Monday, July 6, 2026

Radha Chalisa with word by word meanings

Radha Chalisa with word by word meanings

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https://www.youtube.com/watch?v=CpXSeob2UWM 2 https://www.youtube.com/watch?v=aPuszfH-i68 Radha Chalisa words : https://www.astromantra.com/radha-chalisa/ दोहा श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।   वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारम्बार ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधे = राधारानी   - वृषभानुजा = वृषभानु की पुत्री   - भक्तनि = भक्तों की   - प्राणाधार = प्राणों का आधार   - वृन्दाविपिन विहारिणी = वृन्दावन के वन में विहार करने वाली   - प्रणवौं = मैं नमस्कार करता हूँ   - बारम्बार = बार-बार भावार्थ:   मैं श्री राधारानी को बार-बार प्रणाम करता हूँ, जो वृषभानु की पुत्री हैं, भक्तों के जीवन-प्राण हैं और वृन्दावन में दिव्य विहार करने वाली हैं। 1 पहला पद जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।   चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥ शब्दार्थ:   - जैसो तैसो = जैसी भी हूँ   - रावरौ = आपकी   - कृष्ण प्रिया = श्रीकृष्ण को प्रिय   - सुखधाम = सुख का धाम   - चरण शरण = चरणों की शरण   - निज दीजिये = अपना दीजिए   - सुन्दर सुखद ललाम = सुंदर, सुख देने वाली, श्रेष्ठ भावार्थ:   हे राधे! मैं जैसा भी हूँ, मैं आपका ही हूँ। आप कृष्ण की प्रिया और परम सुख देने वाली हैं। कृपा करके मुझे अपने चरणों की शरण दीजिए। 2 दूसरा पद जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।   कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥ शब्दार्थ:   - जय = जय हो   - वृषभान कुँवरी = वृषभानु की कन्या   - श्री श्यामा = श्री श्यामा राधा   - कीरति नंदिनी = कीर्ति देवी की पुत्री   - शोभा धामा = शोभा का धाम भावार्थ:   श्री श्यामा राधारानी की जय हो, जो वृषभानु की कन्या और कीर्ति देवी की पुत्री हैं तथा सौंदर्य की साक्षात् मूर्ति हैं। 3  तीसरा पद नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।   अमित मोद मंगल दातारा ॥ शब्दार्थ:   - नित्य विहारिनि = सदा विहार करने वाली   - श्याम अधारा = श्रीकृष्ण का आश्रय   - अमित = अपार   - मोद = आनंद   - मंगल = शुभता   - दातारा = देने वाली भावार्थ:   राधारानी सदा कृष्ण के साथ दिव्य विहार करती हैं और अपार आनंद तथा कल्याण प्रदान करती हैं। 4 चौथा पद रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।   सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥ शब्दार्थ:   - रास विलासिनि = रास-लीला में विहार करने वाली   - रस विस्तारिनि = भक्ति-रस बढ़ाने वाली   - सहचरि = सखियों के साथ रहने वाली   - सुभग = सुंदर   - यूथ = समूह   - मन भावनि = मन को भाने वाली भावार्थ:   राधारानी रास-लीला की शोभा बढ़ाने वाली, भक्ति-रस का विस्तार करने वाली और सखियों के समूह को आनंद देने वाली हैं। 5 पाँचवाँ पद नित्य किशोरी राधा गोरी ।   श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥ शब्दार्थ:   - नित्य किशोरी = सदा किशोरी रूप वाली   - राधा गोरी = उज्ज्वल, सुंदर राधा   - श्याम प्राणधन = श्यामसुंदर के प्राणधन   - अति जिय भोरी = हृदय में अत्यंत प्रिय भावार्थ:   राधारानी सदा किशोरी रूप में विराजती हैं। वे श्रीकृष्ण के प्राणों की धन हैं और उनके हृदय में अत्यंत प्रिय हैं। 6 छठा पद करुणा सागर हिय उमंगिनी ।   ललितादिक सखियन की संगिनी ॥ शब्दार्थ:   - करुणा सागर = करुणा का समुद्र   - हिय उमंगिनी = हृदय में उमंग उत्पन्न करने वाली   - ललितादिक = ललिता आदि   - सखियन की संगिनी = सखियों की संगिनी, साथिन भावार्थ:   राधारानी करुणा से भरी हुई हैं और हृदय में आनंद जगाने वाली हैं। वे ललिता आदि सखियों के साथ सदा रहती हैं। 7 सातवाँ पद दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।   कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥ शब्दार्थ:   - दिनकर कन्या = सूर्य की पुत्री   - कूल विहारिनि = कुल में विहार करने वाली   - कृष्ण प्राण प्रिय = कृष्ण को प्राणों से प्रिय   - हिय हुलसावनि = हृदय को हर्षित करने वाली भावार्थ:   राधारानी सूर्यवंश में प्रकट होकर विहार करती हैं और श्रीकृष्ण के हृदय को आनंदित करती हैं। 8 आठवाँ पद नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।   राधा राधा कहि हरषावैं ॥ शब्दार्थ:   - नित्य = सदा   - श्याम = श्रीकृष्ण   - तुमरौ = आपका   - गुण गावैं = गुण गाते हैं   - हरषावैं = हर्षित होते हैं भावार्थ:   जो श्रीकृष्ण सदा आपके गुण गाते हैं और “राधा राधा” कहकर आनंदित होते हैं, वे धन्य हैं। 9 नवाँ पद मुरली में नित नाम उचारें ।   तुव कारण लीला वपु धारें ॥ शब्दार्थ:   - मुरली में = बांसुरी में   - नित = निरंतर   - नाम उचारें = नाम उच्चारण करें   - तुव कारण = आपके कारण   - लीला वपु = लीला-शरीर   - धारें = धारण करते हैं भावार्थ:   श्रीकृष्ण बांसुरी पर निरंतर आपका नाम उच्चारण करते हैं और आपकी लीला के लिए ही दिव्य रूप धारण करते हैं। 10 दसवाँ पद प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।   श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥ शब्दार्थ:   - प्रेम स्वरूपिणि = प्रेम का स्वरूप   - अति सुकुमारी = बहुत कोमल   - श्याम प्रिया = कृष्ण को प्रिय   - वृषभानु दुलारी = वृषभानु की लाड़ली भावार्थ:   राधारानी स्वयं प्रेम का स्वरूप हैं, अत्यंत कोमल हैं, कृष्ण को प्रिय हैं और वृषभानु की प्यारी पुत्री हैं। 11 नवल किशोरी अति छवि धामा ।   द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥ शब्दार्थ:   - नवल किशोरी = नई-नई किशोरी, सदा तरोताज़ा यौवन वाली   - अति छवि धामा = अत्यंत सुंदर रूप का धाम   - द्युति = कान्ति, चमक   - लघु लगै = छोटी लगे   - कोटि = करोड़ों   - रति कामा = कामदेव की रति, सौंदर्य भावार्थ:   राधारानी इतनी सुंदर हैं कि उनके सौंदर्य के सामने करोड़ों कामदेवों का सौंदर्य भी तुच्छ लगने लगता है। वे दिव्य छवि का साक्षात् धाम हैं। [youtube] 12 गौरांगी शशि निंदक बदना ।   सुभग चपल अनियारे नयना ॥ शब्दार्थ:   - गौरांगी = गौर वर्ण वाली   - शशि निंदक = चंद्रमा को लज्जित करने वाली   - बदना = मुख   - सुभग = सुंदर, सौभाग्यशाली   - चपल = चंचल   - अनियारे = अनूठे, विशेष   - नयना = नेत्र भावार्थ:   राधारानी का मुख चंद्रमा से भी अधिक सुंदर है। उनके नेत्र चंचल, मोहक और अत्यंत अनोखे हैं।  13 जावक युत युग पंकज चरना ।   नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥ शब्दार्थ:   - जावक युत = लाक्षारस से युक्त   - युग पंकज चरना = दोनों कमल-सदृश चरण   - नूपुर धुनि = पायल की ध्वनि   - प्रीतम मन हरना = प्रियतम का मन हरने वाली भावार्थ:   राधारानी के दोनों चरण कमल जैसे हैं और उन पर लाक्षारस की शोभा है। उनकी पायल की मधुर ध्वनि श्रीकृष्ण के मन को मोहित कर लेती है। 14 संतत सहचरि सेवा करहीं ।   महा मोद मंगल मन भरहीं ॥ शब्दार्थ:   - संतत = निरंतर   - सहचरि = सखियाँ   - सेवा करहीं = सेवा करती हैं   - महा मोद = अत्यंत आनंद   - मंगल = शुभता   - मन भरहीं = मन भर देती हैं भावार्थ:   राधारानी की सखियाँ सदा उनकी सेवा में लगी रहती हैं, और उनके साथ रहने से मन आनंद और मंगल से भर जाता है।  15 रसिकन जीवन प्राण अधारा ।   राधा नाम सकल सुख सारा ॥ शब्दार्थ:   - रसिकन = रसिक भक्तों के   - जीवन प्राण अधारा = जीवन का आधार, प्राण   - सकल सुख सारा = सभी सुखों का सार भावार्थ:   रसिक भक्तों के लिए राधारानी ही जीवन और प्राण का आधार हैं। उनका नाम ही सभी सुखों का सार है।  16 अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।   ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥ शब्दार्थ:   - अगम = जिन तक पहुँचना कठिन   - अगोचर = इंद्रियों से परे   - नित्य स्वरूपा = सदा रहने वाला दिव्य स्वरूप   - ध्यान धरत = ध्यान करते हैं   - निशिदिन = दिन-रात   - ब्रज भूपा = ब्रज के स्वामी, श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधारानी का स्वरूप इंद्रियों से परे और समझ से परे है। ब्रज के स्वामी श्रीकृष्ण भी दिन-रात उनका ध्यान करते हैं।  17 उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।   कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥ शब्दार्थ:   - उपजेउ = उत्पन्न हुए   - जासु अंश = जिनके अंश से   - गुण खानी = गुणों की खान   - कोटिन = करोड़ों   - उमा रमा ब्रह्मानी = उमा, लक्ष्मी, ब्रह्माणी आदि भावार्थ:   राधारानी के अंश से ही अनेक दिव्य शक्तियाँ प्रकट होती हैं। उमा, रमा, ब्रह्माणी जैसी करोड़ों देवियाँ भी उनके सामने गौण हैं।  18 नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।   जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥ शब्दार्थ:   - नित्य धाम = शाश्वत धाम   - गोलोक विहारिणि = गोलोक में विहार करने वाली   - जन रक्षक = भक्तों की रक्षक   - दुख दोष नसावनि = दुख और दोष नष्ट करने वाली भावार्थ:   राधारानी गोलोक की नित्य विहारिणी हैं और अपने भक्तों की रक्षा करके उनके दुख-दोष मिटा देती हैं। 19 शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।   पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥ शब्दार्थ:   - शिव अज मुनि = शिव, ब्रह्मा आदि ऋषि   - सनकादिक = सनक, सनंदन आदि   - नारद = नारद मुनि   - पार न पाँइ = अंत नहीं पा सके   - शेष अरु शारद = शेषनाग और सरस्वती भावार्थ:   शिव, ब्रह्मा, सनकादिक, नारद, शेष और सरस्वती भी राधारानी के गुणों की सीमा नहीं पा सके। 20 राधा शुभ गुण रूप उजारी ।   निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥ शब्दार्थ:   - शुभ गुण रूप उजारी = शुभ गुणों और सुंदर रूप से प्रकाशित   - निरखि = देखकर   - प्रसन्न होत = प्रसन्न होते हैं   - बनवारी = श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधारानी के दिव्य गुणों और सुंदर रूप को देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। 21 ब्रज जीवन धन राधा रानी ।   महिमा अमित न जाय बखानी ॥ शब्दार्थ:   - ब्रज जीवन धन = ब्रजवासियों का जीवन-धन   - महिमा अमित = अपार महिमा   - न जाय बखानी = वर्णन नहीं की जा सकती भावार्थ:   राधारानी ब्रजवासियों के जीवन की अमूल्य निधि हैं। उनकी महिमा का पूरा वर्णन करना असंभव है। 22 प्रीतम संग देइ गलबाँही । बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥ शब्दार्थ: प्रीतम = प्रियतम श्रीकृष्ण संग = साथ देइ = देकर गलबाँही = गले लगाना, आलिंगन बिहरत = विहार करती हैं नित = सदा वृन्दावन माँही = वृन्दावन में भावार्थ: राधारानी अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ आलिंगन करती हुई सदा वृन्दावन में दिव्य विहार करती हैं। उनका प्रेम अत्यंत आत्मीय और माधुर्यपूर्ण है। 23 राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा । एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥ शब्दार्थ: राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा = राधा और कृष्ण एक-दूसरे का नाम लेते हैं एक रूप = एक ही स्वरूप जैसे दोउ = दोनों प्रीति अगाधा = गहरी, असीम प्रेम भावार्थ: राधा और कृष्ण एक-दूसरे के नाम में ही लीन रहते हैं। दोनों का प्रेम इतना गहरा है कि वे दो होते हुए भी प्रेम की दृष्टि से एक ही प्रतीत होते हैं। 24 श्री राधा मोहन मन हरनी । जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥ शब्दार्थ: श्री राधा मोहन = राधा जी और मोहन श्रीकृष्ण मन हरनी = मन को हरने वाली जन = भक्तों के सुख दायक = सुख देने वाली प्रफुलित बदनी = प्रसन्न मुख वाली भावार्थ: राधा और मोहन दोनों भक्तों के मन को मोहित करने वाले हैं। राधारानी प्रसन्न मुख से भक्तों को सुख प्रदान करती हैं।