Sunday, August 2, 2026

कैसे जानूँ कि मैं कौन हूँ? किसका हूँ? Who am I? Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कैसे जानूँ कि मैं कौन हूँ? किसका हूँ? Who am I? Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given

https://youtu.be/2BNRwabK5dc

00:22 माया के प्रभाव और अज्ञान के कारण जीव अनंत जन्मों से यह भूल चुका है कि वह वास्तव में कौन है और उसका वास्तविक संबंधी कौन है। 04:19 मायाबद्ध होने के कारण मनुष्य स्वयं यह सत्य नहीं जान सकता, इसलिए केवल निर्दोष और प्रामाणिक वेद-वाणी ही इस रहस्य को स्पष्ट करती है। 08:16 वेद और शास्त्र प्रमाणित करते हैं कि प्रत्येक जीव परमात्मा का ही नित्य अंश, पुत्र और उनकी शक्ति है। 11:25 भौतिक संसार और माया पूरी तरह 'जड़' हैं, जबकि जीव 'चेतन' है; अतः चेतन जीव का सच्चा संबंध केवल परम चेतन भगवान से ही हो सकता है। 14:21 भगवान ही जीव के एकमात्र निस्वार्थ सखा हैं, जो हर जन्म में साथ रहकर बिना किसी स्वार्थ के हमें शक्ति और कर्मफल प्रदान करते हैं। 16:46 जिस प्रकार समुद्र की तरंगें समुद्र से ही उत्पन्न होती हैं और उसी में लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार जीव का शाश्वत अस्तित्व केवल भगवान से ही जुड़ा है।

Full Transcript :

00:02 राधे  00:07 मैं किसका हूं मेरा कौन है  00:18 यह बात  00:22 अनंत जन्म बीट जान पर भी मैंने नहीं समझी  00:31 मेरा कौन है मैं किसका हूं कहां से आया हूं और  00:52 जानू स्वयं असंभव क्योंकि मेरे ऊपर  01:11 अंधकार  01:15 अग्न्यानेना अमृतम ज्ञानम  01:21 समस्त जीवन पर माया का अधिकार है भयम द्वितीय  01:35 दिशा  01:41 मिलती  01:45 माया के करण माटी विप्राज्य हो गया है बुद्धि का ज्ञान चला गया है मैं कौन हूं मेरा कौन है  02:01 मैं किसका हूं सब भूल गया  02:14 इसको कौन बताया किसी जीव पर तो हम विश्वास करेंगे नहीं क्योंकि  02:38 लोग कहते हैं तुलसीदास सूरदास मीरा कबीर नानक तुकाराम ये सब संत है इनमें आज्ञा नहीं हुई खबर है उड़ी  02:53 पड़ी खबर है लिखी पड़ी खबर है हमारा हृदय हमारी बुद्धि कैसे स्वीकार कर ले भगवान अगर का दे मैं  03:11 किसका हूं मेरा कौन है वो बता दे अगर तो हम मां लेंगे क्योंकि भगवान के ऊपर माया का अधिकार  03:20 नहीं हो सकता है  03:38 जमाना  03:56 ही अधिकार सूरज के समाज श्री कृष्णा है प्रकाशक स्वरूप भेड़ हमें तम पुरुष महानतम आधिक्य वर्ण आदित्य वर्णन तमाशा  04:14 परस्तात  04:19 भगवान कहां से आएंगे बताने के लिए फिर हम कैसे जान हम किसके हैं हमारा कौन है  04:33 एक रास्ता है वेद  04:40 निष्ठा  04:43 है भगवान की वाणी है जाति सहज स्वास्थ्य प्यारी  04:57 भेद वाणी गलत नहीं हो शक्ति मिथ्या नहीं हो शक्ति  05:13 जो माया बद्दू में दोष होता है आज्ञा वगैरा यह सब वेद में नहीं है वह भेड़ ब्रह्मात्मा विषय  05:33 इमेज  05:38 अध्याय का 35वां श्लोक वेद ब्रह्म के समाज है जैसे ब्रह्म मायतित है मायाधीस है नित्य शुद्ध मुक्त आत्मा है  05:59 परमात्मा ऐसे ही वेद  06:08 लेकिन  06:11 वेद को भी जानना यह मायावती जी के लिए असंभव है यहां तक की ब्रह्मा के लिए असंभव था जब  06:30 वेद प्रकट हुए प्रकट हुए जैसे ब्रह्मा प्रकट हुए नाही से ऐसे विश्वास से वेद प्रकट हुए  06:48 बनाया नहीं गए लिखे नहीं गए  06:55 तो ब्रह्मा ने देखा वेदों को नहीं समझ सका  07:03 क्योंकि अलौकिक वाणी है वेद कल नाश्ता कर ले वाणी वेद संगीत  07:25 ब्रह्मा को मैंने बताया प्रकट किया  07:40 तो भगवान ने अपनी योग माया की शक्ति से ब्रह्मा की बुद्धि में प्रवेश करके उसको वेद का ज्ञान कराया  07:58 इसलिए वेद विशुद्ध और निर्दोष निर्भरण कोई डाउट नहीं उससे पता चलेगा उसे वेद को जन वालों के द्वारा हम  08:16 किसके हैं तो वेद कहता है  08:25 की हम  08:30 भगवान के हैं अमृता सवाई पुत्र वधू  08:41 सब उसके अंश है  08:54 ओम सक्रीतम सब उसके अंश है उसके पुत्र है उसकी शक्ति है जिसे गीता कहा  09:54 यह  10:14 मैं जीवन का सब कुछ और कोई नहीं है जीव का रिश्तेदार केवल मैं हूं केवल मैं यह बात जो  10:29 जान लेट है वो वेदव्यास लिख रहा है  11:25 और माया यह जड़ है जैसे तकिया जड़ मैं उसके शरीर है ना इंद्रिय है ना मां है ना बुद्धि  11:36 है कुछ नहीं  11:44 तो जड़ से तो हमारा कोई नाता हुई नहीं सकता क्योंकि हम उसके उल्टा है चेतन और चेतन भगवान के  11:54 शिव और कोई है नहीं तत्व तो है इसलिए हमारा संबंधी केवल भगवान ही है माया हो ही नहीं सकती  12:09 और माया का कोई समान भी नहीं हो सकता  12:20 इसलिए  12:38 यानी भगवान से हमारा  12:43 साझट संबंध सक्षम बंधन  13:36 एक ही जगह दोनों  13:41 और सजा के साथ  13:53 शाखा मैन पापा निवारण  14:00 हिताय जो हमारा हितेषी हो बिना उपकार चाहे  14:09 निस्वार्थ भाव से जो हमारा  14:21 इतनी चिंता करते हैं की मां के पेट में डालने से लेकर और सदा जहां हम गए हमारे साथ रहकर  14:38 हमारी इंद्रियों में मां में बुद्धि में त-तक कर्म करने की शक्ति लगातार दे रहे हैं जहां तक आत्मा में  14:51 भी चेतन शक्ति वेद देते रहते हैं जी यानी में हम जाते हैं वो साथ रहते हैं हमारे अनंत जनों  15:04 के कर्मों का हिसाब रखते हैं उसका फल देते हैं वर्तमान जन्म के कर्म का भी हिसाब रखते हैं ये  15:20 सब बिना कहे ऐसा हमारा शाखा  15:28 अब सज्जाद से संबंध भी है वो भी चेतन है हम भी चेतन है  15:39 जो अक्षर  15:44 हम इस में रहते हैं  15:51 यहां तक वेदों ने का दिया  16:14 रिश्तेदारी  16:17 जो हम लोग एक्टिंग में कहते हैं मम्मी पापा बीबी पति से जोकरी करते हैं ना हम लोग हम दोनों  16:29 एक है  16:35 समुद्र की तरंग से जो रिश्तेदारियां  16:46 कोई तरंग समुद्र से भिन्न नहीं पैदा होती और नलिन होती है  16:56 तरंग पैदा होगी समुद्र में ली होगी ऐसे ही तो भाई मेरी भूतनी जयंती

Saturday, August 1, 2026

मन के रोग और उनकी औषधि | The Diseases of the Mind and Their Remedy by Shri Hit Ambrish ji

मन के रोग और उनकी औषधि | The Diseases of the Mind and Their Remedy by Shri Hit Ambrish ji

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given
1. मन के रोगों से मुक्ति का एकमात्र उपाय | The Only Remedy for the Diseases of the Mind 2. राम कृपा और सद्गुरु की औषधि | The Remedy of Rama's Grace and the Sadguru
https://www.youtube.com/watch?v=DZ_L5fVr508 [00:00] - [01:30] तन बीमार हो तो भी भक्ति संभव है, लेकिन यदि मन रोगी हो जाए, तो आध्यात्मिक मार्ग पर चलना असंभव हो जाता है। Even if the body is ill, devotion is still possible, but if the mind becomes diseased, it becomes impossible to walk on the spiritual path. [01:38] - [03:00] काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और राग-द्वेष को मन के रोग बताया गया है। यज्ञ, तप, दान आदि से भी ये रोग पूरी तरह नष्ट नहीं होते। Lust, anger, greed, attachment, jealousy, and attraction-aversion are described as diseases of the mind. Even sacrifices, austerities, charity, and similar practices do not completely destroy these diseases. [04:15] - [05:30] मनोरोगी कभी स्वीकार नहीं करता कि वह बीमार है। बाहरी लाभ-हानि के चक्कर में अपने भीतर के मन को मैला नहीं करना चाहिए। A person suffering from a mental disease never accepts that he is ill. One should not pollute the inner mind while becoming caught up in external gain and loss. [06:56] - [08:10] बिखरे हुए मन को समेटना राई के दानों को समेटने जैसा कठिन है। भजन के लिए मन का स्वस्थ और शांत होना अनिवार्य है। Gathering a scattered mind is as difficult as gathering mustard seeds. For devotion, it is essential that the mind be healthy and peaceful. [08:14] - [10:30] संसार की वस्तुओं से सुख की इच्छा ही मन को दुर्बल बनाती है। महाराज जी 'मनोरथ' इच्छाओं को हृदय में गड़ा हुआ कांटा बताते हैं। The desire for happiness from worldly objects is what makes the mind weak. Maharaj Ji describes 'Manorath', or desires, as thorns embedded in the heart. [11:40] - [14:30] जो भाग्य में लिखा है उसे कोई नहीं बदल सकता। "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" के भाव को अपनाने से ही शांति मिलती है। No one can change what is written in one's destiny. Peace comes only by adopting the feeling expressed in "Hoihi Soi Jo Ram Rachi Rakha." [18:20] - [20:00] सत्संग के माध्यम से ही व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को पहचान पाता है। दोष दूर करने के लिए प्रभु के सामने छटपटाना और रोना आवश्यक है। It is through Satsang that a person is able to recognize the faults within oneself. To remove these faults, one must yearn before the Lord and cry out to Him. [31:00] - [33:00] राम कृपा ही एकमात्र औषधि है। इसके लिए 'सद्गुरु' रूपी वैद्य की आवश्यकता है और उनकी वाणी वचन पर अटूट विश्वास ही इलाज है। The grace of Lord Rama is the only remedy. For this, a physician in the form of a Sadguru is needed, and unwavering faith in their words is the treatment. [33:50] - [36:00] औषधि के साथ परहेज जरूरी है। यहाँ परहेज का अर्थ है—सांसारिक विषयों से सुख की आशा का त्याग करना। Along with the medicine, restraint is necessary. Here, restraint means giving up the expectation of happiness from worldly objects. https://www.youtube.com/watch?v=DZ_L5fVr508 ---
Full Transcript


