6 questions answered
https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI "6 Questions Answered -DBS#004" [00:22] प्रश्न 1: दिग्विजय जी का प्रश्न (दीक्षा गुरु और दीक्षा का महत्व) [00:22] "I have 2 questions prabhuji. 1- I want to know more about Diksha Guru? 2- Can I go back to godhead without Initiation?" (दीक्षा लिए बगैर क्या मैं भगवद्धाम वापस जा सकता हूँ?) [00:39] तो पहला प्रश्न मैंने इनसे पूछा था कि आप दीक्षा गुरु के बारे में... इन्होंने लिखा था "I want to know more". तो मैंने प्रश्न लिखा कि आप कितना जानते हो? क्योंकि मुझे रिपीट न करना पड़े, है ना? [00:50] तो मैंने इनको प्रश्न किया तो इन्होंने उत्तर दिया था— "मैं यह जानता हूँ, जो मैंने सुना है, मैंने यह पढ़ा है कि दीक्षा गुरु जो है, वह तुम्हें इस जन्म-मृत्यु के चक्कर से निकालता है, तुम्हारे पाप कर्म ले लेता है।" [01:02] तो ही इज़ एब्सोल्यूटली राइट (He is absolutely right)। कि दीक्षा गुरु क्या करता है? हमारे को जन्म-मृत्यु के चक्कर से निकालता है। हम अपने आप कभी नहीं निकल सकते। हमें हर हेल्प चाहिए, हर किस पर? स्टेप पर। हमें हर स्टेप पर क्या चाहिए? हेल्प चाहिए। [01:24] तो दीक्षा गुरु का इन्होंने पूछा... मोर जानने का मतलब यह है कि दीक्षा शब्द, दीक्षा शब्द दो शब्दों से बना है— 'दी' और 'क्षा'। [01:37] 'दी' का मतलब होता है— दिव्य ज्ञान। 'क्षा' का मतलब— जो दिव्य ज्ञान लेने से जिसके पाप कर्म क्षय (खत्म) हो जाते हैं। [01:46] दिव्य ज्ञान लेने से क्या होते हैं? पाप कर्म क्षय हो जाते हैं यानी खत्म हो जाते हैं। तो वह व्यक्ति है जो कि आपको दिव्य ज्ञान देता है, जिससे कि आपके पाप कर्म क्षय होते हैं। [01:58] जैसे डॉक्टर... कि यार डॉक्टर के हाथ में पता नहीं क्या शिफा है! यह जो गोली देता है उससे काम हो जाता है। तो एक्चुअली डॉक्टर सही कर रहा है कि गोली सही कर रही है? दोनों। क्योंकि डॉक्टर सही गोली प्रिस्क्राइब कर रहा है जिसके कारण तुम्हारी बीमारी दूर हो रही है। [02:14] इसी तरीके से दीक्षा गुरु आपको दिव्य ज्ञान दे रहा है। क्या दे रहा है? दिव्य ज्ञान दे रहा है। जिससे कि आपके पापों का क्षय, मतलब पाप खत्म हो रहे हैं। He is giving you transcendental knowledge. [02:30] सो गोली विदाउट डॉक्टर एंड डॉक्टर विदाउट गोली... बंदूक एंड द बुलेट। बंदूक है, नो बुलेट— डरा सकता है थोड़ी देर के लिए, फिर जब दबाएगा तो कुछ निकलेगा नहीं तो फिर तुझे दबाएगा वह, है ना? और गोली लेके कहेगा मार दूंगा... (हँसते हुए) उससे नहीं। [02:59] तो इसी तरीके से गुरु इज़ लाइक बंदूक एंड दिव्य ज्ञान इज़ लाइक गोली। नाउ द गुरु नोज़ किधर मारना है। अगर किसी को पकड़ना हो तो उसके दिल में नहीं मारते गोली, पैर में मारते हैं पकड़ने के लिए। यहाँ मार दी तो क्या होगा? मर जाएगा। [03:18] तो इसीलिए गुरु भी दवाई देख-देख के देता है कि पहला अभी इतनी दवाई दो, क्योंकि यह बहुत बीमार रहा है। इसको बहुत स्ट्रॉन्ग डोज इमीडिएटली दे दी तो हो सकता है पेट के अंदर अल्सर्स हो जाएँ। तो इसको सब चेक करना पड़ता है कि कैसे इसको मैं वह दूँ। तो गुरु यह सब चीजें देखकर वह देता है। [03:39] सो दीक्षा का अर्थ, शब्द का मतलब यह है। 'गुरु' शब्द का अर्थ है— जो ज्ञान से भारी है। गु-रु— जो ज्ञान से भारी है। He has a lot of weight. बट वेट ऑफ वॉट? बोले साहब, मेरे गुरु तो बड़े श्रेष्ठ हैं, बोले क्यों? बोले साहब, 230 किलो के हैं! (हँसते हुए) वह वेट नहीं... Weight of knowledge! [04:11] गुरु मीन्स heavy with knowledge. गुरु का दूसरा मतलब है— जो 'गु' से 'रु' यानी अंधकार से उजाले की तरफ ले जाए। [04:27] तो दीक्षा गुरु आपका क्या करता है कि बेसिकली आपको बेसिक 'सम्बन्ध ज्ञान' देता है। और डिटेल में जाना चाहें तो सम्बन्ध ज्ञान का मतलब कि— मैं कौन हूँ? यह प्रकृति क्या है? इन दोनों का मालिक कौन है? और इन तीनों का आपस में सम्बन्ध क्या है? यह किसका काम है? दीक्षा गुरु का। [04:45] और यह आपको, आपके पापों को हरता है। पापों को क्यों हरा जाता है? जैसे अभी आपको कोई स्टोरी आती हो ठीक है, I ask you some story and you know the story. परंतु I keep 500 kgs of weight on your head and I tell you keep walking and telling me the story. बोले वेट संभालूँगा कि तेरे को स्टोरी सुनाऊँगा? [05:07] तो इसी तरीके से दीक्षा के समय के अंदर दीक्षा गुरु जो हैं, वह आपके पाप कर्मों को ले लेते हैं जिससे कि आप भक्ति कर सको। इसलिए पाप कर्मों को लेना बहुत जरूरी हो जाता है, उसके बगैर आप भक्ति नहीं कर पाओगे। 500 kg का क्या रख रखा है आपने? वेट रख रखा है और स्टोरी सुना रहे हैं। You are all qualified to do bhakti, because that is the only one thing which is your qualification, rest are all disqualifications. [05:43] तो यह दीक्षा गुरु का कार्य है। अब आता है कि— "Can we go back to Godhead without Diksha?" No! [05:52] दीक्षा के समय तो नाम भी बदला जाता है। क्योंकि दीक्षा के समय में कहा गया है कि आपका दोबारा जन्म होता है। मनुष्य के दो जन्म होने चाहिए मिनिमम (होने तो तीन चाहिए, तीसरा संन्यास पर)। दो जन्म तो अनिवार्य हैं— दूसरा जन्म होता है दीक्षा के समय। [06:15] उस जन्म के अंदर आप अपना पुराना पहनावा छोड़ के नए पहनावे में आते हो। You become from a normal person to a devotee. इसीलिए आपका असली नाम आपको दिया जाता है। असली नाम का मतलब यह है कि हम सब के सब भगवान के दास हैं, तो भगवान के नाम के सामने 'दास' लगाया जाता है और माताओं के लिए 'दासी' लगाया जाता है। [06:39] जैसे मेरी वाइफ हैं, इनका नाम है विष्णुप्रिया दासी। विष्णुप्रिया यानी लक्ष्मी जी, विष्णु जी की प्रिय। या चैतन्य महाप्रभु की वाइफ विष्णुप्रिया। [07:11] जैसे नाम दिया गया अकाम भक्तिदास— यानी जिसे कोई कामना नहीं है भक्ति करने के लिए, उनके दास हैं। तो जितने भी अकाम भक्ति करते हुए आए हैं (प्रह्लाद महाराज, ध्रुव महाराज, समस्त गोपियाँ, राधारानी), उनके दास हुए। मेरे को नाम दिया जैसे वृंदावन चंद्र दास। [07:42] क्योंकि दोबारा बर्थ माना जाएगा ना। फर्स्ट बर्थ तो हर योनि में होता है— कुत्ते का भी बच्चा पैदा होता है, चूहे का भी होता है, सबका होता है। तो फिर हममें और उनमें क्या फर्क है? कोई फर्क ही नहीं रहा! तो इसीलिए कहा गया दूसरा जन्म। दूसरा जन्म जो है, नाम चेंज होता है। [08:06] तो प्रभुपाद जी ने फिर कहा कि जब मैं फिजिकली प्रेजेंट नहीं होऊँगा, परंतु मैं प्रेजेंट हूँ अनमैनिफेस्ट फॉर्म में। कैसे? दिखता नहीं हूँ तुम्हें परंतु मैं हूँ। उस केस के अंदर मेरे सीनियर डिसाइपल जो होंगे, वह दूसरों को क्या करेंगे? दीक्षा देंगे मेरे बिहाफ पर। उनको 'ऋत्विक' कहा जाएगा (Priest)। [08:39] परंतु वह सीनियर विल एक्ट एज 'शिक्षा गुरु'। शिक्षा गुरु का मतलब— अब जो तुम्हें कुछ पूछना है जीवन भक्ति में कैसे चलाना है, क्या करना है, वह तुम उससे लोगे। उससे मतलब वही नहीं जिसने नाम दिया है, कोई भी हो सकता है। परंतु एक सीनियर डिसाइपल को जिसको तुम सोचते हो कि यह मुझे फिलॉसफी समझा सकता है, मेरे जीवन में भक्ति में गाइड कर सकता है, उसको आप शिक्षा गुरु मानकर उसकी आज्ञा का पालन करोगे। [09:05] शास्त्र कहते हैं दीक्षा और शिक्षा गुरु में कोई भेद नहीं है, इसलिए दीक्षा लेना तो अनिवार्य है। [09:11] तो हमारे यहाँ GIVE के अंदर हम सिस्टम यह फॉलो करते हैं जो प्रभुपाद जी ने बोला था करने के लिए। जहाँ किसी से पूछोगे— आप किसके शिष्य हो? "मैं प्रभुपाद जी का दीक्षा शिष्य हूँ। दीक्षित किससे हूँ मैं? प्रभुपाद जी से। हाँ, शिक्षा किससे ले पा रहा हूँ? वृंदावन चंद्र दास प्रभु के अंडर में, तो वह मेरे शिक्षा गुरु हैं।" [09:34] शास्त्रों में कहा गया शिक्षा गुरु और दीक्षा गुरु में भेद करने वाला नर्क जाता है। क्योंकि शिक्षा गुरु आपको भक्ति दे रहा है, बता रहा है कि भक्ति कैसे करनी है। [09:48] तो दीक्षा गुरु दीक्षा के अंदर फेथ (श्रद्धा) पैदा करता है। शिक्षा गुरु का क्या काम है? मेरा काम क्या है कि आपको प्रभुपाद और प्रभुपाद की टीचिंग्स के अंदर फेथ पैदा करूँ। इसीलिए दीक्षा लेना अनिवार्य है। आप मन से नहीं कह सकते कि मैंने प्रभुपाद जी को गुरु मान लिया। अगर ऐसा होता तो शास्त्र कहते दीक्षा की जरूरत नहीं है, आप मन से मान लो। परंतु शास्त्रों ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा। शास्त्रों ने कहा है फॉर्मली इनिशिएट (दीक्षा) होनी चाहिए। [10:38] दीक्षा बहुत इम्पोर्टेंट चीज़ है। रूप गोस्वामी जी ने भी कहा है कि दीक्षा लेने पर ही आप भक्ति करने के योग्य बनते हैं। भक्ति रसामृत सिंधु में जो 64 अंग बताए गए हैं, उसमें पहला अंग है— 'गुरु पद आश्रय', फिर तीसरे में आता है— दीक्षा लेना। तो दीक्षा लेना अनिवार्य है। [11:04] प्रश्न 2: अनुज प्रभु / हर्ष का प्रश्न (भगवद्गीता का ज्ञान एवं अर्जुन के श्लोक) [11:04] दूसरा है अनुज प्रभु— "Hare krishna prabhu ji, gita was written by Vedvyas, I agree he knows bhagvat gita but how he knows the shalokas spoken by arjuna or sanjay. U said this knowledge is coming from guru parampara from infinite years, then it must be same from infinite years but arjun was born 5000 year before and his shalok is also there in gita which shows this is not same before arjun birth ? Please explain..." [12:35] यह बोलना चाह रहे हैं यहाँ कि भगवद्गीता तो अनंत काल से चली आ रही है, जैसे भगवान ने गीता में कहा कि यह ज्ञान मैंने विवस्वान को दिया। परंतु उस टाइम अर्जुन तो थे नहीं, अर्जुन तो 5000 साल पहले आए हैं। तो उन्होंने जो प्रश्न किए हैं, तो वह फिर सेम गीता कैसे हुई जो लाखों साल पहले थी? [12:59] बड़ा सिंपल उत्तर है। क्योंकि भगवद्गीता में मतलब किससे है? जो ज्ञान है। ज्ञान तो सेम है! क्वेश्चन आप कैसे भी करो, ज्ञान आपको सेम मिलेगा। [13:18] मैंने बच्चों के साथ एक एग्जांपल किया था कि— • 7 - 6 कितना होता है? 1 • 5 - 4 कितना होता है? 1 • 10 - 9 कितना होता है? 1 • 8 - 7 कितना होता है? 1 • 14 - 13 कितना होता है? 1 क्वेश्चन सेम था? नहीं। आंसर? 1। [13:47] तो अर्जुन ने जो प्रश्न किए हैं, भगवान ने जो गीता में पढ़ाया था, वह एटरनल (शाश्वत) है। 