Wednesday, August 5, 2026

वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 by Shri Hit Ambrish ji

वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 by Shri Hit Ambrish ji

https://youtu.be/qinGjpCVjog

First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.

00:00:00 और ये जो प्रोत शब्द है ना इस शब्द के गर्भ में हित है प्र उपसर्ग पूर्वक उत हित से 00:00:07 प्रोत बना है इसमें हित है जिसम विशुद्ध हित परक धर्म की बात कही गई है और जैसा कुछ क्षण 00:00:16 पहले मैंने आपसे कहा ना प्रभु के अतिरिक्त यह जीव कभी भी कहीं भी कुछ भी चाहे तू अपने लिए 00:00:26 पीड़ा की ही व्यवस्था कर रहा है पहले भी मैंने 00:00:30 आपसे निवेदन किया था यहां तो दुख भी दुख है भाई और सुख भी कहीं ना कहीं दुख ही छोड़कर 00:00:38 जाता है पीछे थोड़ी देर का सुख बड़ी देर का दुख छोड़ कर जाता है तभी ध्रुव दस जी कह 00:00:45 रहे हैं कि विषय चुगा जिन चुगे मन व जो काल रूपी बहेलिया है वह तो भाई विषय का चुग्गा 00:00:53 डालता ही है सबके सामने डालता है क विषय चुगा जिन चुगे मन चुगत कछु सुख हो 00:01:00 जब तू चुगेगा तो बो थोड़ी देर का सुख होगा विषय में भी क्षण भंगुर रस तो है ना अल्पकालिक 00:01:09 रस तो विषय में भी है ना हो तो कभी मन उसकी ओर आकर्षित नहीं होगा कभी पहले आपसे मैंने 00:01:17 संकेत किया ना भाई मन के पास बुद्धि नहीं है मन को तो रस चाहिए उसको आप भगवत रस नहीं 00:01:23 दोगे तो वो विषय के रस के पीछे दौड़ेगा मन को रस चाहिए मन के पास बुद्धि नहीं है 00:01:31 मन को तो रस चाहिए आप उसकी व्यवस्था कर दीजिए आप लगाए रहेंगे उसको कथा कीर्तन में भजन सत्संग में 00:01:39 सेवा सुमिरन 00:01:44 में सु नहीं दौड़ेगा उस ओ नहीं तो कोरी कोरी बात करने से तो भाई मन हाथ नहीं आता है 00:01:54 ध्रुव दस जी कह रहे विषय चुगा जिन चुग मन चुगत कछु सुख होई थोड़ा सुख 00:02:00 मिलेगा जैसे मैंने कहा ना यहां का सुख बड़ी देर का दुख छोड़ जाता है फिर फांसी ऐसी पर है 00:02:07 तीही सम दुख न 00:02:13 होई आज यहां से जाकर पाच मिनट नेत्र मूंदकर इस इस बात का विचार करना कि जब जब आपने जब 00:02:22 जब आपने संसार से सुख की इच्छा सुख की कामना की क्या आपकी झोली में दुख नहीं गिराकर 00:02:30 वही तो दुख का कारण बना और अगर अनुभव हो रहा हो कि हां भाई दुख ही मिला तो अपने 00:02:40 आप को सौभाग्यशाली जानना कि आप इसका अनुभव कर पा रहे हो नहीं तो मोह निद्रा में पड़ा जीव तो 00:02:46 अनेक अनेक जन्म इस दुख का अनुभव भी नहीं कर पाता है क्योंकि दुरंत मोह है अगर अगर लगे ना 00:02:54 ऐसा कि हां भाई चले तो थे सुख के पीछे हाथ दुख आया अगर ऐसा अनुभव हो तो समझना सौभाग्यशाली 00:02:59 हो 00:03:00 थोड़ा विवेक जगा है तभी यह देख पा रहे 00:03:07 हो श्री काक बसु जी ने गरुड़ जी से यही तो कहा ही विधि सकल जीव जग रोगी रे इन 00:03:15 मानस रोगों से सभी जीव पीड़ित हैं लेकिन कोई बरले होते हैं जो अपने रोग को पहचान पाते हैं क्योंकि 00:03:24 मनोरोगी अपने आप को रोगी समझता है नहीं क मैं स्वस्थ हूं सौभाग्यशाली 00:03:29 कोई होता है जो अपने रोग को पहचान पाता 00:03:36 है तो कुछ भी चाहते हो आप आप आप जान लेना समझ लेना भाई आप अपने लिए दुख की व्यवस्था 00:03:42 कर रहे हो अब कोई प्रश्न करेगा भाई क्या करें यहां कुछ चाहिए मत चाहो मत ये जो चाह है 00:03:53 ना बड़ी अमूल्य है इस चाह को प्रभु को निवेदन करो वो चाहने से वो मिल जाते हैं 00:04:01 इच्छा मत करिए अरे भाग्य कालिका झूली में आ गिरेगा रसिक अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी महाराज क अन 00:04:09 मांग आगे आवेगा आ ही 00:04:18 जाएगा चाहना प्रभु को ही है प्रभु से नहीं चाहना है प्रभु को चाहना है प्रभु को ही