Monday, August 10, 2026

कभी व्यर्थ नहीं जाती ये औषधि | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 4 | Shree Hita Ambrish Ji

कभी व्यर्थ नहीं जाती ये औषधि | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 4 | Shree Hita Ambrish Ji

First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.

https://youtu.be/0p2Qh9-EEkE

00:00:24 शौनकादि ऋषियों ने श्री सूत जी को श्रेष्ठ आसन पर विराजमान

00:00:44 किया और फिर अत्यंत विनयावनत होकर उनसे निवेदन किया कि भगवान की कथा सुनाइए। 00:00:53 कल यहीं पर हमने चर्चा को विराम दिया था कि क्योंकि सब 00:01:08 ऋषि एक बड़े दीर्घकालीन यज्ञ का अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं, पर उनका संकल्प पवित्र है। वह पुरुषार्थ कर 00:01:18 रहे हैं किसलिए? कि सर्वात्मा भगवान प्रसन्न हो जाएं। 00:01:25 इसी पवित्र संकल्प के कारण इस शुभेच्छा का उदय हुआ कि भाई कोई 00:01:30 कोई मिले जो हमें भगवान की कथा सुनाए, भगवान का यश सुनाए। संत वाणी में कहते 00:01:39 हैं कि साधो कौन जुगती अब कीजै, जाते दुरमति सगल बिनासै, राम भगति मन 00:01:54 भीजै। क्या युक्ति करें, ऐसी कौन सी विधि 00:01:59 जिससे दुरमति का नाश हो? दुरमति क्या है? कई बार हम चर्चा करते हैं ना कि भाई भगवान का भजन 00:02:06 तो करते हैं, लेकिन संतों की पूरी-पूरी बात नहीं मान पाते हैं। पूरी बात मानें जब संत कहते हैं ना— 00:02:12 'सब तजि भजिए नंद कुमार'। भगवान का भजन तो करते हैं, पर सबको छोड़ नहीं पाते। वह जो बंधन आशा का, 00:02:21 ममता का संसार से बंधा है, उसके मूल में क्या है? उसके मूल में दुरमति ही है। 00:02:29 दुरमति माने स्वार्थ। मैं सदा से आपसे कहता आया हूं कि जीवन जीने की दो ही विधियां हैं—स्वार्थ है 00:02:37 और परमार्थ है। 00:02:40 स्वार्थी दुरमति है—मुझे सुख मिले, यहां से मिले, वहां से मिले। जबकि जीव अपने स्वरूप का विचार करे, 00:02:51 तो भगवान कह रहे हैं—'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'। जीव अपने स्वरूप का विचार करे, 00:03:02 तो भाई वह तो 'चेतन अमल सहज सुख रासी'। वह तो चेतन है, निर्मल है, सहज ही सुख की राशि 00:03:11 है। उसे किसी से मांगने की आवश्यकता क्या है? उसे किसी से याचना करने की आवश्यकता क्या है? यदि इस 00:03:17 बात का जीव मन में सदा विचार करे कि भाई मैं तो प्रभु का हूं, प्रभु मेरे हैं, फिर तो 00:03:23 तन, मन, प्राण तृप्त हो जाते हैं। और जो तृप्त है, वह तो बांटता है, वह तो देता है। 00:03:31 जब व्यक्ति तृप्त हो जाता है, तब इच्छा होती है देने की। इसीलिए मैं कई बार आपसे कहता हूं, जैसे 00:03:37 प्रेम स्पर्श करेगा, आपकी इच्छा होगी कि भाई अब दें, अब बांटें। क्योंकि प्रेम तृप्त करेगा। 'यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, 00:03:46 तृप्तो भवति'। नारद जी कह रहे हैं—'यत्प्राप्य' जिसको पाकर फिर 'न किञ्चिद् वाञ्छति' कुछ नहीं 00:03:58 चाहता। 00:04:01 'यत्प्राप्य न किञ्चिद् वाञ्छति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति'। प्रेम तृप्त कर जाता है, 00:04:10 दौड़ समाप्त हो जाती है। इसीलिए तो संतों ने प्रेम को परम विश्राम कहा है। तृप्त कर देता है प्रेम। 00:04:19 और जब कोई तृप्त होता है, तब उसकी इच्छा होती है कि अब मैं दूं, अब मैं बांटूं। जैसे हित का 00:04:26 भाव हृदय को स्पर्श करता है, तो एक हितोपासक 00:04:29 क्या कहता है?—'चिरजीवौ भूतल यह जोरी। नव निकुंज अभिराम श्याम संग नीको बन्यौ समाज। जय श्री हित 00:04:37 हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राज।' अभी बसंत आएगा और महाप्रभु बसंत गाते हैं और क्या कहते हैं?—'जय 00:04:45 श्री हित हरिवंश हंस-हंसिनी समाज। ऐसे ही करौ मिलि जुग-जुग 00:04:57 राज।' कोई तृप्त हृदय 00:04:59 ऐसा कह सकता है। 00:05:03 दौड़ समाप्त हो जाती है। जैसे प्रेम छू लेता है, जैसे हित का भाव स्पर्श करेगा, आप दे देना 00:05:13 चाहेंगे। संत कह रहे हैं—कौन सी युक्ति ऐसी करें, जाते दुरमति सगल बिनासै? यह जो हमारी स्वार्थ बुद्धि 00:05:21 है, यह नष्ट हो जाए। हमारे भीतर परमार्थ के उस परम मंगलमय भाव का उदय हो। 00:05:30 आस्तिक भाव की वृद्धि हो। 'जाते दुरमति सगल बिनासै, राम भगति मन भीजै'। हम कई बार बात करते हैं 00:05:40 ना कि भाई थोड़ा घना भाव तो हमारे जीवन में भी है, थोड़ी बहुत भक्ति भावना हमारे जीवन में भी 00:05:48 है, पर हमारी स्थिति एकरस नहीं रहती, हमारा भाव एकरस नहीं रहता, हमारा सुख, हमारा आनंद सदा बना नहीं रहता। 00:05:57 अभी हमारा मन जो है ना, वह 00:05:59 भीगा नहीं है भक्ति में, भीगा नहीं। कह रहे हैं—ऐसी कौन सी युक्ति करें कि दुरमति सदा के लिए नष्ट हो 00:06:05 जाए और राम भगति मन भीजै? संत की वाणी संकेत कर रही है कि जब तक स्वार्थ है, तब तक 00:06:13 मन भीगेगा नहीं। और वहां हमारे श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—'आवत जात न जानिए जैसे छां और धूप'। 00:06:20 रे तब तक उसको उपलब्धि मानना नहीं जब तक वह भाव आता-जाता रहे, जब बना रहे। इसलिए अनेक-अनेक 00:06:29 बार मैं आपको कहता हूं भाई मन सुधर जाए, यह एक बात है, फिर मन सुधरा भी तो रहे। सुधर-सुधर 00:06:35 के बिगड़ता है मन। थोड़ी देर के लिए, थोड़े दिन के लिए आपको लगेगा कि भाई सुधर गया मन, अब 00:06:44 तो मन कहीं नहीं जाता है, अब तो टिक गया, अब तो टिक गया, अब नहीं चाहिए हमको कुछ। और 00:06:48 कभी-कभी व्यक्ति क्या करता है, उसी आवेश में, उसी आवेश में सब छोड़कर चल देता है। लेकिन वह छोड़कर चल 00:06:54 देता है, चार कदम आगे चलता है, मन फिर वैसा का वैसा। फिर-फिर जीवन में वही संग्रह होने लगता 00:06:59 वस्तुओं का, व्यक्तियों का, यह देखने में आता है। यह तो बहुतायत से देखने में आता है। नहीं तो शास्त्र 00:07:07 कहता है कि जिस वस्तु को आपने संकल्प पूर्वक त्याग दिया है, जिस वस्तु को, जिस भाव को आपने संकल्प 00:07:16 पूर्वक त्याग दिया है, उसका पुनः स्पर्श करने पर सारा पुण्य क्षीण हो जाता 00:07:24 है। असत्य भाषण करने से पुण्य क्षय होता है, दिया हुआ वचन 00:07:29 पूरा न करने से आपका पुण्य क्षय होता 00:07:35 है। आप देखिए हमारे यहां हम सदा से सुनते आए हैं—कैसे हमारे श्री रघुनाथ जी हैं, कह रहे—'रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाहुं बरु बचनु न जाई'। जीवन में किसी भी प्रकार से असत्य न आ 00:07:54 जाए। लेकिन हम तो बहुतायत से देख रहे हैं, जो-जो वस्तु 00:08:00 छोड़कर व्यक्ति चलता है, चार-छह महीने बाद, साल-दो साल बाद आप देखते हैं उस व्यक्ति के जीवन में उन्हीं 00:08:08 वस्तुओं का संग्रह फिर से होने लगता है। छोड़े हुए का तो स्वीकार फिर नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि मन 00:08:15 ने छोड़ा ही नहीं था, वह एक भावावेश था। इसीलिए मैं आपको कहता हूं—धीरज धरना धर्म का पहला 00:08:21 लक्षण है, धृति, धैर्य धरना। अपने मन को खूब देर तक देखना, आप देखोगे मन सुधर-सुधर के 00:08:29 बिगड़ेगा, सुधरेगा फिर बिगड़ेगा, सुधरेगा फिर बिगड़ेगा। अरे हमारे महाप्रभु जी तो कह रहे—अंत तक इसका विश्वास नहीं करना—'ना जानौं छिन अंत कवन बुद्धि घटै 00:08:42 प्रकाश'। जिसको आज छोड़ रहा है, कल फिर पकड़ेगा। आज नहीं लग रहा है कोई अच्छा, कल अच्छा लगने लगेगा। 00:08:50 आज कोई बुरा लग रहा है, कल वही भला लगने लगेगा। आज भला लग रहा है, कल बुरा लगने 00:08:58 लगेगा। 00:09:00 तो मन सुधरा भी तो रहे, सुधर तो जाए पर मन सुधरा रहे। और हमको तो भाई छोटी सी बात 00:09:06 समझ में आई कि सत्संग से ही मन सुधरेगा भी और सत्संग से ही मन सुधरा भी रहेगा। इसीलिए आपको 00:09:15 कहता हूं कुछ भी छूटे, साधु का संग नहीं छूटना चाहिए। कहिए—'कीजै साधु संगति सोई'। 00:09:31 साधु 00:09:35 संगति... जो-जो बुधजन इस बात को जान गए, इस बात का मर्म समझ 00:09:45 गए, उन्होंने इस पंक्ति के रहस्य को जाना कि क्यों त्रिलोकीनाथ भगवान शंकर भगवान से यह बात कह रहे हैं—'पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग'। 00:10:00 हमारे श्री महाप्रभु जी प्रिया-लाल का दर्शन कर रहे हैं। प्रिया-लाल का दर्शन करते-करते क्या कह रहे हैं?—'साधु संगति करौं अनुदिन राती'। यही एक व्यवस्था है, मन सुधरा रहे यही एक व्यवस्था है—दुरमति नष्ट हो और फिर लौटकर 00:10:22 न आए। देखो कोई रोग हुआ, आपने जाकर 00:10:29 औषधि ली, रोग ठीक हो गया। डॉक्टर आपको एक बार रोग को ठीक करने की औषधि दे सकता है, लेकिन 00:10:37 संसार का कोई भी डॉक्टर, संसार का कोई भी वैद्य आपको यह लिखकर नहीं दे सकता है कि रोग आपको 00:10:42 फिर से नहीं होगा। यह कोई व्यवस्था नहीं है, चार दिन बाद फिर हो जाएगा। मन भी ऐसा ही है। 00:10:50 रोग न हो कभी, कभी रोग न हो इसके लिए तो भाई अच्छा आहार लीजिए—'युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु'। अच्छा आहार-विहार हो, नियमित, संयमित आपकी दिनचर्या हो, आपके जीवन में परिश्रम हो, प्रकृति के नियमों 00:11:08 का आप आदर करते हों, प्रकृति की अवहेलना न हो। सदा स्वस्थ रहने की तो यह युक्ति हमारे ऋषि-मुनियों 00:11:13 ने बताई है। ऐसे ही मन को भी अगर चाहते हैं ना मन सदा स्वस्थ रहे, पहले तो रोगी है 00:11:18 ही मन, पहले तो जाइए सदगुरु वैद्य और तुलसी बाबा कह रहे—'बचन बिस्वासा'। पहले तो सदगुरु रूपी वैद्य के 00:11:28 वचन पर 00:11:29 विश्वास करिए। 'औषध खाए पथ्य करे ताकि वेदन जाए'। पहले तो गुरु ने जो औषधि दी है उसका सेवन करिए, 00:11:37 कुपथ्य से बचिए। और मैं औषधि के सेवन से भी ज्यादा बल देता हूं—कुपथ्य से बचिए, कुपथ्य न हो 00:11:44 जीवन में। Do's and Don'ts होते हैं ना कुछ, जो नहीं करना वह नहीं करना है, जो करना है उसको 00:11:53 करने में थोड़ी ढिलाई हो भी जाए कोई बात नहीं, लेकिन जो नहीं करना है वह नहीं करना है। 00:12:03 फिर इसके बाद में एक बात और भी कहूंगा—जो नहीं करना है उसको नहीं करने की शक्ति, उसको 00:12:09 नहीं करने का बल कैसे आएगा? जो करना है वह करें, भजन करेंगे तभी तो आत्मबल बढ़ेगा। शायद मैंने 00:12:18 आपको कभी कहा था, एक महापुरुष का एक-एक लिखा हुआ एक वाक्य मेरे जीवन पर, मेरे मन पर, 00:12:25 मेरे चित्त पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला। महापुरुष 00:12:28 उसने एक बात कही कि मैंने जीवन में कभी वह नहीं किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था। मैंने वह 00:12:36 नहीं किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था। देखो महापुरुष बड़ी विनम्रता पूर्वक अपनी बात कहते हैं, वह यह नहीं 00:12:42 कह रहे कि हमने जीवन भर भजन किया। महापुरुष का वह जो कहना था, वह कहना ही मुझे बड़ा प्रिय 00:12:50 लगा। किस युक्ति से महापुरुष अपनी बात कह रहे हैं, यह नहीं कह रहे हैं कि मैंने जीवन भर भजन 00:12:56 किया है, मैंने जीवन भर सत्कर्म किया है, केवल 00:12:58 इतना कह रहे हैं विनम्रता पूर्वक—भाई वह नहीं किया जो हमको नहीं करना चाहिए था। इस एक बात में सब 00:13:03 बात आ गई। अर्थात आपने सदा बड़ी निष्ठा से वह किया है जो आपको करना चाहिए था, तभी तो यह 00:13:08 बल मिला, तभी तो यह शक्ति मिली कि जो न करने योग्य था उससे आप दूर रहे, उससे आप बचे 00:13:16 रहे। विपरीत में मन का आकर्षण सदा से रहा है, क्योंकि मन अविद्या से ग्रस्त है, जीव जो है वह 00:13:23 अविद्या से ग्रस्त है। इसी को दुरमति कहा है संतों ने, यही अज्ञान 00:13:28 है। और उस अज्ञान के कारण मन सदा, मन सदा जो-जो हित से विपरीत है, उसमें मन आकर्षित 00:13:37 होता 00:13:40 है। इस बात का कभी विचार ही नहीं करने देता है कि हमको यह शरीर मिला किसलिए है? शास्त्रीय 00:13:47 व्याख्या जो शरीर की है ना, क्या है शरीर? किसको कहते हैं? शास्त्र क्या कहता है? कहता है—'हिताहितप्राप्तिपरिहारानुकूला क्रिया चेष्टाश्रयं शरीरम्'। 