ये है कथा का असली प्रसाद | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 3 | Shree Hita Ambrish Ji
First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.
00:00:00 आरंभ में ही आरंभ में ही भगवान वेदव्यास ने यह कह दिया है सर्व वेद इतिहासा नाम सारम सारम समुद्रत
00:00:09 मैंने सब वेदों का और पुराणों का जो सार है वह श्रीमद् भागवत में रख दिया है और फिर इसकी 00:00:18 महा महिमा क्या है इसके श्रवण मात्र की इच्छा यदि किसी के हृदय में हो जाए अनेक जन्मों का संचित 00:00:24 पुण्य हो संतो गुरुजनों की कृपा हो और कहीं मन में इच्छा हो जाए कि 00:00:30 एक बार हम भी श्रीमद् भागवत का श्रवण कर ले सुन ले क्योंकि वहां वहां गोपांगने कह रही है यह कथा 00:00:36 कैसी है श्रवण 00:00:43 मंगलम देखो हमारा कल्याण हो कि नहीं आपका हो जाएगा यह नहीं कहा है कथन मंगलम है श्रवण मंगलम आपका 00:00:53 हो जाएगा सुनने मात्र से शिव दम 00:01:01 शिवम ददाति शिवम जो कल्याण का दान करने वाली कथा कल्याणी है कल्याण कर देने वाली है और जीव का 00:01:10 कल्याण कब होता है संस्कृति से मुक्त होने पर ही जीव का कल्याण होता है जीव शिव स्वरूप कब होता 00:01:15 है जब आवागमन के द्वंद से सदा के लिए मुक्त हो जाए जब ये आना जाना ये भूलना भटकना सदा 00:01:21 के लिए समाप्त हो जाए जब सच्चे सुख की प्राप्ति हो जाए तभी कहना चाहिए भाई कल्याण हुआ है जब 00:01:27 मन के संशय दूर हो जाए 00:01:30 लक्ष्य दिखाई पड़ने लगे मार्ग पर निर्बाध गति हो जाए तब समझना चाहिए कल्याण हुआ है ये श्रीमद् भागवत उसी 00:01:39 उसी कल्याण का दान करने वाली है शिव दम और घोषणा कर रहे हैं भगवान वेदव्यास ताप त्रयोन्मूलन आदि 00:01:48 भौतिक आदि दैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के ताप शाप दूर करने वाली है आदि भौतिक ताप क्या है गोस्वामी 00:01:58 जी ने बताया 00:02:01 नहीं दरिद्र सम दुख जग 00:02:06 माही दरिद्रता है और आदि व्याधि है यह सब यह सब आदि भौतिक ताप 00:02:16 है और कभी-कभी आप देखते हो कि आप तो बिल्कुल सीधे रास्ते चल रहे थे एकाएक एकाएक कोई 00:02:22 भयानक दुख आकर सिर पर टूट 00:02:28 पड़ा यह सब क्या 00:02:30 ये आदि भौतिक ताप है फिर जो मन में विक्षेप है ये जो मन की मन की भटकन है जो 00:02:39 मन बार-बार खींच कर खींचकर विषय के अंधकूप में ले जाकर गिरा देता है ये क्या ये आदि दैविक ताप है 00:02:49 और आध्यात्मिक ताप तो एक ही है कि जीव भगवान से बिछड़ा है ये आध्यात्मिक ताप है ये तीनों प्रकार 00:02:57 के ताप दूर करने वाली ये कथा है 00:02:59 यह गाथा है जैसे तुलसी बाबा मानस के लिए कहते हैं ना मंगल करण कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ 00:03:18 की मंगल करण कलि मल हर मंगल करती है कलि मल हरती है 00:03:32 ऐसे कहा वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् और कल हमने विस्तार से चर्चा की वेद्यं जो 00:03:40 जानने योग्य है उसी को जना रही है और जानने योग्य क्या है जिसको जानकर सुख मिले शांति मिले जीवन 00:03:46 में स्थिरता आए अपने स्वरूप की सिद्धि हो जिसको जानकर जिसको जानने से अंतःकरण शुद्ध हो वही जानने योग्य 00:03:58 है 00:04:03 कितना कितना अनर्थ जन्य जिसको सुनने से जिसको जानने से अनर्थ होता है कितना अनर्थ 00:04:13 जन्य विचार हम अपने भीतर डाल लेते हैं यहां वहां से कुछ भी सुनकर कुछ भी सुनकर कल भी मैंने 00:04:21 कहा था मैं आज फिर दोहराता हूं कि अच्छा सुनोगे नहीं तो फिर अच्छा सोचोगे भी नहीं 00:04:29 अच्छा सोचोगे नहीं तो अच्छा समझ नहीं पाओगे और सोचना समझना ही यदि ठीक नहीं हुआ तो करना