Saturday, August 1, 2026

अपने दोषों को भूल कर भी अनदेखा ना करें ||41|| Shree Hita Ambrish Ji

अपने दोषों को भूल कर भी अनदेखा ना करें ||41|| Shree Hita Ambrish Ji 

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given

संत का स्वभाव और परोपकार | संतत्व की वास्तविक पहचान

The Nature of a Saint and Selfless Service | The True Mark of Sainthood https://youtu.be/4ozu5eEm584 [00:42] संत वही है जो दूसरों के दुख से दुखी होता है और परोपकार को ही अपना सहज स्वभाव मानता है। A saint is one who feels the pain of others and considers selfless service to be his natural disposition. [02:42] प्रभु के निकट वही जाता है जो परोपकारी है। जीवन केवल स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ के लिए मिला है। Only one who is benevolent draws near to the Lord. Life has not been given merely for selfish purposes, but for the welfare of others. [04:32] संत दूसरों के सुख के लिए कष्ट सहते हैं, जबकि असंत (दुष्ट) दूसरों के दुख का कारण बनते हैं। Saints endure hardships for the happiness of others, whereas wicked people become the cause of others' suffering. [06:29] वास्तविक आध्यात्मिकता मंदिर में नहीं, बल्कि आपके दैनिक व्यवहार में दिखती है। व्यवहार ही आपके चरित्र की असली परीक्षा है। True spirituality is not demonstrated merely in the temple, but in your daily conduct. Conduct is the real test of your character. [10:29] किसी का बुरा सोचने मात्र से मन भजन के अयोग्य हो जाता है। एक अपवित्र संकल्प पतन का कारण बन सकता है। Merely thinking ill of someone makes the mind unfit for devotion. A single impure thought can become a cause of downfall. [12:05] जैसे ही अपने भीतर कोई दोष दिखाई दे, उसे प्रार्थना और पुरुषार्थ से तुरंत दूर करने का प्रयास करें। As soon as you notice any fault within yourself, immediately make an effort to remove it through prayer and determined effort. [20:43] शरीर को सजाने से अधिक आवश्यक मन को सजाना है। राग, द्वेष और ईर्ष्या को हटाकर सद्गुणों को अपनाना ही असली श्रृंगार है। Adorning the mind is more important than adorning the body. Removing attachment, hatred, and jealousy and adopting virtues is the real adornment. [25:36] अहिंसा (मन, वचन और कर्म से) सबसे बड़ा धर्म है और परनिंदा (दूसरों की बुराई करना) सबसे बड़ा पाप है। Non-violence through thought, word, and deed is the greatest धर्म, while criticizing others is the greatest sin. [34:50] जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वे आध्यात्मिक धन खो देते हैं और अंधकारमय गतियों को प्राप्त होते हैं। Those who criticize others lose their spiritual wealth and attain dark and undesirable destinations. https://youtu.be/4ozu5eEm584 -----