00:13:59 बोले जो हित है उसकी प्राप्ति और जो अहित है उसका परिहार करने के लिए परमात्मा ने आपको अवसर दिया 00:14:06 है शरीर का। हिताहितप्राप्तिपरिहारानुकूला क्रिया चेष्टाश्रयं शरीरम्, इसके लिए शरीर मिला है। हित की प्राप्ति की 00:14:15 जाए और जो-जो अहितकारक है उसका परिहार किया जाए माने उसका त्याग किया जाए। इसी को सरल शब्दों 00:14:21 में कभी मैंने आपसे कहा था, जो-जो हमारे लिए, हमारे भीतर अच्छा है, जो हमारे भीतर कोई गुण है, 00:14:27 उसका हमको विकास 00:14:28 करना है और जो दोष है उसका मार्जन करना है। इसी का नाम साधना है, इसी का नाम तो साधना 00:14:36 है, इसी के लिए शरीर मिला है। कभी मन इस बात का विचार ही नहीं करता है। 00:14:45 क्यों? क्योंकि दुरमति के, अविद्या के अंधकार में पड़ा है। जब कभी कृपा होती है प्रभु की और सद्विचार का 00:14:57 उदय होता है, इसीलिए 00:14:58 मैं कल आपसे कह रहा था—ध्यान रखना भाई, संग न बिगड़े। संग बिगड़ेगा तो विचार बिगड़ जाएगा। क्यों संत 00:15:05 बहुत बल देकर कह रहे हैं? कह रहे—'दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः'। नारद जी भक्ति सूत्र में कह रहे हैं, कह रहे—सर्वथा 00:15:12 त्याग कर देना चाहिए कुसंग का, सर्वथा। अरे गोस्वामी जी ने तो यहां तक कह दिया कि 'तजिए ताहि कोटि बैरी सम जदपि परम सनेही'। आपको लगता हो हमारा परम स्नेही है, परम सुहृद है, 00:15:29 अगर उसके कारण सत्संग से 00:15:36 विमुखता आती है, भजन-भाव में बाधा होती है, मन से तो उसका त्याग कर ही दिया जाए। प्रारब्धवशात् यदि उसके निकट, उसके आसपास रहना भी पड़े, 00:15:46 पर मन से तो उसका त्याग कर ही देना चाहिए। गरज कर कहा है ध्रुवदास जी ने—'वृंदावन के वास को जिनके नाही हुलास। माता मित्र सुतादि तिय तज ध्रुव तिनको 00:16:06 पास।' 00:16:08 जाते दुरमति सगल बिनासै, राम भगति मन भीजै। फिर कहते हैं— 00:16:16 भए दयाल 00:16:18 कृपालु 00:16:21 संत जन 00:16:25 तब यह 00:16:27 बात बता 00:16:31 ई। 00:16:33 सरब धरम 00:16:36 मानौ 00:16:38 तिन की 00:16:40 ए, 00:16:41 जिन हरि 00:16:43 कीरति 00:16:45 गा 00:16:46 ई। 00:16:47 संत दयालु हुए, संतों को हम पर दया आई, उन्होंने हमको जो सब साधनों का सार है, वह साधन 00:16:55 बताया। उसने सब धर्म कर लिए, उसने सब 00:16:58 कर्म कर लिए जिसने हरि का जस गा लिया। इसलिए हमारे सूरदास कहते हैं, सरल शब्दों में बड़ी बात संत 00:17:09 कह देते हैं— 00:17:12 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:17:18 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:17:25 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:17:37 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:17:42 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:17:48 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:17:54 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:17:59 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:18:05 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:18:10 मैं कई बार सोचता हूं कि जब संत यह बात कहते हैं, जब संत यह बात कहते हैं, तो यह बात ही सुनने में कितनी मीठी लगती 00:18:21 है। देखो अभी देखो हम चर्चा कर रहे थे सूरदास जी की, एक बात मुझे याद आई मैंने कही। 00:18:29 कैसे मन में एक आनंद की लहर दौड़ जाती है ना यह बात सुनकर? अभी तो सूरदास जी की बात 00:18:33 मैं आपसे कह रहा हूं, वह काम हमने किया नहीं है, अभी काम करना तो बाकी है। तो काम सूरदास 00:18:40 जी करने को कह रहे हैं— 00:18:44 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:18:49 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:18:54 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:19:00 नर देही पाई चित चरण कमल दीजै। 00:19:05 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:10 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:15 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:20 दीन वचन संतन संग दरस परस कीजै। 00:19:25 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:30 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:35 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:41 लीला गुण अमृत रस श्रवन पुट पीजै। 00:19:46 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:19:50 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:19:55 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:00 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:05 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:10 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:15 सूरदास गिरिधर जस गाए-गाए जीजै। 00:20:20 सूरदास गिरिधर जस... 00:20:26 संग फिरत है काल भ्रमत नित शीश पर, 00:20:34 यह तन अति छिनभंग धुआं को धौरहर। 00:20:42 ताते दुर्लभ काल न वृथा गमाइए, 00:20:51 ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। 00:20:58 मैं तो कहता हूं भाई, उसी दिन, उसी क्षण कल्याण हो जाता है जिस दिन जीव की संत में श्रद्धा 00:21:04 हो जाती है कि भाई यह हमारे हितैषी हैं, जो कह रहे हैं हमारे हित की बात कह रहे 00:21:10 हैं। और वैसे भी देखो, 00:21:16 विचारो, श्री कबीर जी कह रहे हैं—'सतगुरु सम को है सगा, बिन सतगुरु अपना न कोई। जो यह राह बताए...' जिस दिन जीव की इस-इस बात में श्रद्धा पक्की हो जाए, पूरी हो 00:21:40 जाए, श्रद्धा पूरी हो जाए इस बात में कि संत हितैषी हैं 00:21:48 हमारे। मैं, मेरा तो कभी-कभी इन-इन संतों के शब्द, इनकी वाणी पढ़कर मन आनंद से भर जाता है। कितनी 00:21:55 कृपा पूर्वक, अनुग्रह पूर्वक... 00:21:58 मैं तो आपसे कई बार कहता हूं ना भाई, इनको क्या लेना-देना है हम भजन करें न करें, उनका 00:22:03 काम तो बन ही गया है, उनकी तो कार्य सिद्धि हो चुकी है। फिर भी लगे हैं—'परमारथ के कारणे लियो संत अवतार'। जीव को नरक से उबारने के लिए संत स्वयं जननी के गर्भ में आ जाता है। गर्भ 00:22:24 वास नरक वास है, फिर आता है संत उसमें, आप पर 00:22:28 मुझ पर दया करके, कृपा करके। पर उपकार देह धरणम्। ताते दुर्लभ काल न वृथा गमाइए। पैसा-कौड़ी बचाता-बचाता 00:22:44 जीव मर जाता है, देखो क्या-क्या गति होती है धन बचाने वाले की, क्या गति होती है। धन अधिक 00:22:50 हो जाए, धन का संग्रह अधिक हो जाए ना, तो पता है क्या होता है? वह जो आसपास वाले हैं, 00:22:59 वही मन में मनोरथ करने लगते हैं, बोले—कब मरेगा और यह सब सामान हमको मिलेगा। जो अपने सगे, अपने 00:23:08 स्नेही हैं, वही अपने शत्रु हो जाते 00:23:14 हैं। आप देखिए, विचार करना चाहिए कि जिन श्री भगवान के चरण चिन्हों का दर्शन करके अक्रूर जी भाव-विभोर 00:23:26 हो गए थे, प्रेम में 00:23:28 मगन हो गए थे जब-जब ब्रज में आए और श्री ठाकुर जी के चरण चिन्हों का दर्शन किया ना, 00:23:35 लोटपोट हो गए वह अक्रूर जी रज में। क्या सुंदर स्तुति अक्रूर जी भगवान की करते हैं, प्रेम मगन हृदय 00:23:46 उनका। और वही स्यमंतक मणि के प्रसंग में उन्हीं अक्रूर जी का भगवान पर विश्वास नहीं रहा। देखो कितना बड़ा 00:23:56 अनर्थ है यह! यह जिसको 00:23:57 आप अर्थ कहते हो, वस्तुतः कितना बड़ा अनर्थ है। भाई-भाई का शत्रु हो जाता 00:24:08 है। कोई भी युग हो, कोई भी युग हो, सत्य युग हो, वहां देखो ध्रुव जी की सौतेली माता कि 00:24:19 'मेरा पुत्र बैठेगा इस-इस-इस राज सिंहासन पर, मेरा पुत्र बैठेगा'। धन ही तो है। 00:24:28 त्रेता हो, तो कैकेयी की बुद्धि बिगड़ गई—'चले जाएं राम वन में, भरत को राज सिंहासन 00:24:40 मिले'। आज तो यह घर-घर की कथा है, कितना बड़ा अनर्थ है यह! उसका संचय करने में व्यक्ति लगा 00:24:50 रहता है, यह दुरमति तो है, यह कुमति तो है। 00:24:57 इसी से संत निकालता है। ब्रह्मर्षि स्वामी श्री सप्तानंद जी महाराज कहते हैं, बड़े सुंदर शब्द हैं—'कुमति कूप में पतन था, पकड़ निकाला हाथ'। हां, हम तो इस कुमति के कूप में, इस कुएं में, अंधे कुएं में गिरे थे, पकड़ 00:25:19 निकाला 00:25:24 हाथ। संत बताता है—जिसको धन 00:25:27 समझ रहे हो, जिसको अर्थ समझ रहे हो, वह तो अनर्थ है। जीवन की निधि, जीवन की संपत्ति क्या है?— 00:25:33 ताते दुर्लभ काल न वृथा 00:25:39 गमाइए, ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन 00:25:48 गाइए। अब मैं तो उस दिन भी आपसे कह रहा था भाई, इकट्ठा वह करता है जिसको प्रभु पर भरोसा 00:25:53 नहीं होता, जिसको प्रभु पर 00:25:57 विश्वास नहीं है, वह-वह यहां-वहां संग्रह करता रहेगा। शायद कभी आपको सुनाया था ना मैंने, किसी ने दो 00:26:05 पंक्तियां कही हैं, बहुत अच्छी, काम की बात है— 'अगर वह है, तो फिर फिक्र क्यों, और नहीं है, तो फिर उसका जिक्र क्यों?' अगर वह नहीं है, फिर किसकी बात करते हो? क्यों बात करते हो? है 00:26:24 और नहीं के बीच में तो कुछ नहीं होता है ना, या तो है या नहीं 00:26:31 अगर नहीं है, फिर उसका जिक्र क्यों है? और अगर है, तो फिर बंदे तुझे फिक्र क्यों 00:26:41 है? आप और मैं यहां उसका जिक्र करने के लिए आते हैं रोज। अभी हम कहां खड़े हैं? जिक्र भी 00:26:49 है और फिक्र भी है। होती है ना चिंता? होती है ना? ईमानदारी से बताओ, हो जाती है ना चिंता? 00:26:54 हो जाती है। कब होगा, 00:26:57 क्या होगा, कैसे होगा, होगा कि नहीं होगा। जबकि संत युक्ति दे रहे हैं—अरे, 'चरण पर रख दिया जब माथ तो किस बात की चिंता'। अगर चिंता करनी है, तो बस जो समय जा रहा है ना व्यर्थ, इसकी 00:27:21 चिंता करिए। यह नहीं आएगा, यह लौटकर नहीं आएगा। 'पत्ता टूटा डार सौं बहुरि न लागे बार'। 00:27:29 ताते दुर्लभ काल न वृथा 00:27:35 गमाइए, ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन... हरि भक्तन के संग सदा सुख पाइए। सब 00:27:55 कहिए—हरि भक्तन के संग 00:27:57 सदा सुख पाइए। ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। ब्रज नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए। और अब संत कह 00:28:13 रहे हैं तो फिर गाइए— कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:28:28 कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। राधा गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, राधा गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:28:50 गोविंद गोविंद गोपाल 00:28:58 नंदलाल, राधा गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल। 00:29:19 गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, गोपाल नंदलाल, गोपाल नंदलाल। 00:29:27 हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल, हे गोपाल नंदलाल। कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:29:48 कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल 00:29:57 नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल। 00:30:17 कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद हे गोपाल नंदलाल।

