ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 | by Shri Hit Ambrish ji
First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.
00:00:20 यप 00:00:25 दता कुछ ऐसा प्रश्न ऋषि पूछ रहे हैं जिसमें केवल उनका नहीं आप 00:00:30 का मेरा हम सबका कल्याण 00:00:35 है संत का ये ये एक विशिष्ट गुण है आप जपेगा और रा नाम जपा 00:00:51 है परम श्रद्धेय प्रात स्मरणीय श्री स्वामी रामसुख दास जी महाराज कई बार कहते थे बात कहते थे विचार करो 00:00:51 . 00:01:00 अगर प्रभु के मन में इस बात का संकल्प हो कि भाई सबका कल्याण हो जाए तो होही नहीं जाएगा 00:01:06 होही 00:01:09 जाएगा व तो पूर्ण काम है सत्य संकल्प है अगर भगवान का संकल्प हो भाई सबका कल्याण हो जाए तो 00:01:16 होही जाए जीव पर दया तो संत करता है इसीलिए भगवान कह रहे हैं भवान क भा हम तो देखो 00:01:24 आत्माराम है भगवान तो अपने स्वरूप में स्थित है 00:01:30 संत जब कहते ना बोले बार-बार मांगना प्रभु से यही बात मांगना पीछे लगे रहना इनके बड़ी देर के बाद 00:01:41 दीन दयाल के कान में भनक पड़ती है अभी तो संत कह रहे हरि नाम रटते रहो जब तक घट 00:01:47 में प्राण अरे कभी तो दीन दयाल के भनक पड़ेगी कान बड़ी देर के बाद भनक पड़ती है इनके कान 00:01:57 में क्योंकि हमको ऐसा लगता है ना भाई 00:01:59 बड़ा समय हो गया भजन करते करते अब यह तो भाई अनादि काल से हम जैसे जाने कितने कितने कितने 00:02:08 जीवों को देखते आ रहे हैं जैसा आपने चर्चा के आरंभ में कहा जीव सुधरता है फिर बिगड़ता है फिर 00:02:15 सुधरता है फिर बिगड़ता है और वहां श्रीमद वल्लभाचार्य महाप्रभु कह रहे बोले स्वभाव से ही दुष्ट है तो बहुत 00:02:26 जल्दी ध्यान नहीं देते ठाकुर जी 00:02:30 कोई लगा है लगा है ठीक है लगा है फिर उनके पास भी कई कई खिलौने हैं देते हैं खेलने 00:02:37 के लिए जीव भी खेलता है उनसे अच्छा ठाकुर जी जो खिलौना देते हैं ना व दो चार बरस में 00:02:44 नहीं टूटता है उससे दो चार वरस में अरुचि भी नहीं होती है कभी कभी तो जन्म जन्म खेलता है 00:02:49 जीव उन्ही खिलौनों से खेल ही रहा है यह तो कभी संत की कृपा होती है जब तब साधु तारसी 00:02:56 कभी संत कृपा करता है जीव पर दुरमति नष्ट हो 00:02:59 होती है तब यह बात समझ में आती है बहुत जन्म बिछड़े थे 00:03:10 माधो ये जन्म तुम्हारे 00:03:19 लेखे यह जन्म तुम्हारे ले बहुत जन्म बिछड़े थे तब कभी ये बात समझ में आती देर के बाद 00:03:32 इसलिए शास्त्र कह रहा है धीरज धरना धैर्य धारण किए रहना दीन दयाल के कान में कभी भनक 00:03:47 पड़ेगी और फिर गुरु साहिब तो वाणी में कह रहे सच्चा होकर कोई सच्चे साहिब के सच्चे दरबार में जाता 00:03:54 है तब सच को पहचानता है सच्चा होके हम 00:03:59 हमारे हमारे हमारे उर अंतर में हमारे भीतर प्रभु के अतिरिक्त कोई और चाह ना रहे आप देखो अभी तो 00:04:06 य बात असंभव सी मालूम पड़ती है अभी तो संसार के कितने संकल्प विकल्प उन्हीं में उलझा हुआ मन है 00:04:13 यह तो संतों की सत्संग की कृपा है थोड़ा बहुत आकर बैठ जाते हैं सुन लेते हैं कह लेते 00:04:20 हैं पर कल जैसा मैं आपको कह रहा था खारे पानी के कुए में चुटकी भर खांड कोई डाल दे 00:04:27 अरे चुटकी भर क्या बोरी भर खांड भी कोई 00:04:29 डाल दे जल थोड़ी मीठा हो जाता है तो खारा ही है ऐसे ये हमारा जो ये जो घट है 00:04:39 काम कामना वासना से भरा है कोई कोई सरल काम है इस इस सबको हटा 00:04:52 देना संत की कृपा है मैं तो आपसे बार-बार कहता हूं कहता रहता हूं कहता रहूंगा कहता 00:04:59 रहगा अंत तक एक ही बात कहता रहूंगा आपको संत ना होते जगत में जल मरता संसार जल मरता संसार 00:05:08 यही हमारे तैसी है इसलिए आपको अनेक बार निवेदन करता हूं हमारी तो इन संतों की वाणी में श्रधा है 00:05:15 संत क्या कहते हैं हमारे लिए वही मार्ग है जी मार्ग सब संत गया छ व मरग में जा स्या 00:05:26 मेरा रंग लागयो 00:05:29 नाम हरी और रंग अटक 00:05:38 परी सबसे पहले तो आपको अपने विश्वास को कहीं एक जगह पर समेटना पड़ेगा तब विश्वास सुदृढ़ होता 00:05:48 है और मैं मैं आपको वो अगर आप मुझसे पूछोगे वो एक स्थान क्या है तो मैं कहूंगा कि कि 00:05:53 संतों की वाणी में ले आइए आप अपने मन को यहां यहां है हमारे हित की बात जीव के हित 00:05:58 की बात तो संत करता है 00:06:00 नहीं तो सहजो भाई नहीं कहती कि हरि तो कुटुंब जाल में घेरी यही बात तो श्री स्वामी जी कहा 00:06:08 करते थे बोले अगर भगवानी संकल्प कर ले भाई सब जीवों का उद्धार हो जाए सब हमारे पास आ जाए 00:06:13 तो लो आही जाए फिर रोकने वाला कौन है भगवान के मन में ऐसा संकल्प नहीं होता ऐसा संकल्प संत 00:06:19 के मन में होता है इसलिए श्री रघुनाथ जी को कहना पड़ा सातम सम मोहिम 00:06:29 जग देखा दो बातें कही है भगवान ने य पर सातम सम मोही 00:06:39 मैं ममता राम