ठीक कैसे 00:04:37 होगा इसलिए बहुत विचार कर भक्ति मार्ग के आचार्यों ने भी और स्वयं भगवान ने भी कहा प्रथम भक्ति श्रवण 00:04:48 अच्छा सुनो पहली भक्ति है कि इस इंद्रिय को भजन में लगाइए इस इस इंद्रिय को खींच कर सन्मार्ग पर 00:04:56 लेकर जाइए कभी आप 00:04:59 को मैंने कहा था कि विषय का सेवन करने से भी ज्यादा भयानक है विषय का चिंतन करना विषय का 00:05:08 चिंतन कैसे होता है विषय की वार्ता श्रवण करने से ही विषय का चिंतन होता है आप देख लेना आप 00:05:13 इसका अनुभव कर लेना आप विषय वार्ता का श्रवण करोगे उससे आपका चिंतन दूषित हो जाएगा उससे आपका विचार दूषित 00:05:24 हो जाएगा जैसे 00:05:29 एक व्यक्ति आपके पास में खड़ा धूम्रपान कर रहा है आप नहीं कर रहे पर वो कर रहा है पर 00:05:35 उसकी थोड़ी बहुत क्षति तो आपको भी हो रही है इसको कह देते हैं पैसिव स्मोकिंग आपके साथ रहने वाला 00:05:45 व्यक्ति अगर धूम्रपान करता रहता है आप नहीं करते तो आपका स्वास्थ्य भी कहीं ना कहीं थोड़ा घना उससे प्रभावित 00:05:52 होगा ऐसे दो लोग व्यर्थ की वार्ता कर रहे हैं दो लोग विषय की चर्चा कर रहे हैं आपने कहा 00:05:57 भाई हम तो नहीं कर रहे हम तो केवल बैठे थे ना ना 00:05:59 बैठना भी ठीक नहीं है कान से वह भीतर जाएगा आपके चिंतन को आपके विचार को दूषित करेगा आप कभी 00:06:05 इसका अनुभव करना पर बात क्या है कि जीवन में सत्संग के अभाव में विवेक रहता नहीं और व्यक्ति सावधान 00:06:12 रह नहीं पाता और भूल तो ऐसी है कि भूलते भूलते व्यक्ति को यह भी भूल जाता है कि मैं 00:06:20 भूल कर रहा हूं भूल कैसी होती है भूल भूल क्या है भूलते भूलते व्यक्ति यह भी भूल जाता है 00:06:28 कि मैं गलत कर रहा हूं कि मैं 00:06:29 भूल रहा हूं यदि गलती को आप बार-बार दोहराते हैं आप ध्यान रखना आप वहां पहुंच जाओगे जहां गलत आपको 00:06:37 ठीक लगने लगेगा आपको लगने लगेगा यही ठीक 00:06:43 है इसलिए कल आपको मैंने निवेदन किया था तुलसी बाबा कह रहे हैं कि विधि सकल जीव जग रोगी 00:06:51 मानस रोग है तो सभी को ही पर बिरला कोई होता है जो जो पहचान लेता है कि कि मेरे 00:06:57 भीतर यह रोग है 00:06:59 कौन पहचानता है जिसके जीवन में विवेक का प्रकाश होगा जिसकी बुद्धि विवेक से प्रकाशित होगी वही पहचानेगा हां 00:07:07 भाई मैं रोगी हूं वही दौड़ेगा सदगुरु रूपी वैद्य के पास वही याचना करेगा गुरु से औषधि की वही पथ्य 00:07:18 कुपथ्य का विचार कर पाएगा जो पहले यह स्वीकार करे मेरे को रोग 00:07:28 है 00:07:30 तो घोषणा करते हुए कह रहे हैं भगवान वेदव्यास वेद वृक्ष का यह पका हुआ फल है और फिर इसके 00:07:37 माधुर्य का क्या कहना क्योंकि शुकमुखादमृतद्रव 00:07:44 संयुतम् भगवान की बात ऐसे कोई कहे तो कहानी लगती है और भगवान की बात जब कोई संत कहता है 00:07:55 जब कोई भक्त कहता है उसका प्रभाव कुछ और होता है 00:08:00 हमारे प्रातः स्मरणीय परम श्रद्धेय वात्सल्य भाव मूर्ति श्री गोपालाचार्य जी महाराज जब कथा सुनाते थे तो ऐसी ऐसी विचित्र 00:08:10 विचित्र कथाएं सुनाते थे जो किसी ने कहीं ना पढ़ी हो ना सुनी हो एक दिन उनसे किसी ने पूछा 00:08:17 बोले महाराज आप यह सब कथा सुनाते हो यह हमने कहीं किताब में तो पढ़ा नहीं है तो श्री महाराज 00:08:26 जी मुस्कुराते हुए कहने लगे बोले जैसे 00:08:29 बालक की सब बात मां के पेट में होती है ना ऐसे भगवान की सब बात भक्तों के हृदय में 00:08:35 होती है बोले पोथी किताब में नहीं लिखी रहती वो तो भक्त जानते हैं भगवान के पास तो भगवान के 00:08:40 भक्त रहते हैं वह जानते हैं इनका स्वरूप कैसा है इनका स्वभाव कैसा है भगवान की लीला का रहस्य