Gist in Hindi with timestamps & English

1. मानव जीवन के मूल उद्देश्य की समझ - Understanding the Core Purpose of Human Life

2. सत्संग और भक्ति की शक्ति - The Power of Satsang and Devotion

https://youtu.be/0p2Qh9-EEkE

[00:01] - [02:28] | सूत जी का सत्कार और ऋषियों का प्रश्न: शौनकादि ऋषियों ने सूत जी का दिव्य आसन पर सत्कार किया और भगवान की कथा सुनने का निवेदन किया ताकि 'दुरमति' (बुरी बुद्धि) का नाश हो सके।

[02:29] - [05:20] | स्वार्थ बनाम परमार्थ: स्वामी जी बताते हैं कि स्वार्थ ही दुरमति है। जब जीव स्वयं को ईश्वर का अंश मानकर तृप्त हो जाता है, तब उसके भीतर प्रेम और 'हित' का भाव जागता है।

[05:21] - [09:14] | मन की चंचलता और सुधार: मन अक्सर सुधर कर फिर बिगड़ जाता है। संतों के अनुसार, जब तक भक्ति में मन पूरी तरह भीग न जाए, तब तक उसकी स्थिरता पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

[09:15] - [13:40] | सत्संग की औषधि: सत्संग ही वह औषधि है जो मन को स्वस्थ रखती है। गुरु के वचनों पर विश्वास और 'कुपथ' (गलत संगति) से परहेज करना साधना का मुख्य हिस्सा है।

[13:41] - [17:00] | शरीर का उद्देश्य: मानव शरीर केवल हित की प्राप्ति और अहित के त्याग के लिए मिला है। दोषों को दूर करना और गुणों का विकास करना ही असली साधना है।

[17:01] - [22:40] | संतों की महिमा: सूरदास जी के पदों के माध्यम से समझाया गया है कि संतों का संग और भगवान के लीला गुणों का श्रवण ही इस दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनाने का एकमात्र मार्ग है।

[22:41] - [28:10] | धन का अनर्थ और समय की बर्बादी: संसार में धन का संग्रह अक्सर अनर्थ और आपसी कलह का कारण बनता है। दुर्लभ समय को व्यर्थ की चिंता के बजाय प्रभु सिमरन में लगाना चाहिए।

[28:11] - [30:46] | संकीर्तन: वीडियो के अंत में 'कृष्ण गोविंद गोविंद गोपाल नंदलाल' के मधुर संकीर्तन के माध्यम से भक्ति का रस प्रवाहित किया गया है।

1. The discourse emphasizes that the primary purpose of the human body is to distinguish between what is beneficial ('Hit') and harmful ('Ahit') for the soul.

