Monday, August 10, 2026

भक्ति जीवन मे कैसे स्थिर होगी| Shree Hita Ambrish Ji

 


1. Full Transcript In Hindi (पूरा प्रतिलेख हिंदी में)
परसों मैंने आपसे कहा था कि यह प्रभु का प्रण है - सनमुख होई जीव मोहि जब, जन्म कोटि अग नासहीं तब ही। आप जब सत्संग में आते हो, आप जब कथा में आते हो, तो अपने मन में यह विश्वास लेकर आइए भाई यहाँ प्रभु विराजमान हैं। बस प्रभु के सन्मुख मुझे, मुझे प्रभु का होकर जाना है। इसलिए मैंने आपको कहा था थोड़े दिन इस भाव का अभ्यास करिए कि आगे-पीछे जो है वह तो आगे-पीछे होता ही रहेगा। एक बार श्री रामकृष्ण परमहंस अपने कुछ शिष्यों के साथ ऐसे तालाब के किनारे टहल रहे थे। मछली पकड़ने वाले ने जाल डाला। अब जो जाल में मछली फँसी ना, उसमें कुछ तो ऐसी थी जो छटपटा रही थी, कुछ ऐसी थी जो बिल्कुल निस्पंद पड़ी थी, और कुछ एक-दो ऐसी भी थी जो प्रयास करके जाल से बाहर निकल गई। अब श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने अपने शिष्यों की ओर देखा और मुस्कुराते हुए पूछा—बोल क्या समझे? मैं अभी आपको यही कह रहा था ना, जिसको सीखना है वह तो आसपास घटने वाली घटना से भी सीखेगा। जो शिष्य हो गया है ना, माने जिसको सीखना आ गया है, जो सीखने को तत्पर है, जो श्रद्धावान है, वह तो इस अस्तित्व में घटने वाली एक-एक घटना से सीख लेगा। जो आपको दिखाई पड़ रहा है, जो आपको सुनाई पड़ रहा है—बहुत ध्यान से सुनना—जो आपको दिखाई पड़ रहा है, जो आपको सुनाई पड़ रहा है, उसके पीछे कोई कारण है। आपको वह क्यों दिखाया जा रहा है, आपको वह क्यों सुनाया जा रहा है, उसका कोई कारण है। उस कारण का विचार करिए। कोई विशेष प्रकार की परिस्थिति यदि आपके जीवन में आई है, तो आप ही के जीवन में क्यों आई है? अरे कोई कारण होगा, महापुरुष कहते हैं—अरे कोई कारण होगा! तो श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों से पूछा—बोले हाँ भाई बताओ, क्या समझे? एक जो शिष्य था वह बड़ा प्रज्ञावान था। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि तीन प्रकार के जीव इस संसार में होते हैं। तीन प्रकार की मछलियाँ थी। एक बिल्कुल निस्पंद पड़ी थी, माने जिन्होंने संसार का बंधन स्वीकार कर लिया है। जैसे आप कह देते हो ना—अब महाराज जी हम क्या करें, हम तो गृहस्थ हैं, हमारे भाग्य में तो यह रोना-धोना ही लिखा है, हम तो खाएँगे-पिएँगे और सोएँगे, और रोग से, चिंता से ग्रस्त होकर, शोक से त्रस्त होकर एक दिन मर जाएँगे, यही हमारा जीवन है। फिर गधा, कुकर, सुकर होकर फिर जन्म लेंगे, हम तो इसको स्वीकार करके बैठे हैं क्योंकि हम तो गृहस्थ हैं। एक यह विचार पता है आपको कितना दुर्बल कर देता है भीतर से? क्यों? क्योंकि इस विचार के मूल में अज्ञान है, अविद्या है। यहाँ ना कोई विरक्त है, ना कोई गृहस्थ। जीव प्रभु का है, हम प्रभु के हैं। कितना उत्साह भर जाता है जीवन में इस विचार का पुनः-पुनः विचार करने से! भाई हम प्रभु के हैं, और कोई झूठी बात थोड़ी है, कौन झुठला देगा इसको कि आप प्रभु के नहीं हैं? आप प्रभु के ही तो हैं। सच्ची बातें ही तो आपको कही जा रही हैं। झूठ तो वह है जो आपने पकड़ रखा है, जिसको आप छोड़ने को तैयार नहीं हो, जिसके कारण इतना कष्ट पा रहे हो लेकिन छोड़ने को तैयार नहीं हो। दुख तो वह है। यह तो सीधी-सच्ची बात है भाई—आप प्रभु के हो, प्रभु आपके हैं। तो उसने कहा कि भाई देखो, एक मछली तो ऐसी है जिसने जाल से बाहर निकलने की चेष्टा ही नहीं की। उसने तो बंधन स्वीकार कर लिया, उसने तो कहा भाई ठीक है, अब गए, अब तो हम मर ही गए। पर एक ऐसी है जो फड़फड़ा तो रही है लेकिन जाल से निकल नहीं पा रही है। और एक ऐसी है जो प्रयास करके जाल से निकल ही गई। अब आप सोचो, जिनका शिष्य ऐसा प्रज्ञावान है वह गुरु कैसे होंगे! श्री रामकृष्ण परमहंस का एक शिष्य था जिसने उत्तर दिया श्री रामकृष्ण परमहंस के पूछने पर। अब देखो क्या घटना घट रही है—मछली पकड़ने वाला अपनी मछली पकड़ रहा है और आप उस शिष्य की प्रज्ञा देखिए! अब जब यह सब बात उसने श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस से कह दी, तो परमहंस मुस्कुराने लगे और कहने लगे—एक मछली और भी होती है। अब शिष्यों ने कहा वह कौन सी? बोले वह जाल के निकट आती ही नहीं। जो जाल के निकट ही नहीं आती! ऐसे भगवान के कुछ नित्य सिद्ध जन भी होते हैं ना, जो निवृत्ति परायण ही होते हैं, जो इस संसार में केवल संसार का कल्याण करने के लिए आते हैं। वह इस दुस्तर भव-सिंधु के बहाव में नहीं बह जाते। पर बाकी आपके-मेरे में तो तीन प्रकार के जीव हैं। गोस्वामी जी ने भी तीन प्रकार के जीव कहा साधक सिद्ध सयाने। त्रिविध जीव जग वेद बखाने॥ तो एक तो ऐसा व्यक्ति है भाई जिसने बंधन स्वीकार ही कर लिया है, वह तो प्रयास भी नहीं कर रहा है। एक है जो प्रयास कर रहा है लेकिन उसका प्रयास सफल नहीं हो रहा है, क्यों? क्योंकि उसके प्रयास में उत्साह नहीं है और धैर्य नहीं है, उसके प्रयास में सातत्य नहीं है, उसके प्रयास में निरंतरता नहीं है। इसलिए आपको कुछ क्षण पहले मैंने कहा कि प्रैक्टिकल बात मैं आपसे कह रहा हूँ। केवल भाव के धरातल पर मैं यहाँ से कुछ कह दूँ, आप कुछ समझ लें, तो उससे ना मेरा कुछ काम बनेगा ना आपका। यहाँ से तो भाई सीधी-सच्ची बात कहनी चाहिए जो हो सके वही बात यहाँ से कही जाए ना। तो अभ्यास में, साधन में निरंतरता बनाकर रखनी पड़ेगी। तो कुछ मछलियाँ जो थोड़ी देर के लिए फड़फड़ाईं फिर वह भी शांत हो गईं, उन्होंने भी उस बंधन को स्वीकार कर लिया। पर कुछ ऐसी थीं जो जब तक निकल नहीं गईं तब तक सतत प्रयास करती रहीं। और परमहंस कहते हैं—एक मछली और भी होती है जो जाल में फँसती नहीं, वह जाल के निकट ही नहीं आती। और ऐसे निवृत्ति-परायण महापुरुष भी आते हैं इस संसार में, वह भगवान के भेजे आते हैं, वह भगवान के धाम से ही नित्य-मुक्त होकर ही आए हैं। उनको संसार का बंधन नहीं बाँधता, वह माया-मुक्त ही हैं। पर बाकी तीन प्रकार के जीव हैं। अब घर जाकर इसका विचार करना कि हम तीनों में से कौन से हैं? हमारा, हम कौन से प्रकार के हैं? पहले हैं कि भाई अब क्या करें, हम तो ऐसे ही हैं, हम तो ऐसे ही आए हैं ऐसे ही मर जाएँगे? थोड़ा सा भजन-सत्संग का सुख भी ले लेते हैं और थोड़ा संसार का गाना-बजाना हो जाए तो भी कोई बुरी बात नहीं है, वह भी कर लेते हैं, थोड़ा यहाँ भी हाथ-पैर मार लेते हैं, थोड़ा वहाँ भी चले जाते हैं, वहाँ भी देख लेते हैं संसार में क्या हो रहा है। आपको स्मरण हो, मैं पहले आपसे कभी कहा करता था—जिसको संसार में ही सुख है, जिसको अभी विषय का ही रस अच्छा लग रहा है, मीठा लग रहा है, उसको तो सत्संग कभी-न-कभी प्रिय लगेगा। उसको तो कभी-न-कभी सत्संग प्रिय लगेगा क्योंकि सत्संग का रस उस विषय-रस से ऊँचा रस है, श्रेष्ठ रस है, गाढ़ा रस है, अधिक मधुर है, दीर्घकालिक है, इसका प्रभाव दीर्घकालिक है। पर ध्यान रखना, एक बार यदि सत्संग का रस मिल गया है, एक बार यदि सत्संग का रस आपने चख लिया है, फिर संसार का रस प्रिय नहीं लग सकता। अगर लग रहा है—और ईमानदार रहना—अगर लग रहा है तो समझ लेना कि अभी सत्संग का रस मिला नहीं, रस विशेष तिन्ह जाना नाही। अभी यह रस मिला नहीं, मिल जाएगा फिर संसार का रस प्रिय लग नहीं सकता। रमा विलास राम अनुरागी। तजत वमन... सत्संग का जो रस है वह तो विषय-रस में वमनवत प्रतीति कराता है, और ऐसा ही होता है। इसलिए सत्संग का वास्तविक रस मिले इसके लिए प्रयास करना। इस विचार से अपने आप को दुर्बल नहीं करना—भाई हम तो घर-गृहस्थी में पड़े हुए लोग हैं, हम क्या कर सकते हैं? इस विचार से अपने आप को दुर्बल नहीं करना, यह विचार आपको कमजोर कर देगा। हम ना गृहस्थ हैं ना विरक्त हैं, हम ना इधर के हैं ना उधर के हैं, हम भाई प्रभु के हैं। और जैसा अभी मैं आपसे कह रहा था ना, जो कुछ आपको सुनाया जा रहा है, जो कुछ आपको दिखाया जा रहा है, उसका कोई कारण है। क्यों आया जीवन में यह क्षण जब मैं यह कह रहा हूँ आप यह सुन रहे हैं, हम यहाँ यह कथन-श्रवण कर रहे हैं, क्यों आया हमारे जीवन में यह क्षण? संसार में देखो व्यक्ति कहाँ-कहाँ भटक रहा है इस समय, कोई सिनेमा देख रहा होगा, कोई बढ़िया खा-पी रहा होगा, कोई कहीं डोल रहा होगा। हमको प्रभु ने यहाँ लाकर बैठाया है, अरे कोई कारण होगा! मैं यह कह रहा हूँ आप सुन रहे हैं, क्यों? कोई कारण होगा! तो बंधन स्वीकार मत करिए। छटपटाइए, तो छटपटाने का अर्थ क्या है? प्रयास तो करिए। अपनी जो सामर्थ्य में हो—वैसे तो प्रयास सामर्थ्य से अधिक किया जाना चाहिए—पर कम से कम सामर्थ्य से कम प्रयास तो मत करिए! जितना सामर्थ्य प्रभु ने दिया है, कम से कम उतने को तो ईमानदारी से साधन में लगाइए। तो भगवान का दर्शन करके वहाँ एकदम जैसे आनंद की बाढ़ सी आ गई। अब देखो, अभी कथा आरंभ नहीं हुई, अभी तो केवल कथा की महिमा ही कही जा रही है, कथा आरंभ नहीं हुई उससे पहले ही भगवान आकर वहाँ पर खड़े हो गए। भगवान को केवल भक्ति प्यारी है—कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानऊँ एक भगति कर नाता॥ अभी बताओ यह सीधा-सीधा भक्ति का पक्षपात हुआ कि नहीं? भक्ति का पक्षपात है! भगवान ने कहा—भाई सब साधन ठीक हैं अपनी जगह पर हैं, पर मानऊँ एक भगति कर नाता। ज्ञान अनुभव तो करा सकता है, दर्शन भी करा सकता है। महाराज जी, मैंने ऐसा भी देखा कि एक-दो ब्रह्मज्ञानी महात्माओं को भी भगवद्-दर्शन हुआ। माने उनका मार्ग ज्ञान का है, लेकिन उनके अत्यंत शुद्ध अंतःकरण के कारण उनको भगवद्-दर्शन भी हुआ। तो ज्ञान अनुभव भी करा देता है, ज्ञान दर्शन भी करा देता है, लेकिन जिसको भगवती श्रुति 'रसौ वै सः' कहती है, उस रस-मूर्ति का, उस परम फल का आस्वादन भक्ति कराती है, उस फल को चखाती भक्ति है। मैंने देखा कि उन महात्माओं को भगवद्-दर्शन हुआ, लेकिन भगवद्-दर्शन हो जाने के बाद भी वह पुनः आकर अपनी उसी ज्ञान-अवस्था में ही आरूढ़ हुए। ऐसा होता है ना महाराज जी, ऐसा हुआ है! ऐसे महापुरुषों का चरित्र मिलता है कि वह ज्ञान-मार्ग के साधक हैं, उनको श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ, श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद भी उनकी वृत्ति अपने उसी भाव में आरूढ़ रही, वही स्थित रही। तो इसलिए कोई पूछता है ना कि पुराणों में लिखा है कि इतना करोड़ नाम-जप करने से भगवान का दर्शन होता है तो क्या होता है? अवश्य होता है भाई, पुराणों में झूठ नहीं लिखा है। पर मैं आपको एक बात और निवेदन कर दूँ—कहीं भी यह नहीं लिखा है कि इतना जप या इतना साधन करने से भगवान में प्रेम होता है। भगवान में प्रेम केवल भगवान के प्रेमी के संग से होता है, भगवान में प्रेम केवल भगवान के प्रेमी के अनुग्रह से होता है। इस बात का सबसे ज्वलंत उदाहरण श्री उद्धव जी हैं। वह तो ज्ञान, कर्म, भक्ति सबका रहस्य जानते हैं, क्या है जो वह नहीं जानते! लेकिन वह जो आँख में आँसू आया ना—कृष्ण नाम कान में पड़े और हृदय विगलित हो जाए—जिसकी याचना चैतन्य महाप्रभु कर रहे हैं— नयनं गलदश्रुधारया गद्गदुरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥ कैसी भक्ति चाहता हूँ? उससे पहले क्या कह रहे हैं—न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद्भक्तिरहेतुकी त्वयि॥ ना धन चाहिए, ना जन चाहिए, ना सुंदरी, और वह तो यहाँ तक कहते हैं 'कवितां वा जगदीश कामये'—मैं कोई श्रेष्ठ-श्रेष्ठ रचनाएँ करके इस संसार में यशस्वी भी नहीं होना चाहता। 'मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहेतुकी'—जन्म-जन्म में आपकी अहेतुकी भक्ति! अब भगवान ने पूछा—भाई कैसी भक्ति चाहते हो? क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि में भक्ति का अर्थ अलग-अलग है ना, पीपल को डोरा बाँधने वाला वह भी यह समझता है मैं भक्ति कर रहा हूँ, उससे पूछो क्या कर रहे हो, बोले भगवान की भक्ति कर रहे हैं। तो भक्ति का अर्थ तो सबके मन में अलग-अलग है। तो भगवान ने पूछा कैसी भक्ति चाहते हो? तो कहते हैं—नयनं गलदश्रुधारया कि मेरे नेत्रों से अविरल अश्रु-प्रवाह होता रहे, कंठ का स्वर प्रेम के भार से भारी हो जाए, और रोम-रोम पुलकित हो, और ऐसा कब हो? बस आपका नाम लेते ही ऐसा हो जाए, ऐसी भक्ति मुझे प्रदान करिए। आपका नाम लेते ही ऐसी दशा हो जाए, ऐसी भक्ति हमको प्रदान करिए। मन क्रम वचन तुम्हारी आशा। ऐसी भक्ति करै रिदास॥ संतों ने वह जो कठिन-कठिन बातें लिखी हैं ना, उनको सरल करके बताया है। मुझे क्यों मीरा, कबीर, तुलसी, नानक प्राणाधिक प्रिय हैं? क्योंकि वह वेद-शास्त्रों की जो कठिन-कठिन बातें हैं, क्लिष्ट-क्लिष्ट बातें हैं, वह इन्होंने बहुत सरल-सहज करके बताई हैं। और मुझे लगता है कि बिना साधु-संग कोई साधु बन तो सकता है... साधु होने के तो अनेक कारण हो सकते हैं ना, जैसे भगवान का भजन अनेक-अनेक कारणों से करते हैं। भगवान के भक्तों में आर्त भी हैं, अर्थार्थी भी हैं, जिज्ञासु भी हैं, ज्ञानी भी हैं। कल भी मुझे चलते-चलते किसी ने पत्र दिया था ना, वह है यहाँ पर जिसने कल पत्र दिया था? नहीं है? तो सज्जन ने ऐसा लिखा था कि आप कहते हैं कि भय से भी भक्ति होती है, पर मैं आपकी यह थ्योरी नहीं मानता क्योंकि भक्ति तो ऐसे होती है, वैसे होती है। तो मैंने कहा मैं तो वैसे भी थ्योरी मनवाने के लिए नहीं कहता हूँ, मैं तो सदा ही कहता हूँ भाई—मैं कह रहा हूँ, आपको अच्छी लगे आप सुन लो, नहीं लगे छोड़ दो। पर मैं स्पष्ट कर दूँ—क्योंकि थोड़ा सावधान होकर सुनना चाहिए, उन्होंने टोपी और मास्क लगाया था ना तो हो सकता है ठीक से सुना नहीं हो—तो मैंने यह नहीं कहा कि भय में भी भक्ति होती है, मैंने कहा भय से भी भक्ति होती है! अर्थात संसार के भय से भयभीत होकर भी तो कोई भगवान की शरण में जाता है, और जाता ही है, और जाना चाहिए। मैं तो कल आपसे यही तो कह रहा था, आचार्य का वाक्य ही है—'डर ही डरप', हरिवंश महाप्रभु जी इस त्रिगुण के इस पसारे से, इस माया के प्रपंच से भयभीत होने के लिए तो कह रहे हैं भाई, इससे डरकर भगवान की शरण में जाओ। तो भय में भक्ति नहीं, पर भय से भक्ति तो होती है। तो अनेक-अनेक कारणों से कोई भगवान का भजन करता है, उसमें आर्त भी है, अर्थार्थी भी है, जिज्ञासु भी है, और ज्ञानी भी है। तो ऐसे साधु भी अनेक-अनेक कारणों से हुआ जा सकता है। पर मैं समझता हूँ कि बिना साधु-संग के कोई साधु हो तो सकता है, बिना साधु-संग के कोई साधु बन तो सकता है, पर बिना साधु-संग के कोई साधु रह नहीं सकता! यदि कोई चाहे ना जीवन में साधुता रहे, फिर तो साधु के संग रहना पड़ेगा। साधु-संग के बिना जीवन में साधुता रह नहीं सकती, आ तो जाएगी पर स्थिर नहीं रहेगी। जो बात मीराबाई कह रही हैं, पहले कितनी-कितनी बात कहती हैं कि—शील संतोष धरूँ घट भीतर समता पकड़ रहूँगी, जाको नाम निरंजन कहिए ताको ध्यान धरूँगी। गुरु के ज्ञान रंगूँ तन कपड़ा मन मुद्रा पहनूँगी, और प्रेम प्रीत सू हरि गुण गाऊँ चरणन लिपट रहूँगी। या तन की मैं करूँ किंगरी रसना नाम रटूंगी... फिर अंत में विचार करके कहती हैं भाई—यह सब हो जाएगा जब साधा संग रहूँगीमीरा के प्रभु गिरधर नागर संतन संग रहूँगी, साधा संग रहूँगी। मुझे तो अब तक इतनी सी बात समझ में आई और मुझे लगता है कि इतनी सी बात से अपना काम बन जाएगा। इतनी सी बात समझ में आई कि प्रयासपूर्वक, प्रार्थना से काम बने तो प्रार्थना से करिए, पुरुषार्थ से बने तो पुरुषार्थ से करिए, और प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों ही इस दिशा में लगाइए, और किसी प्रकार से बस प्रभु से यह कहला लीजिए कि तुम्हारे जीवन में सत्संग सदा बना रहे! इतनी सी बात मेरी तो समझ में आई। हमने नंददास जी का भ्रमरगीत गाया, वहाँ भी अंत में यही बात मिली। पूरा भ्रमरगीत गाने के बाद श्री नंददास जी अंत में एक ही बात कहते हैं भाई—सबको कहने का फल क्या है? इतनी बात समझ लीजिए कि साधु-संग ही सर्वोपरि लाभ है। किसी कारण से, किसी प्रकार से आपके जीवन में सद्गुण आ भी गया, पर वह सत्संग के बिना जीवन में टिकेगा नहीं। मैं यह कहना चाह रहा हूँ, स्थिर नहीं रहेगा। यदि आप चाहें कि भक्ति स्थिर रहे—जब मानस में गोस्वामी जी कहते हैं ना सदा सत्संग—तो जो 'सदा' शब्द है ना, वह भक्ति के लिए भी कहा गया है और सत्संग के लिए भी कहा गया है। यह कवि का काव्य-कौशल है कि उस शब्द को मध्य में रखकर वह शब्द दोनों के लिए कहा गया है। यदि कोई चाहे कि जीवन में सदा भक्ति रहे, फिर सदा सत्संग रहना पड़ेगा, निरंतर-निरंतर, इसमें प्रमाद ना करे, इसमें भूल नहीं हो जाए। और कल मैं आपसे कह रहा था ना भाई, काल तो घात लगाकर बैठा ही है, और ऐसा महापुरुषों का मत है—# fq काल फिरत सर सांधे और चढ़्यो रहत है कांधे। और हरि का ऐसा ही सब खेल, बिगड़ते-बिगड़ते बात बन जाती है, बनते-बनते बिगड़ जाती है। बिगड़ते-बिगड़ते बन जाएगी, बनते-बनते बिगड़ जाएगी, अब कौन कहेगा भाई मैंने बनाई या मैंने बिगाड़ी? जो राम रचि राखा। यह तो ऐसा ही खेल है भाई, इसीलिए इस पर बहुत ज्यादा आश्रित हुए नहीं हैं महापुरुष। आपके शब्दों में कहूँ तो इस पर बहुत ज्यादा रिलाई (rely) मत करिए, इस पर बहुत ज्यादा आश्रित नहीं। यह तो ठीक है, हो रहा है, बस आवश्यकता से थोड़ा कम ही संबंध रखा है महापुरुषों ने, बुद्धिजीवियों ने जिनका विवेक जग गया है उन्होंने आवश्यकता से भी थोड़ा कम संबंध रखा है, कम से कम में जितने में काम चल जाए बस उतना, कम से कम। तो इतनी बात यहाँ पर समझ में आई कि जहाँ संत होंगे वहाँ हरि की कथा होगी, और जहाँ संतों के मुख से प्रवाहमान हरि की कथा होगी, श्री हरि भी वहीं पर होंगे, अन्यत्र नहीं। फिर भगवान को यदि खोजने जाना भी हो तो फिर कहाँ जाएँ? हम तो ऐसा कहते हैं जिधर तुम छिपे हो उधर देखना है, पर यहाँ तो भगवान कहते हैं भाई जिधर हम खड़े हैं उधर देखिए ना! जिधर छिपे नहीं हैं, जिधर हम खड़े हैं। भगवान का श्रीमुख वाक्य है—मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद। नारद से कह रहे हैं भगवान जी। तो जिधर हम खड़े हैं उधर देखिए।
यह जो बार-बार, बार-बार सहस्रों-सहस्रों उदाहरण देकर आपको सत्संग की महिमा कही जा रही है, इसलिए नहीं कि आप यहाँ आते रहें, इसलिए नहीं कही जा रही है क्योंकि भाई यही सच्ची-अच्छी बात है। हर बात कहकर यहीं आना है, जैसे गीत में 'सम' होता है ना, बार-बार उस सम पर आता है गाने वाला, ऐसे ही हर बात कहकर आना यहीं पर है—राधावल्लभ भजत भज भली भली सब होय। इसलिए कहा जा रहा है ताकि हम इसके लिए प्रयासरत हों, प्रयासरत रहें, थक ना जाएँ। पुनः दोहराता हूँ मैं—बाहर उत्साह और भीतर धैर्य, यह बना रहे। बाहर उत्साह भी बना रहे, माने बुझ ना जाए, जीवन ऐसे बुझा-बुझा सा ना हो जाए। और जो वैराग्य है ना, उसमें कहीं भी उदासी नहीं है। जिनके वैराग्य में उदासीनता है, माने वह सहज वैराग्य नहीं है। सहज वैराग्य में तो अप्रतिम आनंद है, सहज वैराग्य में तो अप्रतिम आनंद है! मुझसे एक बार ऋषिकेश की बात है, हम गंगा किनारे बैठे थे। वहाँ शायद एकादश स्कंध पर ही चर्चा हुई थी कुछ साल पहले। तो कथा के बाद हम शाम को चले जाते थे, तो गंगा किनारे बैठे थे। तो एक महात्मा मेरे पास आकर बैठ गए, अच्छे महात्मा थे, कुछ अच्छी चर्चा उन्होंने की, एक-आध अच्छी बात हमको भी सुनने-सीखने को मिली। पर उनका एक विशेष आग्रह था, उनका आग्रह यह था कि—आपने इस रंग के वस्त्र क्यों पहने हैं? आप तो साधु हैं, आप तो विरक्त हैं, आप इस रंग के वस्त्र क्यों पहने हैं? मैंने उनसे तो कुछ नहीं कहा, बड़े थे और बड़ों की बात मौन होकर सुन लेनी चाहिए, उनसे तो मैंने कुछ नहीं कहा, पर मैंने अपने मन से यह बात उसी समय कही थी—एक पतिव्रता स्त्री जब श्रृंगार करती है, तो वह ऐसा श्रृंगार नहीं करती जो उसको प्रिय लगे, वह ऐसा श्रृंगार करती है जो उसके पति को प्रिय लगे। गोपी श्रृंगार कैसा करती है? जैसा श्रीकृष्ण को प्रिय है। जब उद्धव गए तो गोपियाँ बड़ा सुंदर श्रृंगार किए बैठी हैं, नेत्रों में अश्रु हैं, कंपित गात है, पर श्रृंगार किए बैठी हैं। उद्धव जी के मन में प्रश्न हुआ—भाई यह तो प्रेम-वैरागियों की स्थिति नहीं होनी चाहिए! फिर गोपियाँ कहती हैं—श्यामसुंदर को हम ऐसी अच्छी लगती हैं। यदि हमारा जर्जर गात देखेंगे तो उनको बड़ा कष्ट होगा, बड़े कोमल हृदय हैं वह! तू जिस कृष्ण को जानता है वह होगा पूर्णकाम, आपका काम निर्लिप्त-निष्पक्ष, पर हमारा सांवरा-सलोना ऐसा नहीं है, हमारा श्यामसुंदर ऐसा नहीं है। हम जानती हैं उसको क्या प्रिय लगता है। उस समय भी वह श्रृंगार किए बैठी हैं, किसलिए? क्योंकि वह श्यामसुंदर को प्रिय है। तो पतिव्रता का जो श्रृंगार है वह केवल पति को सुख देने के लिए है, पति को कैसा श्रृंगार प्रिय है। तो मैंने कहा भाई यह तो महात्मा हैं, संन्यासी महात्मा हैं, इनको तो यह सब कहना ठीक नहीं है, पर मैंने उनमें कहा... मैंने कहा भाई आपने पूछा यह रंग क्यों पहना है, मैंने कहा हमारे इनको अच्छा लगता है, बस इसीलिए पहना है और कोई उत्तर नहीं है। जिन्ह भेसां महाराज रीझे सो ही भेष धरूँगी। इसलिए थोड़ी पहना है कि कोई हमको साधु माने, माने ना माने, नहीं माने नहीं माने। हम इनको अपना मानें, यह हमको अपना मानें। पर जो कर रहे हैं वह इसीलिए तो कर रहे हैं—पहली बात भी यही है, बीच में भी यही है और अंत में भी यही है, हम इनको अपना मानें और यह हमको अपना मानें। पर आज की बात को यहीं विराम देते हुए कि भाई कहीं से भी आरंभ करें, पर जीवन में सद्गुण-सद्भाव यदि स्थिर रहेगा तो केवल सत्संग की ही कृपा से रहेगा। आज की वार्ता श्री जी के चरणों में निवेदन करते हैं, महाराज श्री के चरणों में प्रणाम, आप सबके हृदय-स्थित प्रभु को नमन।