केवल 00:08:46 भगवान का भक्त जानता है ना कोई और जानता है ना कोई और जान सकता है सोई जाने जेहि 00:08:59 देहु जनाई इसलिए रैदास कहते हैं बलिहारी उनकी है जो केवल कथा नहीं कहते कहे कथा और अरथ विचार और 00:09:18 अर्थ विचार तो लीला का रहस्य जानता है कभी आपको मैंने कहा था ये जो कथा शब्द है ना इसका 00:09:26 इसका उद्भव कथम से हुआ क्यों 00:09:30 कथा यह नहीं कहती क्या हुआ यह तो इतिहास भी बता देता है क्या हुआ राम आए कृष्ण आए श्री 00:09:41 राम ने यह लीला की श्री कृष्ण ने यह लीला की क्या हुआ कालक्रम में क्या हुआ यह तो इतिहास 00:09:48 भी बता देता है क्यों हुआ कथा तो वह रहस्य है लीनं लाति लीला 00:10:00 भगवान की लीला का अर्थ क्या है जो रहस्य है जो गुप्त है उसको प्रकट करना उसको उजागर करना 00:10:08 श्रुति भी नहीं जानती भगवान का स्वरूप क्या है भगवान का स्वभाव क्या है थोड़ा सा एक इशारा करके वो 00:10:14 मौन हो जाती है चुप हो जाती है इससे अधिक वो जानते नहीं इससे अधिक उनकी पहुंच नहीं है भगवान 00:10:19 के भक्त जानते हैं अभी कल परसों की तो बात है जब हम अर्जुन और भीष्म जी की चर्चा 00:10:29 कर रहे थे कल कल शायद मेरे से यहां पर किसी ने पूछा बोले जो आपने सुनाया ये कौन से 00:10:36 ग्रंथ में ग्रंथ में नहीं है भाई ग्रंथ में नहीं है भगवान की सब बात ग्रंथ में नहीं लिखी है 00:10:45 भगवान की सब बात तो भक्तों के हृदय में होती है जो आपसे हम कहते हैं ना नाम जपिए नाम 00:10:52 जपते जपते क्या होगा हृदय में रूप का प्रकाश होगा उस रूप के प्रकाश में प्रभु की लीला का 00:10:58 दर्शन होता है 00:11:01 क्यों मैं बार-बार आपसे कहता हूं भाई सारी शक्ति नाम जप में लगाओ सब सब साधन छोड़कर लग जाओ दिन 00:11:09 रात नाम जप में लग जाओ सास सास सिमरौ गोबिंद लक्ष्य यही होना चाहिए हमारा कि एक उश्वास बिना नाम 00:11:17 के नहीं जाए यह सोचोगे ना दिन रात भजन करें तब थोड़ा भजन हो पाएगा आप यह संकल्प करो कि 00:11:24 मैं दिन रात भजन करूंगा तब थोड़ा भजन हो पाएगा तब भजन में थोड़ी 00:11:29 निरंतरता आ पाएगी आप सोचो थोड़ा सुबह शाम समय मिलेगा कर लेंगे तो वो तो मैं आपको उदाहरण दिया करता हूं 00:11:36 भाई वह तो खारे पानी के कुएं में खांड की चुटकी डालने जैसा है उससे कुएं का जल मीठा नहीं 00:11:43 हो जाएगा वो तो खारा ही रहेगा ईमानदारी से यह संकल्प करोगे कि भाई दिन रात भजन करेंगे तब थोड़ा भजन 00:11:50 होगा तब थोड़ी भजन में निरंतरता आएगी तो निरंतर भजन करते-करते नाम 00:11:59 बीज है ना सेवक जी महाराज कह रहे ललितादिक श्यामा अरु श्याम श्री हरिवंश प्रेम रस धाम नाम प्रगट 00:12:08 जग जानिए नाम बीज है फिर झलकने लगता है पहले नाम क्या करता है पहले नाम हृदय के दर्पण को 00:12:17 स्वच्छ करता है वो जो दर्पण पर धूल जमी है ना जन्मों जन्मों की पहले नाम उसका मार्जन करता है 00:12:24 क्यों नाम जपते ही आपको मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है ना भाई क्यों आनंद नहीं आ रहा 00:12:29 सुना तो था नाम जपेंगे तो दर्शन होगा पर नहीं हो रहा है भाई पहले नाम क्या करेगा चेतोदर्पणमार्जनं 00:12:35 प्रक्रिया बताई है चैतन्य महाप्रभु ने प्रथम श्लोक में इस ये जो आठ श्लोक श्री चैतन्य महाप्रभु ने 00:12:46 कहे उसके प्रथम श्लोक में श्री महाप्रभु जी ने स्पष्ट किया है क्या होगा कैसे होगा कहा चेतोदर्पणमार्जनं 00:12:52 भवमहादावाग्नि निर्वापणं फिर कहा 00:12:59 कैरवचंद्रिका वितरणं विद्यावधू जीवनम् इसके बाद इसके बाद जब रूप का दर्शन होगा आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं 00:13:11 पूर्णामृतास्वादनं 00:13:19 