Full Transcript


00:00:00 तो सबसे बड़ा दुख दरिद्रता और दरिद्रता में भी जो भाव की दरिद्रता है वो सबसे बड़ा दुख है सबसे 00:00:08 बड़ी पीड़ा है और संत मिलन सब सुख जग नाही पर उपकार वचन मन काया संत सहज स्वभाव 00:00:28 खगरा. 00:00:30 संत सहज सुभा खगरा और संत का संत क्या है किरे जो पर दुख के लिए जो पर दुख से 00:00:42 कातर होकर जो पर पर पीड़ा से तप्त होकर स्वयं दुख सह रहा है कल एक छोटी सी बात मैंने 00:00:50 आपको निवेदन की थी जिस दिन पराई पीड़ा से आप भी पीड़ित हो जाओ उस दिन समझना अब हमारा मन 00:00:59 भगवान के भजन. 00:01:00 योग्य हो रहा है आप पराई पीड़ा से पीड़ित हो जाओ अपनी पीड़ा से तो भाई सभी पीड़ित है सब 00:01:06 रो लेते हैं इस दिन किसी का दुख आपको दुखी कर दे संत का सबसे पहला गुण यही बता रहे 00:01:14 परोपकार और किससे वचन मन काया शरीर से भी मन से भी और वचन से भी जो सतत परोपकार में 00:01:22 संलग्न है सेवक जी श्री महाप्रभु जी के अवतरण का हेतु क्या बताते. 00:01:30 देह धरण परोपकार के लिए जिन्होंने देह धारण किया है और कोई प्रयोजन नहीं है पलटू साहब कहते हैं पर 00:01:38 परमार्थ के कारण लियो संत 00:01:44 अवतार और श्रीमद भागवत तो कहती है भगवान की सबसे बड़ी आराधना यही है तपत लोक तापन बो जो संसार 00:01:53 के ताप से तप रहा है अर्थात जो संसार को दुखी देखकर दुखी है जो जीव को दुख. 00:02:00 पाता देखकर दुखी है वो साधु है और उस उस दुख को दूर करने का जो प्रयास कर रहा है 00:02:08 भगवान के नाम रूप लीला का गान करके जो यह प्रसाद जगत को बांट रहा है वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ 00:02:14 पुजारी है उपासक है आराधक 00:02:20 है आज जहां से हमने चर्चा आरंभ की जहां भी हम खड़े हैं जिस भी स्तर पर हम खड़े हैं 00:02:26 जो भी साधन हमारे पास है हम कम से कम वहीं से पर. 00:02:29 का आरंभ तो करें जो भी आपके पास हो शरीर से कर सको धन से कर सको आपके पास विद्या 00:02:37 हो विद्या से कर सक कोई गुण हो आपको प्रभु ने दिया उस गुण से सेवा कर सक पर आपके 00:02:42 जीवन में परोपकार आरंभ तो हो परोपकारी ही प्रभु के निकट जाता है 00:02:50 परोपकारी जब कुछ वर्ष पहले आपको मैंने निवेदन किया था ना भाई नाम जप करना सबके हित का विचार करके 00:02:57 केवल परमार्थ की भावना का. 00:02:59 बीज बोने के लिए यह बात मैंने आपसे कही थी कि हमारे भीतर ये परमार्थ का भाव तो अंकुरित हो 00:03:07 कि भाई कुछ हमको ऐसा भी करना है जो अपने लिए नहीं करना है सब कुछ स्वार्थ के लिए नहीं 00:03:14 करते चले जाना है जीवन तो परमार्थ के लिए मिला 00:03:22 है अब एक व्यक्ति जाकर भगवान से प्रार्थना करे प्रभु मेरे घर बारिश हो जाए एक. 00:03:30 केवल जाकर के प्रभु वर्षा हो जाए भाई वर्षा हो जाए तो अपने घर तो होही जाएगी आप यह ना 00:03:39 समझना कि भाई हम सबके लिए करते र जाएंगे तो हमारा कार्य कैसे होगा ना ना आपका तो पहले हो 00:03:45 ही जाएगा और मुझे तो लगता है आधा हो गया है तभी तो आप सबके लिए करने चले हो जिसके 00:03:51 मन में यह परमार्थ की भावना प्रतिष्ठित हो गई है उसका आधा कार्य तो होही गया है भाई तभी तो 00:03:58 व इस दिशा में चला. 00:03:59 निकला 00:04:03 है और यहां तुलसी बाबा तो संत का ही लक्षण बता रहे हैं पर उपकार वचन मन काया संत सहज 00:04:18 स्वभाव खगरा बो यही संत का सहज स्वभाव होता है संत सह ही दुख परही. 00:04:32 लागी पर दुख है तू असंत अभ अगले प्रश्न श्री गरुड़ जी ने यही पूछे थे ना संत का लक्षण 00:04:42 क्या है असंत का लक्षण क्या है संत सहाई दुख परहित 00:04:51 लागी संत कौन है क जो दूसरे के लिए दुख सह रहा है और असंत कर जो दूसरे के दुख 00:04:57 का कारण बन रहा है. 00:05:00 किसी भी प्रकार से जो दूसरे के दुख का कारण बन रहा है वही असंत है आपको याद हो कभी 00:05:09 मैंने आपको संकेत किया था भाई किसी की सेवा सहायता ना कर सको चलो कोई बात नहीं पर जीवन में 00:05:16 कभी किसी की कष्ट और पीड़ा का कारण तो बिल्कुल नहीं बनना कांटा तो बिल्कुल नहीं बनना साधक ना बन 00:05:24 सको तो कम से कम बाधक तो किसी के लिए आप बिल्कुल भी ना होना हो सकता है. 00:05:29 कि अभी हमारे पास इतना बड़ा मन ना हो हमारे पास इतना बड़ा हृदय ना हो कि हम सबका सम्मान 00:05:35 कर सके पर किसी का अपमान ना करें हमारे हमारे मुख से कभी कोई ऐसा कठोर ऐसा कठोर वचन कोई 00:05:45 कठोर शब्द ना निकले जो किसी का हृदय दुखा दे जो किसी के लिए पीड़ा का कारण बन जाए ऐसा 00:05:50 ऐसा तो प्रयास करना ही चाहिए क्योंकि हम साधक 00:05:56 हैं बुल्ले शाह एक बात कहते हैं. 00:05:59 कहते बुलिया ज तू कभ किसी द फट नहीं सीता बुलिया ज कद किसी का फट नहीं सीता फिर माला 00:06:12 तू कख नहीं कीता मैं तो कहता ही हूं भाई मंदिर में तो सभी भक्त हैं अपने मंदिर में या 00:06:21 भगवान के मंदिर में जो खड़े हैं भाई व तो सभी भक्त है पर आपके चरित्र का वास्तविक दर्शन. 00:06:29 व्यवहार में होता है व्यवहार में आप कैसे हैं जो दैनिक व्यवहार आप करते हैं उसमें आपकी चेष्टा कैसी है 00:06:37 उसमें आपकी वृत्ति कहां है शुद्ध है कि नहीं है इसलिए मैं कहता हूं भाई सब छोड़कर और एक और 00:06:45 बैठ जाना सरल है पर व्यवहार में रहकर स्वयं को साधे रखना यह बहुत कठिन कार्य है उसके लिए वास्तविक 00:06:51 आध्यात्मिक बल की आवश्यकता है परीक्षा तो व्यवहार में ही होती 00:06:58 है. 00:07:02 यहां तो भाई किसी को हम धक्का मार के और आगे आकर बैठते हैं व्यवहारी तो बताता है अब उसको 00:07:09 आप यह कहते हो भाई य तो हमारी भावना है आपके 00:07:15 लिए आज नहीं तो कल स्वयं को स्वयं के हृदय को कसौटी पर कसना पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा कभी तो 00:07:23 आओगे कसौटी पर किसी दिन तो भाई परीक्षा देनी पड़ती है क्योंकि उसके. 00:07:29 बिना तो अगली कक्षा में कोई बालक जा नहीं सकता है कब तक टा होगे किसी दिन तो कसौटी पर 00:07:36 खरा उतरना पड़ेगा ना आपका व्यवहार कैसा 00:07:44 है ये ये जो बात यहां कही गई है ना ये केवल संत के लिए नहीं है तो भाई आपके 00:07:50 मेरे सबके लिए कही जा रही है मैंने कल ही आपसे बात कही थी कि सब प्रश्नों के उत्तर गरुड़ 00:07:55 जी जानते हैं ऐसा हो ही नहीं सकता गरुड़ जी ना जानते हो आपके मेरे लिए पूछा है. 00:08:01 काक बु सुंडी जी जो उत्तर देंगे आपके मेरे काम की बात है इसलिए पूछी है इसलिए आपको मुझे सुना 00:08:06 रहे 00:08:10 हैं और हम हम अपनी बात करें तो भाई हित की यहां उपासना हित के हैं हम दास हमारे आचार्य 00:08:18 का तो पहला वाक्य और उसका भी पहला शब्द सब सोहित निष्काम मती आगे की बात बाद में करेंगे पहले 00:08:28 यहीं पर. 00:08:30 चर्चा कर लेते हैं है हमारे भीतर यह बात सब सोहित और सब में सिर्फ अपने अपने नहीं आते सब 00:08:38 में तो सब आते हैं सब में सब आते हैं श लाडली दास जी कह र चीटी सोले जुगल तक 00:08:47 सब सोहित 00:08:53 निष्काम अपने अपनों से तो भाई सभी कर रहे हैं ना पर सब सोहित. 00:09:02 और कम से कम इस उपासना के मार्ग पर तो कोई शॉर्टकट नहीं है कहीं होता हो तो पता नहीं 00:09:08 यहां तो नहीं है यहां तो भाई गुरुजन ने जो मार्ग बताया है उसी मार्ग पर चलकर ही कोई पग 00:09:16 पग आगे बढ़ सकता है पहला पहला वाक्य और उसका भी पहला शब्द सब सोहित निष्काम और उसमें भी टर्म 00:09:25 एंड कंडीशन अप्लाई है सबस हित निष्काम. 00:09:29 मति तब वृंदावन विश्राम उसके बाद तो कोई प्रभु का नाम लेने योग्य हो राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान 00:09:44 मुखना तभी आचार्यों ने कहा है जीवे दया नाम रुचि जीव मात्र पर दया आप कल्पना नहीं कर सकते किसी 00:09:55 के भी अहित की भावना किसी के भी अनादर की भावना. 00:09:59 किसी की भी अवज्ञा या अवहेलना की भावना आपके हृदय को आपकी भाव भावना को कितनी भारी क्षति पहुंचा सकती 00:10:07 है आपको याद हो तो कल मैंने कहा था एक अपवित्र संकल्प पतन के गहरे गर्द में ले जाकर छोड़ 00:10:16 सकता है एक अपवित्र संकल्प किसी की भी अवज्ञा अवहेलना की भावना किसी का भी अहित चिंतन अहित करना नहीं 00:10:27 अहित चिंतन मैला. 00:10:29 उछला कर देगा मलीन हो जाएगा मन कोई पूछे ना क्या होता है किसी का अहित चिंतन करने से क्या 00:10:35 होगा तो मैं कहता हूं और तु और तो मैं कुछ नहीं जानता पर मन भजन के योग्य नहीं रहेगा 00:10:41 इससे बड़ी हानि और क्या होगी इससे बड़ी क्षति हमारी और क्या होगी कि हमारा मन भजन के योग्य ना 00:10:48 रहे और कभी ऐसा मन हो जाए कभी ऐसा भाव आ भी जाए किसी के लिए तो दौड़कर प्रभु की 00:10:57 चरण शरण में चले जाना. 00:11:00 भक्तों ने कहा है कि दल बल के साथ माया घेरे जो मुझे आकर तुम देखते ना रहना झट आके 00:11:14 बचा 00:11:17 लेना दौड़ कर जाना मनी मन दौड़ कर जाना चरण पकड़ लेना प्रभु के प्रभु मैं मैं स्वयं को इस 00:11:26 पाप से बचा नहीं पा रहा हूं आप मेरी रक्षा करिए. 00:11:29 आप मुझे संभालिए और अपने प्रति सचेत भी रहना और अपने प्रति ईमानदार भी रहना कल एक छोटा सा उदाहरण 00:11:39 दिया था मैंने आपको किसान बीज डालता है ना अवांछित घास फूस भी पैदा हो जाती है उसको समय रहते 00:11:46 काटना पड़ता है समय रहते छटाई करनी पड़ती है उसकी नहीं तो भूमि की सारी उर्वरक शक्ति जो होती है 00:11:53 व घास खा जाती 00:11:57 है. 00:11:58 परिश्रम व्यर्थ चला जाता है समय रहते और मैं तो कहता हूं अपना दोष दृष्टि में आए तो उसी समय 00:12:05 लग जाओ जब तक दूर ना हो तब तक चैन से बैठना नहीं जैसे अपना दोष दृष्टि में आए सत्संग 00:12:14 करोगे तो यह घटना तो घटेगी अपना दोष दिखाई पड़ेगा लेकिन हम हम छोड़कर बचकर भाग जाते हैं ये मनुष्य 00:12:23 की वृत्ति है आपको उदाहरण दे रहा था ना मैं. 00:12:29 सफेद हो लो आपने काले कर लिए दूसरे को तो काले ही दिख रहे हैं है सफेद दिख काले रहे 00:12:38 हैं आपकी छोटी छोटी चेष्टा बताती है मन कैसा है मन कहां है मन कैसा है किस धरातल पर आपकी 00:12:46 चेतना खड़ी 00:12:53 है इससे बचना और ये जो बात मैंने अभी आपसे. 00:12:58 कही ना बड़ी महत्त्वपूर्ण है इसको आज साथ ले जाना जैसे अपना दोष दिखाई दे उसके लिए उसको दूर करने 00:13:04 के लिए प्रार्थना भी करना पुरुषार्थ भी करना प्रभु से प्रार्थना करना प्रभु मेरी रक्षा करिए और भगवान रक्षा करेंगे 00:13:15 सच्चे हृदय से यदि आप प्रभु से प्रार्थना करेंगे प्रभु मेरे हृदय का यह दोष दूर हो जाए प्रभु तत्काल 00:13:23 कृपा करते हैं उसी क्षण देव द्वार से कृपा अवतरित होती है ये बात में आपको. 00:13:28 अपना अनुभव बता रहा भाई हम संसार में रहते हैं व्यवहार में रहते हैं आ जाता है ऐसा कोई वैसा 00:13:35 कोई भाव ऐसा कोई विचार मन में आ जाता है उसको अनदेखा ना करें मैं यह कह रहा हूं इस 00:13:40 दोष को इस रोग को अनदेखा ना करें व जड़ पकड़ 00:13:50 लेगा क्या होता है भाई व्यक्ति अपना पुण्य देखता है दूसरे. 00:13:59 का पाप देखता है अपना पुण्य देखता है दूसरे का पाप देखता है और इसका परिणाम क्या होता है एक 00:14:11 पग भी जीवन में आगे नहीं बढ़ पाता मैं बड़ी विनम्रता पूर्वक यह बात आपको कह रहा हूं क्यक ऐसा 00:14:17 भी मैंने देखा कि 10 10 151 साल लगे हुए हैं अपनी ओर से साधन में लेकिन उनकी वृत्ति में 00:14:26 उनके व्यवहार में तनिक सा भी कोई परिवर्तन. 00:14:29 कल भी वही छोटी छोटी बातें थी जिनको पकड़ पकड़ कर और राग द्वेष में उलझे रहते थे आज भी 00:14:35 वही बातें खूब सेवा कर रहे हैं खूब सब कर रहे हैं लेकिन मन नहीं बदल रहा है जीवन में 00:14:41 परिवर्तन नहीं आ रहा है द्वंद का प्रभाव जो का त्य बना हुआ है जीवन पर यह बता रहा है 00:14:50 कि भाई गति नहीं हो रही है जीवन गतिमान नहीं है अटका है कहीं अटका है. 00:15:01 और मैं आपको उपदेश नहीं कर रहा हूं एक साधक की भाति आपको बड़ी विनम्रता पूर्व की बात कह रहा 00:15:07 हूं कि अगर आप मेरे इस अनुभव से थोड़ा लाभ ले सके आप सच्चे हृदय से प्रार्थना करो प्रभु से 00:15:13 कि प्रभु मेरे हृदय का यह दोष दूर हो जाए प्रभु तत्काल कृपा करेंगे कोई ना कोई विचार आपको मिलेगा 00:15:20 कोई ना कोई शब्द आपको मिलेगा कभी-कभी कोई ग्रंथ आ जाता है कभी-कभी कोई संत आ जाता है लेकिन आपके 00:15:26 भीतर परिवर्तन होगा. 00:15:29 एक बात तो मैं आपसे सदा से कहता ही हूं कि भाई अच्छा होना और अच्छा बने रहना यह दो 00:15:37 बातें हैं ऐसे मन अच्छा हो जाता है कभी-कभी अच्छा बना भी तो रहे मन शुद्ध हो जाए और फिर 00:15:43 शुद्ध बना रहे यह बड़ी बात है मन की शुद्धता बनी रहे शिखर पर पहुंचना आसान होता है शिखर पर 00:15:52 बने रहना कठिन होता है पहाड़ की चोटी पर जो लोग चढ़ते हैं ना बहुत देर वहां ठहर नहीं पाते 00:15:58 झंडा. 00:15:58 के वापस आ जाते हैं बहुत देर वहां कोई रह नहीं सकता है शिखर पर बने रहना कठिन होता है 00:16:05 ऐसी जीवन जीवन शिखर पर पहुंचे और फिर बना रहे बड़ी चुनौती है वहां पर बने 00:16:17 रहना इसके लिए लगे रहना पड़ेगा स्वयं के साथ स्वयं को ई देखते हुए स्वयं को ही संभालते हुए साधक 00:16:25 के जीवन में तो समय नहीं होता किसी दूसरे को देखने का दूसरे का विचार ही कैसे. 00:16:28 करेगा तो स्वयं को ई देख रहा है और मैंने कहा कि सत्संग करोगे ईमानदारी से अपने सुधार के लिए 00:16:37 सत्संग करोगे यह परिणाम तो जीवन में अवश्य आएगा ही आएगा अपना दोष आपको दिखाई पड़ेगा अपना दोष दिखाई 00:16:47 पड़ेगा और अगर आपने अपने मन को व्यस्त रखा अपना सुधार करने में तो आप देखो जितना अनुचित अवांछित जीवन 00:16:56 में है सब दूर हो जाएगा सब. 00:16:58 छिटक जाएगा क्योंकि आपका मन तो व्यस्त है मन एक है एक साथ दो स्थान पर वो रह नहीं सकता 00:17:04 मन आपका व्यस्त है अपनी संभाल करने में कल भी आपसे मैंने कहा था ना भाई पिछला जो है वह 00:17:13 सुधर जाए और अगला संवर जाए यही हमारा लक्ष्य हो यही हमारा उद्देश्य हो जो भूल हमसे होती आई है 00:17:21 अब वह सुधर जाए अब और ना हो क्यों ना हो क्योंकि भाई अब प्रभु की शरण में आ गए 00:17:27 हैं. 00:17:30 प्रभु का दरबार यही तो है सूरदास जी गाते हैं ना बैठे सब सभा हरि जू की बैठे सब सभा 00:17:47 हरि जू की कौन बड़ो को छोट बड़ी है. 