00:00:00 छह प्रश्नों के बाद सातवां प्रश्न श्री गरुड़ जी ने पूछा है मानस रोग कह ह समझा 00:00:11 आई क्योंकि श्री गरुड़ जी स्वयं भी इसी मानस रोग से ही पीड़ित होकर आए थे तन तो स्वस्थ था 00:00:18 मन रोगी हो गया था मन अस्वस्थ हो गया था और यह मार्ग ऐसा है 00:00:30 कि तन स्वस्थ हो तो उत्तम ना 00:00:37 हो तो भी व्यक्ति साधन में प्रवृत्त रह सकता है पर मन अस्वस्थ हो जाए मन रोगी हो जाए फिर 00:00:48 इस मार्ग पर गति संभव नहीं है हाथ में माला हो कोई और कार्य हो पर ध्यान रखना सेवा स्मरण 00:01:00 का कार्य मुख्य रूप से तो मन ही कर रहा है मन ही करता है और मन के किए ही 00:01:05 होता है तो तन प्रारब्ध वसाद रुग्ण हो भी जाए तो भी साधन संभव है पर मन रोगी हो जाए 00:01:18 तो साधन संभव नहीं है एक क्षण के लिए भी संभव नहीं है तो गरुड़ जी को भी मन का 00:01:25 ही रोग हुआ था 00:01:30 में गरुड़ जी ने बात पूछी मानस रोग कहु समझाई श्री गरुड़ जी ने पूछा कि मानस रोग कितने हैं 00:01:38 कैसे हैं तो श्री गोस्वामी जी ने कहा भाई ऐसे काम है क्रोध है लोभ है मोह है ईर्ष है 00:01:45 राग है द्वेष है हर्ष है विषाद है ऐसे अनेक अनेक रोग श्री गोस्वामी जी ने गिना दिए फिर अंत 00:01:51 में क्या कह रहे हैं नेम धर्म आचार तप ज्ञान जप 00:01:59 जप दान भेषज पुनि कोटिन नहीं रोग जाही हरि जा क नियम धर्म आचार तप ज्ञान यज्ञ जप दान 00:02:23 क और भी करोड़ों औषधियां है प्रका बसन जी कह रहे हे गरुड़ जी लेकिन उनसे 00:02:29 य रोग जाते नहीं सार की बात यहां यहां गोस्वामी जी कह रहे कि अनेक अनेक मानस रोग है अनेक 00:02:38 अनेक विकृतियां है क कितनी कहू आपसे अनेक अनेक रोग है पर कय जितने भी सब साधन है अब देखो 00:02:46 एक प्रकार से सभी कुछ तो कह दिया श्री काग सुंडी जी ने कहा कि नियम धर्म आचार तप ज्ञान 00:02:55 यज्ञ जप दान और और भी जितनी औषधिया है 00:02:59 लीजिए तो क भाई उनसे यह रोग जाते नहीं 00:03:05 फिर कैसे जाते हैं यही विधि सकल जीव जग रोगी शोक हरस भय प्रीति वियोगी मानस रोग क छुक 00:03:25 में गाए हो ही सबके 00:03:32 लखर एक प्रश्न खड़ा होता है गरुड़ जी ने पूछा क्यों यह प्रश्न मानस रोग समझा कर कहिए और फिर 00:03:40 क्या कह रहे हैं गरुड़ जी मानस रोग कह समझाई मुझे समझाकर कहिए उसका कारण है कि आप में हम 00:03:49 सब हमारा शरीर भले स्वस्थ हो पर जो हमारा मन मानस है ना वह तो अस्वस्थ ही है जितने जीव 00:03:57 है सब किसी ना किसी मानसिक व्याधि 00:03:59 से किसी ना किसी मानसिक रोग से पीड़ित है इसीलिए कह रहे ही विधि सकल जीव जग रोगी सभी रोगी 00:04:08 है अच्छा और मन का रोग जिसको होता है ना उसकी विडंबना क्या है कि जो मनोरोगी होता है व 00:04:15 सबसे पहले तो अपने आप को रोगी मानता नहीं आप ऐसे भी आप किसी में ऐसा कोई लक्षण देखो और 00:04:24 आप कहो कि चलो तुम्हें एक मनो चिकित्सक के पास लेकर जाते हैं वो आपको मारने दौड़ेगा कि अच्छा आप 00:04:29 हमें पागल समझते हैं पागल हूं क्या मैं मैं क्यों जाऊंगा मैं मन के डॉक्टर के पास क्यों जाऊं मैं कोई पागल 00:04:36 हूं वो आपको मारने दौड़ेगा मनोरोग की यही विडंबना है कि जिसको मनोरोग होगा वोह कभी अपने आप को रोगी 00:04:46 मानेगा ही नहीं औषधि से दूर भागेगा चिकित्सक उसको औषधि देगा वो औषधि से ही दूर भागेगा इसलिए भाई यहां 00:04:57 संत कह रहे हैं कि तन रोगी हो जाए 00:04:59 तो चिंता नहीं करना औषधि करना स्वस्थ हो जाओगे पर ध्यान रखना मन रोगी नहीं हो जाए कभी आपसे पहले 00:05:06 भी मैंने कहा था भाई बाहर कुछ बनाने के लिए भीतर का खेल बिगाड़ मत बैठना बाहर के हानि लाभ 00:05:13 को देखते हुए कहीं कहीं अपना मन ना बिगाड़ बैठना मन मलीन ना हो जाए मन मैला ना हो जाए 00:05:19 कल भी हम इसी बात पर चर्चा कर रहे थे ऐसा कुछ ना हो जाए कि हमारा मन ही भजन 00:05:24 के योग्य ना रहे बाहर की सारी क्षति पूर्ति हो जाएगी 00:05:29 और एक और बात बाहर जो भी लाभ और हानि है ना वो आपके मेरे हाथ में नहीं है सुनहु 00:05:38 भरत भावी प्रबल बहसी कहहु मुनि ना हानि लाभ जीवन मरण जस अप जैस विधि हाथ जैस अप जैस 00:06:01 सुने भरत भावी प्रबल बहसी कहे मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ अपनी ओर से तो 00:06:12 भाई अपनी हानि का इंतजाम कोई नहीं करता फिर भी हानि होती है मैं तो कहता ही हूं कि सीख 00:06:21 सको तो अपने आसपास होने वाली घटनाओं से सीखो देखो कि जिस बुद्धि से व्यक्ति कमाता है उसी बुद्धि के 00:06:29 द्वारा लिए गए किसी निर्णय से व्यक्ति गवा भी देता है अपने हाथ में नहीं है महादेव तो यहां तक 00:06:36 कह रहे हैं जिही जस जग रघुपति करही सोते ही छिन तस हुई तो बाहर का लाभ बाहर की हानि 00:06:46 इसके लिए भाई अपनी वास्तविक हानि ना करा बैठना और ध्यान रखना बिखर मन सिमट नहीं बिखर मन सिमट नहीं 00:06:56 आपको एक उदाहरण दिया था मैंने याद है आपको 00:06:59 कि राई के दानों की पोटली बांधी उनको बिखेर दीजिए उस पोटली को बिखेर देने में कितना समय लगा एक 00:07:08 क्षण अब कोई कहे आपसे भाई इसको समेट लो समेटना सरल नहीं है और पूरा पूरा तो कोई समेट भी 00:07:17 नहीं पाएगा समेटना सरल भी नहीं है बहुत कठिन है और पूरा पूरा तो मुझे लगता है समेट पाना लगभग 00:07:24 असंभव ही है कोई ना कोई दाना छूट ही जाएगा कोई ना कोई दाना रह जाएगा 00:07:30 क बिखर मन सिमट नहीं तो भाई देखना मन ना बिखर जाए मन की हानि ना हो जाए मन अस्वस्थ 00:07:37 ना हो जाए यही बात तो श्री ध्रुव जी की मां ने कही ध्रुव जी से जब जा रहे थे 00:07:41 भजन करने कहा बेटा पहले अपनी छोटी मां को प्रणाम करके जाना अगर उसके लिए मन में कोई अभाव लेकर 00:07:47 जाता है अगर उसकी अवहेलना का कोई भाव तेरे मन में रहा तो तू इस मार्ग पर चल नहीं पाएगा 00:07:52 कोई कांटा मन में गड़ा रहा फय ये ये मार्ग फिर तेरे लिए सहज सुगम नहीं होगा उसको प्रणाम कर 00:07:59 कर जा अपना मन स्वस्थ करके जा स्वस्थ मन से भजन होता है स्वस्थ मन से साधन होता 00:08:07 है मन को दुर्बल कौन बनाता है य बड़ी सुंदर बात गोस्वामी जी कह रहे हैं क जो विषय की 00:08:14 इच्छा है मुझे अमुक व्यक्ति से सुख मिल जाए ये जो कल्पना है मन की है केवल कल्पना इसीलिए इसको 00:08:23 माया जाल कहते हैं ये कैसा माया जाल केवल कल्पना है 00:08:29 अमुक व्यक्ति से सुख मिल जाए यह वस्तु हमारे पास आ जाए तो हम थोड़े शायद सुखी हो जाएं कहीं 00:08:35 वहां चले जाए तो सुखी हो जाएं ऐसे य जो मन कल्पना करता है ना यह क्या करता है य 00:08:40 आपकी आपके मन को दुर्बल करता है कभी मैंने आपसे कहा था य जो व्यर्थ का चिंतन है य आपकी 00:08:45 शक्ति का अपव्यय कराता है अब एक और आप भजन करते हो साधन करते हो थोड़ा बल संचय करते हो 00:08:52 आप और फिर दूसरी ओर क्या होता है व्यर्थ का चिंतन भी चलता रहता है उससे शक्ति का अपव्यय होता 00:08:58 है 00:08:59 इसलिए गति नहीं होती एक कदम आगे नहीं बढ़ पाते हैं कम से कम इस मार्ग पर चलना है तो 00:09:07 सबसे पहले एक प्रबंध तो आप अपने लिए करिए इस बात को समझ लीजिए भाई हुई जो राम रच राखा 00:09:16 को कर तर्क बढ़ाव साखा गा गाकर संत समझा रहे हैं हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाद को 00:09:25 न काऊ सुख दुख कर दाता निज कृत कर्म भोग 00:09:29 भ्राता कितनी बात तो संत कह रहे हैं कि भाई जहां हो अब वहीं पर एक बार संतोष 00:09:40 करो कितने करो मनोरथ माला गोस्वामी जी ने मनोरथ को कांटा बताया लिए मनोरथ कांटा है शूल है यह कांटा 00:09:52 गड़ा हो जहां पग रोगे वही पीड़ा होगी व्यास जी ने कहा ना 00:10:01 व्यास राधिका रमण बिन कहू न पायो सुख डारन डारन में फिरो पात पात दुख कांटा गड़ा है भीतर जहां 00:10:09 पैर रखोगे फूल बिछे हु आपके मार्ग पर लेकिन पांव के भीतर अगर कांटा है हजारों फूल आपके मार्ग पर 00:10:17 बिछे हो पर वो पांव में गड़ा हुआ कांटा आपको चैन नहीं लेने देगा आपका एक एक पग आपको पीड़ा 00:10:24 की अनुभूति कराएगा क्योंकि भीतर कांटा गड़ा है ऐसे मनोरथ को गोस्वामी जी काटा 00:10:29 बता रहे फि ये कांटा है इस कांटे को निकालिए कैसे निकलेगा संत की बात सुनिए वह आपको यही विवेक 00:10:38 देने का प्रयास कर रहा है आप गलत जगह पर परिश्रम कर रहे हैं यहां तो भाई ई जो राम 00:10:43 रचि राखा संत कह रहे हैं कितने करो मनोरथ 00:10:53 माला पर भावी पर परदा 00:11:03 अरे बुद्ध जन तो कहते हैं त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम दव न जानाति कुतो मनुष्य भाग्य में क्या लिखा है 00:11:13 बो तो देवता भी नहीं जानते मनुष्य कैसे जानेगा आप पहुंच जाते हो पंडित जी के पास जन्म कुंडली लेकर 00:11:22 देखो बताओ हमारा क्या होगा अरे तुम्हारा वही होगा जो तुमने किया है 00:11:29 और क्या होगा दूसरा कोई क्या करेगा इसमें जो जस कर तस फल खा जो करके आए हो भाई बोया 00:11:38 पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए कौन बदल देगा भाग्य के खे को कौन बदलेगा ध्यान रखना कान 00:11:46 खोलकर सुन लो पहली बात तो कोई बता नहीं सकता पर भावी पर पर्दा काला सृष्टि को बनाने वाले ब्रह्मा 00:11:56 जी वो विधाता है उनका लिखा 00:11:59 लेख कोई मिटा नहीं सकता केवल महादेव मिटा सकते हैं ऐसा गोस्वामी जी कह रहे भावी मेट स कही त्रिपुरारी 00:12:08 अब ब्रह्मा जी को अपने भाग्य में क्या लिखा पता नहीं है चले ठाकुर जी की परीक्षा लेने उनको पता 00:12:15 नहीं मेरे साथ में क्या होने वाला है अगले एक वर्ष तक क्या चकरघिन्नी मेरी बनेगी उनको यह पता नहीं 00:12:21 है विधाता को नहीं पता मेरे साथ अगले पल क्या हो जाए आगे कहे गोस्वामी जी मच्छर को 00:12:29 एक क्षण में ब्रह्मा और ब्रह्मा को मच्छर से भी हीन कर देने वाले प्रभु बोले जीव की मूर्ता देखो 00:12:35 ऐसे समर्थ स्वामी को छोड़कर जाने किसकिस का भजन करता है कहां कहा सुख खोजता है पहली बात तो कोई 00:12:43 बता नहीं सकता बता भी दे अनुमान भले कोई लगा ले पर बता नहीं सकता और बता भी दे तो 00:12:51 बदल नहीं सकता पहली बात तो बता नहीं सकता है कोई भावी नहीं बता सकता है 00:13:00 और बता भी दे तो बदल नहीं सकता है पुराणों में कितनी कथाएं आती है देवऋषि नारद पहुंचे पर्वतराज हिमाचल 00:13:09 के यहां बता दिया तुम्हारी कन्या का विवाह ऐसे होगा और बड़े चिंता में पड़ 00:13:19 गए व तो कोई अवधूत होगा उसके तन पर वस्त्र भी नहीं होगा सर्प बिच्छू के आभूषण होंगे ऐसा उसका 00:13:25 वेश होगा सब नारद जी ने बता दिया 00:13:31 अब उन्होंने पूछा बोले इस विपत्ति से बचने का कोई उपाय है बो नहीं बचने का कोई उपाय नहीं हम 00:13:36 तो बता रहे हैं ऐसा होगा इसको कोई मिटा नहीं सकता है हुई जो राम रच राखा को कर तर्क 00:13:52 बढ़ाव सा तब संत कह रहे कितने करो 00:14:00 मनोरथ माला पर भावी पर परदा काला तब कहते हैं सुजन सयाने राम की बातें राम ही जाने राम की 00:14:27 बातें 00:14:28 नाम ही 00:14:35 जाने अब क्या है ना मन अपने रथ पर सवार होकर दौड़ता रहता है दसों दिशाओ में यहां गया वहां 00:14:42 गया चैन पाता 00:14:46 नहीं इसी को कहते हैं मन का भटकना मनोरथ में ही तो मन भटकता है इसी को कहते हैं मन 00:14:54 का भटकना यहां गया वहां गया यहां दौड़ा वहां दौड़ा सुख की कल्पना में जल 00:14:58 कना में दौड़ रहा है भाग रहा है भटक रहा है इसलिए तो कह रहे हैं संत सच्चे संत की 00:15:05 शरण में बैठ मिले विश्राम संत आएगा ना संतोष लेकर आएगा और संतोष का प्रसाद देगा व मन को इस 00:15:18 माया जाल से मुक्त करेगा व आपको वो आपको वो विवेक देगा जिसमें आप देख पाएंगे कि भाई इस अस्तित्व 00:15:27 का वास्तविक सत्य 00:15:28 है क्या अरे जो प्रभु की इच्छा है वो हो रहा है और आगे भी होगा क्यों नहीं हम भगवान 00:15:34 की इच्छा में अपनी इच्छा मिला दे और कल मैं आपसे कह रहा था कि भाई अपने ऊपर तो आपने 00:15:41 बहुत बार बाजी लगाकर देखी है एक बार एक बार प्रभु पर विश्वास करके देख लो ईमानदारी से एक बार 00:15:50 भगवान का भरोसा करके 00:15:56 देखो एक पंक्ति कहीं मैंने पढ़ी थी 00:15:58 बहुत अच्छी लगी थी किसी ने कहा कि अधिक मैं मांगता नहीं और कम वो देता 00:16:08 नहीं कम वो देता नहीं अरे प्रभु तो ऐसे हैं कि वो तो मांगने का अवसर ही नहीं आने देते 00:16:19 हमने प्रभु से कुछ नहीं मांगा इसमें हमारी बड़ाई नहीं है प्रभु ने कभी मांगने का अवसर ही नहीं आने 00:16:25 दिया कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी तो मांगते कैसे 00:16:29 बिन बोलिया सब कुछ जान द बिन बोलिया सब कुछ जान किस आग की ज 00:16:50 अरदास बिन बोलिया सब कुछ जाने पहली बात तो मा 00:16:58 कभी पढ़ा ही नहीं मैं यहां से कभी भी एक भी शब्द अपने अनुभव की परिधि से बाहर जाकर आपको 00:17:09 नहीं सुनाऊंगा जो कहूंगा वह गुरु कृपा से संत कृपा से मेरे जीवन में घटता देखा है इसलिए बड़े विश्वास 00:17:17 से आपको कहता हूं मांगने कहा तो प्रभु अवसर ही नहीं आने देते कल यही तो आपको कह रहा था 00:17:24 भाई कि जो सोचा था वो काम भी बना और जो नहीं सोचा था 00:17:28 वो भी बन गया और बनता ही गया एक बार प्रभु पर भरोसा करके देखो संतोष आएगा जीवन में संतोष 00:17:37 आएगा तो इस मार्ग पर एक पैर आप आगे बढ़ा पाओगे लगा रहा मनोरथ का कांटा भीतर जहां पैर धरो 00:17:44 ग वही पीड़ा है डारन डारन में फिरो और पात पात दुख और फिर यहां श्री काग ब सुंडी जी 00:17:52 कह रहे हैं नेम धर्म आचार तप ज्ञान जग जप दान 00:17:59 भेज पुनि कोटिन नहीं रोग जाही हरि जान भाई ऐसी करोड़ों करोड़ों औषधिया है पर क इन सबके कर लेने 00:18:11 से भी य जो मन के रोग है य जाते नहीं है और ही विधि सकल जीव जग रोगी और 00:18:19 सब इन मानस रोगों से पीड़ित है पर एक बात यहां बड़ी अच्छी कही है बोले मानस रोग कचक में 00:18:26 गाए गरु जी तो कुछ मानस 00:18:28 रोग मैंने आपको आपके पूछने पर कहे हैं पर हुई सब के लखी बरले न पाए बोले होते सबको है 00:18:35 पर कोई बिरला अपने मन के रोग को पहचान पाता है कल इसी बात पर हम चर्चा कर रहे थे 00:18:41 ना सत्संग करोगे अपना दोष दिखाई पड़ेगा और जब दोष दिखाई पड़े तो फिर और सत्संग करना और निष्ठा से 00:18:50 भजन में लगना और उस दोष को समूल नष्ट करने का प्रयास करना प्रभु कृपा करेंगे आपके प्रयास करने 00:18:58 दोष दूर नहीं होगा एक और बात महत्त्वपूर्ण है हमारे प्रयास करने से दोष दूर नहीं होगा लेकिन हमारे प्रयास 00:19:08 करने से प्रभु कृपा करेंगे प्रभु कृपा करेंगे जब हमको देखेंगे छटपटाते हुए भाई