Saturday, August 8, 2026

6 Questions Answered -DBS#004 by Vrindavan Chandra Das

First the Gist with timestamps & thereafter Full Transcript is given

"6 Questions Answered -DBS#004" 

1. I want to know more about Diksha Guru? 2- Can I go back to godhead without Initiation?" https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI&t=22 2. This knowledge is coming from guru parampara from infinite years, then it must be same from infinite years but Arjuna was born 5000 year before... https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI&t=664 3. Kya Sai Baba ki puja krna uchit hai. https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI&t=921 4. Question reg. Chaitanya Mahaprabhu https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI&t=1153 5. समलैंगिकता / समलैंगिक संबंधों पर दृष्टिकोण https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI&t=1436 6.  शिर्डी साईं बाबा की पूजा ? https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI&t=1811

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Full Transcript :

6 questions answered 

https://www.youtube.com/watch?v=EEydWY-dzVI "6 Questions Answered -DBS#004"  [00:22] प्रश्न 1: दिग्विजय जी का प्रश्न (दीक्षा गुरु और दीक्षा का महत्व) [00:22] "I have 2 questions prabhuji. 1- I want to know more about Diksha Guru? 2- Can I go back to godhead without Initiation?" (दीक्षा लिए बगैर क्या मैं भगवद्धाम वापस जा सकता हूँ?) [00:39] तो पहला प्रश्न मैंने इनसे पूछा था कि आप दीक्षा गुरु के बारे में... इन्होंने लिखा था "I want to know more". तो मैंने प्रश्न लिखा कि आप कितना जानते हो? क्योंकि मुझे रिपीट न करना पड़े, है ना? [00:50] तो मैंने इनको प्रश्न किया तो इन्होंने उत्तर दिया था— "मैं यह जानता हूँ, जो मैंने सुना है, मैंने यह पढ़ा है कि दीक्षा गुरु जो है, वह तुम्हें इस जन्म-मृत्यु के चक्कर से निकालता है, तुम्हारे पाप कर्म ले लेता है।" [01:02] तो ही इज़ एब्सोल्यूटली राइट (He is absolutely right)। कि दीक्षा गुरु क्या करता है? हमारे को जन्म-मृत्यु के चक्कर से निकालता है। हम अपने आप कभी नहीं निकल सकते। हमें हर हेल्प चाहिए, हर किस पर? स्टेप पर। हमें हर स्टेप पर क्या चाहिए? हेल्प चाहिए। [01:24] तो दीक्षा गुरु का इन्होंने पूछा... मोर जानने का मतलब यह है कि दीक्षा शब्द, दीक्षा शब्द दो शब्दों से बना है— 'दी' और 'क्षा'। [01:37] 'दी' का मतलब होता है— दिव्य ज्ञान। 'क्षा' का मतलब— जो दिव्य ज्ञान लेने से जिसके पाप कर्म क्षय (खत्म) हो जाते हैं। [01:46] दिव्य ज्ञान लेने से क्या होते हैं? पाप कर्म क्षय हो जाते हैं यानी खत्म हो जाते हैं। तो वह व्यक्ति है जो कि आपको दिव्य ज्ञान देता है, जिससे कि आपके पाप कर्म क्षय होते हैं। [01:58] जैसे डॉक्टर... कि यार डॉक्टर के हाथ में पता नहीं क्या शिफा है! यह जो गोली देता है उससे काम हो जाता है। तो एक्चुअली डॉक्टर सही कर रहा है कि गोली सही कर रही है? दोनों। क्योंकि डॉक्टर सही गोली प्रिस्क्राइब कर रहा है जिसके कारण तुम्हारी बीमारी दूर हो रही है। [02:14] इसी तरीके से दीक्षा गुरु आपको दिव्य ज्ञान दे रहा है। क्या दे रहा है? दिव्य ज्ञान दे रहा है। जिससे कि आपके पापों का क्षय, मतलब पाप खत्म हो रहे हैं। He is giving you transcendental knowledge. [02:30] सो गोली विदाउट डॉक्टर एंड डॉक्टर विदाउट गोली... बंदूक एंड द बुलेट। बंदूक है, नो बुलेट— डरा सकता है थोड़ी देर के लिए, फिर जब दबाएगा तो कुछ निकलेगा नहीं तो फिर तुझे दबाएगा वह, है ना? और गोली लेके कहेगा मार दूंगा... (हँसते हुए) उससे नहीं। [02:59] तो इसी तरीके से गुरु इज़ लाइक बंदूक एंड दिव्य ज्ञान इज़ लाइक गोली। नाउ द गुरु नोज़ किधर मारना है। अगर किसी को पकड़ना हो तो उसके दिल में नहीं मारते गोली, पैर में मारते हैं पकड़ने के लिए। यहाँ मार दी तो क्या होगा? मर जाएगा। [03:18] तो इसीलिए गुरु भी दवाई देख-देख के देता है कि पहला अभी इतनी दवाई दो, क्योंकि यह बहुत बीमार रहा है। इसको बहुत स्ट्रॉन्ग डोज इमीडिएटली दे दी तो हो सकता है पेट के अंदर अल्सर्स हो जाएँ। तो इसको सब चेक करना पड़ता है कि कैसे इसको मैं वह दूँ। तो गुरु यह सब चीजें देखकर वह देता है। [03:39] सो दीक्षा का अर्थ, शब्द का मतलब यह है। 'गुरु' शब्द का अर्थ है— जो ज्ञान से भारी है। गु-रु— जो ज्ञान से भारी है। He has a lot of weight. बट वेट ऑफ वॉट? बोले साहब, मेरे गुरु तो बड़े श्रेष्ठ हैं, बोले क्यों? बोले साहब, 230 किलो के हैं! (हँसते हुए) वह वेट नहीं... Weight of knowledge! [04:11] गुरु मीन्स heavy with knowledge. गुरु का दूसरा मतलब है— जो 'गु' से 'रु' यानी अंधकार से उजाले की तरफ ले जाए। [04:27] तो दीक्षा गुरु आपका क्या करता है कि बेसिकली आपको बेसिक 'सम्बन्ध ज्ञान' देता है। और डिटेल में जाना चाहें तो सम्बन्ध ज्ञान का मतलब कि— मैं कौन हूँ? यह प्रकृति क्या है? इन दोनों का मालिक कौन है? और इन तीनों का आपस में सम्बन्ध क्या है? यह किसका काम है? दीक्षा गुरु का। [04:45] और यह आपको, आपके पापों को हरता है। पापों को क्यों हरा जाता है? जैसे अभी आपको कोई स्टोरी आती हो ठीक है, I ask you some story and you know the story. परंतु I keep 500 kgs of weight on your head and I tell you keep walking and telling me the story. बोले वेट संभालूँगा कि तेरे को स्टोरी सुनाऊँगा? [05:07] तो इसी तरीके से दीक्षा के समय के अंदर दीक्षा गुरु जो हैं, वह आपके पाप कर्मों को ले लेते हैं जिससे कि आप भक्ति कर सको। इसलिए पाप कर्मों को लेना बहुत जरूरी हो जाता है, उसके बगैर आप भक्ति नहीं कर पाओगे। 500 kg का क्या रख रखा है आपने? वेट रख रखा है और स्टोरी सुना रहे हैं। You are all qualified to do bhakti, because that is the only one thing which is your qualification, rest are all disqualifications. [05:43] तो यह दीक्षा गुरु का कार्य है। अब आता है कि— "Can we go back to Godhead without Diksha?" No! [05:52] दीक्षा के समय तो नाम भी बदला जाता है। क्योंकि दीक्षा के समय में कहा गया है कि आपका दोबारा जन्म होता है। मनुष्य के दो जन्म होने चाहिए मिनिमम (होने तो तीन चाहिए, तीसरा संन्यास पर)। दो जन्म तो अनिवार्य हैं— दूसरा जन्म होता है दीक्षा के समय। [06:15] उस जन्म के अंदर आप अपना पुराना पहनावा छोड़ के नए पहनावे में आते हो। You become from a normal person to a devotee. इसीलिए आपका असली नाम आपको दिया जाता है। असली नाम का मतलब यह है कि हम सब के सब भगवान के दास हैं, तो भगवान के नाम के सामने 'दास' लगाया जाता है और माताओं के लिए 'दासी' लगाया जाता है। [06:39] जैसे मेरी वाइफ हैं, इनका नाम है विष्णुप्रिया दासी। विष्णुप्रिया यानी लक्ष्मी जी, विष्णु जी की प्रिय। या चैतन्य महाप्रभु की वाइफ विष्णुप्रिया। [07:11] जैसे नाम दिया गया अकाम भक्तिदास— यानी जिसे कोई कामना नहीं है भक्ति करने के लिए, उनके दास हैं। तो जितने भी अकाम भक्ति करते हुए आए हैं (प्रह्लाद महाराज, ध्रुव महाराज, समस्त गोपियाँ, राधारानी), उनके दास हुए। मेरे को नाम दिया जैसे वृंदावन चंद्र दास। [07:42] क्योंकि दोबारा बर्थ माना जाएगा ना। फर्स्ट बर्थ तो हर योनि में होता है— कुत्ते का भी बच्चा पैदा होता है, चूहे का भी होता है, सबका होता है। तो फिर हममें और उनमें क्या फर्क है? कोई फर्क ही नहीं रहा! तो इसीलिए कहा गया दूसरा जन्म। दूसरा जन्म जो है, नाम चेंज होता है। [08:06] तो प्रभुपाद जी ने फिर कहा कि जब मैं फिजिकली प्रेजेंट नहीं होऊँगा, परंतु मैं प्रेजेंट हूँ अनमैनिफेस्ट फॉर्म में। कैसे? दिखता नहीं हूँ तुम्हें परंतु मैं हूँ। उस केस के अंदर मेरे सीनियर डिसाइपल जो होंगे, वह दूसरों को क्या करेंगे? दीक्षा देंगे मेरे बिहाफ पर। उनको 'ऋत्विक' कहा जाएगा (Priest)। [08:39] परंतु वह सीनियर विल एक्ट एज 'शिक्षा गुरु'। शिक्षा गुरु का मतलब— अब जो तुम्हें कुछ पूछना है जीवन भक्ति में कैसे चलाना है, क्या करना है, वह तुम उससे लोगे। उससे मतलब वही नहीं जिसने नाम दिया है, कोई भी हो सकता है। परंतु एक सीनियर डिसाइपल को जिसको तुम सोचते हो कि यह मुझे फिलॉसफी समझा सकता है, मेरे जीवन में भक्ति में गाइड कर सकता है, उसको आप शिक्षा गुरु मानकर उसकी आज्ञा का पालन करोगे। [09:05] शास्त्र कहते हैं दीक्षा और शिक्षा गुरु में कोई भेद नहीं है, इसलिए दीक्षा लेना तो अनिवार्य है। [09:11] तो हमारे यहाँ GIVE के अंदर हम सिस्टम यह फॉलो करते हैं जो प्रभुपाद जी ने बोला था करने के लिए। जहाँ किसी से पूछोगे— आप किसके शिष्य हो? "मैं प्रभुपाद जी का दीक्षा शिष्य हूँ। दीक्षित किससे हूँ मैं? प्रभुपाद जी से। हाँ, शिक्षा किससे ले पा रहा हूँ? वृंदावन चंद्र दास प्रभु के अंडर में, तो वह मेरे शिक्षा गुरु हैं।" [09:34] शास्त्रों में कहा गया शिक्षा गुरु और दीक्षा गुरु में भेद करने वाला नर्क जाता है। क्योंकि शिक्षा गुरु आपको भक्ति दे रहा है, बता रहा है कि भक्ति कैसे करनी है। [09:48] तो दीक्षा गुरु दीक्षा के अंदर फेथ (श्रद्धा) पैदा करता है। शिक्षा गुरु का क्या काम है? मेरा काम क्या है कि आपको प्रभुपाद और प्रभुपाद की टीचिंग्स के अंदर फेथ पैदा करूँ। इसीलिए दीक्षा लेना अनिवार्य है। आप मन से नहीं कह सकते कि मैंने प्रभुपाद जी को गुरु मान लिया। अगर ऐसा होता तो शास्त्र कहते दीक्षा की जरूरत नहीं है, आप मन से मान लो। परंतु शास्त्रों ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा। शास्त्रों ने कहा है फॉर्मली इनिशिएट (दीक्षा) होनी चाहिए। [10:38] दीक्षा बहुत इम्पोर्टेंट चीज़ है। रूप गोस्वामी जी ने भी कहा है कि दीक्षा लेने पर ही आप भक्ति करने के योग्य बनते हैं। भक्ति रसामृत सिंधु में जो 64 अंग बताए गए हैं, उसमें पहला अंग है— 'गुरु पद आश्रय', फिर तीसरे में आता है— दीक्षा लेना। तो दीक्षा लेना अनिवार्य है। [11:04] प्रश्न 2: अनुज प्रभु / हर्ष का प्रश्न (भगवद्गीता का ज्ञान एवं अर्जुन के श्लोक) [11:04] दूसरा है अनुज प्रभु— "Hare krishna prabhu ji, gita was written by Vedvyas, I agree he knows bhagvat gita but how he knows the shalokas spoken by arjuna or sanjay. U said this knowledge is coming from guru parampara from infinite years, then it must be same from infinite years but arjun was born 5000 year before and his shalok is also there in gita which shows this is not same before arjun birth ? Please explain..." [12:35] यह बोलना चाह रहे हैं यहाँ कि भगवद्गीता तो अनंत काल से चली आ रही है, जैसे भगवान ने गीता में कहा कि यह ज्ञान मैंने विवस्वान को दिया। परंतु उस टाइम अर्जुन तो थे नहीं, अर्जुन तो 5000 साल पहले आए हैं। तो उन्होंने जो प्रश्न किए हैं, तो वह फिर सेम गीता कैसे हुई जो लाखों साल पहले थी? [12:59] बड़ा सिंपल उत्तर है। क्योंकि भगवद्गीता में मतलब किससे है? जो ज्ञान है। ज्ञान तो सेम है! क्वेश्चन आप कैसे भी करो, ज्ञान आपको सेम मिलेगा। [13:18] मैंने बच्चों के साथ एक एग्जांपल किया था कि— • 7 - 6 कितना होता है? 1 • 5 - 4 कितना होता है? 1 • 10 - 9 कितना होता है? 1 • 8 - 7 कितना होता है? 1 • 14 - 13 कितना होता है? 1 क्वेश्चन सेम था? नहीं। आंसर? 1। [13:47] तो अर्जुन ने जो प्रश्न किए हैं, भगवान ने जो गीता में पढ़ाया था, वह एटरनल (शाश्वत) है। 16 प्रश्नों के अंदर आप कोई ऐसा प्रश्न कर ही नहीं सकते जिसका भगवान ने गीता में उत्तर न दिया हो। [14:17] जैसे आपने एक क्वेश्चन किया, मैंने आंसर किया। फिर उसके बाद मैंने दो उत्तर और रख दिए, आपने कहा— प्रभु जी, आपको कैसे पता था मेरे मन में यह चल रहा था? क्योंकि मैं समझ जाता हूँ कि मैंने यह आंसर दिया होगा तो इसके मन में यह क्वेश्चन उठा होगा। भगवान से बढ़िया तो और कोई जान नहीं सकता। [14:49] तो नॉलेज इज़ द सेम, फिलॉसफी इज़ द सेम। अर्जुन वाज द बेस्ट स्टूडेंट, तो ही विल पुट अप द बेस्ट क्वेश्चंस। नॉलेज रिमेंस द सेम। [15:21] प्रश्न 3: विनोद मिश्रा जी का प्रश्न (साईं बाबा की पूजा) [15:21] Vinod Mishra: "Hare krishna....kya sai baba ki puja krna uchit hai...mere khyal se wo ek sant the aur hme ijjat krni chiye...na ki puja..plz iska samadhan kren" [15:39] हरे कृष्णा विनोद जी! एक वैष्णव समस्त जीवों की इज्ज़त करता है, चाहे वह संत हो या न हो। एक कृष्ण भक्त चींटी की भी इज्ज़त करता है उसको न मारकर। क्योंकि हर जीव का जीने का अधिकार है (Right to live)। [16:23] साईं बाबा जी क्या हैं, क्या थे— इससे कोई शास्त्रों में चर्चा नहीं है। इसलिए हम उनकी पूजा भी नहीं करते। इज्ज़त हम सबकी करते हैं। वह तो देवी-देवता भी नहीं हैं। [16:40] परंतु भटका जरूर रहे हैं लोगों को भगवान से। संत का काम भटकाना नहीं है, संत का काम है बताना कि भगवान कौन हैं। लोग बोलते हैं "सबका मालिक एक"— अबे है कौन? यह तो बता दे! [17:13] तो यह मूर्ख बना रहे हैं लोग। वह भगवान नहीं हैं। इज्ज़त करना गलत नहीं है, परंतु मंदिर बना के पूजा करना? मंदिर सिर्फ भगवान के बनते हैं, किसी आम के नहीं बना करते। हमारे गुरुदेवों के मंदिर नहीं बनते, समाधियाँ बना करती हैं। मंदिर तो सिर्फ भगवान श्री कृष्ण के हैं। [18:00] हर जगह जो बनी हुई हैं वह समाधियाँ हैं, मंदिर नहीं हैं। उनके नाम पर लोग पैसा कमा रहे हैं। भगवद्गीता पढ़िए 16वाँ अध्याय, भगवान कहते हैं अपनी इंद्रिय तृप्ति करने के लिए असुर लोग किसी को भी कुछ भी करते हैं। [19:13] प्रश्न 4: Anonymous का प्रश्न (समलैंगिकता / समलैंगिक संबंधों पर दृष्टिकोण) [19:13] Anonymous: "Hare krishna prabhu ji, please clear ... Chaitanya mahaprabhu aaye aur chale gye, aise hi bhagvan ka har avatar dharti se chala gya ? Ab jab wo nahi h to phr hum unki pooja kyu krte h, hume sirf bhagvan shrikrishna ki pooja krni chaiye...please tell about jaganath baldev subhadra maiya... Chaitanya mahaprabhu jab aashirvad dete tab kehte 'krishna mate rasto' iska kya mtlbi h ?..." [19:16] पहला— "हर अवतार चला गया" - यह रॉन्ग स्टेटमेंट है। कोई नहीं गया, सब यही हैं। हिरण्यकशिपु के लिए खंभे में भगवान नहीं थे, प्रह्लाद महाराज के लिए थे। विष्णु जी परमात्मा के रूप में कण-कण में विराजमान हैं। भगवान हर जगह, हर समय हैं। [20:24] "जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा मैया के बारे में बताओ" — जगन्नाथ जी स्वयं कृष्ण भगवान हैं, द्वारकाधीश का स्वरूप हैं। बलदेव जी बलराम जी हैं। सुभद्रा मैया साक्षात भगवान की बहन हैं (माया देवी)। [23:11] चैतन्य महाप्रभु आशीर्वाद देते हुए कहते थे— "कृष्णमतिरस्तु"। इसका मतलब है— तुम्हारी मति (मन) कृष्ण में लगे। [23:56] प्रश्न 5: कोपल जी का प्रश्न (समलैंगिकता और धार्मिक आख्यान) [23:56] Kopal: "hare krishna prabhuji, i have a doubt, these days supreme court criminalised gay practises... and here many religions have put forward their ideologies on this, and they say that its justified in hinduism as with the association of vishnu and shivji ayyappa was born... so it gay practises natural, ethical or unethical..." [24:59] The basic fact is this: First of all, you have to understand the goal of human life is to develop love of Krishna and go back home, back to Godhead. All carnal feelings have to be finished. [25:21] If carnal feelings are there, that means there is a big problem in your being called a Hindu. You are Hindu Asura! [25:35] When sex between male and female is restricted only for childbirth, then what do you talk of gay? [25:44] Talking about Vishnu Ji and Shiv Ji... two gays can never produce a child! What people are saying is all nonsense. Sanatana Dharma is so strict on sexual relationships even in marriage—if a person is having sex for not begetting children, it is called illicit sex. [26:31] Ayyappa was born by Shiv Ji and Vishnu Ji... they had sex? This is nonsense! As you go higher into planetary systems, bodies become subtle. In Svarga, birth of children happens through subtle mental thoughts. [27:25] Vishnu Ji and Shiv Ji could create children through their thought process. Minds meet and children are born. Dattatreya Ji was born by Shiv Ji, Vishnu Ji, and Brahma Ji together—they did not copulate! That was a mixed avatar of these three. [28:19] In the creation of Krishna, there is only one Purusha (male)—Lord Sri Krishna. Everyone else is female gender (Shakti/energy). So how can there be two gays when there is only one Shaktiman? This is all nonsense. [30:11] प्रश्न 6: अनमोल जी का प्रश्न (शिर्डी साईं बाबा की पूजा) [30:11] Anmol: "why shirdi sai baba is being worshipped ? He is not even in deva devta i thnk ? Please clear. Hare krishna" [30:17] Anmol Prabhu, you are absolutely right! Why is he being worshipped? God/Krishna has given us independence, and people misuse independence to worship anyone. [30:38] You are right, he is not even a Devi-Devta. You don't have to get any clarification, you are already right. These prevalent wrong thoughts should be cleared. Thank you very much!