2. It explains that 'Durmati' or corrupted intellect arises from selfishness, and it can only be cured through the medicine of Satsang (spiritual company) and the grace of a Guru.

3. The speaker highlights that a person’s mind is unpredictable and prone to falling back into old habits; hence, constant association with saints is necessary to keep the mind steady.

4. Material wealth is often described as a source of conflict ('Anarth') that leads to spiritual decline, whereas the real wealth is the remembrance of God's name.

5. The session concludes by teaching that instead of worrying about the future, one should surrender to the Divine and utilize every precious moment in chanting and devotion.

https://youtu.be/0p2Qh9-EEkE

बिगड़ी बात ऐसे बनेगी by Shri Hit Ambrish ji

बिगड़ी बात ऐसे बनेगी by Shri Hit Ambrish ji

Https://youtu.be/S6PKypQ3EQ0

First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.

#fq mark denotes an important quote / fact
00:00 जैसे सोए हुए हाथी से  00:14 जागती हुई चींटी की शक्ति अधिक है हाथी सोया हो और चींटी जागती हो तो उस काल उस समय उस  00:26 चींटी का बल उस चींटी की शक्ति अधिक है  00:32 इसी प्रकार जो मोह निद्रा में सोया है वो भिक्षुक है या सम्राट है पर वो मृत प्राय ही है  00:43 निद्रा में व्यक्ति मृत प्राय ही तो होता है उस पर कहीं से कोई आक्रमण कर दे उसको कोई होश  00:50 नहीं है अगर आप कभी इस बात का विचार करोगे तो आपको अनुभव होगा कि वही है जो सोते जागते  01:00 जीव की रक्षा करता है जब हम सो जाते हैं अपनी देह की भी सुध नहीं रहती किस दिशा से  01:07 कौन आकर आक्रमण कर दे क्या खबर है तभी तो जब एक राजकुमार ने कहा था मीरा जी से कि  01:15 मैं आपसे विवाह करना चाहता हूं तो मीरा जी ने कहा कि ठीक है मैं जो खिलाऊंगी खा लोगे खा  01:22 लूंगा जो पहनाऊंगी पहन लोगे पहन लूंगा और जब मैं सोऊंगी तब जागोगे तो यहां पर आकर वह मौन हो  01:31 गया अर्थात सोना नहीं कभी यह मेरी शर्त है क्योंकि जो मेरा पहला पति है वह कभी सोता नहीं मैं  01:38 जब सो जाती हूं तो भी वह जागता हुआ मेरी रक्षा करता है कहने का तात्पर्य यह है कि जो  01:44 जो सुशुप्ति में है जो जो अचेत पड़ा है वो मृत प्राय ही है तो जो मोह की निद्रा में  01:49 सोया है वो मृत प्राय ही है जो संत और सत्संग की कृपा से जाग गया है कल के सत्र  01:58 में मैंने आपको निवेदन किया था कि भगवत कथा के शब्दों में क्या है जागृति है वो जगाते हैं सोए  02:06 हुए जीव को जगाते हैं और जब जीव जागता है वस्तुत वो तभी आत्मबल प्राप्त करता है तो जो मोह  02:14 निद्रा में सोया है वो भले सम्राट क्यों नहीं है पर वो मृत प्राय है तभी संत कहते हैं जो  02:20 न भजे हरि नाम को जानिए मरे समान धोंकनी जो सुनार की ले सांस बिन प्राण सांस तो सुनार की  02:31 धोंकनी भी लेती है प्रभु जीवन तो नहीं है जो ना भजे हरि नाम को जानिए मरे समान तो जो  02:39 जागा हुआ है उसका बल उसकी शक्ति उसके जीवन का मूल्य उसके जीवन की गुणवत्ता उसके जीवन की श्रेष्ठता एक  02:48 मोह निद्रा में पड़े सम्राट से कहीं अधिक है  02:53 इसीलिए कबीर ने भी कहा धनवंता सोई जानिए जाके नाम रतन धन होए  03:02 कई बार हमने चर्चा की अनेक अनेक बार इस विषय पर कभी कम कभी अधिक चर्चा हुई कि बड़ा अद्भुत  03:13 यह सूत्र है और बड़ा सुंदर रहस्य इसमें छिपा है कि सत हरि भजन जगत सब सपना और इस दृश्य  03:24 प्रपंच से मुक्त होने की विधि है बस केवल जाग जाना और कल भी आपसे कहा आज पुनः कह रहा  03:31 हूं जागृति केवल संत के संग से ही संभव है बिन सत्संग न हरि कथा और तेहि बिन मोह न  03:38 भाग उससे उससे कम में उसके बिना ये मोह की तंद्रा जो है ये टूटेगी नहीं पहले संत मिलेगा संत  03:46 के मुख से भगवत कथा सुनने को मिलेगी और उस भगवत कथा के प्रभाव और प्रताप से यह सोया जीव  03:52 जो है ये जगेगा शरीर की दृष्टि से बुद्धि की दृष्टि से यहां कोई कितना भी बलवान क्यों ना दिख  04:00 पड़ता हो पर हाथ में विष का प्याला आ जाए और कोई मुस्कुराता रहे ऐसा तो कोई भगवान का भक्त  04:05 ही कर सकता है ऐसी सामर्थ तो भगवान के भक्तों में ही देखी जाती है जिनका जीव जग गया है  04:14 मैं तो कई बार चिंतन करता हूं और आंख भीग जाती है आप देखिए कैसा अपमान द्रोपदी का होता है  04:23 कोई उस पीड़ा की कल्पना नहीं कर सकता कोई भी उस पीड़ा की कल्पना नहीं कर सकता जो जो पीड़ा  04:31 द्रोपदी को है भरी सभा और कैसा अपमान असहय अपमान दुस्य पीड़ा श्राप देने को उद्यत है द्रोपदी और माता  04:42 गांधारी कहती है बेटी रुक जा वो रुक भी जाती है और माता को देखते ही पहले प्रणाम भी करती  04:47 है इसको कहते हैं आत्मबल किसी ने अनुचित किया आपने बदला लिया आपने प्रतिकार किया आपने उत्तर दिया तो यह  04:57 बल नहीं है क्षमा बल है क्षमा वही कर सकता है जिसके पास में आत्मबल होगा जिसके पास भीतर का  05:04 कोई आधार होगा वो क्षमा कर सकता है कहते हैं अकारण करुणा सिंधु है भगवान कितने कृपालु है कितने दयालु  05:14 है ब्रह्मांड्य देव है कहते पर अश्वत्थामा की करनी देखकर तो भगवान को भी क्रोध आ गया भगवान ने कहा  05:20 ये आतताई है माने धरती पर बोझ है धिक्कार है इसके जीवन को यह ब्राह्मण कहलाने योग्य नहीं है इसके  05:26 प्राण अभी ले लेने चाहिए ऐसा व्यक्ति अगर जीता है तो वो धरती पर बोझ है वो धरती के कष्ट  05:32 का कारण बनता है इसके प्राण ले लेने चाहिए अभी  05:37 और द्रोपदी कहती है कि नहीं इसे क्षमा कर दो गुरु पुत्र है आज जो कष्ट मैं पा रही हूं  05:45 कल वो कष्ट इसकी माता पाएगी और कष्ट बढ़ाने से बढ़ता ही तो है अभी मैं कष्ट में हूं मैं  05:54 पीड़ा में हूं कल इसकी माता इसी कष्ट और पीड़ा में होगी और मेरा जीवन पीड़ा बढ़ाने के लिए नहीं  05:59 है कहते हैं भगवान के नेत्र छलछला गए उस समय द्रोपदी के मुख से सुनिए कितनी पीड़ा में है ये  06:06 और आप आप उनके पूर्व की यात्रा देखिए वो कितनी पीड़ा भोग कर आई है कितनी पीड़ा कितना अपमान कितना  06:13 कष्ट  06:16 लेकिन उसके बाद भी कहती है भाई इसको क्षमा कर दो यह गुरु पुत्र है यह जो आत्मबल है ना  06:22 यह भीतर से जागे हुए जीव के पास सोता है जो भीतर से संत और सत्संग की कृपा से जग  06:29 गया है जिसने जान लिया है देखो भाई सच्ची चीज देकर कोई झूठी चीज कमाए तो उसको बुद्धिमान तो नहीं  06:36 कहना चाहिए सोने का सच्चा सिक्का देकर और कोई पीतल का सिक्का घर ले आए तो उसको बुद्धिमान कहोगे वह  06:45 तो बुद्धिमान नहीं है झूठी वस्तु देकर कोई सच्ची कमा ले वो पंडित है इसीलिए गोस्वामी जी कह रहे हैं  06:53 सोई कवि कोवि सोई रण धीरा नीति निपुण सोई चतुर सयाना श्रुति सिद्धांत नीक ते जाना सोई कवि कोवि सोई  07:02 रणधीरा जो छल छाड़ भजे रघुवीरा जिसने जिसने ये ये जन्म जीवन पाकर वो सच्ची वस्तु कमा ली नहीं तो  07:11 भाई जीवन झूठा ही है ऐसे अनन्य नपति श्री स्वामी हरिदास जी महाराज कहते हैं कहे श्री हरिदास विचार देखो  07:20 कह रहे विचार करके देखो कहे श्री हरिदास विचार देखो बिना बिहारी नाही जस सार वस्तु क्या है इस संसार  07:27 में एक बार विचार करो देखो  07:32 जो अपना अपना सुहृद है संबंधी है आज थोड़ा सुख देता है कल बड़ा दुख भी देता है आज जो  07:38 प्रिय है कल वही अप्रिय हो जाता है आज जो संग खड़ा है कल वही विरोध में खड़ा हो जाता  07:44 है हरि को एसो ही सब खेल तो कह रहे बिना बिहारी ना ही जस और संत कह रहे विचार  07:52 करके देखो कहे श्री हरिदास विचार देखो अरे एक बार विचार तो करो बिना बिहारी ना ही जस प्रभु के  08:01 बिना प्रभु के भजन के बिना प्रभु की कृपा के बिना ना तो जीव रस पाता है ना जस पाता  08:07 है जीव फस जाता है फिर फांसी ऐसी परे तह सम दुख न होई  08:17 तू सोए नहीं रहना है भाई बहुत गई और थोड़ी रही  08:25 बहुत विचार कर संत कहते हैं कि दो बातें मत भूलिए