बालक भी रोता है तो मां 00:19:16 दूध देती है ना बालक अपनी भूख कैसे व्यक्त करता है बोल तो सकता नहीं दुध मुआ बालक है व 00:19:25 जो अपनी भूख है वो बोलकर तो कह नहीं सकता 00:19:28 रो देता है अरे कम से कम अपने दोष को देखकर रोइए तो प्रभु के सन्मुख जाकर अपने दोष से 00:19:36 पीड़ित तो होईए अपने अपने दोष के कारण जो पीड़ा जो वेदना होनी चाहिए हमारे जीवन में तो उसका भी 00:19:42 अभाव है हमको दोष दोष लगता ही नहीं तभी तो कह रहे हो ही सबके बोले मानस रोग है सभी 00:19:48 को सब इन रोगों से रोगी है दुखी है पर लख बरले न पाए कोई बिरला होता है जो इनको 00:19:54 देख पाता है जो अपने मन के रोग को पहचान 00:19:58 पाता कोई विरला होता है जाने ते ीज कछु पापी नास ना पाव जन 00:20:20 परिता अब अनुभवी श्री काग ब सुंडी जी एक बात कह रहे हैं और बोले प्रयास करके इनकी 00:20:28 औषधि करके इन रोगों को कोई दूर करने का प्रयास भी करें तो क भाई थोड़ी देर के लिए दूर 00:20:35 हो जाते हैं कल जो मैं आपसे कह रहा था ना मन स्वस्थ हो जाए और फिर मन स्वस्थ बना 00:20:42 रहे मन को स्वस्थ करने से कहीं कठिन है मन को स्वस्थ बनाए रखना आप बीमार हुए आपने दवा ली 00:20:51 दो चार दिन आपने परहेज भी किया आप स्वस्थ हो गए पर क्या फिर बीमार नहीं पड़े फिर बीमार हो 00:20:57 गए 00:20:58 शरीर फिर फिर रोगी होता 00:21:06 है जैसे कभी किसी 00:21:11 को किडनी में पत्थर हो जाए ना बड़ी भयंकर पीड़ा होती है 00:21:19 उसकी जब पीड़ा होती है उस समय तो व्यक्ति कहता है भाई 00:21:28 हमसे खाना है लिखा लो भगवान कृपा करें एक बार मैं स्वस्थ हो जाऊं एक बार स्वस्थ हो जाऊ आज 00:21:34 के बाद कभी कुपथ नहीं करूंगा आज के बाद ऐसा नहीं करूंगा आज के बाद वैसा नहीं करूंगा ठीक है 00:21:40 भाई डॉक्टर दवा दारू करता है ज्यादा करता है तो एक इंजेक्शन लगा देता है थोड़ी देर में दर्द ठीक 00:21:48 हो जाता है जब दर्द ठीक हो जाता है फ ति सब भूल जाता है थोड़े दिन के बाद तो 00:21:53 फिर वही कुपथ करने लगता है बस यही यही दशा सबकी है 00:21:58 किसी बात को लेकर मन दुखी हुआ पीड़ित हुआ अब ऐसा नहीं करेंगे अब वैसा नहीं करेंगे ठीक है मन 00:22:04 स्वस्थ हो गया थोड़ी देर के लिए स्वस्थ हुआ फिर वही कुपथ किया तो कहरे भाई यह सब साधन करने 00:22:11 से थोड़ी देर के लिए यय मन के रोग आपको लगे कि भाई अब नष्ट हो गए अब हमारा मन 00:22:16 स्वस्थ हो गया पर विषय को पथ पाई अंकुरे बोले विषय का 00:22:28 कुपथ प्राप्त करके फिर अंकुरित हो जाते हैं और यह स्थिति किसकी है मुनि ह हृदय का नर बा जी 00:22:39 कह रहे भाई बड़े बड़े ज्ञानियों की बड़े बड़े मुनियों की यह दशा है मनुष्य बेचारा किस गिनती में यही 00:22:45 शब्द शि काग बसु जी कह रहे बोले बड़े बड़े ऋषि मुनियों की यह स्थिति है कि फिर फिर उनके 00:22:52 मन में यह पाप का बीज अंकुरित होता है तभी श्री महाप्रभु जी कह रहे पारा सरसर 00:22:58 कलप कामिनी मन फ्या परे देह दुख द्वंद कौन क्रम काल नि अरे भाई बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी तपस्वी मोहित 00:23:08 हो जाते हैं मनुष्य की गिनती किसम है उसकी गिनती कौन करे अब थोड़े गरुड़ जी निराश होने लगे बोले 00:23:18 भाई देखो एक तो यह कह रहे हैं सभी इन रोगों से रोगी है और कुछ किए से रोग दूर 00:23:23 नहीं होते और अगर कोई बढ़िया बड़ा परिश्रम करके बड़ा 00:23:28 करके इनकी औषधि कर भी ले तो कर थोड़ी देर के लिए रोग दूर होता है फिर वह बीज अंकुरित 00:23:33 होता है तो गरु जी थोड़ा निराश होने लगे बोले भाई फिर उस उस रोग का क्या निदान जिसकी कोई 00:23:41 औषधि ना हो और हो भी और अगर औषधि कोई हो भी बोले थोड़ी देर के लिए व लाभ देती 00:23:48 हो और फिर रोग के हो जाने की आशंका हो व्यक्ति जाए कहां फिर किसके पास जाए किसकी शरण में 00:23:56 जाए 00:24:00 फिर अंत में काग ब सुंडी जी कह रहे हैं अब अब यह चर्चा विश्राम की ओर है अंत में 00:24:05 काग ब सुंडी कह रहे राम कृपा ना सही सब रोगा जो यही भाति बने 00:24:24 संजोगा नहीं एक एक युक्ति है जिससे यह रो 00:24:28 सदा सदा के लिए समूल नष्ट हो जाते हैं और भगवान कृपा करें और ऐसा संयोग बन जाए और व 00:24:34 संयोग क्या है ब्रम भूल में भटकते उदय हुए जब भा मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की ला 00:25:00 संयोग बने और संयोग क्या है बोले राम कृपा और राम कृपा होती है तो क्या होता है अब मोही 00:25:07 भाव भरोस 00:25:11 हनुमंता बिन हरि कृपा मिल नहीं 00:25:19 संता दो दिन से मैं आपको यही तो निवेदन कर रहा हूं भाई अपना आंचल फैलाकर 00:25:31 कर जोड़ कर मस्तक झुका कर सजल नेत्र बार-बार एक बार नहीं बार-बार बस प्रभु से यही कहिए प्रभु अपने 00:25:39 किसी अपने किसी प्रिय जन का अपने किसी निज जन का हमको संग दीजिए हमारे जीवन में कोई संत आए 00:25:47 हो कोई ऐसो रे भेटे 00:25:54 सं मेरी ला है 00:25:57 ली चिंत ठाकुर सयो मेरो रंग 00:26:08 ला हो कोई ऐसो रे 00:26:14 सुखदाई जिन हरि की कथा सुनाई इस भेटे गति हो 00:26:26 हवा 00:26:28 आपने कितनी कितनी बातें प्रभु के सन्मुख जाकर कही होगी पर कहने योग्य बात एक है मांगने योग्य वस्तु तो 00:26:34 यह एक वस्तु है एक वस्तु यह मांगना चाहिए प्रभु से और इसको मांगने के लिए संत आज्ञा दे रहे 00:26:43 हैं अ एक बार नहीं बार बार बर मा बार बार मांग रहा हूं प्रभु में हरख देहु 00:26:56 श्रीरंग 00:26:57 पद सरोज अन पायनी भक्ति सदा 00:27:12 सत्संग इसलिए मैं भी नित्य गाता हूं और आपसे भी गवाता हूं देखो हमारे शब्दों में तो ऐसी सामर्थ्य नहीं 00:27:19 है प्रभु के कान तक पहुंचे पर ये तो संतों की वाणी है ना ये तो संतों की वाणी 00:27:29 लाश का पत्ता भी निज मंदिर में पहुंच जाता है कमल के पुष्प के संग ऐसे संतों की वाणी है 00:27:36 हम भी अपना स्वर अपना थोड़ा भाव इसमें मिलाए तो यह यह शब्द प्रभु के कान तक पहुंचते हैं प्रभु 00:27:42 सुनते हैं स्वीकारते हैं इसलिए कह रहे बार बार बरमा जन के चरण बस मेरे हीय रे जन 00:27:57 के चरण बस मेरे हीय रे संग पुनीता 00:28:11 देई संग पुनीता देही सब कहिए जन के चरण बस में रही है रेन के चरण 00:28:31 बही संग पुनीता 00:28:39 देही संग गुनीना दे जनकी धूर देहु कृपानिधि जनकी दूर 00:28:58 कृपानिधि नानक के सुख 00:29:07 ही नानक के सुख ही नानक के सुख 00:29:20 ही नानक के 00:29:26 सुख 00:29:27 जिनके चरण बस में रही हैरे जिनके चरण बस में रही संग पुनीता 00:29:47 देही संग पुनीता देही जनकी धूर 00:29:57 देहु कृपा निधी चन की दूर देहु कृपा नानक के सुख 00:30:14 ही नानक के सुख यही नानक के सुख ही 00:30:28 नानक के 00:30:32 सुख जन के चरण बस मेरे ही है रे जन के चरण बस में रही है जन के चरण बस 00:30:51 में रही हैन के चरण 00:31:03 राम कृपा ना सही सब रोगा और राम की कृपा क्या है ऐसा कोई संत मिले ठाकुर से मेरो रंग 00:31:14 लावे और फिर कह रहे ऐसा संत मिले तो सदगुरु बैद वचन 00:31:26 विश्वासा 00:31:27 ध्यान दीजिए चर्चा जहां से आरंभ हुई थी वहीं जा रही है जब श्री गरुड़ जी गए थे ब्रह्मा जी 00:31:35 के पास तो ब्रह्मा जी जान गए कि इनको मन का रोग हो गया है और मन के रोग की 00:31:41 औषधि केवल गुरु के ही पास में होती है तभी गरुड़ जी से कहा था कि यहां से सीधे कैलाश 00:31:48 पर जाना देवाधि देव महादेव के चरणों में अपने मन की ये व्यथा निवेदन करना और उनके अतिरिक्त किसी और 00:31:56 से ना कहना 00:31:58 उन्हीं से जाकर कहना मन के रोग का वैद तो गुरु ही है क भगवान कृपा करें यह संयोग मिले 00:32:08 और सदगुरु रूपी वैद मिल जाए सदगुरु वैद औषधि क्या है वचन विश्वासा जो गुरु के मुख से नाम श्रवण 00:32:23 किया है ना उसका उसका भरोसा उसका उसका विश्वास 00:32:29 गुरु के मुख से जो नाम श्रवण किया है गुरु की जो वाणी है गुरु का जो शब्द है उसका 00:32:35 विश्वास सदगुरु वैद वचन 00:32:43 विश्वासा पर कबीर कहते हैं कि राम नाम की औषधि सतगुरु दई बताए औषध खाए और पथ करे ताकि वेदन 00:32:56 जाए 00:32:57 सदगुरु वैद वचन विश्वासा पर जब वैद औषधि देता है तो कुछ परहेज भी तो बताता है और मुझे ऐसा 00:33:07 लगता है कि जितना कार्य औषधि करती है उतना ही कार्य परहेज भी करता है संयम भी उतना ही कार्य 00:33:14 करता है औषधि लेते रहो और कुपथ भी करते रहो तो तो रोग नहीं जाता है और कभी-कभी यह भी 00:33:22 देखने में आता है औषधि ना करो और 00:33:27 केवल आप अपने आप को कुपथ से बचा लो तो जो हमारी जीवनी शक्ति है वो थोड़ी थोड़े से काल 00:33:34 में शरीर को फिर स्वस्थ कर देती है भगवान ने भगवान ने तो आपको मुझे सारी व्यवस्था करके भेजा 00:33:45 है सारी व्यवस्था तो कहरे सदगुरु वैद वचन विश्वासा एक परहेज भी बताया है सन 00:33:56 संजम यह ना विषय के आसा संजम यह ना विषय के आस आपको याद हो कभी हमने यहां चर्चा की 00:34:12 थी कि हम आदि बात मानते हैं महापुरुषों की सूरदास जब क सब तज भजिए नंद कुमार नंद कुमार का 00:34:23 भजन तो करेंगे पर सबको छोड़ते नहीं मदास कहते 00:34:27 मैं अपना मन हरिस जोर हरि स जोर सबन स तोर यहां कह रहे बोले परहेज क्या है संयम क्या 00:34:35 रखना है क संयम ने यह ना विषय के आसा गुरु के चरणों में अपना मस्तक रखा गुरु से नाम 00:34:44 जैसी अमोलक वस्तु पाई चिंतामणि हरि नाम है सफल करे सब काम गुरु ने आपको चिंतामणि दिया है उसके बाद 00:34:53 फिर संसार के विषय से सुख की आशा ना रखिए 00:34:57 यह कार्य आपको करना पड़ेगा अपने मन को यह बात समझा पड़ेगी अपने मन को यह बोध देना पड़ेगा झंझोट 00:35:03 कर कि भाई अब मेरे सुख का विधान प्रभु करेंगे जो भाग्य का लिखा है व आता जाता रहेगा उसके 00:35:11 लिए कुछ करना नहीं है जो सुख दुख लग रहे देहस व तो आते जाते 00:35:20 रहेंगे कान खोलकर सुन लेना भाई ना बुलाने से सुख आता है ना भगाने से दुख जाता है 00:35:27 बुलाने से सुख आता नहीं और भगाने से दुख जाता नहीं तो प्रारब्ध का है लिखा है जो उसका समय 00:35:34 नियत है आएगा भी और जाएगा भी आप कितना रोते बिल बिलाते रहो कितना नाचते कूदते रहो रती घटे ना 00:35:43 तिल बढ़े जो लिख दी करता ना घटेगा ना बढ़ेगा कितना बड़ा आश्चर्य है जहां हमारे करने से कुछ नहीं 00:35:56 हो ररहा है वहां हम अपनी सारी शक्ति लगाए जा रहे हैं और जहां पुरुषार्थ करने से मनुष्य सदा के 00:36:06 लिए सुखी हो जाता है वहां से वहां से जीव विमुख रहता है यह माया श्री कृष्ण की मोयो सब 00:36:16 संसार जहां पुरुषार्थ बिल्कुल व्यर्थ है जो भूमि बंजर है जहां पर कुछ है नहीं संभावना वहां सारा परिश्रम कर 00:36:26 रहा 00:36:31 और जहां राई के सम भजन को मानत मेरु समान वहां से जीव विमुख रहता है यही भगवान की माया 00:36:42 है और इस माया ने मोयो सब संसार व काक ब सुंडी कह रहे हैं बो बड़े बड़े ऋषि मुनि 00:36:49 इससे पीड़ित है भाई नर बिचारा मनुष्य विचारा क्या करेगा तो क भगवान कृपा 00:36:56 करें सदगुरु मिले और फिर उससे बड़ी कृपा क्या है सदगुरु वैद वचन विश्वा भाई डॉक्टर की बात माननी भी 00:37:07 तो पड़ेगी आप संसार के सबसे श्रेष्ठ डॉक्टर से औषधि ले आओ केवल सबसे श्रेष्ठ डॉक्टर से औषधि लेने से 00:37:18 थोड़ी ठीक हो जाओगे भाई समय पर औषधि का सेवन भी करना पड़ेगा पत्थ कुपथ का विचार भी तो करना 00:37:25 पड़ेगा 00:37:29 क सदगुरु बैद सदगुरु रूपी वैद मिले और फिर उसके वचन पर विश्वास हो अ साथ साथ में एक परहेज 00:37:38 भी करना है संयम यह ना विषय के आसा यही कपट हम करते हैं भगवान से हम यही कपट सदा 00:37:49 सदा निरंतर करते हैं भगवान से और वो कह रहे मो कपट छल छिद्र न भावा हम यही कपट करते 00:37:55 हैं हमको सुख की आशा 00:37:56 है कहीं से यहां से वहां से इससे उससे भाई यह देगा हमें कुछ य ऐसा करेगा हम सुखी हो 00:38:04 जाएंगे इससे कुछ मिलेगा हम सुखी हो जाएंगे यह परहेज करना है भाई यह संयम रहे और मैंने आपको कहा 00:38:13 इसका अभ्यास करना पड़ेगा झंझोट झंझोट कर अपने मन को आपको समझाना पड़ेगा कि ना नहीं मिलेगा यहां सुख और 00:38:21 मिल भी जाए और यदि मिलता भी हो तो बने तो 00:38:26 रघुवर पे बने और बिगड़े तो भरपूर जो रघुवर को ना रुच वा बन बे में धू एक बार मैं 00:38:43 कह रहा हूं एक बार यह बाजी ऐसे भी खेल कर देखो और मान लो हमारी बात आनंद आएगा आपको 00:38:50 निश्चिंत हो जाओगे निर्भर हो जाओगे आप भी देखोगे कि पतवार के 00:38:56 बिना ही मेरी नाव चल रही है और हैरान है जमाना मंजिल भी मिल रही है चरण कमल बंद हरि 00:39:12 राई चरण कमल 00:39:19 बंद जा की कृपा पंगु गिरि लंग 00:39:34 रंक चले सिर छत्र 00:39:47 धराई चरण कमल बंदो हरि राई 00:40:03 आजकल जैसे लोग पैसा देकर जाते हैं मोटिवेशनल स्पीकर्स की स्पीच सुनने के लिए रुपया देकर जाते हैं यह तो 00:40:13 ऐसा हुआ जैसे कोई उत्साह खरीदने जा रहा हो जसे कोई शांति खरीदने जाते हैं आजकल लोग सोते वहां जाएंगे 00:40:19 शं शांति हो जाएगी मन शांत हो जाएगा जैसे यहां जाते हैं लोग 00:40:26 ऐसा लगता हैसे उत्साह खरीदने जा रहा हो जैसे दुकान में उत्साह बट रहा 00:40:32 हो हालांकि देख रहे हैं वह मोटिवेशनल स्पीकर्स की आज क्या दशा हो रही है व बेचारे खुद कहां 00:40:44 है हमको भी जीवन में मोटिवेशन मिला हमको भी जीवन में उत्साह मिला पर हमारे मोटिवेशनल स्पीकर्स तो यह संत 00:40:55 थे जो यह कह 00:40:56 कहते हैं नीच ऊच करे मेरा गोविंद नीच ही ऊच प्र मेरा गोविंद 00:41:25 हु 00:41:28 हमको यहां से उत्साह मिला हम भी निराश हुए 00:41:33 थे कभी बड़ी विचित्र परिस्थितियां आ गई थी अब कहां देखें अब किसकी ओर देखें कोई भी एक पग साथ 00:41:43 चलने को तैयार नहीं है तब नीचे ऊंच करे मेरा गोविंद और काह पे ना डरे ऐसी लाल तुझ बिन 00:41:53 कौन करे 00:41:56 ऐसी 00:42:00 लाल गरीब निवाज गु सैया मेरो गरीब निवाज गु सैया मेरो गरीब निवाज गु सैया मेरा माथ है 00:42:26 छतर 00:42:29 धर ऐसी लाल तुझ बिन कौ करे ऐसी 00:42:43 लाल एक बार बस आशा एक राम जी से एक राम जी से अब कोई कहेगा क्या सिखा रहे हैं 00:42:52 आप कुछ नहीं करें हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाए एक बार भगवान का भरोसा 00:42:56 करके तो देखो जहां की कृपा पंगु गिरी लंग है जब कोई भरोसा करता है तो फिर उसके रथ का 00:43:02 सारथी वो स्वयं होकर बैठता है और सामने समुद्र के जैसी दस्तर सेना हो उसको भी पार करा के अंत 00:43:09 में विजय श्री का प्रसाद देता है एक बार करके तो देखिए 00:43:18 आप बस संजम यह ना विषय क्या 00:43:25 आसा