Wednesday, August 5, 2026

पति के जीवन में पत्नी बनकर कौन आता है जानिए शास्त्रों का गूढ़ रहस्य by Rajender Das ji

पति के जीवन में पत्नी बनकर कौन आता है जानिए शास्त्रों का गूढ़ रहस्य

by Rajender Das ji

[00:00] उत्तम का विवाह बहुला के साथ हुआ था और जो उनकी पत्नी बहुला थी वह बड़ी रूपवती थी। वो उसमें आसक्त रहते थे, उनका मन और किसी काम में नहीं लगता था। स्वप्न में भी वह बहुला का ही चिंतन करते थे। रानी उनके अनुसार नहीं चलती थी पर वे रानी के अनुसार ही सदा चलते थे। वो कहे खड़े हो जाओ तो खड़े हो जाते, बैठ जाओ तो बैठ जाते। इस तरह से एकदम उसके अधीन होकर चलते थे। पर इतना प्रयास करने के बाद भी वह रानी बहुला कभी उनके अनुकूल नहीं होती।

[00:52] एक दिन राजा उत्तम अनेक राजाओं के साथ बैठे थे और उन राजाओं के समक्ष ही रानी ने महाराज का अपमान कर दिया, उनकी आज्ञा को ठुकरा दिया। इससे राजा को क्रोध आ गया। उन्होंने सोचा कि इतने लोगों के बीच में मेरी मर्यादा नहीं रखी और मेरी बेइज्जती कर दी। [01:25] राजाओं को विदा करने के बाद उन्होंने द्वारपालों को आज्ञा दी कि इस दुष्ट हृदया स्त्री को तुरंत रथ में बिठाओ और घनघोर जंगल में छोड़ आओ। सेवक ने रानी को निर्जन जंगल में छोड़ दिया और राजा अपनी प्रजा का पुत्रों के समान पालन करने लगे। [02:14] एक दिन राजा उत्तम के दरबार में एक दुखी ब्राह्मण आया और बोला, "महाराज! मेरी स्त्री को रात में बिना दरवाजा खुले कोई चुरा ले गया। आप मेरी स्त्री को खोजकर प्रदान करें, क्योंकि राजा आय और धर्म दोनों का छठा भाग लेता है।"

[03:45] राजा ने ब्राह्मण से स्त्री का हुलिया पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि उसकी दृष्टि क्रूर है, कद लंबा है, बाहें छोटी हैं, चेहरा दुबला और कुरूप है। उसका स्वभाव बहुत कठोर है और वह मीठा बोलना नहीं जानती।

[05:22] राजा हंसे और बोले कि ऐसी स्त्री से तो पिंड छूट गया, अच्छा हुआ। यदि आवश्यकता हो तो मैं तुम्हारा दूसरा विवाह करा देता हूँ। [06:17] ब्राह्मण ने कहा, "शास्त्रों का आदेश है कि प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपनी धर्मपत्नी की रक्षा करे, चाहे उसका स्वभाव अनुकूल हो या प्रतिकूल। यदि उसका त्याग किया गया तो वर्णसंकर संतान पैदा होगी और पितर नरक में गिरेंगे। बिना पत्नी के धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि नहीं हो सकती।" [08:17] राजा उत्तम ब्राह्मण की पत्नी की खोज में निकले और एक तेजस्वी ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि ने पहले अपने शिष्य से अर्घ्य लाने को कहा, फिर मना कर दिया।

[09:33] राजा ने पूछा कि मुझे अर्घ्य का अधिकारी क्यों नहीं माना गया? ऋषि ने कहा कि तुमने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया है। जो व्यक्ति १५ दिन तक नित्य कर्म छोड़ दे वह अस्पृश्य हो जाता है, और तुमने एक वर्ष से पत्नी का त्याग किया है, इसलिए तुम्हारा नित्य कर्म फलहीन हो गया है। पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे का त्याग नहीं करना चाहिए।

[13:46] ऋषि ने बताया कि बला नाम का राक्षस ब्राह्मण की पत्नी को उत्पलावत जंगल में ले गया है। राजा वहाँ पहुँचे। राक्षस ने बताया कि वह केवल यज्ञों के अपूर्ण होने पर उनके पुण्य का भक्षण करता है। उसने ब्राह्मण का धर्म नष्ट करने के लिए उसकी पत्नी का हरण किया था। [17:33] राजा के कहने पर राक्षस ने ब्राह्मणी के दुष्ट स्वभाव को भक्षण कर लिया, जिससे वह सुशील और सुंदर हो गई। राजा ने उसे ब्राह्मण को सौंप दिया। [19:08] इसके बाद राजा ने अपनी पत्नी बहुला के बारे में पूछा। ऋषि ने बताया कि उसे नागराज कपोत पाताल (रसातल) ले गया है। [20:54] राजा ने राक्षस का स्मरण किया और राक्षस राजा की पत्नी बहुला को वापस ले आया। बाद में सारस्वत यज्ञ करके नागकन्या की वाणी लौटाई गई। उस रानी से जो पुत्र हुआ, वह आगे चलकर उत्तम मन्वंतर का अधिपति बना। [21:41] कथा का मुख्य संदेश यही है कि हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार किसी भी परिस्थिति में पति और पत्नी को एक-दूसरे का त्याग नहीं करना चाहिए।



वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 by Shri Hit Ambrish ji

वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 by Shri Hit Ambrish ji

https://youtu.be/qinGjpCVjog

First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.