16 प्रश्नों के अंदर आप कोई ऐसा प्रश्न कर ही नहीं सकते जिसका भगवान ने गीता में उत्तर न दिया हो। [14:17] जैसे आपने एक क्वेश्चन किया, मैंने आंसर किया। फिर उसके बाद मैंने दो उत्तर और रख दिए, आपने कहा— प्रभु जी, आपको कैसे पता था मेरे मन में यह चल रहा था? क्योंकि मैं समझ जाता हूँ कि मैंने यह आंसर दिया होगा तो इसके मन में यह क्वेश्चन उठा होगा। भगवान से बढ़िया तो और कोई जान नहीं सकता। [14:49] तो नॉलेज इज़ द सेम, फिलॉसफी इज़ द सेम। अर्जुन वाज द बेस्ट स्टूडेंट, तो ही विल पुट अप द बेस्ट क्वेश्चंस। नॉलेज रिमेंस द सेम। [15:21] प्रश्न 3: विनोद मिश्रा जी का प्रश्न (साईं बाबा की पूजा) [15:21] Vinod Mishra: "Hare krishna....kya sai baba ki puja krna uchit hai...mere khyal se wo ek sant the aur hme ijjat krni chiye...na ki puja..plz iska samadhan kren" [15:39] हरे कृष्णा विनोद जी! एक वैष्णव समस्त जीवों की इज्ज़त करता है, चाहे वह संत हो या न हो। एक कृष्ण भक्त चींटी की भी इज्ज़त करता है उसको न मारकर। क्योंकि हर जीव का जीने का अधिकार है (Right to live)। [16:23] साईं बाबा जी क्या हैं, क्या थे— इससे कोई शास्त्रों में चर्चा नहीं है। इसलिए हम उनकी पूजा भी नहीं करते। इज्ज़त हम सबकी करते हैं। वह तो देवी-देवता भी नहीं हैं। [16:40] परंतु भटका जरूर रहे हैं लोगों को भगवान से। संत का काम भटकाना नहीं है, संत का काम है बताना कि भगवान कौन हैं। लोग बोलते हैं "सबका मालिक एक"— अबे है कौन? यह तो बता दे! [17:13] तो यह मूर्ख बना रहे हैं लोग। वह भगवान नहीं हैं। इज्ज़त करना गलत नहीं है, परंतु मंदिर बना के पूजा करना? मंदिर सिर्फ भगवान के बनते हैं, किसी आम के नहीं बना करते। हमारे गुरुदेवों के मंदिर नहीं बनते, समाधियाँ बना करती हैं। मंदिर तो सिर्फ भगवान श्री कृष्ण के हैं। [18:00] हर जगह जो बनी हुई हैं वह समाधियाँ हैं, मंदिर नहीं हैं। उनके नाम पर लोग पैसा कमा रहे हैं। भगवद्गीता पढ़िए 16वाँ अध्याय, भगवान कहते हैं अपनी इंद्रिय तृप्ति करने के लिए असुर लोग किसी को भी कुछ भी करते हैं। [19:13] प्रश्न 4: Anonymous का प्रश्न (समलैंगिकता / समलैंगिक संबंधों पर दृष्टिकोण) [19:13] Anonymous: "Hare krishna prabhu ji, please clear ... Chaitanya mahaprabhu aaye aur chale gye, aise hi bhagvan ka har avatar dharti se chala gya ? Ab jab wo nahi h to phr hum unki pooja kyu krte h, hume sirf bhagvan shrikrishna ki pooja krni chaiye...please tell about jaganath baldev subhadra maiya... Chaitanya mahaprabhu jab aashirvad dete tab kehte 'krishna mate rasto' iska kya mtlbi h ?..." [19:16] पहला— "हर अवतार चला गया" - यह रॉन्ग स्टेटमेंट है। कोई नहीं गया, सब यही हैं। हिरण्यकशिपु के लिए खंभे में भगवान नहीं थे, प्रह्लाद महाराज के लिए थे। विष्णु जी परमात्मा के रूप में कण-कण में विराजमान हैं। भगवान हर जगह, हर समय हैं। [20:24] "जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा मैया के बारे में बताओ" — जगन्नाथ जी स्वयं कृष्ण भगवान हैं, द्वारकाधीश का स्वरूप हैं। बलदेव जी बलराम जी हैं। सुभद्रा मैया साक्षात भगवान की बहन हैं (माया देवी)। [23:11] चैतन्य महाप्रभु आशीर्वाद देते हुए कहते थे— "कृष्णमतिरस्तु"। इसका मतलब है— तुम्हारी मति (मन) कृष्ण में लगे। [23:56] प्रश्न 5: कोपल जी का प्रश्न (समलैंगिकता और धार्मिक आख्यान) [23:56] Kopal: "hare krishna prabhuji, i have a doubt, these days supreme court criminalised gay practises... and here many religions have put forward their ideologies on this, and they say that its justified in hinduism as with the association of vishnu and shivji ayyappa was born... so it gay practises natural, ethical or unethical..." [24:59] The basic fact is this: First of all, you have to understand the goal of human life is to develop love of Krishna and go back home, back to Godhead. All carnal feelings have to be finished. [25:21] If carnal feelings are there, that means there is a big problem in your being called a Hindu. You are Hindu Asura! [25:35] When sex between male and female is restricted only for childbirth, then what do you talk of gay? [25:44] Talking about Vishnu Ji and Shiv Ji... two gays can never produce a child! What people are saying is all nonsense. Sanatana Dharma is so strict on sexual relationships even in marriage—if a person is having sex for not begetting children, it is called illicit sex. [26:31] Ayyappa was born by Shiv Ji and Vishnu Ji... they had sex? This is nonsense! As you go higher into planetary systems, bodies become subtle. In Svarga, birth of children happens through subtle mental thoughts. [27:25] Vishnu Ji and Shiv Ji could create children through their thought process. Minds meet and children are born. Dattatreya Ji was born by Shiv Ji, Vishnu Ji, and Brahma Ji together—they did not copulate! That was a mixed avatar of these three. [28:19] In the creation of Krishna, there is only one Purusha (male)—Lord Sri Krishna. Everyone else is female gender (Shakti/energy). So how can there be two gays when there is only one Shaktiman? This is all nonsense. [30:11] प्रश्न 6: अनमोल जी का प्रश्न (शिर्डी साईं बाबा की पूजा) [30:11] Anmol: "why shirdi sai baba is being worshipped ? He is not even in deva devta i thnk ? Please clear. Hare krishna" [30:17] Anmol Prabhu, you are absolutely right! Why is he being worshipped? God/Krishna has given us independence, and people misuse independence to worship anyone. [30:38] You are right, he is not even a Devi-Devta. You don't have to get any clarification, you are already right. These prevalent wrong thoughts should be cleared. Thank you very much!It is all about Krishna and contains list of Holy Spiritual Books, extracts from Srimad Bhagvat, Gita and other gist of wisdom learnt from God kathas - updated with new posts frequently
Saturday, August 8, 2026
Wednesday, August 5, 2026
पति के जीवन में पत्नी बनकर कौन आता है जानिए शास्त्रों का गूढ़ रहस्य by Rajender Das ji
पति के जीवन में पत्नी बनकर कौन आता है जानिए शास्त्रों का गूढ़ रहस्य
by Rajender Das ji
[00:00] उत्तम का विवाह बहुला के साथ हुआ था और जो उनकी पत्नी बहुला थी वह बड़ी रूपवती थी। वो उसमें आसक्त रहते थे, उनका मन और किसी काम में नहीं लगता था। स्वप्न में भी वह बहुला का ही चिंतन करते थे। रानी उनके अनुसार नहीं चलती थी पर वे रानी के अनुसार ही सदा चलते थे। वो कहे खड़े हो जाओ तो खड़े हो जाते, बैठ जाओ तो बैठ जाते। इस तरह से एकदम उसके अधीन होकर चलते थे। पर इतना प्रयास करने के बाद भी वह रानी बहुला कभी उनके अनुकूल नहीं होती।
[00:52] एक दिन राजा उत्तम अनेक राजाओं के साथ बैठे थे और उन राजाओं के समक्ष ही रानी ने महाराज का अपमान कर दिया, उनकी आज्ञा को ठुकरा दिया। इससे राजा को क्रोध आ गया। उन्होंने सोचा कि इतने लोगों के बीच में मेरी मर्यादा नहीं रखी और मेरी बेइज्जती कर दी। [01:25] राजाओं को विदा करने के बाद उन्होंने द्वारपालों को आज्ञा दी कि इस दुष्ट हृदया स्त्री को तुरंत रथ में बिठाओ और घनघोर जंगल में छोड़ आओ। सेवक ने रानी को निर्जन जंगल में छोड़ दिया और राजा अपनी प्रजा का पुत्रों के समान पालन करने लगे। [02:14] एक दिन राजा उत्तम के दरबार में एक दुखी ब्राह्मण आया और बोला, "महाराज! मेरी स्त्री को रात में बिना दरवाजा खुले कोई चुरा ले गया। आप मेरी स्त्री को खोजकर प्रदान करें, क्योंकि राजा आय और धर्म दोनों का छठा भाग लेता है।"
[03:45] राजा ने ब्राह्मण से स्त्री का हुलिया पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि उसकी दृष्टि क्रूर है, कद लंबा है, बाहें छोटी हैं, चेहरा दुबला और कुरूप है। उसका स्वभाव बहुत कठोर है और वह मीठा बोलना नहीं जानती।
[05:22] राजा हंसे और बोले कि ऐसी स्त्री से तो पिंड छूट गया, अच्छा हुआ। यदि आवश्यकता हो तो मैं तुम्हारा दूसरा विवाह करा देता हूँ। [06:17] ब्राह्मण ने कहा, "शास्त्रों का आदेश है कि प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपनी धर्मपत्नी की रक्षा करे, चाहे उसका स्वभाव अनुकूल हो या प्रतिकूल। यदि उसका त्याग किया गया तो वर्णसंकर संतान पैदा होगी और पितर नरक में गिरेंगे। बिना पत्नी के धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि नहीं हो सकती।" [08:17] राजा उत्तम ब्राह्मण की पत्नी की खोज में निकले और एक तेजस्वी ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि ने पहले अपने शिष्य से अर्घ्य लाने को कहा, फिर मना कर दिया।
[09:33] राजा ने पूछा कि मुझे अर्घ्य का अधिकारी क्यों नहीं माना गया? ऋषि ने कहा कि तुमने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया है। जो व्यक्ति १५ दिन तक नित्य कर्म छोड़ दे वह अस्पृश्य हो जाता है, और तुमने एक वर्ष से पत्नी का त्याग किया है, इसलिए तुम्हारा नित्य कर्म फलहीन हो गया है। पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे का त्याग नहीं करना चाहिए।
[13:46] ऋषि ने बताया कि बला नाम का राक्षस ब्राह्मण की पत्नी को उत्पलावत जंगल में ले गया है। राजा वहाँ पहुँचे। राक्षस ने बताया कि वह केवल यज्ञों के अपूर्ण होने पर उनके पुण्य का भक्षण करता है। उसने ब्राह्मण का धर्म नष्ट करने के लिए उसकी पत्नी का हरण किया था। [17:33] राजा के कहने पर राक्षस ने ब्राह्मणी के दुष्ट स्वभाव को भक्षण कर लिया, जिससे वह सुशील और सुंदर हो गई। राजा ने उसे ब्राह्मण को सौंप दिया। [19:08] इसके बाद राजा ने अपनी पत्नी बहुला के बारे में पूछा। ऋषि ने बताया कि उसे नागराज कपोत पाताल (रसातल) ले गया है। [20:54] राजा ने राक्षस का स्मरण किया और राक्षस राजा की पत्नी बहुला को वापस ले आया। बाद में सारस्वत यज्ञ करके नागकन्या की वाणी लौटाई गई। उस रानी से जो पुत्र हुआ, वह आगे चलकर उत्तम मन्वंतर का अधिपति बना। [21:41] कथा का मुख्य संदेश यही है कि हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार किसी भी परिस्थिति में पति और पत्नी को एक-दूसरे का त्याग नहीं करना चाहिए।
वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 by Shri Hit Ambrish ji
वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 by Shri Hit Ambrish ji
First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.
