कि चलो तुम्हें एक मनो चिकित्सक के पास लेकर जाते हैं वो आपको मारने दौड़ेगा कि अच्छा आप 00:04:29 हमें पागल समझते हैं पागल हूं क्या मैं मैं क्यों जाऊंगा मैं मन के डॉक्टर के पास क्यों जाऊं मैं कोई पागल 00:04:36 हूं वो आपको मारने दौड़ेगा मनोरोग की यही विडंबना है कि जिसको मनोरोग होगा वोह कभी अपने आप को रोगी 00:04:46 मानेगा ही नहीं औषधि से दूर भागेगा चिकित्सक उसको औषधि देगा वो औषधि से ही दूर भागेगा इसलिए भाई यहां 00:04:57 संत कह रहे हैं कि तन रोगी हो जाए 00:04:59 तो चिंता नहीं करना औषधि करना स्वस्थ हो जाओगे पर ध्यान रखना मन रोगी नहीं हो जाए कभी आपसे पहले 00:05:06 भी मैंने कहा था भाई बाहर कुछ बनाने के लिए भीतर का खेल बिगाड़ मत बैठना बाहर के हानि लाभ 00:05:13 को देखते हुए कहीं कहीं अपना मन ना बिगाड़ बैठना मन मलीन ना हो जाए मन मैला ना हो जाए 00:05:19 कल भी हम इसी बात पर चर्चा कर रहे थे ऐसा कुछ ना हो जाए कि हमारा मन ही भजन 00:05:24 के योग्य ना रहे बाहर की सारी क्षति पूर्ति हो जाएगी 00:05:29 और एक और बात बाहर जो भी लाभ और हानि है ना वो आपके मेरे हाथ में नहीं है सुनहु 00:05:38 भरत भावी प्रबल बहसी कहहु मुनि ना हानि लाभ जीवन मरण जस अप जैस विधि हाथ जैस अप जैस 00:06:01 सुने भरत भावी प्रबल बहसी कहे मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ अपनी ओर से तो 00:06:12 भाई अपनी हानि का इंतजाम कोई नहीं करता फिर भी हानि होती है मैं तो कहता ही हूं कि सीख 00:06:21 सको तो अपने आसपास होने वाली घटनाओं से सीखो देखो कि जिस बुद्धि से व्यक्ति कमाता है उसी बुद्धि के 00:06:29 द्वारा लिए गए किसी निर्णय से व्यक्ति गवा भी देता है अपने हाथ में नहीं है महादेव तो यहां तक 00:06:36 कह रहे हैं जिही जस जग रघुपति करही सोते ही छिन तस हुई तो बाहर का लाभ बाहर की हानि 00:06:46 इसके लिए भाई अपनी वास्तविक हानि ना करा बैठना और ध्यान रखना बिखर मन सिमट नहीं बिखर मन सिमट नहीं 00:06:56 आपको एक उदाहरण दिया था मैंने याद है आपको 00:06:59 कि राई के दानों की पोटली बांधी उनको बिखेर दीजिए उस पोटली को बिखेर देने में कितना समय लगा एक 00:07:08 क्षण अब कोई कहे आपसे भाई इसको समेट लो समेटना सरल नहीं है और पूरा पूरा तो कोई समेट भी 00:07:17 नहीं पाएगा समेटना सरल भी नहीं है बहुत कठिन है और पूरा पूरा तो मुझे लगता है समेट पाना लगभग 00:07:24 असंभव ही है कोई ना कोई दाना छूट ही जाएगा कोई ना कोई दाना रह जाएगा 00:07:30 क बिखर मन सिमट नहीं तो भाई देखना मन ना बिखर जाए मन की हानि ना हो जाए मन अस्वस्थ 00:07:37 ना हो जाए यही बात तो श्री ध्रुव जी की मां ने कही ध्रुव जी से जब जा रहे थे 00:07:41 भजन करने कहा बेटा पहले अपनी छोटी मां को प्रणाम करके जाना अगर उसके लिए मन में कोई अभाव लेकर 00:07:47 जाता है अगर उसकी अवहेलना का कोई भाव तेरे मन में रहा तो तू इस मार्ग पर चल नहीं पाएगा 00:07:52 कोई कांटा मन में गड़ा रहा फय ये ये मार्ग फिर तेरे लिए सहज सुगम नहीं होगा उसको प्रणाम कर 00:07:59 कर जा अपना मन स्वस्थ करके जा स्वस्थ मन से भजन होता है स्वस्थ मन से साधन होता 00:08:07 है मन को दुर्बल कौन बनाता है य बड़ी सुंदर बात गोस्वामी जी कह रहे हैं क जो विषय की 00:08:14 इच्छा