00:00:00 और ये जो प्रोत शब्द है ना इस शब्द के गर्भ में हित है प्र उपसर्ग पूर्वक उत हित से 00:00:07 प्रोत बना है इसमें हित है जिसम विशुद्ध हित परक धर्म की बात कही गई है और जैसा कुछ क्षण 00:00:16 पहले मैंने आपसे कहा ना प्रभु के अतिरिक्त यह जीव कभी भी कहीं भी कुछ भी चाहे तू अपने लिए 00:00:26 पीड़ा की ही व्यवस्था कर रहा है पहले भी मैंने 00:00:30 आपसे निवेदन किया था यहां तो दुख भी दुख है भाई और सुख भी कहीं ना कहीं दुख ही छोड़कर 00:00:38 जाता है पीछे थोड़ी देर का सुख बड़ी देर का दुख छोड़ कर जाता है तभी ध्रुव दस जी कह 00:00:45 रहे हैं कि विषय चुगा जिन चुगे मन व जो काल रूपी बहेलिया है वह तो भाई विषय का चुग्गा 00:00:53 डालता ही है सबके सामने डालता है क विषय चुगा जिन चुगे मन चुगत कछु सुख हो 00:01:00 जब तू चुगेगा तो बो थोड़ी देर का सुख होगा विषय में भी क्षण भंगुर रस तो है ना अल्पकालिक 00:01:09 रस तो विषय में भी है ना हो तो कभी मन उसकी ओर आकर्षित नहीं होगा कभी पहले आपसे मैंने 00:01:17 संकेत किया ना भाई मन के पास बुद्धि नहीं है मन को तो रस चाहिए उसको आप भगवत रस नहीं 00:01:23 दोगे तो वो विषय के रस के पीछे दौड़ेगा मन को रस चाहिए मन के पास बुद्धि नहीं है 00:01:31 मन को तो रस चाहिए आप उसकी व्यवस्था कर दीजिए आप लगाए रहेंगे उसको कथा कीर्तन में भजन सत्संग में 00:01:39 सेवा सुमिरन 00:01:44 में सु नहीं दौड़ेगा उस ओ नहीं तो कोरी कोरी बात करने से तो भाई मन हाथ नहीं आता है 00:01:54 ध्रुव दस जी कह रहे विषय चुगा जिन चुग मन चुगत कछु सुख होई थोड़ा सुख 00:02:00 मिलेगा जैसे मैंने कहा ना यहां का सुख बड़ी देर का दुख छोड़ जाता है फिर फांसी ऐसी पर है 00:02:07 तीही सम दुख न 00:02:13 होई आज यहां से जाकर पाच मिनट नेत्र मूंदकर इस इस बात का विचार करना कि जब जब आपने जब 00:02:22 जब आपने संसार से सुख की इच्छा सुख की कामना की क्या आपकी झोली में दुख नहीं गिराकर 00:02:30 वही तो दुख का कारण बना और अगर अनुभव हो रहा हो कि हां भाई दुख ही मिला तो अपने 00:02:40 आप को सौभाग्यशाली जानना कि आप इसका अनुभव कर पा रहे हो नहीं तो मोह निद्रा में पड़ा जीव तो 00:02:46 अनेक अनेक जन्म इस दुख का अनुभव भी नहीं कर पाता है क्योंकि दुरंत मोह है अगर अगर लगे ना 00:02:54 ऐसा कि हां भाई चले तो थे सुख के पीछे हाथ दुख आया अगर ऐसा अनुभव हो तो समझना सौभाग्यशाली 00:02:59 हो 00:03:00 थोड़ा विवेक जगा है तभी यह देख पा रहे 00:03:07 हो श्री काक बसु जी ने गरुड़ जी से यही तो कहा ही विधि सकल जीव जग रोगी रे इन 00:03:15 मानस रोगों से सभी जीव पीड़ित हैं लेकिन कोई बरले होते हैं जो अपने रोग को पहचान पाते हैं क्योंकि 00:03:24 मनोरोगी अपने आप को रोगी समझता है नहीं क मैं स्वस्थ हूं सौभाग्यशाली 00:03:29 कोई होता है जो अपने रोग को पहचान पाता 00:03:36 है तो कुछ भी चाहते हो आप आप आप जान लेना समझ लेना भाई आप अपने लिए दुख की व्यवस्था 00:03:42 कर रहे हो अब कोई प्रश्न करेगा भाई क्या करें यहां कुछ चाहिए मत चाहो मत ये जो चाह है 00:03:53 ना बड़ी अमूल्य है इस चाह को प्रभु को निवेदन करो वो चाहने से वो मिल जाते हैं 00:04:01 इच्छा मत करिए अरे भाग्य कालिका झूली में आ गिरेगा रसिक अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी महाराज क अन 00:04:09 मांग आगे आवेगा आ ही 00:04:18 जाएगा चाहना प्रभु को ही है प्रभु से नहीं चाहना है प्रभु को चाहना है प्रभु को ही चाहना है 00:04:30 हजार बार यह बात अपने मन से कहोगे तब एक बार मन सुनेगा मानेगा नहीं सुनेगा भगवान ने गीता में 00:04:39 अभ्यास शब्द कहा ना किस बात का अभ्यास करना है हजार बार य बात आप अपने मन से कहोगे ना 00:04:44 नहीं चाहना है संसार को नहीं चाहना है संसार से अब कुछ हजार बार अपने मन को सिखाओ पढ़ाओ तब 00:04:51 एक बार मन सुनेगा और बड़ी देर में जाकर फिर मानेगा यही तो साधना है 00:05:02 इसलिए जब हम मानस जी का चिंतन कर रहे थे तो मैंने कहा था कि सुनकर फिर अपने मन को 00:05:08 भी सुनाना कथा पूर्ण तभी 00:05:14 होगी इसी का नाम अभ्यास है इसीलिए रोज आकर मैं बैठ रहा हूं या आप बैठ रहे हो कि कोई 00:05:20 एक विचार हमको यहां से मिले और फिर उस उस उस विचार का अपने मन को अभ्यास 00:05:28 कराए 00:05:30 सबसे पहले यही बात श्रीमद् भागवत में कही गई है कि भाई इसमें इसमें निष्कपट धर्म की बात है निष्कपट 00:05:37 धर्म माने विशुद्ध 00:05:43 भक्ति उत्तमा भक्ति उसी की चर्चा यहां भगवान वेदव्यास कर रहे हैं और फिर कह रहे हैं कि विशुद्ध अंतःकरण 00:05:53 वाले संतों के द्वारा जानने योग्य जो वस्तु है 00:05:59 फिर विचार हुआ भाई जानने योग्य क्या है जिसको जानकर य ज्ञात वा मतो भवती माने अगर मैं बहुत सरल 00:06:14 शब्दों में इसे कहूं भाई जिसको जानकर कुछ आनंद आए ना उसी को तो जानना चाहिए जिसको जानकर आनंद आए 00:06:22 जिसको जानकर आनंद की अभिवृद्धि हो और यहां नारद जी कह रहे बो जिसको जानकर यवा मतो भवति 00:06:30 कोई आनंद में उन्मत हो जाता है जैसे बाईसा कह रही है भाग खुल्या महारा साद संगत सु सांवरिया के 00:06:43 बट नित उठ हरि जीरा मंदिर जा स्या नाचा दे दे चुटकी मेरो मन लागयो हरि जी सु अब ना 00:06:58 रह 00:07:02 य ये किसी मत की अवस्था ही तो है ना य मता अवस्था है य जत मतो भवती कोई उमत 00:07:09 हो जाता है जसे शी कबीर साहेब कह रहे नाम चढ़ी उतरे नहीं भाई और चढ़ी छिन छिन चढ़ उतरे 00:07:19 नाम चढ़ी तो चढ़े सवाई और क कैसी है य ये खुमारी कैसी है देखत चढ़े 00:07:30 चढ़े अगर आपने कभी किसी भक्त को प्रेम में भाव में भरकर कभी गाते नाचते देखा हो तो आपको शायद 00:07:36 अनुभव वषण का आनंद कैसा होता है देखत चढ़े जब कोई भावा वेश में होता है ना तब उसके उसके 00:07:48 रोम रोम से एक विशिष्ट प्रकार का परमाणु नहीं प्रेमा निशित होता है जब कोई भावा आवेश में होता है 00:07:55 तभी भगवान कह रहे वा गद गदा द्रव यस चित्तम 00:07:59 सत्य भीषण को ल उदय त चम भक्ति यतो भुवन पुना कोई भावा वेश में होता है भक्त जब भाव 00:08:12 में वह अपने अपने अपने प्रियतम अपने स्वामी के निकट 00:08:19 है कैसे महादेव कथा सुनाते सुनाते समाधि स्त हो गए प्रभु कर पंकज कप 00:08:29 कैसी सा सुमिर सो दसा मगन गौरी रघुनाथ जी का कर कमल है श्री हनुमान जी का मस्तक है और 00:08:42 शंकर स्वयं केसरी नंदन महादेव को वही अपने मस्तक पर प्रभु के उस कर कमल की दिव्य सुखद अनुभूति हो 00:08:51 रही है महादेव समाधि हो गए तो जो भावा वेश में थे महादेव और जग 00:08:59 जबा महादेव का दर्शन कर कर के आनंदित हो रही है वहा महादेव कथा कहते कहते रुक गए समाधि लग 00:09:08 गई और जगदंबा को जो आनंद कथा श्रवण करने में आ रहा था वैसा ही आनंद महादेव की उस अवस्था 00:09:16 का दर्शन करने में भी आ रहा है भाव में मग्न य जञा मतो जिसको जानने से ऐसा आनंद मिले 00:09:25 वही जानने योग्य है अरे 00:09:29 उस दिन यही तो मैं आपसे कह रहा था संसार की कोई भी बात जान लो कांटे की तरह भीतर 00:09:34 जाकर चुभती है दो लोग आपस में बैठे हैं मैंने आपसे कहा था ना भाई अंत में व्यक्ति दुखी होता 00:09:47 है अपने दुख से दुखी होता है दूसरे के सुख से दुखी होता है दुखी होता है संसार की कोई 00:09:53 भी चर्चा कोई भी वार्ता मन में विक्षेप पैदा करती है आनंद नहीं विक्षेप 00:10:01 हां पर यह है कि मोह निद्रा में सोया जीव इस बात का अनुभव नहीं कर पाता लगा रहता है 00:10:06 निंदा में पिसता में ध्यान रखना कथा का अमृत भी कान सेही पिया जाता है पिवती भगवत आत्मन 00:10:21 सतामटका अमृत भी कान से ही पिया जाता है और संसार की विषैली वार्ता भी कान से ही भीतर जाती 00:10:28 है 00:10:31 ये जो सुनना है ना श्रवण जो है इसका बड़ा गहरा प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है सुनने का देखने 00:10:41 से भी ज्यादा सुनने 00:10:45 का बड़ा गहरा और बड़ा गंभीर प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है इसलिए सबसे पहले भगवान ने इसी इंद्रिय को 00:10:55 भक्ति में लगाने की बात कही है श्रवण भाई कथा सुनो 00:11:00 सबसे पहले कान को ही भक्ति में लगाने की बात क्यों की क्योंकि सबसे अधिक संसार यहीं से जाता है 00:11:05 भीतर विषय की वार्ता सुन सुनकर फिर विषय का आकर्षण होता है विषय की बात सुनकर विषय का आकर्षण होता 00:11:14 है फिर विषय का चिंतन होता है और चिंतन गाढ़ा हो जाए तो संस्कार बन जाता है संस्कार स्वभाव हो 00:11:23 जाता 00:11:27 है 00:11:31 सबसे पहले भगवान ने यही व्यवस्था की भाई सबसे पहले कान को लगाओ भजन में कान लगे भक्ति में प्रथम 00:11:39 भक्ति संतन करी संगा दूजी रति मम कथा प्रसंगा अच्छी बात सुनिए