अंत में श्री गरुड़ जी ने पूछे ये 7 प्रश्न || 38 || Shree Hita Ambrish Ji

अंत में श्री गरुड़ जी ने पूछे ये 7 प्रश्न || 38 || Shree Hita Ambrish Ji 


https://youtu.be/pUjfYi9IMFo
First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given 1. सात प्रश्नों में छिपा राम कथा का गूढ़ संदेश | The Deeper Message Behind the Seven Questions of Ram Katha 2. राम कथा की महिमा और सात प्रश्न, The Glory of Ram Katha and the Seven Questions  3. दुर्लभ मानव जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान, The Rarest Gift: Human Life and Spiritual Wisdom  GIST:  [00:38] गरुड़ जी, राम कथा सुनने के बाद भी अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए सात प्रश्न पूछते हैं। Garuda Ji, even after listening to the Ram Katha, asks seven questions to satisfy his curiosity. [03:00] कथा सुनने की अतृप्ति (और सुनने की इच्छा) और जन-कल्याण के लिए 'प्रसाद' को बाँटने का भाव। The reason is the insatiable desire to hear the Katha and the feeling of sharing its 'Prasad' for the welfare of all. [10:21] राम कथा को 'मंगल करण' और 'कलि मल हरण' बताया गया है जो मन के विकारों को धो देती है। Ram Katha is described as 'Mangal Karan' and 'Kali Mal Haran', which washes away the impurities of the mind. [13:50] आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपनी प्रशंसा सुनने से बचने और उसे भगवान को अर्पित करने की सीख। For spiritual progress, one should avoid listening to one's own praise and offer it to God. [25:40] गरुड़ जी के सात प्रश्न: दुर्लभ शरीर, सबसे बड़ा दुख/सुख, संत/असंत लक्षण, पाप/पुण्य और मानस रोग। Garuda Ji's seven questions concern the rare human body, the greatest sorrow and happiness, the characteristics of saints and non-saints, sin and virtue, and the diseases of the mind. [27:51] पहले प्रश्न का उत्तर: मनुष्य शरीर सबसे दुर्लभ है, जिसे देवता भी पाने के लिए लालायित रहते हैं। The answer to the first question: The human body is the rarest, and even the demigods long to attain it. [35:42] भारत भूमि पर जन्म और जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों की विशेषता का वर्णन। The discourse describes the significance of being born in the land of Bharat and the importance of the various samskaras performed from birth to death. 7 questions & answers: श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में पक्षीराज गरुड़ जी द्वारा श्री काकभुशुण्डि जी से पूछे गए सात प्रश्न और उनके संक्षिप्त उत्तर: 1. सबसे दुर्लभ शरीर कौन सा है? उत्तर: मनुष्य शरीर (नर तन)। यह चर-अचर सभी जीवों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, क्योंकि यह मोक्ष, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति प्राप्त करने का साधन है। 2. सबसे बड़ा दुःख कौन सा है? उत्तर: दरिद्रता (नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं)। 3. सबसे बड़ा सुख कौन सा है? उत्तर: संतों का मिलना व सत्संग (संत मिलन सम सुख जग नाहीं)। 4. संत और असंत का सहज स्वभाव क्या है? उत्तर: संत: मन, वचन और कर्म से परोपकार करना और दूसरों के कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहना (भोजपत्र के वृक्ष के समान)। असंत (दुष्ट): बिना किसी स्वार्थ के अकारण ही दूसरों को दुःख पहुँचाना और दूसरों की संपत्ति नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाना (ओलों के समान)। 5. वेदों में वर्णित सबसे बड़ा पुण्य कौन सा है? उत्तर: अहिंसा एवं परोपकार (परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा)। 6. सबसे बड़ा एवं भयंकर पाप कौन सा है? उत्तर: परनिंदा—दूसरों की बुराई या आलोचना करना (पर निंदा सम अघ न गरीसा)। 7. मानस रोग (मानसिक व्याधियाँ) क्या हैं और उनका उपचार क्या है? उत्तर: सभी मानसिक रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। काम वात है, लोभ कफ है और क्रोध पित्त है। अहंकार, ईर्ष्या, तृष्णा आदि असाध्य रोग हैं। उपचार: सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर विश्वास, विषयों से वैराग्य (परहेज) और श्री राम जी की भक्ति रूपी संजीवनी बूटी ही इसका एकमात्र उपचार है। https://youtu.be/pUjfYi9IMFo ---
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00:00:02 नाथ 00:00:08 मोहि निज सेवक 00:00:17 जानी 00:00:21 सप्त 00:00:24 प्रश्न मम कहा ह. 00:00:38 बखानी नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रश्न मम कह 00:00:46 बखानी मंगल करण कलि मल 00:00:53 हर श्री रघुनाथ 00:00:58 गाथा. 00:01:00 श्री काग भूसुंडी जी के मुख से श्रवण करने के पश्चात गरुड़ जी यह बात कहते यह बात बड़ी विचित्र 00:01:11 है प्राय करके भोजन के बाद ही तो मिष्ठान पाया जाता है ना महा 00:01:25 मधुर परम विमल श्री राम कथा श्रवण करने के. 00:01:29 बा भी क्या कोई प्रश्न रह सकता है क्या कोई संशय रह सकता है क्या अभी कुछ और ऐसा है 00:01:36 जो गरुड़ जी को जानना है क्योंकि पूर्व में ही श्री काग सुंडी जी तीन बार यह बात कह चुके 00:01:43 कि जो मैं जानता हूं जो भगवत कृपा से मैंने अनुभव किया है सो सब मैंने आपको निवेदन कर 00:01:55 दिया भक्ति दयनी श्री हरि कथा है. 00:02:01 और जब श्री काग बसु जी जैसा वक्ता हो जिसकी स्तुति महादेव करते हैं और गरुड़ जी जैसा श्रोता हो 00:02:10 तो निश्चित रूप से निश्चित रूप से ऐसी कथा ऐसा सत्संग कहने वाले और सुनने वाले दोनों के हृदय में 00:02:20 विशुद्ध भक्ति भाव की प्रतिष्ठा कर देता है स्थापना कर देता 00:02:28 है. 00:02:30 कथा का अर्थ ही यही है कम 00:02:35 सुखम स्थापति इति कथा जो सुख की परम सुख की स्थापना कर दे हृदय में फिर भी गरुड़ जी प्रश्न 00:02:46 पूछते हैं तो महापुरुषों ने विचार किया है कि इतनी मीठी इतनी मधुर राम कथा सुनने के बाद फिर गरुड़ 00:02:56 जी ने प्रश्न किए हैं ऐसा क्यों. 00:03:00 दो कारण है एक तो सुनते सुनते गरुड़ जी को तृप्ति नहीं हो रही है व और सुनना चाहते हैं 00:03:10 और सुनना चाहते हैं और गरुड़ जी के प्रश्न बता रहे हैं कि गरुड़ जी को व जो रस विशेष 00:03:20 है उसकी प्राप्ति हो गई है जिसका संकेत श्री गोस्वामी जी करते हैं वैसे देखो कथा का परम फल तो 00:03:28 यही है सेवा का. 00:03:29 फल क्या है मैं आपसे पूछूं सेवा का फल क्या है सेवा ही है भजन का फल क्या है भजन 00:03:38 ही है भजन का फल भजन है सेवा का फल सेवा है ऐसी कथा श्रवण का फल क्या है कथा 00:03:45 श्रवण का फल कथा श्रवण का प्रसाद यही है कि श्रवण में अनुराग हो जाए नारद जी ने अपने भक्ति 00:03:51 सूत्र में इसे भी एक प्रकार की भक्ति कहा है जब भगवान की कथा श्रवण में अनुराग हो जाए प्रीति 00:03:58 हो जाए. 00:04:01 तो गरुड़ जी को कथा श्रवण में प्रीति हो गई 00:04:07 है और महादेव महादेव तो इसका प्रसाद यही बताते हैं बिन सत्संग न हरी कथा तेही बिन मोह न 00:04:24 भा मोह गए बिनु रा. 00:04:31 होही न दृढ़ 00:04:38 अनुरा यह यात्रा जो यहां से आरंभ होती है व प्रभु के श्री चरणारविंद का दृढ़ अनुराग प्रदान करके ही 00:04:45 विश्राम लेती है तो गरुड़ जी के मन में कथा के प्रति जो अनुराग है श्रवण के प्रति जो अनुराग 00:04:51 बहुत बड़ी बात है य देखो कहते सुनते तो आप मैं हम सब है ही परव जो रस विशेष. 00:05:01 कि कभी और अंतर को तृप्ति हुई नहीं आप देखो कथा के आदि वक्ता भगवान शंकर हैं और मैंने पूर्व 00:05:10 भी आपको शायद एक बार संकेत किया था कि या तो वह भजन में रहते हैं या तो ध्यान में 00:05:16 रहते हैं अन्यथा केवल एक ही कार्य करते हैं हरि की कथा सुनते हैं सुनाने वाला मिल जाए तो सुनते 00:05:25 हैं सुनने वाला मिल जाए तो सुनाते हैं. 00:05:32 रस रस विशेष जिसको प्राप्त हो जाए वही कृत कृत्य है तो एक तो गरुर जी को तृप्ति नहीं हो 00:05:38 रही व कह भाई ऐसा वक्ता मिला है और सुन ले और सुन ले और सुन ले और दूसरी बात 00:05:45 कि प्रसाद सदा बांट कर पाना चाहिए देखो यह जितना भी संतों के मुख से प्रकट हुआ है यह भगवान 00:05:54 का जस रस जो भी है जो आज तक हम जैसे जीवों का उद्धार कर रहा है कल्याण कर. 00:05:59 कल्याण का हेतु कारण बन रहा है उसके मूल में क्या है उसके मूल में संतों की कृपा ही है 00:06:06 उसके मूल में संतों का अनुग्रह है गरुड़ जी ने मन में विचार किया भाई ऐसा ऐसा संयोग बना है 00:06:13 और बार-बार तो बनत नहीं यह संजोग अनूप यह तो आप और मैं जाने कब समझेंगे पर जिन महापुरुषों ने 00:06:20 समझा वह तो कह रहे हैं धन दरा सुत लक्ष्मी तो पापी के भी हुए पर संत समागम हरि कथा 00:06:27 तुलसी दुर्लभ दोए. 00:06:29 फिर जाने कब मिलेगा बड़ी बात गोस्वामी जी कह रहे तात स्वर्ग अपवर्ग सुख और धरि तुला एक अंग तुलना 00:06:40 ताही सकल मिली जो सुख लव सतसंग जो की त्य बात भगवान वेदव्यास श्रीमद् भागवत में कहते हैं तुलम लवे 00:06:48 नापना स्वर्गम ना पुनर भव भगवत संगी संगस मृत नाम 00:06:58 किमता. 00:06:59 तो गरुड़ जी ने मन में विचार किया भाई ऐसा ऐसा वक्ता हमको प्राप्त हुआ है राम कथा के अद्भुत 00:07:06 अद्वितीय गायक हैं जिस दिन इस प्रसंग का आरंभ हुआ था मैंने आपको यही निवेदन किया था कि ऐसे तो 00:07:14 ऐसे तो सारी मानस ही महा मधुर है मैंने पहले भी आपको कहा कि व्यवहार जगत की छोटी से छोटी 00:07:23 बात से लेकर अध्यात्म जगत के श्रेष्ठतम सिद्धांत का समावेश श्री गोस्वामी जी ने मानस में कर दिया है. 00:07:30 ये तो भव सिंधु पार करने के लिए नौका है नौका है मंगल करण कलि मल हरण तुलसी कथा रघुनाथ 00:07:50 की एक और बड़ी सुंदर बात है मानस के विषय में मैं कहना चाहूंगा गोस्वामी जी कह तीन प्रकार के 00:07:58 जीव है. 00:07:59 संसार में विषय साधक सिद्ध सयाने त्रिविध जीव जग वेद पखा अच्छा तुलसी बाबा की मानस ऐसी है यह राम 00:08:10 कथा ऐसी है जो सबको प्रिय लगती है थोड़ी देर के लिए तो विषय को भी इसमें आनंद आता है 00:08:18 साधक तो रस प्राप्त करता ही है और सिद्ध है वह तो भाई उसके लिए तो ये ये शब्द नहीं 00:08:24 है उसके लिए तो यह अमृत है वैसे जहां जहां श्रीमद् भागवत में. 00:08:29 कथा की बात कही गई है ना वहां कथा सुनने की बात नहीं कही गई है पिवती भगवत आत्मन सता 00:08:36 कथामृत श्रवण पुटेन क श्रवण पुटो से इसका पान करिए और पान भी कैसे करिए कैसे कैसे पिए श्रवण पुटो 00:08:48 से इसको कैसे पिए करें बहुत सावधान होकर तस्म महन मुखरता मधु चरित्र पियूष शेष सरित परित श्रवंती और ताय 00:08:58 पिव. 00:09:00 नप गाढ करण स्तान भय शोक मोहा जो सावधान होकर कथा श्रवण करे सावधान माने कर एक शब्द भी एक 00:09:12 शब्द भी छूट नहीं जाए ऐसे दत चित होकर जो श्रवण पुटो से इस कथा अमृत का पान करता है 00:09:18 क व सुनते सुनते भूख प्यास भय शोक मोह नस भय शोक मोहा सुनते सुनते इन पंच क्लेश से. 00:09:29 हो जाता कथा अमृत है कथा अमृत है कभी पहले मैंने आपको निवेदन किया था प्रत्येक शब्द में एक ऊर्जा 00:09:39 होती है या तो सकारात्मक ऊर्जा होती है नकारात्मक ऊर्जा होती है शब्द जैसे स्पर्श करता है आपकी चेतना का 00:09:47 उस क्रिया की प्रतिक्रिया होती है शब्द में स्पंदन है व जैसे कान से भीतर जाएगा भीतर कुछ हलचल करेगा 00:09:54 एक शोभ उत्पन्न करता है शब्द जब भीतर जाता है क्योंकि शब्द में शक्ति है सकरा. 00:09:59 भी है नकारात्मक भी है लेकिन य जो कथा है इसमें ना सकारात्मक कोई ऊर्जा है ना नकारात्मक इसमें भगवती 00:10:06 ऊर्जा है इसमें भगवती शक्ति है इसीलिए इसलिए बड़े विश्वास से तुलसी बाबा कह रहे हैं मंगल करण कलि मल 00:10:21 हर तुलसी कथा रघुनाथ की. 00:10:30 मंगल करण कलि मल संसार की संसार की कोई वार्ता मैं कह रहा हूं संसार के शब्द कोश में से 00:10:41 कोई एक शब्द आप ऐसा ले आइए जो मन की हलचल को शांत कर सके देखो प्रशंसा सुनोगे तो भी 00:10:50 मन में क्षोभ होगा निंदा सुनोगे तो भी मन में क्षोभ होगा अच्छा सुन लो तो भी मन में हलचल 00:10:56 है बुरा सुन लो तो भी मन में हलचल है संसार की वार्ता. 00:10:59 तो मन में हलचल पैदा करने वाली है 00:11:04 ना नारद जी को मोह हुआ शब्द स्पर्श रूप रस गंध उसमें नारद जी ना तो स्पर्श से ना रूप 00:11:19 से ना रस से ना गंध से इनमें से किसी से भी नारद जी चलायमान नहीं हुए नारद जी कैसे 00:11:24 चलायमान हो गए नारद जी का मन कहां डोला शब्द से प्रशंसा सुन ली अपनी. 00:11:29 वो जो प्रशंसा के शब्द कान में गए ना उसने मन में शोभ पैदा कर दिया कितनी सुंदर अप्सराएं कामदेव 00:11:38 लेकर आया है अपने साथ में नार जी ने देखा भी नहीं उनकी तरफ दृष्टि उठाकर भी नहीं देखा व 00:11:45 जिस मादक वातावरण की रचना कामदेव ने की नारद जी उससे भी उससे भी हिले नहीं ना दृष्टि से देखा 00:11:55 ना ना उस उस गंध ने कोई विकार पैदा किया स्पर्श. 00:11:59 की भी इच्छा नारद जी के मन में नहीं हुई वो रूप देखकर स्पर्श की भी इच्छा नारद जी के 00:12:05 मन में नहीं हुई कहां कहां मन हिल गया वो जो प्रशंसा के शब्द कान में पड़े ना जाते जाते 00:12:12 कामदेव प्रशंसा करता गया कि आप जैसा कोई महापुरुष नहीं है आपसे मैं परास्त होकर जा रहा हूं मुझे आज 00:12:20 तक भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं हरा पाया आपने हरा दिया पर जाते जाते कामदेव यह बाण छोड़ता गया वो 00:12:26 पंच बाण तो नारद जी को नहीं लगे. 00:12:29 वो तो नारद जी का कुछ नहीं बिगाड़ सके लेकिन वो शब्द से जो प्रशंसा के शब्द भीतर गए कान 00:12:35 से व जो प्रशंसा के शब्द भीतर गए उसने मन में शोभ पैदा कर दिया और कहां जाकर पहुंचे नारद 00:12:42 जी मोह हो गया गोस्वामी जी ने यह नहीं कहा है कि नारद जी को काम विकार ने सताया या 00:12:50 लोभ हुआ नारद जी गोस्वामी जी कह रहे नारद जी को मोह हो गया तो शब्द एक शोभ पैदा करता 00:12:58 है अंदर. 00:12:59 केवल हरि की कथा ही है जो मन को शांत करती है संसार की वार्ता मन में विकार पैदा करती 00:13:04 है व भली बुरी कोई भी हो आपकी कोई बहुत प्रशंसा करे तब तो और सावधान रहना निंदा जो कर 00:13:12 रहा है वह तो आपका हिताशी है जो आपकी आलोचना कर रहा है जो आपकी निंदा कर रहा है जो 00:13:19 आपको कटुर शब्द कह रहा है व तो आपका हिताशी है जो प्रशंसा कर रहा है ना उससे सावधान रहना 00:13:25 कभी शायद मैंने आपको कहा भी था. 00:13:29 मुझे ऋषिकेश में एक महात्मा ने कहा था बोले बेटा जीवन में यि आध्यात्मिक उन्नति करनी है मुझे संत के 00:13:37 शब्द भली प्रकार से स्मरण है आज तक गूंजते हैं मेरे मेरे उर अंतर में बड़ी गहरी दृष्टि से मुझे 00:13:44 देखते हुए उन्होंने कहा था बोले बेटा जीवन में अगर आध्यात्मिक उन्नति चाहते हो तो अपनी प्रशंसा करने वाले लोगों 00:13:50 से दूर 00:13:54 रहना प्रशंसा स्वीकार ना करना. 00:13:58 प्रशंसा जैसे ही हो व सीधे-सीधे भगवान को निवेदन कर देना इस संसार में कोई ऐसा नहीं है जो प्रशंसा 00:14:05 पचा सके केवल प्रभु पचा सकते हैं यह सामर्थ्य केवल इन्हीं में ही 00:14:12 है मैं कई बार आपको उदाहरण देता हूं ना कितना महत कार्य करके श्री हनुमान जी आ गए भगवान तो 00:14:19 मन में यह विचार कर रहे कि अब मैं इनको क्या दूं और जब श्री रघुनाथ जी ने थोड़ी प्रशंसा 00:14:25 की तो हनुमान जी क्या कहकर उठते त्राहि त्रा. 00:14:29 भगवंत यही शब्द श्री हनुमान जी कह रहे हैं क प्रभु रक्षा करिए मेरी रक्षा करिए 00:14:41 नाथ ना कछु मोर 00:14:51 प्रभुताई सो सब तब. 00:15:05 रघुराई ऐसे कभी जब हो ना प्रशंसा आपकी ऐसे बस प्रशंसा भगवान को निवेदन करते चलना आप स्वस्थ रहोगे प्रशंसा 00:15:15 स्वीकार नहीं 00:15:19 करना तो मैं शब्द की बात कह रहा था आपसे इन शब्दों में भगवती ऊर्जा है ज्ञान और वैराग्य का 00:15:27 संस्कार. 00:15:28 पुष्ट करती है कथा जो भगवान की कथा है यह जो वार्ता है य ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को 00:15:37 पुष्ट करेगी और जो मलिन संस्कार हमारे भीतर जन्म जन्मांतर से हमने एकत्रित कर लिए हैं उनका क्षय करती है 00:15:46 इसीलिए गोस्वामी जी कह रहे हैं मंगल करनी क्या मंगल करती है जीव का मंगल कैसे होता है ज्ञान और 00:15:55 वैराग्य सेही तो जीव का मंगल होता है. 