00:00:00 और ये जो प्रोत शब्द है ना इस शब्द के गर्भ में हित है प्र उपसर्ग पूर्वक उत हित से 00:00:07 प्रोत बना है इसमें हित है जिसम विशुद्ध हित परक धर्म की बात कही गई है और जैसा कुछ क्षण 00:00:16 पहले मैंने आपसे कहा ना प्रभु के अतिरिक्त यह जीव कभी भी कहीं भी कुछ भी चाहे तू अपने लिए 00:00:26 पीड़ा की ही व्यवस्था कर रहा है पहले भी मैंने 00:00:30 आपसे निवेदन किया था यहां तो दुख भी दुख है भाई और सुख भी कहीं ना कहीं दुख ही छोड़कर 00:00:38 जाता है पीछे थोड़ी देर का सुख बड़ी देर का दुख छोड़ कर जाता है तभी ध्रुव दस जी कह 00:00:45 रहे हैं कि विषय चुगा जिन चुगे मन व जो काल रूपी बहेलिया है वह तो भाई विषय का चुग्गा 00:00:53 डालता ही है सबके सामने डालता है क विषय चुगा जिन चुगे मन चुगत कछु सुख हो 00:01:00 जब तू चुगेगा तो बो थोड़ी देर का सुख होगा विषय में भी क्षण भंगुर रस तो है ना अल्पकालिक 00:01:09 रस तो विषय में भी है ना हो तो कभी मन उसकी ओर आकर्षित नहीं होगा कभी पहले आपसे मैंने 00:01:17 संकेत किया ना भाई मन के पास बुद्धि नहीं है मन को तो रस चाहिए उसको आप भगवत रस नहीं 00:01:23 दोगे तो वो विषय के रस के पीछे दौड़ेगा मन को रस चाहिए मन के पास बुद्धि नहीं है 00:01:31 मन को तो रस चाहिए आप उसकी व्यवस्था कर दीजिए आप लगाए रहेंगे उसको कथा कीर्तन में भजन सत्संग में 00:01:39 सेवा सुमिरन 00:01:44 में सु नहीं दौड़ेगा उस ओ नहीं तो कोरी कोरी बात करने से तो भाई मन हाथ नहीं आता है 00:01:54 ध्रुव दस जी कह रहे विषय चुगा जिन चुग मन चुगत कछु सुख होई थोड़ा सुख 00:02:00 मिलेगा जैसे मैंने कहा ना यहां का सुख बड़ी देर का दुख छोड़ जाता है फिर फांसी ऐसी पर है 00:02:07 तीही सम दुख न 00:02:13 होई आज यहां से जाकर पाच मिनट नेत्र मूंदकर इस इस बात का विचार करना कि जब जब आपने जब 00:02:22 जब आपने संसार से सुख की इच्छा सुख की कामना की क्या आपकी झोली में दुख नहीं गिराकर 00:02:30 वही तो दुख का कारण बना और अगर अनुभव हो रहा हो कि हां भाई दुख ही मिला तो अपने 00:02:40 आप को सौभाग्यशाली जानना कि आप इसका अनुभव कर पा रहे हो नहीं तो मोह निद्रा में पड़ा जीव तो 00:02:46 अनेक अनेक जन्म इस दुख का अनुभव भी नहीं कर पाता है क्योंकि दुरंत मोह है अगर अगर लगे ना 00:02:54 ऐसा कि हां भाई चले तो थे सुख के पीछे हाथ दुख आया अगर ऐसा अनुभव हो तो समझना सौभाग्यशाली 00:02:59 हो 00:03:00 थोड़ा विवेक जगा है तभी यह देख पा रहे 00:03:07 हो श्री काक बसु जी ने गरुड़ जी से यही तो कहा ही विधि सकल जीव जग रोगी रे इन 00:03:15 मानस रोगों से सभी जीव पीड़ित हैं लेकिन कोई बरले होते हैं जो अपने रोग को पहचान पाते हैं क्योंकि 00:03:24 मनोरोगी अपने आप को रोगी समझता है नहीं क मैं स्वस्थ हूं सौभाग्यशाली 00:03:29 कोई होता है जो अपने रोग को पहचान पाता 00:03:36 है तो कुछ भी चाहते हो आप आप आप जान लेना समझ लेना भाई आप अपने लिए दुख की व्यवस्था 00:03:42 कर रहे हो अब कोई प्रश्न करेगा भाई क्या करें यहां कुछ चाहिए मत चाहो मत ये जो चाह है 00:03:53 ना बड़ी अमूल्य है इस चाह को प्रभु को निवेदन करो वो चाहने से वो मिल जाते हैं 00:04:01 इच्छा मत करिए अरे भाग्य कालिका झूली में आ गिरेगा रसिक अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी महाराज क अन 00:04:09 मांग आगे आवेगा आ ही 00:04:18 जाएगा चाहना प्रभु को ही है प्रभु से नहीं चाहना है प्रभु को चाहना है प्रभु को ही चाहना है 00:04:30 हजार बार यह बात अपने मन से कहोगे तब एक बार मन सुनेगा मानेगा नहीं सुनेगा भगवान ने गीता में 00:04:39 अभ्यास शब्द कहा ना किस बात का अभ्यास करना है हजार बार य बात आप अपने मन से कहोगे ना 00:04:44 नहीं चाहना है संसार को नहीं चाहना है संसार से अब कुछ हजार बार अपने मन को सिखाओ पढ़ाओ तब 00:04:51 एक बार मन सुनेगा और बड़ी देर में जाकर फिर मानेगा यही तो साधना है 00:05:02 इसलिए जब हम मानस जी का चिंतन कर रहे थे तो मैंने कहा था कि सुनकर फिर अपने मन को 00:05:08 भी सुनाना कथा पूर्ण तभी 00:05:14 होगी इसी का नाम अभ्यास है इसीलिए रोज आकर मैं बैठ रहा हूं या आप बैठ रहे हो कि कोई 00:05:20 एक विचार हमको यहां से मिले और फिर उस उस उस विचार का अपने मन को अभ्यास 00:05:28 कराए 00:05:30 सबसे पहले यही बात श्रीमद् भागवत में कही गई है कि भाई इसमें इसमें निष्कपट धर्म की बात है निष्कपट 00:05:37 धर्म माने विशुद्ध 00:05:43 भक्ति उत्तमा भक्ति उसी की चर्चा यहां भगवान वेदव्यास कर रहे हैं और फिर कह रहे हैं कि विशुद्ध अंतःकरण 00:05:53 वाले संतों के द्वारा जानने योग्य जो वस्तु है 00:05:59 फिर विचार हुआ भाई जानने योग्य क्या है जिसको जानकर य ज्ञात वा मतो भवती माने अगर मैं बहुत सरल 00:06:14 शब्दों में इसे कहूं भाई जिसको जानकर कुछ आनंद आए ना उसी को तो जानना चाहिए जिसको जानकर आनंद आए 00:06:22 जिसको जानकर आनंद की अभिवृद्धि हो और यहां नारद जी कह रहे बो जिसको जानकर यवा मतो भवति 00:06:30 कोई आनंद में उन्मत हो जाता है जैसे बाईसा कह रही है भाग खुल्या महारा साद संगत सु सांवरिया के 00:06:43 बट नित उठ हरि जीरा मंदिर जा स्या नाचा दे दे चुटकी मेरो मन लागयो हरि जी सु अब ना 00:06:58 रह 00:07:02 य ये किसी मत की अवस्था ही तो है ना य मता अवस्था है य जत मतो भवती कोई उमत 00:07:09 हो जाता है जसे शी कबीर साहेब कह रहे नाम चढ़ी उतरे नहीं भाई और चढ़ी छिन छिन चढ़ उतरे 00:07:19 नाम चढ़ी तो चढ़े सवाई और क कैसी है य ये खुमारी कैसी है देखत चढ़े 00:07:30 चढ़े अगर आपने कभी किसी भक्त को प्रेम में भाव में भरकर कभी गाते नाचते देखा हो तो आपको शायद 00:07:36 अनुभव वषण का आनंद कैसा होता है देखत चढ़े जब कोई भावा वेश में होता है ना तब उसके उसके 00:07:48 रोम रोम से एक विशिष्ट प्रकार का परमाणु नहीं प्रेमा निशित होता है जब कोई भावा आवेश में होता है 00:07:55 तभी भगवान कह रहे वा गद गदा द्रव यस चित्तम 00:07:59 सत्य भीषण को ल उदय त चम भक्ति यतो भुवन पुना कोई भावा वेश में होता है भक्त जब भाव 00:08:12 में वह अपने अपने अपने प्रियतम अपने स्वामी के निकट 00:08:19 है कैसे महादेव कथा सुनाते सुनाते समाधि स्त हो गए प्रभु कर पंकज कप 00:08:29 कैसी सा सुमिर सो दसा मगन गौरी रघुनाथ जी का कर कमल है श्री हनुमान जी का मस्तक है और 00:08:42 शंकर स्वयं केसरी नंदन महादेव को वही अपने मस्तक पर प्रभु के उस कर कमल की दिव्य सुखद अनुभूति हो 00:08:51 रही है महादेव समाधि हो गए तो जो भावा वेश में थे महादेव और जग 00:08:59 जबा महादेव का दर्शन कर कर के आनंदित हो रही है वहा महादेव कथा कहते कहते रुक गए समाधि लग 00:09:08 गई और जगदंबा को जो आनंद कथा श्रवण करने में आ रहा था वैसा ही आनंद महादेव की उस अवस्था 00:09:16 का दर्शन करने में भी आ रहा है भाव में मग्न य जञा मतो जिसको जानने से ऐसा आनंद मिले 00:09:25 वही जानने योग्य है अरे 00:09:29 उस दिन यही तो मैं आपसे कह रहा था संसार की कोई भी बात जान लो कांटे की तरह भीतर 00:09:34 जाकर चुभती है दो लोग आपस में बैठे हैं मैंने आपसे कहा था ना भाई अंत में व्यक्ति दुखी होता 00:09:47 है अपने दुख से दुखी होता है दूसरे के सुख से दुखी होता है दुखी होता है संसार की कोई 00:09:53 भी चर्चा कोई भी वार्ता मन में विक्षेप पैदा करती है आनंद नहीं विक्षेप 00:10:01 हां पर यह है कि मोह निद्रा में सोया जीव इस बात का अनुभव नहीं कर पाता लगा रहता है 00:10:06 निंदा में पिसता में ध्यान रखना कथा का अमृत भी कान सेही पिया जाता है पिवती भगवत आत्मन 00:10:21 सतामटका अमृत भी कान से ही पिया जाता है और संसार की विषैली वार्ता भी कान से ही भीतर जाती 00:10:28 है 00:10:31 ये जो सुनना है ना श्रवण जो है इसका बड़ा गहरा प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है सुनने का देखने 00:10:41 से भी ज्यादा सुनने 00:10:45 का बड़ा गहरा और बड़ा गंभीर प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है इसलिए सबसे पहले भगवान ने इसी इंद्रिय को 00:10:55 भक्ति में लगाने की बात कही है श्रवण भाई कथा सुनो 00:11:00 सबसे पहले कान को ही भक्ति में लगाने की बात क्यों की क्योंकि सबसे अधिक संसार यहीं से जाता है 00:11:05 भीतर विषय की वार्ता सुन सुनकर फिर विषय का आकर्षण होता है विषय की बात सुनकर विषय का आकर्षण होता 00:11:14 है फिर विषय का चिंतन होता है और चिंतन गाढ़ा हो जाए तो संस्कार बन जाता है संस्कार स्वभाव हो 00:11:23 जाता 00:11:27 है 00:11:31 सबसे पहले भगवान ने यही व्यवस्था की भाई सबसे पहले कान को लगाओ भजन में कान लगे भक्ति में प्रथम 00:11:39 भक्ति संतन करी संगा दूजी रति मम कथा प्रसंगा अच्छी बात सुनिए मुझे तो ऐसा लगता है भाई जो अच्छा 00:11:48 सुनेगा वह अच्छा सोचेगा जो अच्छा सोचेगा वह अच्छा समझेगा और जो अच्छा समझेगा वो अच्छा करेगा हम यही तो 00:11:57 कहते ना भाई सोच समझ कर करना 00:11:59 गलत सुनोगे गलत सोचोगे गलत सोचने वाला गलत ही समझेगा और जो सोचेगा और समझेगा ही गलत ठीक करेगा कैसे 00:12:11 तो गलत ही 00:12:16 करेगा क्यों बार-बार कुसंग से बचने की बात महापुरुष करते हैं क्यों क्योंकि कुसंग आपके विचार को दूषित करता है 00:12:25 आप गलत संग में रहोगे आपका विचार दूषित हो जाएगा 00:12:30 आप ठीक सोचोगे ही नहीं और ठीक सोचोगे नहीं तो ठीक समझोगे कैसे ठीक करोगे कैसे इसलिए अच्छा सुनिए मैं 00:12:39 बार-बार आपको कहता हूं शब्द भी एक प्रकार का आहार है जो आप कान से ग्रहण करते हैं आपका यह 00:12:45 आहार शुद्ध होना 00:12:49 चाहिए नहीं तो यह मानसिक विक्षेप पैदा करेगा मन बीमार हो जाएगा आप देखिए 00:12:59 मंथरा ने जो विष उगला कहां से प्रवेश किया उसने थोड़े समय के लिए यद्यपि य भगवान की लीला है 00:13:10 पर जो भी हुआ मंथरा ने जो विष उगला उसने कहां से प्रवेश किया कान से ही तो प्रवेश किया 00:13:17 व स्वार्थ में भरे जो शब्द थे व विषैले शब्द उसने क के कान में जाकर 00:13:27 डाले 00:13:29 और भरत जैसे महा भागवत को गर्भ में रखने वाली क कहीं और एका एक श्री राम को भरत जी 00:13:35 से भी अधिक स्नेह करने वाली श्री कह कई एका एक क्या कह बैठी क्या निर्णय ले लिया कान से 00:13:43 गलत आहार हु कुसंग हुआ कुसंग ने विचार दूषित 00:13:49 किया और भाई वैसे तो भगवान की लीला है पर देखो कुसंग का परिणाम क्या आया कुसंग का परिणाम यह 00:13:56 हुआ कि सदा सदा के लिए अपयश मिला 00:14:00 व अपयश की पात्र हो 00:14:04 गई बहुत कम लोग ही तो जानते हैं कि भाई ककई जी ने जो किया वह भगवान की इच्छा से 00:14:10 किया साधारण व्यक्ति तो आज कोई भी अपनी संतान का नाम ककही नहीं 00:14:18 रखेगा अगर हम इस दृष्टि से इसका विचार करें हुआ क्या कान से गलत आहार हुआ है फिर गलत सोचा 00:14:27 गलत समझा गलत कर दिया 00:14:32 इसलिए महापुरुषों ने कहा है भाई अपना अपना संग साफ सुथरा रखना गलत बात कान में जाने ना पाए इसलिए 00:14:40 आपको सुना रहा था उस दिन श्री गिरिराज वाले राध स्मरणीय पंडित श्री गया प्रसाद जी महाराज की बात वो 00:14:46 तो कहते थे खूब खाए ले खूब सोए ले और खूब भजन करे बोले कादना भजन में मन ना लगे 00:14:54 तो बोले चादर तान के भले सो जाए 00:14:58 पर संसार की वार्ता ना करें संसार की चर्चा ना करें मैं फिर दोहरा रहा हूं गनत प्रभाव होता है 00:15:09 आपकी चेतना पर जो आप सुनते हैं उसका मैं तो सदा ही कहता आया हूं भाई सबसे बड़ी शक्ति शब्द 00:15:17 की तो है गुरु के मुख से निकला एक शब्द जीव को भव पार करा देता है जीव भव से 00:15:23 पार हो