मुझे तो ऐसा लगता है भाई जो अच्छा 00:11:48 सुनेगा वह अच्छा सोचेगा जो अच्छा सोचेगा वह अच्छा समझेगा और जो अच्छा समझेगा वो अच्छा करेगा हम यही तो 00:11:57 कहते ना भाई सोच समझ कर करना 00:11:59 गलत सुनोगे गलत सोचोगे गलत सोचने वाला गलत ही समझेगा और जो सोचेगा और समझेगा ही गलत ठीक करेगा कैसे 00:12:11 तो गलत ही 00:12:16 करेगा क्यों बार-बार कुसंग से बचने की बात महापुरुष करते हैं क्यों क्योंकि कुसंग आपके विचार को दूषित करता है 00:12:25 आप गलत संग में रहोगे आपका विचार दूषित हो जाएगा 00:12:30 आप ठीक सोचोगे ही नहीं और ठीक सोचोगे नहीं तो ठीक समझोगे कैसे ठीक करोगे कैसे इसलिए अच्छा सुनिए मैं 00:12:39 बार-बार आपको कहता हूं शब्द भी एक प्रकार का आहार है जो आप कान से ग्रहण करते हैं आपका यह 00:12:45 आहार शुद्ध होना 00:12:49 चाहिए नहीं तो यह मानसिक विक्षेप पैदा करेगा मन बीमार हो जाएगा आप देखिए 00:12:59 मंथरा ने जो विष उगला कहां से प्रवेश किया उसने थोड़े समय के लिए यद्यपि य भगवान की लीला है 00:13:10 पर जो भी हुआ मंथरा ने जो विष उगला उसने कहां से प्रवेश किया कान से ही तो प्रवेश किया 00:13:17 व स्वार्थ में भरे जो शब्द थे व विषैले शब्द उसने क के कान में जाकर 00:13:27 डाले 00:13:29 और भरत जैसे महा भागवत को गर्भ में रखने वाली क कहीं और एका एक श्री राम को भरत जी 00:13:35 से भी अधिक स्नेह करने वाली श्री कह कई एका एक क्या कह बैठी क्या निर्णय ले लिया कान से 00:13:43 गलत आहार हु कुसंग हुआ कुसंग ने विचार दूषित 00:13:49 किया और भाई वैसे तो भगवान की लीला है पर देखो कुसंग का परिणाम क्या आया कुसंग का परिणाम यह 00:13:56 हुआ कि सदा सदा के लिए अपयश मिला 00:14:00 व अपयश की पात्र हो 00:14:04 गई बहुत कम लोग ही तो जानते हैं कि भाई ककई जी ने जो किया वह भगवान की इच्छा से 00:14:10 किया साधारण व्यक्ति तो आज कोई भी अपनी संतान का नाम ककही नहीं 00:14:18 रखेगा अगर हम इस दृष्टि से इसका विचार करें हुआ क्या कान से गलत आहार हुआ है फिर गलत सोचा 00:14:27 गलत समझा गलत कर दिया 00:14:32 इसलिए महापुरुषों ने कहा है भाई अपना अपना संग साफ सुथरा रखना गलत बात कान में जाने ना पाए इसलिए 00:14:40 आपको सुना रहा था उस दिन श्री गिरिराज वाले राध स्मरणीय पंडित श्री गया प्रसाद जी महाराज की बात वो 00:14:46 तो कहते थे खूब खाए ले खूब सोए ले और खूब भजन करे बोले कादना भजन में मन ना लगे 00:14:54 तो बोले चादर तान के भले सो जाए 00:14:58 पर संसार की वार्ता ना करें संसार की चर्चा ना करें मैं फिर दोहरा रहा हूं गनत प्रभाव होता है 00:15:09 आपकी चेतना पर जो आप सुनते हैं उसका मैं तो सदा ही कहता आया हूं भाई सबसे बड़ी शक्ति शब्द 00:15:17 की तो है गुरु के मुख से निकला एक शब्द जीव को भव पार करा देता है जीव भव से 00:15:23 पार हो जाता 00:15:27 है 00:15:30 निष्कपट धर्म है और इसमें उसकी चर्चा है जो महापुरुषों के द्वारा विशुद्ध अंतःकरण वाले संतों के द्वारा जानने योग्य 00:15:39 है जानने योग्य वस्तु क्या है भाई जिसको जानकर आनंद आए त्वा मतो भवति और फिर कहा स्तब्ध 00:15:51 भवती जिसको जानकर मन की उठा भटक लचल सब समाप्त हो 00:15:58 परम शांति प्राप्त हो जाए जिसको जानकर यवा मतो भवति स्तब्ध भवति स्तब्ध माने निष्क्रिय नहीं 00:16:13 शांत छोटे बच्चे कभी कभी खेल खेला करते ना उसको कहते स्टैचू जहा है वही पर रुक जाए ऐसे मन 00:16:19 जहा है वही रुक जाए 00:16:23 स्तब्ध और य जो स्तब्ध है एक एक स्तब्ध 00:16:29 तमोगुण जन्य होती है एक स्तब्ध सतोगुण जन्य होती है तमोगुण व्यक्ति भी पड़ा रहता है व उसको भी हिलना 00:16:36 डुलना अच्छा नहीं 00:16:41 लगता एक व्यक्ति तमोगुण होगा ना तो उसको भी बहुत हिलना डुलना अच्छा नहीं लगेगा माने उसको बहुत मेहनत करना 00:16:46 अच्छा नहीं लगेगा व बैठे बैठे सब काम हो जाए हमारे लेकिन वो जड़ता है और सत्व गुण से जो 00:16:54 प्राप्त होती है उसको स्थिरता कहते हैं एक जड़ता है एक स्थिरता है 00:16:59 एक व्यक्ति बिल्कुल स्थिर बैठा है दूर से कोई देखेगा तो लगेगा मूर्ति है कोई जड़ मूर्ति है ले व्यक्ति 00:17:07 स्थिर है एक व्यक्ति जड़ है तमोगुण से परिणाम आता है वह जड़ता है सत्व गुण से स्थिरता आती 00:17:17 है जिसको जानकर कोई मत हो जाए स्थिर हो जाए गीता में भगवान स्थित प्रज्ञ कहते हैं उसको सुख दुख 00:17:27 में 00:17:28 दुख में अ जो डोलता नहीं जैसे श्री धुप दास जी कह रहे सुख पाए फूले नहीं दुख पाए बिल 00:17:33 लाए बोले जिसको जानकर कोई स्थिर मति हो जाए स्थित प्रज्ञ हो जाए यवा मतो भवति सबसे पहले तो भाई 00:17:41 आनंद मिले जिसको जानकर आनंद 00:17:46 मिले कितने आनंद की बात है संत के मुख से जब आप ये सुनते हो भाई नहीं आप प्रभु के 00:17:51 हो प्रभु आपके हैं आज तक भाई इसी संसार को अपना समझे बैठे थे इतनी सी बात 00:17:58 इतनी सी बात ही तो पुड़िया में बांध कर दी थी रदास जी महाराज ने तभी तो मीरा जी कह 00:18:02 रही है गुरु मिला रदास जी दीनी ज्ञान की गु मीरा जी ने पूछा था कैसे हो जाएंगे यह मेरे 00:18:13 अरे दस जी ने कहा बेटा तू तो इन्हीं की है मीरा जी ने पूछा यह कैसे होंगे मेरे और 00:18:21 गुरु ने कहा तू पहले से ही इन्हीं की है बस इनका गुण 00:18:27 गाना 00:18:30 इतनी सी बात गुरु के मुख से सुनी आनंद आ गया आनंद आ गया गुरु के मुख से राम नाम 00:18:39 सुना कबीर सारी काशी में नाच रहे हैं राम नामी ओड़कर और कहत कबीर सुनो भाई साधो मन का सन 00:18:49 से भागा नाम रंग लागा मई राम रंग नागा 00:18:58 नाम रंग लगा मई नाम रंग ना जानकर आनंद आ गया मन के सन से दूर हुए मन आनंद मगन 00:19:13 अरे कबीर जी की जीवनी में तो यह लिखा है कि राम नामी ओड़कर कबीर नाच रहे हैं और वहां 00:19:19 ठाड़ी रोवे कबीर की माई राम नामी ओड़कर कबीर उस मोहल्ले में आ गए हैं सारे 00:19:28 यवन रहते हैं वहां माथे पर तिलक है अब ऐसे तो कबीर बड़े अलमस्त महापुरुष है पर उस दिन उस 00:19:37 दिन की उमंग कुछ और थी सीताराम सीताराम लिखाए माथे पर तिलक है राम राम राम करते आ गए कबीर 00:19:46 नाचते गाते य ज्ञात मव भवती मां रो रही है बोले अरे तो मोहल्ले में नहीं रहने देंगे हमें ठाड़ी 00:19:57 रोवे 00:19:58 कबीर की माई हे लड़का क्यों जपे रघुराई अ क्यों य लड़का राम का भजन करने लगा भाई अब खुदा 00:20:13 के कुफ्र से कौन बचाएगा हमको डर गई माता डर गई और कबीर गाते हैं कहे कबीर कोई संग ना 00:20:25 साथ जल थल रा 00:20:29 रहे रघुनाथ हमको पता चल गया हमारा हमारा स्वामी हमारा रक्षक कौन है गुरु ने बता दिया है गुरु ने 00:20:36 जना दिया है और उसको जानते ही हर मरे तो हम मरे हमरी मरे बला साचे गुरु का बालका मरे 00:20:54 ना मारा जाए कबीरा 00:20:58 मरे न माराजा यहां ये कह रहे वेदम वेदम वास्तव मत्र वस्तु शिवम ताप मूलन जानने योग्य क्या है जिसको 00:21:10 जानकर आनंद हो इसको जानकर परम शांति की प्राप्ति हो मन की दौड़ भाग समाप्त हो जाए जिसको जानकर वह 00:21:19 जानने योग्य है संसार की कोई किताब पढ़ो मन की दौड़ भाग और बढ़ जाती है बढ़ जाती है कि 00:21:26 नहीं बढ़ जाती 00:21:30 बोलो हां बताता हूं कैसे जब तक व्यक्ति कुछ नहीं जानता है पड़ा रहता है दो चार बात समझ में 00:21:36 आ जाए तो हमारी तरह समझाने निकल पड़ता है चार किताब और पढ़ ले फिर तो कहना ही क्या है 00:21:45 ध्यान रखना भाई जीवन में संत नहीं होगा तो बुध जनों का ऐसा कहना है कि विद्या विवादाय धन 00:21:59 मदाय शक्ति परेशान पर पीड़ना और लस साधो विपरीत में त ज्ञाना दाना च रक्षण अगर जीवन में संत नहीं 00:22:12 होगा जीवन में हरि की भक्ति नहीं होगी तो विद्या अर्जित करके क्या करोगे बोले विवाद करोगे विद्या विवाद आए 00:22:20 धन मिलेगा तो क्या करोगे बोले धन मिलेगा तो उन्मत हो जाओ शक्ति मिलेगी तो क्या करोगे दुर्बल को दन 00:22:27 को 00:22:28 अगर जीवन में भक्ति ना हुई जीवन में संत ना हुआ गुरु ना हुआ लिए विद्या विवाद में जाकर लगेगी 00:22:36 धन उन्माद बना देगा शक्ति आतताई कर देगी और इससे विपरीत लस साधो विपरीत मेत ज्ञाना दाना च रक्ष जीवन 00:22:53 में संत हुआ तो बताएगा भाई विद्या का फल विवाद नहीं है 00:22:59 किसी के किसी के अज्ञान भरे अंधकार भरे जीवन में ज्ञान का दीपक जलाना किसी को सन्मार्ग पर लाना आप 00:23:07 जपे रा नाम 00:23:13 जपा धन हो फिर सेवा करना दान आए और शक्ति हो तो रक्षण आए किसी दीन दुखी की रक्षा करना 00:23:24 उसकी सहायता करना उसका सहयोगी बनना उसका उसका अवलंब बनना 00:23:34 यहां जो यह शब्द भगवान वेदव्यास क रहे विद्यम जानने योग्य जानने योग्य वही है वही एक नहीं तो भाई 00:23:44 यहां कुछ भी जानोगे कहीं और चल 00:23:50 पड़ोगे