00:16:01 संसार के स्वरूप का ज्ञान हो जाए और उससे वैराग्य हो जाए इसी से ही तो जीव का मंगल है 00:16:08 इससे दृष्टि हटे तभी तो आत्म कल्याण की बात मन चित्त में आए संसार से दृष्टि तो हटे कभी आपसे 00:16:17 मैंने कहा था ना भाई भगवान से हमको आशा तो है पर अभी संसार से निराशा नहीं हुई अभी आशा 00:16:23 का बंधन यहां बंधा है अभी डोर यही पर बंधी है तो. 00:16:28 मंगल करती है ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को पुष्ट करती है मंगल करनी कलि मल और जो मैले कुचले 00:16:40 संस्कार हमारे भीतर है जो जन्म जन्मांतर से हमने अर्जित किए हैं उनको धो देती है यथा यथा आत्मा परि 00:16:49 मृते स मत पुण्य गाथा शव विधान तथा तथा पत. 00:16:58 तव सूक्ष्म चरवा जन सम प्रयुक्त भगवान का श्रीमुख वाक्य सुनते रहोगे सुनते रहोगे क्या होगा देखते देखते व मैले 00:17:13 कुचले संस्कार जो मन में है ना जो बारबार धकेल हैं अशुभ की ओर अपवित्र की ओर बड़ी विनम्रता पूर्वक 00:17:24 मैं आपसे कहूंगा सावधान रहना मन का एक अपवित्र स. 00:17:28 कल्प पतन के बड़े गहरे अंधकार में आपको धकेल सकता है एक अपवित्र संकल्प इसलिए वेदों की रचा है भगवती 00:17:37 श्रुति कह रही है तन में मन शिव संकल्प मस्तु प्रभु की कृपा हो हमारा संकल्प पवित्र हो हमारा संकल्प 00:17:47 शुभ 00:17:51 हो इसीलिए कहा जाता है आपसे शुभ कर्म करिए सत्कर्म करिए अवसर मिले करते. 00:17:58 चलिए सबकी सेवा करिए क्योंकि भाई ना जान छिन अंत कवन बुद्धि घट प्रकाशित आपको पता नहीं है हमको खबर 00:18:08 ही नहीं भाई हमारे भीतर अभी कौन-कौन सा बवाल भरा है कितने जन्म जन्म के संस्कार अर्जित है कभी कहा 00:18:16 था मैंने आपसे कौन कहता है कुछ साथ नहीं आया कुछ साथ नहीं जाएगा नहीं भाई मन साथ आया और 00:18:22 यह साथ ही जाएगा इसका ध्यान रखना है इसकी संभाल करनी है. 00:18:28 मन साथ आया है संस्कार साथ में आए हैं और ये साथ में ही जाएंगे तभी संत कह रहे हैं 00:18:35 मन ही मिलावे राम से जब तक प्रभु नहीं मिलेंगे तब तक इसकी दौड़ समाप्त नहीं होगी मन ही मिलावे 00:18:43 राम से तो मन साथ आया है संस्कार साथ में आए हैं कितने जन्मों के संस्कार भरे हैं भीतर वही 00:18:51 तो भजन नहीं करने देते हैं कभी आपने सोचा है कितने मन से आप माला लेकर बैठते हो कितना प्रयास 00:18:58 करते हो आप भजन में मन लग जाए लग जाए नहीं लगता है आप देखो आप रोज बैठ रहे हो 00:19:04 प्रयास कर रहे हो पर मन नहीं लग रहा है क्यों नहीं लग रहा है भाई पूर्व का संस्कार शोभ 00:19:09 पैदा करता है पूर्व के संस्कार के कारण ही विस्मृति गाड़ी होती चली जाती है आप और मैं तो बड़भागी 00:19:19 है नित्य प्रभु अपने चरणों में लाकर बैठा हैं हम संतों की वाणी का आश्रय लेकर कुछ कह सुन लेते 00:19:25 हैं आप देखो. 00:19:28 आप देखो संसार में लाखों करोड़ों मनुष्य जिनको सुधि नहीं है इस बात की जो शरीर के भोग से इतर 00:19:35 और कुछ भी संभव हैय जानते ही नहीं है उन्हीं को देखकर तो कबीर कहते हैं खाना पीना सोना और 00:19:46 ना कोई चीत सदगुरु शबद विसार आदि अंत का. 00:20:04 नारायण स्वामी जो फटकार लगाते हुए कहते हैं क चटक मटक नित छैल बन तकत फिरत च 00:20:15 और माया मरी न मन मरा और मर मर गए शरीर और आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर 00:20:26 शरीर वृद्ध हो जाता है. 00:20:28 जरजर हो जाता है लेकिन व्यक्ति उसको स्वीकार नहीं करता है व्यक्ति शरीर की जर जरता को कहां स्वीकार करता 00:20:34 है मैं बूढ़ा हो रहा हूं मैं वृद्ध हो रहा हूं मेरा सौंदर्य मेरा यवन सब जा रहा है इसको 00:20:41 व्यक्ति कहां स्वीकार करता है अंत तक प्रयास करता रहता है भाई कुछ बच जाए कुछ तो रह 00:20:52 जाए कि बचकर भागना नहीं है तो क्या है प्रकृति की व्यवस्था है बाल सफेद हो गए उ. 00:20:58 फिर काला कर रहा 00:21:03 है ये सत्य को स्वीकार ना करना ही तो है बचकर भागना ही तो है और क्या है कैसे कैसे 00:21:10 उपक्रम व्यक्ति करता है आज तो राम राम पूछो ही मत कैसी दशा हो गई 00:21:18 है संत को दया आती है तभी वह कहते हैं क्रोध ना छोड़ा मोह ना. 00:21:29 छोड़ा क्रोध ना छोड़ा मोह ना छोड़ा हरि का भजन क्यों छोड़ दिया रे मन नाम जपन क्यों छोड़ दिया 00:21:54 चटक मटक निद छैल बन तकत फिरत चहर. 00:21:58 नारायण ये सुध नहीं आज मरे के 00:22:06 भोर कह रहे हैं हाथ जोर ठा रयो ध्यान से सुनना क रे हाथ जोर ठाडो रयो जिनके सन्मुख काल 00:22:20 रे काल जिनके सन्मुख हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर खड़ा रहता था रे नारायण. 00:22:28 तेव बली और गए काल के 00:22:34 गाल अरे उनका भी बस आज लिखो रह गयो 00:22:41 नाम धर्म राय जब लेखा 00:22:49 मांगे क्या मुख लेके जाएगा रे मन राम सिमर. 00:22:58 पछताएगा रे मन राम सिमर 00:23:06 पछताएगा य यह जो शब्द है ना यह करते हैं ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को पुष्ट करते हैं मैले 00:23:14 कुचले विचारों को धोते हैं इसलिए मेरे तुलसी बाबा कह रहे हैं हाथ जोड़कर कहिए भाव में भर कर कहिए 00:23:27 मंग. 00:23:29 करनी कलि मल हर यही प्रसाद हमको प्राप्त हो तुलसी कथा रघुनाथ की मंगल करनी कलि मल हर जी को 00:23:52 लगा भाई कथा का विश्राम नहीं होना चाहिए यह ऐसा शुभ संयोग बन गया है ऐसे ऐसे. 00:23:58 राम कथा के गायक हमको मिल गए हैं जितना सुन सके उतना सुने और फिर दूसरी बात गरुड़ जी के 00:24:03 मन में विचार हुआ भाई प्रसाद बांटना चाहिए हमने तो कथा सुन ली इनसे कुछ ऐसा भी पूछे जिससे आने 00:24:10 वाले समय में इस प्रसंग का चिंतन इस प्रसंग का श्रवण करने वाले का हित हो कल्याण देखो वास्तविक बात 00:24:21 तो यही है पूर्व में भी मैंने कभी आपको संकेत किया था कि. 00:24:27 अर्जुन को मोह नहीं हो सकता अर्जुन भ्रमित नहीं हो सकते तो भगवान की विभूति है भगवान अर्जुन को निमित्त 00:24:35 बनाते हैं गीता का ज्ञान देने के लिए जैसे किसी जननी की कोख का चयन करते हैं ना भगवान इस 00:24:44 संसार में आने के लिए कोई तो निमित्त बनता है ऐसे भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाया कि उस ज्ञान 00:24:51 का प्राकट्य कैसे हो संसार 00:24:56 में. 00:24:59 यही बात श्री गरुड़ जी ने मन में विचारी भाई अभी अवसर मिला है ऐसी चर्चा हो रही है थोड़ी 00:25:04 और बात पूछे इनसे कुछ ऐसा ज्ञान इनके हृदय से प्रकट हो जो अनंत काल तक अनंत काल तक जीवों 00:25:13 का कल्याण करता रहे और यही संत का लक्षण है मोरे मन प्रभु अस 00:25:25 विश्वासा राम. 00:25:28 अधिक राम कर दासा रामत 00:25:40 अधिक तो गरु जी ने कहा नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रश्न मम क बखानी सात प्रश्न है मेरे 00:25:48 उनका उत्तर दीजिए प्रथम ही क नाथ मति धीरा. 00:25:58 सबते दुर्लभ कवन 00:26:04 शरीरा बड़ दुख कवन कवन सुख भारी सो संक्षेप ही कहु बचारी संत असंत मरम तुम जान तिन कर सहज 00:26:29 सुभव बखान कवन पुण्य श्रुति विदित विशाला कह कवन अघ परम करा पले तोय छह प्रश्न सबसे पहला प्रश्न सबते 00:26:50 दुर्लभ कवन शरीरा फिर पूछा सबसे बड़ा दुख कौन सा है और सबसे बड़ा सुख कौन सा है. 00:26:58 संत और असंत का लक्षण कहिए मुझसे ऐसा श्री गरुड़ जी पूछ रहे हैं संत का लक्षण क्या है और 00:27:04 असंत का लक्षण क्या 00:27:09 है और आपके मत में पाप क्या है और पुण्य क्या है और इसके बाद मानस रोग कह 00:27:23 समझाई तुम सर्वज्ञ कृपा. 00:27:30 अधिका तात सुनहु सादर अति प्रीति मैं संक्षेप कह यनी पहले प्रश्न का उत्तर शिका सुंडी जी कहते हैं नरस 00:27:51 नर तन सम नहीं कवन उ देही. 00:27:58 जीव चराचर जा चत 00:28:06 ते नरक स्वर्ग अपवर्ग नि सेनी ज्ञान विराग भगति सुभ दे बड़े संक्षेप में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात शि काग. 00:28:27 जी ने कह दी कि नर तन सम नहीं कवन देही सबसे पहली बात तो हम यहां यह विचार करें 00:28:37 कि देखो सब संत एक मत से एक स्वर से मनुष्य शरीर की महिमा गा रहे हैं सुर दुर्लभ सई 00:28:45 ग्रंथन गावा मैं स्वयं से भी पूछूं आपसे भी 00:28:54 पूछूं कितनी बार हमारे जीवन में. 00:28:57 ऐसा क्षण आया होगा जब हमने हृदय से प्रभु को धन्यवाद दिया होगा कि प्रभु आपने कृपा करके हमें इस 00:29:04 भारत भूमि पर मनुष्य का शरीर दिया 00:29:09 है किया है कभी ऐसा शायद नहीं जब हृदय से केवल इस बात का ही धन्यवाद दिया हो कितनी कृपा 00:29:19 है 00:29:24 आपकी क्योंकि दुर्लभ त्रय. 00:29:29 देवानुकू महापुरुष संशय भगवत पाद शंकराचार्य कह रहे 00:29:38 हैं ये कै कैसी दुर्लभ देन प्रभु ने सहज कृपा से प्रदान की है देखो यह जो आत्म कल्याण की 00:29:49 यात्रा है ना इसका प्रथम चरण यही है जो सबसे पहले इस जीवन का मूल्य समझेगा. 00:29:57 वही आत्म कल्याण का प्रयास करेगा वही पुरुषार्थ कर पाएगा जो सबसे पहले जीवन का मूल्य समझेगा कि कितनी मूल्यवान 00:30:05 वस्तु प्रभु ने कृपा करके मुझे दे 00:30:10 दी य एक एक तव स्वास का तीन लोक नहीं 00:30:19 दान कबीर कह रहे हैं ना जागन की कर चोप रे मन सोया क्या करे और जागन की कर चोप 00:30:29 हर दम हीरा लाल है गिन गिन गुरु को सौप सबसे पहली बात यह है साधक जीवन का सबसे पहला 00:30:38 गुण सबसे पहला लक्षण यही है कि उसको जीवन का मूल्य पता हो कि कितनी मूल्यवान वस्तु प्रभु ने मुझे 00:30:44 दिए और मूल्यवान ही नहीं अमूल्य इसका कोई मोल नहीं है एक एक तव स्वास का तीन लोक नहीं दान 00:30:54 प्रपंच से बचाने के लिए सबसे पहले तो इसी. 00:30:57 बात का चिंतन आवश्यक है ना कि भाई ये मनुष्य शरीर करुणा करके प्रभु ने मुझे प्रसाद दिया है जिसके 00:31:06 जिसके जीवन में जिसके जीवन में इस बात का इस भाव का प्रकाश हो जाएगा वह कभी समय व्यर्थ नहीं 00:31:15 कर सकता पहले भी मैंने आपसे कभी कहा था ना कि समय ही जीवन है और जीवन क्या है जन्म 00:31:23 और मृत्यु के बीच की जो अवधि है जो काल है जो समय है. 00:31:27 उसी का ही तो नाम जीवन है जीवन का आदर करने वाला समय का निरादर कैसे कर सकता है यही 00:31:35 बात तो संत कह रहे हैं अरे जो छोड़ना था वह नहीं छोड़ा क्रोध ना छोड़ा मोह ना छोड़ा क्रोध 00:31:49 ना छोड़ा मोह ना छोड़ा हरि का. 00:31:57 भजन क्यों छोड़ दिया रे मन नाम जपन क्यों छोड़ दिया अ मीरा सूर कबीर तुलसी नानक 00:32:15 रदास इन सबने जब जब भजन की बात की नाम जप पर बल दिया है नाम जपन क्यों छोड़ 00:32:25 दिया एक एक. 00:32:27 नाम जप ऐसा है कि आपका मन हो ना हो लगे ना लगे प्रणाम जपत मंगल दसी दस 00:32:40 हू कारण है क्यों पूछा क्या गरुड़ जी नहीं जानते आपको क्या लगता है जिनके पंखों से सामवेद की ध्वनि 00:32:50 प्रकट होती है वो गरुड़ जी इतनी सी बात नहीं जानते होंगे सबते दुर्लभ कवन शरीरा. 00:32:57 पर एक तो काग बसु जी बड़े अनुभवी हैं महादेव यही कहकर तो उनकी स्तुति करते हैं बहु कालीना बड़े 00:33:05 पुराने हैं वोह बड़े अनुभवी हैं एक वृद्ध व्यक्ति का आदर क्यों होता है क्योंकि उसके पास जीवन का अनुभव 00:33:13 अधिक है जीवन का अनुभव व्यक्ति को समृद्ध बनाता है उसके पास अनुभव 00:33:22 है इसीलिए तो बड़े बूढ़ों का सम्मान किया जाता है क्योंकि अनुभव में बड़े हैं. 00:33:27 उनके पास जीवन का अनुभव 00:33:33 है तो गरुड़ जी ने पूछा भाई अनुभवी व्यक्ति से भी सुन लो गरुड़ जी ने यह बात तो आपको 00:33:38 और मुझे सुनाने के लिए पूछी है जो भी प्रश्न गरुड़ जी ने पूछा है वह सब जानते हैं आप 00:33:43 और मैं सुन ले इन दो महापुरुषों की इन दो महा भागव तों की वार्ता से आपको मुझे कुछ प्राप्त 00:33:49 हो जाए आप पर मुझ पर कृपा करके गरुड़ जी ने ये प्रश्न पूछे क्योंकि मैंने कहा ना प्रसाद अकेले 00:33:55 नहीं पाना चाहिए बांट कर पाना. 00:33:57 चाए कर जी ने कहा भाई हमने तो प्रसाद पा लिया अब थोड़ा बांटना भी चाहिए तो इनसे कुछ ऐसी 00:34:01 बात पूछे जिससे जनमानस का मन मानस शुद्ध हो 00:34:11 जाए क सबते दुर्लभ कवन शरीरा नर तन सम नहीं कवन उ देही बो इसके जैसा तो कोई और देह 00:34:20 नहीं है जीव चराचर जाच तेही सुर दुर्लभ देवता लालायित रहते हैं. 00:34:32 श्रीमद भागवत में भगवान वेदव्यास क रहे अहो अमशाम किम का शोभन प्रसन्न य शमत स्वयं हरि जिसको भारत भूमि 00:34:41 पर मनुष्य का जन्म मिला है उस पर तो श्री हरि 00:34:49 सर्वात्मक भूमि में मनुष्य का जन्म मिला है मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है इस पवित्र. 00:34:57 भूखंड के अतिरिक्त ऐसे तो भाई हरि व्यापक सर्वत्र 00:35:04 समाना पर मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस पवित्र भूखंड के अतिरिक्त भी मनुष्य जन्म लेते हैं 00:35:12 लेकिन जन्म से मृत्यु पर्यंत यात्रा आगे बढ़ती है केवल विकारों के साथ एक यह देश ऐसा है एक यह 00:35:20 भूमि ऐसी है यहां पर जब कोई जन्म लेता है ना तो जन्म लेने से पहले ही हमारे यहां तो 00:35:27 जीव जब गर्भ में आता है तो गर्भाधान संस्कार होता है उससे पहले या जन्म से पहले और मृत्यु के 00:35:33 बाद तक भी जो क्रिया की जाती है उसे अंतिम संस्कार कहते हैं संस्कार जन्म से मृत्यु पर्यंत य संस्कारों 00:35:42 के साथ आपको अपनी यात्रा गौरव और गरिमा से आदर से सत्कार से आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है यह 00:35:51 ऋषि मुनियों की तप पूत भूमि है मैं कहा करता हूं. 00:35:56 कि इस इस धरती ने बड़े दुर्दिन देखे हैं भारत की भूमि ने बड़े कठिन बड़े कठोर दिन देखे हैं 00:36:06 ऐसा तो समय आया जब यहां सुख सुख चैन की घड़ियां नहीं थी लेकिन इस भूमि का सौभाग्य है कि 00:36:13 एक दिन भी आज तक यहां ऐसा नहीं आया जब इस भूमि पर कोई संत नहीं था जब सारे सारे 00:36:22 विश्व की मंगल कामना करने वाला कोई संत इस भूमि पर नहीं था ऐसा दिन अभी एक भी. 00:36:26 नहीं 00:36:30 आया मैं तो कल ही किसी से कह रहा था कि देखो हम कितने सौभाग्यशाली हैं हम मैं आप हम 00:36:37 सब कितने सौभाग्यशाली हैं भाई हमारे पूर्वजों ने तो मंदिर टूटते देखे हैं हम बड़भागी है कि हम मंदिर बनता 00:36:44 देख रहे हैं कितना कठिन समय रहा होगा हमारे पूर्वजों के लिए जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनी. 00:36:56 श और विश्वास के केंद्रों को क्षत विक्षत होते देखा होगा खंड खंड होते देखा होगा हम बड़भागी हैं हमको 00:37:03 ऐसे समय में जन्म मिला है जब हम मंदिर बनता देख रहे हैं जब हम जब हम सनातन धर्म का 00:37:12 यह धर्म ध्वज लहराता देख रहे हम सबका सौभाग्य है अब बात हुई है मुझे मुझे स्मरण हो आया है 00:37:21 तो एक बार प्रेम से दो क्षण के लिए भगवन नाम का उच्चारण कर दीजिए एक बार सब. 00:37:26 प्रेम से कहिए राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय 00:37:39 सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:37:52 राम जय राजा राम राम राम जय. 00:37:57 सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:38:09 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम देखो यह नाम तो ऐसा है मैं सोचता हूं कोई किसी भी 00:38:18 धर्म का किसी भी मत का हो व किसी भी विधि से. 00:38:27 साधन करता हो यह एक नाम तो ऐसा है भाई जो अनंत अनंत काल से इस भरत खंड की चेतना 00:38:37 में रमा है य इस देश में जो जो सूरज की पहली किरण फूट है ना उसके साथ ही केवल 00:38:45 पंछी नहीं चह चहाते चारों र एक शब्द और भी और भी गुंजित होता है और वो क्या है राम 00:38:52 राम जी राम राम जी राम राम. 00:38:56 जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम हरे रामा रामा राम 00:39:08 सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम 00:39:22 हरे रामा रामा राम सीता राम रा. 00:39:26 राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:39:40 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:39:53 राम हरे रामा रामा. 00:39:56 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:40:09 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:40:22 राम सीता राम राम राम. 00:40:26 हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम अरे रामा रामा राम 00:40:38 सीता राम राम राम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम राम राम जय राजा राम राम 00:40:49 राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम. 00:40:56 राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम 00:41:05 राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता 00:41:25 राम.