00:17:59 हरि नाम की ओट ऐसे प्रभु के नाम की ओट में तो आप में यहां पर आकर बैठे य प्रभु 00:18:07 का दरबार ही तो है क्योंकि भाई प्रभु के दरबार में आप पहुंचे हैं अब हमसे ना हो वो भूल 00:18:12 ना हो जो जो जो भूल होती आई व अब सुधर जाए और अगला जीवन संवर जाए इस जीवन को 00:18:23 प्रभु के लिए सजाना है इस जीवन का वास्तविक श्रृंगार करना है तन का श्रृंगार नहीं करना है जीवन. 00:18:28 का श्रंगार कर अपने आप को हार्ड मास का पुतला समझते हो तो अपने तन को 00:18:37 सजाओ अगर आप अपने आप को केवल हार्ड मास का पुतला ही समझते हो तो फिर इसको सजाओ और गुरु 00:18:44 की कृपा से आंख खुल गई है गुरु की कृपा से अंतर दृष्टि प्राप्त हो गई है देख पाते हो 00:18:50 अपने आप को इससे इससे अतिरिक्त कुछ 00:18:56 और कहते तो हो कि. 00:18:58 क् होती है नया जन्म होता है किसका जन्म होता है आपके भीतर एक साधक का जन्म होता है सत्संग 00:19:04 से जो भाव देह प्राप्त होता है दीक्षा के समय उसकी पुष्टि की जाती है उसको सजाना है य ये 00:19:10 यह हाड़ चाम का पुतला प्रभु से नहीं मिलेगा कौन सा निंद गृहित ऐसा कर्म है जो इस शरीर से 00:19:17 नहीं होता है बार-बार नहीं होता है किसी भी दृष्टि से क्या यह प्रभु के योग्य है ना ना यह 00:19:22 तो प्रभु के योग्य नहीं 00:19:26 है क्योंकि ऐसे कई बार. 00:19:28 देखने में आता है ना बात आई है तो मैं कह रहा हूं हम कहते हैं भाई कल उत्सव 00:19:35 है कल उत्सव है अपना श्रृंगार करके आना तो देखने में आता है कि कुछ लोग केवल इसी इसी पुतले 00:19:43 को ही सजाकर आ जाते हैं सत्संग में जो बात कही जा रही है उसका तात्पर्य उसका प्रयोजन समझना चाहिए 00:19:50 ना उसका समझना चाहिए प्रयोजन क्या है किसको कहा जा रहा है मैं यहां जो आपसे सब बात कह रहा 00:19:57 हूं मैं. 00:19:58 मैं किसी स्त्री या पुरुष से बात थोड़ी कह रहा हूं किसी बालक या वृद्ध से थोड़ी कह रहा हूं 00:20:03 आपके शरीर को देखकर यह बात थोड़ी कही जा रही है यहां तो जो बैठा है वह प्रभु का है 00:20:09 प्रभु के दरबार में तो जीव आता है यह बात तो जीव से कही जा रही है उसके कल्याण के 00:20:14 लिए सुनना चाहिए ना यह बात किसको कही जा रही है किसका श्रृंगार होना चाहिए कैसा श्रृंगार होना 00:20:23 चाहिए संत कहते आ रहे क मन ना रंग आए रंग. 00:20:28 जोगी कपड़ा य बहुत आसान है ना यह सब कर लेना बड़ा आसान 00:20:37 है ना पर अपने जीवन का श्रृंगार करना है अपने मन को सजाना है मन जाएगा प्रभु के पास मन 00:20:43 ही मिलावे राम से मन जाएगा प्रभु के पास मन मिलेगा प्रभु से इस मन को सजाना है राग द्वेष 00:20:53 ईर्ष्या मद मास अभिमान काम क्रोध जितने विकार है. 00:20:58 दुर्गुण य दूषण बने हुए हैं इन सबको 00:21:04 हटाकर इन सबको इन सद्गुणों से सजाना है जिनकी बात भगवत रस देव कह रहे हैं हरि को भजन साधु 00:21:11 की सेवा सर्व भूत पर दाया तृष्णा दम लोभ छल त्यागे विस सम देखे माया सहनशील आशय उदार अति धीरज 00:21:21 सहित विवेक सत्य वचन सबको सुखदायक गह अनन्य व्रत एक. 00:21:34 तो कहा संत सह दुख परहित लागी और पर दुख हेतु असंत अभागी भूज तरु सम संत कृपाला परहित निति 00:21:50 सह वि पति 00:21:57 विसा. 00:21:59 देवता आए हैं दधीच ऋषि के 00:22:05 पास आपकी हड्डियों से वज्र 00:22:11 बनेगा ऋषि क्या कहते हैं कि सर्वा भगवान मुझ पर प्रसन्न हो गए हैं मेरी तपस्या सफल हो गई है 00:22:20 कि यह शरीर जो किसी भी काम का नहीं है य शरीर भी परोपकार में लग जाएगा इससे बड़ा जीवन 00:22:26 का फल और क्या हो सकता है. 00:22:30 किसी भी काम का नहीं है शरीर अगर परोपकार में ना लगे अगर जीवन में सेवा सुमिर ना हो तो 00:22:37 फिर किस काम का है क सर्वात्मका मेरे पास में आना इस इस बात का संकेत है भगवान मुझ पर 00:22:50 प्रसन्न है प्रभु मुझे स्वीकार अंगीकार करने को तैयार हो गए हैं तभी तो आप मेरे पास में आए हैं 00:22:57 किय शरीर जो. 00:22:58 किसी भी काम का नहीं य परोपकार में लगेगा इससे बड़ा कोई फल नहीं है जीवन का इसलिए पूर्व में 00:23:05 तुलसी बाबा मानस में कहते हैं परहित सरस धर्म नहीं भाई पर पीरा सम नहीं 00:23:21 अधमा संत होते हैं तुलसी बाबा तो कहते हैं कि दूसरे के हित के लिए. 00:23:28 भारी विपत्ति सहते अपनी खाल तक उधड़ वा लेते कैसा होता है संत का हृदय उसी को देखकर उसी को 00:23:37 विचार कर प्रभु कह रहे मोते अधिक संत करि 00:23:44 लेखा तो यह संत और असंत का लक्षण बताया तीन प्रकार के लोग होते हैं प्राय करके संसार में एक 00:23:52 साधारण एक मध्यम एक अधम. 00:23:58 साधारण कैसे होते हैं भाई हमारा भी काम बन जाए किसी का भी बन जाए य साधारण है इनको भी 00:24:04 अच्छा नहीं माना गया है साधारण है उत्तम संत होते हैं यह साधारण है भाई चलो हमारा भी काम बन 00:24:10 जाए आपका भी बन जाए फिर एक होते हैं मध्यम भाई हमारा बन जाए किसी का बने ना बने फिर 00:24:20 एक है अधम वो कह र हमारा बने ना बने इसका बिगड़ना चाहिए हमारा बने ना बने. 00:24:28 इसका काम नहीं बनना चाहिए इसका बिगड़ना चाहिए और बोले अधम क्या करते बोले स्वयं दुख सहकर भी दूसरे का 00:24:35 काम बिगड़ते इसका इसका बिगड़ना चाहिए काम इसका ना बन जाए फर य अधम है तो एक साधारण है एक 00:24:42 मध्यम है एक अधम है फिर उत्तम कौन है बोले जो जो जिसका जीवन परोपकार को समर्पित है जो परोपकार 00:24:50 के लिए जीवन धारण कर रहा है जिसके जीवन का लक्ष्य उद्देश्य परमार्थ है भाई अपने पास में जो है 00:24:57 किसी के. 00:24:57 काम आ जाए जितनी हो सके अपने से सेवा हो जाए हमारे पास जो है उससे बन जाए किसी का 00:25:06 काम बनता हो तो खूब बन जाए तेरे जन के हित लगे तन मन धन सब ठाट आत्मा तुझ में 00:25:19 ही रमे मुख में तेरा 00:25:26 पाट. 00:25:29 और फिर कहते हैं भाई संत उदय संतत सुख कारी विश्व सुखद जिम इंदु तमारी परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा 00:25:36 पर निंदा सम अगन गरीसा भले भाई ऐसे संतों का उदय लोक के कल्याण के लिए होता है फिर दो 00:25:42 प्रश्न और पूछे सबसे बड़ा पुण्य कौन सा है सबसे बड़ा पाप कौन सा है तो क परम धर्म श्रुति 00:25:50 विदित अहिंसा जिसकी चर्चा हम करते ही आ रहे हैं रे अहिंसा परमो धर्म ये सबसे बड़ा धर्म है. 00:26:00 और अहिंसा केवल तन से नहीं मन से भी अहिंसा मन से भी अहिंसा हमारे हमारे हृदय में दूर तक 00:26:10 लेश मात्र भी किसी का अहित चिंतन ना रहे देखो भाई यहां बीच में कुछ नहीं है या तो आप 00:26:20 धार्मिक हैं या नहीं है बीच में कोई खेल नहीं है यहां पर. 00:26:28 धर्म को धारण करने वाला धार्मिक है धर्म की बात करने वाला धार्मिक नहीं है धर्म को धारण करने वाला 00:26:34 धार्मिक है और धर्म क्या है क परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा य गोस्वामी जी बिल्कुल वेद शास्त्र सम्मत बात 00:26:43 कह रहे हैं भाई बोले भाई वेदों शास्त्रों का मत है कि अहिंसा सर्वश्रेष्ठ धर्म है परम धर्म है अब 00:26:50 भाई जिसने जीवन में इस धर्म को धारण किया वही तो धार्मिक हुआ मुझे याद है बंबई. 00:26:57 की बात है शायद य सात आ साल हो गए किसी के यहां गए एक व्यक्ति आया उसने कहा कि 00:27:04 आशीर्वाद दीजिए आशीर्वाद दीजिए अब मैं तो इस व्यापार में कोई पढ़ा ही नहीं अब मैंने से विनोद के लिए 00:27:13 पूछ लिया मैंने किसके लिए चाहिए आशीर्वाद बताओ ऐसे तो आशीर्वाद कैसे दे दे अरे बताओ क्यों चाहिए आशीर्वाद छोटे 00:27:23 भाई पर मुकदमा किया है मैं जीत जाऊ इसलिए आशीर्वाद दे दीजिए. 00:27:28 आशीर्वाद भी इसके लिए मांग रहा है अब मांग तो आशीर्वाद रहा है बड़ी लंबी दंडवत प्रणाम भी कर रहा 00:27:33 है दूर से तो देखेगा भाई बड़ा धर्मात्मा है बड़ा धार्मिक है साधु संतो की सेवा भी कर रहा है 00:27:38 प्रणाम भी कर रहा है मन की वृत्ति क्या है मन की गति किस और है किसी का अहित चिंतन 00:27:45 करने में लगा है तो इसलिए धर्म की बात करने वाला धार्मिक नहीं है धर्म को धारण करने वाला धार्मिक 00:27:52 है और धर्म क्या है अहिंसा प्राणी मात्र के. 00:27:57 दया का भाव जीवे दया बड़ी बड़ी स्पष्ट रीति से श्री सेवक जी ने समझाया है सब जीवनस प्रीत रीत 00:28:09 निहत आपनी श्रवण कथन परती यह जो कृपा हरिवंश की आचार्य की कृपा का लक्षण है पहले सब जीवन स 00:28:22 प्रीत माने अहिंसा सब सोहित निष्काम मति माने अहिंसा. 00:28:28 यह परम धर्म 00:28:34 है अब जाकर आज विचार करना हमारे मन में है तो नहीं ऐसा विचार किसी के लिए मिलेगा अवश्य मिलेगा 00:28:45 और जैसा कुछ देर पहले मैंने आपसे कहा कि अपना दोष देखो अनदेखा नहीं करना छोटा सा रोग भी अगर 00:28:54 समय रहते उसकी औषधि ना की जाए तो असाध्य हो जाता है. 00:28:57 प्राणों पर संकट उपस्थित हो सकता है जाकर देखना आत्म चिंतन करना कहीं ऐसी कोई बात है तो नहीं मेरे 00:29:07 मन में और अगर दिखाई दे फ प्रभु से प्रार्थना करना थोड़ा नाम जप करना कल आपसे कह ही रहा 00:29:14 था मैं ऐसी कोई बात हो जो अपने हाथ में ना हो फ प्रभु से कहना चाहिए ये मन हो 00:29:24 निर्मल तुम्हारी कृपा. 00:29:28 से इसे शुद्ध करने में हम तो है हारे मैंने तो मैं तो बहुत बार प्रभु से कहता हूं अपनी 00:29:42 करुणा का जल तू बहा दे कर दे पावन हर एक मन का कोना हम चले. 00:29:57 नेक रास्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल 00:30:09 होना बो सबसे बड़ा पुण्य है यह सबसे बड़ा धर्म है अ फिर कह रहे सबसे बड़ा पाप परनिंदा सम 00:30:22 अघन गरी निंदा से जैसा बड़ा कोई दूसरा पाप नहीं. 00:30:32 थोड़ी घनी निंदा तो भाई हम सब करते सुनते ही रहते हैं उससे पहले हम कह देते हैं भाई कहना 00:30:41 तो नहीं चाहिए पर चलो कह देते हैं ऐसे दो लोग बात करते हैं तो कह रहे कि अच्छा तुमको 00:30:47 एक बात बताए देखो वैसे से कहना तो नहीं चाहिए पर देखो ऐसा हो रहा है देखो इसको कहते हैं 00:30:54 अब आत्म विवेक का अनादर इसको. 00:30:57 कहते आत्म ज्ञान का अनादर आपको पता है नहीं कहना चाहिए फिर भी कह रहे हो आप और मुझे लगता 00:31:04 है किसी के अनादर से बड़ा तो अपना ही अनादर है अपना ही अनादर व्यक्ति करता है जानता है कि 00:31:09 मार्ग ठीक नहीं है फिर चलता है यह काम ठीक नहीं है फिर करता 00:31:16 है अभी बात सुनकर सब मुस्कुरा दिए थे माने सब ऐसा करते हैं ना थोड़ी बहुत कहने सुनने में ऐसे 00:31:24 निंदा हो जाती है. 00:31:28 अच्छा फिर कभी-कभी हम यह भी कह देते हैं भाई सत्य है इसमें निंदा क्या है तो सत्य है हम 00:31:33 कह रहे हैं पर संत कहते हैं संतों की रहनी संतों की कहनी कुछ और है संत क रे भलो 00:31:45 बरो संसार तेरे भावे जो करे भलो बरो 00:31:56 संसार. 00:31:57 नारायण तू बैठ के अपनो भवन 00:32:06 बुहा अरे निर्णय करने वाला न्याय करने वाला कोई बैठा है जा की जैसी भावना ऐ सोही फल 00:32:17 दे और फिर ध्रुव दस जी तो बहुत सावधान करते हैं पर निंदा के किए ते आवत कछु नहीं हाथ 00:32:17 . 00:32:27 ये ये ये पंक्ति सदा स्मरण रखनी चाहिए क मूर्ख पर्वत पाप को ले चलो अपने 00:32:36 साथ भगवान ने भी नवदा भक्ति का उपदेश करते हुए बात कही है सुपने नहीं देख पर दूष निंदा के 00:32:44 मूल में क्या है निंदा के मूल में प्रदोष दर्शन ही तो है तभी तो आप निंदा कर रहे हो 00:32:51 निंदा के मूल में क्या है प्रदोष दर्शन है भगवान ने सीधी निंदा की बात ना कह के मूल काटने 00:32:56 की बात कही है. 00:32:57 इसका मूलो छेद किया जाए पर दोष दर्शन हुही 00:33:04 नहीं करनी हो तो अपनी निंदा करो चार लोगों में बैठक अपनी निंदा 00:33:12 करो निंदा ही करनी है तो अपनी निंदा करो संत संत अपनी बात कहकर सुनाता है मौसम कौन कुटिल खल 00:33:21 कामी कहे जा रहे हैं सूरदास जी हो सब पति तन को राजा सूरदास कह रहे हो सब. 00:33:27 पति तन को राजा क को कर सके बराबरी मेरी बो पाप में मेरी बराबरी कौन कर सकता है सामर्थ 00:33:35 हो तो फिर ऐसी अपनी निंदा करो अपना दोष 00:33:43 बखान पर पर निंदा के किए ते आवत कछु नहीं हाथ और यहां तो गोस्वामी जी कह भाई इसके जैसा 00:33:50 पर निंदा सम अघन गरीसा इसके समान कोई भारी पाप नहीं है. 00:33:59 कितना पुरुषार्थ करके परिश्रम करके कितनी मेहनत करके आप भजन साधन करते हो थोड़ी देर किसी की निंदा की जो 00:34:07 किया था सब सब गांठ का धन गवा दिया और केवल गांठ का धन ही नहीं गवाया क मूर्ख पर्वत 00:34:15 पाप को ले चलो अपने 00:34:20 साथ निंदा करना कि जीभ से किसी का मल साफ करना है जीभ से. 00:34:27 से निंदा करते हो ना ऐसा ऐसा निंदनीय है ये कैसा गणित है ये क पर निंदा सम अघन गरीसा 00:34:36 और फिर आगे तो गोस्वामी जी ने कहा है क्या गति होती है उसकी सबके निंदा जे जड़ करही ते 00:34:50 चमगादर होई अवतर सबकी निंदा करने वाला. 00:34:57 बो चमगादड़ होकर आता है गोस्वामी जी कह रहे हैं अ वो तो त्रिकालदर्शी महापुरुष है ठीक ही कह रहे 00:35:05 होंगे य जो मूर्ख मनुष्य सबकी निंदा करते हैं चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं चमगादड़ माने जिसके हिस्से अंधकार ही 00:35:14 अंधकार आता है अंधकार ही 00:35:22 अंधकार एक और बात है भाई होता क्या है फिर. 00:35:26 ऐसे कहते सुनते यह वृत्ति हमारा अभ्यास बन जाती है फिर वही बात स्वभाव में आ जाती है जो बात 00:35:35 स्वभाव में आए उससे छुटकारा पाना लगभग लगभग असंभव हो जाता है बहुत कठिन तो है ही जो बात स्वभाव 00:35:42 में आ जाए इसलिए मैंने कहा थोड़ा सा भी अपना दोष देखो दौड़ कर जाओ प्रभु से प्रार्थना करो दो 00:35:51 माला करो नाम जप करो नाम की ओट लीजिए. 00:35:56 प्रभु मैं अपनी संभाल नहीं कर पा रहा हूं मैं अपने बल अपनी शक्ति से इस दोष को दूर नहीं 00:36:01 कर पा रहा हूं आप कृपा करो और मैं वाणी को विराम देने से पहले फिर आपसे कह रहा हूं 00:36:05 अपना अनुभव आपसे बांट रहा हूं आप सच्चे हृदय से प्रार्थना करोगे प्रभु तुरंत स्वीकार करते हैं कोई ना कोई 00:36:12 मानक बनेगा कोई ना कोई घटना घटेगी या तो भीतर घटेगी या बाहर घटेगी कि आपको आपको उस वृत्ति से 00:36:20 आपको उस दूषित वृत्ति से प्रभु बाहर निकालेंगे.

कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji |

कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji | 

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given

1. हरि भक्ति की संजीवनी और सत्संग की महिमा The Life-Giving Power of Hari Bhakti and Satsang 2. भवसागर पार करने का एकमात्र उपाय: हरि भजन The Only Way to Cross the Ocean of Worldly Existence: Hari Bhajan https://www.youtube.com/watch?v=azHpbv6BXgg [00:18] श्रद्धा की औषधि: गुरु द्वारा दी गई हरि भक्ति की संजीवनी जड़ी को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए। The Medicine of Faith: The life-giving herb of Hari Bhakti given by the Guru should be received with complete faith and trust. [01:23] मन की निर्मलता: करोड़ों यत्न करने के बाद भी मन तब तक निर्मल नहीं होता जब तक प्रभु की कृपा और सच्चे संत का मार्गदर्शन न मिले। Purity of the Mind: Even after making millions of efforts, the mind does not become pure until one receives the grace of the Lord and the guidance of a true saint. [02:49] भजन का महत्व: अम्बरीष जी स्पष्ट करते हैं कि बिना हरि के भजन के जीवन के क्लेश और कष्ट कभी समाप्त नहीं हो सकते। The Importance of Bhajan: Ambrish Ji clearly explains that the troubles and sufferings of life can never come to an end without Hari Bhajan. [06:26] राम कथा और मर्यादा: डोंगरे जी महाराज का प्रसंग सुनाते हुए वे कहते हैं कि कृष्ण कथा का अधिकारी बनने के लिए पहले राम कथा के संयम और मर्यादा को अपनाना आवश्यक है। Ram Katha and Discipline: While narrating an incident involving Dongre Ji Maharaj, he explains that to become qualified to hear Krishna Katha, one must first adopt the restraint and discipline taught through Ram Katha. [12:49] असंभव को संभव: कागभुशुण्डि जी कहते हैं कि जल मथने से घी निकलना या बालू से तेल निकलना भले ही संभव हो जाए, पर हरि भजन के बिना भवसागर पार करना असंभव है। Making the Impossible Possible: Kakbhushundi Ji says that churning water to produce ghee or extracting oil from sand may somehow become possible, but crossing the ocean of worldly existence without Hari Bhajan is impossible. [16:47] भक्त का दैन्य भाव: भगवान का सच्चा भक्त अत्यंत विनम्र होता है। कागभुशुण्डि जी स्वयं को 'अधम पक्षी' कहकर अपनी विनम्रता और प्रभु की असीम कृपा को दर्शाते हैं। The Humility of a Devotee: A true devotee of God is extremely humble. Kakbhushundi Ji calls himself an 'inferior bird,' expressing his humility and acknowledging the Lord's infinite grace. [25:05] सत्संग की महिमा: शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि सत्संग के समान जगत में दूसरा कोई लाभ नहीं है, और यह केवल हरि की कृपा से ही सुलभ होता है। The Glory of Satsang: Lord Shiva tells Mother Parvati that there is no greater benefit in the world than Satsang, and it is accessible only through the grace of Hari. [32:04] गुरु के प्रति कृतज्ञता: गरुड़ जी कागभुशुण्डि जी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वे उनका ऋण कभी नहीं चुका सकते, बस उनके चरणों में बार-बार प्रणाम कर सकते हैं। Gratitude Toward the Guru: Garuda Ji expresses his gratitude toward Kakbhushundi Ji, saying that he can never repay his debt to him and can only repeatedly offer obeisances at his feet. https://www.youtube.com/watch?v=azHpbv6BXgg -----