नारायण एक एक मौत को और दूजे श्री भगवान  08:33 मृत्यु का स्मरण करना अर्थात क्या 24 घंटा भयभीत रहना मर जाएंगे मर जाएंगे इसके लिए संत कह रहे हैं  08:39 ना वो कह रहे हैं भाई मृत्यु सत्य है निकट है सर पर खड़ी है इसलिए शीघ्र अति शीघ्र अपना  08:45 काम बना लीजिए बस जल्दी से जल्दी अपना काम बना लीजिए ना विलंब कर तभी श्रीमद् भागवत कहती है तीव्र  08:53 भक्ति योगन भजेत पुरुषम परम  08:59 तभी हम रोज कहते हैं कि राधा वल्लभ लाल की दौड़ आरती देख दौड़ कर जाइए ठीक है आप और  09:06 मैं लगे हैं संसार के काम में धंधे में पर वो काम धंधा छोड़िए और दौड़ कर जाइए जब अवसर  09:12 मिले तो दौड़ कर जाइए कल स्मरण हो आपको मैंने कहा था कि बाहर उत्साह और भीतर निश्चय बना रहे  09:21 धैर्य बना रहे बाहर हमारी हमारी क्रिया में उत्साह बना रहे और भीतर धैर्य बना रहे और उत्साह और क्रिया  09:29 के साथ-साथ कहीं और भीतर निश्चय भी बना रहे निश्चय डगमगा ना जाए हरि नाम व्यास जी अपनी वाणी में  09:38 लिखते हैं कहते हैं भक्त बिन कौन सहयो अपमान कैसी-कैसी पीड़ा कैसा कैसा कष्ट यहां पर भक्तों ने सहा है  09:46 कौन कौन सहे अपमान फिर उनके पास ये बल कहां से आता है कह वो जो जागृति है ना जो  09:56 जीव जग गया है जिसने अपने स्वरूप को जान लिया है पहचान लिया है ये जागृति ये आत्मबल प्रदान करती  10:03 है  10:09 और इस इस जागृति का स्रोत क्या है गाया गाया हरि गुण गाया  10:20 गाया गाया हरि गुण गाया गाया गाया हरि गुण गाया काल व्याल सो अरे निश्चय तो ऐसा हो श्री रैदास  10:41 जी महाराज महाराज कहते जो तुम तोरो राम मैं ना तोरू तुम संग तोर कौन संग जोरू  10:51 कह जो तुम तोरो माने तुम भी अगर मेरा हाथ छोड़ दो मारो झिड़को तो नहीं जाऊं सरक सरक तुम  11:01 ही पे आऊं और देखो भाई भूमि से जब स्वर्ण निकलता है ना तो प्रभु के श्री अंग पर पहुंचने  11:12 से पहले एक बार तो उसको जलना पड़ता है मैं उस दिन भी किसी से कह रहा था जीवन में  11:18 एक बार तो आपके भाव की आपकी भक्ति की परीक्षा होगी एक बार वो कब हो आज हो कल हो  11:25 अभी हो जाए या कभी हो पर होगी अवश्य याद रखना प्रभु तक पहुंचने से पहले स्वर्ण को एक बार  11:31 अग्नि में तप कर अपनी शुद्धता की परीक्षा देनी पड़ती है मैंने उस दिन भी आपसे कहा था ना कि  11:40 स्वर्ण को शुद्ध नहीं किया जाता है अग्नि में डालकर सोने को शुद्ध नहीं किया जाता अशुद्धि हटाई जाती है  11:45 स्वर्ण तो शुद्ध ही है अशुद्धि हटा दी जाती है  11:53 तो उस उस समय उस परीक्षा से तप कर एक बार तो जीव को खरा उतरना पड़ता है उस कसौटी  12:00 पर भी हां पर इतना मैं अवश्य साथ में और कह दूं यह तभी संभव हो पाता है जब जीवन  12:06 में सत्संग का आधार हो मैंने ऐसा देखा अनुभव होता है चारों ओर घटती घटनाओं को देखकर कि कोई प्रतिकूल  12:17 परिस्थिति आ जाती है जीवन में अगर सत्संग का आधार ना हो तो व्यक्ति कुमार्ग पर चला जाता है सत्संग  12:23 का आधार ना हो तो व्यक्ति कुमार्ग पर चला जाता है और सत्संग का आधार हो सत्संग का संस्कार हो  12:29 तो व्यक्ति अपने जीवन को तपस्या बनाकर तप कर निखर जाता है  12:37 क्योंकि क्योंकि वो जो कुमार्ग है ना वह देखने में बड़ा सरल सुगम है आपको लगेगा कि उस पर कोई  12:44 बहुत परिश्रम नहीं करना पड़ेगा बड़ा बड़ा आसान रास्ता दिखाई पड़ता है वो पर लेकर कहीं नहीं जाता है भाई  12:52 उसके अंत में है अंधेरा लेकिन ये ये सब बल ये सब आधार देगा सत्संग ही इसलिए मैंने कहा कि  12:59 आसपास घटने वाली घटनाओं से ही हम देखते हैं सीखते हैं और सीखना भी चाहिए आसपास घटने वाली घटनाओं से  13:05 देख सीख कर पता चलता है कि प्रतिकूल परिस्थिति तो जीवन में आती है पर जिसके पास सत्संग का बल  13:12 होता है ना वो उसके बाद और सजग सावधान हो जाता है और जिसके पास नहीं होता सत्संग का संस्कार  13:18 वो चल पड़ता है कुमार्ग पर  13:24 इसलिए बहुत विचार कर संत कहते हैं कल भी मैं आपको कहता कह रहा था ना संतों की वाणी की  13:30 यही बलिहारी है उनके शब्दों की यही बलिहारी है कि वह बड़ी कठिन कठिन क्लिष्ट क्लिष्ट बातों को अत्यंत सरल  13:37 करके दे देते हैं जैसे बहुत कड़वी दवा हो बहुत कड़वी दवा हो ना तो वैद कहता है इसको शहद  13:44 के साथ देना ऐसे ग्रहण नहीं की जाएगी इसको शहद के साथ देना इसको किसी मीठी वस्तु के साथ देना  13:50 खाते ही कोई मीठी वस्तु खा लेना ऐसे जो संत है ना वो कठिन कठिन बातों को बड़ी सरलता सुगमता  13:55 से आपको मुझे पिला देते हैं हृदंगम करा देते हैं तभी कहते हैं बस लगे रहना तेरी बनत बनत बन  14:02 जाए  14:07 बनत बनत बन जाएगी  14:12 तो यही से बात बनेगी भाई इसी के अभाव में बिगड़ी है जिसके अभाव में बात बिगड़ी है उसकी पूर्ति  14:24 से ही तो बात बनेगी सत्संग के अभाव में ही जीव बिगड़ा है जीव क्यों बिगड़ा वो तो ईश्वर अंश  14:31 है अविनाशी है चेतन अमल सहज सुख राशि किसके अभाव में बिगड़ा सत्संग के अभाव में बिगड़ा देखो किसी ना  14:41 किसी का संग तो मन करेगा निरंतर करेगा सतत करेगा आप दो घड़ी चैन से बैठ भी जाओ पर मन  14:48 तो नहीं बैठता है वो तो किसी ना किसी का संग कर रहा है मन है ही क्या मन क्या  14:54 है संकल्प विकल्पात्मकम अंतःकरणम इति मनः संकल्प और विकल्प का ही नाम मन है माने मन उछल कूद कर ही  15:01 रहा है कर ही रहा है निरंतर कर रहा है और करेगा किसी का संग तो करेगा अगर आप मन  15:06 को सत्संग नहीं कराओगे तो मन कुसंग करेगा किसी ना किसी का संग तो मन करेगा आप सत्संग करा दो  15:12 तो वो सत्संग करेगा आप आप सत्संग नहीं कराओगे एक एक और बात भी यहां समझने की है एक व्यक्ति  15:18 कहता है कि भाई हम कुसंग भी नहीं करते लेकिन हम सत्संग में भी नहीं जाते वो व्यक्ति भूल कर  15:23 रहा है क्योंकि सत्संग के अतिरिक्त तो जो है वो एक प्रकार से कुसंग ही है वो आज नहीं तो  15:28 कल किसी ना किसी प्रकार की हानि कराएगा ही ऐसे भी बहुत लोग होते हैं ना वो कहते हैं कि  15:34 भाई हम सत्संग में भी नहीं जाते पर हम किसी का बुरा भी नहीं करते हम किसी का अहित भी  15:39 नहीं करते लेकिन हम सत्संग में भी नहीं जाते भाई कमाओगे नहीं तो जो गांठ में कमाया हुआ धन है  15:45 वो कई दिन चलेगा खर्च करते करते कोई केवल खर्च ही करे कमाए नहीं तो समुद्र भी खाली हो जाता  15:51 है  15:58 तो यदि आप सत्संग में मन को नहीं लगाओगे तो वो आपको कुसंग में ले जाकर गिरा देगा और उसके  16:04 पास इतनी सामर्थ है संत कह रहे हैं शास्त्र कह रहे हैं बोले बंधन और मोक्ष का कारण मन ही  16:10 है इस चेतन अमल सहज सुख राशि जीव को बंधन में डालने वाला कौन है मन है मुक्त कराने वाला  16:18 कौन है मन है मन ही मिलावे राम से और मन ही करे फजीत किसी की बात भगवान ने नहीं  16:26 की ना बुद्धि की ना चित्त की मन की बात कर रहे हैं असंशय महाो मनो दुर्निग्रहम चलम ध्रुवदास जी  16:33 कह रहे हैं जैसे खोटे तुरंग की जैसे अडियल घोड़ा होता है ना थोड़ी थोड़ी देर बाद अटक जाता है  16:39 स्वामी चाहता है वह कहीं चले पर वो जाता कहीं और है स्वामी को भी कहीं और ले जाता है  16:44 तो बहुत अड़ियल घोड़ा हो तो अपने सवार को ही पटक देता है (मन भी इसी प्रकार है) फिर मैं आपको यह कह रहा हूं  16:49 कि मन के पास इतनी सामर्थ है वो ले जा सकता है आपको कहीं आज व्यक्ति जितनी दौड़ भाग कर  16:54 रहा है कि जीवन में जितनी दौड़ भाग है क्या क्या व्यक्ति नहीं करता है छल कपट पाप कर रहा  17:03 है निरंतर कर रहा है किसके कहे कर रहा है शास्त्रों के कहे कर रहा है गुरुजनों के कहे कर  17:09 रहा है अपने हितैषियों के कहे कर रहा है किसके कहे कर रहा है मन के कहे कर रहा है  17:15 अच्छा और संसार कैसा दुष्ट है कैसी शिक्षा संसार देता है वो कहता है सुनो सबकी करो मन की कहता  17:22 है कि नहीं कह सबकी सुनो करो मन की अरे मन की सुनी करके किसका हित हुआ है आज तक  17:32 यहां तो कहते हैं मन की चाल चलने वाला मन मुखी है वह तो कभी कृपा पात्र हो ही नहीं  17:37 सकता मैं तो कई बार विचार