सर्वात्मस्नपनं 00:13:24 संकीर्तनं भाई झटपट भी ये कार्य हो सकता है 00:13:28 थोड़ी देर भी लग सकती है पर देर लग रही हो बस यही यही सोचना चाहिए यही विचारना चाहिए भाई 00:13:37 कि मेरे मन के दर्पण पर बहुत धूल होगी पर वह व्यर्थ नहीं जा रहा है वो व्यर्थ नहीं जा 00:13:45 रहा है नाम का जप व्यर्थ नहीं जा सकता कोई भी कोई भी साधन कोई 00:13:59 विधि बंध्या हो सकती है नाम का जप व्यर्थ नहीं जा सकता आपको नहीं पता चल रहा कोई बात नहीं 00:14:04 बहुत भारी रोग होता है कोई दवा लेते तो तुरंत आराम नहीं आ जाता है ना बड़ा भारी रोग होता है 00:14:12 डॉक्टर कहता है भाई साल दो साल दवाई करनी पड़ेगी शुरू के दो चार महीने कोई आराम नहीं आता है 00:14:16 लेकिन दवा ने भीतर जाकर अपना कार्य करना आरंभ कर दिया है कल यही तो आपको मैं निवेदन कर रहा था 00:14:25 भाई श्रद्धा और विश्वास ही हमारी अर्जित संपत्ति है 00:14:28 गुरु के वचनों में श्रद्धा और भगवान के नाम में विश्वास बना रहे मतंग ऋषि ने शबरी जी को मंत्रराज 00:14:40 श्री राम का नाम जपने के लिए कहा और कहा तू प्रतीक्षा करना राम आएंगे राम आ गए गुरु ने 00:14:52 कहा था अपनी ओर देखती थी तो बड़ी निराशा होती थी स्वयं कह रही है 00:14:58 अधम ते अधम अधम अति नारी 00:15:06 तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी कहहु कवन बिधि 00:15:16 अस्तुति तोरी अपनी ओर देखती थी तो बड़ी निराशा होती थी कैसे आएंगे आसपास देखती थी तो और मन निराश हो 00:15:23 जाता था बड़े बड़े ऋषि 00:15:27 मुनि 00:15:30 नियम और कैसे कैसे कठिन साधनों से स्वयं को साध रहे हैं मैं क्या कर रही हूं बस सोहनी लेकर 00:15:37 और रोज मार्ग बुहारती हूं यहां वहां से जंगल से ऐसे थोड़े से कंद मूल फल बीन कर ले आती 00:15:44 हूं कहां देखो इनका साधन देखो योग यज्ञ जप तप व्रत पूजा षट संपत्ति से संपन्न ऋषि मुनि और कहां 00:15:53 देखो मैं इनके सन्मुख भी नहीं जा सकती उस 00:15:58 समय की व्यवस्था ऐसी थी कि शबरी को तो उन ऋषि मुनियों के दर्शन का भी अधिकार नहीं था कि 00:16:04 उनके सन्मुख चली जाऊं उनका दर्शन कर लूं अपनी ओर देखती थी बड़ी निराशा होती थी उस निराशा से कौन 00:16:12 बाहर निकालता था महाराज कहते हैं वाणी में बांह पकड़ि कढ़ि लीने अपने उस निराशा से कौन बाहर निकालता था 00:16:21 उस निराशा से गुरु का शब्द बाहर निकालता कि नहीं भाई अपनी ओर देखूं तो फिर तो कोई संभावना नहीं 00:16:27 है पर पता नहीं क्यों 00:16:29 मेरे गुरु मुझ पर ये अकारण कृपा करके चले गए हैं वो कह गए हैं राम आएंगे तेरी कुटिया में 00:16:35 राम आएंगे और राम आ 00:16:43 गए इसीलिए मैं तो आपको कई बार कहता हूं भाई मन बहुत उछल कूद करे आपको लगे भाई कोई परिणाम 00:16:50 हमारे जीवन में नहीं आ रहा है भजन का हम तो कुछ नहीं देख पा रहे हैं कोई आनंद नहीं 00:16:55 है कोई सुख नहीं है पर 00:16:58 गुरु की आज्ञा में बने रहना और मैं तो कहता हूं मन को एक ही बात कहनी है हमको नाम 00:17:03 जप क्यों करना है गुरु की आज्ञा है बस और विश्वास रखना कृपा पात्र सोई जानिए जो आज्ञावर्ती होय 00:17:13 गुरु की आज्ञा में बने रहने वाला एक दिन भगवत कृपा का पात्र अवश्य होता है अवश्य होता है होता 00:17:20 ही 00:17:24 है होता ही है श्री 00:17:28 विट्ठल दास जी को जब पत्र लिखा श्री महाप्रभु जी ने तो श्री प्रिया जी को महाप्रभु कह रहे तिहारे 00:17:36 स्थापेरु मार्ग विषय अविश्वास अज्ञानी को होता है वस्तुतः इस इस गुरु परंपरा के इस गुरु परंपरा के संस्थापक 00:17:47 स्वयं भगवान हैं इसकी रक्षा भगवान कर रहे हैं सदा हर काल में कर रहे हैं और करते रहेंगे जो 00:17:55 