अपने दोषों को भूल कर भी अनदेखा ना करें ||41|| Shree Hita Ambrish Ji

अपने दोषों को भूल कर भी अनदेखा ना करें ||41|| Shree Hita Ambrish Ji 

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given

संत का स्वभाव और परोपकार | संतत्व की वास्तविक पहचान

The Nature of a Saint and Selfless Service | The True Mark of Sainthood https://youtu.be/4ozu5eEm584 [00:42] संत वही है जो दूसरों के दुख से दुखी होता है और परोपकार को ही अपना सहज स्वभाव मानता है। A saint is one who feels the pain of others and considers selfless service to be his natural disposition. [02:42] प्रभु के निकट वही जाता है जो परोपकारी है। जीवन केवल स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ के लिए मिला है। Only one who is benevolent draws near to the Lord. Life has not been given merely for selfish purposes, but for the welfare of others. [04:32] संत दूसरों के सुख के लिए कष्ट सहते हैं, जबकि असंत (दुष्ट) दूसरों के दुख का कारण बनते हैं। Saints endure hardships for the happiness of others, whereas wicked people become the cause of others' suffering. [06:29] वास्तविक आध्यात्मिकता मंदिर में नहीं, बल्कि आपके दैनिक व्यवहार में दिखती है। व्यवहार ही आपके चरित्र की असली परीक्षा है। True spirituality is not demonstrated merely in the temple, but in your daily conduct. Conduct is the real test of your character. [10:29] किसी का बुरा सोचने मात्र से मन भजन के अयोग्य हो जाता है। एक अपवित्र संकल्प पतन का कारण बन सकता है। Merely thinking ill of someone makes the mind unfit for devotion. A single impure thought can become a cause of downfall. [12:05] जैसे ही अपने भीतर कोई दोष दिखाई दे, उसे प्रार्थना और पुरुषार्थ से तुरंत दूर करने का प्रयास करें। As soon as you notice any fault within yourself, immediately make an effort to remove it through prayer and determined effort. [20:43] शरीर को सजाने से अधिक आवश्यक मन को सजाना है। राग, द्वेष और ईर्ष्या को हटाकर सद्गुणों को अपनाना ही असली श्रृंगार है। Adorning the mind is more important than adorning the body. Removing attachment, hatred, and jealousy and adopting virtues is the real adornment. [25:36] अहिंसा (मन, वचन और कर्म से) सबसे बड़ा धर्म है और परनिंदा (दूसरों की बुराई करना) सबसे बड़ा पाप है। Non-violence through thought, word, and deed is the greatest धर्म, while criticizing others is the greatest sin. [34:50] जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वे आध्यात्मिक धन खो देते हैं और अंधकारमय गतियों को प्राप्त होते हैं। Those who criticize others lose their spiritual wealth and attain dark and undesirable destinations. https://youtu.be/4ozu5eEm584 -----