चाहना है 00:04:30 हजार बार यह बात अपने मन से कहोगे तब एक बार मन सुनेगा मानेगा नहीं सुनेगा भगवान ने गीता में 00:04:39 अभ्यास शब्द कहा ना किस बात का अभ्यास करना है हजार बार य बात आप अपने मन से कहोगे ना 00:04:44 नहीं चाहना है संसार को नहीं चाहना है संसार से अब कुछ हजार बार अपने मन को सिखाओ पढ़ाओ तब 00:04:51 एक बार मन सुनेगा और बड़ी देर में जाकर फिर मानेगा यही तो साधना है 00:05:02 इसलिए जब हम मानस जी का चिंतन कर रहे थे तो मैंने कहा था कि सुनकर फिर अपने मन को 00:05:08 भी सुनाना कथा पूर्ण तभी 00:05:14 होगी इसी का नाम अभ्यास है इसीलिए रोज आकर मैं बैठ रहा हूं या आप बैठ रहे हो कि कोई 00:05:20 एक विचार हमको यहां से मिले और फिर उस उस उस विचार का अपने मन को अभ्यास 00:05:28 कराए 00:05:30 सबसे पहले यही बात श्रीमद् भागवत में कही गई है कि भाई इसमें इसमें निष्कपट धर्म की बात है निष्कपट 00:05:37 धर्म माने विशुद्ध 00:05:43 भक्ति उत्तमा भक्ति उसी की चर्चा यहां भगवान वेदव्यास कर रहे हैं और फिर कह रहे हैं कि विशुद्ध अंतःकरण 00:05:53 वाले संतों के द्वारा जानने योग्य जो वस्तु है 00:05:59 फिर विचार हुआ भाई जानने योग्य क्या है जिसको जानकर य ज्ञात वा मतो भवती माने अगर मैं बहुत सरल 00:06:14 शब्दों में इसे कहूं भाई जिसको जानकर कुछ आनंद आए ना उसी को तो जानना चाहिए जिसको जानकर आनंद आए 00:06:22 जिसको जानकर आनंद की अभिवृद्धि हो और यहां नारद जी कह रहे बो जिसको जानकर यवा मतो भवति 00:06:30 कोई आनंद में उन्मत हो जाता है जैसे बाईसा कह रही है भाग खुल्या महारा साद संगत सु सांवरिया के 00:06:43 बट नित उठ हरि जीरा मंदिर जा स्या नाचा दे दे चुटकी मेरो मन लागयो हरि जी सु अब ना 00:06:58 रह 00:07:02 य ये किसी मत की अवस्था ही तो है ना य मता अवस्था है य जत मतो भवती कोई उमत 00:07:09 हो जाता है जसे शी कबीर साहेब कह रहे नाम चढ़ी उतरे नहीं भाई और चढ़ी छिन छिन चढ़ उतरे 00:07:19 नाम चढ़ी तो चढ़े सवाई और क कैसी है य ये खुमारी कैसी है देखत चढ़े 00:07:30 चढ़े अगर आपने कभी किसी भक्त को प्रेम में भाव में भरकर कभी गाते नाचते देखा हो तो आपको शायद 00:07:36 अनुभव वषण का आनंद कैसा होता है देखत चढ़े जब कोई भावा वेश में होता है ना तब उसके उसके 00:07:48 रोम रोम से एक विशिष्ट प्रकार का परमाणु नहीं प्रेमा निशित होता है जब कोई भावा आवेश में होता है 00:07:55 तभी भगवान कह रहे वा गद गदा द्रव यस चित्तम 00:07:59 सत्य भीषण को ल उदय त चम भक्ति यतो भुवन पुना कोई भावा वेश में होता है भक्त जब भाव 00:08:12 में वह अपने अपने अपने प्रियतम अपने स्वामी के निकट 00:08:19 है कैसे महादेव कथा सुनाते सुनाते समाधि स्त हो गए प्रभु कर पंकज कप 00:08:29 कैसी सा सुमिर सो दसा मगन गौरी रघुनाथ जी का कर कमल है श्री हनुमान जी का मस्तक है और 00:08:42 शंकर स्वयं केसरी नंदन महादेव को वही अपने मस्तक पर प्रभु के उस कर कमल की दिव्य सुखद अनुभूति हो 00:08:51 रही है महादेव समाधि हो गए तो जो भावा वेश में थे महादेव और जग 00:08:59 जबा महादेव का दर्शन कर कर के आनंदित हो रही है वहा महादेव कथा कहते कहते रुक गए समाधि लग 00:09:08 गई और जगदंबा को जो आनंद कथा श्रवण करने में आ रहा था वैसा ही आनंद महादेव की उस अवस्था 00:09:16 का दर्शन करने में भी आ रहा है भाव में मग्न य जञा मतो जिसको जानने से ऐसा आनंद मिले 00:09:25 वही जानने योग्य है अरे 00:09:29 उस दिन यही तो मैं आपसे कह रहा था संसार की कोई भी बात जान लो कांटे की तरह भीतर 00:09:34 जाकर चुभती है दो लोग आपस में बैठे हैं मैंने आपसे कहा था ना भाई अंत में व्यक्ति दुखी होता 00:09:47 है अपने दुख से दुखी होता है दूसरे के सुख से दुखी होता है दुखी होता है संसार की कोई 00:09:53 भी चर्चा कोई भी वार्ता मन में