है मुझे अमुक व्यक्ति से सुख मिल जाए ये जो कल्पना है मन की है केवल कल्पना इसीलिए इसको 00:08:23 माया जाल कहते हैं ये कैसा माया जाल केवल कल्पना है 00:08:29 अमुक व्यक्ति से सुख मिल जाए यह वस्तु हमारे पास आ जाए तो हम थोड़े शायद सुखी हो जाएं कहीं 00:08:35 वहां चले जाए तो सुखी हो जाएं ऐसे य जो मन कल्पना करता है ना यह क्या करता है य 00:08:40 आपकी आपके मन को दुर्बल करता है कभी मैंने आपसे कहा था य जो व्यर्थ का चिंतन है य आपकी 00:08:45 शक्ति का अपव्यय कराता है अब एक और आप भजन करते हो साधन करते हो थोड़ा बल संचय करते हो 00:08:52 आप और फिर दूसरी ओर क्या होता है व्यर्थ का चिंतन भी चलता रहता है उससे शक्ति का अपव्यय होता 00:08:58 है 00:08:59 इसलिए गति नहीं होती एक कदम आगे नहीं बढ़ पाते हैं कम से कम इस मार्ग पर चलना है तो 00:09:07 सबसे पहले एक प्रबंध तो आप अपने लिए करिए इस बात को समझ लीजिए भाई हुई जो राम रच राखा 00:09:16 को कर तर्क बढ़ाव साखा गा गाकर संत समझा रहे हैं हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाद को 00:09:25 न काऊ सुख दुख कर दाता निज कृत कर्म भोग 00:09:29 भ्राता कितनी बात तो संत कह रहे हैं कि भाई जहां हो अब वहीं पर एक बार संतोष 00:09:40 करो कितने करो मनोरथ माला गोस्वामी जी ने मनोरथ को कांटा बताया लिए मनोरथ कांटा है शूल है यह कांटा 00:09:52 गड़ा हो जहां पग रोगे वही पीड़ा होगी व्यास जी ने कहा ना 00:10:01 व्यास राधिका रमण बिन कहू न पायो सुख डारन डारन में फिरो पात पात दुख कांटा गड़ा है भीतर जहां 00:10:09 पैर रखोगे फूल बिछे हु आपके मार्ग पर लेकिन पांव के भीतर अगर कांटा है हजारों फूल आपके मार्ग पर 00:10:17 बिछे हो पर वो पांव में गड़ा हुआ कांटा आपको चैन नहीं लेने देगा आपका एक एक पग आपको पीड़ा 00:10:24 की अनुभूति कराएगा क्योंकि भीतर कांटा गड़ा है ऐसे मनोरथ को गोस्वामी जी काटा 00:10:29 बता रहे फि ये कांटा है इस कांटे को निकालिए कैसे निकलेगा संत की बात सुनिए वह आपको यही विवेक 00:10:38 देने का प्रयास कर रहा है आप गलत जगह पर परिश्रम कर रहे हैं यहां तो भाई ई जो राम 00:10:43 रचि राखा संत कह रहे हैं कितने करो मनोरथ 00:10:53 माला पर भावी पर परदा 00:11:03 अरे बुद्ध जन तो कहते हैं त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम दव न जानाति कुतो मनुष्य भाग्य में क्या लिखा है 00:11:13 बो तो देवता भी नहीं जानते मनुष्य कैसे जानेगा आप पहुंच जाते हो पंडित जी के पास जन्म कुंडली लेकर 00:11:22 देखो बताओ हमारा क्या होगा अरे तुम्हारा वही होगा जो तुमने किया है 00:11:29 और क्या होगा दूसरा कोई क्या करेगा इसमें जो जस कर तस फल खा जो करके आए हो भाई बोया 00:11:38 पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए कौन बदल देगा भाग्य के खे को कौन बदलेगा ध्यान रखना कान 00:11:46 खोलकर सुन लो पहली बात तो कोई बता नहीं सकता पर भावी पर पर्दा काला सृष्टि को बनाने वाले ब्रह्मा 00:11:56 जी वो विधाता है उनका लिखा 00:11:59 लेख कोई मिटा नहीं सकता केवल महादेव मिटा सकते हैं ऐसा गोस्वामी जी कह रहे भावी मेट स कही त्रिपुरारी 00:12:08 अब ब्रह्मा जी को अपने भाग्य में क्या लिखा पता नहीं है चले ठाकुर जी की परीक्षा लेने