Full Transcript


00:00:00 तो सबसे बड़ा दुख दरिद्रता और दरिद्रता में भी जो भाव की दरिद्रता है वो सबसे बड़ा दुख है सबसे 00:00:08 बड़ी पीड़ा है और संत मिलन सब सुख जग नाही पर उपकार वचन मन काया संत सहज स्वभाव 00:00:28 खगरा. 00:00:30 संत सहज सुभा खगरा और संत का संत क्या है किरे जो पर दुख के लिए जो पर दुख से 00:00:42 कातर होकर जो पर पर पीड़ा से तप्त होकर स्वयं दुख सह रहा है कल एक छोटी सी बात मैंने 00:00:50 आपको निवेदन की थी जिस दिन पराई पीड़ा से आप भी पीड़ित हो जाओ उस दिन समझना अब हमारा मन 00:00:59 भगवान के भजन. 00:01:00 योग्य हो रहा है आप पराई पीड़ा से पीड़ित हो जाओ अपनी पीड़ा से तो भाई सभी पीड़ित है सब 00:01:06 रो लेते हैं इस दिन किसी का दुख आपको दुखी कर दे संत का सबसे पहला गुण यही बता रहे 00:01:14 परोपकार और किससे वचन मन काया शरीर से भी मन से भी और वचन से भी जो सतत परोपकार में 00:01:22 संलग्न है सेवक जी श्री महाप्रभु जी के अवतरण का हेतु क्या बताते. 00:01:30 देह धरण परोपकार के लिए जिन्होंने देह धारण किया है और कोई प्रयोजन नहीं है पलटू साहब कहते हैं पर 00:01:38 परमार्थ के कारण लियो संत 00:01:44 अवतार और श्रीमद भागवत तो कहती है भगवान की सबसे बड़ी आराधना यही है तपत लोक तापन बो जो संसार 00:01:53 के ताप से तप रहा है अर्थात जो संसार को दुखी देखकर दुखी है जो जीव को दुख. 00:02:00 पाता देखकर दुखी है वो साधु है और उस उस दुख को दूर करने का जो प्रयास कर रहा है 00:02:08 भगवान के नाम रूप लीला का गान करके जो यह प्रसाद जगत को बांट रहा है वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ 00:02:14 पुजारी है उपासक है आराधक 00:02:20 है आज जहां से हमने चर्चा आरंभ की जहां भी हम खड़े हैं जिस भी स्तर पर हम खड़े हैं 00:02:26 जो भी साधन हमारे पास है हम कम से कम वहीं से पर. 00:02:29 का आरंभ तो करें जो भी आपके पास हो शरीर से कर सको धन से कर सको आपके पास विद्या 00:02:37 हो विद्या से कर सक कोई गुण हो आपको प्रभु ने दिया उस गुण से सेवा कर सक पर आपके 00:02:42 जीवन में परोपकार आरंभ तो हो परोपकारी ही प्रभु के निकट जाता है 00:02:50 परोपकारी जब कुछ वर्ष पहले आपको मैंने निवेदन किया था ना भाई नाम जप करना सबके हित का विचार करके 00:02:57 केवल परमार्थ की भावना का. 00:02:59 बीज बोने के लिए यह बात मैंने आपसे कही थी कि हमारे भीतर ये परमार्थ का भाव तो अंकुरित हो 00:03:07 कि भाई कुछ हमको ऐसा भी करना है जो अपने लिए नहीं करना है सब कुछ स्वार्थ के लिए नहीं 00:03:14 करते चले जाना है जीवन तो परमार्थ के लिए मिला 00:03:22 है अब एक व्यक्ति जाकर भगवान से प्रार्थना करे प्रभु मेरे घर बारिश हो जाए एक. 00:03:30 केवल जाकर के प्रभु वर्षा हो जाए भाई वर्षा हो जाए तो अपने घर तो होही जाएगी आप यह ना 00:03:39 समझना कि भाई हम सबके लिए करते र जाएंगे तो हमारा कार्य कैसे होगा ना ना आपका तो पहले हो 00:03:45 ही जाएगा और मुझे तो लगता है आधा हो गया है तभी तो आप सबके लिए करने चले हो जिसके 00:03:51 मन में यह परमार्थ की भावना प्रतिष्ठित हो गई है उसका आधा कार्य तो होही गया है भाई तभी तो 00:03:58 व इस दिशा में चला. 00:03:59 निकला 00:04:03 है और यहां तुलसी बाबा तो संत का ही लक्षण बता रहे हैं पर उपकार वचन मन काया संत सहज 00:04:18 स्वभाव खगरा बो यही संत का सहज स्वभाव होता है संत सह ही दुख परही. 00:04:32 लागी पर दुख है तू असंत अभ अगले प्रश्न श्री गरुड़ जी ने यही पूछे थे ना संत का लक्षण 00:04:42 क्या है असंत का लक्षण क्या है संत सहाई दुख परहित 00:04:51 लागी संत कौन है क जो दूसरे के लिए दुख सह रहा है और असंत कर जो दूसरे के दुख 00:04:57 का कारण बन रहा है. 00:05:00 किसी भी प्रकार से जो दूसरे के दुख का कारण बन रहा है वही असंत है आपको याद हो कभी 00:05:09 मैंने आपको संकेत किया था भाई किसी की सेवा सहायता ना कर सको चलो कोई बात नहीं पर जीवन में 00:05:16 कभी किसी की कष्ट और पीड़ा का कारण तो बिल्कुल नहीं बनना कांटा तो बिल्कुल नहीं बनना साधक ना बन 00:05:24 सको तो कम से कम बाधक तो किसी के लिए आप बिल्कुल भी ना होना हो सकता है. 00:05:29 कि अभी हमारे पास इतना बड़ा मन ना हो हमारे पास इतना बड़ा हृदय ना हो कि हम सबका सम्मान 00:05:35 कर सके पर किसी का अपमान ना करें हमारे हमारे मुख से कभी कोई ऐसा कठोर ऐसा कठोर वचन कोई 00:05:45 कठोर शब्द ना निकले जो किसी का हृदय दुखा दे जो किसी के लिए पीड़ा का कारण बन जाए ऐसा 00:05:50 ऐसा तो प्रयास करना ही चाहिए क्योंकि हम साधक 00:05:56 हैं बुल्ले शाह एक बात कहते हैं. 00:05:59 कहते बुलिया ज तू कभ किसी द फट नहीं सीता बुलिया ज कद किसी का फट नहीं सीता फिर माला 00:06:12 तू कख नहीं कीता मैं तो कहता ही हूं भाई मंदिर में तो सभी भक्त हैं अपने मंदिर में या 00:06:21 भगवान के मंदिर में जो खड़े हैं भाई व तो सभी भक्त है पर आपके चरित्र का वास्तविक दर्शन. 00:06:29 व्यवहार में होता है व्यवहार में आप कैसे हैं जो दैनिक व्यवहार आप करते हैं उसमें आपकी चेष्टा कैसी है 00:06:37 उसमें आपकी वृत्ति कहां है शुद्ध है कि नहीं है इसलिए मैं कहता हूं भाई सब छोड़कर और एक और 00:06:45 बैठ जाना सरल है पर व्यवहार में रहकर स्वयं को साधे रखना यह बहुत कठिन कार्य है उसके लिए वास्तविक 00:06:51 आध्यात्मिक बल की आवश्यकता है परीक्षा तो व्यवहार में ही होती 00:06:58 है. 00:07:02 यहां तो भाई किसी को हम धक्का मार के और आगे आकर बैठते हैं व्यवहारी तो बताता है अब उसको 00:07:09 आप यह कहते हो भाई य तो हमारी भावना है आपके 00:07:15 लिए आज नहीं तो कल स्वयं को स्वयं के हृदय को कसौटी पर कसना पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा कभी तो 00:07:23 आओगे कसौटी पर किसी दिन तो भाई परीक्षा देनी पड़ती है क्योंकि उसके. 00:07:29 बिना तो अगली कक्षा में कोई बालक जा नहीं सकता है कब तक टा होगे किसी दिन तो कसौटी पर 00:07:36 खरा उतरना पड़ेगा ना आपका व्यवहार कैसा 00:07:44 है ये ये जो बात यहां कही गई है ना ये केवल संत के लिए नहीं है तो भाई आपके 00:07:50 मेरे सबके लिए कही जा रही है मैंने कल ही आपसे बात कही थी कि सब प्रश्नों के उत्तर गरुड़ 00:07:55 जी जानते हैं ऐसा हो ही नहीं सकता गरुड़ जी ना जानते हो आपके मेरे लिए पूछा है. 00:08:01 काक बु सुंडी जी जो उत्तर देंगे आपके मेरे काम की बात है इसलिए पूछी है इसलिए आपको मुझे सुना 00:08:06 रहे 00:08:10 हैं और हम हम अपनी बात करें तो भाई हित की यहां उपासना हित के हैं हम दास हमारे आचार्य 00:08:18 का तो पहला वाक्य और उसका भी पहला शब्द सब सोहित निष्काम मती आगे की बात बाद में करेंगे पहले 00:08:28 यहीं पर. 00:08:30 चर्चा कर लेते हैं है हमारे भीतर यह बात सब सोहित और सब में सिर्फ अपने अपने नहीं आते सब 00:08:38 में तो सब आते हैं सब में सब आते हैं श लाडली दास जी कह र चीटी सोले जुगल तक 00:08:47 सब सोहित 00:08:53 निष्काम अपने अपनों से तो भाई सभी कर रहे हैं ना पर सब सोहित. 00:09:02 और कम से कम इस उपासना के मार्ग पर तो कोई शॉर्टकट नहीं है कहीं होता हो तो पता नहीं 00:09:08 यहां तो नहीं है यहां तो भाई गुरुजन ने जो मार्ग बताया है उसी मार्ग पर चलकर ही कोई पग 00:09:16 पग आगे बढ़ सकता है पहला पहला वाक्य और उसका भी पहला शब्द सब सोहित निष्काम और उसमें भी टर्म 00:09:25 एंड कंडीशन अप्लाई है सबस हित निष्काम. 00:09:29 मति तब वृंदावन विश्राम उसके बाद तो कोई प्रभु का नाम लेने योग्य हो राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान 00:09:44 मुखना तभी आचार्यों ने कहा है जीवे दया नाम रुचि जीव मात्र पर दया आप कल्पना नहीं कर सकते किसी 00:09:55 के भी अहित की भावना किसी के भी अनादर की भावना. 00:09:59 किसी की भी अवज्ञा या अवहेलना की भावना आपके हृदय को आपकी भाव भावना को कितनी भारी क्षति पहुंचा सकती 00:10:07 है आपको याद हो तो कल मैंने कहा था एक अपवित्र संकल्प पतन के गहरे गर्द में ले जाकर छोड़ 00:10:16 सकता है एक अपवित्र संकल्प किसी की भी अवज्ञा अवहेलना की भावना किसी का भी अहित चिंतन अहित करना नहीं 00:10:27 अहित चिंतन मैला. 00:10:29 उछला कर देगा मलीन हो जाएगा मन कोई पूछे ना क्या होता है किसी का अहित चिंतन करने से क्या 00:10:35 होगा तो मैं कहता हूं और तु और तो मैं कुछ नहीं जानता पर मन भजन के योग्य नहीं रहेगा 00:10:41 इससे बड़ी हानि और क्या होगी इससे बड़ी क्षति हमारी और क्या होगी कि हमारा मन भजन के योग्य ना 00:10:48 रहे और कभी ऐसा मन हो जाए कभी ऐसा भाव आ भी जाए किसी के लिए तो दौड़कर प्रभु की 00:10:57 चरण शरण में चले जाना. 00:11:00 भक्तों ने कहा है कि दल बल के साथ माया घेरे जो मुझे आकर तुम देखते ना रहना झट आके 00:11:14 बचा 00:11:17 लेना दौड़ कर जाना मनी मन दौड़ कर जाना चरण पकड़ लेना प्रभु के प्रभु मैं मैं स्वयं को इस 00:11:26 पाप से बचा नहीं पा रहा हूं आप मेरी रक्षा करिए. 00:11:29 आप मुझे संभालिए और अपने प्रति सचेत भी रहना और अपने प्रति ईमानदार भी रहना कल एक छोटा सा उदाहरण 00:11:39 दिया था मैंने आपको किसान बीज डालता है ना अवांछित घास फूस भी पैदा हो जाती है उसको समय रहते 00:11:46 काटना पड़ता है समय रहते छटाई करनी पड़ती है उसकी नहीं तो भूमि की सारी उर्वरक शक्ति जो होती है 00:11:53 व घास खा जाती 00:11:57 है. 00:11:58 परिश्रम व्यर्थ चला जाता है समय रहते और मैं तो कहता हूं अपना दोष दृष्टि में आए तो उसी समय 00:12:05 लग जाओ जब तक दूर ना हो तब तक चैन से बैठना नहीं जैसे अपना दोष दृष्टि में आए सत्संग 00:12:14 करोगे तो यह घटना तो घटेगी अपना दोष दिखाई पड़ेगा लेकिन हम हम छोड़कर बचकर भाग जाते हैं ये मनुष्य 00:12:23 की वृत्ति है आपको उदाहरण दे रहा था ना मैं. 00:12:29 सफेद हो लो आपने काले कर लिए दूसरे को तो काले ही दिख रहे हैं है सफेद दिख काले रहे 00:12:38 हैं आपकी छोटी छोटी चेष्टा बताती है मन कैसा है मन कहां है मन कैसा है किस धरातल पर आपकी 00:12:46 चेतना खड़ी 00:12:53 है इससे बचना और ये जो बात मैंने अभी आपसे. 00:12:58 कही ना बड़ी महत्त्वपूर्ण है इसको आज साथ ले जाना जैसे अपना दोष दिखाई दे उसके लिए उसको दूर करने 00:13:04 के लिए प्रार्थना भी करना पुरुषार्थ भी करना प्रभु से प्रार्थना करना प्रभु मेरी रक्षा करिए और भगवान रक्षा करेंगे 00:13:15 सच्चे हृदय से यदि आप प्रभु से प्रार्थना करेंगे प्रभु मेरे हृदय का यह दोष दूर हो जाए प्रभु तत्काल 00:13:23 कृपा करते हैं उसी क्षण देव द्वार से कृपा अवतरित होती है ये बात में आपको. 00:13:28 अपना अनुभव बता रहा भाई हम संसार में रहते हैं व्यवहार में रहते हैं आ जाता है ऐसा कोई वैसा 00:13:35 कोई भाव ऐसा कोई विचार मन में आ जाता है उसको अनदेखा ना करें मैं यह कह रहा हूं इस 00:13:40 दोष को इस रोग को अनदेखा ना करें व जड़ पकड़ 00:13:50 लेगा क्या होता है भाई व्यक्ति अपना पुण्य देखता है दूसरे. 00:13:59 का पाप देखता है अपना पुण्य देखता है दूसरे का पाप देखता है और इसका परिणाम क्या होता है एक 00:14:11 पग भी जीवन में आगे नहीं बढ़ पाता मैं बड़ी विनम्रता पूर्वक यह बात आपको कह रहा हूं क्यक ऐसा 00:14:17 भी मैंने देखा कि 10 10 151 साल लगे हुए हैं अपनी ओर से साधन में लेकिन उनकी वृत्ति में 00:14:26 उनके व्यवहार में तनिक सा भी कोई परिवर्तन. 00:14:29 कल भी वही छोटी छोटी बातें थी जिनको पकड़ पकड़ कर और राग द्वेष में उलझे रहते थे आज भी 00:14:35 वही बातें खूब सेवा कर रहे हैं खूब सब कर रहे हैं लेकिन मन नहीं बदल रहा है जीवन में 00:14:41 परिवर्तन नहीं आ रहा है द्वंद का प्रभाव जो का त्य बना हुआ है जीवन पर यह बता रहा है 00:14:50 कि भाई गति नहीं हो रही है जीवन गतिमान नहीं है अटका है कहीं अटका है. 00:15:01 और मैं आपको उपदेश नहीं कर रहा हूं एक साधक की भाति आपको बड़ी विनम्रता पूर्व की बात कह रहा 00:15:07 हूं कि अगर आप मेरे इस अनुभव से थोड़ा लाभ ले सके आप सच्चे हृदय से प्रार्थना करो प्रभु से 00:15:13 कि प्रभु मेरे हृदय का यह दोष दूर हो जाए प्रभु तत्काल कृपा करेंगे कोई ना कोई विचार आपको मिलेगा 00:15:20 कोई ना कोई शब्द आपको मिलेगा कभी-कभी कोई ग्रंथ आ जाता है कभी-कभी कोई संत आ जाता है लेकिन आपके 00:15:26 भीतर परिवर्तन होगा. 00:15:29 एक बात तो मैं आपसे सदा से कहता ही हूं कि भाई अच्छा होना और अच्छा बने रहना यह दो 00:15:37 बातें हैं ऐसे मन अच्छा हो जाता है कभी-कभी अच्छा बना भी तो रहे मन शुद्ध हो जाए और फिर 00:15:43 शुद्ध बना रहे यह बड़ी बात है मन की शुद्धता बनी रहे शिखर पर पहुंचना आसान होता है शिखर पर 00:15:52 बने रहना कठिन होता है पहाड़ की चोटी पर जो लोग चढ़ते हैं ना बहुत देर वहां ठहर नहीं पाते 00:15:58 झंडा. 00:15:58 के वापस आ जाते हैं बहुत देर वहां कोई रह नहीं सकता है शिखर पर बने रहना कठिन होता है 00:16:05 ऐसी जीवन जीवन शिखर पर पहुंचे और फिर बना रहे बड़ी चुनौती है वहां पर बने 00:16:17 रहना इसके लिए लगे रहना पड़ेगा स्वयं के साथ स्वयं को ई देखते हुए स्वयं को ही संभालते हुए साधक 00:16:25 के जीवन में तो समय नहीं होता किसी दूसरे को देखने का दूसरे का विचार ही कैसे. 00:16:28 करेगा तो स्वयं को ई देख रहा है और मैंने कहा कि सत्संग करोगे ईमानदारी से अपने सुधार के लिए 00:16:37 सत्संग करोगे यह परिणाम तो जीवन में अवश्य आएगा ही आएगा अपना दोष आपको दिखाई पड़ेगा अपना दोष दिखाई 00:16:47 पड़ेगा और अगर आपने अपने मन को व्यस्त रखा अपना सुधार करने में तो आप देखो जितना अनुचित अवांछित जीवन 00:16:56 में है सब दूर हो जाएगा सब. 00:16:58 छिटक जाएगा क्योंकि आपका मन तो व्यस्त है मन एक है एक साथ दो स्थान पर वो रह नहीं सकता 00:17:04 मन आपका व्यस्त है अपनी संभाल करने में कल भी आपसे मैंने कहा था ना भाई पिछला जो है वह 00:17:13 सुधर जाए और अगला संवर जाए यही हमारा लक्ष्य हो यही हमारा उद्देश्य हो जो भूल हमसे होती आई है 00:17:21 अब वह सुधर जाए अब और ना हो क्यों ना हो क्योंकि भाई अब प्रभु की शरण में आ गए 00:17:27 हैं. 00:17:30 प्रभु का दरबार यही तो है सूरदास जी गाते हैं ना बैठे सब सभा हरि जू की बैठे सब सभा 00:17:47 हरि जू की कौन बड़ो को छोट बड़ी है. 