विक्षेप पैदा करती है आनंद नहीं विक्षेप 00:10:01 हां पर यह है कि मोह निद्रा में सोया जीव इस बात का अनुभव नहीं कर पाता लगा रहता है 00:10:06 निंदा में पिसता में ध्यान रखना कथा का अमृत भी कान सेही पिया जाता है पिवती भगवत आत्मन 00:10:21 सतामटका अमृत भी कान से ही पिया जाता है और संसार की विषैली वार्ता भी कान से ही भीतर जाती 00:10:28 है 00:10:31 ये जो सुनना है ना श्रवण जो है इसका बड़ा गहरा प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है सुनने का देखने 00:10:41 से भी ज्यादा सुनने 00:10:45 का बड़ा गहरा और बड़ा गंभीर प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है इसलिए सबसे पहले भगवान ने इसी इंद्रिय को 00:10:55 भक्ति में लगाने की बात कही है श्रवण भाई कथा सुनो 00:11:00 सबसे पहले कान को ही भक्ति में लगाने की बात क्यों की क्योंकि सबसे अधिक संसार यहीं से जाता है 00:11:05 भीतर विषय की वार्ता सुन सुनकर फिर विषय का आकर्षण होता है विषय की बात सुनकर विषय का आकर्षण होता 00:11:14 है फिर विषय का चिंतन होता है और चिंतन गाढ़ा हो जाए तो संस्कार बन जाता है संस्कार स्वभाव हो 00:11:23 जाता 00:11:27 है 00:11:31 सबसे पहले भगवान ने यही व्यवस्था की भाई सबसे पहले कान को लगाओ भजन में कान लगे भक्ति में प्रथम 00:11:39 भक्ति संतन करी संगा दूजी रति मम कथा प्रसंगा अच्छी बात सुनिए मुझे तो ऐसा लगता है भाई जो अच्छा 00:11:48 सुनेगा वह अच्छा सोचेगा जो अच्छा सोचेगा वह अच्छा समझेगा और जो अच्छा समझेगा वो अच्छा करेगा हम यही तो 00:11:57 कहते ना भाई सोच समझ कर करना 00:11:59 गलत सुनोगे गलत सोचोगे गलत सोचने वाला गलत ही समझेगा और जो सोचेगा और समझेगा ही गलत ठीक करेगा कैसे 00:12:11 तो गलत ही 00:12:16 करेगा क्यों बार-बार कुसंग से बचने की बात महापुरुष करते हैं क्यों क्योंकि कुसंग आपके विचार को दूषित करता है 00:12:25 आप गलत संग में रहोगे आपका विचार दूषित हो जाएगा 00:12:30 आप ठीक सोचोगे ही नहीं और ठीक सोचोगे नहीं तो ठीक समझोगे कैसे ठीक करोगे कैसे इसलिए अच्छा सुनिए मैं 00:12:39 बार-बार आपको कहता हूं शब्द भी एक प्रकार का आहार है जो आप कान से ग्रहण करते हैं आपका यह 00:12:45 आहार शुद्ध होना 00:12:49 चाहिए नहीं तो यह मानसिक विक्षेप पैदा करेगा मन बीमार हो जाएगा आप देखिए 00:12:59 मंथरा ने जो विष उगला कहां से प्रवेश किया उसने थोड़े समय के लिए यद्यपि य भगवान की लीला है 00:13:10 पर जो भी हुआ मंथरा ने जो विष उगला उसने कहां से प्रवेश किया कान से ही तो प्रवेश किया 00:13:17 व स्वार्थ में भरे जो शब्द थे व विषैले शब्द उसने क के कान में जाकर 00:13:27 डाले 00:13:29 और भरत जैसे महा भागवत को गर्भ में रखने वाली क कहीं और एका एक श्री राम को भरत जी 00:13:35 से भी अधिक स्नेह करने वाली श्री कह कई एका एक क्या कह बैठी क्या निर्णय ले लिया कान से 00:13:43 गलत आहार हु कुसंग हुआ कुसंग ने विचार दूषित 00:13:49 किया और भाई वैसे तो भगवान की लीला है पर देखो कुसंग का परिणाम क्या आया कुसंग का परिणाम यह 00:13:56 हुआ कि सदा सदा के लिए अपयश मिला 00:14:00 व अपयश की पात्र हो 00:14:04 गई बहुत कम लोग ही तो जानते हैं कि भाई ककई जी ने जो किया वह भगवान की इच्छा से 00:14:10 किया साधारण व्यक्ति तो आज कोई भी अपनी संतान का नाम ककही नहीं 00:14:18 रखेगा अगर हम इस दृष्टि से इसका विचार करें हुआ क्या कान से गलत आहार हुआ है फिर गलत सोचा 00:14:27 गलत समझा गलत कर दिया 00:14:32 इसलिए महापुरुषों ने कहा है भाई अपना अपना संग साफ सुथरा रखना गलत बात कान में जाने ना पाए इसलिए 00:14:40 आपको सुना रहा था उस दिन श्री गिरिराज वाले राध स्मरणीय पंडित श्री गया प्रसाद जी महाराज की बात वो 00:14:46 तो कहते थे खूब खाए ले खूब सोए ले और खूब भजन