सो समता सब संसार एक तो भगवान क भाई सबको समान मानना और फिर क मोही मैं 00:06:49 जग देखा सिराम मैं सब जग जानी कर प्रणाम जोर जुग पानी पर शायद भगवान ने सोचा हो सब सबको 00:06:58 समान देखेंगे 00:06:59 संत कहां रहेंगे तो श्री रघुनाथ जी कह रहे हैं सातम सम मोही मैं जग देखा मोते अधिक संत करी 00:07:17 लेखा मोते अधिक संत करी मैं तो भाई अपने जीवन में देखता हूं 00:07:30 अब भाई प्रारब्ध बसात पूर्व के संस्कार से कभी वातावरण के प्रभाव से कभी-कभी हो जाता है मन में विक्षेप 00:07:38 हो जाता है अकारण विक्षेप हो जाता है उसकी क्या औषधि है इ संतों के पास कुछ देर बैठ जाने 00:07:47 से इन्हीं की वाणी का चिंतन कर लेने से कुछ स्वाध्याय कर लेने से ही मन का विक्षेप दूर हो 00:07:54 जा होता है भव रोग की औषधि तो भाई इन्ही संतों के शबद 00:08:02 जन्म जन्म का सोया मनवा सतगुरु शबद सुन 00:08:09 जागा तो सब ऋषियों ने कुछ ऐसा प्रश्न पूछा जिससे जिसे उनका भी मंगल हो पर इस समस्त लोक में 00:08:17 आस्तिक भाव की वृद्धि हो शुभ मंगल का संचार हो सब धर्म का अभ्युदय हो यही संत के जीवन का 00:08:28 लक्ष्य होता है 00:08:31 य दो पंक्तियां मुझे बड़ी प्रिय हैं श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने अमृतवाणी में कहा है वृद्धि आस्तिक भाव 00:08:44 की शुभ मंगल 00:08:50 संचार अभुदय सद धर्म का राम नाम 00:09:05 विस्तार और उन्होने तो युक्ति भी बताई है कैसे होगी आस्तिक भाव की वृद्धि कैसे शुभ मंगल का संचार होगा 00:09:11 कैसे सद धर्म का अभ्युदय होगा एक ही युक्ति संत कह राम नाम 00:09:19 विस्तार जोत से जोत जले कल मैं आपसे कह रहा था जो यहां पर बैठा है ना भाई मुझे तो 00:09:24 लगता है कि यदि युग का काल का और धर्म का भी यदि विचार किया जाए 00:09:29 तो आज तो भाई जीव मात्र के लिए प्राणी मात्र के लिए यही तो धर्म है यही एक धर्म है 00:09:35 आपका मेरा 00:09:38 सबका और ये यह सार्वभौमिक धर्म है यूनिवर्सल रिलीजन राम सिमर राम सिमर यही तेरो काज है राम 00:09:59 सिमर 00:10:05 राम य सार्वभौमिक धर्म है इसलिए मैं कई बार कह देता हूं यहां से अनेक अनेक कर्म कांडों में अनेक 00:10:16 अनेक विधियों रीति हों में किसी को ना उलझा करर सीधे-सीधे वह मार्ग दिया जाए जिससे लोक भी सुधरे और 00:10:22 परलोक भी सुध सीधा सधा ही रास्ता देना चाहिए ना भाई नाम जपि भगवन नाम जपि 00:10:34 मैं कहता डंके की चोट पर क्यों क्योंकि सब सब सत्पुरुष का एक मत है एक 00:10:44 मत कोई किसी भी मत संप्रदाय का हो फ यही धर्म कल्याण इसी से होगा राम नाम विस्तार मैं जपूं 00:10:56 आप जपे और ऐसे ही ऐसे 00:10:59 हमारे संपर्क में जो आए कहीं ना कहीं उसके जीवन में भी यह दीप जले इसी को कहते हैं जोत 00:11:04 से जोत जलाना इसी को कहते हैं दीप से दीप जलाना ऐसे ही तो दीपावली होती है ना दीप से 00:11:12 दीप जलता है ऐसे ही दीपोत्सव होता है और मैं तो आपसे यही कहूंगा प्रयास यही करना पहले तो हमारे 00:11:19 भीतर हमारे भीतर यह दीप जले और फिर उस दीप से कोई और दीप जले उस दीप से कोई और 00:11:25 दीप जले और ये ये दीपावली केवल एक दिन की 00:11:29 दीपावली बनकर ना रहे भला बुरा समय आता रहता है हमारा सौभाग्य है कि शुभ गड़ी हम देख रहे हैं 00:11:39 हमारा सौभाग्य है य मंगलमय य मंगलमय बेला हमारे जीवन काल में आई 00:11:48 है तो मैं तो एक बड़ा विनम्र सा निवेदन यहां से य कर रहा हूं कि व्यासपीठ पर जो भी 00:11:54 जो भी है व्यासपीठ का यह पवित्र 00:11:59 कर्तव्य है कि जनमानस के मन मानस को केवल हरि नाम से जोड़ा जाए सब सबके सबकी मत विचार का 00:12:08 आदर करते हुए सबकी श्रद्धा का आदर करते हुए सब अपने अपने कर्तव्य का पालन करें लेकिन इस बात पर 00:12:15 बल दिया जाना चाहिए इस एक सिद्धांत की एक मत से प्रतिष्ठा होनी चाहिए भाई आपका मेरा कल्याण तो भगवन 00:12:22 नाम से ही होगा यही सब संतो महापुरुषों का मत है मीरा हो सूर हो 00:12:29 हो कबीर हो रदास हो नानक हो सबका एक मत है सब कर मत खनायक 00:12:40 एहा करिए राम पद पंकज नेहा करिए राम पंकज ने क्योंकि भाई आपसे मुझसे मिलकर ही तो समाज बना है 00:12:59 हमारा मन सुधरेगा हमारे मन में शांति होगी तो समाज में शांति होगी समाज में सुख शांति कैसे होगी तो 00:13:06 मन में सुख शांति होगी किसी भी किसी भी कर्मकांड से समाज में शांति नहीं आ सकती 00:13:15 है समाज में शांति तो तब आएगी जब आपके मेरे मन में शांति होगी और जन्म जन्म के भटके इस 00:13:27 मन को 00:13:28 विश्राम देने वाला अगर कोई साधन है तो भाई संत तो यही कह रहे हैं अब अपनी मति से कोई 00:13:33 कुछ भी कहता रहे विचार रहे बात दूसरी है संत तो एक ही बात कहते राम सिमर राम सिमर ही 00:13:46 तेरो काज है राम सिमर राम सिमर 00:13:58 तो ऋषियों ने पूछा हे सूत जी आप सब शास्त्रों के पुराणों के ज्ञाता हैं सब