Saturday, August 1, 2026

अंत में श्री गरुड़ जी ने पूछे ये 7 प्रश्न || 38 || Shree Hita Ambrish Ji

अंत में श्री गरुड़ जी ने पूछे ये 7 प्रश्न || 38 || Shree Hita Ambrish Ji 


https://youtu.be/pUjfYi9IMFo
First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given 1. सात प्रश्नों में छिपा राम कथा का गूढ़ संदेश | The Deeper Message Behind the Seven Questions of Ram Katha 2. राम कथा की महिमा और सात प्रश्न, The Glory of Ram Katha and the Seven Questions  3. दुर्लभ मानव जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान, The Rarest Gift: Human Life and Spiritual Wisdom  GIST:  [00:38] गरुड़ जी, राम कथा सुनने के बाद भी अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए सात प्रश्न पूछते हैं। Garuda Ji, even after listening to the Ram Katha, asks seven questions to satisfy his curiosity. [03:00] कथा सुनने की अतृप्ति (और सुनने की इच्छा) और जन-कल्याण के लिए 'प्रसाद' को बाँटने का भाव। The reason is the insatiable desire to hear the Katha and the feeling of sharing its 'Prasad' for the welfare of all. [10:21] राम कथा को 'मंगल करण' और 'कलि मल हरण' बताया गया है जो मन के विकारों को धो देती है। Ram Katha is described as 'Mangal Karan' and 'Kali Mal Haran', which washes away the impurities of the mind. [13:50] आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपनी प्रशंसा सुनने से बचने और उसे भगवान को अर्पित करने की सीख। For spiritual progress, one should avoid listening to one's own praise and offer it to God. [25:40] गरुड़ जी के सात प्रश्न: दुर्लभ शरीर, सबसे बड़ा दुख/सुख, संत/असंत लक्षण, पाप/पुण्य और मानस रोग। Garuda Ji's seven questions concern the rare human body, the greatest sorrow and happiness, the characteristics of saints and non-saints, sin and virtue, and the diseases of the mind. [27:51] पहले प्रश्न का उत्तर: मनुष्य शरीर सबसे दुर्लभ है, जिसे देवता भी पाने के लिए लालायित रहते हैं। The answer to the first question: The human body is the rarest, and even the demigods long to attain it. [35:42] भारत भूमि पर जन्म और जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों की विशेषता का वर्णन। The discourse describes the significance of being born in the land of Bharat and the importance of the various samskaras performed from birth to death. 7 questions & answers: श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में पक्षीराज गरुड़ जी द्वारा श्री काकभुशुण्डि जी से पूछे गए सात प्रश्न और उनके संक्षिप्त उत्तर: 1. सबसे दुर्लभ शरीर कौन सा है? उत्तर: मनुष्य शरीर (नर तन)। यह चर-अचर सभी जीवों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, क्योंकि यह मोक्ष, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति प्राप्त करने का साधन है। 2. सबसे बड़ा दुःख कौन सा है? उत्तर: दरिद्रता (नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं)। 3. सबसे बड़ा सुख कौन सा है? उत्तर: संतों का मिलना व सत्संग (संत मिलन सम सुख जग नाहीं)। 4. संत और असंत का सहज स्वभाव क्या है? उत्तर: संत: मन, वचन और कर्म से परोपकार करना और दूसरों के कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहना (भोजपत्र के वृक्ष के समान)। असंत (दुष्ट): बिना किसी स्वार्थ के अकारण ही दूसरों को दुःख पहुँचाना और दूसरों की संपत्ति नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाना (ओलों के समान)। 5. वेदों में वर्णित सबसे बड़ा पुण्य कौन सा है? उत्तर: अहिंसा एवं परोपकार (परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा)। 6. सबसे बड़ा एवं भयंकर पाप कौन सा है? उत्तर: परनिंदा—दूसरों की बुराई या आलोचना करना (पर निंदा सम अघ न गरीसा)। 7. मानस रोग (मानसिक व्याधियाँ) क्या हैं और उनका उपचार क्या है? उत्तर: सभी मानसिक रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। काम वात है, लोभ कफ है और क्रोध पित्त है। अहंकार, ईर्ष्या, तृष्णा आदि असाध्य रोग हैं। उपचार: सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर विश्वास, विषयों से वैराग्य (परहेज) और श्री राम जी की भक्ति रूपी संजीवनी बूटी ही इसका एकमात्र उपचार है। https://youtu.be/pUjfYi9IMFo ---