करे बोले कादना भजन में मन ना लगे 00:14:54 तो बोले चादर तान के भले सो जाए 00:14:58 पर संसार की वार्ता ना करें संसार की चर्चा ना करें मैं फिर दोहरा रहा हूं गनत प्रभाव होता है 00:15:09 आपकी चेतना पर जो आप सुनते हैं उसका मैं तो सदा ही कहता आया हूं भाई सबसे बड़ी शक्ति शब्द 00:15:17 की तो है गुरु के मुख से निकला एक शब्द जीव को भव पार करा देता है जीव भव से 00:15:23 पार हो जाता 00:15:27 है 00:15:30 निष्कपट धर्म है और इसमें उसकी चर्चा है जो महापुरुषों के द्वारा विशुद्ध अंतःकरण वाले संतों के द्वारा जानने योग्य 00:15:39 है जानने योग्य वस्तु क्या है भाई जिसको जानकर आनंद आए त्वा मतो भवति और फिर कहा स्तब्ध 00:15:51 भवती जिसको जानकर मन की उठा भटक लचल सब समाप्त हो 00:15:58 परम शांति प्राप्त हो जाए जिसको जानकर यवा मतो भवति स्तब्ध भवति स्तब्ध माने निष्क्रिय नहीं 00:16:13 शांत छोटे बच्चे कभी कभी खेल खेला करते ना उसको कहते स्टैचू जहा है वही पर रुक जाए ऐसे मन 00:16:19 जहा है वही रुक जाए 00:16:23 स्तब्ध और य जो स्तब्ध है एक एक स्तब्ध 00:16:29 तमोगुण जन्य होती है एक स्तब्ध सतोगुण जन्य होती है तमोगुण व्यक्ति भी पड़ा रहता है व उसको भी हिलना 00:16:36 डुलना अच्छा नहीं 00:16:41 लगता एक व्यक्ति तमोगुण होगा ना तो उसको भी बहुत हिलना डुलना अच्छा नहीं लगेगा माने उसको बहुत मेहनत करना 00:16:46 अच्छा नहीं लगेगा व बैठे बैठे सब काम हो जाए हमारे लेकिन वो जड़ता है और सत्व गुण से जो 00:16:54 प्राप्त होती है उसको स्थिरता कहते हैं एक जड़ता है एक स्थिरता है 00:16:59 एक व्यक्ति बिल्कुल स्थिर बैठा है दूर से कोई देखेगा तो लगेगा मूर्ति है कोई जड़ मूर्ति है ले व्यक्ति 00:17:07 स्थिर है एक व्यक्ति जड़ है तमोगुण से परिणाम आता है वह जड़ता है सत्व गुण से स्थिरता आती 00:17:17 है जिसको जानकर कोई मत हो जाए स्थिर हो जाए गीता में भगवान स्थित प्रज्ञ कहते हैं उसको सुख दुख 00:17:27 में 00:17:28 दुख में अ जो डोलता नहीं जैसे श्री धुप दास जी कह रहे सुख पाए फूले नहीं दुख पाए बिल 00:17:33 लाए बोले जिसको जानकर कोई स्थिर मति हो जाए स्थित प्रज्ञ हो जाए यवा मतो भवति सबसे पहले तो भाई 00:17:41 आनंद मिले जिसको जानकर आनंद 00:17:46 मिले कितने आनंद की बात है संत के मुख से जब आप ये सुनते हो भाई नहीं आप प्रभु के 00:17:51 हो प्रभु आपके हैं आज तक भाई इसी संसार को अपना समझे बैठे थे इतनी सी बात 00:17:58 इतनी सी बात ही तो पुड़िया में बांध कर दी थी रदास जी महाराज ने तभी तो मीरा जी कह 00:18:02 रही है गुरु मिला रदास जी दीनी ज्ञान की गु मीरा जी ने पूछा था कैसे हो जाएंगे यह मेरे 00:18:13 अरे दस जी ने कहा बेटा तू तो इन्हीं की है मीरा जी ने पूछा यह कैसे होंगे मेरे और 00:18:21 गुरु ने कहा तू पहले से ही इन्हीं की है बस इनका गुण 00:18:27 गाना 00:18:30 इतनी सी बात गुरु के मुख से सुनी आनंद आ गया आनंद आ गया गुरु के मुख से राम नाम 00:18:39 सुना कबीर सारी काशी में नाच रहे हैं राम नामी ओड़कर और कहत कबीर सुनो भाई साधो मन का सन 00:18:49 से भागा नाम रंग लागा मई राम रंग नागा 00:18:58 नाम रंग लगा मई नाम रंग ना जानकर आनंद आ गया मन के सन से दूर हुए मन आनंद मगन 00:19:13 अरे कबीर जी की जीवनी में तो यह लिखा है कि राम नामी ओड़कर कबीर नाच रहे हैं और वहां 00:19:19 ठाड़ी रोवे कबीर की माई राम नामी ओड़कर कबीर उस मोहल्ले में आ गए हैं सारे 00:19:28 यवन रहते हैं वहां माथे पर तिलक है अब ऐसे तो कबीर बड़े अलमस्त महापुरुष है पर उस दिन उस 00:19:37 दिन की उमंग कुछ और थी सीताराम सीताराम लिखाए माथे पर तिलक है राम राम राम करते आ गए कबीर 00:19:46 नाचते गाते य ज्ञात मव भवती मां रो रही है बोले अरे तो मोहल्ले में नहीं रहने देंगे हमें ठाड़ी 00:19:57 रोवे 