शास्त्रों पुराणों में जीव 00:14:05 के कल्याण के जो जो साधन वर्णन किए गए हैं आप सबका सार जानते हैं पर ऋषियों ने कहा कि 00:14:12 कलयुग आ पहुंचा है सबसे पहले तो कहा है कि लोगों की आयु ही कम हो गई है माने हमारे 00:14:18 पास समय ही बहुत थोड़ा है और आपको याद हो कभी आपसे मैंने कहा था कि भाई दूर जाना हो 00:14:28 नियत समय पर पहुंचना भी आवश्यक हो मार्ग लंबा हो फिर क्या करना पड़ता है अपनी गति बढ़ानी पड़ती है 00:14:35 यही बात श्रीमद भागवत कहती हैं तीव्रे भक्ति योगेन भजे पुरुषम परम य बात श्री महाप्रभु जी भी कह रहे 00:14:43 हैं स्फुट वाणी में जि नाव नि मंगल लोक तिहुं सु हरि पद भज ना विलंब कर दो बातें कही 00:14:52 है महाप्रभु जी ने एक तो नर देही पाई चित चरण कमल दीज और कह रहे अब कोई 00:14:58 और विचार मत करो ना विलंब कर देर मत करिए क्योंकि नारायण य सुधि नहीं आज मरे के 00:15:11 भोर कितना कितना अस्थिर जीवन है एक क्षण में घटना घटती है सब कुछ जीवन में बदल जाता है मन 00:15:21 नहीं रहता साधन नहीं रहता सामर्थ नहीं रहती व्याधि 00:15:28 मंदिर इस इस शरीर को संतो ने कहा है खबर नहीं है किसके भीतर कौन सा रोग पल रहा है 00:15:35 एक एक क्षण में जीवन बदल जाता है इसलिए संत कह रहे हैं यात दुर्लभ काल ना वृथा गमा इए 00:15:49 ब्रज नागर नंदलाल सुनिस दिन 00:15:56 गा कहा कि भाई पहले तो 00:15:58 लोगों की आयु ही बहुत कम हो गई है अल्पायु मनुष्य है कलयुग 00:16:07 का और फिर साधन करने में रुचि और प्रवृत्ति भी कम है क्यों क्योंकि तमोगुण का प्रभाव है तमोगुण का 00:16:14 प्रभाव क्या है प्रमाद य तमोगुण का प्रभाव है हा कर लेंगे य तमो गुण का प्रभाव है जैसे आजकल 00:16:24 सुबह बिस्तर से निकलने में आधा घंटा लग जाता है लग जाता है कि 00:16:30 अब उठेंगे अब उठेंगे अब उठेंगे आधा घंटा बिस्तर से निकलने में लगता है फिर आधा घंटा नहाने में लग 00:16:36 जाता है कि भाई जल को छुए कि नहीं 00:16:44 छुए जाड़े का धर्म यही होता है ना और गति मंद पड़ जाती है जाड़े में क्या होता है गति 00:16:52 मंद पड़ जाती है ना कीर्तन होता आप लोग ताली भी नहीं बजाते ऐसे ही बैठे रहते हो 00:16:59 माने हिलने डुलने का मन नहीं करता ऐसा ऐसा जहां बैठे बस बैठे ही है हिलने डुलने की इच्छा नहीं 00:17:05 होती ऐसे मन को भी जब जड़ता का जाड़ लगता है ना मन भी हिलना डुलना नहीं चाहता व भी 00:17:10 साधन नहीं करना चाहता है तमो गुण की अधिकता हो जाती कलयुग में य युग का धर्म 00:17:23 है और वर्तते कस्य दूषण किसी का भी दोष नहीं भाई युग का ही धर्म है 00:17:29 जून के महीने में कितना भी 00:17:35 रहो महाराज जी भी लगता है पीछे से सुनते आ रहे हैं तभी मुस्कुराते आ रहे हैं जाड़ा है ना 00:17:42 भाई इसी को कह रहे जड़ता जाड़ विषम जब लागा तुलसी बाबा बड़ा सुंदर उदाहरण देते गया न मज जन 00:17:48 पाव 00:17:53 अभागा एक समय था जब लोग मीलों पैदल चलकर तीर्थ यात्रा करने जाते 00:17:58 जीवन में एक ही बार तीर्थ हो पाता था एक बार गंगा नहाए तो बस हो गया पर खैर तब 00:18:05 मैं कहूंगा कि तीर्थ के प्रति लोगों की श्रद्धा थी भावना थी लोग तीर्थ बुद्धि से ही जाते थे तप 00:18:10 करने के लिए तीर्थ में जाते थे अब तो सुविधा अधिक हो गई तो पिकनिक मनाने के लिए आते हैं 00:18:16 पर गोस्वामी जी कहते भाई एक व्यक्ति कोई गया मीलो चलके महीनों में जाकर पहुंचा गंगा किनारे अब जेठ के 00:18:24 महीने में यात्रा शुरू की थी मांग के महीने में पहुंचा 00:18:31 क जड़ता जाड़ विषम जब लागा गयो न मजन पाव अभागा इतनी दूर चल करर गया उसने कहा जाड़ा बहुत 00:18:37 है दूर से प्रणाम करके चलते हैं तो कलयुग में तमो गुण बढ़ता है और तमो गुण का प्रभाव क्या 00:18:45 है जीवन में प्रमाद आता है ऋषियों ने सबसे पहला प्रश्न यही किया है सू जी से आप आप संत 00:18:52 शिरोमणि है आप बताइए कि कलयुग में पहले तो मनुष्य अल्पायु हो जाएगा उसके पास अवधि 00:18:58 बहुत कम है और उस बहुत कम अवधि में भी सूरदास जी कहते हैं कि बालापन खेलत ही खोय और 00:19:06 यवन विषय रस भोई और वृद्ध भयो सुधि प्रगट मोक तब ये थोड़ी सी अकल आती हमने पीछे क्या कर 00:19:17 दिया इसलिए सूरदास जी तो कहते हैं दीनानाथ अब बार तुम्हारी अब तो आपकी बारी है हमारी हरि तुम ही 00:19:26 स सुधरेगी सौभाग्यशाली कोई 00:19:28 होता है जिसको समय पर चेत आ जाता है मैं कई बार आपसे कहता हूं भाई एक तो है सही 00:19:33 निर्णय लेना और फिर एक है सही समय पर सही निर्णय लेना सही निर्णय और सही समय में भी सही 00:19:40 समय अधिक महत्त्वपूर्ण है सही समय पर सही निर्णय लिया 00:19:54 जाए एक तो अवधि कम है और फिर साधन में प्रवृत्ति भी 00:19:58 साधन में रुचि भी नहीं है रुचि नहीं रही प्रवृत्ति नहीं है क्यों क्योंकि प्रमाद बढ़ गया आहार विहार बिगड़ 00:20:05 गया जीवन में कितना असंतुलन है