Full Transcript
00:00:02 नाथ 00:00:08 मोहि निज सेवक 00:00:17 जानी 00:00:21 सप्त 00:00:24 प्रश्न मम कहा ह. 00:00:38 बखानी नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रश्न मम कह 00:00:46 बखानी मंगल करण कलि मल 00:00:53 हर श्री रघुनाथ 00:00:58 गाथा. 00:01:00 श्री काग भूसुंडी जी के मुख से श्रवण करने के पश्चात गरुड़ जी यह बात कहते यह बात बड़ी विचित्र 00:01:11 है प्राय करके भोजन के बाद ही तो मिष्ठान पाया जाता है ना महा 00:01:25 मधुर परम विमल श्री राम कथा श्रवण करने के. 00:01:29 बा भी क्या कोई प्रश्न रह सकता है क्या कोई संशय रह सकता है क्या अभी कुछ और ऐसा है 00:01:36 जो गरुड़ जी को जानना है क्योंकि पूर्व में ही श्री काग सुंडी जी तीन बार यह बात कह चुके 00:01:43 कि जो मैं जानता हूं जो भगवत कृपा से मैंने अनुभव किया है सो सब मैंने आपको निवेदन कर 00:01:55 दिया भक्ति दयनी श्री हरि कथा है. 00:02:01 और जब श्री काग बसु जी जैसा वक्ता हो जिसकी स्तुति महादेव करते हैं और गरुड़ जी जैसा श्रोता हो 00:02:10 तो निश्चित रूप से निश्चित रूप से ऐसी कथा ऐसा सत्संग कहने वाले और सुनने वाले दोनों के हृदय में 00:02:20 विशुद्ध भक्ति भाव की प्रतिष्ठा कर देता है स्थापना कर देता 00:02:28 है. 00:02:30 कथा का अर्थ ही यही है कम 00:02:35 सुखम स्थापति इति कथा जो सुख की परम सुख की स्थापना कर दे हृदय में फिर भी गरुड़ जी प्रश्न 00:02:46 पूछते हैं तो महापुरुषों ने विचार किया है कि इतनी मीठी इतनी मधुर राम कथा सुनने के बाद फिर गरुड़ 00:02:56 जी ने प्रश्न किए हैं ऐसा क्यों. 00:03:00 दो कारण है एक तो सुनते सुनते गरुड़ जी को तृप्ति नहीं हो रही है व और सुनना चाहते हैं 00:03:10 और सुनना चाहते हैं और गरुड़ जी के प्रश्न बता रहे हैं कि गरुड़ जी को व जो रस विशेष 00:03:20 है उसकी प्राप्ति हो गई है जिसका संकेत श्री गोस्वामी जी करते हैं वैसे देखो कथा का परम फल तो 00:03:28 यही है सेवा का. 00:03:29 फल क्या है मैं आपसे पूछूं सेवा का फल क्या है सेवा ही है भजन का फल क्या है भजन 00:03:38 ही है भजन का फल भजन है सेवा का फल सेवा है ऐसी कथा श्रवण का फल क्या है कथा 00:03:45 श्रवण का फल कथा श्रवण का प्रसाद यही है कि श्रवण में अनुराग हो जाए नारद जी ने अपने भक्ति 00:03:51 सूत्र में इसे भी एक प्रकार की भक्ति कहा है जब भगवान की कथा श्रवण में अनुराग हो जाए प्रीति 00:03:58 हो जाए. 00:04:01 तो गरुड़ जी को कथा श्रवण में प्रीति हो गई 00:04:07 है और महादेव महादेव तो इसका प्रसाद यही बताते हैं बिन सत्संग न हरी कथा तेही बिन मोह न 00:04:24 भा मोह गए बिनु रा. 00:04:31 होही न दृढ़ 00:04:38 अनुरा यह यात्रा जो यहां से आरंभ होती है व प्रभु के श्री चरणारविंद का दृढ़ अनुराग प्रदान करके ही 00:04:45 विश्राम लेती है तो गरुड़ जी के मन में कथा के प्रति जो अनुराग है श्रवण के प्रति जो अनुराग 00:04:51 बहुत बड़ी बात है य देखो कहते सुनते तो आप मैं हम सब है ही परव जो रस विशेष. 00:05:01 कि कभी और अंतर को तृप्ति हुई नहीं आप देखो कथा के आदि वक्ता भगवान शंकर हैं और मैंने पूर्व 00:05:10 भी आपको शायद एक बार संकेत किया था कि या तो वह भजन में रहते हैं या तो ध्यान में 00:05:16 रहते हैं अन्यथा केवल एक ही कार्य करते हैं हरि की कथा सुनते हैं सुनाने वाला मिल जाए तो सुनते 00:05:25 हैं सुनने वाला मिल जाए तो सुनाते हैं. 