जाता 00:15:27 है 00:15:30 निष्कपट धर्म है और इसमें उसकी चर्चा है जो महापुरुषों के द्वारा विशुद्ध अंतःकरण वाले संतों के द्वारा जानने योग्य 00:15:39 है जानने योग्य वस्तु क्या है भाई जिसको जानकर आनंद आए त्वा मतो भवति और फिर कहा स्तब्ध 00:15:51 भवती जिसको जानकर मन की उठा भटक लचल सब समाप्त हो 00:15:58 परम शांति प्राप्त हो जाए जिसको जानकर यवा मतो भवति स्तब्ध भवति स्तब्ध माने निष्क्रिय नहीं 00:16:13 शांत छोटे बच्चे कभी कभी खेल खेला करते ना उसको कहते स्टैचू जहा है वही पर रुक जाए ऐसे मन 00:16:19 जहा है वही रुक जाए 00:16:23 स्तब्ध और य जो स्तब्ध है एक एक स्तब्ध 00:16:29 तमोगुण जन्य होती है एक स्तब्ध सतोगुण जन्य होती है तमोगुण व्यक्ति भी पड़ा रहता है व उसको भी हिलना 00:16:36 डुलना अच्छा नहीं 00:16:41 लगता एक व्यक्ति तमोगुण होगा ना तो उसको भी बहुत हिलना डुलना अच्छा नहीं लगेगा माने उसको बहुत मेहनत करना 00:16:46 अच्छा नहीं लगेगा व बैठे बैठे सब काम हो जाए हमारे लेकिन वो जड़ता है और सत्व गुण से जो 00:16:54 प्राप्त होती है उसको स्थिरता कहते हैं एक जड़ता है एक स्थिरता है 00:16:59 एक व्यक्ति बिल्कुल स्थिर बैठा है दूर से कोई देखेगा तो लगेगा मूर्ति है कोई जड़ मूर्ति है ले व्यक्ति 00:17:07 स्थिर है एक व्यक्ति जड़ है तमोगुण से परिणाम आता है वह जड़ता है सत्व गुण से स्थिरता आती 00:17:17 है जिसको जानकर कोई मत हो जाए स्थिर हो जाए गीता में भगवान स्थित प्रज्ञ कहते हैं उसको सुख दुख 00:17:27 में 00:17:28 दुख में अ जो डोलता नहीं जैसे श्री धुप दास जी कह रहे सुख पाए फूले नहीं दुख पाए बिल 00:17:33 लाए बोले जिसको जानकर कोई स्थिर मति हो जाए स्थित प्रज्ञ हो जाए यवा मतो भवति सबसे पहले तो भाई 00:17:41 आनंद मिले जिसको जानकर आनंद 00:17:46 मिले कितने आनंद की बात है संत के मुख से जब आप ये सुनते हो भाई नहीं आप प्रभु के 00:17:51 हो प्रभु आपके हैं आज तक भाई इसी संसार को अपना समझे बैठे थे इतनी सी बात 00:17:58 इतनी सी बात ही तो पुड़िया में बांध कर दी थी रदास जी महाराज ने तभी तो मीरा जी कह 00:18:02 रही है गुरु मिला रदास जी दीनी ज्ञान की गु मीरा जी ने पूछा था कैसे हो जाएंगे यह मेरे 00:18:13 अरे दस जी ने कहा बेटा तू तो इन्हीं की है मीरा जी ने पूछा यह कैसे होंगे मेरे और 00:18:21 गुरु ने कहा तू पहले से ही इन्हीं की है बस इनका गुण 00:18:27 गाना 00:18:30 इतनी सी बात गुरु के मुख से सुनी आनंद आ गया आनंद आ गया गुरु के मुख से राम नाम 00:18:39 सुना कबीर सारी काशी में नाच रहे हैं राम नामी ओड़कर और कहत कबीर सुनो भाई साधो मन का सन 00:18:49 से भागा नाम रंग लागा मई राम रंग नागा 00:18:58 नाम रंग लगा मई नाम रंग ना जानकर आनंद आ गया मन के सन से दूर हुए मन आनंद मगन 00:19:13 अरे कबीर जी की जीवनी में तो यह लिखा है कि राम नामी ओड़कर कबीर नाच रहे हैं और वहां 00:19:19 ठाड़ी रोवे कबीर की माई राम नामी ओड़कर कबीर उस मोहल्ले में आ गए हैं सारे 00:19:28 यवन रहते हैं वहां माथे पर तिलक है अब ऐसे तो कबीर बड़े अलमस्त महापुरुष है पर उस दिन उस 00:19:37 दिन की उमंग कुछ और थी सीताराम सीताराम लिखाए माथे पर तिलक है राम राम राम करते आ गए कबीर 00:19:46 नाचते गाते य ज्ञात मव भवती मां रो रही है बोले अरे तो मोहल्ले में नहीं रहने देंगे हमें ठाड़ी 00:19:57 रोवे 00:19:58 कबीर की माई हे लड़का क्यों जपे रघुराई अ क्यों य लड़का राम का भजन करने लगा भाई अब खुदा 00:20:13 के कुफ्र से कौन बचाएगा हमको डर गई माता डर गई और कबीर गाते हैं कहे कबीर कोई संग ना 00:20:25 साथ जल थल रा 00:20:29 रहे रघुनाथ हमको पता चल गया हमारा हमारा स्वामी हमारा रक्षक कौन है गुरु ने बता दिया है गुरु ने 00:20:36 जना दिया है और उसको जानते ही हर मरे तो हम मरे हमरी मरे बला साचे गुरु का बालका मरे 00:20:54 ना मारा जाए कबीरा 00:20:58 मरे न माराजा यहां ये कह रहे वेदम वेदम वास्तव मत्र वस्तु शिवम ताप मूलन जानने योग्य क्या है जिसको 00:21:10 जानकर आनंद हो इसको जानकर परम शांति की प्राप्ति हो मन की दौड़ भाग समाप्त हो जाए जिसको जानकर वह 00:21:19 जानने योग्य है संसार की कोई किताब पढ़ो मन की दौड़ भाग और बढ़ जाती है बढ़ जाती है कि 00:21:26 नहीं बढ़ जाती 00:21:30 बोलो हां बताता हूं कैसे जब तक व्यक्ति कुछ नहीं जानता है पड़ा रहता है दो चार बात समझ में 00:21:36 आ जाए तो हमारी तरह समझाने निकल पड़ता है चार किताब और पढ़ ले फिर तो कहना ही क्या है 00:21:45 ध्यान रखना भाई जीवन में संत नहीं होगा तो बुध जनों का ऐसा कहना है कि विद्या विवादाय धन 00:21:59 मदाय शक्ति परेशान पर पीड़ना और लस साधो विपरीत में त ज्ञाना दाना च रक्षण अगर जीवन में संत नहीं 00:22:12 होगा जीवन में हरि की भक्ति नहीं होगी तो विद्या अर्जित करके क्या करोगे बोले विवाद करोगे विद्या विवाद आए 00:22:20 धन मिलेगा तो क्या करोगे बोले धन मिलेगा तो उन्मत हो जाओ शक्ति मिलेगी तो क्या करोगे दुर्बल को दन 00:22:27 को 00:22:28 अगर जीवन में भक्ति ना हुई जीवन में संत ना हुआ गुरु ना हुआ लिए विद्या विवाद में जाकर लगेगी 00:22:36 धन उन्माद बना देगा शक्ति आतताई कर देगी और इससे विपरीत लस साधो विपरीत मेत ज्ञाना दाना च रक्ष जीवन 00:22:53 में संत हुआ तो बताएगा भाई विद्या का फल विवाद नहीं है 00:22:59 किसी के किसी के अज्ञान भरे अंधकार भरे जीवन में ज्ञान का दीपक जलाना किसी को सन्मार्ग पर लाना आप 00:23:07 जपे रा नाम 00:23:13 जपा धन हो फिर सेवा करना दान आए और शक्ति हो तो रक्षण आए किसी दीन दुखी की रक्षा करना 00:23:24 उसकी सहायता करना उसका सहयोगी बनना उसका उसका अवलंब बनना 00:23:34 यहां जो यह शब्द भगवान वेदव्यास क रहे विद्यम जानने योग्य जानने योग्य वही है वही एक नहीं तो भाई 00:23:44 यहां कुछ भी जानोगे कहीं और चल 00:23:50 पड़ोगे मुझे याद आ रहा है कुछ समय पहले इसी एक हमारे बालक ने 00:23:57 मेरे पास में मुझे कहा मुझे बात बहुत अच्छी लगी उसने कहा कि बस ये जो आपने थोड़ा सा हमको 00:24:05 बता दिया है ना ये हमारे हैं हम इनके हैं अब इसके अलावा कुछ और जानना नहीं है हमको जानने 00:24:10 से डर लगता है और कुछ जानना नहीं चाहते हैं क्यक जो भी कुछ अन्य जानना है वह मन में 00:24:15 मन में उत्पाद करता है भाई व मन में विक्षेप करता है मैं तो आपको अपना एक अनुभव बता रहा 00:24:23 हूं कि जब संगीत शास्त्र का बिल्कुल 00:24:28 ज्ञान नहीं था तब कोई ऐसे भाव में भर कर भी गा रहा होता था हमको लगता था कितना बढ़िया 00:24:34 है हम भी उसका आनंद ले लेते थे थड़ी दो चार बात हमको समझ में आ गई तब सामने वाले 00:24:41 में कोई गलती हो तुरंत समझ में आती बो हा तो गलती हो गई अब उस गलती होने से हुआ 00:24:48 क्या व तो गलत है ही तुम तो उसको ठीक कर नहीं सकते हुआ क्या तुम्हारे रस में बिरस हो 00:24:55 गया तुम नहीं जानते थे तो 00:24:57 आनंद लेते थे चार बात समझ में आ गई तो यहां वहां दोष दिखाई पड़ता है दोष दर्शन होता है 00:25:07 अब क्या करें कुछ जाने ही नहीं सब जानिए पर जानने से पहले यह जान लीजिए सब जानिए पर जानने 00:25:16 से पहले यह जानना बड़ा आवश्यक है सोई कवि को विध सोई रण धीरा जो छल छ 00:25:29 भज 00:25:32 रघुवीरा जो छल छाड़ भज जितनी भी विद्या हैं इन सबकी सफलता भगवान के चरणों में पहुंच जाने में है 00:25:45 बस य पहले यह जान 00:25:49 लीजिए भगवान के बिना तो भाई कोई भी कोई भी वस्तु किसी भी प्रकार का ज्ञान 00:25:58 कोई भी कर्म अंत में उत्पात का ही कारण बनता है तो बड़ी सुंदर बात यहां भगवान वेदव्यास ने क 00:26:07 आरंभ में ही लिए हम इसमें निरूपण करेंगे निष्कपट धर्म का धर्म प्रित कत परमो निर्म सराणा सता और निर्म 00:26:21 सर विशुद्ध अंतःकरण वाले जो संत है उनके जानने योग्य जो वस्तु है उसकी बात हम इस इस ग्रंथ में 00:26:27 करेंगे 00:26:30 और वस्तु कैसी है शिवद शिवम ददा शिवम शिव अर्थात कल्याण जो कल्याण कराने वाली है भगवान शंकराचार्य कहते हैं 00:26:44 ना चिदानंद रूप शिवोहम 00:26:50 शिवोहम तो मैंने देखा एक बार कोई अपने ही सर पर बेलपत्र चढ़ रहे हैं पीछे ये बज रहा है 00:26:57 चिदानंद 00:26:58 शिह शि भगवत पाद शंकराचार्य का य ये विचार नहीं है मनो बुद्धि रंकार चित्तानी नाह नच शोत्र जिन च 00:27:09 ग्राण नेत्र न भूमि नमस न तेजो न वायु चिदानंद रूप शिवोहम शिव वो तो अपने कल्याण की उद्घोषणा कर 00:27:20 रहे हैं ब्रम ब्रम भवति सोई जाने देहु जनाई जानत तुम तुम होई जाई 00:27:28 मंगल स्वरूप कल्याण स्वरूप प्रभु को जानने वाले का भी तो मंगल हो जाता है उसका भी तो कल्याण हो 00:27:34 जाता है यहां तो निर्वाण टक में भगवत पाद शंकराचार्य अपने कल्याण की उद्घोषणा करे भाई हमारा कल्याण हो गया 00:27:41 है हमारे सब भ्रम दूर हो गए हैं हमको वह विमल ज्ञान प्राप्त हो गया 00:27:50 है तो हम एक एक शब्द पर चर्चा कर रहे विद्यम जानने योग्य वस्तु जानने योग्य वस्तु कौन सी है 00:27:57 सबसे पहले तो जिससे जिसको जानकर आनंद हो आनंद हो मन का विक्षेप बड़े नहीं शांत हो और फिर स्थिरता स्थिरता 00:28:13 की प्राप्ति हो मतो भवति स्तब्ध भवति अंत में देवऋषि कहते हैं आत्मा रामो भवती आत्मा रामो भवती 00:28:27 राम भवती अर्था जो असंग हो जाए कोई पूछे ना सत्संग का फल क्या है किसलिए किया जाना चाहिए सत्संग 00:28:38 सत्संग सिखाता है सबके संग रहते हुए असंग कैसे रहना है यही सत्संग का फल है सबके संग रहते हुए 00:28:45 असंग कैसे रहना है सबके संग तो रहना ही पड़ेगा भाई हम संसार में हैं सबके संग रहना पड़ेगा सबके 00:28:55 संग भी रहना पड़ेगा 00:28:58 और सौहार्द से रहना पड़ेगा नहीं तो फिर अपने लिए कांटा बो दोगे सबके संग रहना पड़ेगा इस भाव से 00:29:09 रहना पड़ेगा सोई सेवक जाके असी मति न टई हनुमंत मैं सेवक स चराचर रूप राशि 00:29:26 भगवन 00:29:31 जिसको जानने से पहले तो आनंद हो स्थिरता की प्राप्ति हो और व्यक्ति असंग हो जाए जीवन में जितने दोष 00:29:41 आते हैं वो संग से ही आते हैं जितने दोष जीवन में आते हैं व संग से ही आते 00:29:51 हैं और तत्वज्ञान 00:29:58 शरीर निज जा में भरे विकार कुछ ऐसा हो जिससे जिसे बार-बार मिलने वाले इस इस इस शरीर से भी 00:30:09 पीछा छूट जाए हम अपने अपने सहज स्वरूप में अपने वास्तविक स्वरूप में हमारे आचार्य के अनुसार हम अपने सखी 00:30:16 स्वरूप में स्थित हो जाए इस पंच भौतिक देह से कुदे हज जो मल है उससे उससे भी तो छुटकारा 00:30:26 हो सबसे 00:30:27 ड़ कुसंग तो यही 00:30:31 है मीरा जी इसी का ही तो अनुभव कर रही है जब कहती है कहा करू कछु बस नहीं मेरो 00:30:44 पाख नहीं उड़ जावन 00:30:51 की पाख नहीं उड़ जाव 00:31:00 कह रहा है ना कोई प्राण पिंजरे में कैद मन सांवरिया के पास प्राण है शरीर रूपी पिंजरे में कैद 00:31:14 है प्राण पिंजरे में कैद मन सांवरिया के पास मन सावरिया के पास है यह भी तो कुसंग है 00:31:27 महापुरुषों ने महापुरुषों ने अंत में इस इससे भी तो पीछा छुड़ाने की बात ही तो कही 00:31:42 है वेद्य वास्तव मत्र वस्तु शिवद ताप करयो मूलन ताप का उन्मूलन कर दे जड़ से समाप्त कर दे उनको 00:31:59 उस वस्तु की चर्चा हम हम यहां आगे करेंगे और फिर 00:32:22 साधिकारथा नाम सारम सारम समुद्रत 00:32:32 एक बात यहां से समझनी है श्रीमद् भागवत क्यों श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें निष्कपट धर्म की बात की गई निष्कपट 00:32:40 धर्म माने निष्काम 00:32:44 भक्ति और य उसी को प्रदान करने वाली है य स्याम शु मायाम कृष्ण परम पुरुष भक्ति