उनको पता 00:12:15 नहीं मेरे साथ में क्या होने वाला है अगले एक वर्ष तक क्या चकरघिन्नी मेरी बनेगी उनको यह पता नहीं 00:12:21 है विधाता को नहीं पता मेरे साथ अगले पल क्या हो जाए आगे कहे गोस्वामी जी मच्छर को 00:12:29 एक क्षण में ब्रह्मा और ब्रह्मा को मच्छर से भी हीन कर देने वाले प्रभु बोले जीव की मूर्ता देखो 00:12:35 ऐसे समर्थ स्वामी को छोड़कर जाने किसकिस का भजन करता है कहां कहा सुख खोजता है पहली बात तो कोई 00:12:43 बता नहीं सकता बता भी दे अनुमान भले कोई लगा ले पर बता नहीं सकता और बता भी दे तो 00:12:51 बदल नहीं सकता पहली बात तो बता नहीं सकता है कोई भावी नहीं बता सकता है 00:13:00 और बता भी दे तो बदल नहीं सकता है पुराणों में कितनी कथाएं आती है देवऋषि नारद पहुंचे पर्वतराज हिमाचल 00:13:09 के यहां बता दिया तुम्हारी कन्या का विवाह ऐसे होगा और बड़े चिंता में पड़ 00:13:19 गए व तो कोई अवधूत होगा उसके तन पर वस्त्र भी नहीं होगा सर्प बिच्छू के आभूषण होंगे ऐसा उसका 00:13:25 वेश होगा सब नारद जी ने बता दिया 00:13:31 अब उन्होंने पूछा बोले इस विपत्ति से बचने का कोई उपाय है बो नहीं बचने का कोई उपाय नहीं हम 00:13:36 तो बता रहे हैं ऐसा होगा इसको कोई मिटा नहीं सकता है हुई जो राम रच राखा को कर तर्क 00:13:52 बढ़ाव सा तब संत कह रहे कितने करो 00:14:00 मनोरथ माला पर भावी पर परदा काला तब कहते हैं सुजन सयाने राम की बातें राम ही जाने राम की 00:14:27 बातें 00:14:28 नाम ही 00:14:35 जाने अब क्या है ना मन अपने रथ पर सवार होकर दौड़ता रहता है दसों दिशाओ में यहां गया वहां 00:14:42 गया चैन पाता 00:14:46 नहीं इसी को कहते हैं मन का भटकना मनोरथ में ही तो मन भटकता है इसी को कहते हैं मन 00:14:54 का भटकना यहां गया वहां गया यहां दौड़ा वहां दौड़ा सुख की कल्पना में जल 00:14:58 कना में दौड़ रहा है भाग रहा है भटक रहा है इसलिए तो कह रहे हैं संत सच्चे संत की 00:15:05 शरण में बैठ मिले विश्राम संत आएगा ना संतोष लेकर आएगा और संतोष का प्रसाद देगा व मन को इस 00:15:18 माया जाल से मुक्त करेगा व आपको वो आपको वो विवेक देगा जिसमें आप देख पाएंगे कि भाई इस अस्तित्व 00:15:27 का वास्तविक सत्य 00:15:28 है क्या अरे जो प्रभु की इच्छा है वो हो रहा है और आगे भी होगा क्यों नहीं हम भगवान 00:15:34 की इच्छा में अपनी इच्छा मिला दे और कल मैं आपसे कह रहा था कि भाई अपने ऊपर तो आपने 00:15:41 बहुत बार बाजी लगाकर देखी है एक बार एक बार प्रभु पर विश्वास करके देख लो ईमानदारी से एक बार 00:15:50 भगवान का भरोसा करके 00:15:56 देखो एक पंक्ति कहीं मैंने पढ़ी थी 00:15:58 बहुत अच्छी लगी थी किसी ने कहा कि अधिक मैं मांगता नहीं और कम वो देता 00:16:08 नहीं कम वो देता नहीं अरे प्रभु तो ऐसे हैं कि वो तो मांगने का अवसर ही नहीं आने देते 00:16:19 हमने प्रभु से कुछ नहीं मांगा इसमें हमारी बड़ाई नहीं है प्रभु ने कभी मांगने का अवसर ही नहीं आने 00:16:25 दिया कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी तो मांगते कैसे 00:16:29 बिन बोलिया सब कुछ जान द बिन बोलिया सब कुछ जान किस आग की ज 00:16:50 अरदास बिन बोलिया सब कुछ जाने पहली बात तो मा 00:16:58 कभी पढ़ा ही नहीं मैं यहां से कभी भी