00:05:32 रस रस विशेष जिसको प्राप्त हो जाए वही कृत कृत्य है तो एक तो गरुर जी को तृप्ति नहीं हो 00:05:38 रही व कह भाई ऐसा वक्ता मिला है और सुन ले और सुन ले और सुन ले और दूसरी बात 00:05:45 कि प्रसाद सदा बांट कर पाना चाहिए देखो यह जितना भी संतों के मुख से प्रकट हुआ है यह भगवान 00:05:54 का जस रस जो भी है जो आज तक हम जैसे जीवों का उद्धार कर रहा है कल्याण कर. 00:05:59 कल्याण का हेतु कारण बन रहा है उसके मूल में क्या है उसके मूल में संतों की कृपा ही है 00:06:06 उसके मूल में संतों का अनुग्रह है गरुड़ जी ने मन में विचार किया भाई ऐसा ऐसा संयोग बना है 00:06:13 और बार-बार तो बनत नहीं यह संजोग अनूप यह तो आप और मैं जाने कब समझेंगे पर जिन महापुरुषों ने 00:06:20 समझा वह तो कह रहे हैं धन दरा सुत लक्ष्मी तो पापी के भी हुए पर संत समागम हरि कथा 00:06:27 तुलसी दुर्लभ दोए. 00:06:29 फिर जाने कब मिलेगा बड़ी बात गोस्वामी जी कह रहे तात स्वर्ग अपवर्ग सुख और धरि तुला एक अंग तुलना 00:06:40 ताही सकल मिली जो सुख लव सतसंग जो की त्य बात भगवान वेदव्यास श्रीमद् भागवत में कहते हैं तुलम लवे 00:06:48 नापना स्वर्गम ना पुनर भव भगवत संगी संगस मृत नाम 00:06:58 किमता. 00:06:59 तो गरुड़ जी ने मन में विचार किया भाई ऐसा ऐसा वक्ता हमको प्राप्त हुआ है राम कथा के अद्भुत 00:07:06 अद्वितीय गायक हैं जिस दिन इस प्रसंग का आरंभ हुआ था मैंने आपको यही निवेदन किया था कि ऐसे तो 00:07:14 ऐसे तो सारी मानस ही महा मधुर है मैंने पहले भी आपको कहा कि व्यवहार जगत की छोटी से छोटी 00:07:23 बात से लेकर अध्यात्म जगत के श्रेष्ठतम सिद्धांत का समावेश श्री गोस्वामी जी ने मानस में कर दिया है. 00:07:30 ये तो भव सिंधु पार करने के लिए नौका है नौका है मंगल करण कलि मल हरण तुलसी कथा रघुनाथ 00:07:50 की एक और बड़ी सुंदर बात है मानस के विषय में मैं कहना चाहूंगा गोस्वामी जी कह तीन प्रकार के 00:07:58 जीव है. 00:07:59 संसार में विषय साधक सिद्ध सयाने त्रिविध जीव जग वेद पखा अच्छा तुलसी बाबा की मानस ऐसी है यह राम 00:08:10 कथा ऐसी है जो सबको प्रिय लगती है थोड़ी देर के लिए तो विषय को भी इसमें आनंद आता है 00:08:18 साधक तो रस प्राप्त करता ही है और सिद्ध है वह तो भाई उसके लिए तो ये ये शब्द नहीं 00:08:24 है उसके लिए तो यह अमृत है वैसे जहां जहां श्रीमद् भागवत में. 00:08:29 कथा की बात कही गई है ना वहां कथा सुनने की बात नहीं कही गई है पिवती भगवत आत्मन सता 00:08:36 कथामृत श्रवण पुटेन क श्रवण पुटो से इसका पान करिए और पान भी कैसे करिए कैसे कैसे पिए श्रवण पुटो 00:08:48 से इसको कैसे पिए करें बहुत सावधान होकर तस्म महन मुखरता मधु चरित्र पियूष शेष सरित परित श्रवंती और ताय 00:08:58 पिव. 00:09:00 नप गाढ करण स्तान भय शोक मोहा जो सावधान होकर कथा श्रवण करे सावधान माने कर एक शब्द भी एक 00:09:12 शब्द भी छूट नहीं जाए ऐसे दत चित होकर जो श्रवण पुटो से इस कथा अमृत का पान करता है 00:09:18 क व सुनते सुनते भूख प्यास भय शोक मोह नस भय शोक मोहा सुनते सुनते इन पंच क्लेश से. 00:09:29 हो जाता कथा अमृत है कथा अमृत है कभी पहले मैंने आपको निवेदन किया था प्रत्येक शब्द में एक ऊर्जा 00:09:39 होती है या तो सकारात्मक ऊर्जा होती है नकारात्मक ऊर्जा होती है शब्द जैसे स्पर्श करता है आपकी चेतना का 00:09:47 उस क्रिया की प्रतिक्रिया होती है शब्द में स्पंदन है व जैसे कान से भीतर जाएगा भीतर कुछ हलचल करेगा 00:09:54 एक शोभ उत्पन्न करता है शब्द जब भीतर जाता है क्योंकि शब्द में शक्ति है सकरा. 00:09:59 भी है नकारात्मक भी है लेकिन य जो कथा है इसमें ना सकारात्मक कोई ऊर्जा है ना नकारात्मक इसमें भगवती 00:10:06 ऊर्जा है इसमें भगवती शक्ति है इसीलिए इसलिए बड़े विश्वास से तुलसी बाबा कह रहे हैं मंगल करण कलि मल 00:10:21 हर तुलसी कथा रघुनाथ की. 00:10:30 मंगल करण कलि मल संसार की संसार की कोई वार्ता मैं कह रहा हूं संसार के शब्द कोश में से 00:10:41 कोई एक शब्द आप ऐसा ले आइए जो मन की हलचल को शांत कर सके देखो प्रशंसा सुनोगे तो भी 00:10:50 मन में क्षोभ होगा निंदा सुनोगे तो भी मन में क्षोभ होगा अच्छा सुन लो तो भी मन में हलचल 00:10:56 है बुरा सुन लो तो भी मन में हलचल है संसार की वार्ता. 