य उसी विशुद्ध 00:32:53 भक्ति को प्रदान करने वाली भी है 00:32:57 श्रीमद भागवत महामुनि कृते किवा परवर सद दते कति 00:33:09 शना भाई इसकी महिमा सुन लो इसको जानने की इच्छा मात्र होते ही ध्यान से सुनना मैं श्लोक का 00:33:25 अदार्थी इच्छा 00:33:27 मात्र होते ही सद्य हृद्य रुते मेने भगवान हृदय में बंदी बनकर बैठ जाते हैं भागवत में प्रवेश करने से 00:33:40 पहले भागवत का प्रसाद बता रहे हैं भाई क्या क्या इसकी महिमा है क्यों ये श्रेष्ठ है क इसको जानने 00:33:48 की इच्छा भी हो जाए केवल मन में इच्छा हो कि हम भी श्रवण करें हम भी जाने फ केवल 00:33:54 इतनी इच्छा से ही भगवान हृदय में आकर बैठ जाते हैं 00:33:58 ये ये इसका इसका परम प्रसाद है फिर भगवान वेदव्यास कह रहे हैं तत क्षणात उसी क्षण आज जहां से 00:34:10 चर्चा आरंभ हुई देखो भाई संपत्ति तो श्रद्धा और विश्वास है महापुरुषों के वचनों में शास्त्र के वाक्यों में जितनी 00:34:18 श्रद्धा जितना विश्वास होगा उतना उसका फल प्रत्यक्ष 00:34:24 होगा इसलिए मैंने कहा 00:34:27 साधन करके अर्जित क्या करता है कोई श्रद्धा और विश्वास ही अर्जित करता 00:34:34 है एक है जो ठीक से सुन ही नहीं पा रहा है एक है सुनता तो है पर समझता नहीं 00:34:41 है पर एक है सुनते ही ग्रहण करता है श्रुति धर है सुना और ग्रहण कर लिया जय श्री हित 00:34:49 हरिवंश लाल ललना मिल हियो सरावत मोर नवल दस जी के मुख से व्यास जी ने सुना सुनते ही व्यास 00:34:55 जी ने कहा कि भाई 00:34:56 कि प्रेम की ऐसी अद्भुत अलौकिक अनिर्वचनीय स्थिति यह शब्द किसके हैं केवल सुना समझ गए भाई यह यह कौन 00:35:05 से धरातल पर कोई कोई कह सकता है गा सकता है दौड़कर आ गए पीछे मुड़कर देखा ही नहीं नवल 00:35:12 दस जी ने कहा चलेंगे वृंदावन बोले चलेंगे नहीं चलिए अभी चलिए और दौड़कर आ गए क्यों क्योंकि उनके पास 00:35:21 श्रद्धा और विश्वास की संपत्ति 00:35:25 है 00:35:26 उजला करती है मन जो श्रद्धा है मन को उजला करती है श्रद्धालु व्यक्ति सहज ही कृपा का पात्र हो 00:35:35 जाता है हम देखते हैं अपने जीवन में अनुभव करते हैं कभी-कभी कोई श्रद्धालु होता है उसका हमारा कोई परिचय 00:35:42 नहीं है कोई परिचय नहीं है श्रद्धालु है बस ऐसी कई मिला लेकिन बड़ी श्रद्धा से उसने प्रणाम किया है 00:35:50 उसके प्रणाम को देखकर सहजी मन से मन से एक शुभ कामना एक मंगल कामना 00:35:57 हो जाती उसकी श्रद्धा को देखकर उसकी श्रद्धा ने ले लिया आशीर्वाद बिना किसी परिचय के उसकी श्रद्धा ने आशीर्वाद 00:36:04 ले लिया पात्र बनाती है श्रद्धा उज्जवल श्रद्धा भगवत कृपा का पात्र बनाती 00:36:17 है तो क ऐसी वस्तु का इसमें निरूपण हुआ है जो जानने योग्य है शिव दम कल्याण करने 00:36:27 ताप त्रयो मूलन और जीव के तित ताप को नष्ट करने वाली है आज की वार्ता यही श्री जी के 00:36:35 चरणों में निवेदन करते हैं महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हदत प्रभु को भाव प्रभु को 00:36:55 नमन
Gist in Hindi with timestamps & English
वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 1. केवल प्रभु को चाहो, संसार को नहीं Desire Only the Lord, Not the World 2. सत्संग और श्रवण से चित्त की शुद्धि Purifying the Mind Through Satsang and Hearing https://youtu.be/qinGjpCVjog [00:00:16] प्रभु के अलावा जब भी यह जीव संसार से कुछ पाने की इच्छा करता है, तो वह अनजाने में अपने लिए केवल दुःख की ही व्यवस्था करता है। Whenever the soul desires to obtain anything from the world apart from the Lord, it unknowingly creates nothing but suffering for itself. [00:01:17] मन के पास अपनी कोई बुद्धि नहीं होती, उसे केवल रस चाहिए; इसलिए यदि उसे भगवद-रस नहीं दिया गया, तो वह स्वाभाविक रूप से विषयों के क्षणभंगुर रस की ओर दौड़ेगा। The mind has no intelligence of its own; it only seeks enjoyment. Therefore, if it is not given the divine taste of God, it will naturally run toward the fleeting pleasures of worldly objects. [00:04:18] मनुष्य को संसार या भगवान से कुछ सांसारिक वस्तुएं नहीं मांगनी चाहिए, बल्कि केवल और केवल प्रभु को ही चाहना चाहिए। One should not ask the world or God for worldly objects; one should desire only and only the Lord. [00:05:30] श्रीमद्भागवत में निष्कपट धर्म यानी विशुद्ध और उत्तम भक्ति का निरूपण किया गया है, जो संतों के लिए जानने योग्य परम तत्व है। The Srimad Bhagavatam describes sincere religion, meaning pure and exalted devotion, which is the supreme truth worthy of being known by saints. [00:09:29] संसार की व्यर्थ चर्चाएं चित्त में विक्षेप और अशांति लाती हैं, जबकि ईश्वर और सत्य को जानने से हृदय में परम आनंद और स्थिरता का उदय होता है। Useless worldly discussions create distraction and restlessness in the mind, whereas knowing God and the truth brings supreme bliss and stability to the heart. [00:10:31] श्रवण इंद्रिय का चेतना पर सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि जो बात हम सुनते हैं वही आगे चलकर हमारे विचार, संस्कार और स्वभाव का निर्माण करती है। The sense of hearing has the deepest influence on consciousness, because what we hear eventually shapes our thoughts, impressions, and character. [00:12:39] शब्द भी एक प्रकार के मानसिक आहार हैं, इसलिए कुसंग और विषैली बातों से बचकर केवल सत्संग और प्रभु कथा का ही श्रवण करना चाहिए। Words are also a form of mental nourishment. Therefore, one should avoid bad company and toxic speech and listen only to Satsang and the stories of the Lord. [00:22:12] जीवन में संत और भक्ति के बिना अर्जित की गई विद्या केवल विवाद और अहंकार को जन्म देती है, जबकि सद्गुरु के सान्निध्य में विद्या कल्याणकारी बन जाती है। Knowledge acquired without saints and devotion in life gives rise only to arguments and ego, whereas knowledge gained in the company of the Sadguru becomes beneficial and spiritually uplifting. [00:28:38] सत्संग का वास्तविक फल यह है कि वह मनुष्य को संसार के सभी बंधनों और लोगों के बीच रहते हुए भी अंतर्मन से असंग और शांत रहना सिखाता है। The true fruit of Satsang is that it teaches a person to remain inwardly detached and peaceful while living amidst all the bonds and people of the world. [00:33:27] श्रीमद्भागवत की महिमा इतनी अद्भुत है कि इसे श्रद्धापूर्वक सुनने या जानने की मात्र इच्छा करने से ही भगवान उस भक्त के हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं। The glory of the Srimad Bhagavatam is so extraordinary that merely listening to it with faith, or even desiring to know it, causes the Lord to come and reside in the heart of that devotee. https://youtu.be/qinGjpCVjog
ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 | by Shri Hit Ambrish ji
ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 | by Shri Hit Ambrish ji
First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.
00:00:20 यप 00:00:25 दता कुछ ऐसा प्रश्न ऋषि पूछ रहे हैं जिसमें केवल उनका नहीं आप 00:00:30 का मेरा हम सबका कल्याण 00:00:35 है संत का ये ये एक विशिष्ट गुण है आप जपेगा और रा नाम जपा 00:00:51 है परम श्रद्धेय प्रात स्मरणीय श्री स्वामी रामसुख दास जी महाराज कई बार कहते थे बात कहते थे विचार करो 00:00:51 . 00:01:00 अगर प्रभु के मन में इस बात का संकल्प हो कि भाई सबका कल्याण हो जाए तो होही नहीं जाएगा 00:01:06 होही 00:01:09 जाएगा व तो पूर्ण काम है सत्य संकल्प है अगर भगवान का संकल्प हो भाई सबका कल्याण हो जाए तो 00:01:16 होही जाए जीव पर दया तो संत करता है इसीलिए भगवान कह रहे हैं भवान क भा हम तो देखो 00:01:24 आत्माराम है भगवान तो अपने स्वरूप में स्थित है 00:01:30 संत जब कहते ना बोले बार-बार मांगना प्रभु से यही बात मांगना पीछे लगे रहना इनके बड़ी देर के बाद 00:01:41 दीन दयाल के कान में भनक पड़ती है अभी तो संत कह रहे हरि नाम रटते रहो जब तक घट 00:01:47 में प्राण अरे कभी तो दीन दयाल के भनक पड़ेगी कान बड़ी देर के बाद भनक पड़ती है इनके कान 00:01:57 में क्योंकि हमको ऐसा लगता है ना भाई 00:01:59 बड़ा समय हो गया भजन करते करते अब यह तो भाई अनादि काल से हम जैसे जाने कितने कितने कितने 00:02:08 जीवों को देखते आ रहे हैं जैसा आपने चर्चा के आरंभ में कहा जीव सुधरता है फिर बिगड़ता है फिर 00:02:15 सुधरता है फिर बिगड़ता है और वहां श्रीमद वल्लभाचार्य महाप्रभु कह रहे बोले स्वभाव से ही दुष्ट है तो बहुत 00:02:26 जल्दी ध्यान नहीं देते ठाकुर जी 00:02:30 कोई लगा है लगा है ठीक है लगा है फिर उनके पास भी कई कई खिलौने हैं देते हैं खेलने 00:02:37 के लिए जीव भी खेलता है उनसे अच्छा ठाकुर जी जो खिलौना देते हैं ना व दो चार बरस में 00:02:44 नहीं टूटता है उससे दो चार वरस में अरुचि भी नहीं होती है कभी कभी तो जन्म जन्म खेलता है 00:02:49 जीव उन्ही खिलौनों से खेल ही रहा है यह तो कभी संत की कृपा होती है जब तब साधु तारसी 00:02:56 कभी संत कृपा करता है जीव पर दुरमति नष्ट हो 00:02:59 होती है तब यह बात समझ में आती है बहुत जन्म बिछड़े थे 00:03:10 माधो ये जन्म तुम्हारे 00:03:19 लेखे यह जन्म तुम्हारे ले बहुत जन्म बिछड़े थे तब कभी ये बात समझ में आती देर के बाद 00:03:32 इसलिए शास्त्र कह रहा है धीरज धरना धैर्य धारण किए रहना दीन दयाल के कान में कभी भनक 00:03:47 पड़ेगी और फिर गुरु साहिब तो वाणी में कह रहे सच्चा होकर कोई सच्चे साहिब के सच्चे दरबार में जाता 00:03:54 है तब सच को पहचानता है सच्चा होके हम 00:03:59 हमारे हमारे हमारे उर अंतर में हमारे भीतर प्रभु के अतिरिक्त कोई और चाह ना रहे आप देखो अभी तो 00:04:06 य बात असंभव सी मालूम पड़ती है अभी तो संसार के कितने संकल्प विकल्प उन्हीं में उलझा हुआ मन है 00:04:13 यह तो संतों की सत्संग की कृपा है थोड़ा बहुत आकर बैठ जाते हैं सुन लेते हैं कह लेते 00:04:20 हैं पर कल जैसा मैं आपको कह रहा था खारे पानी के कुए में चुटकी भर खांड कोई डाल दे 00:04:27 अरे चुटकी भर क्या बोरी भर खांड भी कोई 00:04:29 डाल दे जल थोड़ी मीठा हो जाता है तो खारा ही है ऐसे ये हमारा जो ये जो घट है 00:04:39 काम कामना वासना से भरा है कोई कोई सरल काम है इस इस सबको हटा 00:04:52 देना संत की कृपा है मैं तो आपसे बार-बार कहता हूं कहता रहता हूं कहता रहूंगा कहता 00:04:59 रहगा अंत तक एक ही बात कहता रहूंगा आपको संत ना होते जगत में जल मरता संसार जल मरता संसार 00:05:08 यही हमारे तैसी है इसलिए आपको अनेक बार निवेदन करता हूं हमारी तो इन संतों की वाणी में श्रधा है 00:05:15 संत क्या कहते हैं हमारे लिए वही मार्ग है जी मार्ग सब संत गया छ व मरग में जा स्या 00:05:26 मेरा रंग लागयो 00:05:29 नाम हरी और रंग अटक 00:05:38 परी सबसे पहले तो आपको अपने विश्वास को कहीं एक जगह पर समेटना पड़ेगा तब विश्वास सुदृढ़ होता 00:05:48 है और मैं मैं आपको वो अगर आप मुझसे पूछोगे वो एक स्थान क्या है तो मैं कहूंगा कि कि 00:05:53 संतों की वाणी में ले आइए आप अपने मन को यहां यहां है हमारे हित की बात जीव के हित 00:05:58 की बात तो संत करता है 00:06:00 नहीं तो सहजो भाई नहीं