एक भी शब्द अपने अनुभव की परिधि से बाहर जाकर आपको 00:17:09 नहीं सुनाऊंगा जो कहूंगा वह गुरु कृपा से संत कृपा से मेरे जीवन में घटता देखा है इसलिए बड़े विश्वास 00:17:17 से आपको कहता हूं मांगने कहा तो प्रभु अवसर ही नहीं आने देते कल यही तो आपको कह रहा था 00:17:24 भाई कि जो सोचा था वो काम भी बना और जो नहीं सोचा था 00:17:28 वो भी बन गया और बनता ही गया एक बार प्रभु पर भरोसा करके देखो संतोष आएगा जीवन में संतोष 00:17:37 आएगा तो इस मार्ग पर एक पैर आप आगे बढ़ा पाओगे लगा रहा मनोरथ का कांटा भीतर जहां पैर धरो 00:17:44 ग वही पीड़ा है डारन डारन में फिरो और पात पात दुख और फिर यहां श्री काग ब सुंडी जी 00:17:52 कह रहे हैं नेम धर्म आचार तप ज्ञान जग जप दान 00:17:59 भेज पुनि कोटिन नहीं रोग जाही हरि जान भाई ऐसी करोड़ों करोड़ों औषधिया है पर क इन सबके कर लेने 00:18:11 से भी य जो मन के रोग है य जाते नहीं है और ही विधि सकल जीव जग रोगी और 00:18:19 सब इन मानस रोगों से पीड़ित है पर एक बात यहां बड़ी अच्छी कही है बोले मानस रोग कचक में 00:18:26 गाए गरु जी तो कुछ मानस 00:18:28 रोग मैंने आपको आपके पूछने पर कहे हैं पर हुई सब के लखी बरले न पाए बोले होते सबको है 00:18:35 पर कोई बिरला अपने मन के रोग को पहचान पाता है कल इसी बात पर हम चर्चा कर रहे थे 00:18:41 ना सत्संग करोगे अपना दोष दिखाई पड़ेगा और जब दोष दिखाई पड़े तो फिर और सत्संग करना और निष्ठा से 00:18:50 भजन में लगना और उस दोष को समूल नष्ट करने का प्रयास करना प्रभु कृपा करेंगे आपके प्रयास करने 00:18:58 दोष दूर नहीं होगा एक और बात महत्त्वपूर्ण है हमारे प्रयास करने से दोष दूर नहीं होगा लेकिन हमारे प्रयास 00:19:08 करने से प्रभु कृपा करेंगे प्रभु कृपा करेंगे जब हमको देखेंगे छटपटाते हुए भाई बालक भी रोता है तो मां 00:19:16 दूध देती है ना बालक अपनी भूख कैसे व्यक्त करता है बोल तो सकता नहीं दुध मुआ बालक है व 00:19:25 जो अपनी भूख है वो बोलकर तो कह नहीं सकता 00:19:28 रो देता है अरे कम से कम अपने दोष को देखकर रोइए तो प्रभु के सन्मुख जाकर अपने दोष से 00:19:36 पीड़ित तो होईए अपने अपने दोष के कारण जो पीड़ा जो वेदना होनी चाहिए हमारे जीवन में तो उसका भी 00:19:42 अभाव है हमको दोष दोष लगता ही नहीं तभी तो कह रहे हो ही सबके बोले मानस रोग है सभी 00:19:48 को सब इन रोगों से रोगी है दुखी है पर लख बरले न पाए कोई बिरला होता है जो इनको 00:19:54 देख पाता है जो अपने मन के रोग को पहचान 00:19:58 पाता कोई विरला होता है जाने ते ीज कछु पापी नास ना पाव जन 00:20:20 परिता अब अनुभवी श्री काग ब सुंडी जी एक बात कह रहे हैं और बोले प्रयास करके इनकी 00:20:28 औषधि करके इन रोगों को कोई दूर करने का प्रयास भी करें तो क भाई थोड़ी देर के लिए दूर 00:20:35 हो जाते हैं कल जो मैं आपसे कह रहा था ना मन स्वस्थ हो जाए और फिर मन स्वस्थ बना 00:20:42 रहे मन को स्वस्थ करने से कहीं कठिन है मन को स्वस्थ बनाए रखना आप बीमार हुए आपने दवा ली 00:20:51 दो चार दिन आपने परहेज भी किया आप स्वस्थ हो गए पर क्या फिर बीमार नहीं पड़े फिर बीमार हो 00:20:57 गए 00:20:58 शरीर फिर फिर रोगी होता 00:21:06 है जैसे कभी किसी 00:21:11 को किडनी में पत्थर हो