[bhaktibharat] 25 कोटिक रूप धरें नंद नंदा । दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥ शब्दार्थ: कोटिक रूप = करोड़ों रूप धरें = धारण करें नंद नंदा = नंदलाल श्रीकृष्ण दर्शन करन हित = दर्शन देने के लिए गोकुल चंदा = गोकुल के चंद्रमा भावार्थ: गोकुल के चंद्रमा श्रीकृष्ण भक्तों को दर्शन देने के लिए अनेक रूप धारण करते हैं। वे प्रेमवश अपने भक्तों के लिए स्वयं को विविध रूपों में प्रकट करते हैं। 26 रास केलि करि तुम्हें रिझावें । मान करौ जब अति दुःख पावें ॥ शब्दार्थ: रास केलि = रास-लीला करि = करके तुम्हें रिझावें = आपको प्रसन्न करते हैं मान करौ = जब आप रूठती हैं अति दुःख पावें = बहुत दुःख पाते हैं भावार्थ: श्रीकृष्ण रास-लीला करके राधारानी को प्रसन्न करते हैं। जब राधा जी रुष्ट हो जाती हैं, तब श्रीकृष्ण बहुत दुखी हो जाते हैं और उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं। 27 प्रफुलित होत दर्श जब पावें । विविध भांति नित विनय सुनावें ॥ शब्दार्थ: प्रफुलित होत = अत्यंत प्रसन्न होते हैं दर्श = दर्शन जब पावें = जब पाते हैं विविध भांति = अनेक प्रकार से नित = सदा विनय सुनावें = विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं भावार्थ: जब श्रीकृष्ण राधारानी के दर्शन पाते हैं, तब वे अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और सदा उनके सामने विनम्रतापूर्वक अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। 28 वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा । नाम लेत पूरण सब कामा ॥ शब्दार्थ: वृन्दारण्य = वृन्दावन का वन विहारिणि = विहार करने वाली श्यामा = श्यामवर्णी राधा नाम लेत = नाम लेते ही पूरण = पूर्ण होते हैं सब कामा = सभी कार्य, इच्छाएँ भावार्थ: श्यामा राधारानी वृन्दावन के वन में विहार करती हैं। उनका नाम लेने मात्र से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। 29 कोटिन यज्ञ तपस्या करहु । विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥ शब्दार्थ: कोटिन = करोड़ों यज्ञ तपस्या = यज्ञ और तप करहु = करें विविध नेम व्रत = अनेक नियम और व्रत हिय में धरहु = हृदय में धारण करें भावार्थ: चाहे कोई करोड़ों यज्ञ, तपस्या, नियम और व्रत कर ले, फिर भी यदि राधा नाम की भक्ति न हो तो पूर्ण फल नहीं मिलता। बाहरी साधनाओं से अधिक महत्वपूर्ण राधा-भक्ति है। 30 तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें । जब लगि राधा नाम न गावें ॥ शब्दार्थ: तऊ न = तब भी नहीं श्याम = श्रीकृष्ण भक्तहिं = भक्त को अपनावें = अपनाते हैं जब लगि = जब तक राधा नाम न गावें = राधा नाम का गान न करे भावार्थ: जब तक भक्त राधा नाम का गान नहीं करता, तब तक श्रीकृष्ण भी उसे अपने प्रेम में पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करते। राधा-नाम कृष्ण-प्राप्ति की कुंजी है। 31 वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा । लीला वपु तब अमित अगाधा ॥ शब्दार्थ: वृन्दाविपिन स्वामिनी = वृन्दावन वन की स्वामिनी राधा = राधारानी लीला वपु = लीला-शरीर तब = तब उनका अमित = असीम अगाधा = गहरा, अथाह भावार्थ: राधारानी वृन्दावन वन की स्वामिनी हैं। उनका लीला-स्वरूप असीम और गूढ़ है, जिसे पूरी तरह समझ पाना कठिन है। 32 स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।   और तुम्हें को जानन हारा ॥ शब्दार्थ:   - स्वयं कृष्ण = श्रीकृष्ण स्वयं   - पावैं नहिं पारा = पूर्णतः पा नहीं सकते, अंत नहीं पा सकते   - और = अन्य   - तुम्हें = आपको   - को जानन हारा = कौन जान सकता है भावार्थ:   राधारानी की महिमा इतनी गहरी है कि स्वयं श्रीकृष्ण भी उनके स्वरूप की सीमा नहीं पा सकते। फिर अन्य कोई उन्हें पूरी तरह कैसे जान सकता है।  33 श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।   सादर गान करत नित वेदा ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधा रस = राधा-भाव, राधा का प्रेम-रस   - प्रीति अभेदा = प्रेम से अभिन्न   - सादर = आदरपूर्वक   - गान करत = गान करते हैं   - नित = निरंतर   - वेदा = वेद भावार्थ:   राधारानी का प्रेम-रस और प्रीति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। वेद भी आदरपूर्वक उनकी महिमा का गान करते रहते हैं।  