00:10:59 तो मन में हलचल पैदा करने वाली है 00:11:04 ना नारद जी को मोह हुआ शब्द स्पर्श रूप रस गंध उसमें नारद जी ना तो स्पर्श से ना रूप 00:11:19 से ना रस से ना गंध से इनमें से किसी से भी नारद जी चलायमान नहीं हुए नारद जी कैसे 00:11:24 चलायमान हो गए नारद जी का मन कहां डोला शब्द से प्रशंसा सुन ली अपनी. 00:11:29 वो जो प्रशंसा के शब्द कान में गए ना उसने मन में शोभ पैदा कर दिया कितनी सुंदर अप्सराएं कामदेव 00:11:38 लेकर आया है अपने साथ में नार जी ने देखा भी नहीं उनकी तरफ दृष्टि उठाकर भी नहीं देखा व 00:11:45 जिस मादक वातावरण की रचना कामदेव ने की नारद जी उससे भी उससे भी हिले नहीं ना दृष्टि से देखा 00:11:55 ना ना उस उस गंध ने कोई विकार पैदा किया स्पर्श. 00:11:59 की भी इच्छा नारद जी के मन में नहीं हुई वो रूप देखकर स्पर्श की भी इच्छा नारद जी के 00:12:05 मन में नहीं हुई कहां कहां मन हिल गया वो जो प्रशंसा के शब्द कान में पड़े ना जाते जाते 00:12:12 कामदेव प्रशंसा करता गया कि आप जैसा कोई महापुरुष नहीं है आपसे मैं परास्त होकर जा रहा हूं मुझे आज 00:12:20 तक भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं हरा पाया आपने हरा दिया पर जाते जाते कामदेव यह बाण छोड़ता गया वो 00:12:26 पंच बाण तो नारद जी को नहीं लगे. 00:12:29 वो तो नारद जी का कुछ नहीं बिगाड़ सके लेकिन वो शब्द से जो प्रशंसा के शब्द भीतर गए कान 00:12:35 से व जो प्रशंसा के शब्द भीतर गए उसने मन में शोभ पैदा कर दिया और कहां जाकर पहुंचे नारद 00:12:42 जी मोह हो गया गोस्वामी जी ने यह नहीं कहा है कि नारद जी को काम विकार ने सताया या 00:12:50 लोभ हुआ नारद जी गोस्वामी जी कह रहे नारद जी को मोह हो गया तो शब्द एक शोभ पैदा करता 00:12:58 है अंदर. 00:12:59 केवल हरि की कथा ही है जो मन को शांत करती है संसार की वार्ता मन में विकार पैदा करती 00:13:04 है व भली बुरी कोई भी हो आपकी कोई बहुत प्रशंसा करे तब तो और सावधान रहना निंदा जो कर 00:13:12 रहा है वह तो आपका हिताशी है जो आपकी आलोचना कर रहा है जो आपकी निंदा कर रहा है जो 00:13:19 आपको कटुर शब्द कह रहा है व तो आपका हिताशी है जो प्रशंसा कर रहा है ना उससे सावधान रहना 00:13:25 कभी शायद मैंने आपको कहा भी था. 00:13:29 मुझे ऋषिकेश में एक महात्मा ने कहा था बोले बेटा जीवन में यि आध्यात्मिक उन्नति करनी है मुझे संत के 00:13:37 शब्द भली प्रकार से स्मरण है आज तक गूंजते हैं मेरे मेरे उर अंतर में बड़ी गहरी दृष्टि से मुझे 00:13:44 देखते हुए उन्होंने कहा था बोले बेटा जीवन में अगर आध्यात्मिक उन्नति चाहते हो तो अपनी प्रशंसा करने वाले लोगों 00:13:50 से दूर 00:13:54 रहना प्रशंसा स्वीकार ना करना. 00:13:58 प्रशंसा जैसे ही हो व सीधे-सीधे भगवान को निवेदन कर देना इस संसार में कोई ऐसा नहीं है जो प्रशंसा 00:14:05 पचा सके केवल प्रभु पचा सकते हैं यह सामर्थ्य केवल इन्हीं में ही 00:14:12 है मैं कई बार आपको उदाहरण देता हूं ना कितना महत कार्य करके श्री हनुमान जी आ गए भगवान तो 00:14:19 मन में यह विचार कर रहे कि अब मैं इनको क्या दूं और जब श्री रघुनाथ जी ने थोड़ी प्रशंसा 00:14:25 की तो हनुमान जी क्या कहकर उठते त्राहि त्रा. 00:14:29 भगवंत यही शब्द श्री हनुमान जी कह रहे हैं क प्रभु रक्षा करिए मेरी रक्षा करिए 00:14:41 नाथ ना कछु मोर 00:14:51 प्रभुताई सो सब तब. 00:15:05 रघुराई ऐसे कभी जब हो ना प्रशंसा आपकी ऐसे बस प्रशंसा भगवान को निवेदन करते चलना आप स्वस्थ रहोगे प्रशंसा 00:15:15 स्वीकार नहीं 00:15:19 करना तो मैं शब्द की बात कह रहा था आपसे इन शब्दों में भगवती ऊर्जा है ज्ञान और वैराग्य का 00:15:27 संस्कार. 00:15:28 पुष्ट करती है कथा जो भगवान की कथा है यह जो वार्ता है य ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को 00:15:37 पुष्ट करेगी और जो मलिन संस्कार हमारे भीतर जन्म जन्मांतर से हमने एकत्रित कर लिए हैं उनका क्षय करती है 00:15:46 इसीलिए गोस्वामी जी कह रहे हैं मंगल करनी क्या मंगल करती है जीव का मंगल कैसे होता है ज्ञान और 00:15:55 वैराग्य सेही तो जीव का मंगल होता है. 