जाए ना बड़ी भयंकर पीड़ा होती है 00:21:19 उसकी जब पीड़ा होती है उस समय तो व्यक्ति कहता है भाई 00:21:28 हमसे खाना है लिखा लो भगवान कृपा करें एक बार मैं स्वस्थ हो जाऊं एक बार स्वस्थ हो जाऊ आज 00:21:34 के बाद कभी कुपथ नहीं करूंगा आज के बाद ऐसा नहीं करूंगा आज के बाद वैसा नहीं करूंगा ठीक है 00:21:40 भाई डॉक्टर दवा दारू करता है ज्यादा करता है तो एक इंजेक्शन लगा देता है थोड़ी देर में दर्द ठीक 00:21:48 हो जाता है जब दर्द ठीक हो जाता है फ ति सब भूल जाता है थोड़े दिन के बाद तो 00:21:53 फिर वही कुपथ करने लगता है बस यही यही दशा सबकी है 00:21:58 किसी बात को लेकर मन दुखी हुआ पीड़ित हुआ अब ऐसा नहीं करेंगे अब वैसा नहीं करेंगे ठीक है मन 00:22:04 स्वस्थ हो गया थोड़ी देर के लिए स्वस्थ हुआ फिर वही कुपथ किया तो कहरे भाई यह सब साधन करने 00:22:11 से थोड़ी देर के लिए यय मन के रोग आपको लगे कि भाई अब नष्ट हो गए अब हमारा मन 00:22:16 स्वस्थ हो गया पर विषय को पथ पाई अंकुरे बोले विषय का 00:22:28 कुपथ प्राप्त करके फिर अंकुरित हो जाते हैं और यह स्थिति किसकी है मुनि ह हृदय का नर बा जी 00:22:39 कह रहे भाई बड़े बड़े ज्ञानियों की बड़े बड़े मुनियों की यह दशा है मनुष्य बेचारा किस गिनती में यही 00:22:45 शब्द शि काग बसु जी कह रहे बोले बड़े बड़े ऋषि मुनियों की यह स्थिति है कि फिर फिर उनके 00:22:52 मन में यह पाप का बीज अंकुरित होता है तभी श्री महाप्रभु जी कह रहे पारा सरसर 00:22:58 कलप कामिनी मन फ्या परे देह दुख द्वंद कौन क्रम काल नि अरे भाई बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी तपस्वी मोहित 00:23:08 हो जाते हैं मनुष्य की गिनती किसम है उसकी गिनती कौन करे अब थोड़े गरुड़ जी निराश होने लगे बोले 00:23:18 भाई देखो एक तो यह कह रहे हैं सभी इन रोगों से रोगी है और कुछ किए से रोग दूर 00:23:23 नहीं होते और अगर कोई बढ़िया बड़ा परिश्रम करके बड़ा 00:23:28 करके इनकी औषधि कर भी ले तो कर थोड़ी देर के लिए रोग दूर होता है फिर वह बीज अंकुरित 00:23:33 होता है तो गरु जी थोड़ा निराश होने लगे बोले भाई फिर उस उस रोग का क्या निदान जिसकी कोई 00:23:41 औषधि ना हो और हो भी और अगर औषधि कोई हो भी बोले थोड़ी देर के लिए व लाभ देती 00:23:48 हो और फिर रोग के हो जाने की आशंका हो व्यक्ति जाए कहां फिर किसके पास जाए किसकी शरण में 00:23:56 जाए 00:24:00 फिर अंत में काग ब सुंडी जी कह रहे हैं अब अब यह चर्चा विश्राम की ओर है अंत में 00:24:05 काग ब सुंडी कह रहे राम कृपा ना सही सब रोगा जो यही भाति बने 00:24:24 संजोगा नहीं एक एक युक्ति है जिससे यह रो 00:24:28 सदा सदा के लिए समूल नष्ट हो जाते हैं और भगवान कृपा करें और ऐसा संयोग बन जाए और व 00:24:34 संयोग क्या है ब्रम भूल में भटकते उदय हुए जब भा मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की ला 00:25:00 संयोग बने और संयोग क्या है बोले राम कृपा और राम कृपा होती है तो क्या होता है अब मोही 00:25:07 भाव भरोस 00:25:11 हनुमंता बिन हरि कृपा मिल नहीं 00:25:19 संता दो दिन से मैं आपको यही तो निवेदन कर रहा हूं भाई अपना आंचल फैलाकर 00:25:31 कर जोड़ कर मस्तक झुका कर सजल नेत्र बार-बार एक बार नहीं बार-बार बस