करता हूं कि कुछ कुछ बातें कैसे जन्म से ही हमको सिखा दी जाती  17:43 है ऐसे आपसे मैं कहता हूं कहते हैं मन लगा के काम करो  17:50 छोटी सी बात है आप चाय बना रहे हो मन लगाने से क्या होगा भाई उसमें बुद्धि की आवश्यकता है  17:57 है ना कब कब उसमें चाय डालनी है कब मीठा डालना है कब दूध डालना है तो बुद्धि की आवश्यकता  18:01 है इसमें मन क्या करेगा इसमें मन ना हो तो भी चाय बन जाएगी बुद्धि ना हो तो नहीं बनेगी  18:07 अब मूर्ख व्यक्ति को कहो जाकर लड्डू बनाओ कैसे बनाएगा वो मन तो उसके पास में है बुद्धि तो नहीं  18:11 है तो संसार के काम में तो मन नहीं चाहिए जो वस्तु जहां लगानी चाहिए वो वहां नहीं लगाई इसी  18:18 के कारण तो सब भूल भ्रम है जीवन में और दूसरी बात ये हमको सिखा दी बोले सुनो सबकी करो  18:25 मन की क्यों करो भाई मन की मन की करने से हित नहीं होता मन से मन से कराने से  18:33 हित होता है ध्रुवदास जी कह रहे हैं बोले मन अब तू मेरो कहो कर अपने मन से ध्रुवदास जी कह  18:38 रहे आज तक मैंने तेरा कहा किया अब तू मेरा कहा कर क्योंकि तेरा कहा मैं जब तक करता रहा  18:44 कहूं ना पायो सुख डारन डारन में फिरो पातन पातन दुख बात तो बड़ी छोटी सी है हजार बार सुनी  18:52 होगी आपने सुनी ना यहां वहां से सुनी आप भी हो सकता है किसी को ये सलाह देते हो भाई  18:56 सबकी सुनो मन की करो ना ना मन की ना करिए भाई श्रीमद् भागवत में उदाहरण आता है ना ध्रुव  19:02 जी के प्रसंग में राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां है एक सुरुचि है एक सुनीति है सुनीति माने जो शास्त्र  19:09 कह रहे हैं जो गुरुजन कह रहे हैं वो करो लेकिन वो करना कठिन है उसके लिए आपको अनुशासन में  19:14 रहना पड़ेगा उसके लिए स्वार्थ को एक और रखना पड़ेगा उसके लिए शरीर के सुख का भी त्याग करना पड़ेगा  19:19 और दूसरी है सुरुचि सुरुचि माने जो मन में आए वो करो अच्छी राजा उत्तानपात को कौन लगती है सुरुचि  19:26 लगती किसी को भी उनको क्यों आपको मुझे हम सबको सुरुचि ही प्रिय है जो मन को अच्छा लगे वो  19:31 करो छोटे से बच्चे को सिखा दिया मन की करो सबकी सुनो मन की करो ना भाई मन की ना  19:38 करिए मन का कहा करके कोई टिकाने नहीं पहुंचा मन ही करे फजीत तभी श्री नागरीदास जी कहते हैं ये  19:47 मन मार जवाइए जीयत ना आवे काज ऐसा मन भजन के काम का नहीं जैसा आपका मेरा आज मन है  19:54 ना अपनी इच्छा से चलने वाला बेलगाम चलता है जहां जहां इच्छा हो वहीं जाता है और अकेला नहीं जाता  20:00 आपको भी ले जाता है आपको भी ले जाता है तो ऐसे मन के कहे चल के ऐसे मन के  20:07 पीछे लग के किसी का हित नहीं हुआ यह मन मार जिवाइए मार जिवाइए अर्थात एक बार इस मन को  20:13 गुरु चरणों में डालिए  20:18 फिर वो अपनी अमृत संजीवनी विद्या से इसको इसको पुनर्जीवित करेगा  20:26 फिर फिर यह काम का होगा फिर यह कल्याण कराएगा अब कोई पूछे भाई इतना ही झंझट है तो इसको  20:35 मार ही दो मन मार दो लेकिन नहीं मारना नहीं है क्योंकि मिलाएगा भी यही मिलाएगा भी यही मन ही  20:42 मिलावे राम से मिलाने वाला भी यही है तो इसको मार नहीं सकते तभी जब श्री कृष्ण कथा का चिंतन  20:49 किया जाता है ना तो कहते जो कालिया है ना हजार फण है हर फण से वो विश्व उगलता है  20:53 भगवान ने उसको मारा नहीं मार भी सकते थे कितने दैत्यों को मारा असुरों को मारा उसको क्यों छोड़ दिया  21:01 मारा नहीं उसको नाथा माने नियंत्रित किया है अपने चरण कमल उसके मस्तक पर पधराकर उसको उसकी वृत्ति से मुक्त  21:10 किया है इस इस लीला में प्रभु ने पापी का संहार नहीं किया पाप का संहार कर दिया जो अनुचित  21:16 था उसको हटा दिया हां पर ये छोटी सी बात हमको आज मिल जाती है कि भाई ये ये बात  21:25 ठीक नहीं है कि सुनो सबकी और करो मन की ये ये बात ठीक नहीं है ये ये फार्मूला जीवन  21:30 में नहीं लगाना लगाओगे तो बड़ी भारी भूल हो जाएगी  21:40 जहां अपनी बुद्धि न जाती हो जहां जिस बात पर अपनी बुद्धि में निर्णय लेने की क्षमता ना हो वहां  21:46 शास्त्र का और गुरुजनों की आज्ञा का ही अनुसरण करना चाहिए चाहिए इसी में जीव का इसी में आपका मेरा  21:53 हम सबका हित है कल्याण है  22:00 कल भी मैं आपको कह रहा था ना किसी व्यक्ति ने लिखा कि मैं आपकी इस थ्योरी से सहमत नहीं  22:04 हूं तो मैं बड़ी विनम्रता पूर्वक एक बात यहां से कहना चाहता हूं कि मैं यहां से कुछ भी अपनी  22:10 थ्योरी नहीं कहता हूं ये तो जो शास्त्र की और गुरुजनों की बात है मैं तो जो की त्यों आपको  22:16 वो बता रहा हूं अरे मेरे क्या मेरे पिता के पिता के पास में इतनी बुद्धि नहीं है जो अपनी  22:21 थ्योरी बना सके हमारे पास इतनी बुद्धि नहीं है भाई मैं तो यहां से ये बात कह रहा हूं हमारे  22:26 पास ना इतनी बुद्धि है और ना हमें ऐसी बुद्धि की आवश्यकता है कि हम इससे न्यारा कोई अपना सिद्धांत  22:31 बनाए तो जो हमको मिल गया है हमको पर्याप्त है इन शास्त्र के वाक्यों के रूप में अपने आचार्य के  22:39 शब्दों के रूप में हमें जो मिल गया है ना जो प्राप्त है वो पर्याप्त है इससे इससे अधिक की  22:43 हमको आवश्यकता नहीं है  22:51 तो ये जो जागृति है यही शक्ति है मैं मैं सार के रूप में आपको यह निवेदन करना चाह रहा  22:58 हूं जहां से मैंने चर्चा आरंभ की पहला वाक्य मैंने क्या कहा कि सोते हुए हाथी से जागती हुई चींटी  23:05 की शक्ति अधिक है क्योंकि वो सोया है और वो जागृत है जागृति ही बल है जागृति ही जीवन शक्ति  23:13 है जो सोया है वो तो मृत प्राय है वो भूमि पर सोया हो या सोने के पलंग पर पर  23:19 वो तो मरे समान ही है जो जागा है जागा जो जागा है जो जागत है सो पावत है छोटा  23:27 सा था तब से सुनता हूं ये दो पंक्तियां उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रेन कहा जो सोवत है  23:33 जो सोवत है सो खोवत है जो जागत है सो पावत है जो जागृत है वो प्राप्त कर रहा है  23:39 वो करेगा श्रेष्ठ वस्तु प्राप्त करेगा जो जाग गया है और इतनी सी बात और समझ में आ गई भाई  23:46 जगाने की जो सामर्थ्य है वो किसके पास है वंद गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि महा तम  24:02 पुंज जासु वचन रवि कर जा वचन रवि कर जन्मजनम का सोया मनवा और सतगुरु शब्द सु जागा ये जो  24:24 इतने दिनों से हम चर्चा कर रहे हैं ना मैंने आपको पहले ही कहा मैं आपको कोई कहानी नहीं सुना  24:28 रहा हूं इन शब्दों में जागृति है क्योंकि परम जागृत अवस्था से यह शब्द उद्भूत हुए हैं महर्षि वेदव्यास परम  24:37 सत्य का दर्शन कर रहे हैं परम सत्य का जय जय घोष करते हुए कह रहे हैं सत्यम परम धीमहि  24:44 उसका दर्शन कर रहे हैं उसका अनुभव कर रहे हैं उसका आस्वादन कर रहे हैं उस परम जागृति की अवस्था  24:49 में प्रकट हुए ये शब्द हैं और कई बार चर्चा की हमने क्रोध से जो शब्द आता है वो आपको  24:57 भी क्रोध में ले जाता है गुस्से में आपको कोई कुछ बोले तो गुस्सा आता है कि नहीं आता प्यार  25:01 में कोई कुछ बोले तो बदले में प्रेम और स्नेह ही तो उमड़ता है ह्रदय में जो शब्द जहां से  25:06 आया है वो आपकी चेतना को वहीं ले जाएगा सकारात्मक शब्द आपको सकारात्मकता की ओर ले जाएगा नकारात्मक शब्द आपको  25:13 नकारात्मकता की ओर लेकर जाएगा गुरु का शब्द भगवान से आता है इसीलिए वह भगवान तक लेकर जाता है गुरु  25:20 का जो शब्द है प्रभु से आया है वह सच्चिदानंद से आया है वो सच्चिदानंद ही है वही से आया  25:25 है वही तक लेकर जाता है अक्षर धुर की पालकी  25:36 महाराज अपनी वाणी में कहते हैं ना जाका किया दरगाह चले जो यहां कहता है और वहां तक चलता है  25:45 जाको मीत साजन है समिया  25:53 जिस जन को काहे की कमिया जाको मीत साजन है समिया इस जन को कहो काहे की कमिया हो जाकी  26:14 प्रीत गोविंद स लागी हो जाकी प्रीत गोविंद स लागी दुख दर्द भ्रम ताका भागी जाको मीत साजन है समिया  26:42 इस जन को काहे की कमी पर एक छोटी सी बात मैं और निवेदन करके आगे बढूं शायद कभी पहले  26:51 भी मैंने आपसे