तमोगुण बढ़ता ही जा रहा है बुद्धि मलीन होती चली जा रही है अब 00:20:15 तो भाई वह समय आ गया है जब आप देखो जब गलत करने वालों की संख्या अधिक दिखाई पड़ेगी सही 00:20:24 करने वाले थोड़े ही रह जाएंगे 00:20:31 प्रवर्तते कस दूषण युग धर्म युग का धर्म है इसको समझना पड़ेगा कर कुछ नहीं सकते हम हम इसमें कुछ 00:20:41 भी नहीं कर सकते पहले ही कह दिया महापुरुषों ने घोरे कलयुग प्राप्त सर्व धर्म विव जिते धर्म रहेगा ही 00:20:50 नहीं एक चरण धर्म का रह जाएगा और वो भी जीव मात्र पर दया दया राक धर्म को पाल 00:20:58 कबीर जी कह रहे हैं बो जो दया रखेगा वही धर्म का पालन कर सकता है दया राख धर्म को 00:21:06 पाले और घर में रहे कह देते कबीर जी वन में रहे नहीं घर में रहे उदासी पर घर में 00:21:15 रहे कैसे 00:21:20 उदासी चार दिन के लिए कहीं जाना हो और चार दिन वहां रहने की अच्छी व्यवस्था हो जाए बस इतना 00:21:26 ही बहुत है 00:21:28 घर क्या है भाई आए हैं यहां पर रहने के लिए प्रभु ने हमारी एक व्यवस्था कर दी है बस 00:21:32 इतना ही पर ये ये बात एक क्षण के लिए भी भूले नहीं रहना नहीं है देश बगाना है कहत 00:21:50 कबीर सुनो भाई साध सतगुरु नाम 00:21:58 ठिकाना है सतगुरु नाम 00:22:07 ठिकाना रहना नहीं है 00:22:16 देश कले पहले तो अवधि कम है उसम बुद्धि भी कम है साधन में प्रवृति तो है ही नहीं क्योंकि 00:22:24 तमोगुण बढ़ गया और बढ़ता ही जा रहा है प्रमा 00:22:28 मनुष्य हो गया है और जब उसमें भी जब बात भजन की आए माने जब किसी परमार्थिक किसी शुभ कार्य 00:22:33 की बात आए फिर तो फिर तो मन घोर प्रमाद का आश्रय ले लेता है प्रमाद से ग्रस्त है पहले 00:22:41 संत कहते थे भाई शुभ कार्य का संकल्प मन में हो ना तत्काल कर दीजिए उसी के लिए श्री कबीर 00:22:49 जी जैसे संतो ने कहारे पल में परलय होएगी फेर करेगा कब बड़ी अच्छी बात एक बार एक महात्मा ने 00:22:55 हमको बताई यहां के बड़े लोग कहते थे कि 00:22:58 दाया हाथ देना तो बाए को खबर नहीं पड़े पूछा कि ये ये कैसा देना होता है ऐसे कैसे संभव 00:23:04 है कि दाया हाथ दे रहा है बाए को खबर नहीं है तो कहते थ देने का भाव मन में 00:23:09 आए ना बस तत्काल दे दीजिए अरे अगले पल देने का मन नहीं रहेगा हमें कल महाराज जी से चर्चा 00:23:17 कर रहा था जो आज मैंने आपसे कहा ना भाई मन सुधरे और फिर सुधरा रहे क्योंकि मन तो सुधर 00:23:22 सुधर के बिगड़ता 00:23:26 है सुधरता है 00:23:27 फिर बिगड़ता है जो छोड़कर आया है उसी को जाकर फिर लिपट 00:23:36 है तभी तो संत कह रहे हैं खरोई कठिन है भजन डिंग रिव तमक सिंदूर मेल माथे प साहस सिद्ध 00:23:45 सती को सु जरी सुनते नहीं हम पर संत तो कहते आ ही रहे हैं भक्ति करे कोई सूरमा जात 00:23:57 ब 00:24:06 इसीलिए अनेक अनेक प्रकार से अनेक अनेक उदाहरण देकर आपको यहां से निवेदन किया जाता है भाई सत कर्म करना 00:24:14 उससे क्या होगा जीवन में सत्व गुण बना रहेगा आपका आहार शुद्ध हो सात्विक हो पवित्र हो नहीं तो प्रमाद 00:24:25 आएगा नहीं तो प्रमाद आएगा 00:24:27 छोटा सा छेद छिद्र बड़े जहाज को डुबो देता है छोटा सा छिद्र हो जाए ना ऐसे भजन करने के 00:24:37 लिए भी एक व्यवस्था है संतों ने बताई है उस व्यवस्था में छोटा सा छिद्र हुआ डूब जाएगा 00:24:46 जहाज तो कहा पहले तो भाई इनकी इनकी आयु कम है अवधि कम है और वो अल्प आयु में भी 00:24:54 60 70 वर्ष की जो आयु है उसमें भी 00:24:58 बालापन खेलत ही खयो बचपन खेलने में गवा दिया और यवन विषय रस भोई आपको स्मरण हो कभी यहीं से 00:25:11 मैंने आपको कहा था जिसका बालपन संस्कारी रहेगा उसकी युवावस्था शुद्ध रहेगी पवित्र रहेगी जिसकी युवावस्था शुद्ध होगी उसी 00:25:27 की भजन भावना वृद्धावस्था में जाकर सिद्ध होगी और बाल्यावस्था में भजन कौन करेगा जिसकी माता संस्कारी होगी वही तो 00:25:39 बालक बाल्यावस्था में भजन करेगा जिसको गर्भ में भजन का संस्कार मिलेगा इसी को कहते हैं दीप से दीप जलाना 00:25:46 इसकी मैं आपसे अभी बात कर रहा था इसी को कहते हैं जोत से जोत 00:25:53 जलाना इसीलिए मैं कहता हूं यदि आप माता-पिता है 00:25:57 तो फिर अधिकार से पहले आपका कर्तव्य हैने बालक को संस्कारी बनाइए ईश्वर आपकी गोध में जब कोई बालक प्रसाद 00:26:07 स्वरूप देता है ना तो आप समझिए कि आपको इस इस इस सारे संसार की सेवा करने का अवसर ईश्वर 00:26:14 ने दिया है दीजिए अपने बालक को ऐसा संस्कार कि कल व जाकर देश के राष्ट्र के समाज के हित 00:26:21 में कल्याण में कुछ कर सके अपना भी कल्याण करें राष्ट्र और समाज के हित में कल्याण में 00:26:27 व अपना कुछ कुछ योगदान दे 00:26:36 सके अंग्रेजी की एक कहावत है यू कैन नॉट पोर फ्रॉम एन एमटी कप यदि हमारा ही बर्तन खाली है 00:26:43 दूसरे में क्या डालेंगे 00:26:47 कभी-कभी कोई पूछ लेता है ना कैसे लगाए बच्चे को भजन में आप करिए आप लगि