गुरु की आज्ञा में बना रहेगा एक दिन भगवत 00:17:58 कृपा का पात्र हो जाएगा नाम जपोगे जपते जपते एक समय ऐसा आएगा जब आंख बंद करोगे और प्रभु के 00:18:05 नामी के नामी के स्वरूप की झलक मन के दर्पण पर मन के मुकुर पर पड़ने लगेगी उसके उसके प्रकाश 00:18:15 में फिर लीला का दर्शन होता है फिर भगवान की लीला का रहस्य समझ में आता है जब रहस्य समझ 00:18:21 में आता है देखो आप स्टेडियम में बैठकर खेल देख रहे हो लेकिन आपको खेल का नियम पता नहीं 00:18:28 नहीं आपको आनंद आएगा नहीं आएगा खेल का आनंद तब आता है ना जब आपको खेलना भले ना आता हो 00:18:36 लेकिन खेल का नियम पता हो ऐसे श्री ठाकुर जी की लीला का आनंद तब आता है जब लीला का रहस्य 00:18:41 समझ में आ जाता 00:18:45 है कैसा कैसा प्रलाप लोग करते हैं श्री कृष्ण की लीला के विषय में रास लीला के विषय में जब 00:18:52 चीर हरण की बात आती है तब कैसा कैसा प्रलाप मूर्ख लोग करते हैं कैसी कैसी बातें लोग कहते 00:18:59 और वही उसी समय जो भगवान के भक्त हैं जिनको भगवत कृपा से भगवान की लीला का रहस्य समझ 00:19:06 में आ गया है जो कथा का अर्थ कथा का मर्म जान गए हैं उसी लीला का पुनः पुनः पुनः 00:19:15 पुनः गान करके आनंद में मगन रहते हैं अरे माया काल से परे हो जाते हैं कागभुशुंडि श्री 00:19:21 राम की कथा कहते कहते कैसी अद्भुत कैसी विलक्षण स्थिति को प्राप्त कर गए हैं 27 कल्पों 00:19:29 से राम कथा कह रहे हैं भगवान की आराधना कर रहे जब जब भगवान का अवतार होता है तब तब 00:19:35 जाते हैं और भगवान लीला का दर्शन करते हैं यह स्थिति यह सिद्धि कैसे पाई गरुड़ जी ने पूछा भाई 00:19:42 कैसे मिल गया आपको यह स्थान ऐसी सिद्धि कहां से प्राप्त हुई बोले भाई भगवान का गुण गाते हैं गाया 00:19:57 गाया 00:19:59 हरि गुण 00:20:02 गाया गाया गाया हरि गुण गाया गाया गाया हरि गुण गाया काल ब्याल सों बांचि माई री मैं 00:20:29 सांवरो 00:20:33 रंग राची सांवरो 00:20:39 रंग राची कह रहे भाई इस फल में ना छिलका है ना गुठली है रस ही रस है केवल रस ही है 00:20:47 इसमें इसलिए रसिकों के लिए है मुहुर्मुहो रसिका भुवि भावुका बार बार बार बार इसको 00:20:58 तो सुनना नहीं है इस रस का पान करना है पिबन्ति 00:21:05 कथामृतं श्रवणपुटेषु सम्भृतं पुनन्ति विषयविदूषिताशयं और कह रहे इसका इसका प्रताप क्या है व्रजन्ति ते चरणसरोरुहान्तिकं 00:21:17 बोले आपको कहीं नहीं जाना है आप तो बस बैठे बैठे कथा सुनते रहना इसलिए जिनकी कथा का 00:21:26 श्रवण कर रहे हो ना वो आ जाएंगे 00:21:29 वह आ जाएंगे वह व्रजन्ति ते चरणसरोरुहान्तिकं वो हृदय तक आ 00:21:37 जाएंगे ये यह यह साधन यह विधि अमोघ है तत्काल आनंद का दान करने वाली है शिव दम कल्याण कराने 00:21:49 वाली है त्रितापों का उन्मूलन कर देने वाली है सहज है सरल है सुगम है बस प्रभु की 00:21:58 कृपा इतनी हो क्योंकि पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता प्रभु की कृपा इतनी हो कि कोई ऐसो रे 00:22:12 सुखदाई जिहिं हरि की कथा सुनाई जासों भेंटे गति होय 00:22:26 हमारी कल जो हम 00:22:28 बात कर रहे थे जब तक मन लगा रहेगा ना बाहर किसी खटपट में मान लो कथा कहने वाले का 00:22:35 मन अगर लगा है बाहर किसी व्यवहार में किसी व्यापार में मन बुद्धि में कोई और व्यापार चल रहा है 00:22:45 जब तक तन्मयता नहीं होगी तब तक इसका रस प्रकट नहीं होता सेवक जी महाराज ने स्पष्ट किया है सोई 00:22:53 सेवक रसिक अनन्य विमल यश विस्तरै 00:22:59 कथा कहने वाले का केवल एक उद्देश्य हो भाई भगवान की विमल यश का विस्तार करना है केवल उसके मन 00:23:06 का एक ही भाव कि भाई हरि गुण