00:19:58 कबीर की माई हे लड़का क्यों जपे रघुराई अ क्यों य लड़का राम का भजन करने लगा भाई अब खुदा 00:20:13 के कुफ्र से कौन बचाएगा हमको डर गई माता डर गई और कबीर गाते हैं कहे कबीर कोई संग ना 00:20:25 साथ जल थल रा 00:20:29 रहे रघुनाथ हमको पता चल गया हमारा हमारा स्वामी हमारा रक्षक कौन है गुरु ने बता दिया है गुरु ने 00:20:36 जना दिया है और उसको जानते ही हर मरे तो हम मरे हमरी मरे बला साचे गुरु का बालका मरे 00:20:54 ना मारा जाए कबीरा 00:20:58 मरे न माराजा यहां ये कह रहे वेदम वेदम वास्तव मत्र वस्तु शिवम ताप मूलन जानने योग्य क्या है जिसको 00:21:10 जानकर आनंद हो इसको जानकर परम शांति की प्राप्ति हो मन की दौड़ भाग समाप्त हो जाए जिसको जानकर वह 00:21:19 जानने योग्य है संसार की कोई किताब पढ़ो मन की दौड़ भाग और बढ़ जाती है बढ़ जाती है कि 00:21:26 नहीं बढ़ जाती 00:21:30 बोलो हां बताता हूं कैसे जब तक व्यक्ति कुछ नहीं जानता है पड़ा रहता है दो चार बात समझ में 00:21:36 आ जाए तो हमारी तरह समझाने निकल पड़ता है चार किताब और पढ़ ले फिर तो कहना ही क्या है 00:21:45 ध्यान रखना भाई जीवन में संत नहीं होगा तो बुध जनों का ऐसा कहना है कि विद्या विवादाय धन 00:21:59 मदाय शक्ति परेशान पर पीड़ना और लस साधो विपरीत में त ज्ञाना दाना च रक्षण अगर जीवन में संत नहीं 00:22:12 होगा जीवन में हरि की भक्ति नहीं होगी तो विद्या अर्जित करके क्या करोगे बोले विवाद करोगे विद्या विवाद आए 00:22:20 धन मिलेगा तो क्या करोगे बोले धन मिलेगा तो उन्मत हो जाओ शक्ति मिलेगी तो क्या करोगे दुर्बल को दन 00:22:27 को 00:22:28 अगर जीवन में भक्ति ना हुई जीवन में संत ना हुआ गुरु ना हुआ लिए विद्या विवाद में जाकर लगेगी 00:22:36 धन उन्माद बना देगा शक्ति आतताई कर देगी और इससे विपरीत लस साधो विपरीत मेत ज्ञाना दाना च रक्ष जीवन 00:22:53 में संत हुआ तो बताएगा भाई विद्या का फल विवाद नहीं है 00:22:59 किसी के किसी के अज्ञान भरे अंधकार भरे जीवन में ज्ञान का दीपक जलाना किसी को सन्मार्ग पर लाना आप 00:23:07 जपे रा नाम 00:23:13 जपा धन हो फिर सेवा करना दान आए और शक्ति हो तो रक्षण आए किसी दीन दुखी की रक्षा करना 00:23:24 उसकी सहायता करना उसका सहयोगी बनना उसका उसका अवलंब बनना 00:23:34 यहां जो यह शब्द भगवान वेदव्यास क रहे विद्यम जानने योग्य जानने योग्य वही है वही एक नहीं तो भाई 00:23:44 यहां कुछ भी जानोगे कहीं और चल 00:23:50 पड़ोगे मुझे याद आ रहा है कुछ समय पहले इसी एक हमारे बालक ने 00:23:57 मेरे पास में मुझे कहा मुझे बात बहुत अच्छी लगी उसने कहा कि बस ये जो आपने थोड़ा सा हमको 00:24:05 बता दिया है ना ये हमारे हैं हम इनके हैं अब इसके अलावा कुछ और जानना नहीं है हमको जानने 00:24:10 से डर लगता है और कुछ जानना नहीं चाहते हैं क्यक जो भी कुछ अन्य जानना है वह मन में 00:24:15 मन में उत्पाद करता है भाई व मन में विक्षेप करता है मैं तो आपको अपना एक अनुभव बता रहा 00:24:23 हूं कि जब संगीत शास्त्र का बिल्कुल 00:24:28 ज्ञान नहीं था तब कोई ऐसे भाव में भर कर भी गा रहा होता था हमको लगता था कितना बढ़िया 00:24:34 है हम भी उसका आनंद ले लेते थे थड़ी दो चार बात हमको समझ में आ गई तब सामने वाले 00:24:41 में कोई गलती हो तुरंत समझ में आती बो हा तो गलती हो गई अब उस गलती होने से हुआ 00:24:48 क्या व तो गलत है ही तुम तो उसको ठीक कर नहीं सकते हुआ क्या तुम्हारे रस में बिरस हो 00:24:55 गया तुम नहीं जानते थे तो 00:24:57 आनंद लेते थे चार बात समझ में आ गई तो यहां वहां दोष दिखाई पड़ता है दोष दर्शन होता है 00:25:07 अब क्या करें कुछ जाने ही नहीं सब जानिए पर जानने से पहले यह जान लीजिए सब जानिए पर जानने 00:25:16 से पहले यह जानना बड़ा आवश्यक है सोई कवि को विध सोई