कल ही शायद महाराज 00:26:53 जी मुझसे कह रहे थे सत्संग के बाद 00:26:57 कि भाई अब अब होता क्या है कि जो सही समय था अभी आपसे मैं कह रहा हूं ना सही 00:27:02 निर्णय और सही समय में भी सही समय पहले नंबर पर है पहले सही समय हो सही समय निकल गया 00:27:09 उस समय बालक को संस्कार दिया नहीं अब खींच खींच कर ला रहे हैं बालक को सत्संग में अब बात 00:27:16 बनेगी नहीं भाई वैसी बात नहीं बनेगी जब जो समय पर संस्कार दिया जाए पर हो सकता है अब आप 00:27:25 इतनी माताएं यहां पर बैठी हैं 00:27:27 और भी माताएं इसको सुनेंगे उनके मन में आए भाई अब वह समय निकल गया पर अब क्या करें अब 00:27:32 प्रार्थना करिए क्योंकि जो कार्य पुरुषार्थ से ना हो पाए उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना ही एकमात्र विकल्प है प्रार्थना 00:27:40 कर सकते हैं अब तो भाई कि हमारा बालक सद मार्ग पर चले ईश्वर इसको सद्बुद्धि दे आप माता पिता 00:27:48 है तो तो बड़े बड़े सीधे सच्चे ईमानदारी वाले भाव से आप बालक के लिए प्रार्थना कर सकते हैं प्रार्थना 00:27:56 करिए 00:27:57 हां पर जो जो क्रम मैंने आपको बताया ना कि जो बाल्यावस्था में बालक संस्कारी होगा उसकी युवावस्था शुद्ध रहेगी 00:28:06 पवित्र रहेगी जिसकी युवावस्था शुद्ध होगी उसकी वृद्धावस्था सिद्ध हो जाएगी लेकिन बाल्यावस्था में भजन कौन करेगा जिसकी माता संस्कारी 00:28:17 होगी इसको गर्भ में भजन का संस्कार मिलेगा अरे भाई बहुत पुरानी बात नहीं है 10 20 वर्ष पहले की 00:28:26 बात ले लो 00:28:28 कन्या आती थी ना तो मां उसके हाथ में गीता भागवत रामायण देती थी रामायण दी जाती थी कि बेटी 00:28:39 तुझे परिवार में संसार में रहना है पर संस्कार के साथ रहना उसको रामायण दी जाती थी गर्भ में गर्भ 00:28:48 में जीव आता था तो माता बालक संस्कारी बने इसीलिए उस गर्भावस्था में कुछ कुछ 00:28:57 नियम धारण करती थी कुछ जप करती थी कुछ तप करती थी स्वाध्याय करती थी ताकि कुछ संस्कार बालक को 00:29:07 मिले अब तो पता नहीं यह कहां आ गए हम और अभी और कहां जाएंगे पता नहीं अब तो वहां 00:29:16 आ गए कि भाई किसी को सुधारने की बात भूल जाओ अपना जीवन सुधरा रहे यही बहुत बड़ी बात है 00:29:22 यही बहुत बड़ी विजय है हम सीधे सच्चे मार्ग पर चलते रहे प्रभु ने जो रास्ता दिखा 00:29:27 दिया है हम उस पर चलते रहे भाई य यही जीवन की विजय है लो कहा समस्त सुखिनो भवंतु सर्व 00:29:35 के प्रति सद्भाव रखते हुए अपने जीवन को सीधे सच्चे मार्ग पर चलाते 00:29:42 रहे तो खैर यहां ऋषियों ने पूछा साधन करने में रुचि प्रवृत्ति है नहीं आलसी हो गए हैं लोग प्रमाद 00:29:51 हो गए हैं और बोले भाग्य भी उनका मंद है समझ भी थोड़ी है 00:29:57 सब कुछ अल्प ही अल्प तो है और क थोड़ा सा जो जीवन है वह भी अनेक अनेक प्रकार की 00:30:06 विघ्न बाधाओं से भरा हुआ है छोटा सा बालक छोटा सा बालक पहली दूसरी कक्षा में पढ़ता हुआ आज उसको 00:30:16 भी स्ट्रेस है मैंने शायद आपको सुनाया भी था एक छोटी सी नन्नी सी बच्ची मेरे पास आई थ शंभू 00:30:24 जी भी साथ में थे नन्नी सी बच्ची 00:30:27 और वो आकर मुझे कहती है कि अरे क्या बताए जेजे आपको हमको शाम तक बड़ा स्ट्रेस हो जाता है 00:30:34 छोटी सी बच्ची पाच छ वर्ष की अवस्था होगी उसकी यह बड़ी चिंता की बात है कैसी हमारी शिक्षा पद्धति 00:30:42 हो गई 10 20 किलो का तो बसता है बालक के पास 00:30:48 में कितना कितना दबाव है छोटे-छोटे बच्चों के मन चित पर और भगवान जाने स्कूलों में पढ़ाया क्या जा रहा 00:30:56 है 00:30:59 कैसी कैसी शिक्षा पद्धति कैसे कैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं कहां हमारे यहां गुरुकुल में वेद वेदांग पढ़ाया जाता 00:31:06 था शस्त्र शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी शास्त्र सिखाया जाता था कि कोई अपने मन की रक्षा कर सके 00:31:13 शस्त्र सिखाया जाता था अपने तन की रक्षा कर सके साथ साथ एक ही काल में शस्त्र और शास्त्र दोनों 00:31:21 सिखाया जाता था तन मन की रक्षा के लिए 00:31:28 हां ब बात यही है ना कि पहले पहले पहले गुरु के चरणों में बैठकर कोई विद्या अर्जित करता था 00:31:37 पहले पहले विद्या का उद्देश्य था मनुष्य को संस्कारी बनाना आज शिक्षा का उद्देश्य है मनुष्य को व्यापारी बनाना पहले 00:31:49 संस्कारी बनाने के लिए विद्या दी जाती थी आज आज केवल व्यापारी बनाने के लिए शिक्षा दी जाती है मैं 00:31:56 मैं 00:31:57 यह बात मैं केवल भारत देश का एक सामान्य नागरिक होते हुए कह रहा हूं अपने आसपास की परिस्थिति देखता 00:32:04 हूं देखता हूं कि किस किस दिशा में नई पीढ़ी जा रही है जब जब इनके पास इनके जीवन में 00:32:12 जब सदाचार नहीं होगा तो तो धर्म की बात समझ में ही कैसे आएगी समझ में नहीं आती है उसके 00:32:19 लिए भी तो संस्कार चाहिए ना एक ग्राहक चाहिए