00:16:01 संसार के स्वरूप का ज्ञान हो जाए और उससे वैराग्य हो जाए इसी से ही तो जीव का मंगल है 00:16:08 इससे दृष्टि हटे तभी तो आत्म कल्याण की बात मन चित्त में आए संसार से दृष्टि तो हटे कभी आपसे 00:16:17 मैंने कहा था ना भाई भगवान से हमको आशा तो है पर अभी संसार से निराशा नहीं हुई अभी आशा 00:16:23 का बंधन यहां बंधा है अभी डोर यही पर बंधी है तो. 00:16:28 मंगल करती है ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को पुष्ट करती है मंगल करनी कलि मल और जो मैले कुचले 00:16:40 संस्कार हमारे भीतर है जो जन्म जन्मांतर से हमने अर्जित किए हैं उनको धो देती है यथा यथा आत्मा परि 00:16:49 मृते स मत पुण्य गाथा शव विधान तथा तथा पत. 00:16:58 तव सूक्ष्म चरवा जन सम प्रयुक्त भगवान का श्रीमुख वाक्य सुनते रहोगे सुनते रहोगे क्या होगा देखते देखते व मैले 00:17:13 कुचले संस्कार जो मन में है ना जो बारबार धकेल हैं अशुभ की ओर अपवित्र की ओर बड़ी विनम्रता पूर्वक 00:17:24 मैं आपसे कहूंगा सावधान रहना मन का एक अपवित्र स. 00:17:28 कल्प पतन के बड़े गहरे अंधकार में आपको धकेल सकता है एक अपवित्र संकल्प इसलिए वेदों की रचा है भगवती 00:17:37 श्रुति कह रही है तन में मन शिव संकल्प मस्तु प्रभु की कृपा हो हमारा संकल्प पवित्र हो हमारा संकल्प 00:17:47 शुभ 00:17:51 हो इसीलिए कहा जाता है आपसे शुभ कर्म करिए सत्कर्म करिए अवसर मिले करते. 00:17:58 चलिए सबकी सेवा करिए क्योंकि भाई ना जान छिन अंत कवन बुद्धि घट प्रकाशित आपको पता नहीं है हमको खबर 00:18:08 ही नहीं भाई हमारे भीतर अभी कौन-कौन सा बवाल भरा है कितने जन्म जन्म के संस्कार अर्जित है कभी कहा 00:18:16 था मैंने आपसे कौन कहता है कुछ साथ नहीं आया कुछ साथ नहीं जाएगा नहीं भाई मन साथ आया और 00:18:22 यह साथ ही जाएगा इसका ध्यान रखना है इसकी संभाल करनी है. 00:18:28 मन साथ आया है संस्कार साथ में आए हैं और ये साथ में ही जाएंगे तभी संत कह रहे हैं 00:18:35 मन ही मिलावे राम से जब तक प्रभु नहीं मिलेंगे तब तक इसकी दौड़ समाप्त नहीं होगी मन ही मिलावे 00:18:43 राम से तो मन साथ आया है संस्कार साथ में आए हैं कितने जन्मों के संस्कार भरे हैं भीतर वही 00:18:51 तो भजन नहीं करने देते हैं कभी आपने सोचा है कितने मन से आप माला लेकर बैठते हो कितना प्रयास 00:18:58 करते हो आप भजन में मन लग जाए लग जाए नहीं लगता है आप देखो आप रोज बैठ रहे हो 00:19:04 प्रयास कर रहे हो पर मन नहीं लग रहा है क्यों नहीं लग रहा है भाई पूर्व का संस्कार शोभ 00:19:09 पैदा करता है पूर्व के संस्कार के कारण ही विस्मृति गाड़ी होती चली जाती है आप और मैं तो बड़भागी 00:19:19 है नित्य प्रभु अपने चरणों में लाकर बैठा हैं हम संतों की वाणी का आश्रय लेकर कुछ कह सुन लेते 00:19:25 हैं आप देखो. 00:19:28 आप देखो संसार में लाखों करोड़ों मनुष्य जिनको सुधि नहीं है इस बात की जो शरीर के भोग से इतर 00:19:35 और कुछ भी संभव हैय जानते ही नहीं है उन्हीं को देखकर तो कबीर कहते हैं खाना पीना सोना और 00:19:46 ना कोई चीत सदगुरु शबद विसार आदि अंत का. 00:20:04 नारायण स्वामी जो फटकार लगाते हुए कहते हैं क चटक मटक नित छैल बन तकत फिरत च 00:20:15 और माया मरी न मन मरा और मर मर गए शरीर और आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर 00:20:26 शरीर वृद्ध हो जाता है. 00:20:28 जरजर हो जाता है लेकिन व्यक्ति उसको स्वीकार नहीं करता है व्यक्ति शरीर की जर जरता को कहां स्वीकार करता 00:20:34 है मैं बूढ़ा हो रहा हूं मैं वृद्ध हो रहा हूं मेरा सौंदर्य मेरा यवन सब जा रहा है इसको 00:20:41 व्यक्ति कहां स्वीकार करता है अंत तक प्रयास करता रहता है भाई कुछ बच जाए कुछ तो रह 00:20:52 जाए कि बचकर भागना नहीं है तो क्या है प्रकृति की व्यवस्था है बाल सफेद हो गए उ. 00:20:58 फिर काला कर रहा 00:21:03 है ये सत्य को स्वीकार ना करना ही तो है बचकर भागना ही तो है और क्या है कैसे कैसे 00:21:10 उपक्रम व्यक्ति करता है आज तो राम राम पूछो ही मत कैसी दशा हो गई 00:21:18 है संत को दया आती है तभी वह कहते हैं क्रोध ना छोड़ा मोह ना. 