Full Transcript


कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji |  00:00:00 रघुपति भगति सजीवन 00:00:07 मूरी अनु पान श्रद्धा मति पूरी आइए श्री रघुनाथ जी की भक्ति यही संजीवनी जड़ी है जो गुरु ने दी 00:00:18 है श्रद्धा के साथ इसका पान करना है य औषधि श्रद्धा के साथ लेनी है मैं तो कई बार आपको 00:00:28 कहता हूं भाई प्रभु की हमसे मिलने की इच्छा नहीं होती तो हमारे जीवन में मानक बनता ही कैसे हम 00:00:36 कोई ऐसे भारी पुण्य आत्मा है जो अपने पुण्य के बल से यहां पहुंच गए कोई है जो यहां तक 00:00:45 लाया है और जो यहां तक लाया है जोर से बोलो वो आगे भी लेकर जाएगा क्योंकि वो पूर्ण है 00:00:57 जो भी कार्य करता है पूर्ण ही करता है 00:01:03 जो गुरु ने व जो हरि भक्ति की संजीवनी जड़ी दी है गुरु के वचन पर विश्वास करके श्रद्धा सहित 00:01:11 नित्य निरंतर उस औषधि का पान करना है यही विधि भले सो रोग न 00:01:23 साही नात जतन कोटि नहीं जा कह रहे गरु सावधान क्योंकि आप बड़े ज्ञानी है आप आप समर्थ है आप 00:01:37 भगवान के पार्षद है पर फिर भी ध्यान रखिए क ही विधि भले ही सरोग न साई ऐसे तो भले 00:01:46 यह रोग नष्ट हो जाए बोले नहीं तो जतन कोटि नहीं नहीं तो कोटि जत्न करने से भी मन स्वस्थ 00:01:54 नहीं होता मन निर्मल नहीं होता नहीं होता इसलिए तो कहते भाई यह गुण साधन ते नहीं हुई क श 00:02:06 श्री रघुनाथ जी की कृपा हो कोई सच्चा संत मिल जाए और फिर सच्चा संत भी मिले और उसके वचन 00:02:11 में विश्वास भी हो जाए श्रद्धा भी हो जाए तभी नारद जी भक्ति सूत्र में कह रहे मत संगस तु 00:02:18 दुर्लभ हो फिर कह र अगम्य अमोग कहने से पहले यह दो बातें कही है पहले तो दुर्लभ है मिलेगा 00:02:26 ही नहीं अग मिल भी जाए तो व्यक्ति अपनी ता से अपनी मूर्ता से संत को पहचानता नहीं है संत 00:02:34 मिल भी जाए तो उसके वचन में श्रद्धा नहीं होती विश्वास नहीं 00:02:40 होता हम तो भाई देखो कहीं से भी आरंभ करें आपको बात तो एक ही बताएंगे बिन हरि भजन न 00:02:49 जाही 00:02:52 कलेसा बिन हरि 00:02:58 भजन 00:03:03 और फिर अंत में क्योंकि अब चर्चा को विश्राम की ओर ले जाना है फिर कागस जी अंत में कह 00:03:12 रहे हैं सब करमत खग नायक यहा आरंभ में क्या कहा था निज अनुभव अब कह खगे सा हरि भजन 00:03:31 न जाही कले हा हा गाओ गाओ बिन हरि 00:03:44 भजन बस रोज अपने मन को भी सुनाते रहना यह बात रोज आप अपने मन को भी सुनाते रहना कि 00:03:52 बिन हरि भजन न जाही कलेसा आरंभ में यह कहा था और फिर अब क्या कह रहे हैं सब कमत 00:04:02 खग नायक 00:04:06 यहा करय राम पद पंकज नेहा करि राम पद पंकज श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहा श्रुति पुराण 00:04:35 सब रघुपति भगति बिना सुख 00:04:43 नाही 00:04:48 भ ये दो चौपाई याद कर लो निज अनुभव अब कह खगे सा 00:05:06 बिन हरि भजन न जाही 00:05:12 कलेसा 00:05:18 ह श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहा 00:05:28 हीरा 00:05:32 बहारी रघुपति भगति बिना सुख नाही 00:05:46 ख राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:05:59 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजाराम राम राम जय 00:06:13 सीताराम राम राम जयीता राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम एक 00:06:26 बार प्रात स्मरणीय श्री डोंगरे जी महाराज बंबई कथा कहने के लिए गए श्रीमद् भागवत की कथा होनी थी पांडाल 00:06:37 में पहुंचे व्यासपीठ पर विराजमान 00:06:42 हुए और ऐसा विशुद्ध संत शताब्दियों में कभी एक बार आता है इस धरा धाम को पवित्र करने के लिए 00:06:51 और उने राम कथा आरंभ कर दी अब जो यजमान थे उन्होंने स कथा के बाद पूछा कथा तो भागवत 00:07:05 जी की होनी थी आपने राम कथा आरंभ कर दी उन्होने उत्तर दिया कि भागवत में अगली बार कहूंगा यहां 00:07:18 के जन समूह को देखकर मुझे लगा पहले इनको राम कथा सुननी चाहिए फिर मैं आकर इनको कृष्ण कथा सुनाऊ 00:07:26 श्रीमद् भागवत में भी कृष्ण के पावन चरित्र से पहले श्री रघुनाथ जी का चरित्र 00:07:35 है जब तक जब तक ऐसी मर्यादा ऐसा संयम ऐसा आचरण ना हो तब तक जीव कृष्ण कथा का अधिकारी 00:07:47 नहीं है दुख होता है कभी मैं देखता हूं कल ही मुझे कौन दिखा रहा था किसी विश्व प्रसिद्ध संस्था 00:07:59 का एक सन्यासी जो अपने आप को वैष्णव कहते हैं मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता यहां से विश्व 00:08:08 प्रसिद्ध वह संस्था है और उसका एक सन्यासी और जब व श्री कृष्ण और गोपियों की बात कर रहा है 00:08:16 तो क्या उदाहरण दे रहा है गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड यही वो लोगों को सिखा रहा है लोग भी बैठकर ताली 00:08:23 पीट रहे हैं इसलिए इसलिए कहा है कि भाई अधिकारी से बात ना करें अनाधिकार स चर्चा ना करें श्रीमद् 00:08:36 भागवत के प्रत्येक अध्याय के विश्राम के समय लिखा य परम हंसों की संगिता है यह तो परम हंसों का 00:08:45 चिंतनीय विषय है जो अमला अपमा जन है व वो पुनः पुनः इस पावन चरित्र का चिंतन करते हैं और 00:08:51 मैं देख रहा हूं माथे पर वैष्णव तिलक है गले में तुलसी की कंठी है विश्व प्रसिद्ध वो संस्था उसका 00:08:57 वो सन्यासी और देखा मैंने बड़ा प्रसिद्ध भी है और जब श्री कृष्ण और गोपियों की बात कर रहा है 00:09:03 तो यह उदाहरण दे रहा है यह 00:09:10 उदाहरण तो मुझे बड़ा दुख हुआ मुझे बड़ी पीड़ा हुई और फिर धीरे धीरे संतों का सिद्धांत हृदयम हो रहा 00:09:20 है देखो भाई राम कथा हो या कृष्ण कथा है तो हरि की कथा ना मन को निर्मल पावन करने 00:09:28 वाली पर अनेक अनेक सिद्धांत श्री राम कथा में ऐसे हैं जो हमारी भक्ति की भाव की जो भूमिका है 00:09:39 उसको सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है परम आवश्यक है और फिर आज तो जैसा अब भाई समय की गति 00:09:47 है जैसा हो रहा है अब तो मैं तो बहुत स संकोच बोलता हूं कि भाई क्या कहना चाहिए क्या 00:09:55 नहीं कहना चाहिए क्यों क्योंकि हमको संत सावधान कर चुके हैं कि अधिकारी से बात करे तो रस आप जाए 00:10:02 अंतर परे निसंदेह कल से यहां श्रीमद् भागवत की चर्चा आरंभ होगी और मैंने कहा यह परम हंसों की संगीता 00:10:13 है केवल आचार्यों की गुरुजनों की कृपा का बल लेकर 00:10:20 ही हम इस पावन अनुष्ठान में प्रवेश कर सकते 00:10:27 हैं मैं तो फिर भी सब सब विचार कर अंत में अंत में धन्यवाद देता हूं प्रभु का कि उसके 00:10:34 गुण उपकार का पा सकू नहीं पा य श्री काग बसु जी ने कहा ना कि श्री रघुनाथ जी की 00:10:43 कृपा और संयोग बन जाए ऐसे यहां हम पर लाड़ली लाल की कृपा हुई और यह संयोग बन गया है 00:10:51 य संयोग बन 00:10:55 गया राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:11:07 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम हरे रामा रामा 00:11:19 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:11:33 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:11:47 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:12:01 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:12:14 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:12:28 राम रामा रामा राम सीता राम राम राम बारी मथे गृत हो बरु सताते 00:12:49 बरते श काग ब सुंडी जी कह रहे बोले जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए जो 00:12:59 किसी भी काल में असंभव है क भले ऐसा हो जाए बारी मथे गृत 00:13:12 होई और कह बालू को पेरने से भले तेल कोई निकाल ले यह तो हो सकता है हो सकता है 00:13:21 कासुंडी कह र भले यह हो जाए 00:13:26 पर बारी मथे त होई ब सताते 00:13:38 रुते बिन हरि भजन न भव तरिए यह सिद्धांत अपे यह सिद्धांत कले बर्फ से अग्नि प्रकट हो जाए ये 00:13:57 सब अनहोनी बातें हो जाए हो जाए शी श्री राम जी से विमुख होकर कोई सुखी नहीं हो सकता बिन 00:14:05 हरि भजन ना भव तरिए यह सिद्धांत 00:14:12 अपे मस कहीं करई रंच प्रभु अजही म सकते 00:14:23 ही और सावधान कर रहे गरुड़ जी को क्योंकि गरुड़ जी जाएंगे शुभकामना दे रहे हैं बड़ी विनम्रता पूर्वक गणु 00:14:34 जी ध्यान 00:14:38 रखिए य जो प्रभु है क मस कही कर रंच प्रभु मसक माने मच्छर बोले प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर 00:14:51 दे और ब्रह्मा को नहीं ब्रह्मा को मच्छर 00:14:58 नहीं 00:15:02 तुलसी बाबा तो तुलसी बाबा है कर मस कही करई बिरंचि प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर दे और ब्रह्मा को 00:15:10 अजही मसक ते हीन और बोले उसको मच्छर से भी हीन कर सकते हैं एक क्षण में अस विचार तज 00:15:20 संशय कह रहे दोबारा ऐसा संशय ना करना प्रभु को नाग पाश में बंदे देखकर ही तो आपको मोह हुआ 00:15:27 था अरे वो करतु करतु मन्य था तु कुछ भी कर सकते हैं भाई इसलिए जो भी हो रहा हो 00:15:33 उसको देखकर तेरी माया का ना पाया कोई पार के लीला तेरी तू ही जाने तेरी माया का ना पाया 00:15:55 कोई पर भाई प्रभु कृपा करते हैं जब किसी को अपने ऐसे स्वरूप का अनुभव कराते हैं सोई जाने ही 00:16:05 देहु जनाई सोही जाने जो प्रभु की कृपा से प्रभु को जानता है और जिसको प्रभु समझाना चाहते हैं इसको 00:16:17 दिखाते हैं प्रभु अपना निज स्वरूप अपना विशुद्ध स्वरूप का बसु जी बड़भागी है इसलिए कह रहे कि हे गरुड़ 00:16:26 जी सचा तज 00:16:32 संशय राम ही भज 00:16:37 प्रवी राम ही भज और अंत में श्री काग ब सुंडी जी ने अपने लिए जो कहा है व यह 00:16:47 बताता है कि भगवान की भक्ति कैसा दैन्य प्रसाद स्वरूप देती है भगवान का भक्त कितना दीन कितना विनम्र होता 00:16:55 है आप देखिए हमने चर्चा आरंभ की थी कहां से कि महादेव 00:17:05 देवादित्य में क्या कहते हैं देख गरुड़ निज हृदय 00:17:15 विचारी मैं रघुवीर भजन अधिकारी रे गरुड़ जी आप अपने मन में विचार करके देखिए कि क्या मैं किसी भी 00:17:30 प्रकार से भगवान के भजन का अधिकारी हूं सकुना धम अरे पहले तो पक्षी हूं और पक्षियों में भी पक्षियों 00:17:42 में भी अधम हूं सकुना 00:17:57 धम 00:18:03 सखु ना धम सब भाति 00:18:10 अवन प्रभु मोहि की विदित 00:18:27 जग सकुना धम सब भाति 00:18:38 अवन प्रभु मोहि की विदित जग पा देखो एक तो मैं अधम पक्षी सब भाति अपवित्र और देखो कैसे प्रभु 00:18:51 ने मुझे जगत को पावन करने वाला प्रसिद्ध कर दिया महादेव मेरी स्तुति करते हैं आप कहते हैं और मैं 00:19:00 मन में यह विचार करता हूं कि किसी भी प्रकार से क्या मैं किसी भी प्रकार से श्री रघुनाथ जी 00:19:07 के भजन का अधिकारी हूं अ आप ही विचार करिए देख गरुड़ निज हृदय बचारी का बुी जी के शब्द 00:19:18 बता रहे भगवान का भक्त कैसा होता है कैसा भक्त का हृदय होता है कैसे भक्त सदा प्रभु के निकट 00:19:27 रहते हैं 00:19:34 बड़ा ना जाने पाए हैं साहिब के 00:19:44 दरबार द्वारे ही पे लागी है सहजो मोटी मा यही तो कल मैं आपको कह रहा था भाई संत मिले 00:20:00 जिसमें संत 00:20:05 हो भगवान का भक्त जिसको भगवत सत्ता की अनुभूति है जो अनुभव प्राप्त है व तो भाई किसी भी प्रकार 00:20:13 से कोई श्रेय कोई प्रतिष्ठा कोई सम्मान स्वीकार नहीं कर सकता है कर ही नहीं सकता 00:20:22 है आप देखो गरुड़ जी कौन है भगवान के पार्षद उनको मोह उनके मोह को दूर काग बु सुंडी ने 00:20:30 किया है कैसी सामर्थ्य श्री काग बु सुंडी जी की मैं कई बार विचार करता हूं जब श्री विठल दास 00:20:37 जी ने एक विषय राजा को अपने रोम रोम में वृंदावन का दर्शन करवा दिया दर्शन करा 00:20:47 दिया और जब राजा ने कहा कि मैं आपके शरणागत हूं तो श्री विठ्ठल दास क्या कहते हैं कि मेरे 00:20:57 गुरुदेव विराजमान ने शरण ग्रहण करनी हो तो उन्हीं की ग्रहण करिए आप देखो विठ्ठल दास जी समर्थ है तभी 00:21:03 तो उस राजा को दर्शन करा दिया जो वस्तु का दर्शन करा रहा है साधिकारथा होगी और उनके हृदय का 00:21:12] ैन्य देखिए कि हम तो उनके उनके चरणों के सेवक हैं आपको शरण ग्रहण करनी है तो फिर हमारे स्वामी 00:21:21 की ग्रहण करिए गरुड़ जी के मोह का नाश श्री काग बसु जी ने अपनी वाणी से किया है गुरु 00:21:29 की सामर्थ्य है इसीलिए इसीलिए पहले ही श्री गरुड़ जी ने कागी जी को गुरु के स्थान पर बैठा दिया 00:21:35 और बड़ी विनम्रता पूर्वक य सब प्रश्न पूछा है शास्त्र का विधान तो यही कहता है बिना गुरु बुद्धि के 00:21:41 प्रश्न नहीं करना चाहिए आपको स्मरण हो तो मैंने गत सत्र में निवेदन किया था पहले पहले गरुड़ जी श्रोता 00:21:50 बन के कथा सुनते रहे पर फिर फिर उन्होने श्री काग बसु जी को गरुड़ गुरु के स्थान पर बैठाया 00:21:58 स्वयं शिष्य के स्थान पर बैठे तो काग बुजी जी गुरु है और किसके गुरु गरुड़ जी के गुरु हो 00:22:03 गए काग बुजी उनके उनके मोह का नाश कर दिया अपने शब्द से अपनी वाणी से य तो गुरु का 00:22:10 ही लक्षण है ना महा मोह तम पुंज जहा सु वचन रवि कर बंद गुरु पद कंज और कृपा सिंधु 00:22:18 नर रूप हरि और व काग बसु अब कथा विश्राम हुई है अब यह संवाद विश्राम की ओर जा रहा 00:22:27 है 00:22:30 राई के दाने जितना भी श्रे लेने को तैयार नहीं है गरुड़ जी बारबार प्रणाम कर रहे हैं और वह 00:22:35 कह रहे हैं देख गरुड़ निज हृदय विचारी मैं रघुवीर भजन अधिका सकुना धम सब भाति अवर प्रभु मोही की 00:23:01 विदित जग पा और इससे पहले गरुड़ जी कुछ कहते कासुंडी जी ने दोनों हाथ जोड़ लिए भाई कथा तो 00:23:09 पूरी हो गई अपने आसन से उतर आए हैं आज धन्य में धन्य अति जदपि सब विधि हीन निज जन 00:23:22 जानी राम मोही संत समा 00:23:31 संत समागम यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन हू और एक और बात जिनका मन लीन है हरि भक्ति में 00:23:46 लीन है उनके लिए श्री सेवक जी महाराज कह रहे हरिवंश नाम लीन जे अजात शत्रु ते सदा प्रपंच दंभ 00:23:54 आदि द तहा कछु न पखी ये सब बातें तो हम लोग भी कभी कभी कहते हैं पर हम लोगों 00:24:01 का कहना दंब मात्र है जब भक्त कह रहा है तो वैसा ही अनुभव कर रहा है व वैसा ही 00:24:08 अनुभव कर रहा है तभी कह रहा है संत वही तो है ना जिसकी जिसकी कथनी करनी एक हो मनस्य 00:24:15 एकम वस्य एकम कर्मण्य एकम स साधु जिसकी कथनी करनी एक हो वही तो साधु है इनकी कथनी करनी एक 00:24:24 है वो कह रहे हैं यद मैं सब विधि जद सब विधि हीन निज जन जानी राम मोही संत समागम 00:24:41 दी संत समागम य तो प्रभु ने केवल मुझ पर कृपा की है मुझे अपना जन जान के सत्संग दिया 00:24:51 है संत समागम दीन आगे महादेव कहेंगे गिरिजा संत समा समना लाभ 00:25:05 कछुआ संतो की कृपा से गुरु कृपा से मन अनुभव करता है मैं अपनी बात कहूं मन अनुभव करता है 00:25:14 कि गिरिजा संत समागम समन लाभ कचुवा पर क्या करू मेरे पास वैसी वाणी वैसे शब्द नहीं है जो मैं 00:25:20 आपको बता सकू समझा सकू कैसा लाभ है य कैसा सुख है संत मिलन सम सुख जग नाही जन्म जन्म 00:25:29 का अनादि काल से भटकता हुआ जीव सदमा पर आ जाता है यह यह सत्संग का फल है तभी ध्रुव 00:25:38 दस जी ने कहा मोल तोल सब फिर गयो और पायो नाम फुलेल कहान होई सत्संग देखो तिल और तेल 00:25:47 कहा जन्म जन्म से भटक भटक रहे थे हम संत मिला सद मार्ग मिल गया मोल तोल सब बदल जाता 00:25:57 है किसकी महिमा है सत्संग की महिमा है गिरिजा संत समागम समना लाभ 00:26:11 कछुवा बिन हरि कृपा ना होई सो गाव ही वेद पुराण गाव ही वेद पुराण शिव अज पूज्य चरण 00:26:35 रघुराई मो पर कृपा परम मृदु लाई अस सुभव कह सुन ना देख केही खगे रघुपति समले कैसी अपने इष्ट 00:26:57 के प्रति भावना हो ऐसा दर्शन य तुलसी बाबा करा रहे हैं जिन श्री रघुनाथ जी के चरण शिवजी और 00:27:04 ब्रह्मा जी के द्वारा पूज्य हैं उनकी मुझ पर ऐसी ऐसी कोमल करुणा है ऐसी कृपा है कह रहे हे 00:27:13 गरुड़ जी मेरे श्री रघुनाथ जी जैसा स्वभाव ना तो मैंने कभी देखा है और ना मैंने कभी सुना है 00:27:23 सुन भूसुंडी के वचन शुभ देख राम पद ने बोले प्रेम सहित गिरा गरुड़ विगत 00:27:42 संदे तब गरुड़ जी बोले श कासुंडी जी का व दिव्य प्रेम वैभव देखकर प्रेम का भी तो अपना एक 00:27:50 वैभव होता है वो प्रेम वैभव देखकर श्री गरुड़ जी बोले मैं कृत कृत्य य तब बानी सुन रघुवीर भगति 00:28:05 रस सानी राम चरण नूतन रती भई माया जनित विपत सब गई य मेरी नवीन प्रीति हो गई है प्रभु 00:28:22 के चरणों में तो इसी कारण जो नित्य बना रहता है ना सत्संग में उसका प्रेम उसका अनुराग उसका भाव 00:28:32 भी नित्य नवाय मान रहता है एक बार मुझसे किसी ने पूछा था बोले वही तो कथा है मैंने क 00:28:42 गैया वही दूध तो देती है रोज देखने में एक जैसा ही होता है स्वाद भी एक जैसा है और 00:28:48 उसका नित्य पान करने से पोषण तो नित्य नवीन प्राप्त होता है ऐसे ही भगवान की कथा है ऐसे ही 00:28:54 भगवत चरित्र है पर जब कोई प्रणाम करता है त आशीर्वाद देना चाहिए गरुड़ जी ने प्रणाम किया है कागस 00:29:06 आशीर्वाद भी देते हैं तो देखो कैसे भगवान का भक्त कैसा है कैसी उसकी चेष्टा है कैसे उसका कैसा उसका 00:29:15 एक एक आचरण 00:29:21 है जा सु नाम भव भेषज हरण 00:29:31 यस जिनका नाम जन्म मरण रूपी रोग की औषध और आदि दैविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की भयंकर 00:29:42 पीड़ा और ताप को हरने वाला है कासुंडी आशीर्वाद दे रहे हैं गरुड़ जी प्रणाम कर रहे हैं और व 00:29:51 व्यासपीठ पर भी बैठे हैं पर कैसे दे रहे हैं आशीर्वाद ज सु नाम भव भे सज हरण घोर त्रय 00:30:03 सूल सो कृपाल मोहितो पर सदा रह अनुकूल सदा रह अनुक वो श्री रघुनाथ जी पहले तो मुझ पर मैं 00:30:22 दीन हीन हूं मैं कृपा पात्र हूं पहले मुझ पर और फिर आप पर भी सदा अनुकूल रहे हैं ऐसा 00:30:29 आशीर्वाद काग ब सुंडी दे रहे मुझे मुझे इतना आनंद हुआ जब ये पंक्ति मैंने पढ़ी कि काग बसु आशीर्वाद 00:30:37 देरहे पर कैसे बोले श्री रघुनाथ जी पहले तो मुझ पर अनुकूल हो और फिर आप पर अनुकूल रहे 00:30:48 हैं मुझसे कोई पूछे कि एक शब्द बताइए इस मानस का सार क्या है एक शब्द तो जैसे श्री गोसाई 00:30:57 विट्ठलनाथ जी कहते ना हे गोकुलेश आपकी कृपा का हेतु एक मात्र दैन्य है वो दैन्य इस मानस का सार 00:31:04 है अंतिम बात मेरे तुलसी बाबा यही कह रहे हैं मोसम दीन न दीन हित तुम समान 00:31:18 रघुवीर अस विचार रघुवंश मणि हर भ 00:31:37 भीर फिर गरु जी अंत में कह रहे हैं मो पही होईना प्रति 00:31:56 उपकाराची प्रति उपकार करो का तोरा मैं आपका ऋण तो नहीं चुका सकता सदा सदा आपका आपका ऋणी हूं बस 00:32:04 बंदे तब पद 12 ही बारा बस बार बार बार बार बार बार आपके चरणों में प्रणाम करता हूं यही 00:32:13 मैं आपको सदा कहता हूं भाई गुरु को बस ऐसे भाव से प्रणाम ही तो किया जा सकता है और 00:32:17 क्या ही निवेदन करेंगे 00:32:22 उसको जिसने मन को स्वस्थ किया है जिसने दुरंत मोह का भंजन किया है जिसने इस जीवन को प्रभु के 00:32:32 योग्य बनाया है जिसकी कृपा से प्रभु अनुकूल हुए हैं उसको क्या निवेदन किया जाएगा इन संतों का इन भक्तों 00:32:41 का इन भागव तों का आचरण आपको मुझे बता रहा है कह रहे गरुड़ जी मो पही होई ना प्रति 00:32:55 उपकाप बारही 00:33:01 इसलिए श्री हरदास जी कहते हैं कहे कथा और अर्थ 00:33:11 विचारे आप तरे औरन को 00:33:25 तारे कहर मिले 00:33:40 हरिदासा जनम जनम की पूरी 00:33:54 आशा क्या कहकर गरुड़ जी विदा ले जीवन जन्म सुफल मम 00:34:07 भय सफल मम भय तब प्रसाद सब संशय गय जाने ह सदा मोहि निज किंक पुनि पुनी उमा 00:34:31 महादेव मां भवानी से कह रहे हैं यह कहकर गरुड़ जी प्रस्थान किए हैं हे नाथ मैं आपका ऋण तो 00:34:40 नहीं चुका सकता प्रति उपकार तो नहीं कर सकता बस इतना ही आपको निवेदन करके प्रस्थान करता हूं कि आप 00:34:50 सदा सदा के लिए मुझे अपना सेवक जानिए देखो जो नारायण के पर् वो नारायण स्वरूपी होते हैं जो भगवत 00:35:01 पार्षद है वो भगवत स्वरूपी हैं गरुड़ जी भगवत पार्षद 00:35:10 है यहां इस लीला के माध्यम से अंतिम सिद्धांत भगवान क्या प्रतिष्ठित कर रहे हैं राम ते अधिक राम करि 00:35:24 दासा राम ते अधिक राम करि दासा दासु चरण सिर नाय कर प्रेम सहित मति धीर गय गरुड़ बैकुंठ तब 00:35:43 हृदय राख रघुवीर महादेव कह रहे भाई इसके बाद गरुड़ जी बैकुंठ को गए और मां भवानी ने कहा हमसे 00:35:53 भी आप कुछ कह दीजिए काग बुस जी ने कथा के अंत में एक सिद्धांत कहा ना कि बिन हरि 00:36:01 भजन न भव तरी यह सिद्धांत अपेल आपने भी हमको कथा सुनाई है आप भी अंत में हमको कोई एक 00:36:06 बात कह दीजिए महादेव मुस्कुराकर क्या बात कह रहे हैं गिरिजा संत समागम समना लाभ कछु आन बिन हरि कृपा 00:36:22 ना होई सो गाव ही वे पुराण गाव ही वेद पुराण कहा कि हे गिरजे संत समागम के समान कोई 00:36:39 दूसरा लाभ नहीं है प्रभु जब अनुकूल होते हैं विशुद्ध कृपा भगवान की होती है तब कोई ऐसा संत मिलता 00:36:48 है तब ऐसा कोई संयोग बनता है सार की बात एक बार पुनः आपको निवेदन करूं भु सुंडी जी सावधान 00:36:58 करते हुए कह रहे भाई ये मानस रोग अनेक अनेक अनेक प्रकार की औषधियां युक्तियां करने पर भी समूल नष्ट 00:37:05 नहीं होते और कह रहे बड़े-बड़े मुनियों के मन में फिर विषय सुख और उसकी संभावना अंकुरित हो जाती है 00:37:14 तो बेचारा मनुष्य क्या है मनुष्य की गिनती किसम है यह शब्द तुलसी बाबा ने प्रयोग किया का नर बापुरे 00:37:22 बेचारा मनुष्य क्या करेगा जो बड़े-बड़े धीर मती मुनि है तपस्वी है उनके मन में भी विषय सुख की कामना 00:37:32 अंकुरित हो जाती 00:37:36 है तो जब गरुड़ जी थोड़े निराश हुए भाई फिर करें क्या बोले राम की कृपा हो राम कृपा से 00:37:43 बोले संयोग बन जाए सदगुरु बैद वचन 00:37:50 विश्वासा गुरु के पहले तो गुरु मिल जाए और फिर गुरु के वचन पर विश्वास हो जाए तब ये तब 00:38:00 रोग नष्ट होता है और एक और बात कही है भूलना नहीं इस विधि भले हो जाए तो हो जाए 00:38:07 जैसे श्री नाभादास जी महाराज जब श्री महाप्रभु जी का परिचय देते हैं तो क व्यास सुवन पथ अनुसरे सोई 00:38:15 भले पहचान ये जो भले कहा है ना माने इस पथ पर चलने वाला तो भले पहचान ले तो पहचान 00:38:21 ले ऐसे अंत में कह रहे हैं बोले हरि की कृपा से भले येय मन निर्मल हो जाए तो हो 00:38:27 जाए भले अन्यथा अन्यथा तो कोई साधन नहीं है कोई युक्ति नहीं ये मन हो निर्मल तुम्हारी कृपा से इसे 00:38:43 शुद्ध करने में हम तोहे हारे अगर नाथ 00:38:56 देखो 00:39:14 माए तो हम कैसे भव से लगेंगे 00:39:23 किनाए ये पावन चरित्र प्रभु की कृपा से प्रभु की प्रेरणा से प्रभु के प्रसाद से कहकर सुनकर हम यहां 00:39:35 प्रभु के चरणों में निवेदन करते हैं ऐसे तो यह भाव जगत की बात है कहने की बात नहीं है 00:39:41 फिर भी मैं कह रहा हूं कि जैसा मैंने आपको कहा था इस जीवन में इस जन्म में इस जीवन 00:39:52 में मेरा पहला परिचय श्री रामचरित मानस जी से हुआ इसलिए मैं प्रथम प्रणाम इन्हीं को निवेदन करता हूं और 00:40:04 जब संतों की कृपा से इस स्थान पर बैठने को मिला तो मैंने सबसे पहली कथा श्री हनुमान जी को 00:40:11 लक्ष्य करके सुनाई थी मेरे जन्म स्थान में हनुमान जी का एक सिद्ध स्थान है वही श्री हनुमान जी को 00:40:19 लक्ष्य करके मैंने भक्त माल की कथा सुनाई थी और तब से लेकर आज के दिन तक इस क्षण तक 00:40:31 उनकी कृपा उनका आशीर्वाद किसी ना किसी प्रकार से मुझे सदा मिलता रहा है ज मैंने यह प्रसंग आरंभ किया 00:40:39 था तो मन ही मन भाव से उनको निवेदन किया था पहली बात तो प्रभु चरित्र सुनि वे को रसिया 00:40:50 राम लखन सीता मन बसिया आपकी कृपा से आप अनुग्रह से ही कोई पवित्र अनुष्ठान सफल होता है यहां काग 00:41:02 बसु जी जैसे वक्ता है यहां महादेव जैसे वक्ता है यहां तुलसी बाबा जैसे वक्ता है वही बात मुझे कहनी 00:41:11 है प्रथम दिन मैंने भाव से उनको निवेदन किया था कि आप आप कृपा करके यहां पर विराजमान रहना आपकी 00:41:19 सन्निधि रहेगी तो हम हम हम कुछ कह सुन पाएंगे यहां कुछ कुछ यहां पर प्राप्त कर पाएंगे ऐसे तो 00:41:26 उनको निमंत्रण दे आवश्यकता नहीं होती जहां मंगल करण कलि मल हरण तुलसी कथा रघुनाथ की जहां यह पावन रघुनाथ 00:41:35 गाथा गाई जाती है वहां वह स्वत आकर विराजमान हो जाते हैं पर बीच में दो बार ऐसा श्री हनुमान 00:41:44 जी महाराज ने मुझे अपनी अपनी उपस्थिति का अनुभव कराया उनकी कृपा से ही मैं जो कह पाया उनकी कृपा 00:41:52 से कह पाया हूं कि यह कहना सुनना जो भी है इसके मूल में केवल केवल केवल आचार्यों की गुरुजनों 00:41:58 की संतों की कृपा है जो भी कहा गया इसमें जो सुंदर है वह भगवान का यश है और जो 00:42:04 त्रुटियां है वो मेरी है यही कहकर आज की चर्चा में लाली लाल जी के चरणों में निवेदन करता हूं 00:42:09 महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हृदयस्पर्शी