गाना है बस इससे क्या होगा होगा या नहीं होगा यानी इसके 00:23:14 पीछे कोई कोई अन्य वासना कोई अन्य लालसा ना हो होते ही क्या होगा कथासारस्ततोगतः कथा का 00:23:22 जो सार है कथा का जो वास्तविक रस है कथा का जो आनंद है कथा का जो फल है 00:23:28 कथा का फल क्या है कथा का फल भगवान है कथा का फल भगवान की भक्ति है गरुड़ जी अंत 00:23:34 में यही कहकर तो गए मेरा मोह नष्ट हो गया मेरे सारे संशय दूर हो गए आपकी कृपा से आपकी 00:23:42 कृपा से श्री रघुनाथ जी के चरणों में मेरी नवीन भक्ति हो गई है मेरा अनुराग नवीन हो गया है 00:23:50 नया नित्य नवोन्मेषिणी भावना ये कथा का फल है 00:23:58 इसीलिए कभी आपसे मैंने कहा था कि अभी हमारे जीवन में नाम तो आया है पर नाम की खुमारी नहीं 00:24:03 आई है जिस नाम की खुमारी को पाकर पाकर संत गा रहे हैं नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात 00:24:19 यह जो जितने संतों के शब्द हैं ये सब नाम की खुमारी तो है अब ना रहूंगी अटकी एक स्थान 00:24:27 पर मीरा 00:24:27 कह रही कि सुन री सखी तू चेतन होके मैं मन की बात कहूं बरजी मैं काहू की नहीं रहूं मुझे 00:24:36 रोकने वाला कोई नहीं है हो मेरो कोई ना रोकन 00:24:44 हार मगन हुइ मीरा चली अब मुझे रोकने वाला कोई नहीं 00:24:55 है बस बड़ी बात है कि 00:24:57 ऐसा कोई सुनाने वाला मिल जाए और फिर ऐसा कोई श्रोता श्रोता सोई परम सुजान सुनत चित रति करै ऐसा 00:25:07 कोई श्रोता इसलिए तो दो दिन पहले आपसे कह रहा था कि भाई जो जो जिसको श्रवण की इच्छा हो 00:25:16 वो 00:25:20 आए हमको बहुत लोगों की भीड़ यहां नहीं चाहिए भीड़ में तो भीड़ में तो रस में विरस होता है 00:25:27 मैं देखता हूं शनिवार रविवार को जब बहुत अधिक संख्या में लोग होते हैं तब वातावरण और होता है थोड़ी 00:25:38 सी भी खटपट हो जाए तो तार टूट जाता है आपको मैं अबकी बार का अनुभव बताता हूं जब तीन 00:25:43 दिन के लिए बरसाना में चर्चा थी तो पहला दिन शायद पूर्णिमा थी कार्तिक पूर्णिमा थी बड़ी भारी भीड़ थी 00:25:54 अब जो चर्चा करने का भाव मैं मन में लेकर गया 00:25:57 था वो चर्चा मैं वहां पर कर ही नहीं पाया पहले दिन नहीं कर पाया दूसरे दिन जब मैंने देखा 00:26:07 कि हां भाई आज सब साधक लोग हैं आज सिर्फ सुनने वाले हैं श्रोता हैं जिज्ञासु हैं तब मैं तब 00:26:12 मैं उस दिशा में थोड़ा आगे बढ़ पाया अरे मैं तो सदा कहता हूं भाई यह जितनी बातें हम यहां 00:26:19 कह सुन रहे हैं यह बातें जब प्रकट हुईं तब एक कहने वाला था एक सुनने वाला था कोई एक 00:26:26 कहता था कोई एक सुनता था 00:26:28 यह सारा ज्ञान यह सारे रहस्य ये दो ये किन्हीं दो के मध्य का संवाद ही तो है कोई कह 00:26:35 रहा है कोई सुन रहा है महादेव सुना रहे हैं और और मां भवानी सुन रही हैं और गोस्वामी जी 00:26:43 कह रहे भाई हमको तो कोई भी नहीं मिला तो हम तो अपने मन को ही सुना रहे हैं स्वांतः 00:26:48 सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा रघुनाथगाथा 00:26:59 हमारे ध्रुवदास जी भी कहते हैं या मन के अवलंब हित कीनो आहि उपाय अपने मन को सहारा देने 00:27:07 के लिए हमको यह उपाय मिल गया है अपने मन को बिठाकर और प्रभु की हरि की कथा सुनाते हैं 00:27:16 हमारा लक्ष्य क्या हो हमारे लिए कथा का प्रसाद क्या हो हमारे लिए कथा का प्रसाद यह हो कि हमें 00:27:22 उस रस विशेष की प्राप्ति हो जाए जिसको प्राप्त करके 00:27:29 यत्प्राप्य न किञ्चिद् वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति जिसको प्राप्त करके वो चिर तृष्णा 00:27:40 हमको प्राप्त हो और सुनें और सुनें और सुनें जब सत्संग होता