00:21:29 छोड़ा क्रोध ना छोड़ा मोह ना छोड़ा हरि का भजन क्यों छोड़ दिया रे मन नाम जपन क्यों छोड़ दिया 00:21:54 चटक मटक निद छैल बन तकत फिरत चहर. 00:21:58 नारायण ये सुध नहीं आज मरे के 00:22:06 भोर कह रहे हैं हाथ जोर ठा रयो ध्यान से सुनना क रे हाथ जोर ठाडो रयो जिनके सन्मुख काल 00:22:20 रे काल जिनके सन्मुख हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर खड़ा रहता था रे नारायण. 00:22:28 तेव बली और गए काल के 00:22:34 गाल अरे उनका भी बस आज लिखो रह गयो 00:22:41 नाम धर्म राय जब लेखा 00:22:49 मांगे क्या मुख लेके जाएगा रे मन राम सिमर. 00:22:58 पछताएगा रे मन राम सिमर 00:23:06 पछताएगा य यह जो शब्द है ना यह करते हैं ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को पुष्ट करते हैं मैले 00:23:14 कुचले विचारों को धोते हैं इसलिए मेरे तुलसी बाबा कह रहे हैं हाथ जोड़कर कहिए भाव में भर कर कहिए 00:23:27 मंग. 00:23:29 करनी कलि मल हर यही प्रसाद हमको प्राप्त हो तुलसी कथा रघुनाथ की मंगल करनी कलि मल हर जी को 00:23:52 लगा भाई कथा का विश्राम नहीं होना चाहिए यह ऐसा शुभ संयोग बन गया है ऐसे ऐसे. 00:23:58 राम कथा के गायक हमको मिल गए हैं जितना सुन सके उतना सुने और फिर दूसरी बात गरुड़ जी के 00:24:03 मन में विचार हुआ भाई प्रसाद बांटना चाहिए हमने तो कथा सुन ली इनसे कुछ ऐसा भी पूछे जिससे आने 00:24:10 वाले समय में इस प्रसंग का चिंतन इस प्रसंग का श्रवण करने वाले का हित हो कल्याण देखो वास्तविक बात 00:24:21 तो यही है पूर्व में भी मैंने कभी आपको संकेत किया था कि. 00:24:27 अर्जुन को मोह नहीं हो सकता अर्जुन भ्रमित नहीं हो सकते तो भगवान की विभूति है भगवान अर्जुन को निमित्त 00:24:35 बनाते हैं गीता का ज्ञान देने के लिए जैसे किसी जननी की कोख का चयन करते हैं ना भगवान इस 00:24:44 संसार में आने के लिए कोई तो निमित्त बनता है ऐसे भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाया कि उस ज्ञान 00:24:51 का प्राकट्य कैसे हो संसार 00:24:56 में. 00:24:59 यही बात श्री गरुड़ जी ने मन में विचारी भाई अभी अवसर मिला है ऐसी चर्चा हो रही है थोड़ी 00:25:04 और बात पूछे इनसे कुछ ऐसा ज्ञान इनके हृदय से प्रकट हो जो अनंत काल तक अनंत काल तक जीवों 00:25:13 का कल्याण करता रहे और यही संत का लक्षण है मोरे मन प्रभु अस 00:25:25 विश्वासा राम. 00:25:28 अधिक राम कर दासा रामत 00:25:40 अधिक तो गरु जी ने कहा नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रश्न मम क बखानी सात प्रश्न है मेरे 00:25:48 उनका उत्तर दीजिए प्रथम ही क नाथ मति धीरा. 00:25:58 सबते दुर्लभ कवन 00:26:04 शरीरा बड़ दुख कवन कवन सुख भारी सो संक्षेप ही कहु बचारी संत असंत मरम तुम जान तिन कर सहज 00:26:29 सुभव बखान कवन पुण्य श्रुति विदित विशाला कह कवन अघ परम करा पले तोय छह प्रश्न सबसे पहला प्रश्न सबते 00:26:50 दुर्लभ कवन शरीरा फिर पूछा सबसे बड़ा दुख कौन सा है और सबसे बड़ा सुख कौन सा है. 00:26:58 संत और असंत का लक्षण कहिए मुझसे ऐसा श्री गरुड़ जी पूछ रहे हैं संत का लक्षण क्या है और 00:27:04 असंत का लक्षण क्या 00:27:09 है और आपके मत में पाप क्या है और पुण्य क्या है और इसके बाद मानस रोग कह 00:27:23 समझाई तुम सर्वज्ञ कृपा. 00:27:30 अधिका तात सुनहु सादर अति प्रीति मैं संक्षेप कह यनी पहले प्रश्न का उत्तर शिका सुंडी जी कहते हैं नरस 00:27:51 नर तन सम नहीं कवन उ देही. 00:27:58 जीव चराचर जा चत 00:28:06 ते नरक स्वर्ग अपवर्ग नि सेनी ज्ञान विराग भगति सुभ दे बड़े संक्षेप में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात शि काग. 00:28:27 जी ने कह दी कि नर तन सम नहीं कवन देही सबसे पहली बात तो हम यहां यह विचार करें 00:28:37 कि देखो सब संत एक मत से एक स्वर से मनुष्य शरीर की महिमा गा रहे हैं सुर दुर्लभ सई 00:28:45 ग्रंथन गावा मैं स्वयं से भी पूछूं आपसे भी 00:28:54 पूछूं कितनी बार हमारे जीवन में. 