कहा था जो करता है जो जीव स्वयं को करता जानता है उसके लिए ईश्वर केवल दृष्टा  27:01 है केवल देखता है उसके लिए एक अलग विधान बनाया है ईश्वर ने भाई करेगा सो भरेगा संत कह रहे  27:10 तू क्यों होत उदास लेकिन जो समर्पित है जैसे द्रोपदी ने जब दोनों हाथ उठा दिए ना उसने कहा कि  27:19 भाई अब मेरा कोई बल नहीं है उसने देख लिया संग सखा सब तज गए और कोई न निभयो साथ  27:28 और मैं तो एक और बात भी आपको बड़ी विनम्रता पूर्वक कहूं भाई जीवन में अनेक अनेक बार ऐसी स्थितियां  27:35 उत्पन्न होती है जब वस्तुत उस पर किसी का नियंत्रण नहीं  27:41 संग सखा सब तज गए और कोई ना निवयो साथ कहे नानक यह विपत में एक टेक रघुनाथ लेकिन भगवान  27:50 की माया कैसी है कि जब वो दुख का झंझात आता है ना तो जीव से भगवान के चरण छूट  27:56 जाते हैं वो छूट ना जाए और कस के पकड़ लिए जाए छूट जाते हैं मैं मैं ऐसा नहीं कह  28:01 रहा कि आपसे छूट जाते हैं मुझसे नहीं छूटते किसी से भी छूट जाते हैं जीव अधीर हो जाता है  28:09 पर उस समय और कस के पकड़े  28:15 उस समय ना छोड़े  28:22 तो समस्त सद्गुणों का समस्त बल शक्ति ऊर्जा के संचार का जो मूल है वो ये भगवत कथा है और  28:31 इसकी महिमा तो कल विराम के क्षणों में हमने यहीं से चर्चा की कि अभी कथा आरंभ नहीं हुई अभी  28:36 सनकादिक केवल कथा की महिमा बता रहे हैं इस कथा की महिमा क्या है और वहीं पर भक्ति महारानी ज्ञान  28:42 और वैराग्य के सहित प्रसन्न मुद्रा में प्रकट होती है और जहां भक्ति है जहां भक्त है वहीं भगवान है  28:49 सदा हरि वसे तत्र यत्र भागवता जना गायती भक्ति भावेन हरे नामव केवलम  29:03 तो जब श्री संगादिक ने कथा आरंभ की तो पहले कथा का प्रभाव प्रताप क्या है यह बताया एक छोटा  29:13 सा इतिहास सुनाकर एक छोटी सी कथा सुनाकर  29:21 कि तुंगभद्रा नदी के तट पर एक ब्राह्मण रहते हैं उनका नाम है आत्मदेव बहुत ध्यान से सुनना बड़ी गंभीर  29:28 वार्ता है और एक बड़ा बड़ा विलक्षण सिद्धांत इस कथा के गर्भ में है और मैं आपको नित्य स्मरण कराता  29:39 चलूंगा कि यहां उद्देश्य क्या है कहे कथा और अर्थचारे कथा का अर्थ ही भक्ति का श्रृंगार है  29:51 जो कथा का वास्तविक अर्थ है वही भक्ति महारानी का श्रृंगार है  29:58 तो आत्मदेव नाम के ब्राह्मण है तपस्वी ब्राह्मण है समृद्ध भी है तपस्वी भी हैं और कथा कहती है कि  30:07 बिल्कुल ब्राह्मणोचित जीवन का वो निर्वाह करते हैं द गुण कहे हैं ब्राह्मण के श्रीमद् भागवत ने ही शमो दम  30:15 तप शचम संतोष शांति राजवंम ज्ञानम दयातात्मत्वम सत्यम च ब्रह्म लक्षणम दिव्य गुणों से विभूषित उनका जीवन है विवाह हुआ  30:31 पत्नी सुंदरी है नाम क्या है धुंधुली अब यहां से यहां से यह जो कथा है जो गाथा है यहां  30:44 से इसका प्रवाह किसी और दिशा में मुड़ जाता आत्मदेव ब्राह्मण तो बड़े तपस्वी हैं सूर्य के समान तेजस्वी जैसे  30:52 जीवात्मा है चेतन अमल सहज सुख राशि आप देखो नाम में ही रहस्य छिपा है आत्मदेव और पत्नी का नाम  31:00 क्या है धुंधुली धुंधुला शब्द है ना सुना है आपने धुंधुला धुंधली अंग्रेजी में कहे तो फगी अस्पष्ट  31:14 थोड़ा और विचार करें तो संशयात्मिका दो प्रकार की बुद्धि होती है एक संशयात्मिका बुद्धि होती है एक निश्चयात्मिका बुद्धि  31:23 होती है संसार का जो व्यक्ति है ना वो कितना भी बुद्धिमान क्यों ना हो माने उसको कितना भी एक  31:30 से 10 से हजार लाख करोड़ बनाना आता हो लेकिन उसकी बुद्धि संशयात्मिका बुद्धि है और जो साधक है उसकी  31:37 बुद्धि निश्चयात्मिका बुद्धि है ये बात मैं क्यों कह रहा हूं कैसे कह रहा हूं क्योंकि साधक ने सत और  31:44 असत का विवेक पूर्ण विचार कर लिया है और अब सत वस्तु को प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहा  31:49 है उसने दृढ़ निश्चय कर लिया है दृढ़ निश्चय कर लिया ना श्री मीरा जी ने ओ बाला मैं तो  31:58 बैरागण हूंगी अब मुझे कोई रोक नहीं सकता है जिन भ्या मारा साहिब री जिन भ्या मारा साहिब री सोई  32:20 भ धरूंगी मैं तो बैरागनूंगी  32:29 बाला मैं तो वैरागन मुंगी निश्चय कि राजा जी रूठे वो देश रखासी हरि रूठा जास री माई ये निश्चयात्मिका  32:43 बुद्धि का स्वर है राम नाम रो जहाज चिलास्या और भवसागर तिर जास्या रे माई कितना दृढ़ निश्चय है इस  32:52 पंक्ति में  32:56 जो आरंभ में मैंने आपसे कहा ना निश्चय उत्साह और धैर्य तीन बात जीवन में बनी रहे बाहर उत्साह भीतर  33:04 धैर्य और इन दोनों के मूल में निश्चय है क्या निश्चय है कि भाई मिलना है प्रभु से प्रभु को  33:10 प्राप्त करना है कह राम नाम रो जहाज चिलास्या और भवसागर तिर जास्यारी माई मैं दृढ़ निश्चय यहां यू देख  33:18 रहा हूं कि वो कह रही है कि मैं ही जहाज चलाऊंगी नानक नाम जहाज है चढ़े सो उतरे पार  33:27 गुरु ने जो नाम सुनाया है उस नाम के जहाज में बैठूंगी किसी ने कहा भवसागर की बड़ी उत्तल तरंगे  33:33 हैं श्रीमद् भागवत स्वयं कहती है संसार सिंधु अति दुस्तम बड़ा दुस्तर सिंधु है कैसे जाओगी कह रही इस बात  33:41 का मुझे भय नहीं है राम नाम रो जहाज चिलास्या और एक प्रकार से मानो परिणाम भी लिख कर दे  33:47 रही है कि भवसागर तिर जाई फिक्र नहीं मोहे तरन की इसी से कहते निश्चय निश्चत्मिका बुद्धि तो धुंधली अर्थात  33:59 अस्पष्ट माने धुंध संशयात्मिका बुद्धि का नाम धुंधुली है बुद्धि स्वार्थ में लगाओगे तो वो सदा संशयात्मिका ही रहेगी बाहर  34:14 से व्यक्ति कितना भी स्वस्थ प्रसन्न क्यों ना दिखता हो लेकिन उसके मन में संशय का रोग तो है ही  34:20 ना जैसे ही कबीर गुरु के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करते हैं गुरु की कृपा से क्या हुआ वो  34:26 जो संशयात्मिका बुद्धि थी वो समाप्त हो गई बुद्धि निश्चयात्मिका हो गई और मैं आपको अपनी ओर से एक बात  34:32 यहां निवेदन करूं आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि दृढ़ निश्चय कितना बड़ा बल भी है और दृढ़ निश्चय  34:37 में कितना बड़ा सुख भी है बड़ा अद्भुत सुख है इस दृढ़ निश्चय की अवस्था में जब निश्चय हो गया  34:45 कि भाई अब यही हमारा मार्ग है अब करेंगे मरेंगे जो भी होगा पर लेकिन अब यहीं होगा यही हमारा  34:53 मार्ग है और जहां कुछ देर पहले मैं आपको कह रहा था ना भाई एक ना एक बार तो कसौटी  34:57 पर खरा उतरना पड़ेगा केवल कसौटी पर उतरना पड़ेगा नहीं कसौटी पर खरा उतरना पड़ेगा  35:08 खाली कसौटी पर चढ़ जाने से काम नहीं चलेगा उससे खरा भी उतरना पड़ेगा कोई भी वस्तु प्रभु की सेवा  35:16 में लाने से पूर्व देख ली जाती है ना परख ली जाती है गलासड़ा फल कौन लेकर जाएगा उत्तम वस्तु  35:21 ही प्रभु के चरणों तक लाता है ना प्रभु का पुजारी प्रभु का सेवक  35:28 तो इस बुद्धि को आप स्वार्थ में लगाओगे तो ये सदा ही संशय पूर्ण बनी रहेगी आपने जैसे ही परमार्थ  35:35 में बुद्धि को निवेदन किया जैसे ही आपने इस बुद्धि से परमार्थ का विचार किया परमार्थ को बुद्धि निवेदन करना  35:42 अर्थात परमार्थ का विचार करना इसलिए कई बार मैं आपसे कहता हूं भाई थोड़ा एकांत में बैठ बैठकर कभी अपने  35:51 मन से बात भी करो सब संत अपने मन से ही बात कर रहे हैं रे मन रसिकन संग बिन  35:59 रंचना उपजे प्रेम रे मन श्री हरिवंश भज जो चाहत विश्राम रे मन अपने मन से कह रहे हैं  36:11 तो परमार्थ का विचार करिए यह बुद्धि परमार्थ में लगे और जब ये बुद्धि परमार्थ में लगेगी तभी दृढ़ होगी  36:17 तभी ये निश्चयात्मिका होगी तभी उस उस सुख का उस उस आनंद का किंचित अनुभव होगा पानी में लहरें उठती  36:27 हो तो कोई प्रतिबिंब नहीं देख सकता है ना उसमें ऐसे ही जब तक भीतर बाहर अस्थिरता हो तो सुख  36:33 की अनुभूति कैसी होगी सुख तो माने उस स्थिर अवस्था का नाम है ना चेतना स्थिर हो जाए जब  36:42 तो आत्मदेव की वो पत्नी जो है ना है तो देखने में तो सुंदर है पर नाम धुंधली है माने  36:48 है संशयात्मिका अस्थिर है और उसका उसका कुछ लक्षण यहां पर कहा गया है जिस पर विचार करना चाहिए वीडियो का लिंक