Tuesday, July 7, 2026

image drawing by chatgpt on Srimad Bhagavatam & Gita - wip

SB 4.16.8: When there is no rainfall and the citizens are in great danger due to the scarcity of water, this royal Personality of Godhead (King Pṛthu) will be able to supply rains exactly like the heavenly King Indra. Thus he will very easily be able to protect the citizens from drought.


SB 4.16.9: This King, Pṛthu Mahārāja, by virtue of his affectionate glances and beautiful moonlike face, which is always smiling with great affection for the citizens, will enhance everyone’s peaceful life.

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SB 4.16.10: The reciters continued: No one will be able to understand the policies the King (Pṛthu) will follow. His activities will also be very confidential, and it will not be possible for anyone to know how he will make every activity successful. His treasury will always remain unknown to everyone. He will be the reservoir of unlimited glories and good qualities, and his position will be maintained and covered just as Varuṇa, the deity of the seas, is covered all around by water.


SB 4.16.11: King Pṛthu was born of the dead body of King Vena as fire is produced from araṇi wood. Thus King Pṛthu will always remain just like fire, and his enemies will not be able to approach him. Indeed, he will be unbearable to his enemies, for although staying very near him, they will never be able to approach him but will have to remain as if far away. No one will be able to overcome the strength of King Pṛthu.

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SB 4.16.12: King Pṛthu will be able to see all the internal and external activities of every one of his citizens. Still, no one will be able to know his system of espionage, and he himself will remain neutral regarding all matters of glorification or vilification paid to him. He will be exactly like air, the life force within the body, which is exhibited internally and externally but is always neutral to all affairs.


SB 4.16.13: Since this King will always remain on the path of piety, he will be neutral to both his son and the son of his enemy. If the son of his enemy is not punishable, he will not punish him, but if his own son is punishable, he will immediately punish him.

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SB 4.16.14: Just as the sun-god expands his shining rays up to the Arctic region without impedance, the influence of King Pṛthu will cover all tracts of land up to the Arctic region and will remain undisturbed as long as he lives.


SB 4.16.15: This King will please everyone by his practical activities, and all of his citizens will remain very satisfied. Because of this the citizens will take great satisfaction in accepting him as their ruling king.

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SB 4.16.16: The King (Pṛthu) will be firmly determined and always situated in truth. He will be a lover of the brahminical culture and will render all service to old men and give shelter to all surrendered souls. Giving respect to all, he will always be merciful to the poor and innocent.


SB 4.16.17: The King will respect all women as if they were his own mother, and he will treat his own wife as the other half of his body. He will be just like an affectionate father to his citizens, and he will treat himself as the most obedient servant of the devotees, who always preach the glories of the Lord.

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SB 4.16.18: The King (Pṛthu) will consider all embodied living entities as dear as his own self, and he will always be increasing the pleasures of his friends. He will intimately associate with liberated persons, and he will be a chastising (crticising) hand to all impious persons.


SB 4.16.19: This King is the master of the three worlds, and he is directly empowered by the Supreme Personality of Godhead. He is without change, and he is an incarnation of the Supreme known as a śaktyāveśa-avatāra. Being a liberated soul and completely learned, he sees all material varieties as meaningless because their basic principle is nescience.

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SB 4.16.20: This King (Pṛthu), being uniquely powerful and heroic, will have no competitor. He will travel around the globe on his victorious chariot, holding his invincible bow in his hand and appearing exactly like the sun, which rotates in its own orbit from the south.


SB 4.16.21: When the King travels all over the world, other kings, as well as the demigods, will offer him all kinds of presentations. Their queens will also consider him the original king, who carries in His hands the emblems of club and disc, and will sing of his fame, for he will be as reputable as the Supreme Personality of Godhead.