00:28:57 ऐसा क्षण आया होगा जब हमने हृदय से प्रभु को धन्यवाद दिया होगा कि प्रभु आपने कृपा करके हमें इस 00:29:04 भारत भूमि पर मनुष्य का शरीर दिया 00:29:09 है किया है कभी ऐसा शायद नहीं जब हृदय से केवल इस बात का ही धन्यवाद दिया हो कितनी कृपा 00:29:19 है 00:29:24 आपकी क्योंकि दुर्लभ त्रय. 00:29:29 देवानुकू महापुरुष संशय भगवत पाद शंकराचार्य कह रहे 00:29:38 हैं ये कै कैसी दुर्लभ देन प्रभु ने सहज कृपा से प्रदान की है देखो यह जो आत्म कल्याण की 00:29:49 यात्रा है ना इसका प्रथम चरण यही है जो सबसे पहले इस जीवन का मूल्य समझेगा. 00:29:57 वही आत्म कल्याण का प्रयास करेगा वही पुरुषार्थ कर पाएगा जो सबसे पहले जीवन का मूल्य समझेगा कि कितनी मूल्यवान 00:30:05 वस्तु प्रभु ने कृपा करके मुझे दे 00:30:10 दी य एक एक तव स्वास का तीन लोक नहीं 00:30:19 दान कबीर कह रहे हैं ना जागन की कर चोप रे मन सोया क्या करे और जागन की कर चोप 00:30:29 हर दम हीरा लाल है गिन गिन गुरु को सौप सबसे पहली बात यह है साधक जीवन का सबसे पहला 00:30:38 गुण सबसे पहला लक्षण यही है कि उसको जीवन का मूल्य पता हो कि कितनी मूल्यवान वस्तु प्रभु ने मुझे 00:30:44 दिए और मूल्यवान ही नहीं अमूल्य इसका कोई मोल नहीं है एक एक तव स्वास का तीन लोक नहीं दान 00:30:54 प्रपंच से बचाने के लिए सबसे पहले तो इसी. 00:30:57 बात का चिंतन आवश्यक है ना कि भाई ये मनुष्य शरीर करुणा करके प्रभु ने मुझे प्रसाद दिया है जिसके 00:31:06 जिसके जीवन में जिसके जीवन में इस बात का इस भाव का प्रकाश हो जाएगा वह कभी समय व्यर्थ नहीं 00:31:15 कर सकता पहले भी मैंने आपसे कभी कहा था ना कि समय ही जीवन है और जीवन क्या है जन्म 00:31:23 और मृत्यु के बीच की जो अवधि है जो काल है जो समय है. 00:31:27 उसी का ही तो नाम जीवन है जीवन का आदर करने वाला समय का निरादर कैसे कर सकता है यही 00:31:35 बात तो संत कह रहे हैं अरे जो छोड़ना था वह नहीं छोड़ा क्रोध ना छोड़ा मोह ना छोड़ा क्रोध 00:31:49 ना छोड़ा मोह ना छोड़ा हरि का. 00:31:57 भजन क्यों छोड़ दिया रे मन नाम जपन क्यों छोड़ दिया अ मीरा सूर कबीर तुलसी नानक 00:32:15 रदास इन सबने जब जब भजन की बात की नाम जप पर बल दिया है नाम जपन क्यों छोड़ 00:32:25 दिया एक एक. 00:32:27 नाम जप ऐसा है कि आपका मन हो ना हो लगे ना लगे प्रणाम जपत मंगल दसी दस 00:32:40 हू कारण है क्यों पूछा क्या गरुड़ जी नहीं जानते आपको क्या लगता है जिनके पंखों से सामवेद की ध्वनि 00:32:50 प्रकट होती है वो गरुड़ जी इतनी सी बात नहीं जानते होंगे सबते दुर्लभ कवन शरीरा. 00:32:57 पर एक तो काग बसु जी बड़े अनुभवी हैं महादेव यही कहकर तो उनकी स्तुति करते हैं बहु कालीना बड़े 00:33:05 पुराने हैं वोह बड़े अनुभवी हैं एक वृद्ध व्यक्ति का आदर क्यों होता है क्योंकि उसके पास जीवन का अनुभव 00:33:13 अधिक है जीवन का अनुभव व्यक्ति को समृद्ध बनाता है उसके पास अनुभव 00:33:22 है इसीलिए तो बड़े बूढ़ों का सम्मान किया जाता है क्योंकि अनुभव में बड़े हैं. 00:33:27 उनके पास जीवन का अनुभव 00:33:33 है तो गरुड़ जी ने पूछा भाई अनुभवी व्यक्ति से भी सुन लो गरुड़ जी ने यह बात तो आपको 00:33:38 और मुझे सुनाने के लिए पूछी है जो भी प्रश्न गरुड़ जी ने पूछा है वह सब जानते हैं आप 00:33:43 और मैं सुन ले इन दो महापुरुषों की इन दो महा भागव तों की वार्ता से आपको मुझे कुछ प्राप्त 00:33:49 हो जाए आप पर मुझ पर कृपा करके गरुड़ जी ने ये प्रश्न पूछे क्योंकि मैंने कहा ना प्रसाद अकेले 00:33:55 नहीं पाना चाहिए बांट कर पाना. 00:33:57 चाए कर जी ने कहा भाई हमने तो प्रसाद पा लिया अब थोड़ा बांटना भी चाहिए तो इनसे कुछ ऐसी 00:34:01 बात पूछे जिससे जनमानस का मन मानस शुद्ध हो 00:34:11 जाए क सबते दुर्लभ कवन शरीरा नर तन सम नहीं कवन उ देही बो इसके जैसा तो कोई और देह 00:34:20 नहीं है जीव चराचर जाच तेही सुर दुर्लभ देवता लालायित रहते हैं. 