34 राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।   ते सपनेहुँ जग जलधि न तरिहैं ॥ शब्दार्थ:   - त्यागि = छोड़कर   - भजिहैं = भजन करेंगे   - सपनेहुँ = स्वप्न में भी   - जग जलधि = संसार-सागर   - न तरिहैं = पार नहीं कर पाएँगे भावार्थ:   जो लोग राधा को छोड़कर केवल कृष्ण-भजन करना चाहते हैं, वे संसार-सागर से पार नहीं हो सकते। राधा-भक्ति के बिना भक्ति अधूरी मानी गई है।  35 कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।   सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥ शब्दार्थ:   - कीरति कुँवरि = कीर्ति देवी की पुत्री   - लाड़िली = अत्यंत प्रिय   - सुमिरत = स्मरण करने से   - सकल = सब   - भव बाधा = संसार की बाधाएँ भावार्थ:   कीर्ति देवी की प्यारी पुत्री राधारानी का स्मरण करने से जीवन की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं। 36 नाम अमंगल मूल नसावन ।   त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥ शब्दार्थ:   - नाम = नाम   - अमंगल मूल = अशुभ का मूल   - नसावन = नष्ट करने वाला   - त्रिविध ताप = तीन प्रकार के दुःख   - हर = हरने वाले   - हरि मनभावन = हरि को प्रिय भावार्थ:   राधा नाम अशुभताओं के मूल को नष्ट कर देता है और तीनों प्रकार के तापों का नाश करता है। यह नाम भगवान हरि को भी अत्यंत प्रिय है।  37 राधा नाम लेइ जो कोई ।   सहजहि दामोदर बस होई ॥ शब्दार्थ:   - लेइ = लेता है   - जो कोई = जो भी   - सहजहि = सहज रूप से   - दामोदर बस होई = भगवान कृष्ण के वश में हो जाता है भावार्थ:   जो भी राधा नाम लेता है, वह सहज ही श्रीकृष्ण के प्रेम-आकर्षण में आ जाता है।  38 राधा नाम परम सुखदाई ।   भजतहि कृपा करहिं यदुराई ॥ शब्दार्थ:   - परम सुखदाई = परम सुख देने वाला   - भजतहि = भजन करने वालों पर   - कृपा करहिं = कृपा करते हैं   - यदुराई = यदुवंश के स्वामी, श्रीकृष्ण भावार्थ:   राधा नाम सबसे बड़ा सुख देने वाला है। जो इसका भजन करता है, उस पर श्रीकृष्ण कृपा करते हैं। 39 यशुमति नंदन पीछे फिरिहैं ।   जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥ शब्दार्थ:   - यशुमति नंदन = श्रीकृष्ण   - पीछे फिरिहैं = पीछे-पीछे चलेंगे   - जो कोऊ = जो कोई   - सुमिरिहैं = स्मरण करेगा भावार्थ:   जो व्यक्ति राधा नाम का स्मरण करता है, श्रीकृष्ण उसके पीछे-पीछे चलते हैं। यह राधा-नाम की महिमा बताता है। 40 रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।   करहु कृपा बरसाने वारी ॥ शब्दार्थ:   - रास विहारिणि = रास में विहार करने वाली   - श्यामा प्यारी = प्यारी श्यामा राधा   - करहु कृपा = कृपा कीजिए   - बरसाने वारी = बरसाने वाली राधा भावार्थ:   हे रास-विहारिणी श्यामा, हे बरसाने की प्यारी राधे, हम पर कृपा कीजिए। [astromantra](https://www.astromantra.com/radha-chalisa/) 41 वृन्दावन है शरण तिहारी ।   जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥ शब्दार्थ:   - वृन्दावन = वृन्दावन धाम   - शरण तिहारी = आपकी शरण   - जय जय जय = बार-बार जय   - वृषभानु दुलारी = वृषभानु की प्यारी पुत्री भावार्थ:   वृन्दावन आपकी शरण है। हे वृषभानु की प्रिय राधे, आपकी बार-बार जय हो।  42 श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।   करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥ शब्दार्थ:   - श्री राधा सर्वेश्वरी = राधारानी, जो सबकी ईश्वरी हैं   - रसिकेश्वर = रसिकों के ईश्वर   - धनश्याम = श्रीकृष्ण   - करहुँ = करूँ   - निरंतर = सदा   - बास = निवास   - श्री वृन्दावन धाम = पवित्र वृन्दावन धाम भावार्थ:   हे श्री राधारानी, आप समस्त शक्तियों की अधीश्वरी हैं, और श्रीकृष्ण रसिकों के स्वामी हैं। मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा निवास सदा श्री वृन्दावन धाम में रहे।    समापन ॥ इति श्री राधा चालीसा ॥