है ना सत्संग होता है तो सत्संग का 00:27:48 वास्तविक फल यही है और कसौटी भी यही है सत्संग हुआ है कि नहीं एक होता है 00:27:56 समागम 00:27:58 हम यहां से भी कुछ लोग आ गए वहां से भी कुछ लोग आ गए मिले बैठे हुआ सब ठीक 00:28:02 है वो भी ठीक है सत्संग सत्संग की कसौटी क्या है हमने सत्संग किया है कि नहीं उसको कैसे पहचानोगे 00:28:13 उसको तो यहीं से पहचानना पड़ेगा भाई कि थोड़ी प्यास बढ़ जाए एक पंक्ति में एक पंक्ति में तुलसी 00:28:23 बाबा ने बड़ी बात ये कह दी है राम चरित 00:28:29 जे सुनत 00:28:33 अघाहीं रस बिसेष तिन्ह 00:28:40 जाना नाहीं आप अपने ठाकुर जी की घर में सेवा करते हो कभी-कभी पहले धारण कराई हुई पोशाक धारण कराते हो 00:28:49 पहले धारण कराया हुआ श्रृंगार धारण कराते हो लेकिन अपने ठाकुर जी कभी पुराने तो नहीं लगते अगर लगते हों 00:28:56 तो फिर आप सेवा 00:28:57 नहीं कर रहे अपने ठाकुर जी नित्य नवीन लगते हैं यहां तो रसिक लोग मंगला से शयन पर्यंत सातों आरती 00:29:06 का दर्शन राधा वल्लभ लाल का करते हैं जब हम वृंदावन आए आज तो भाई जो जो वस्तुतः दर्शनार्थी हैं 00:29:15 ना जो वस्तुतः दर्शन करने ही जाते हैं दर्शन ही जिनका जीवन है आज तो भाई उन लोगों के लिए 00:29:21 बड़ी समस्या हो गई है जो जो दर्शन का सुख लेते हैं वो तो बेचारे अब दर्शन कर ही नहीं 00:29:26 पाते हैं 00:29:28 यहां से धक्का पड़ा और वहां से धक्का पड़ा जब हम आए थे यहां पर जब हमने देखा ऐसी ऐसी 00:29:35 वृद्ध माताएं एक कदम उनसे चला नहीं जा रहा है पर सातों आरती का उनका नियम है मंगला से लेकर 00:29:42 शयन पर्यंत प्रत्येक आरती का दर्शन करेंगी एक माता तो ऐसी थी जो गुस्से में रहती थी अब वो गुस्सा 00:29:50 क्या था वस्तुतः गुस्सा नहीं था वो बेचारी शारीरिक रूप से दुर्बल थी शरीर में 00:29:57 अनेक अनेक रोग लेकिन उसका नियम है अब जितनी बार वो दर्शन करने आए उतनी बार एक दो प्यार भरी 00:30:07 गाली ठाकुर जी को देकर ही 00:30:13 जाए एक बार तो मंगला आरती का समय था मुझे याद आ रहा है कि उनके पास जाकर हम लोग 00:30:19 बैठ गए वो गाया भी करती थी दर्शन दे दो राधा वल्लभ जी 00:30:28 कब की खड़ी गाया करती थी मुझे याद है दुर्बल सा शरीर था तब ऐसी भीड़ नहीं होती थी मंगला 00:30:39 का समय था अभी पट खुलने में समय था हम जाकर वहां पर बैठ गए वो गा रही है अब ने 00:30:44 नेक सा मेरा हाथ लग गया उसको मेरे को बोली देख लाला वहां चलो 00:30:53 जा हम चुपचाप चले गए 00:30:58 जब आरती हुई मैं फिर गया उनके पास मैंने श्री हरिवंश किया उस समय हाथ में किनका था किनका प्रसाद दिया 00:31:08 मेरा हाथ पकड़ कर वो बाहर आई और हाथ पकड़ के बाहर आते आते मुझे कह रही है बोली कितने 00:31:13 बरस हो गए मैं या तो कह रही हूं अब मोए ले जा अब मोए ले जा अपने संग अब 00:31:21 मेरो यहां का धरो है चलो मो पर जाए नहीं देख है है नहीं रोज जाते क आऊं 00:31:27 ले जा पर लेके ना जा रह्यो लेकिन उसका हमने देखा अंत तक नियम रहा सातों आरती का वो 00:31:32 दर्शन करती थी जो ऐसा दर्शन का सुख लेने वाले थे अब वो तो कम दिखाई पड़ते हैं क्योंकि ऐसे 00:31:42 वातावरण बदल गया धीरे धीरे और बदल रहा है खैर मैं क्या कह रहा था भूल 00:31:55 गया कुछ 00:31:57 और कह रहा था है 00:32:06 ना मैया की याद में कथा भूल गई 00:32:12 देखो चलो यहीं से आगे चलते हैं रस बिसेष तिन्ह जाना नाहीं मैं ये कह रहा था हां भाई हमारा 00:32:21 लक्ष्य क्या हो हमको भी किसी ऐसे भाव की प्राप्ति हो हां मैं ये कह रहा था 00:32:27 रोज दर्शन करो पर ठाकुर जी पुराने थोड़ी लगते हैं दर्शन करने वाले सुबह से लेकर रात तक सातों बार 00:32:34 दर्शन कर रहे हैं लेकिन उनका आनंद नवीन है ऐसे ही कथा भी हो कभी ऐसा ना लगे कथा पुरानी 00:32:41 है ये तो हमने पहले सुना है अगर आपको कभी ऐसा लगे ना पहले भी सुना है तो समझना केवल सुना 00:32:46 ही है केवल सुना ही है राम चरित जे सुनत अघाहीं 00:33:00 रस बिसेष तिन्ह जाना 00:33:23 नाहींGist in Hindi with timestamps & English