00:17:59 हरि नाम की ओट ऐसे प्रभु के नाम की ओट में तो आप में यहां पर आकर बैठे य प्रभु 00:18:07 का दरबार ही तो है क्योंकि भाई प्रभु के दरबार में आप पहुंचे हैं अब हमसे ना हो वो भूल 00:18:12 ना हो जो जो जो भूल होती आई व अब सुधर जाए और अगला जीवन संवर जाए इस जीवन को 00:18:23 प्रभु के लिए सजाना है इस जीवन का वास्तविक श्रृंगार करना है तन का श्रृंगार नहीं करना है जीवन. 00:18:28 का श्रंगार कर अपने आप को हार्ड मास का पुतला समझते हो तो अपने तन को 00:18:37 सजाओ अगर आप अपने आप को केवल हार्ड मास का पुतला ही समझते हो तो फिर इसको सजाओ और गुरु 00:18:44 की कृपा से आंख खुल गई है गुरु की कृपा से अंतर दृष्टि प्राप्त हो गई है देख पाते हो 00:18:50 अपने आप को इससे इससे अतिरिक्त कुछ 00:18:56 और कहते तो हो कि. 00:18:58 क् होती है नया जन्म होता है किसका जन्म होता है आपके भीतर एक साधक का जन्म होता है सत्संग 00:19:04 से जो भाव देह प्राप्त होता है दीक्षा के समय उसकी पुष्टि की जाती है उसको सजाना है य ये 00:19:10 यह हाड़ चाम का पुतला प्रभु से नहीं मिलेगा कौन सा निंद गृहित ऐसा कर्म है जो इस शरीर से 00:19:17 नहीं होता है बार-बार नहीं होता है किसी भी दृष्टि से क्या यह प्रभु के योग्य है ना ना यह 00:19:22 तो प्रभु के योग्य नहीं 00:19:26 है क्योंकि ऐसे कई बार. 00:19:28 देखने में आता है ना बात आई है तो मैं कह रहा हूं हम कहते हैं भाई कल उत्सव 00:19:35 है कल उत्सव है अपना श्रृंगार करके आना तो देखने में आता है कि कुछ लोग केवल इसी इसी पुतले 00:19:43 को ही सजाकर आ जाते हैं सत्संग में जो बात कही जा रही है उसका तात्पर्य उसका प्रयोजन समझना चाहिए 00:19:50 ना उसका समझना चाहिए प्रयोजन क्या है किसको कहा जा रहा है मैं यहां जो आपसे सब बात कह रहा 00:19:57 हूं मैं. 00:19:58 मैं किसी स्त्री या पुरुष से बात थोड़ी कह रहा हूं किसी बालक या वृद्ध से थोड़ी कह रहा हूं 00:20:03 आपके शरीर को देखकर यह बात थोड़ी कही जा रही है यहां तो जो बैठा है वह प्रभु का है 00:20:09 प्रभु के दरबार में तो जीव आता है यह बात तो जीव से कही जा रही है उसके कल्याण के 00:20:14 लिए सुनना चाहिए ना यह बात किसको कही जा रही है किसका श्रृंगार होना चाहिए कैसा श्रृंगार होना 00:20:23 चाहिए संत कहते आ रहे क मन ना रंग आए रंग. 00:20:28 जोगी कपड़ा य बहुत आसान है ना यह सब कर लेना बड़ा आसान 00:20:37 है ना पर अपने जीवन का श्रृंगार करना है अपने मन को सजाना है मन जाएगा प्रभु के पास मन 00:20:43 ही मिलावे राम से मन जाएगा प्रभु के पास मन मिलेगा प्रभु से इस मन को सजाना है राग द्वेष 00:20:53 ईर्ष्या मद मास अभिमान काम क्रोध जितने विकार है. 00:20:58 दुर्गुण य दूषण बने हुए हैं इन सबको 00:21:04 हटाकर इन सबको इन सद्गुणों से सजाना है जिनकी बात भगवत रस देव कह रहे हैं हरि को भजन साधु 00:21:11 की सेवा सर्व भूत पर दाया तृष्णा दम लोभ छल त्यागे विस सम देखे माया सहनशील आशय उदार अति धीरज 00:21:21 सहित विवेक सत्य वचन सबको सुखदायक गह अनन्य व्रत एक. 00:21:34 तो कहा संत सह दुख परहित लागी और पर दुख हेतु असंत अभागी भूज तरु सम संत कृपाला परहित निति 00:21:50 सह वि पति 00:21:57 विसा. 00:21:59 देवता आए हैं दधीच ऋषि के 00:22:05 पास आपकी हड्डियों से वज्र 00:22:11 बनेगा ऋषि क्या कहते हैं कि सर्वा भगवान मुझ पर प्रसन्न हो गए हैं मेरी तपस्या सफल हो गई है 00:22:20 कि यह शरीर जो किसी भी काम का नहीं है य शरीर भी परोपकार में लग जाएगा इससे बड़ा जीवन 00:22:26 का फल और क्या हो सकता है. 00:22:30 किसी भी काम का नहीं है शरीर अगर परोपकार में ना लगे अगर जीवन में सेवा सुमिर ना हो तो 00:22:37 फिर किस काम का है क सर्वात्मका मेरे पास में आना इस इस बात का संकेत है भगवान मुझ पर 00:22:50 प्रसन्न है प्रभु मुझे स्वीकार अंगीकार करने को तैयार हो गए हैं तभी तो आप मेरे पास में आए हैं 00:22:57 किय शरीर जो. 00:22:58 किसी भी काम का नहीं य परोपकार में लगेगा इससे बड़ा कोई फल नहीं है जीवन का इसलिए पूर्व में 00:23:05 तुलसी बाबा मानस में कहते हैं परहित सरस धर्म नहीं भाई पर पीरा सम नहीं 00:23:21 अधमा संत होते हैं तुलसी बाबा तो कहते हैं कि दूसरे के हित के लिए. 00:23:28 भारी विपत्ति सहते अपनी खाल तक उधड़ वा लेते कैसा होता है संत का हृदय उसी को देखकर उसी को 00:23:37 विचार कर प्रभु कह रहे मोते अधिक संत करि 00:23:44 लेखा तो यह संत और असंत का लक्षण बताया तीन प्रकार के लोग होते हैं प्राय करके संसार में एक 00:23:52 साधारण एक मध्यम एक अधम. 00:23:58 साधारण कैसे होते हैं भाई हमारा भी काम बन जाए किसी का भी बन जाए य साधारण है इनको भी 00:24:04 अच्छा नहीं माना गया है साधारण है उत्तम संत होते हैं यह साधारण है भाई चलो हमारा भी काम बन 00:24:10 जाए आपका भी बन जाए फिर एक होते हैं मध्यम भाई हमारा बन जाए किसी का बने ना बने फिर 00:24:20 एक है अधम वो कह र हमारा बने ना बने इसका बिगड़ना चाहिए हमारा बने ना बने. 00:24:28 इसका काम नहीं बनना चाहिए इसका बिगड़ना चाहिए और बोले अधम क्या करते बोले स्वयं दुख सहकर भी दूसरे का 00:24:35 काम बिगड़ते इसका इसका बिगड़ना चाहिए काम इसका ना बन जाए फर य अधम है तो एक साधारण है एक 00:24:42 मध्यम है एक अधम है फिर उत्तम कौन है बोले जो जो जिसका जीवन परोपकार को समर्पित है जो परोपकार 00:24:50 के लिए जीवन धारण कर रहा है जिसके जीवन का लक्ष्य उद्देश्य परमार्थ है भाई अपने पास में जो है 00:24:57 किसी के. 00:24:57 काम आ जाए जितनी हो सके अपने से सेवा हो जाए हमारे पास जो है उससे बन जाए किसी का 00:25:06 काम बनता हो तो खूब बन जाए तेरे जन के हित लगे तन मन धन सब ठाट आत्मा तुझ में 00:25:19 ही रमे मुख में तेरा 00:25:26 पाट. 00:25:29 और फिर कहते हैं भाई संत उदय संतत सुख कारी विश्व सुखद जिम इंदु तमारी परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा 00:25:36 पर निंदा सम अगन गरीसा भले भाई ऐसे संतों का उदय लोक के कल्याण के लिए होता है फिर दो 00:25:42 प्रश्न और पूछे सबसे बड़ा पुण्य कौन सा है सबसे बड़ा पाप कौन सा है तो क परम धर्म श्रुति 00:25:50 विदित अहिंसा जिसकी चर्चा हम करते ही आ रहे हैं रे अहिंसा परमो धर्म ये सबसे बड़ा धर्म है. 00:26:00 और अहिंसा केवल तन से नहीं मन से भी अहिंसा मन से भी अहिंसा हमारे हमारे हृदय में दूर तक 00:26:10 लेश मात्र भी किसी का अहित चिंतन ना रहे देखो भाई यहां बीच में कुछ नहीं है या तो आप 00:26:20 धार्मिक हैं या नहीं है बीच में कोई खेल नहीं है यहां पर. 00:26:28 धर्म को धारण करने वाला धार्मिक है धर्म की बात करने वाला धार्मिक नहीं है धर्म को धारण करने वाला 00:26:34 धार्मिक है और धर्म क्या है क परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा य गोस्वामी जी बिल्कुल वेद शास्त्र सम्मत बात 00:26:43 कह रहे हैं भाई बोले भाई वेदों शास्त्रों का मत है कि अहिंसा सर्वश्रेष्ठ धर्म है परम धर्म है अब 00:26:50 भाई जिसने जीवन में इस धर्म को धारण किया वही तो धार्मिक हुआ मुझे याद है बंबई. 00:26:57 की बात है शायद य सात आ साल हो गए किसी के यहां गए एक व्यक्ति आया उसने कहा कि 00:27:04 आशीर्वाद दीजिए आशीर्वाद दीजिए अब मैं तो इस व्यापार में कोई पढ़ा ही नहीं अब मैंने से विनोद के लिए 00:27:13 पूछ लिया मैंने किसके लिए चाहिए आशीर्वाद बताओ ऐसे तो आशीर्वाद कैसे दे दे अरे बताओ क्यों चाहिए आशीर्वाद छोटे 00:27:23 भाई पर मुकदमा किया है मैं जीत जाऊ इसलिए आशीर्वाद दे दीजिए. 00:27:28 आशीर्वाद भी इसके लिए मांग रहा है अब मांग तो आशीर्वाद रहा है बड़ी लंबी दंडवत प्रणाम भी कर रहा 00:27:33 है दूर से तो देखेगा भाई बड़ा धर्मात्मा है बड़ा धार्मिक है साधु संतो की सेवा भी कर रहा है 00:27:38 प्रणाम भी कर रहा है मन की वृत्ति क्या है मन की गति किस और है किसी का अहित चिंतन 00:27:45 करने में लगा है तो इसलिए धर्म की बात करने वाला धार्मिक नहीं है धर्म को धारण करने वाला धार्मिक 00:27:52 है और धर्म क्या है अहिंसा प्राणी मात्र के. 00:27:57 दया का भाव जीवे दया बड़ी बड़ी स्पष्ट रीति से श्री सेवक जी ने समझाया है सब जीवनस प्रीत रीत 00:28:09 निहत आपनी श्रवण कथन परती यह जो कृपा हरिवंश की आचार्य की कृपा का लक्षण है पहले सब जीवन स 00:28:22 प्रीत माने अहिंसा सब सोहित निष्काम मति माने अहिंसा. 00:28:28 यह परम धर्म 00:28:34 है अब जाकर आज विचार करना हमारे मन में है तो नहीं ऐसा विचार किसी के लिए मिलेगा अवश्य मिलेगा 00:28:45 और जैसा कुछ देर पहले मैंने आपसे कहा कि अपना दोष देखो अनदेखा नहीं करना छोटा सा रोग भी अगर 00:28:54 समय रहते उसकी औषधि ना की जाए तो असाध्य हो जाता है. 00:28:57 प्राणों पर संकट उपस्थित हो सकता है जाकर देखना आत्म चिंतन करना कहीं ऐसी कोई बात है तो नहीं मेरे 00:29:07 मन में और अगर दिखाई दे फ प्रभु से प्रार्थना करना थोड़ा नाम जप करना कल आपसे कह ही रहा 00:29:14 था मैं ऐसी कोई बात हो जो अपने हाथ में ना हो फ प्रभु से कहना चाहिए ये मन हो 00:29:24 निर्मल तुम्हारी कृपा. 00:29:28 से इसे शुद्ध करने में हम तो है हारे मैंने तो मैं तो बहुत बार प्रभु से कहता हूं अपनी 00:29:42 करुणा का जल तू बहा दे कर दे पावन हर एक मन का कोना हम चले. 00:29:57 नेक रास्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल 00:30:09 होना बो सबसे बड़ा पुण्य है यह सबसे बड़ा धर्म है अ फिर कह रहे सबसे बड़ा पाप परनिंदा सम 00:30:22 अघन गरी निंदा से जैसा बड़ा कोई दूसरा पाप नहीं. 00:30:32 थोड़ी घनी निंदा तो भाई हम सब करते सुनते ही रहते हैं उससे पहले हम कह देते हैं भाई कहना 00:30:41 तो नहीं चाहिए पर चलो कह देते हैं ऐसे दो लोग बात करते हैं तो कह रहे कि अच्छा तुमको 00:30:47 एक बात बताए देखो वैसे से कहना तो नहीं चाहिए पर देखो ऐसा हो रहा है देखो इसको कहते हैं 00:30:54 अब आत्म विवेक का अनादर इसको. 00:30:57 कहते आत्म ज्ञान का अनादर आपको पता है नहीं कहना चाहिए फिर भी कह रहे हो आप और मुझे लगता 00:31:04 है किसी के अनादर से बड़ा तो अपना ही अनादर है अपना ही अनादर व्यक्ति करता है जानता है कि 00:31:09 मार्ग ठीक नहीं है फिर चलता है यह काम ठीक नहीं है फिर करता 00:31:16 है अभी बात सुनकर सब मुस्कुरा दिए थे माने सब ऐसा करते हैं ना थोड़ी बहुत कहने सुनने में ऐसे 00:31:24 निंदा हो जाती है. 00:31:28 अच्छा फिर कभी-कभी हम यह भी कह देते हैं भाई सत्य है इसमें निंदा क्या है तो सत्य है हम 00:31:33 कह रहे हैं पर संत कहते हैं संतों की रहनी संतों की कहनी कुछ और है संत क रे भलो 00:31:45 बरो संसार तेरे भावे जो करे भलो बरो 00:31:56 संसार. 00:31:57 नारायण तू बैठ के अपनो भवन 00:32:06 बुहा अरे निर्णय करने वाला न्याय करने वाला कोई बैठा है जा की जैसी भावना ऐ सोही फल 00:32:17 दे और फिर ध्रुव दस जी तो बहुत सावधान करते हैं पर निंदा के किए ते आवत कछु नहीं हाथ 00:32:17 . 00:32:27 ये ये ये पंक्ति सदा स्मरण रखनी चाहिए क मूर्ख पर्वत पाप को ले चलो अपने 00:32:36 साथ भगवान ने भी नवदा भक्ति का उपदेश करते हुए बात कही है सुपने नहीं देख पर दूष निंदा के 00:32:44 मूल में क्या है निंदा के मूल में प्रदोष दर्शन ही तो है तभी तो आप निंदा कर रहे हो 00:32:51 निंदा के मूल में क्या है प्रदोष दर्शन है भगवान ने सीधी निंदा की बात ना कह के मूल काटने 00:32:56 की बात कही है. 00:32:57 इसका मूलो छेद किया जाए पर दोष दर्शन हुही 00:33:04 नहीं करनी हो तो अपनी निंदा करो चार लोगों में बैठक अपनी निंदा 00:33:12 करो निंदा ही करनी है तो अपनी निंदा करो संत संत अपनी बात कहकर सुनाता है मौसम कौन कुटिल खल 00:33:21 कामी कहे जा रहे हैं सूरदास जी हो सब पति तन को राजा सूरदास कह रहे हो सब. 00:33:27 पति तन को राजा क को कर सके बराबरी मेरी बो पाप में मेरी बराबरी कौन कर सकता है सामर्थ 00:33:35 हो तो फिर ऐसी अपनी निंदा करो अपना दोष 00:33:43 बखान पर पर निंदा के किए ते आवत कछु नहीं हाथ और यहां तो गोस्वामी जी कह भाई इसके जैसा 00:33:50 पर निंदा सम अघन गरीसा इसके समान कोई भारी पाप नहीं है. 00:33:59 कितना पुरुषार्थ करके परिश्रम करके कितनी मेहनत करके आप भजन साधन करते हो थोड़ी देर किसी की निंदा की जो 00:34:07 किया था सब सब गांठ का धन गवा दिया और केवल गांठ का धन ही नहीं गवाया क मूर्ख पर्वत 00:34:15 पाप को ले चलो अपने 00:34:20 साथ निंदा करना कि जीभ से किसी का मल साफ करना है जीभ से. 00:34:27 से निंदा करते हो ना ऐसा ऐसा निंदनीय है ये कैसा गणित है ये क पर निंदा सम अघन गरीसा 00:34:36 और फिर आगे तो गोस्वामी जी ने कहा है क्या गति होती है उसकी सबके निंदा जे जड़ करही ते 00:34:50 चमगादर होई अवतर सबकी निंदा करने वाला. 00:34:57 बो चमगादड़ होकर आता है गोस्वामी जी कह रहे हैं अ वो तो त्रिकालदर्शी महापुरुष है ठीक ही कह रहे 00:35:05 होंगे य जो मूर्ख मनुष्य सबकी निंदा करते हैं चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं चमगादड़ माने जिसके हिस्से अंधकार ही 00:35:14 अंधकार आता है अंधकार ही 00:35:22 अंधकार एक और बात है भाई होता क्या है फिर. 00:35:26 ऐसे कहते सुनते यह वृत्ति हमारा अभ्यास बन जाती है फिर वही बात स्वभाव में आ जाती है जो बात 00:35:35 स्वभाव में आए उससे छुटकारा पाना लगभग लगभग असंभव हो जाता है बहुत कठिन तो है ही जो बात स्वभाव 00:35:42 में आ जाए इसलिए मैंने कहा थोड़ा सा भी अपना दोष देखो दौड़ कर जाओ प्रभु से प्रार्थना करो दो 00:35:51 माला करो नाम जप करो नाम की ओट लीजिए. 00:35:56 प्रभु मैं अपनी संभाल नहीं कर पा रहा हूं मैं अपने बल अपनी शक्ति से इस दोष को दूर नहीं 00:36:01 कर पा रहा हूं आप कृपा करो और मैं वाणी को विराम देने से पहले फिर आपसे कह रहा हूं 00:36:05 अपना अनुभव आपसे बांट रहा हूं आप सच्चे हृदय से प्रार्थना करोगे प्रभु तुरंत स्वीकार करते हैं कोई ना कोई 00:36:12 मानक बनेगा कोई ना कोई घटना घटेगी या तो भीतर घटेगी या बाहर घटेगी कि आपको आपको उस वृत्ति से 00:36:20 आपको उस दूषित वृत्ति से प्रभु बाहर निकालेंगे.