देर शुड बी रिसेप्टिविटी 00:32:30 अभी कुछ दिन पहले की बात है मुझसे किसी व्यक्ति ने पूछा कि मैंने वेज और नॉन वेज के विषय 00:32:40 में आप क्या कहते 00:32:44 हैं मैंने क भाई वैसे तो हम कुछ भी किसी से नहीं कहते हैं आपने पूछा है तो हम आपको 00:32:50 बता देते हैं मेरा मानना यह है कि आपके आसपास सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की 00:32:57 र्जा हमेशा रहती है आपके आसपास पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी हमेशा रहती है बड़ी बात ये है कि आप ग्रहण 00:33:03 किसको कर रहे हैं जब आप तामसी आहार करते हैं तामसी भोजन जब आप ग्रहण करते हैं जब आपका आहार 00:33:12 अशुद्ध हो जाता है तामसी हो जाता है फिर जो नकारात्मकता ग्रहण करने की आपकी वृत्ति है वो बढ़ जाती 00:33:19 है आप जैसा आहार ग्रहण करेंगे आपके भीतर उसी गुण का निर्माण होगा आपका आहार अपवित्र होगा 00:33:27 आहार में तमोगुण की प्रधानता होगी आपके भीतर भी तमोगुण बढ़ेगा तमोगुण बढ़ेगा तो क्या होगा उसी से मेल जोल 00:33:34 रखती हुई ऊर्जा जो है उसी से मेल खाती जो तरंगे हैं बाहर वही आपकी तरफ दौड़ दौड़ कर 00:33:45 आएंगी दुर्योधन के सामने भगवान खड़े हैं वह पहचान ही नहीं पा रहा है उसके पास आंख नहीं है आंख 00:33:51 तो है लेकिन उसके पास दृष्टि नहीं है उसके उसके सन्मुख विग्रह 00:33:57 धर्म खड़ा है उसके हित की बात उसको भगवान बता रहे हैं उसको समझ में ही नहीं आ रही क्यों 00:34:03 उसके पास ग्रहण करने की क्षमता ही नहीं है ग्रहण करने की क्षमता के लिए सात्विक जीवन चाहिए पवित्र आहार 00:34:09 चाहिए प्रकृति का आदर चाहिए क्यों मैं आप आपको बल देता हूं इस बात पर कहता हूं भाई प्रकृति का 00:34:15 आदर करना प्रकृति की अवहेलना करोगे तार टूट जाएगा अच्छी बात सुनकर भी समझ नहीं आएगी आप आप आप उसको 00:34:27 ग्रहण नहीं कर पाओगे कहने वाला कहता 00:34:32 रहेगा नहीं तो कोई आवश्यकता नहीं थी युद्ध के मैदान में श्री कृष्ण अर्जुन को युक्ता हार विहारस युक्त चेस 00:34:39 कर्मसु ये उपदेश कर रहे हैं भाई अपना खाना पीना और सोना जगना सुधारना दो बातें भगवान ने की खाना 00:34:47 और सोना ये नियमित संतुलित रहना चाहिए श्लोक है श्रीमद् भगवत गीता में भगवान क ना तो अधिक खाने वाले 00:34:56 का 00:34:58 ना अधिक सोने वाले का ना बहुत कम खाने वाले का ना बहुत कम सोने वाले का योग सधे का 00:35:04 उसके जीवन में संतुलन नहीं आएगा माने दो बातें महत्त्वपूर्ण होगी ना तभी तो भगवान कह रहे हैं जीवन में 00:35:12 तमोगुण बढ़ेगा आप बैठ जाओ समझ में आपको कुछ नहीं 00:35:19 आएगा अब आज आजकल के किसी बालक को आप यहां पर लाकर बैठा दो कभी-कभी कोई माता-पिता ले भी आते 00:35:26 हैं 00:35:26 ना फिर बाद में बच्चा मुझे अगर कभी मिले क सुना तो सब ऊपर से निकल गया हमरे तो कुछ 00:35:31 समझ में नहीं आया क्यों समझ में नहीं आया बड़ी बात ये नहीं कि आपको समझ में नहीं आया क्यों 00:35:38 समझ में नहीं आया क्योंकि धर्म की बात को समझने के लिए भी आपको भीतर से एक योग्यता चाहिए एक 00:35:46 पात्रता चाहिए वो पात्रता कहां से आएगी जब जीवन सात्विक होगा तब धर्म की बात समझ आएगी तब धर्म का 00:35:53 मर्म धर्म का जो सूक्ष्म तत्व है उसको आप अनुभव कर पाएंगे 00:36:00 हमारे यहां की शिक्षा पद्धति ऐसी थी उसका लक्ष्य केवल शरीर और शरीर का भोग नहीं था तन मन को 00:36:09 साधा जाता था जब गुरु के चरणों में कोई कोई बालक जाता था तो गुरु उसके तन मन को साध 00:36:16 था क्योंकि शरीर भी क्या है खल धर्म साधन शरीर भी धर्म साधन के लिए मिला है मन भी अनुकूल 00:36:23 हो उसके चरित्र का भी निर्माण हो उसके जीवन 00:36:26 का उसका आचरण पवित्र हो य सब बातें ये सब बातें एक एक एक उच्च एक श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति का 00:36:34 निर्माण करती थी आज तो भाई देखो ऐसा मैंने सुना है हमारे समय में तो ऐसा नहीं था पर आज 00:36:43 तो मैंने ऐसा सुना है कि बोले क्लास में टीचर बैठ नहीं सकता है ऐसा होता है ऐसा होता है 00:36:52 हा बालक बैठेगा लेकिन अध्यापक जो है वो बैठ नहीं सकता 00:36:57 बताओ य कितनी उल्टी खोपड़ी है इन लोगों की देखो जो जो जो बेचारा ग्रहण कर रहा है कायदे से 00:37:05 उसको नीचे बैठना चाहिए और गुरु को शिक्षक को ऊपर बैठना चाहिए पर यहां तो ऐसी अनीति है बालक बैठे 00:37:12 रहेंगे टांग पर टांग चढ़ाकर कुर्सी पर और अध्यापक है व बेचारा खड़ा 00:37:21 रहेगा पीड़ा क्या है हम लोगों की हम लोगों को लगता है 00:37:27 कि वेस्टर्न हो जाना मॉडर्न हो जाना मॉडर्न का अर्थ होता है समय के साथ 00:37:36 चलना युग धर्म को समझते हुए काल की गति का विचार करते हुए अपने जीवन में अपने जीवन में कुछ 00:37:44 परिवर्तन लाना इसको कहते हैं मॉडर्न हो जाना माने समय के साथ चलना इसकी बात तो श्री गीता जी में 