रण धीरा जो छल छ 00:25:29 भज 00:25:32 रघुवीरा जो छल छाड़ भज जितनी भी विद्या हैं इन सबकी सफलता भगवान के चरणों में पहुंच जाने में है 00:25:45 बस य पहले यह जान 00:25:49 लीजिए भगवान के बिना तो भाई कोई भी कोई भी वस्तु किसी भी प्रकार का ज्ञान 00:25:58 कोई भी कर्म अंत में उत्पात का ही कारण बनता है तो बड़ी सुंदर बात यहां भगवान वेदव्यास ने क 00:26:07 आरंभ में ही लिए हम इसमें निरूपण करेंगे निष्कपट धर्म का धर्म प्रित कत परमो निर्म सराणा सता और निर्म 00:26:21 सर विशुद्ध अंतःकरण वाले जो संत है उनके जानने योग्य जो वस्तु है उसकी बात हम इस इस ग्रंथ में 00:26:27 करेंगे 00:26:30 और वस्तु कैसी है शिवद शिवम ददा शिवम शिव अर्थात कल्याण जो कल्याण कराने वाली है भगवान शंकराचार्य कहते हैं 00:26:44 ना चिदानंद रूप शिवोहम 00:26:50 शिवोहम तो मैंने देखा एक बार कोई अपने ही सर पर बेलपत्र चढ़ रहे हैं पीछे ये बज रहा है 00:26:57 चिदानंद 00:26:58 शिह शि भगवत पाद शंकराचार्य का य ये विचार नहीं है मनो बुद्धि रंकार चित्तानी नाह नच शोत्र जिन च 00:27:09 ग्राण नेत्र न भूमि नमस न तेजो न वायु चिदानंद रूप शिवोहम शिव वो तो अपने कल्याण की उद्घोषणा कर 00:27:20 रहे हैं ब्रम ब्रम भवति सोई जाने देहु जनाई जानत तुम तुम होई जाई 00:27:28 मंगल स्वरूप कल्याण स्वरूप प्रभु को जानने वाले का भी तो मंगल हो जाता है उसका भी तो कल्याण हो 00:27:34 जाता है यहां तो निर्वाण टक में भगवत पाद शंकराचार्य अपने कल्याण की उद्घोषणा करे भाई हमारा कल्याण हो गया 00:27:41 है हमारे सब भ्रम दूर हो गए हैं हमको वह विमल ज्ञान प्राप्त हो गया 00:27:50 है तो हम एक एक शब्द पर चर्चा कर रहे विद्यम जानने योग्य वस्तु जानने योग्य वस्तु कौन सी है 00:27:57 सबसे पहले तो जिससे जिसको जानकर आनंद हो आनंद हो मन का विक्षेप बड़े नहीं शांत हो और फिर स्थिरता स्थिरता 00:28:13 की प्राप्ति हो मतो भवति स्तब्ध भवति अंत में देवऋषि कहते हैं आत्मा रामो भवती आत्मा रामो भवती 00:28:27 राम भवती अर्था जो असंग हो जाए कोई पूछे ना सत्संग का फल क्या है किसलिए किया जाना चाहिए सत्संग 00:28:38 सत्संग सिखाता है सबके संग रहते हुए असंग कैसे रहना है यही सत्संग का फल है सबके संग रहते हुए 00:28:45 असंग कैसे रहना है सबके संग तो रहना ही पड़ेगा भाई हम संसार में हैं सबके संग रहना पड़ेगा सबके 00:28:55 संग भी रहना पड़ेगा 00:28:58 और सौहार्द से रहना पड़ेगा नहीं तो फिर अपने लिए कांटा बो दोगे सबके संग रहना पड़ेगा इस भाव से 00:29:09 रहना पड़ेगा सोई सेवक जाके असी मति न टई हनुमंत मैं सेवक स चराचर रूप राशि 00:29:26 भगवन 00:29:31 जिसको जानने से पहले तो आनंद हो स्थिरता की प्राप्ति हो और व्यक्ति असंग हो जाए जीवन में जितने दोष 00:29:41 आते हैं वो संग से ही आते हैं जितने दोष जीवन में आते हैं व संग से ही आते 00:29:51 हैं और तत्वज्ञान 00:29:58 शरीर निज जा में भरे विकार कुछ ऐसा हो जिससे जिसे बार-बार मिलने वाले इस इस इस शरीर से भी 00:30:09 पीछा छूट जाए हम अपने अपने सहज स्वरूप में अपने वास्तविक स्वरूप में हमारे आचार्य के अनुसार हम अपने सखी 00:30:16 स्वरूप में स्थित हो जाए इस पंच भौतिक देह से कुदे हज जो मल है उससे उससे भी तो छुटकारा 00:30:26 हो सबसे 00:30:27 ड़ कुसंग तो यही 00:30:31 है मीरा जी इसी का ही तो अनुभव कर रही है जब कहती है कहा करू कछु बस नहीं मेरो 00:30:44 पाख नहीं उड़ जावन 00:30:51 की पाख नहीं उड़ जाव 00:31:00 कह रहा है ना कोई प्राण पिंजरे में कैद मन सांवरिया के पास प्राण है शरीर रूपी पिंजरे में कैद 00:31:14 है प्राण पिंजरे में कैद मन सांवरिया के पास मन सावरिया के पास है यह भी तो कुसंग है 00:31:27 महापुरुषों ने महापुरुषों ने अंत में इस इससे भी तो पीछा छुड़ाने की बात ही