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SB 4.16.22: This King (Pṛthu), this protector of the citizens, is an extraordinary king and is equal to the Prajāpati demigods. For the living facility of all citizens, he will milk the earth, which is like a cow. Not only that, but he will level the surface of the earth with the pointed ends of his bow, breaking all the hills exactly as King Indra, the heavenly King, breaks mountains with his powerful thunderbolt.


SB 4.16.23: When the lion travels in the forest with its tail turned upward, all menial animals hide themselves. Similarly, when King Pṛthu will travel over his kingdom and vibrate the string of his bow, which is made of the horns of goats and bulls and is irresistible in battle, all demoniac rogues and thieves will hide themselves in all directions.

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SB 4.16.24: At the source of the river Sarasvatī, this King will perform one hundred sacrifices known as aśvamedha. In the course of the last sacrifice, the heavenly King Indra will steal the sacrificial horse.


SB 4.16.25: This King Pṛthu will meet Sanat-kumāra, one of the four Kumāras, in the garden of his palace compound. The King will worship him with devotion and will be fortunate to receive instructions by which one can enjoy transcendental bliss.

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SB 4.16.26: In this way, when the chivalrous activities of King Pṛthu come to be known to the people in general, King Pṛthu will always hear about himself and his uniquely powerful activities.


SB 4.16.27: No one will be able to disobey the orders of Pṛthu Mahārāja. After conquering the world, he will completely eradicate the threefold miseries of the citizens. Then he will be recognized all over the world. At that time both the suras and the asuras will undoubtedly glorify his magnanimous activities.

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Monday, July 6, 2026

Radha Chalisa with word by word meanings

Radha Chalisa with word by word meanings

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https://www.youtube.com/watch?v=CpXSeob2UWM 2 https://www.youtube.com/watch?v=aPuszfH-i68 Radha Chalisa words : https://www.astromantra.com/radha-chalisa/ दोहा श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।   वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारम्बार ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधे = राधारानी   - वृषभानुजा = वृषभानु की पुत्री   - भक्तनि = भक्तों की   - प्राणाधार = प्राणों का आधार   - वृन्दाविपिन विहारिणी = वृन्दावन के वन में विहार करने वाली   - प्रणवौं = मैं नमस्कार करता हूँ   - बारम्बार = बार-बार भावार्थ:   मैं श्री राधारानी को बार-बार प्रणाम करता हूँ, जो वृषभानु की पुत्री हैं, भक्तों के जीवन-प्राण हैं और वृन्दावन में दिव्य विहार करने वाली हैं। 1 पहला पद जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।   चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥ शब्दार्थ:   - जैसो तैसो = जैसी भी हूँ   - रावरौ = आपकी   - कृष्ण प्रिया = श्रीकृष्ण को प्रिय   - सुखधाम = सुख का धाम   - चरण शरण = चरणों की शरण   - निज दीजिये = अपना दीजिए   - सुन्दर सुखद ललाम = सुंदर, सुख देने वाली, श्रेष्ठ भावार्थ:   हे राधे! मैं जैसा भी हूँ, मैं आपका ही हूँ। आप कृष्ण की प्रिया और परम सुख देने वाली हैं। कृपा करके मुझे अपने चरणों की शरण दीजिए। 2 दूसरा पद जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।   कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥ शब्दार्थ:   - जय = जय हो   - वृषभान कुँवरी = वृषभानु की कन्या   - श्री श्यामा = श्री श्यामा राधा   - कीरति नंदिनी = कीर्ति देवी की पुत्री   - शोभा धामा = शोभा का धाम भावार्थ:   श्री श्यामा राधारानी की जय हो, जो वृषभानु की कन्या और कीर्ति देवी की पुत्री हैं तथा सौंदर्य की साक्षात् मूर्ति हैं। 3  तीसरा पद नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।   अमित मोद मंगल दातारा ॥ शब्दार्थ:   - नित्य विहारिनि = सदा विहार करने वाली   - श्याम अधारा = श्रीकृष्ण का आश्रय   - अमित = अपार   - मोद = आनंद   - मंगल = शुभता   - दातारा = देने वाली भावार्थ:   राधारानी सदा कृष्ण के साथ दिव्य विहार करती हैं और अपार आनंद तथा कल्याण प्रदान करती हैं। 4 चौथा पद रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।   सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥ शब्दार्थ:   - रास विलासिनि = रास-लीला में विहार करने वाली   - रस विस्तारिनि = भक्ति-रस बढ़ाने वाली   - सहचरि = सखियों के साथ रहने वाली   - सुभग = सुंदर   - यूथ = समूह   - मन भावनि = मन को भाने वाली भावार्थ:   राधारानी रास-लीला की शोभा बढ़ाने वाली, भक्ति-रस का विस्तार करने वाली और सखियों के समूह को आनंद देने वाली हैं। 5 पाँचवाँ पद नित्य किशोरी राधा गोरी ।   श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥ शब्दार्थ:   - नित्य किशोरी = सदा किशोरी रूप वाली   - राधा गोरी = उज्ज्वल, सुंदर राधा   - श्याम प्राणधन = श्यामसुंदर के प्राणधन   - अति जिय भोरी = हृदय में अत्यंत प्रिय भावार्थ:   राधारानी सदा किशोरी रूप में विराजती हैं। वे श्रीकृष्ण के प्राणों की धन हैं और उनके हृदय में अत्यंत प्रिय हैं। 6 छठा पद करुणा सागर हिय उमंगिनी ।   ललितादिक सखियन की संगिनी ॥ शब्दार्थ:   - करुणा सागर = करुणा का समुद्र   - हिय उमंगिनी = हृदय में उमंग उत्पन्न करने वाली   - ललितादिक = ललिता आदि   - सखियन की संगिनी = सखियों की संगिनी, साथिन भावार्थ:   राधारानी करुणा से भरी हुई हैं और हृदय में आनंद जगाने वाली हैं। वे ललिता आदि सखियों के साथ सदा रहती हैं। 7 सातवाँ पद दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।   कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥ शब्दार्थ:   - दिनकर कन्या = सूर्य की पुत्री   - कूल विहारिनि = कुल में विहार करने वाली   - कृष्ण प्राण प्रिय = कृष्ण को प्राणों से प्रिय   - हिय हुलसावनि = हृदय को हर्षित करने वाली भावार्थ:   राधारानी सूर्यवंश में प्रकट होकर विहार करती हैं और श्रीकृष्ण के हृदय को आनंदित करती हैं। 8 आठवाँ पद नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।   राधा राधा कहि हरषावैं ॥ शब्दार्थ:   - नित्य = सदा   - श्याम = श्रीकृष्ण   - तुमरौ = आपका   - गुण गावैं = गुण गाते हैं   - हरषावैं = हर्षित होते हैं भावार्थ:   जो श्रीकृष्ण सदा आपके गुण गाते हैं और “राधा राधा” कहकर आनंदित होते हैं, वे धन्य हैं। 9 नवाँ पद मुरली में नित नाम उचारें ।   तुव कारण लीला वपु धारें ॥ शब्दार्थ:   - मुरली में = बांसुरी में   - नित = निरंतर   - नाम उचारें = नाम उच्चारण करें   - तुव कारण = आपके कारण   - लीला वपु = लीला-शरीर   - धारें = धारण करते हैं भावार्थ:   श्रीकृष्ण बांसुरी पर निरंतर आपका नाम उच्चारण करते हैं और आपकी लीला के लिए ही दिव्य रूप धारण करते हैं। 10 दसवाँ पद प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।   श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥ शब्दार्थ:   - प्रेम स्वरूपिणि = प्रेम का स्वरूप   - अति सुकुमारी = बहुत कोमल   - श्याम प्रिया = कृष्ण को प्रिय   - वृषभानु दुलारी = वृषभानु की लाड़ली भावार्थ:   राधारानी स्वयं प्रेम का स्वरूप हैं, अत्यंत कोमल हैं, कृष्ण को प्रिय हैं और वृषभानु की प्यारी पुत्री हैं। 11 नवल किशोरी अति छवि धामा ।   द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥ शब्दार्थ:   - नवल किशोरी = नई-नई किशोरी, सदा तरोताज़ा यौवन वाली   - अति छवि धामा = अत्यंत सुंदर रूप का धाम   - द्युति = कान्ति, चमक   - लघु लगै = छोटी लगे   - कोटि = करोड़ों   - रति कामा = कामदेव की रति, सौंदर्य भावार्थ:   राधारानी इतनी सुंदर हैं कि उनके सौंदर्य के सामने करोड़ों कामदेवों का सौंदर्य भी तुच्छ लगने लगता है। वे दिव्य छवि का साक्षात् धाम हैं। [youtube] 12 गौरांगी शशि निंदक बदना ।   सुभग चपल अनियारे नयना ॥ शब्दार्थ:   - गौरांगी = गौर वर्ण वाली   - शशि निंदक = चंद्रमा को लज्जित करने वाली   - बदना = मुख   - सुभग = सुंदर, सौभाग्यशाली   - चपल = चंचल   - अनियारे = अनूठे, विशेष   - नयना = नेत्र भावार्थ:   राधारानी का मुख चंद्रमा से भी अधिक सुंदर है। उनके नेत्र चंचल, मोहक और अत्यंत अनोखे हैं।  13 जावक युत युग पंकज चरना ।   नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥ शब्दार्थ:   - जावक युत = लाक्षारस से युक्त   - युग पंकज चरना = दोनों कमल-सदृश चरण   - नूपुर धुनि = पायल की ध्वनि   - प्रीतम मन हरना = प्रियतम का मन हरने वाली भावार्थ:   राधारानी के दोनों चरण कमल जैसे हैं और उन पर लाक्षारस की शोभा है। उनकी पायल की मधुर ध्वनि श्रीकृष्ण के मन को मोहित कर लेती है। 14 संतत सहचरि सेवा करहीं ।   महा मोद मंगल मन भरहीं ॥ शब्दार्थ:   - संतत = निरंतर   - सहचरि = सखियाँ   - सेवा करहीं = सेवा करती हैं   - महा मोद = अत्यंत आनंद   - मंगल = शुभता   - मन भरहीं = मन भर देती हैं भावार्थ:   राधारानी की सखियाँ सदा उनकी सेवा में लगी रहती हैं, और उनके साथ रहने से मन आनंद और मंगल से भर जाता है।  15 रसिकन जीवन प्राण अधारा ।   राधा नाम सकल सुख सारा ॥ शब्दार्थ:   - रसिकन = रसिक भक्तों के   - जीवन प्राण अधारा = जीवन का आधार, प्राण   - सकल सुख सारा = सभी सुखों का सार भावार्थ:   रसिक भक्तों के लिए राधारानी ही जीवन और प्राण का आधार हैं। उनका नाम ही सभी सुखों का सार है।  16 अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।   ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥ शब्दार्थ:   - अगम = जिन तक पहुँचना कठिन   - अगोचर = इंद्रियों से परे   - नित्य स्वरूपा = सदा रहने वाला दिव्य स्वरूप   - ध्यान धरत = ध्यान करते हैं   - निशिदिन = दिन-रात   - ब्रज भूपा = ब्रज के स्वामी, श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधारानी का स्वरूप इंद्रियों से परे और समझ से परे है। ब्रज के स्वामी श्रीकृष्ण भी दिन-रात उनका ध्यान करते हैं।  17 उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।   कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥ शब्दार्थ:   - उपजेउ = उत्पन्न हुए   - जासु अंश = जिनके अंश से   - गुण खानी = गुणों की खान   - कोटिन = करोड़ों   - उमा रमा ब्रह्मानी = उमा, लक्ष्मी, ब्रह्माणी आदि भावार्थ:   राधारानी के अंश से ही अनेक दिव्य शक्तियाँ प्रकट होती हैं। उमा, रमा, ब्रह्माणी जैसी करोड़ों देवियाँ भी उनके सामने गौण हैं।  18 नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।   जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥ शब्दार्थ:   - नित्य धाम = शाश्वत धाम   - गोलोक विहारिणि = गोलोक में विहार करने वाली   - जन रक्षक = भक्तों की रक्षक   - दुख दोष नसावनि = दुख और दोष नष्ट करने वाली भावार्थ:   राधारानी गोलोक की नित्य विहारिणी हैं और अपने भक्तों की रक्षा करके उनके दुख-दोष मिटा देती हैं। 19 शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।   पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥ शब्दार्थ:   - शिव अज मुनि = शिव, ब्रह्मा आदि ऋषि   - सनकादिक = सनक, सनंदन आदि   - नारद = नारद मुनि   - पार न पाँइ = अंत नहीं पा सके   - शेष अरु शारद = शेषनाग और सरस्वती भावार्थ:   शिव, ब्रह्मा, सनकादिक, नारद, शेष और सरस्वती भी राधारानी के गुणों की सीमा नहीं पा सके। 20 राधा शुभ गुण रूप उजारी ।   निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥ शब्दार्थ:   - शुभ गुण रूप उजारी = शुभ गुणों और सुंदर रूप से प्रकाशित   - निरखि = देखकर   - प्रसन्न होत = प्रसन्न होते हैं   - बनवारी = श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधारानी के दिव्य गुणों और सुंदर रूप को देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। 21 ब्रज जीवन धन राधा रानी ।   महिमा अमित न जाय बखानी ॥ शब्दार्थ:   - ब्रज जीवन धन = ब्रजवासियों का जीवन-धन   - महिमा अमित = अपार महिमा   - न जाय बखानी = वर्णन नहीं की जा सकती भावार्थ:   राधारानी ब्रजवासियों के जीवन की अमूल्य निधि हैं। उनकी महिमा का पूरा वर्णन करना असंभव है। 22 प्रीतम संग देइ गलबाँही । बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥ शब्दार्थ: प्रीतम = प्रियतम श्रीकृष्ण संग = साथ देइ = देकर गलबाँही = गले लगाना, आलिंगन बिहरत = विहार करती हैं नित = सदा वृन्दावन माँही = वृन्दावन में भावार्थ: राधारानी अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ आलिंगन करती हुई सदा वृन्दावन में दिव्य विहार करती हैं। उनका प्रेम अत्यंत आत्मीय और माधुर्यपूर्ण है। 23 राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा । एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥ शब्दार्थ: राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा = राधा और कृष्ण एक-दूसरे का नाम लेते हैं एक रूप = एक ही स्वरूप जैसे दोउ = दोनों प्रीति अगाधा = गहरी, असीम प्रेम भावार्थ: राधा और कृष्ण एक-दूसरे के नाम में ही लीन रहते हैं। दोनों का प्रेम इतना गहरा है कि वे दो होते हुए भी प्रेम की दृष्टि से एक ही प्रतीत होते हैं। 24 श्री राधा मोहन मन हरनी । जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥ शब्दार्थ: श्री राधा मोहन = राधा जी और मोहन श्रीकृष्ण मन हरनी = मन को हरने वाली जन = भक्तों के सुख दायक = सुख देने वाली प्रफुलित बदनी = प्रसन्न मुख वाली भावार्थ: राधा और मोहन दोनों भक्तों के मन को मोहित करने वाले हैं। राधारानी प्रसन्न मुख से भक्तों को सुख प्रदान करती हैं।[bhaktibharat] 25 कोटिक रूप धरें नंद नंदा । दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥ शब्दार्थ: कोटिक रूप = करोड़ों रूप धरें = धारण करें नंद नंदा = नंदलाल श्रीकृष्ण दर्शन करन हित = दर्शन देने के लिए गोकुल चंदा = गोकुल के चंद्रमा भावार्थ: गोकुल के चंद्रमा श्रीकृष्ण भक्तों को दर्शन देने के लिए अनेक रूप धारण करते हैं। वे प्रेमवश अपने भक्तों के लिए स्वयं को विविध रूपों में प्रकट करते हैं। 26 रास केलि करि तुम्हें रिझावें । मान करौ जब अति दुःख पावें ॥ शब्दार्थ: रास केलि = रास-लीला करि = करके तुम्हें रिझावें = आपको प्रसन्न करते हैं मान करौ = जब आप रूठती हैं अति दुःख पावें = बहुत दुःख पाते हैं भावार्थ: श्रीकृष्ण रास-लीला करके राधारानी को प्रसन्न करते हैं। जब राधा जी रुष्ट हो जाती हैं, तब श्रीकृष्ण बहुत दुखी हो जाते हैं और उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं। 27 प्रफुलित होत दर्श जब पावें । विविध भांति नित विनय सुनावें ॥ शब्दार्थ: प्रफुलित होत = अत्यंत प्रसन्न होते हैं दर्श = दर्शन जब पावें = जब पाते हैं विविध भांति = अनेक प्रकार से नित = सदा विनय सुनावें = विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं भावार्थ: जब श्रीकृष्ण राधारानी के दर्शन पाते हैं, तब वे अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और सदा उनके सामने विनम्रतापूर्वक अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। 28 वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा । नाम लेत पूरण सब कामा ॥ शब्दार्थ: वृन्दारण्य = वृन्दावन का वन विहारिणि = विहार करने वाली श्यामा = श्यामवर्णी राधा नाम लेत = नाम लेते ही पूरण = पूर्ण होते हैं सब कामा = सभी कार्य, इच्छाएँ भावार्थ: श्यामा राधारानी वृन्दावन के वन में विहार करती हैं। उनका नाम लेने मात्र से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। 29 कोटिन यज्ञ तपस्या करहु । विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥ शब्दार्थ: कोटिन = करोड़ों यज्ञ तपस्या = यज्ञ और तप करहु = करें विविध नेम व्रत = अनेक नियम और व्रत हिय में धरहु = हृदय में धारण करें भावार्थ: चाहे कोई करोड़ों यज्ञ, तपस्या, नियम और व्रत कर ले, फिर भी यदि राधा नाम की भक्ति न हो तो पूर्ण फल नहीं मिलता। बाहरी साधनाओं से अधिक महत्वपूर्ण राधा-भक्ति है। 30 तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें । जब लगि राधा नाम न गावें ॥ शब्दार्थ: तऊ न = तब भी नहीं श्याम = श्रीकृष्ण भक्तहिं = भक्त को अपनावें = अपनाते हैं जब लगि = जब तक राधा नाम न गावें = राधा नाम का गान न करे भावार्थ: जब तक भक्त राधा नाम का गान नहीं करता, तब तक श्रीकृष्ण भी उसे अपने प्रेम में पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करते। राधा-नाम कृष्ण-प्राप्ति की कुंजी है। 31 वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा । लीला वपु तब अमित अगाधा ॥ शब्दार्थ: वृन्दाविपिन स्वामिनी = वृन्दावन वन की स्वामिनी राधा = राधारानी लीला वपु = लीला-शरीर तब = तब उनका अमित = असीम अगाधा = गहरा, अथाह भावार्थ: राधारानी वृन्दावन वन की स्वामिनी हैं। उनका लीला-स्वरूप असीम और गूढ़ है, जिसे पूरी तरह समझ पाना कठिन है। 32 स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।   और तुम्हें को जानन हारा ॥ शब्दार्थ:   - स्वयं कृष्ण = श्रीकृष्ण स्वयं   - पावैं नहिं पारा = पूर्णतः पा नहीं सकते, अंत नहीं पा सकते   - और = अन्य   - तुम्हें = आपको   - को जानन हारा = कौन जान सकता है भावार्थ:   राधारानी की महिमा इतनी गहरी है कि स्वयं श्रीकृष्ण भी उनके स्वरूप की सीमा नहीं पा सकते। फिर अन्य कोई उन्हें पूरी तरह कैसे जान सकता है।  33 श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।   सादर गान करत नित वेदा ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधा रस = राधा-भाव, राधा का प्रेम-रस   - प्रीति अभेदा = प्रेम से अभिन्न   - सादर = आदरपूर्वक   - गान करत = गान करते हैं   - नित = निरंतर   - वेदा = वेद भावार्थ:   राधारानी का प्रेम-रस और प्रीति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। वेद भी आदरपूर्वक उनकी महिमा का गान करते रहते हैं।  34 राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।   ते सपनेहुँ जग जलधि न तरिहैं ॥ शब्दार्थ:   - त्यागि = छोड़कर   - भजिहैं = भजन करेंगे   - सपनेहुँ = स्वप्न में भी   - जग जलधि = संसार-सागर   - न तरिहैं = पार नहीं कर पाएँगे भावार्थ:   जो लोग राधा को छोड़कर केवल कृष्ण-भजन करना चाहते हैं, वे संसार-सागर से पार नहीं हो सकते। राधा-भक्ति के बिना भक्ति अधूरी मानी गई है।  35 कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।   सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥ शब्दार्थ:   - कीरति कुँवरि = कीर्ति देवी की पुत्री   - लाड़िली = अत्यंत प्रिय   - सुमिरत = स्मरण करने से   - सकल = सब   - भव बाधा = संसार की बाधाएँ भावार्थ:   कीर्ति देवी की प्यारी पुत्री राधारानी का स्मरण करने से जीवन की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं। 36 नाम अमंगल मूल नसावन ।   त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥ शब्दार्थ:   - नाम = नाम   - अमंगल मूल = अशुभ का मूल   - नसावन = नष्ट करने वाला   - त्रिविध ताप = तीन प्रकार के दुःख   - हर = हरने वाले   - हरि मनभावन = हरि को प्रिय भावार्थ:   राधा नाम अशुभताओं के मूल को नष्ट कर देता है और तीनों प्रकार के तापों का नाश करता है। यह नाम भगवान हरि को भी अत्यंत प्रिय है।  37 राधा नाम लेइ जो कोई ।   सहजहि दामोदर बस होई ॥ शब्दार्थ:   - लेइ = लेता है   - जो कोई = जो भी   - सहजहि = सहज रूप से   - दामोदर बस होई = भगवान कृष्ण के वश में हो जाता है भावार्थ:   जो भी राधा नाम लेता है, वह सहज ही श्रीकृष्ण के प्रेम-आकर्षण में आ जाता है।  38 राधा नाम परम सुखदाई ।   भजतहि कृपा करहिं यदुराई ॥ शब्दार्थ:   - परम सुखदाई = परम सुख देने वाला   - भजतहि = भजन करने वालों पर   - कृपा करहिं = कृपा करते हैं   - यदुराई = यदुवंश के स्वामी, श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधा नाम सबसे बड़ा सुख देने वाला है। जो इसका भजन करता है, उस पर श्रीकृष्ण कृपा करते हैं। 39 यशुमति नंदन पीछे फिरिहैं ।   जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥ शब्दार्थ:   - यशुमति नंदन = श्रीकृष्ण   - पीछे फिरिहैं = पीछे-पीछे चलेंगे   - जो कोऊ = जो कोई   - सुमिरिहैं = स्मरण करेगा भावार्थ:   जो व्यक्ति राधा नाम का स्मरण करता है, श्रीकृष्ण उसके पीछे-पीछे चलते हैं। यह राधा-नाम की महिमा बताता है। 40 रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।   करहु कृपा बरसाने वारी ॥ शब्दार्थ:   - रास विहारिणि = रास में विहार करने वाली   - श्यामा प्यारी = प्यारी श्यामा राधा   - करहु कृपा = कृपा कीजिए   - बरसाने वारी = बरसाने वाली राधा भावार्थ:   हे रास-विहारिणी श्यामा, हे बरसाने की प्यारी राधे, हम पर कृपा कीजिए। [astromantra](https://www.astromantra.com/radha-chalisa/) 41 वृन्दावन है शरण तिहारी ।   जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥ शब्दार्थ:   - वृन्दावन = वृन्दावन धाम   - शरण तिहारी = आपकी शरण   - जय जय जय = बार-बार जय   - वृषभानु दुलारी = वृषभानु की प्यारी पुत्री भावार्थ:   वृन्दावन आपकी शरण है। हे वृषभानु की प्रिय राधे, आपकी बार-बार जय हो।  42 श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।   करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधा सर्वेश्वरी = राधारानी, जो सबकी ईश्वरी हैं   - रसिकेश्वर = रसिकों के ईश्वर   - धनश्याम = श्रीकृष्ण   - करहुँ = करूँ   - निरंतर = सदा   - बास = निवास   - श्री वृन्दावन धाम = पवित्र वृन्दावन धाम भावार्थ:   हे श्री राधारानी, आप समस्त शक्तियों की अधीश्वरी हैं, और श्रीकृष्ण रसिकों के स्वामी हैं। मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा निवास सदा श्री वृन्दावन धाम में रहे।    समापन ॥ इति श्री राधा चालीसा ॥