00:37:49 भगवान ने भी कही है समय के साथ 00:37:54 चलना पर किसी 00:37:56 के जैसा हो जाना मॉडर्न हो जाना थोड़ी है मुझे भी कुछ दिन पहले यह बात किसी ने बताई बोले 00:38:02 आजकल टीचर बैठ नहीं सकते क्लास में बैठ नहीं सकते बच्चे बैठेंगे टीचर खड़ा रहेगा और धन्य ऐसे नियम बनाने 00:38:11 वाले भी और धन्य है वह माता-पिता भी जो जो ऐसी जगह पर अपने बच्चों को पढ़ाकर गर्व महसूस करते 00:38:20 हैं उनको लगता है बड़ी गौरव की बात अब भाई य चर्चा 00:38:26 होती है तो हर विषय पर बात होनी 00:38:36 चाहिए और यहां ऋषियों ने य ऋषियों ने इस चर्चा का आरंभ ही इस प्रश्न से किया है भाई ऐसी 00:38:44 ऐसी गति मति हो गई है कलयुग के मनुष्य की क्या करें उसके लिए कोई साधन बताइए क्योंकि उसका जीवन 00:38:51 विघ्न बाधाओं से घिरा है भीतर बाहर घोर तम 00:38:56 गुण है आचरण की पवित्रता नहीं है 00:39:03 धर्माचक्र भी बहुत है उसमें भी कोई एक साधन निश्चित नहीं है अनेक अनेक प्रकार के कर्मों का विधान है 00:39:13 आपकी मेरी तो क्या कहे या हरिराम व्यास जी जैसे पंडित प्रवर वो भी जीवन का जीवन का कितना काल 00:39:19 इन्हीं शास्त्रों में उलझे रहे और कह रहे कि वो तो इतने बड़े हैं 00:39:26 ऋषियों ने कहा कि बोले भाई ये शास्त्र पुराण आदि इतने विस्तृत है कि एक जीवन काल में तो उनका 00:39:33 एक अंश भी पूरा पूरा सुनना समझना संभव नहीं है सब शास्त्र पढ़कर फिर फिर उसमें से सार की बात 00:39:42 निकालना कोई हमारे सामर्थ्य की बात है हमारे सामर्थ्य की बात तो नहीं है मेरी तो नहीं है आपकी हो 00:39:47 तो आप करो हमारी तो नहीं है हमें तो हमारे संतों ने सिखाया बिलय खसम को कमायो 00:39:56 हमारे नागरी दस जी कहते बोले रस कों ने सार सार की बात निकाल कर दे दी इसको ग्रहण करिए 00:40:03 ध्रुव दस जी ने सिद्धांत विचार में यही तो कहा बोले विवेकी सोई जो सार की बात गहे साधु ऐसा 00:40:14 चाहिए जैसा सूप सुभा सार सार को गही रहे थूथा दे उड़ा 00:40:28 ऋषियों ने कहा आप सार की बात जानते हैं देखो यह कथा पदे पदे कुछ कहती चलेगी सुनना हमारा लक्ष्य 00:40:39 क्या है कहे कथा और अर्थ विचारे यह कथा पदे पदे कुछ कहती चलेगी ऐसे अंग्रेजी में कहते हैं कि 00:40:47 देर स्टोरी बिटवीन द लाइंस कुछ कुछ कह दिया गया है लेकिन कुछ इन शब्दों के गर्भ में है 00:40:57 कुछ रहस्य इन शब्दों के भीतर छिपा है कथा कुछ कहती चलेगी देखो जो ऋषि पूछ रहे हैं आप देखो 00:41:05 उन ऋषियों की सामर्थ्य क्या होगी 1000 वर्ष के अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं कि वह साधारण सामर्थ्य वाले 00:41:13 ऋषि तो इसका मतलब है नहीं उनकी सामर्थ्य दिव्य है उनके पास दिव्य शक्ति है उसी शक्ति के बल पर 00:41:20 ही तो एक सहस्त्र 1000 वर्ष के अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं ऐसा नहीं 00:41:26 वो शास्त्र पुराण नहीं जानते होंगे शास्त्रों पुराणों में क्या लिखा है ऐसा नहीं है कि वह नहीं जानते पर 00:41:34 व आपको मुझे बता रहे हैं कि कल्याण चाहते हो तो गुरुजनों के चरणों में बैठकर श्रद्धापूर्वक पहले अपने कल्याण 00:41:42 का मार्ग गुरुजनों से पूछना चाहिए यह पहला पहला चरण है व वो वो श्री भगवान के दिखाए मार्ग पर 00:41:54 पूरी निष्ठा से चलने का प्रयास 00:41:56 कर रहे आपको मुझे दिखा रहे हैं सिखा रहे हैं प्रथम भगति संतन करी संगा पहले तो शी सूत जी 00:42:07 के पास गए और सकतम सतमा सनम श्रेष्ठ आसन पर उनको बैठाया और फिर क्या कहा कथा सुनाई दूजी रती 00:42:17 मम कथा 00:42:25 प्रसंगा 00:42:27 प्र बहिन श्रद्धा नाना त्मा 00:42:38 संपसी आप अपनी बुद्धि से प्राणी मात्र का जिससे कल्याण हो वह विधि वह मार्ग हमको बताइए हम वह सुनना 00:42:48 चाहते हैं जिसको सुनने से अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो और कभी आपको मैंने संकेत किया था अत 00:42:56 की शुद्धि ही सबसे बड़ी सिद्धि है यही सबसे बड़ी सिद्धि है अंतःकरण की शुद्धि य मन हो निर्मल तुम्हारी 00:43:07 कृपा से वो सुनाइए जिसको सुनने से मन निर्मल हो जाए हो कोई ऐसो रे भेटे 00:43:19 सं मेरी ला है सगली चिं 00:43:27 कुरस मेरो रंग ला इससे पहले ही गुरु साहब ने एक बात कही है पढ़े रे सगले 00:43:39 वेद नहीं चूके मन खेद अभी आपसे जो मैं कह रहा हूं ना कि ऋषि मुनि साधारण तो नहीं है 00:43:49 हजारों हजार वर्ष की इनकी आयु है बड़ा श्रेष्ठ साधन यह लोग किए बैठे हैं पर कहीं ना कहीं 00:43:56 इनका यह प्रश्न पूछना यह बता रहा है यह बता रहा है पढ़े रे सगले वेद नहीं चूके मन खेद 00:44:09 एक खिन नाद रही मेरे घर के 00:44:16 पंचा लेकिन यह जो विकार है फिर फिर फिर अंकुरित हो जाते हैं फिर फिर अंकुरित हो जाते इसलिए 00:44:26 हो कोई ऐसो रे सुखदाई जिन हरि की कथा सुनाई सस भेटे गति हो 00:44:43 हमारी सस भेटे गति होए 00:44:52 हमा हे स जी कुछ ऐसी बात सुनाइए जि 00:44:56 जिसको श्रवण करके हमें हमें अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो तो आज की वार्ता यही श्री जी के चरणों में 00:45:03 निवेदन करते हैं महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हृदय स्त प्रभु को भाव प्रभु को 00:45:24 नमन