तो कही 00:31:42 है वेद्य वास्तव मत्र वस्तु शिवद ताप करयो मूलन ताप का उन्मूलन कर दे जड़ से समाप्त कर दे उनको 00:31:59 उस वस्तु की चर्चा हम हम यहां आगे करेंगे और फिर 00:32:22 साधिकारथा नाम सारम सारम समुद्रत 00:32:32 एक बात यहां से समझनी है श्रीमद् भागवत क्यों श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें निष्कपट धर्म की बात की गई निष्कपट 00:32:40 धर्म माने निष्काम 00:32:44 भक्ति और य उसी को प्रदान करने वाली है य स्याम शु मायाम कृष्ण परम पुरुष भक्ति य उसी विशुद्ध 00:32:53 भक्ति को प्रदान करने वाली भी है 00:32:57 श्रीमद भागवत महामुनि कृते किवा परवर सद दते कति 00:33:09 शना भाई इसकी महिमा सुन लो इसको जानने की इच्छा मात्र होते ही ध्यान से सुनना मैं श्लोक का 00:33:25 अदार्थी इच्छा 00:33:27 मात्र होते ही सद्य हृद्य रुते मेने भगवान हृदय में बंदी बनकर बैठ जाते हैं भागवत में प्रवेश करने से 00:33:40 पहले भागवत का प्रसाद बता रहे हैं भाई क्या क्या इसकी महिमा है क्यों ये श्रेष्ठ है क इसको जानने 00:33:48 की इच्छा भी हो जाए केवल मन में इच्छा हो कि हम भी श्रवण करें हम भी जाने फ केवल 00:33:54 इतनी इच्छा से ही भगवान हृदय में आकर बैठ जाते हैं 00:33:58 ये ये इसका इसका परम प्रसाद है फिर भगवान वेदव्यास कह रहे हैं तत क्षणात उसी क्षण आज जहां से 00:34:10 चर्चा आरंभ हुई देखो भाई संपत्ति तो श्रद्धा और विश्वास है महापुरुषों के वचनों में शास्त्र के वाक्यों में जितनी 00:34:18 श्रद्धा जितना विश्वास होगा उतना उसका फल प्रत्यक्ष 00:34:24 होगा इसलिए मैंने कहा 00:34:27 साधन करके अर्जित क्या करता है कोई श्रद्धा और विश्वास ही अर्जित करता 00:34:34 है एक है जो ठीक से सुन ही नहीं पा रहा है एक है सुनता तो है पर समझता नहीं 00:34:41 है पर एक है सुनते ही ग्रहण करता है श्रुति धर है सुना और ग्रहण कर लिया जय श्री हित 00:34:49 हरिवंश लाल ललना मिल हियो सरावत मोर नवल दस जी के मुख से व्यास जी ने सुना सुनते ही व्यास 00:34:55 जी ने कहा कि भाई 00:34:56 कि प्रेम की ऐसी अद्भुत अलौकिक अनिर्वचनीय स्थिति यह शब्द किसके हैं केवल सुना समझ गए भाई यह यह कौन 00:35:05 से धरातल पर कोई कोई कह सकता है गा सकता है दौड़कर आ गए पीछे मुड़कर देखा ही नहीं नवल 00:35:12 दस जी ने कहा चलेंगे वृंदावन बोले चलेंगे नहीं चलिए अभी चलिए और दौड़कर आ गए क्यों क्योंकि उनके पास 00:35:21 श्रद्धा और विश्वास की संपत्ति 00:35:25 है 00:35:26 उजला करती है मन जो श्रद्धा है मन को उजला करती है श्रद्धालु व्यक्ति सहज ही कृपा का पात्र हो 00:35:35 जाता है हम देखते हैं अपने जीवन में अनुभव करते हैं कभी-कभी कोई श्रद्धालु होता है उसका हमारा कोई परिचय 00:35:42 नहीं है कोई परिचय नहीं है श्रद्धालु है बस ऐसी कई मिला लेकिन बड़ी श्रद्धा से उसने प्रणाम किया है 00:35:50 उसके प्रणाम को देखकर सहजी मन से मन से एक शुभ कामना एक मंगल कामना 00:35:57 हो जाती उसकी श्रद्धा को देखकर उसकी श्रद्धा ने ले लिया आशीर्वाद बिना किसी परिचय के उसकी श्रद्धा ने आशीर्वाद 00:36:04 ले लिया पात्र बनाती है श्रद्धा उज्जवल श्रद्धा भगवत कृपा का पात्र बनाती 00:36:17 है तो क ऐसी वस्तु का इसमें निरूपण हुआ है जो जानने योग्य है शिव दम कल्याण करने 00:36:27 ताप त्रयो मूलन और जीव के तित ताप को नष्ट करने वाली है आज की वार्ता यही श्री जी के 00:36:35 चरणों में निवेदन करते हैं महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हदत प्रभु को भाव प्रभु को 00:36:55 नमन

Gist in Hindi with timestamps & English

वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 1. केवल प्रभु को चाहो, संसार को नहीं Desire Only the Lord, Not the World 2. सत्संग और श्रवण से चित्त की शुद्धि Purifying the Mind Through Satsang and Hearing https://youtu.be/qinGjpCVjog [00:00:16] प्रभु के अलावा जब भी यह जीव संसार से कुछ पाने की इच्छा करता है, तो वह अनजाने में अपने लिए केवल दुःख की ही व्यवस्था करता है। Whenever the soul desires to obtain anything from the world apart from the Lord, it unknowingly creates nothing but suffering for itself. [00:01:17] मन के पास अपनी कोई बुद्धि नहीं होती, उसे केवल रस चाहिए; इसलिए यदि उसे भगवद-रस नहीं दिया गया, तो वह स्वाभाविक रूप से विषयों के क्षणभंगुर रस की ओर दौड़ेगा। The mind has no intelligence of its own; it only seeks enjoyment. Therefore, if it is not given the divine taste of God, it will naturally run toward the fleeting pleasures of worldly objects. [00:04:18] मनुष्य को संसार या भगवान से कुछ सांसारिक वस्तुएं नहीं मांगनी चाहिए, बल्कि केवल और केवल प्रभु को ही चाहना चाहिए। One should not ask the world or God for worldly objects; one should desire only and only the Lord. [00:05:30] श्रीमद्भागवत में निष्कपट धर्म यानी विशुद्ध और उत्तम भक्ति का निरूपण किया गया है, जो संतों के लिए जानने योग्य परम तत्व है। The Srimad Bhagavatam describes sincere religion, meaning pure and exalted devotion, which is the supreme truth worthy of being known by saints. [00:09:29] संसार की व्यर्थ चर्चाएं चित्त में विक्षेप और अशांति लाती हैं, जबकि ईश्वर और सत्य को जानने से हृदय में परम आनंद और स्थिरता का उदय होता है। Useless worldly discussions create distraction and restlessness in the mind, whereas knowing God and the truth brings supreme bliss and stability to the heart. [00:10:31] श्रवण इंद्रिय का चेतना पर सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि जो बात हम सुनते हैं वही आगे चलकर हमारे विचार, संस्कार और स्वभाव का निर्माण करती है। The sense of hearing has the deepest influence on consciousness, because what we hear eventually shapes our thoughts, impressions, and character. [00:12:39] शब्द भी एक प्रकार के मानसिक आहार हैं, इसलिए कुसंग और विषैली बातों से बचकर केवल सत्संग और प्रभु कथा का ही श्रवण करना चाहिए। Words are also a form of mental nourishment. Therefore, one should avoid bad company and toxic speech and listen only to Satsang and the stories of the Lord. [00:22:12] जीवन में संत और भक्ति के बिना अर्जित की गई विद्या केवल विवाद और अहंकार को जन्म देती है, जबकि सद्गुरु के सान्निध्य में विद्या कल्याणकारी बन जाती है। Knowledge acquired without saints and devotion in life gives rise only to arguments and ego, whereas knowledge gained in the company of the Sadguru becomes beneficial and spiritually uplifting. [00:28:38] सत्संग का वास्तविक फल यह है कि वह मनुष्य को संसार के सभी बंधनों और लोगों के बीच रहते हुए भी अंतर्मन से असंग और शांत रहना सिखाता है। The true fruit of Satsang is that it teaches a person to remain inwardly detached and peaceful while living amidst all the bonds and people of the world. [00:33:27] श्रीमद्भागवत की महिमा इतनी अद्भुत है कि इसे श्रद्धापूर्वक सुनने या जानने की मात्र इच्छा करने से ही भगवान उस भक्त के हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं। The glory of the Srimad Bhagavatam is so extraordinary that merely listening to it with faith, or even desiring to know it, causes the Lord to come and reside in the heart of that devotee. https://youtu.be/qinGjpCVjog