Radha Chalisa - only Dohas (no meaning):
श्री राधा चालीसा

॥ दोहा ॥
श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारम्बार ॥

जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥

॥ चौपाई ॥
जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।
कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥

नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।
अमित मोद मंगल दातारा ॥

रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।
सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥

नित्य किशोरी राधा गोरी ।
श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥

करुणा सागर हिय उमंगिनी ।
ललितादिक सखियन की संगिनी ॥

दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।
कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥

नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।
राधा राधा कहि हरषावैं ॥

मुरली में नित नाम उचारें ।
तुव कारण लीला वपु धारें ॥

प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।
श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥

नवल किशोरी अति छवि धामा ।
द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥१०॥

गौरांगी शशि निंदक बदना ।
सुभग चपल अनियारे नयना ॥

जावक युत युग पंकज चरना ।
नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥

संतत सहचरि सेवा करहीं ।
महा मोद मंगल मन भरहीं ॥

रसिकन जीवन प्राण अधारा ।
राधा नाम सकल सुख सारा ॥

अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।
ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥

उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।
कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥

नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।
जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥

शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।
पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥

राधा शुभ गुण रूप उजारी ।
निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥

ब्रज जीवन धन राधा रानी ।
महिमा अमित न जाय बखानी ॥२०॥

प्रीतम संग देइ गलबाँही ।
बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥

राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा ।
एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥

श्री राधा मोहन मन हरनी ।
जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥

कोटिक रूप धरें नंद नंदा ।
दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥

रास केलि करि तुम्हें रिझावें ।
मान करौ जब अति दुःख पावें ॥

प्रफुलित होत दर्श जब पावें ।
विविध भांति नित विनय सुनावें ॥

वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा ।
नाम लेत पूरण सब कामा ॥

कोटिन यज्ञ तपस्या करहु ।
विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥

तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें ।
जब लगि राधा नाम न गावें ॥

वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा ।
लीला वपु तब अमित अगाधा ॥३०॥

स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।
और तुम्हें को जानन हारा ॥

श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।
सादर गान करत नित वेदा ॥

राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।
ते सपनेहुँ जग जलधि न तरिहैं ॥

कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।
सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥

नाम अमंगल मूल नसावन ।
त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥

राधा नाम लेइ जो कोई ।
सहजहि दामोदर बस होई ॥

राधा नाम परम सुखदाई ।
भजतहि कृपा करहिं यदुराई ॥

यशुमति नंदन पीछे फिरिहैं ।
जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥

रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।
करहु कृपा बरसाने वारी ॥

वृन्दावन है शरण तिहारी ।
जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥४०॥