प्रभु से यही कहिए प्रभु अपने 00:25:39 किसी अपने किसी प्रिय जन का अपने किसी निज जन का हमको संग दीजिए हमारे जीवन में कोई संत आए 00:25:47 हो कोई ऐसो रे भेटे 00:25:54 सं मेरी ला है 00:25:57 ली चिंत ठाकुर सयो मेरो रंग 00:26:08 ला हो कोई ऐसो रे 00:26:14 सुखदाई जिन हरि की कथा सुनाई इस भेटे गति हो 00:26:26 हवा 00:26:28 आपने कितनी कितनी बातें प्रभु के सन्मुख जाकर कही होगी पर कहने योग्य बात एक है मांगने योग्य वस्तु तो 00:26:34 यह एक वस्तु है एक वस्तु यह मांगना चाहिए प्रभु से और इसको मांगने के लिए संत आज्ञा दे रहे 00:26:43 हैं अ एक बार नहीं बार बार बर मा बार बार मांग रहा हूं प्रभु में हरख देहु 00:26:56 श्रीरंग 00:26:57 पद सरोज अन पायनी भक्ति सदा 00:27:12 सत्संग इसलिए मैं भी नित्य गाता हूं और आपसे भी गवाता हूं देखो हमारे शब्दों में तो ऐसी सामर्थ्य नहीं 00:27:19 है प्रभु के कान तक पहुंचे पर ये तो संतों की वाणी है ना ये तो संतों की वाणी 00:27:29 लाश का पत्ता भी निज मंदिर में पहुंच जाता है कमल के पुष्प के संग ऐसे संतों की वाणी है 00:27:36 हम भी अपना स्वर अपना थोड़ा भाव इसमें मिलाए तो यह यह शब्द प्रभु के कान तक पहुंचते हैं प्रभु 00:27:42 सुनते हैं स्वीकारते हैं इसलिए कह रहे बार बार बरमा जन के चरण बस मेरे हीय रे जन 00:27:57 के चरण बस मेरे हीय रे संग पुनीता 00:28:11 देई संग पुनीता देही सब कहिए जन के चरण बस में रही है रेन के चरण 00:28:31 बही संग पुनीता 00:28:39 देही संग गुनीना दे जनकी धूर देहु कृपानिधि जनकी दूर 00:28:58 कृपानिधि नानक के सुख 00:29:07 ही नानक के सुख ही नानक के सुख 00:29:20 ही नानक के 00:29:26 सुख 00:29:27 जिनके चरण बस में रही हैरे जिनके चरण बस में रही संग पुनीता 00:29:47 देही संग पुनीता देही जनकी धूर 00:29:57 देहु कृपा निधी चन की दूर देहु कृपा नानक के सुख 00:30:14 ही नानक के सुख यही नानक के सुख ही 00:30:28 नानक के 00:30:32 सुख जन के चरण बस मेरे ही है रे जन के चरण बस में रही है जन के चरण बस 00:30:51 में रही हैन के चरण 00:31:03 राम कृपा ना सही सब रोगा और राम की कृपा क्या है ऐसा कोई संत मिले ठाकुर से मेरो रंग 00:31:14 लावे और फिर कह रहे ऐसा संत मिले तो सदगुरु बैद वचन 00:31:26 विश्वासा 00:31:27 ध्यान दीजिए चर्चा जहां से आरंभ हुई थी वहीं जा रही है जब श्री गरुड़ जी गए थे ब्रह्मा जी 00:31:35 के पास तो ब्रह्मा जी जान गए कि इनको मन का रोग हो गया है और मन के रोग की 00:31:41 औषधि केवल गुरु के ही पास में होती है तभी गरुड़ जी से कहा था कि यहां से सीधे कैलाश 00:31:48 पर जाना देवाधि देव महादेव के चरणों में अपने मन की ये व्यथा निवेदन करना और उनके अतिरिक्त किसी और 00:31:56 से ना कहना 00:31:58 उन्हीं से जाकर कहना मन के रोग का वैद तो गुरु ही है क भगवान कृपा करें यह संयोग मिले 00:32:08 और सदगुरु रूपी वैद मिल जाए सदगुरु वैद औषधि क्या है वचन विश्वासा जो गुरु के मुख से नाम श्रवण 00:32:23 किया है ना उसका उसका भरोसा उसका उसका विश्वास 00:32:29 गुरु के मुख से जो नाम श्रवण किया है गुरु की जो वाणी है गुरु का जो शब्द है उसका 00:32:35 विश्वास सदगुरु वैद वचन 00:32:43 विश्वासा पर कबीर कहते हैं कि राम नाम की औषधि सतगुरु