कहती कि हरि तो कुटुंब जाल में घेरी यही बात तो श्री स्वामी जी कहा 00:06:08 करते थे बोले अगर भगवानी संकल्प कर ले भाई सब जीवों का उद्धार हो जाए सब हमारे पास आ जाए 00:06:13 तो लो आही जाए फिर रोकने वाला कौन है भगवान के मन में ऐसा संकल्प नहीं होता ऐसा संकल्प संत 00:06:19 के मन में होता है इसलिए श्री रघुनाथ जी को कहना पड़ा सातम सम मोहिम 00:06:29 जग देखा दो बातें कही है भगवान ने य पर सातम सम मोही 00:06:39 मैं ममता राम सो समता सब संसार एक तो भगवान क भाई सबको समान मानना और फिर क मोही मैं 00:06:49 जग देखा सिराम मैं सब जग जानी कर प्रणाम जोर जुग पानी पर शायद भगवान ने सोचा हो सब सबको 00:06:58 समान देखेंगे 00:06:59 संत कहां रहेंगे तो श्री रघुनाथ जी कह रहे हैं सातम सम मोही मैं जग देखा मोते अधिक संत करी 00:07:17 लेखा मोते अधिक संत करी मैं तो भाई अपने जीवन में देखता हूं 00:07:30 अब भाई प्रारब्ध बसात पूर्व के संस्कार से कभी वातावरण के प्रभाव से कभी-कभी हो जाता है मन में विक्षेप 00:07:38 हो जाता है अकारण विक्षेप हो जाता है उसकी क्या औषधि है इ संतों के पास कुछ देर बैठ जाने 00:07:47 से इन्हीं की वाणी का चिंतन कर लेने से कुछ स्वाध्याय कर लेने से ही मन का विक्षेप दूर हो 00:07:54 जा होता है भव रोग की औषधि तो भाई इन्ही संतों के शबद 00:08:02 जन्म जन्म का सोया मनवा सतगुरु शबद सुन 00:08:09 जागा तो सब ऋषियों ने कुछ ऐसा प्रश्न पूछा जिससे जिसे उनका भी मंगल हो पर इस समस्त लोक में 00:08:17 आस्तिक भाव की वृद्धि हो शुभ मंगल का संचार हो सब धर्म का अभ्युदय हो यही संत के जीवन का 00:08:28 लक्ष्य होता है 00:08:31 य दो पंक्तियां मुझे बड़ी प्रिय हैं श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने अमृतवाणी में कहा है वृद्धि आस्तिक भाव 00:08:44 की शुभ मंगल 00:08:50 संचार अभुदय सद धर्म का राम नाम 00:09:05 विस्तार और उन्होने तो युक्ति भी बताई है कैसे होगी आस्तिक भाव की वृद्धि कैसे शुभ मंगल का संचार होगा 00:09:11 कैसे सद धर्म का अभ्युदय होगा एक ही युक्ति संत कह राम नाम 00:09:19 विस्तार जोत से जोत जले कल मैं आपसे कह रहा था जो यहां पर बैठा है ना भाई मुझे तो 00:09:24 लगता है कि यदि युग का काल का और धर्म का भी यदि विचार किया जाए 00:09:29 तो आज तो भाई जीव मात्र के लिए प्राणी मात्र के लिए यही तो धर्म है यही एक धर्म है 00:09:35 आपका मेरा 00:09:38 सबका और ये यह सार्वभौमिक धर्म है यूनिवर्सल रिलीजन राम सिमर राम सिमर यही तेरो काज है राम 00:09:59 सिमर 00:10:05 राम य सार्वभौमिक धर्म है इसलिए मैं कई बार कह देता हूं यहां से अनेक अनेक कर्म कांडों में अनेक 00:10:16 अनेक विधियों रीति हों में किसी को ना उलझा करर सीधे-सीधे वह मार्ग दिया जाए जिससे लोक भी सुधरे और 00:10:22 परलोक भी सुध सीधा सधा ही रास्ता देना चाहिए ना भाई नाम जपि भगवन नाम जपि 00:10:34 मैं कहता डंके की चोट पर क्यों क्योंकि सब सब सत्पुरुष का एक मत है एक 00:10:44 मत कोई किसी भी मत संप्रदाय का हो फ यही धर्म कल्याण इसी से होगा राम नाम विस्तार मैं जपूं 00:10:56 आप जपे और ऐसे ही ऐसे 00:10:59 हमारे संपर्क में जो आए कहीं ना कहीं उसके जीवन में भी यह दीप जले इसी को कहते हैं जोत 00:11:04 से जोत जलाना इसी को कहते हैं दीप से दीप जलाना ऐसे ही तो दीपावली होती है ना दीप से 00:11:12 दीप जलता है ऐसे ही दीपोत्सव होता है और मैं तो आपसे यही कहूंगा प्रयास यही करना पहले तो हमारे 00:11:19 भीतर हमारे भीतर यह दीप जले और फिर उस दीप से कोई और दीप जले उस दीप से कोई और 00:11:25 दीप जले और ये ये दीपावली केवल एक दिन की 00:11:29 दीपावली बनकर ना रहे भला बुरा समय आता रहता है हमारा सौभाग्य है कि शुभ गड़ी हम देख रहे हैं 00:11:39 हमारा सौभाग्य है य मंगलमय य मंगलमय बेला हमारे जीवन काल में आई 00:11:48 है तो मैं तो एक बड़ा विनम्र सा निवेदन यहां से य कर रहा हूं कि व्यासपीठ पर जो भी 00:11:54 जो भी है व्यासपीठ का यह पवित्र 00:11:59 कर्तव्य है कि जनमानस के मन मानस को केवल हरि नाम से जोड़ा जाए सब सबके सबकी मत विचार का 00:12:08 आदर करते हुए सबकी श्रद्धा का आदर करते हुए सब अपने अपने कर्तव्य का पालन करें लेकिन इस बात पर 00:12:15 बल दिया जाना चाहिए इस एक सिद्धांत की एक मत से प्रतिष्ठा होनी चाहिए भाई आपका मेरा कल्याण तो भगवन 00:12:22 नाम से ही होगा यही सब संतो महापुरुषों का मत है मीरा हो सूर हो 00:12:29 हो कबीर हो रदास हो नानक हो सबका एक मत है सब कर मत खनायक 00:12:40 एहा करिए राम पद पंकज नेहा करिए राम पंकज ने क्योंकि भाई आपसे मुझसे मिलकर ही तो समाज बना है 00:12:59 हमारा मन सुधरेगा हमारे मन में शांति होगी तो समाज में शांति होगी समाज में सुख शांति कैसे होगी तो 00:13:06 मन में सुख शांति होगी किसी भी किसी भी कर्मकांड से समाज में शांति नहीं आ सकती 00:13:15 है समाज में शांति तो तब आएगी जब आपके मेरे मन में शांति होगी और जन्म जन्म के भटके इस 00:13:27 मन को 00:13:28 विश्राम देने वाला अगर कोई साधन है तो भाई संत तो यही कह रहे हैं अब अपनी मति से कोई 00:13:33 कुछ भी कहता रहे विचार रहे बात दूसरी है संत तो एक ही बात कहते राम सिमर राम सिमर ही 00:13:46 तेरो काज है राम सिमर राम सिमर 00:13:58 तो ऋषियों ने पूछा हे सूत जी आप सब शास्त्रों के पुराणों के ज्ञाता हैं सब शास्त्रों पुराणों में जीव 00:14:05 के कल्याण के जो जो साधन वर्णन किए गए हैं आप सबका सार जानते हैं पर ऋषियों ने कहा कि 00:14:12 कलयुग आ पहुंचा है सबसे पहले तो कहा है कि लोगों की आयु ही कम हो गई है माने हमारे 00:14:18 पास समय ही बहुत थोड़ा है और आपको याद हो कभी आपसे मैंने कहा था कि भाई दूर जाना हो 00:14:28 नियत समय पर पहुंचना भी आवश्यक हो मार्ग लंबा हो फिर क्या करना पड़ता है अपनी गति बढ़ानी पड़ती है 00:14:35 यही बात श्रीमद भागवत कहती हैं तीव्रे भक्ति योगेन भजे पुरुषम परम य बात श्री महाप्रभु जी भी कह रहे 00:14:43 हैं स्फुट वाणी में जि नाव नि मंगल लोक तिहुं सु हरि पद भज ना विलंब कर दो बातें कही 00:14:52 है महाप्रभु जी ने एक तो नर देही पाई चित चरण कमल दीज और कह रहे अब कोई 00:14:58 और विचार मत करो ना विलंब कर देर मत करिए क्योंकि नारायण य सुधि नहीं आज मरे के 00:15:11 भोर कितना कितना अस्थिर जीवन है एक क्षण में घटना घटती है सब कुछ जीवन में बदल जाता है मन 00:15:21 नहीं रहता साधन नहीं रहता सामर्थ नहीं रहती व्याधि 00:15:28 मंदिर इस इस शरीर को संतो ने कहा है खबर नहीं है किसके भीतर कौन सा रोग पल रहा है 00:15:35 एक एक क्षण में जीवन बदल जाता है इसलिए संत कह रहे हैं यात दुर्लभ काल ना वृथा गमा इए 00:15:49 ब्रज नागर नंदलाल सुनिस दिन 00:15:56 गा कहा कि भाई पहले तो 00:15:58 लोगों की आयु ही बहुत कम हो गई है अल्पायु मनुष्य है कलयुग 00:16:07 का और फिर साधन करने में रुचि और प्रवृत्ति भी कम है क्यों क्योंकि तमोगुण का प्रभाव है तमोगुण का 00:16:14 प्रभाव क्या है प्रमाद य तमोगुण का प्रभाव है हा कर लेंगे य तमो गुण का प्रभाव है जैसे आजकल 00:16:24 सुबह बिस्तर से निकलने में आधा घंटा लग जाता है लग जाता है कि 00:16:30 अब उठेंगे अब उठेंगे अब उठेंगे आधा घंटा बिस्तर से निकलने में लगता है फिर आधा घंटा नहाने में लग 00:16:36 जाता है कि भाई जल को छुए कि नहीं 00:16:44 छुए जाड़े का धर्म यही होता है ना और गति मंद पड़ जाती है जाड़े में क्या होता है गति 00:16:52 मंद पड़ जाती है ना कीर्तन होता आप लोग ताली भी नहीं बजाते ऐसे ही बैठे रहते हो 00:16:59 माने हिलने डुलने का मन नहीं करता ऐसा ऐसा जहां बैठे बस बैठे ही है हिलने डुलने की इच्छा नहीं 00:17:05 होती ऐसे मन को भी जब जड़ता का जाड़ लगता है ना मन भी हिलना डुलना नहीं चाहता व भी 00:17:10 साधन नहीं करना चाहता है तमो गुण की अधिकता हो जाती कलयुग में य युग का धर्म 00:17:23 है और वर्तते कस्य दूषण किसी का भी दोष नहीं भाई युग का ही धर्म है 00:17:29 जून के महीने में कितना भी 00:17:35 रहो महाराज जी भी लगता है पीछे से सुनते आ रहे हैं तभी मुस्कुराते आ रहे हैं जाड़ा है ना 00:17:42 भाई इसी को कह रहे जड़ता जाड़ विषम जब लागा तुलसी बाबा बड़ा सुंदर उदाहरण देते गया न मज जन 00:17:48 पाव 00:17:53 अभागा एक समय था जब लोग मीलों पैदल चलकर तीर्थ यात्रा करने जाते 00:17:58 जीवन में एक ही बार तीर्थ हो पाता था एक बार गंगा नहाए तो बस हो गया पर खैर तब 00:18:05 मैं कहूंगा कि तीर्थ के प्रति लोगों की श्रद्धा थी भावना थी लोग तीर्थ बुद्धि से ही जाते थे तप 00:18:10 करने के लिए तीर्थ में जाते थे अब तो सुविधा अधिक हो गई तो पिकनिक मनाने के लिए आते हैं 00:18:16 पर गोस्वामी जी कहते भाई एक व्यक्ति कोई गया मीलो चलके महीनों में जाकर पहुंचा गंगा किनारे अब जेठ के 00:18:24 महीने में यात्रा शुरू की थी मांग के महीने में पहुंचा 00:18:31 क जड़ता जाड़ विषम जब लागा गयो न मजन पाव अभागा इतनी दूर चल करर गया उसने कहा जाड़ा बहुत 00:18:37 है दूर से प्रणाम करके चलते हैं तो कलयुग में तमो गुण बढ़ता है और तमो गुण का प्रभाव क्या 00:18:45 है जीवन में प्रमाद आता है ऋषियों ने सबसे पहला प्रश्न यही किया है सू जी से आप आप संत 00:18:52 शिरोमणि है आप बताइए कि कलयुग में पहले तो मनुष्य अल्पायु हो जाएगा उसके पास अवधि 00:18:58 बहुत कम है और उस बहुत कम अवधि में भी सूरदास जी कहते हैं कि बालापन खेलत ही खोय और 00:19:06 यवन विषय रस भोई और वृद्ध भयो सुधि प्रगट मोक तब ये थोड़ी सी अकल आती हमने पीछे क्या कर 00:19:17 दिया इसलिए सूरदास जी तो कहते हैं दीनानाथ अब बार तुम्हारी अब तो आपकी बारी है हमारी हरि तुम ही 00:19:26 स सुधरेगी सौभाग्यशाली कोई 00:19:28 होता है जिसको समय पर चेत आ जाता है मैं कई बार आपसे कहता हूं भाई एक तो है सही 00:19:33 निर्णय लेना और फिर एक है सही समय पर सही निर्णय लेना सही निर्णय और सही समय में भी सही 00:19:40 समय अधिक महत्त्वपूर्ण है सही समय पर सही निर्णय लिया 00:19:54 जाए एक तो अवधि कम है और फिर साधन में प्रवृत्ति भी 00:19:58 साधन में रुचि भी नहीं है रुचि नहीं रही प्रवृत्ति नहीं है क्यों क्योंकि प्रमाद बढ़ गया आहार विहार बिगड़ 00:20:05 गया जीवन में कितना असंतुलन है तमोगुण बढ़ता ही जा रहा है बुद्धि मलीन होती चली जा रही है अब 00:20:15 तो भाई वह समय आ गया है जब आप देखो जब गलत करने वालों की संख्या अधिक दिखाई पड़ेगी सही 00:20:24 करने वाले थोड़े ही रह जाएंगे 00:20:31 प्रवर्तते कस दूषण युग धर्म युग का धर्म है इसको समझना पड़ेगा कर कुछ नहीं सकते हम हम इसमें कुछ 00:20:41 भी नहीं कर सकते पहले ही कह दिया महापुरुषों ने घोरे कलयुग प्राप्त सर्व धर्म विव जिते धर्म रहेगा ही 00:20:50 नहीं एक चरण धर्म का रह जाएगा और वो भी जीव मात्र पर दया दया राक धर्म को पाल 00:20:58 कबीर जी कह रहे हैं बो जो दया रखेगा वही धर्म का पालन कर सकता है दया राख धर्म को 00:21:06 पाले और घर में रहे कह देते कबीर जी वन में रहे नहीं घर में रहे उदासी पर घर में 00:21:15 रहे कैसे 00:21:20 उदासी चार दिन के लिए कहीं जाना हो और चार दिन वहां रहने की अच्छी व्यवस्था हो जाए बस इतना 00:21:26 ही बहुत है 00:21:28 घर क्या है भाई आए हैं यहां पर रहने के लिए प्रभु ने हमारी एक व्यवस्था कर दी है बस 00:21:32 इतना ही पर ये ये बात एक क्षण के लिए भी भूले नहीं रहना नहीं है देश बगाना है कहत 00:21:50 कबीर सुनो भाई साध सतगुरु नाम 00:21:58 ठिकाना है सतगुरु नाम 00:22:07 ठिकाना रहना नहीं है 00:22:16 देश