॥ दोहा ॥
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥

॥ इति श्री राधा चालीसा ॥

Jagannath Ji's Sacred Bath: The Ancient Mystery of Deva Snana Purnima | Puri Snana Yatra Explained

Jagannath Ji's Sacred Bath: The Ancient Mystery of Deva Snana Purnima | Puri Snana Yatra Explained

https://www.youtube.com/shorts/M0Wk983VsaQ Every year, on the full moon of Jyeshtha — the peak of Indian summer — something extraordinary happens in Puri, Odisha. The doors of the most ancient and sacred temple in the land open wide, the air fills with the sound of conch shells, cymbals and kahali, and Lord Jagannath — the Lord of the Universe — steps out from his sanctum in a grand swaying procession called the Pahandi. Today, he will take his royal bath. Today is Deva Snana Purnima — and this single day carries within it over a thousand years of mythology, astronomy, Ayurveda, and devotion. This is not just a festival. This is a cosmic event. WHY THIS DAY? THE SCIENCE BEHIND JYESHTHA PURNIMA Jyeshtha Purnima is the last full moon before the monsoon arrives. The month of Jyeshtha itself means "the greatest, the most ancient" — and in the Vishnu Sahasranama, Lord Vishnu is called Jyeshtha Shreshtha Prajapita. Astronomically, on this day the Moon sits in the Jyeshtha Nakshatra — a position ancient rishis linked to power, transformation, and divine purification. This is also the tithi when Ganga descended to earth, when Savitri defeated death itself, and when the cosmos stands at the precise threshold between the blazing summer sun and the life-giving monsoon rains. The Lord's bath on this day is not accidental — it is a cosmic transition ceremony, a ritual that mirrors the earth's own renewal. THE STORY BEHIND THE FIRST SNANA PURNIMA The Skanda Purana and the Odia religious treatise Niladri Mahodaya both record the same origin story. King Indradyumna — a great devotee of Vishnu — searched across the earth for the mysterious Nila Madhava, a deity worshipped in secret by a tribal chief of the Sabara people in a forest near Puri. After the deity disappeared and revealed himself instead as a sacred neem log washed ashore from the ocean, Vishwakarma himself descended in human form to carve the idols. But the work was left unfinished when the king broke the divine condition and entered too soon. The result? Three idols with large eyes, stump-like arms, no separately carved hands or feet — an "incomplete" form that became the most worshipped form in all of Odia civilization. The very first act after the installation of these idols was the Snana Yatra — the bathing ceremony — organized by King Indradyumna himself. That first sacred bath, thousands of years ago, is what we reenact every Jyeshtha Purnima. THE 108 POTS — AND WHY THIS NUMBER IS NOT RANDOM On Snana Purnima, Lord Jagannath is bathed with water drawn from the temple's sacred Suna Kua — the Golden Well — mixed with sandalwood paste, fragrant herbs and camphor, and poured in exactly 108 gold vessels. Jagannath receives 35 pots, Balabhadra 33, Subhadra 22, and Sudarshana Chakra 1. The number 108 is not arbitrary. It appears in the distance between the Sun and the Earth measured in solar diameters, in the 108 beads of a Japa mala, in the 108 Upanishads, in the 108 names of every major Hindu deity. Every single pour is accompanied by sacred mantras. This is not bathing — this is a full-scale cosmic consecration. THE MYSTERY OF GAJANANA VESHA — WHY JAGANNATH BECOMES GANESHA As the sun begins to set on Snana Purnima, the Lord undergoes one final, breathtaking transformation. Jagannath and Balabhadra are adorned with ornate elephant-head crowns, becoming the living image of Lord Ganesha — this form is called Gajanana Vesha or Hati Vesha. The story behind it is as beautiful as the vesha itself. Centuries ago, a great scholar named Ganapati Bhatta came to Puri — a man who worshipped only Ganesha and could not conceive of divinity in any other form. He stood on the Snana Bedi and looked for his Ganesha, but could not find him. Lord Jagannath — who lives in the hearts of all his devotees — saw the longing of this man and transformed himself into the very form the devotee was seeking. Since that day, this vesha is observed every single year. The symbolism runs even deeper: Ganesha is the remover of obstacles, always invoked before any great beginning — and the Rath Yatra is coming. The Gajanana Vesha is the Lord's cosmic declaration: all obstacles on the sacred path ahead have been removed. Watch till the end — because after this divine bath, something unexpected happens to the Lord. And that story is even more ancient, even more mysterious than everything you've seen today.