1. श्रीमद्भागवत का वास्तविक सार
The Essence of Shreemad Bhagwat
2. श्रवण और नाम जप की महिमा
The Power of Listening and Chanting
https://youtu.be/QnECp92fmV8
[00:00] श्रीमद्भागवत का सार: भगवान वेदव्यास ने सभी वेदों और पुराणों का सार श्रीमद्भागवत में समाहित किया है।
The Essence of Shreemad Bhagwat: Lord Ved Vyas has incorporated the essence of all the Vedas and Puranas into the Shreemad Bhagwat.
[01:10] कल्याण (शिवम): जीव का वास्तविक कल्याण संसार के आवागमन के चक्र से मुक्त होकर सच्चे सुख की प्राप्ति में है।
Welfare (Shivam): The true welfare of the soul lies in becoming free from the cycle of worldly birth and death and attaining true happiness.
[01:48] ताप-त्रय का निवारण: यह कथा तीनों प्रकार के कष्टों—आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक—को दूर करती है।
Relief from the Threefold Miseries: This discourse removes the three types of suffering—Adhibhautika, Adhidaivika, and Adhyatmika.
[04:48] श्रवण भक्ति: प्रथम भक्ति "श्रवण" (सुनना) है। अच्छी बातें सुनने से ही विचार और कर्म शुद्ध होते हैं।
Shravan Bhakti: The first form of devotion is "Shravan" (hearing). By listening to good things, our thoughts and actions become purified.
[06:45] मानस रोग और विवेक: संसार में सभी किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त हैं, लेकिन विवेक होने पर ही हम अपनी कमियों को पहचान पाते हैं।
Mental Ailments and Discrimination: Everyone in the world is afflicted by one mental ailment or another, but only through discrimination can we recognize our shortcomings.
[08:29] भक्तों का हृदय: भगवान की गुप्त बातें पोथियों (किताबों) में नहीं, बल्कि उनके भक्तों के हृदय में होती हैं।
The Hearts of Devotees: The Lord's secret truths are not merely found in books, but reside in the hearts of His devotees.
[11:15] नाम जप की महिमा: निरंतर नाम जप से हृदय का दर्पण साफ होता है, जिससे प्रभु की लीलाओं का अनुभव होने लगता है।
The Glory of Naam Jap: Constant chanting of the Divine Name cleanses the mirror of the heart, allowing one to begin experiencing the Lord's divine pastimes.
[18:41] लीला का रहस्य: ठाकुर जी की लीलाओं का आनंद तभी आता है जब उनका आध्यात्मिक रहस्य समझ में आ जाए।
The Mystery of Leela: One can truly enjoy Thakur Ji's divine pastimes only when their spiritual mystery is understood.
[22:53] कथा का फल: कथा का वास्तविक फल भगवान की अनन्य भक्ति और हृदय में प्रेम का जागृत होना है।
The Fruit of Katha: The true fruit of spiritual discourse is exclusive devotion to God and the awakening of love within the heart.
[28:29] नित्य नवीनता: जैसे ठाकुर जी का दर्शन रोज करने पर भी पुराना नहीं लगता, वैसे ही सच्ची कथा भी हर बार नई लगती है।
Ever-Fresh: Just as the darshan of Thakur Ji never feels old even when experienced every day, true spiritual discourse also feels new every time.
https://youtu.be/QnECp92fmV8