00:34:32 श्रीमद भागवत में भगवान वेदव्यास क रहे अहो अमशाम किम का शोभन प्रसन्न य शमत स्वयं हरि जिसको भारत भूमि 00:34:41 पर मनुष्य का जन्म मिला है उस पर तो श्री हरि 00:34:49 सर्वात्मक भूमि में मनुष्य का जन्म मिला है मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है इस पवित्र. 00:34:57 भूखंड के अतिरिक्त ऐसे तो भाई हरि व्यापक सर्वत्र 00:35:04 समाना पर मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस पवित्र भूखंड के अतिरिक्त भी मनुष्य जन्म लेते हैं 00:35:12 लेकिन जन्म से मृत्यु पर्यंत यात्रा आगे बढ़ती है केवल विकारों के साथ एक यह देश ऐसा है एक यह 00:35:20 भूमि ऐसी है यहां पर जब कोई जन्म लेता है ना तो जन्म लेने से पहले ही हमारे यहां तो 00:35:27 जीव जब गर्भ में आता है तो गर्भाधान संस्कार होता है उससे पहले या जन्म से पहले और मृत्यु के 00:35:33 बाद तक भी जो क्रिया की जाती है उसे अंतिम संस्कार कहते हैं संस्कार जन्म से मृत्यु पर्यंत य संस्कारों 00:35:42 के साथ आपको अपनी यात्रा गौरव और गरिमा से आदर से सत्कार से आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है यह 00:35:51 ऋषि मुनियों की तप पूत भूमि है मैं कहा करता हूं. 00:35:56 कि इस इस धरती ने बड़े दुर्दिन देखे हैं भारत की भूमि ने बड़े कठिन बड़े कठोर दिन देखे हैं 00:36:06 ऐसा तो समय आया जब यहां सुख सुख चैन की घड़ियां नहीं थी लेकिन इस भूमि का सौभाग्य है कि 00:36:13 एक दिन भी आज तक यहां ऐसा नहीं आया जब इस भूमि पर कोई संत नहीं था जब सारे सारे 00:36:22 विश्व की मंगल कामना करने वाला कोई संत इस भूमि पर नहीं था ऐसा दिन अभी एक भी. 00:36:26 नहीं 00:36:30 आया मैं तो कल ही किसी से कह रहा था कि देखो हम कितने सौभाग्यशाली हैं हम मैं आप हम 00:36:37 सब कितने सौभाग्यशाली हैं भाई हमारे पूर्वजों ने तो मंदिर टूटते देखे हैं हम बड़भागी है कि हम मंदिर बनता 00:36:44 देख रहे हैं कितना कठिन समय रहा होगा हमारे पूर्वजों के लिए जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनी. 00:36:56 श और विश्वास के केंद्रों को क्षत विक्षत होते देखा होगा खंड खंड होते देखा होगा हम बड़भागी हैं हमको 00:37:03 ऐसे समय में जन्म मिला है जब हम मंदिर बनता देख रहे हैं जब हम जब हम सनातन धर्म का 00:37:12 यह धर्म ध्वज लहराता देख रहे हम सबका सौभाग्य है अब बात हुई है मुझे मुझे स्मरण हो आया है 00:37:21 तो एक बार प्रेम से दो क्षण के लिए भगवन नाम का उच्चारण कर दीजिए एक बार सब. 00:37:26 प्रेम से कहिए राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय 00:37:39 सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:37:52 राम जय राजा राम राम राम जय. 00:37:57 सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:38:09 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम देखो यह नाम तो ऐसा है मैं सोचता हूं कोई किसी भी 00:38:18 धर्म का किसी भी मत का हो व किसी भी विधि से. 00:38:27 साधन करता हो यह एक नाम तो ऐसा है भाई जो अनंत अनंत काल से इस भरत खंड की चेतना 00:38:37 में रमा है य इस देश में जो जो सूरज की पहली किरण फूट है ना उसके साथ ही केवल 00:38:45 पंछी नहीं चह चहाते चारों र एक शब्द और भी और भी गुंजित होता है और वो क्या है राम 00:38:52 राम जी राम राम जी राम राम. 00:38:56 जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम हरे रामा रामा राम 00:39:08 सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम 00:39:22 हरे रामा रामा राम सीता राम रा. 00:39:26 राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:39:40 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:39:53 राम हरे रामा रामा. 00:39:56 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:40:09 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:40:22 राम सीता राम राम राम. 00:40:26 हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम अरे रामा रामा राम 00:40:38 सीता राम राम राम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम राम राम जय राजा राम राम 00:40:49 राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम. 00:40:56 राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम 00:41:05 राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता 00:41:25 राम.