मुझे याद आ रहा है कुछ समय पहले इसी एक हमारे बालक ने 00:23:57 मेरे पास में मुझे कहा मुझे बात बहुत अच्छी लगी उसने कहा कि बस ये जो आपने थोड़ा सा हमको 00:24:05 बता दिया है ना ये हमारे हैं हम इनके हैं अब इसके अलावा कुछ और जानना नहीं है हमको जानने 00:24:10 से डर लगता है और कुछ जानना नहीं चाहते हैं क्यक जो भी कुछ अन्य जानना है वह मन में 00:24:15 मन में उत्पाद करता है भाई व मन में विक्षेप करता है मैं तो आपको अपना एक अनुभव बता रहा 00:24:23 हूं कि जब संगीत शास्त्र का बिल्कुल 00:24:28 ज्ञान नहीं था तब कोई ऐसे भाव में भर कर भी गा रहा होता था हमको लगता था कितना बढ़िया 00:24:34 है हम भी उसका आनंद ले लेते थे थड़ी दो चार बात हमको समझ में आ गई तब सामने वाले 00:24:41 में कोई गलती हो तुरंत समझ में आती बो हा तो गलती हो गई अब उस गलती होने से हुआ 00:24:48 क्या व तो गलत है ही तुम तो उसको ठीक कर नहीं सकते हुआ क्या तुम्हारे रस में बिरस हो 00:24:55 गया तुम नहीं जानते थे तो 00:24:57 आनंद लेते थे चार बात समझ में आ गई तो यहां वहां दोष दिखाई पड़ता है दोष दर्शन होता है 00:25:07 अब क्या करें कुछ जाने ही नहीं सब जानिए पर जानने से पहले यह जान लीजिए सब जानिए पर जानने 00:25:16 से पहले यह जानना बड़ा आवश्यक है सोई कवि को विध सोई रण धीरा जो छल छ 00:25:29 भज 00:25:32 रघुवीरा जो छल छाड़ भज जितनी भी विद्या हैं इन सबकी सफलता भगवान के चरणों में पहुंच जाने में है 00:25:45 बस य पहले यह जान 00:25:49 लीजिए भगवान के बिना तो भाई कोई भी कोई भी वस्तु किसी भी प्रकार का ज्ञान 00:25:58 कोई भी कर्म अंत में उत्पात का ही कारण बनता है तो बड़ी सुंदर बात यहां भगवान वेदव्यास ने क 00:26:07 आरंभ में ही लिए हम इसमें निरूपण करेंगे निष्कपट धर्म का धर्म प्रित कत परमो निर्म सराणा सता और निर्म 00:26:21 सर विशुद्ध अंतःकरण वाले जो संत है उनके जानने योग्य जो वस्तु है उसकी बात हम इस इस ग्रंथ में 00:26:27 करेंगे 00:26:30 और वस्तु कैसी है शिवद शिवम ददा शिवम शिव अर्थात कल्याण जो कल्याण कराने वाली है भगवान शंकराचार्य कहते हैं 00:26:44 ना चिदानंद रूप शिवोहम 00:26:50 शिवोहम तो मैंने देखा एक बार कोई अपने ही सर पर बेलपत्र चढ़ रहे हैं पीछे ये बज रहा है 00:26:57 चिदानंद 00:26:58 शिह शि भगवत पाद शंकराचार्य का य ये विचार नहीं है मनो बुद्धि रंकार चित्तानी नाह नच शोत्र जिन च 00:27:09 ग्राण नेत्र न भूमि नमस न तेजो न वायु चिदानंद रूप शिवोहम शिव वो तो अपने कल्याण की उद्घोषणा कर 00:27:20 रहे हैं ब्रम ब्रम भवति सोई जाने देहु जनाई जानत तुम तुम होई जाई 00:27:28 मंगल स्वरूप कल्याण स्वरूप प्रभु को जानने वाले का भी तो मंगल हो जाता है उसका भी तो कल्याण हो 00:27:34 जाता है यहां तो निर्वाण टक में भगवत पाद शंकराचार्य अपने कल्याण की उद्घोषणा करे भाई हमारा कल्याण हो गया 00:27:41 है हमारे सब भ्रम दूर हो गए हैं हमको वह विमल ज्ञान प्राप्त हो गया 00:27:50 है तो हम एक एक शब्द पर चर्चा कर रहे विद्यम जानने योग्य वस्तु जानने योग्य वस्तु कौन सी है 00:27:57 सबसे पहले तो जिससे जिसको जानकर आनंद हो आनंद हो मन का विक्षेप बड़े नहीं शांत हो और फिर स्थिरता स्थिरता 00:28:13 की प्राप्ति हो मतो भवति स्तब्ध भवति अंत में देवऋषि कहते हैं आत्मा रामो भवती आत्मा रामो भवती 00:28:27 राम भवती अर्था जो असंग हो जाए कोई पूछे ना सत्संग का फल क्या है किसलिए किया जाना चाहिए सत्संग 00:28:38 सत्संग सिखाता है सबके संग रहते हुए असंग कैसे रहना है यही सत्संग का फल है सबके संग रहते हुए 00:28:45 असंग कैसे रहना है सबके संग तो रहना ही पड़ेगा भाई हम संसार में हैं सबके संग रहना पड़ेगा सबके 00:28:55 संग भी रहना पड़ेगा 00:28:58 और सौहार्द से रहना पड़ेगा नहीं तो फिर अपने लिए कांटा बो दोगे सबके संग रहना पड़ेगा इस भाव से 00:29:09 रहना पड़ेगा सोई सेवक जाके असी मति न टई हनुमंत मैं सेवक स चराचर रूप राशि 00:29:26 भगवन 00:29:31 जिसको जानने से पहले तो आनंद हो स्थिरता की प्राप्ति हो और व्यक्ति असंग हो जाए जीवन में जितने दोष 00:29:41 आते हैं वो संग से ही आते हैं जितने दोष जीवन में आते हैं व संग से ही आते 00:29:51 हैं और तत्वज्ञान 00:29:58 शरीर निज जा में भरे विकार कुछ ऐसा हो जिससे जिसे बार-बार मिलने वाले इस इस इस शरीर से भी 00:30:09 पीछा छूट जाए हम अपने अपने सहज स्वरूप में अपने वास्तविक स्वरूप में हमारे आचार्य के अनुसार हम अपने सखी 00:30:16 स्वरूप में स्थित हो जाए इस पंच भौतिक देह से कुदे हज जो मल है उससे उससे भी तो छुटकारा 00:30:26 हो सबसे 00:30:27 ड़ कुसंग तो यही 00:30:31 है मीरा जी इसी का ही तो अनुभव कर रही है जब कहती है कहा करू कछु बस नहीं मेरो 00:30:44 पाख नहीं उड़ जावन 00:30:51 की पाख नहीं उड़ जाव 00:31:00 कह रहा है ना कोई प्राण पिंजरे में कैद मन सांवरिया के पास प्राण है शरीर रूपी पिंजरे में कैद 00:31:14 है प्राण पिंजरे में कैद मन सांवरिया के पास मन सावरिया के पास है यह भी तो कुसंग है 00:31:27 महापुरुषों ने महापुरुषों ने अंत में इस इससे भी तो पीछा छुड़ाने की बात ही तो कही 00:31:42 है वेद्य वास्तव मत्र वस्तु शिवद ताप करयो मूलन ताप का उन्मूलन कर दे जड़ से समाप्त कर दे उनको 00:31:59 उस वस्तु की चर्चा हम हम यहां आगे करेंगे और फिर 00:32:22 साधिकारथा नाम सारम सारम समुद्रत 00:32:32 एक बात यहां से समझनी है श्रीमद् भागवत क्यों श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें निष्कपट धर्म की बात की गई निष्कपट 00:32:40 धर्म माने निष्काम 00:32:44 भक्ति और य उसी को प्रदान करने वाली है य स्याम शु मायाम कृष्ण परम पुरुष भक्ति य उसी विशुद्ध 00:32:53 भक्ति को प्रदान करने वाली भी है 00:32:57 श्रीमद भागवत महामुनि कृते किवा परवर सद दते कति 00:33:09 शना भाई इसकी महिमा सुन लो इसको जानने की इच्छा मात्र होते ही ध्यान से सुनना मैं श्लोक का 00:33:25 अदार्थी इच्छा 00:33:27 मात्र होते ही सद्य हृद्य रुते मेने भगवान हृदय में बंदी बनकर बैठ जाते हैं भागवत में प्रवेश करने से 00:33:40 पहले भागवत का प्रसाद बता रहे हैं भाई क्या क्या इसकी महिमा है क्यों ये श्रेष्ठ है क इसको जानने 00:33:48 की इच्छा भी हो जाए केवल मन में इच्छा हो कि हम भी श्रवण करें हम भी जाने फ केवल 00:33:54 इतनी इच्छा से ही भगवान हृदय में आकर बैठ जाते हैं 00:33:58 ये ये इसका इसका परम प्रसाद है फिर भगवान वेदव्यास कह रहे हैं तत क्षणात उसी क्षण आज जहां से 00:34:10 चर्चा आरंभ हुई देखो भाई संपत्ति तो श्रद्धा और विश्वास है महापुरुषों के वचनों में शास्त्र के वाक्यों में जितनी 00:34:18 श्रद्धा जितना विश्वास होगा उतना उसका फल प्रत्यक्ष 00:34:24 होगा इसलिए मैंने कहा 00:34:27 साधन करके अर्जित क्या करता है कोई श्रद्धा और विश्वास ही अर्जित करता 00:34:34 है एक है जो ठीक से सुन ही नहीं पा रहा है एक है सुनता तो है पर समझता नहीं 00:34:41 है पर एक है सुनते ही ग्रहण करता है श्रुति धर है सुना और ग्रहण कर लिया जय श्री हित 00:34:49 हरिवंश लाल ललना मिल हियो सरावत मोर नवल दस जी के मुख से व्यास जी ने सुना सुनते ही व्यास 00:34:55 जी ने कहा कि भाई 00:34:56 कि प्रेम की ऐसी अद्भुत अलौकिक अनिर्वचनीय स्थिति यह शब्द किसके हैं केवल सुना समझ गए भाई यह यह कौन 00:35:05 से धरातल पर कोई कोई कह सकता है गा सकता है दौड़कर आ गए पीछे मुड़कर देखा ही नहीं नवल 00:35:12 दस जी ने कहा चलेंगे वृंदावन बोले चलेंगे नहीं चलिए अभी चलिए और दौड़कर आ गए क्यों क्योंकि उनके पास 00:35:21 श्रद्धा और विश्वास की संपत्ति 00:35:25 है 00:35:26 उजला करती है मन जो श्रद्धा है मन को उजला करती है श्रद्धालु व्यक्ति सहज ही कृपा का पात्र हो 00:35:35 जाता है हम देखते हैं अपने जीवन में अनुभव करते हैं कभी-कभी कोई श्रद्धालु होता है उसका हमारा कोई परिचय 00:35:42 नहीं है कोई परिचय नहीं है श्रद्धालु है बस ऐसी कई मिला लेकिन बड़ी श्रद्धा से उसने प्रणाम किया है 00:35:50 उसके प्रणाम को देखकर सहजी मन से मन से एक शुभ कामना एक मंगल कामना 00:35:57 हो जाती उसकी श्रद्धा को देखकर उसकी श्रद्धा ने ले लिया आशीर्वाद बिना किसी परिचय के उसकी श्रद्धा ने आशीर्वाद 00:36:04 ले लिया पात्र बनाती है श्रद्धा उज्जवल श्रद्धा भगवत कृपा का पात्र बनाती 00:36:17 है तो क ऐसी वस्तु का इसमें निरूपण हुआ है जो जानने योग्य है शिव दम कल्याण करने 00:36:27 ताप त्रयो मूलन और जीव के तित ताप को नष्ट करने वाली है आज की वार्ता यही श्री जी के 00:36:35 चरणों में निवेदन करते हैं महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हदत प्रभु को भाव प्रभु को 00:36:55 नमन

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वो जानिये, जिसे जानकार सुख मिले, शांति मिले!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 2 1. केवल प्रभु को चाहो, संसार को नहीं Desire Only the Lord, Not the World 2. सत्संग और श्रवण से चित्त की शुद्धि Purifying the Mind Through Satsang and Hearing https://youtu.be/qinGjpCVjog [00:00:16] प्रभु के अलावा जब भी यह जीव संसार से कुछ पाने की इच्छा करता है, तो वह अनजाने में अपने लिए केवल दुःख की ही व्यवस्था करता है। Whenever the soul desires to obtain anything from the world apart from the Lord, it unknowingly creates nothing but suffering for itself. [00:01:17] मन के पास अपनी कोई बुद्धि नहीं होती, उसे केवल रस चाहिए; इसलिए यदि उसे भगवद-रस नहीं दिया गया, तो वह स्वाभाविक रूप से विषयों के क्षणभंगुर रस की ओर दौड़ेगा। The mind has no intelligence of its own; it only seeks enjoyment. Therefore, if it is not given the divine taste of God, it will naturally run toward the fleeting pleasures of worldly objects. [00:04:18] मनुष्य को संसार या भगवान से कुछ सांसारिक वस्तुएं नहीं मांगनी चाहिए, बल्कि केवल और केवल प्रभु को ही चाहना चाहिए। One should not ask the world or God for worldly objects; one should desire only and only the Lord. [00:05:30] श्रीमद्भागवत में निष्कपट धर्म यानी विशुद्ध और उत्तम भक्ति का निरूपण किया गया है, जो संतों के लिए जानने योग्य परम तत्व है। The Srimad Bhagavatam describes sincere religion, meaning pure and exalted devotion, which is the supreme truth worthy of being known by saints. [00:09:29] संसार की व्यर्थ चर्चाएं चित्त में विक्षेप और अशांति लाती हैं, जबकि ईश्वर और सत्य को जानने से हृदय में परम आनंद और स्थिरता का उदय होता है। Useless worldly discussions create distraction and restlessness in the mind, whereas knowing God and the truth brings supreme bliss and stability to the heart. [00:10:31] श्रवण इंद्रिय का चेतना पर सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि जो बात हम सुनते हैं वही आगे चलकर हमारे विचार, संस्कार और स्वभाव का निर्माण करती है। The sense of hearing has the deepest influence on consciousness, because what we hear eventually shapes our thoughts, impressions, and character. [00:12:39] शब्द भी एक प्रकार के मानसिक आहार हैं, इसलिए कुसंग और विषैली बातों से बचकर केवल सत्संग और प्रभु कथा का ही श्रवण करना चाहिए। Words are also a form of mental nourishment. Therefore, one should avoid bad company and toxic speech and listen only to Satsang and the stories of the Lord. [00:22:12] जीवन में संत और भक्ति के बिना अर्जित की गई विद्या केवल विवाद और अहंकार को जन्म देती है, जबकि सद्गुरु के सान्निध्य में विद्या कल्याणकारी बन जाती है। Knowledge acquired without saints and devotion in life gives rise only to arguments and ego, whereas knowledge gained in the company of the Sadguru becomes beneficial and spiritually uplifting. [00:28:38] सत्संग का वास्तविक फल यह है कि वह मनुष्य को संसार के सभी बंधनों और लोगों के बीच रहते हुए भी अंतर्मन से असंग और शांत रहना सिखाता है। The true fruit of Satsang is that it teaches a person to remain inwardly detached and peaceful while living amidst all the bonds and people of the world. [00:33:27] श्रीमद्भागवत की महिमा इतनी अद्भुत है कि इसे श्रद्धापूर्वक सुनने या जानने की मात्र इच्छा करने से ही भगवान उस भक्त के हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं। The glory of the Srimad Bhagavatam is so extraordinary that merely listening to it with faith, or even desiring to know it, causes the Lord to come and reside in the heart of that devotee. https://youtu.be/qinGjpCVjog