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ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 |
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[00:00:30] ऋषियों ने ऐसा कल्याणकारी प्रश्न पूछा है जिससे केवल उनका ही नहीं बल्कि समस्त समाज और जीव मात्र का कल्याण हो सके।
The sages asked such a welfare-oriented question that it could benefit not only themselves but the entire society and all living beings.
[00:01:16] संत सदैव जीवों पर असीम दया करते हैं और प्रभु से निरंतर प्रार्थना करते हैं कि दीन दयाल तक जीवों की पुकार पहुँचे।
Saints always show boundless compassion toward living beings and continuously pray to the Lord that the cries of the distressed may reach the Merciful Lord.
[00:04:39] मानव मन सदा सांसारिक काम, वासना और कामनाओं से भरा रहता है, जिसे केवल संतों की कृपा और सत्संग से ही निर्मल किया जा सकता है।
The human mind is always filled with worldly desires, passions, and cravings, and it can be purified only through the grace of saints and Satsang.
[00:09:29] वर्तमान कलियुग में प्राणी मात्र के लिए सबसे सुलभ, श्रेष्ठ और सार्वभौमिक धर्म केवल भगवन नाम का निरंतर जप करना है।
In the present age of Kali, the easiest, highest, and universal spiritual practice for all living beings is the constant chanting of the Lord’s Name.
[00:10:59] सत्संग और भगवद्भाव के प्रभाव से हृदय में जोत से जोत जलती है, जिससे संपर्क में आने वाले अन्य लोगों का जीवन भी प्रकाशित होता है।
Through the influence of Satsang and God-consciousness, one lamp of the heart lights another, thereby illuminating the lives of those who come into contact with it.
[00:12:40] समाज का निर्माण व्यक्तियों से ही होता है, इसलिए जब प्रत्येक व्यक्ति का मन सुधरेगा और शांत होगा, तभी पूरे समाज में वास्तविक शांति आएगी।
Society is made up of individuals; therefore, true peace will come to the entire society only when the mind of each individual becomes refined and peaceful.
[00:14:12] कलियुग में मनुष्य की आयु अत्यंत कम है और साधन का समय सीमित है, अतः बिना विलंब किए तीव्र भक्ति मार्ग अपनाना चाहिए।
In the age of Kali, human life is extremely short and the time available for spiritual practice is limited. Therefore, one should adopt the intensive path of devotion without delay.
[00:16:14] कलियुग में तमोगुण और प्रमाद के अत्यधिक प्रभाव के कारण जीवों की रुचि और प्रवृत्ति भजन-साधन में कम होती जा रही है।
In the age of Kali, due to the overwhelming influence of the mode of ignorance and negligence, the interest and inclination of living beings toward devotional practice are gradually declining.
[00:25:11] बाल्यावस्था में दिए गए श्रेष्ठ संस्कार ही युवावस्था को पवित्र रखते हैं और वही वृद्धावस्था में भगवद्भक्ति को सिद्ध करते हैं।
The noble values and impressions given during childhood are what keep youth pure and ultimately establish devotion to God in old age.
[00:30:59] वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मात्र व्यापारिक न होकर गुरुकुल परंपरा की तरह संस्कारी, सात्विक और तन-मन को साधने वाली होनी चाहिए।
The present education system should not be merely commercial; like the Gurukul tradition, it should cultivate good values, purity, and discipline of both body and mind.
[00:33:12] तामसिक और अशुद्ध आहार से तमोगुण बढ़ता है, जबकि सात्विक आहार और जीवनशैली से ही आध्यात्मिक व धर्म के मर्म को ग्रहण करने की पात्रता आती है।
Tamasic and impure food increases the mode of ignorance, whereas only a Sattvic diet and lifestyle create the qualification to understand the essence of spirituality and Dharma.
[00:41:34] शास्त्रों के गहन सार को समझकर अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त करने के लिए श्रद्धापूर्वक संतों और गुरुजनों की शरण में जाना आवश्यक है।
To understand the profound essence of the scriptures and attain purity of the inner self, it is essential to respectfully take shelter of saints and revered Gurus.
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