कले पहले तो अवधि कम है उसम बुद्धि भी कम है साधन में प्रवृति तो है ही नहीं क्योंकि 00:22:24 तमोगुण बढ़ गया और बढ़ता ही जा रहा है प्रमा 00:22:28 मनुष्य हो गया है और जब उसमें भी जब बात भजन की आए माने जब किसी परमार्थिक किसी शुभ कार्य 00:22:33 की बात आए फिर तो फिर तो मन घोर प्रमाद का आश्रय ले लेता है प्रमाद से ग्रस्त है पहले 00:22:41 संत कहते थे भाई शुभ कार्य का संकल्प मन में हो ना तत्काल कर दीजिए उसी के लिए श्री कबीर 00:22:49 जी जैसे संतो ने कहारे पल में परलय होएगी फेर करेगा कब बड़ी अच्छी बात एक बार एक महात्मा ने 00:22:55 हमको बताई यहां के बड़े लोग कहते थे कि 00:22:58 दाया हाथ देना तो बाए को खबर नहीं पड़े पूछा कि ये ये कैसा देना होता है ऐसे कैसे संभव 00:23:04 है कि दाया हाथ दे रहा है बाए को खबर नहीं है तो कहते थ देने का भाव मन में 00:23:09 आए ना बस तत्काल दे दीजिए अरे अगले पल देने का मन नहीं रहेगा हमें कल महाराज जी से चर्चा 00:23:17 कर रहा था जो आज मैंने आपसे कहा ना भाई मन सुधरे और फिर सुधरा रहे क्योंकि मन तो सुधर 00:23:22 सुधर के बिगड़ता 00:23:26 है सुधरता है 00:23:27 फिर बिगड़ता है जो छोड़कर आया है उसी को जाकर फिर लिपट 00:23:36 है तभी तो संत कह रहे हैं खरोई कठिन है भजन डिंग रिव तमक सिंदूर मेल माथे प साहस सिद्ध 00:23:45 सती को सु जरी सुनते नहीं हम पर संत तो कहते आ ही रहे हैं भक्ति करे कोई सूरमा जात 00:23:57 ब 00:24:06 इसीलिए अनेक अनेक प्रकार से अनेक अनेक उदाहरण देकर आपको यहां से निवेदन किया जाता है भाई सत कर्म करना 00:24:14 उससे क्या होगा जीवन में सत्व गुण बना रहेगा आपका आहार शुद्ध हो सात्विक हो पवित्र हो नहीं तो प्रमाद 00:24:25 आएगा नहीं तो प्रमाद आएगा 00:24:27 छोटा सा छेद छिद्र बड़े जहाज को डुबो देता है छोटा सा छिद्र हो जाए ना ऐसे भजन करने के 00:24:37 लिए भी एक व्यवस्था है संतों ने बताई है उस व्यवस्था में छोटा सा छिद्र हुआ डूब जाएगा 00:24:46 जहाज तो कहा पहले तो भाई इनकी इनकी आयु कम है अवधि कम है और वो अल्प आयु में भी 00:24:54 60 70 वर्ष की जो आयु है उसमें भी 00:24:58 बालापन खेलत ही खयो बचपन खेलने में गवा दिया और यवन विषय रस भोई आपको स्मरण हो कभी यहीं से 00:25:11 मैंने आपको कहा था जिसका बालपन संस्कारी रहेगा उसकी युवावस्था शुद्ध रहेगी पवित्र रहेगी जिसकी युवावस्था शुद्ध होगी उसी 00:25:27 की भजन भावना वृद्धावस्था में जाकर सिद्ध होगी और बाल्यावस्था में भजन कौन करेगा जिसकी माता संस्कारी होगी वही तो 00:25:39 बालक बाल्यावस्था में भजन करेगा जिसको गर्भ में भजन का संस्कार मिलेगा इसी को कहते हैं दीप से दीप जलाना 00:25:46 इसकी मैं आपसे अभी बात कर रहा था इसी को कहते हैं जोत से जोत 00:25:53 जलाना इसीलिए मैं कहता हूं यदि आप माता-पिता है 00:25:57 तो फिर अधिकार से पहले आपका कर्तव्य हैने बालक को संस्कारी बनाइए ईश्वर आपकी गोध में जब कोई बालक प्रसाद 00:26:07 स्वरूप देता है ना तो आप समझिए कि आपको इस इस इस सारे संसार की सेवा करने का अवसर ईश्वर 00:26:14 ने दिया है दीजिए अपने बालक को ऐसा संस्कार कि कल व जाकर देश के राष्ट्र के समाज के हित 00:26:21 में कल्याण में कुछ कर सके अपना भी कल्याण करें राष्ट्र और समाज के हित में कल्याण में 00:26:27 व अपना कुछ कुछ योगदान दे 00:26:36 सके अंग्रेजी की एक कहावत है यू कैन नॉट पोर फ्रॉम एन एमटी कप यदि हमारा ही बर्तन खाली है 00:26:43 दूसरे में क्या डालेंगे 00:26:47 कभी-कभी कोई पूछ लेता है ना कैसे लगाए बच्चे को भजन में आप करिए आप लगि कल ही शायद महाराज 00:26:53 जी मुझसे कह रहे थे सत्संग के बाद 00:26:57 कि भाई अब अब होता क्या है कि जो सही समय था अभी आपसे मैं कह रहा हूं ना सही 00:27:02 निर्णय और सही समय में भी सही समय पहले नंबर पर है पहले सही समय हो सही समय निकल गया 00:27:09 उस समय बालक को संस्कार दिया नहीं अब खींच खींच कर ला रहे हैं बालक को सत्संग में अब बात 00:27:16 बनेगी नहीं भाई वैसी बात नहीं बनेगी जब जो समय पर संस्कार दिया जाए पर हो सकता है अब आप 00:27:25 इतनी माताएं यहां पर बैठी हैं 00:27:27 और भी माताएं इसको सुनेंगे उनके मन में आए भाई अब वह समय निकल गया पर अब क्या करें अब 00:27:32 प्रार्थना करिए क्योंकि जो कार्य पुरुषार्थ से ना हो पाए उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना ही एकमात्र विकल्प है प्रार्थना 00:27:40 कर सकते हैं अब तो भाई कि हमारा बालक सद मार्ग पर चले ईश्वर इसको सद्बुद्धि दे आप माता पिता 00:27:48 है तो तो बड़े बड़े सीधे सच्चे ईमानदारी वाले भाव से आप बालक के लिए प्रार्थना कर सकते हैं प्रार्थना 00:27:56 करिए 00:27:57 हां पर जो जो क्रम मैंने आपको बताया ना कि जो बाल्यावस्था में बालक संस्कारी होगा उसकी युवावस्था शुद्ध रहेगी 00:28:06 पवित्र रहेगी जिसकी युवावस्था शुद्ध होगी उसकी वृद्धावस्था सिद्ध हो जाएगी लेकिन बाल्यावस्था में भजन कौन करेगा जिसकी माता संस्कारी 00:28:17 होगी इसको गर्भ में भजन का संस्कार मिलेगा अरे भाई बहुत पुरानी बात नहीं है 10 20 वर्ष पहले की 00:28:26 बात ले लो 00:28:28 कन्या आती थी ना तो मां उसके हाथ में गीता भागवत रामायण देती थी रामायण दी जाती थी कि बेटी 00:28:39 तुझे परिवार में संसार में रहना है पर संस्कार के साथ रहना उसको रामायण दी जाती थी गर्भ में गर्भ 00:28:48 में जीव आता था तो माता बालक संस्कारी बने इसीलिए उस गर्भावस्था में कुछ कुछ 00:28:57 नियम धारण करती थी कुछ जप करती थी कुछ तप करती थी स्वाध्याय करती थी ताकि कुछ संस्कार बालक को 00:29:07 मिले अब तो पता नहीं यह कहां आ गए हम और अभी और कहां जाएंगे पता नहीं अब तो वहां 00:29:16 आ गए कि भाई किसी को सुधारने की बात भूल जाओ अपना जीवन सुधरा रहे यही बहुत बड़ी बात है 00:29:22 यही बहुत बड़ी विजय है हम सीधे सच्चे मार्ग पर चलते रहे प्रभु ने जो रास्ता दिखा 00:29:27 दिया है हम उस पर चलते रहे भाई य यही जीवन की विजय है लो कहा समस्त सुखिनो भवंतु सर्व 00:29:35 के प्रति सद्भाव रखते हुए अपने जीवन को सीधे सच्चे मार्ग पर चलाते 00:29:42 रहे तो खैर यहां ऋषियों ने पूछा साधन करने में रुचि प्रवृत्ति है नहीं आलसी हो गए हैं लोग प्रमाद 00:29:51 हो गए हैं और बोले भाग्य भी उनका मंद है समझ भी थोड़ी है 00:29:57 सब कुछ अल्प ही अल्प तो है और क थोड़ा सा जो जीवन है वह भी अनेक अनेक प्रकार की 00:30:06 विघ्न बाधाओं से भरा हुआ है छोटा सा बालक छोटा सा बालक पहली दूसरी कक्षा में पढ़ता हुआ आज उसको 00:30:16 भी स्ट्रेस है मैंने शायद आपको सुनाया भी था एक छोटी सी नन्नी सी बच्ची मेरे पास आई थ शंभू 00:30:24 जी भी साथ में थे नन्नी सी बच्ची 00:30:27 और वो आकर मुझे कहती है कि अरे क्या बताए जेजे आपको हमको शाम तक बड़ा स्ट्रेस हो जाता है 00:30:34 छोटी सी बच्ची पाच छ वर्ष की अवस्था होगी उसकी यह बड़ी चिंता की बात है कैसी हमारी शिक्षा पद्धति 00:30:42 हो गई 10 20 किलो का तो बसता है बालक के पास 00:30:48 में कितना कितना दबाव है छोटे-छोटे बच्चों के मन चित पर और भगवान जाने स्कूलों में पढ़ाया क्या जा रहा 00:30:56 है 00:30:59 कैसी कैसी शिक्षा पद्धति कैसे कैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं कहां हमारे यहां गुरुकुल में वेद वेदांग पढ़ाया जाता 00:31:06 था शस्त्र शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी शास्त्र सिखाया जाता था कि कोई अपने मन की रक्षा कर सके 00:31:13 शस्त्र सिखाया जाता था अपने तन की रक्षा कर सके साथ साथ एक ही काल में शस्त्र और शास्त्र दोनों 00:31:21 सिखाया जाता था तन मन की रक्षा के लिए 00:31:28 हां ब बात यही है ना कि पहले पहले पहले गुरु के चरणों में बैठकर कोई विद्या अर्जित करता था 00:31:37 पहले पहले विद्या का उद्देश्य था मनुष्य को संस्कारी बनाना आज शिक्षा का उद्देश्य है मनुष्य को व्यापारी बनाना पहले 00:31:49 संस्कारी बनाने के लिए विद्या दी जाती थी आज आज केवल व्यापारी बनाने के लिए शिक्षा दी जाती है मैं 00:31:56 मैं 00:31:57 यह बात मैं केवल भारत देश का एक सामान्य नागरिक होते हुए कह रहा हूं अपने आसपास की परिस्थिति देखता 00:32:04 हूं देखता हूं कि किस किस दिशा में नई पीढ़ी जा रही है जब जब इनके पास इनके जीवन में 00:32:12 जब सदाचार नहीं होगा तो तो धर्म की बात समझ में ही कैसे आएगी समझ में नहीं आती है उसके 00:32:19 लिए भी तो संस्कार चाहिए ना एक ग्राहक चाहिए देर शुड बी रिसेप्टिविटी 00:32:30 अभी कुछ दिन पहले की बात है मुझसे किसी व्यक्ति ने पूछा कि मैंने वेज और नॉन वेज के विषय 00:32:40 में आप क्या कहते 00:32:44 हैं मैंने क भाई वैसे तो हम कुछ भी किसी से नहीं कहते हैं आपने पूछा है तो हम आपको 00:32:50 बता देते हैं मेरा मानना यह है कि आपके आसपास सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की 00:32:57 र्जा हमेशा रहती है आपके आसपास पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी हमेशा रहती है बड़ी बात ये है कि आप ग्रहण 00:33:03 किसको कर रहे हैं जब आप तामसी आहार करते हैं तामसी भोजन जब आप ग्रहण करते हैं जब आपका आहार 00:33:12 अशुद्ध हो जाता है तामसी हो जाता है फिर जो नकारात्मकता ग्रहण करने की आपकी वृत्ति है वो बढ़ जाती 00:33:19 है आप जैसा आहार ग्रहण करेंगे आपके भीतर उसी गुण का निर्माण होगा आपका आहार अपवित्र होगा 00:33:27 आहार में तमोगुण की प्रधानता होगी आपके भीतर भी तमोगुण बढ़ेगा तमोगुण बढ़ेगा तो क्या होगा उसी से मेल जोल 00:33:34 रखती हुई ऊर्जा जो है उसी से मेल खाती जो तरंगे हैं बाहर वही आपकी तरफ दौड़ दौड़ कर 00:33:45 आएंगी दुर्योधन के सामने भगवान खड़े हैं वह पहचान ही नहीं पा रहा है उसके पास आंख नहीं है आंख 00:33:51 तो है लेकिन उसके पास दृष्टि नहीं है उसके उसके सन्मुख विग्रह 00:33:57 धर्म खड़ा है उसके हित की बात उसको भगवान बता रहे हैं उसको समझ में ही नहीं आ रही क्यों 00:34:03 उसके पास ग्रहण करने की क्षमता ही नहीं है ग्रहण करने की क्षमता के लिए सात्विक जीवन चाहिए पवित्र आहार 00:34:09 चाहिए प्रकृति का आदर चाहिए क्यों मैं आप आपको बल देता हूं इस बात पर कहता हूं भाई प्रकृति का 00:34:15 आदर करना प्रकृति की अवहेलना करोगे तार टूट जाएगा अच्छी बात सुनकर भी समझ नहीं आएगी आप आप आप उसको 00:34:27 ग्रहण नहीं कर पाओगे कहने वाला कहता 00:34:32 रहेगा नहीं तो कोई आवश्यकता नहीं थी युद्ध के मैदान में श्री कृष्ण अर्जुन को युक्ता हार विहारस युक्त चेस 00:34:39 कर्मसु ये उपदेश कर रहे हैं भाई अपना खाना पीना और सोना जगना सुधारना दो बातें भगवान ने की खाना 00:34:47 और सोना ये नियमित संतुलित रहना चाहिए श्लोक है श्रीमद् भगवत गीता में भगवान क ना तो अधिक खाने वाले 00:34:56 का 00:34:58 ना अधिक सोने वाले का ना बहुत कम खाने वाले का ना बहुत कम सोने वाले का योग सधे का 00:35:04 उसके जीवन में संतुलन नहीं आएगा माने दो बातें महत्त्वपूर्ण होगी ना तभी तो भगवान कह रहे हैं जीवन में 00:35:12 तमोगुण बढ़ेगा आप बैठ जाओ समझ में आपको कुछ नहीं 00:35:19 आएगा अब आज आजकल के किसी बालक को आप यहां पर लाकर बैठा दो कभी-कभी कोई माता-पिता ले भी आते 00:35:26 हैं 00:35:26 ना फिर बाद में बच्चा मुझे अगर कभी मिले क सुना तो सब ऊपर से निकल गया हमरे तो कुछ 00:35:31 समझ में नहीं आया क्यों समझ में नहीं आया बड़ी बात ये नहीं कि आपको समझ में नहीं आया क्यों 00:35:38 समझ में नहीं आया क्योंकि धर्म की बात को समझने के लिए भी आपको भीतर से एक योग्यता चाहिए एक 