Gist in Hindi with timestamps & English

जागृति से आत्मबल तक: सत्संग की शक्ति - From Awakening to Inner Strength: The Power of Satsang

मन पर नियंत्रण और भक्ति से आत्मबल का जागरण - Controlling the Mind and Awakening Inner Strength Through Devotion

  1. अम्बरीष जी उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि सोए हुए हाथी की तुलना में जागती हुई चींटी में अधिक शक्ति होती है। इसी प्रकार, जो मनुष्य मोह की निद्रा में सोया है, वह भले ही सम्राट क्यों न हो, मृतप्राय (मरे हुए के समान) ही है। सत्संग और भगवत कथा ही जीव को इस मोह-निद्रा से जगाकर सच्चा आत्मबल प्रदान करती हैं। [00:00:00 – 00:02:52]

  2. मोह से मुक्ति केवल संत और सत्संग के माध्यम से संभव है। जब मनुष्य का जीव जाग जाता है, तब उसमें वास्तविक आत्मबल आता है। इसका प्रमाण द्रौपदी के चरित्र से मिलता है, जिन्होंने दुःशासन और कौरवों द्वारा किए गए अत्यंत अपमान और पीड़ा के बाद भी, गुरुपुत्र अश्वत्थामा को क्षमा कर दिया। सच्चा बल प्रतिकार या बदला लेने में नहीं, बल्कि क्षमा करने में है। [00:02:53 – 00:06:15]

  3. संसार की झूठी वस्तुओं (विषय-भोगों) को देकर भगवान के नाम रूपी सच्चे धन को कमाना ही विद्वत्ता है। स्वामी हरिदास जी के विचारों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि बिना बिहारी जी (ईश्वर) के इस संसार में कोई सार नहीं है। मृत्यु निकट और निश्चित है, इसलिए बिना विलंब किए ईश्वर के नाम और भक्ति का आश्रय लेना चाहिए। [00:06:16 – 00:09:00]

  4. भक्तों ने जीवन में अनेक अपमान और कष्ट सहे हैं, लेकिन उनका आत्मबल ईश्वर-गुणगान से बना रहा। जिस प्रकार सोने को शुद्ध करने के लिए अग्नि में तपना पड़ता है, उसी प्रकार भक्ति के मार्ग पर जीव के भाव की परीक्षा होती है। सत्संग का आधार व्यक्ति को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कुमार्ग पर जाने से रोकता है। [00:09:01 – 00:14:05]

  5. जीव केवल सत्संग के अभाव के कारण बिगड़ता है। मन का स्वभाव संकल्प-विकल्प करना है; यदि इसे सत्संग में नहीं लगाया जाएगा, तो यह स्वयं ही कुसंग की ओर चला जाएगा। मन ही बंधन और मोक्ष दोनों का कारण है। संसार गलत प्रचार कहता है "सुनो सबकी, करो मन की," परंतु केवल मन के अनुसार चलने से कभी कल्याण नहीं होता। [00:14:06 – 00:18:00]

  6. मन को मारने के बजाय उसे नियंत्रित (नाथना) करना आवश्यक है, जैसे श्री कृष्ण ने कालिया नाग को मारा नहीं बल्कि नियंत्रित किया था। जहाँ अपनी बुद्धि काम न करे, वहाँ स्वयं के मन की न सुनकर शास्त्रों और गुरुजनों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। [00:18:01 – 00:22:00]

  7. गुरु के मुख से निकले शब्द सीधे परमात्मा से आते हैं, इसलिए वे जीव की चेतना को ईश्वर की ओर ले जाते हैं। जब जीव स्वयं को कर्ता मानना छोड़कर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाता है (जैसे द्रौपदी ने किया था), तब ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा का दायित्व लेते हैं। [00:22:01 – 00:28:21]

  8. श्रीमद्भागवत कथा की महिमा बताते हुए तुंगभद्रा नदी के तट पर रहने वाले आत्मदेव नामक ब्राह्मण का प्रसंग आरंभ होता है। 'आत्मदेव' शुद्ध जीवात्मा का प्रतीक हैं, जबकि उनकी पत्नी 'धुंधुली' संशयात्मक और अस्थिर बुद्धि की प्रतीक हैं। कथा यह संदेश देती है कि जब तक बुद्धि स्वार्थ में लगी रहेगी तब तक संशय रहेगा, परंतु परमार्थ और गुरु-शरण में जाते ही बुद्धि निश्चयात्मक हो जाती है। [00:28:22 – 00:36:51]

  9. The discourse highlights that true inner strength comes from spiritual awakening through satsang, comparing a conscious ant to a sleeping elephant.

  10. Using the example of Draupadi forgiving Ashwatthama, it illustrates that real strength lies in forgiveness and endurance rather than retaliation.

  11. It emphasizes that material existence is fleeting and true wisdom is prioritizing devotion to God before death inevitably arrives.

  12. The speaker explains the nature of the mind, warning that following unchecked desires leads to downfall, whereas disciplining the mind under a Guru's guidance brings liberation.

  13. Through the story of Atmadev and Dhundhuli, the sermon concludes that a doubtful mind breeds instability, while surrendering to divine wisdom restores spiritual balance.

3 Key Takeaways:

Single-Minded Spiritual Awakening: True inner strength arises when the soul awakens through Satsang, Bhagavat Katha and devotion.

Strength Through Forgiveness: Real spiritual strength is demonstrated not through retaliation, but through patience, endurance and forgiveness.

Mind, Satsang and Guru's Guidance: The uncontrolled mind leads toward bondage and bad association, while Satsang, scripture and the Guru's guidance lead the seeker toward liberation.