दई बताए औषध खाए और पथ करे ताकि वेदन 00:32:56 जाए 00:32:57 सदगुरु वैद वचन विश्वासा पर जब वैद औषधि देता है तो कुछ परहेज भी तो बताता है और मुझे ऐसा 00:33:07 लगता है कि जितना कार्य औषधि करती है उतना ही कार्य परहेज भी करता है संयम भी उतना ही कार्य 00:33:14 करता है औषधि लेते रहो और कुपथ भी करते रहो तो तो रोग नहीं जाता है और कभी-कभी यह भी 00:33:22 देखने में आता है औषधि ना करो और 00:33:27 केवल आप अपने आप को कुपथ से बचा लो तो जो हमारी जीवनी शक्ति है वो थोड़ी थोड़े से काल 00:33:34 में शरीर को फिर स्वस्थ कर देती है भगवान ने भगवान ने तो आपको मुझे सारी व्यवस्था करके भेजा 00:33:45 है सारी व्यवस्था तो कहरे सदगुरु वैद वचन विश्वासा एक परहेज भी बताया है सन 00:33:56 संजम यह ना विषय के आसा संजम यह ना विषय के आस आपको याद हो कभी हमने यहां चर्चा की 00:34:12 थी कि हम आदि बात मानते हैं महापुरुषों की सूरदास जब क सब तज भजिए नंद कुमार नंद कुमार का 00:34:23 भजन तो करेंगे पर सबको छोड़ते नहीं मदास कहते 00:34:27 मैं अपना मन हरिस जोर हरि स जोर सबन स तोर यहां कह रहे बोले परहेज क्या है संयम क्या 00:34:35 रखना है क संयम ने यह ना विषय के आसा गुरु के चरणों में अपना मस्तक रखा गुरु से नाम 00:34:44 जैसी अमोलक वस्तु पाई चिंतामणि हरि नाम है सफल करे सब काम गुरु ने आपको चिंतामणि दिया है उसके बाद 00:34:53 फिर संसार के विषय से सुख की आशा ना रखिए 00:34:57 यह कार्य आपको करना पड़ेगा अपने मन को यह बात समझा पड़ेगी अपने मन को यह बोध देना पड़ेगा झंझोट 00:35:03 कर कि भाई अब मेरे सुख का विधान प्रभु करेंगे जो भाग्य का लिखा है व आता जाता रहेगा उसके 00:35:11 लिए कुछ करना नहीं है जो सुख दुख लग रहे देहस व तो आते जाते 00:35:20 रहेंगे कान खोलकर सुन लेना भाई ना बुलाने से सुख आता है ना भगाने से दुख जाता है 00:35:27 बुलाने से सुख आता नहीं और भगाने से दुख जाता नहीं तो प्रारब्ध का है लिखा है जो उसका समय 00:35:34 नियत है आएगा भी और जाएगा भी आप कितना रोते बिल बिलाते रहो कितना नाचते कूदते रहो रती घटे ना 00:35:43 तिल बढ़े जो लिख दी करता ना घटेगा ना बढ़ेगा कितना बड़ा आश्चर्य है जहां हमारे करने से कुछ नहीं 00:35:56 हो ररहा है वहां हम अपनी सारी शक्ति लगाए जा रहे हैं और जहां पुरुषार्थ करने से मनुष्य सदा के 00:36:06 लिए सुखी हो जाता है वहां से वहां से जीव विमुख रहता है यह माया श्री कृष्ण की मोयो सब 00:36:16 संसार जहां पुरुषार्थ बिल्कुल व्यर्थ है जो भूमि बंजर है जहां पर कुछ है नहीं संभावना वहां सारा परिश्रम कर 00:36:26 रहा 00:36:31 और जहां राई के सम भजन को मानत मेरु समान वहां से जीव विमुख रहता है यही भगवान की माया 00:36:42 है और इस माया ने मोयो सब संसार व काक ब सुंडी कह रहे हैं बो बड़े बड़े ऋषि मुनि 00:36:49 इससे पीड़ित है भाई नर बिचारा मनुष्य विचारा क्या करेगा तो क भगवान कृपा 00:36:56 करें सदगुरु मिले और फिर उससे बड़ी कृपा क्या है सदगुरु वैद वचन विश्वा भाई डॉक्टर की बात माननी भी 00:37:07 तो पड़ेगी आप संसार के सबसे श्रेष्ठ डॉक्टर से औषधि ले आओ केवल सबसे श्रेष्ठ डॉक्टर से औषधि लेने से 00:37:18 थोड़ी ठीक हो जाओगे भाई समय पर औषधि का सेवन भी करना पड़ेगा पत्थ कुपथ का विचार भी तो करना 00:37:25 पड़ेगा 00:37:29 क सदगुरु बैद सदगुरु रूपी वैद मिले और फिर उसके वचन पर विश्वास हो अ साथ साथ में एक परहेज 00:37:38 भी करना है संयम यह ना विषय के आसा यही कपट हम करते हैं भगवान से हम यही कपट सदा 00:37:49 सदा निरंतर करते हैं भगवान से और वो कह रहे मो कपट छल छिद्र न भावा हम यही कपट करते 00:37:55 हैं हमको सुख की आशा 00:37:56 है कहीं से यहां से वहां से इससे उससे भाई यह देगा हमें कुछ य ऐसा करेगा हम सुखी हो 00:38:04 जाएंगे इससे कुछ मिलेगा हम सुखी हो जाएंगे यह परहेज करना है भाई यह संयम रहे और मैंने आपको कहा 00:38:13 इसका अभ्यास करना पड़ेगा झंझोट झंझोट कर अपने मन को आपको समझाना पड़ेगा कि ना नहीं मिलेगा यहां सुख और 00:38:21 मिल भी जाए और यदि मिलता भी हो तो बने तो 00:38:26 रघुवर पे बने और बिगड़े तो भरपूर जो रघुवर को ना रुच वा बन बे में धू एक बार मैं 00:38:43 कह रहा हूं एक बार यह बाजी ऐसे भी खेल कर देखो और मान लो हमारी बात आनंद आएगा आपको 00:38:50 निश्चिंत हो जाओगे निर्भर हो जाओगे आप भी देखोगे कि पतवार के 00:38:56 बिना ही मेरी नाव चल रही है और हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है चरण कमल बंद हरि 00:39:12 राई चरण कमल 00:39:19 बंद जा की कृपा पंगु गिरि लंग 00:39:34 रंक चले सिर छत्र 00:39:47 धराई चरण कमल बंदो हरि राई 00:40:03 आजकल जैसे लोग पैसा देकर जाते हैं मोटिवेशनल स्पीकर्स की स्पीच सुनने के लिए रुपया देकर जाते हैं यह तो 00:40:13 ऐसा हुआ जैसे कोई उत्साह खरीदने जा रहा हो जसे कोई शांति खरीदने जाते हैं आजकल लोग सोते वहां जाएंगे 00:40:19 शं शांति हो जाएगी मन शांत हो जाएगा जैसे यहां जाते हैं लोग 00:40:26 ऐसा लगता हैसे उत्साह खरीदने जा रहा हो जैसे दुकान में उत्साह बट रहा 00:40:32 हो हालांकि देख रहे हैं वह मोटिवेशनल स्पीकर्स की आज क्या दशा हो रही है व बेचारे खुद कहां 00:40:44 है हमको भी जीवन में मोटिवेशन मिला हमको भी जीवन में उत्साह मिला पर हमारे मोटिवेशनल स्पीकर्स तो यह संत 00:40:55 थे जो यह कह 00:40:56 कहते हैं नीच ऊच करे मेरा गोविंद नीच ही ऊच प्र मेरा गोविंद 00:41:25 हु 00:41:28 हमको यहां से उत्साह मिला हम भी निराश हुए 00:41:33 थे कभी बड़ी विचित्र परिस्थितियां आ गई थी अब कहां देखें अब किसकी ओर देखें कोई भी एक पग साथ 00:41:43 चलने को तैयार नहीं है तब नीचे ऊंच करे मेरा गोविंद और काह पे ना डरे ऐसी लाल तुझ बिन 00:41:53 कौन करे 00:41:56 ऐसी 00:42:00 लाल गरीब निवाज गु सैया मेरो गरीब निवाज गु सैया मेरो गरीब निवाज गु सैया मेरा माथ है 00:42:26 छतर 00:42:29 धर ऐसी लाल तुझ बिन कौ करे ऐसी 00:42:43 लाल एक बार बस आशा एक राम जी से एक राम जी से अब कोई कहेगा क्या सिखा रहे हैं 00:42:52 आप कुछ नहीं करें हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाए एक बार भगवान का भरोसा 00:42:56 करके तो देखो जहां की कृपा पंगु गिरी लंग है जब कोई भरोसा करता है तो फिर उसके रथ का 00:43:02 सारथी वो स्वयं होकर बैठता है और सामने समुद्र के जैसी दस्तर सेना हो उसको भी पार करा के अंत 00:43:09 में विजय श्री का प्रसाद देता है एक बार करके तो देखिए 00:43:18 आप बस संजम यह ना विषय क्या 00:43:25 आसा