00:35:46 पात्रता चाहिए वो पात्रता कहां से आएगी जब जीवन सात्विक होगा तब धर्म की बात समझ आएगी तब धर्म का 00:35:53 मर्म धर्म का जो सूक्ष्म तत्व है उसको आप अनुभव कर पाएंगे 00:36:00 हमारे यहां की शिक्षा पद्धति ऐसी थी उसका लक्ष्य केवल शरीर और शरीर का भोग नहीं था तन मन को 00:36:09 साधा जाता था जब गुरु के चरणों में कोई कोई बालक जाता था तो गुरु उसके तन मन को साध 00:36:16 था क्योंकि शरीर भी क्या है खल धर्म साधन शरीर भी धर्म साधन के लिए मिला है मन भी अनुकूल 00:36:23 हो उसके चरित्र का भी निर्माण हो उसके जीवन 00:36:26 का उसका आचरण पवित्र हो य सब बातें ये सब बातें एक एक एक उच्च एक श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति का 00:36:34 निर्माण करती थी आज तो भाई देखो ऐसा मैंने सुना है हमारे समय में तो ऐसा नहीं था पर आज 00:36:43 तो मैंने ऐसा सुना है कि बोले क्लास में टीचर बैठ नहीं सकता है ऐसा होता है ऐसा होता है 00:36:52 हा बालक बैठेगा लेकिन अध्यापक जो है वो बैठ नहीं सकता 00:36:57 बताओ य कितनी उल्टी खोपड़ी है इन लोगों की देखो जो जो जो बेचारा ग्रहण कर रहा है कायदे से 00:37:05 उसको नीचे बैठना चाहिए और गुरु को शिक्षक को ऊपर बैठना चाहिए पर यहां तो ऐसी अनीति है बालक बैठे 00:37:12 रहेंगे टांग पर टांग चढ़ाकर कुर्सी पर और अध्यापक है व बेचारा खड़ा 00:37:21 रहेगा पीड़ा क्या है हम लोगों की हम लोगों को लगता है 00:37:27 कि वेस्टर्न हो जाना मॉडर्न हो जाना मॉडर्न का अर्थ होता है समय के साथ 00:37:36 चलना युग धर्म को समझते हुए काल की गति का विचार करते हुए अपने जीवन में अपने जीवन में कुछ 00:37:44 परिवर्तन लाना इसको कहते हैं मॉडर्न हो जाना माने समय के साथ चलना इसकी बात तो श्री गीता जी में 00:37:49 भगवान ने भी कही है समय के साथ 00:37:54 चलना पर किसी 00:37:56 के जैसा हो जाना मॉडर्न हो जाना थोड़ी है मुझे भी कुछ दिन पहले यह बात किसी ने बताई बोले 00:38:02 आजकल टीचर बैठ नहीं सकते क्लास में बैठ नहीं सकते बच्चे बैठेंगे टीचर खड़ा रहेगा और धन्य ऐसे नियम बनाने 00:38:11 वाले भी और धन्य है वह माता-पिता भी जो जो ऐसी जगह पर अपने बच्चों को पढ़ाकर गर्व महसूस करते 00:38:20 हैं उनको लगता है बड़ी गौरव की बात अब भाई य चर्चा 00:38:26 होती है तो हर विषय पर बात होनी 00:38:36 चाहिए और यहां ऋषियों ने य ऋषियों ने इस चर्चा का आरंभ ही इस प्रश्न से किया है भाई ऐसी 00:38:44 ऐसी गति मति हो गई है कलयुग के मनुष्य की क्या करें उसके लिए कोई साधन बताइए क्योंकि उसका जीवन 00:38:51 विघ्न बाधाओं से घिरा है भीतर बाहर घोर तम 00:38:56 गुण है आचरण की पवित्रता नहीं है 00:39:03 धर्माचक्र भी बहुत है उसमें भी कोई एक साधन निश्चित नहीं है अनेक अनेक प्रकार के कर्मों का विधान है 00:39:13 आपकी मेरी तो क्या कहे या हरिराम व्यास जी जैसे पंडित प्रवर वो भी जीवन का जीवन का कितना काल 00:39:19 इन्हीं शास्त्रों में उलझे रहे और कह रहे कि वो तो इतने बड़े हैं 00:39:26 ऋषियों ने कहा कि बोले भाई ये शास्त्र पुराण आदि इतने विस्तृत है कि एक जीवन काल में तो उनका 00:39:33 एक अंश भी पूरा पूरा सुनना समझना संभव नहीं है सब शास्त्र पढ़कर फिर फिर उसमें से सार की बात 00:39:42 निकालना कोई हमारे सामर्थ्य की बात है हमारे सामर्थ्य की बात तो नहीं है मेरी तो नहीं है आपकी हो 00:39:47 तो आप करो हमारी तो नहीं है हमें तो हमारे संतों ने सिखाया बिलय खसम को कमायो 00:39:56 हमारे नागरी दस जी कहते बोले रस कों ने सार सार की बात निकाल कर दे दी इसको ग्रहण करिए 00:40:03 ध्रुव दस जी ने सिद्धांत विचार में यही तो कहा बोले विवेकी सोई जो सार की बात गहे साधु ऐसा 00:40:14 चाहिए जैसा सूप सुभा सार सार को गही रहे थूथा दे उड़ा 00:40:28 ऋषियों ने कहा आप सार की बात जानते हैं देखो यह कथा पदे पदे कुछ कहती चलेगी सुनना हमारा लक्ष्य 00:40:39 क्या है कहे कथा और अर्थ विचारे यह कथा पदे पदे कुछ कहती चलेगी ऐसे अंग्रेजी में कहते हैं कि 00:40:47 देर स्टोरी बिटवीन द लाइंस कुछ कुछ कह दिया गया है लेकिन कुछ इन शब्दों के गर्भ में है 00:40:57 कुछ रहस्य इन शब्दों के भीतर छिपा है कथा कुछ कहती चलेगी देखो जो ऋषि पूछ रहे हैं आप देखो 00:41:05 उन ऋषियों की सामर्थ्य क्या होगी 1000 वर्ष के अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं कि वह साधारण सामर्थ्य वाले 00:41:13 ऋषि तो इसका मतलब है नहीं उनकी सामर्थ्य दिव्य है उनके पास दिव्य शक्ति है उसी शक्ति के बल पर 00:41:20 ही तो एक सहस्त्र 1000 वर्ष के अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं ऐसा नहीं 00:41:26 वो शास्त्र पुराण नहीं जानते होंगे शास्त्रों पुराणों में क्या लिखा है ऐसा नहीं है कि वह नहीं जानते पर 00:41:34 व आपको मुझे बता रहे हैं कि कल्याण चाहते हो तो गुरुजनों के चरणों में बैठकर श्रद्धापूर्वक पहले अपने कल्याण 00:41:42 का मार्ग गुरुजनों से पूछना चाहिए यह पहला पहला चरण है व वो वो श्री भगवान के दिखाए मार्ग पर 00:41:54 पूरी निष्ठा से चलने का प्रयास 00:41:56 कर रहे आपको मुझे दिखा रहे हैं सिखा रहे हैं प्रथम भगति संतन करी संगा पहले तो शी सूत जी 00:42:07 के पास गए और सकतम सतमा सनम श्रेष्ठ आसन पर उनको बैठाया और फिर क्या कहा कथा सुनाई दूजी रती 00:42:17 मम कथा 00:42:25 प्रसंगा 00:42:27 प्र बहिन श्रद्धा नाना त्मा 00:42:38 संपसी आप अपनी बुद्धि से प्राणी मात्र का जिससे कल्याण हो वह विधि वह मार्ग हमको बताइए हम वह सुनना 00:42:48 चाहते हैं जिसको सुनने से अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो और कभी आपको मैंने संकेत किया था अत 00:42:56 की शुद्धि ही सबसे बड़ी सिद्धि है यही सबसे बड़ी सिद्धि है अंतःकरण की शुद्धि य मन हो निर्मल तुम्हारी 00:43:07 कृपा से वो सुनाइए जिसको सुनने से मन निर्मल हो जाए हो कोई ऐसो रे भेटे 00:43:19 सं मेरी ला है सगली चिं 00:43:27 कुरस मेरो रंग ला इससे पहले ही गुरु साहब ने एक बात कही है पढ़े रे सगले 00:43:39 वेद नहीं चूके मन खेद अभी आपसे जो मैं कह रहा हूं ना कि ऋषि मुनि साधारण तो नहीं है 00:43:49 हजारों हजार वर्ष की इनकी आयु है बड़ा श्रेष्ठ साधन यह लोग किए बैठे हैं पर कहीं ना कहीं 00:43:56 इनका यह प्रश्न पूछना यह बता रहा है यह बता रहा है पढ़े रे सगले वेद नहीं चूके मन खेद 00:44:09 एक खिन नाद रही मेरे घर के 00:44:16 पंचा लेकिन यह जो विकार है फिर फिर फिर अंकुरित हो जाते हैं फिर फिर अंकुरित हो जाते इसलिए 00:44:26 हो कोई ऐसो रे सुखदाई जिन हरि की कथा सुनाई सस भेटे गति हो 00:44:43 हमारी सस भेटे गति होए 00:44:52 हमा हे स जी कुछ ऐसी बात सुनाइए जि 00:44:56 जिसको श्रवण करके हमें हमें अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो तो आज की वार्ता यही श्री जी के चरणों में 00:45:03 निवेदन करते हैं महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हृदय स्त प्रभु को भाव प्रभु को 00:45:24 नमन
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ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 |
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[00:00:30] ऋषियों ने ऐसा कल्याणकारी प्रश्न पूछा है जिससे केवल उनका ही नहीं बल्कि समस्त समाज और जीव मात्र का कल्याण हो सके।
The sages asked such a welfare-oriented question that it could benefit not only themselves but the entire society and all living beings.
[00:01:16] संत सदैव जीवों पर असीम दया करते हैं और प्रभु से निरंतर प्रार्थना करते हैं कि दीन दयाल तक जीवों की पुकार पहुँचे।
Saints always show boundless compassion toward living beings and continuously pray to the Lord that the cries of the distressed may reach the Merciful Lord.
[00:04:39] मानव मन सदा सांसारिक काम, वासना और कामनाओं से भरा रहता है, जिसे केवल संतों की कृपा और सत्संग से ही निर्मल किया जा सकता है।
The human mind is always filled with worldly desires, passions, and cravings, and it can be purified only through the grace of saints and Satsang.
[00:09:29] वर्तमान कलियुग में प्राणी मात्र के लिए सबसे सुलभ, श्रेष्ठ और सार्वभौमिक धर्म केवल भगवन नाम का निरंतर जप करना है।
In the present age of Kali, the easiest, highest, and universal spiritual practice for all living beings is the constant chanting of the Lord’s Name.
[00:10:59] सत्संग और भगवद्भाव के प्रभाव से हृदय में जोत से जोत जलती है, जिससे संपर्क में आने वाले अन्य लोगों का जीवन भी प्रकाशित होता है।
Through the influence of Satsang and God-consciousness, one lamp of the heart lights another, thereby illuminating the lives of those who come into contact with it.
[00:12:40] समाज का निर्माण व्यक्तियों से ही होता है, इसलिए जब प्रत्येक व्यक्ति का मन सुधरेगा और शांत होगा, तभी पूरे समाज में वास्तविक शांति आएगी।
Society is made up of individuals; therefore, true peace will come to the entire society only when the mind of each individual becomes refined and peaceful.
[00:14:12] कलियुग में मनुष्य की आयु अत्यंत कम है और साधन का समय सीमित है, अतः बिना विलंब किए तीव्र भक्ति मार्ग अपनाना चाहिए।
In the age of Kali, human life is extremely short and the time available for spiritual practice is limited. Therefore, one should adopt the intensive path of devotion without delay.
[00:16:14] कलियुग में तमोगुण और प्रमाद के अत्यधिक प्रभाव के कारण जीवों की रुचि और प्रवृत्ति भजन-साधन में कम होती जा रही है।
In the age of Kali, due to the overwhelming influence of the mode of ignorance and negligence, the interest and inclination of living beings toward devotional practice are gradually declining.
[00:25:11] बाल्यावस्था में दिए गए श्रेष्ठ संस्कार ही युवावस्था को पवित्र रखते हैं और वही वृद्धावस्था में भगवद्भक्ति को सिद्ध करते हैं।
The noble values and impressions given during childhood are what keep youth pure and ultimately establish devotion to God in old age.
[00:30:59] वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मात्र व्यापारिक न होकर गुरुकुल परंपरा की तरह संस्कारी, सात्विक और तन-मन को साधने वाली होनी चाहिए।
The present education system should not be merely commercial; like the Gurukul tradition, it should cultivate good values, purity, and discipline of both body and mind.
[00:33:12] तामसिक और अशुद्ध आहार से तमोगुण बढ़ता है, जबकि सात्विक आहार और जीवनशैली से ही आध्यात्मिक व धर्म के मर्म को ग्रहण करने की पात्रता आती है।
Tamasic and impure food increases the mode of ignorance, whereas only a Sattvic diet and lifestyle create the qualification to understand the essence of spirituality and Dharma.
[00:41:34] शास्त्रों के गहन सार को समझकर अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त करने के लिए श्रद्धापूर्वक संतों और गुरुजनों की शरण में जाना आवश्यक है।
To understand the profound essence of the scriptures and attain purity of the inner self, it is essential to respectfully take shelter of saints and revered Gurus.
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