Radha Chalisa - only Dohas (no meaning):
श्री राधा चालीसा

॥ दोहा ॥
श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारम्बार ॥

जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥

॥ चौपाई ॥
जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।
कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥

नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।
अमित मोद मंगल दातारा ॥

रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।
सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥

नित्य किशोरी राधा गोरी ।
श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥

करुणा सागर हिय उमंगिनी ।
ललितादिक सखियन की संगिनी ॥

दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।
कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥

नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।
राधा राधा कहि हरषावैं ॥

मुरली में नित नाम उचारें ।
तुव कारण लीला वपु धारें ॥

प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।
श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥

नवल किशोरी अति छवि धामा ।
द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥१०॥

गौरांगी शशि निंदक बदना ।
सुभग चपल अनियारे नयना ॥

जावक युत युग पंकज चरना ।
नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥

संतत सहचरि सेवा करहीं ।
महा मोद मंगल मन भरहीं ॥

रसिकन जीवन प्राण अधारा ।
राधा नाम सकल सुख सारा ॥

अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।
ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥

उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।
कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥

नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।
जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥

शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।
पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥

राधा शुभ गुण रूप उजारी ।
निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥

ब्रज जीवन धन राधा रानी ।
महिमा अमित न जाय बखानी ॥२०॥

प्रीतम संग देइ गलबाँही ।
बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥

राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा ।
एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥

श्री राधा मोहन मन हरनी ।
जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥

कोटिक रूप धरें नंद नंदा ।
दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥

रास केलि करि तुम्हें रिझावें ।
मान करौ जब अति दुःख पावें ॥

प्रफुलित होत दर्श जब पावें ।
विविध भांति नित विनय सुनावें ॥

वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा ।
नाम लेत पूरण सब कामा ॥

कोटिन यज्ञ तपस्या करहु ।
विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥

तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें ।
जब लगि राधा नाम न गावें ॥

वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा ।
लीला वपु तब अमित अगाधा ॥३०॥

स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।
और तुम्हें को जानन हारा ॥

श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।
सादर गान करत नित वेदा ॥

राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।
ते सपनेहुँ जग जलधि न तरिहैं ॥

कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।
सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥

नाम अमंगल मूल नसावन ।
त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥

राधा नाम लेइ जो कोई ।
सहजहि दामोदर बस होई ॥

राधा नाम परम सुखदाई ।
भजतहि कृपा करहिं यदुराई ॥

यशुमति नंदन पीछे फिरिहैं ।
जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥

रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।
करहु कृपा बरसाने वारी ॥

वृन्दावन है शरण तिहारी ।
जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥४०॥

॥ दोहा ॥
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥

॥ इति श्री राधा चालीसा ॥