Saturday, August 1, 2026

अंत में श्री गरुड़ जी ने पूछे ये 7 प्रश्न || 38 || Shree Hita Ambrish Ji

अंत में श्री गरुड़ जी ने पूछे ये 7 प्रश्न || 38 || Shree Hita Ambrish Ji 


https://youtu.be/pUjfYi9IMFo
First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given 1. सात प्रश्नों में छिपा राम कथा का गूढ़ संदेश | The Deeper Message Behind the Seven Questions of Ram Katha 2. राम कथा की महिमा और सात प्रश्न, The Glory of Ram Katha and the Seven Questions  3. दुर्लभ मानव जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान, The Rarest Gift: Human Life and Spiritual Wisdom  GIST:  [00:38] गरुड़ जी, राम कथा सुनने के बाद भी अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए सात प्रश्न पूछते हैं। Garuda Ji, even after listening to the Ram Katha, asks seven questions to satisfy his curiosity. [03:00] कथा सुनने की अतृप्ति (और सुनने की इच्छा) और जन-कल्याण के लिए 'प्रसाद' को बाँटने का भाव। The reason is the insatiable desire to hear the Katha and the feeling of sharing its 'Prasad' for the welfare of all. [10:21] राम कथा को 'मंगल करण' और 'कलि मल हरण' बताया गया है जो मन के विकारों को धो देती है। Ram Katha is described as 'Mangal Karan' and 'Kali Mal Haran', which washes away the impurities of the mind. [13:50] आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपनी प्रशंसा सुनने से बचने और उसे भगवान को अर्पित करने की सीख। For spiritual progress, one should avoid listening to one's own praise and offer it to God. [25:40] गरुड़ जी के सात प्रश्न: दुर्लभ शरीर, सबसे बड़ा दुख/सुख, संत/असंत लक्षण, पाप/पुण्य और मानस रोग। Garuda Ji's seven questions concern the rare human body, the greatest sorrow and happiness, the characteristics of saints and non-saints, sin and virtue, and the diseases of the mind. [27:51] पहले प्रश्न का उत्तर: मनुष्य शरीर सबसे दुर्लभ है, जिसे देवता भी पाने के लिए लालायित रहते हैं। The answer to the first question: The human body is the rarest, and even the demigods long to attain it. [35:42] भारत भूमि पर जन्म और जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों की विशेषता का वर्णन। The discourse describes the significance of being born in the land of Bharat and the importance of the various samskaras performed from birth to death. 7 questions & answers: श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में पक्षीराज गरुड़ जी द्वारा श्री काकभुशुण्डि जी से पूछे गए सात प्रश्न और उनके संक्षिप्त उत्तर: 1. सबसे दुर्लभ शरीर कौन सा है? उत्तर: मनुष्य शरीर (नर तन)। यह चर-अचर सभी जीवों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, क्योंकि यह मोक्ष, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति प्राप्त करने का साधन है। 2. सबसे बड़ा दुःख कौन सा है? उत्तर: दरिद्रता (नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं)। 3. सबसे बड़ा सुख कौन सा है? उत्तर: संतों का मिलना व सत्संग (संत मिलन सम सुख जग नाहीं)। 4. संत और असंत का सहज स्वभाव क्या है? उत्तर: संत: मन, वचन और कर्म से परोपकार करना और दूसरों के कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहना (भोजपत्र के वृक्ष के समान)। असंत (दुष्ट): बिना किसी स्वार्थ के अकारण ही दूसरों को दुःख पहुँचाना और दूसरों की संपत्ति नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाना (ओलों के समान)। 5. वेदों में वर्णित सबसे बड़ा पुण्य कौन सा है? उत्तर: अहिंसा एवं परोपकार (परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा)। 6. सबसे बड़ा एवं भयंकर पाप कौन सा है? उत्तर: परनिंदा—दूसरों की बुराई या आलोचना करना (पर निंदा सम अघ न गरीसा)। 7. मानस रोग (मानसिक व्याधियाँ) क्या हैं और उनका उपचार क्या है? उत्तर: सभी मानसिक रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। काम वात है, लोभ कफ है और क्रोध पित्त है। अहंकार, ईर्ष्या, तृष्णा आदि असाध्य रोग हैं। उपचार: सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर विश्वास, विषयों से वैराग्य (परहेज) और श्री राम जी की भक्ति रूपी संजीवनी बूटी ही इसका एकमात्र उपचार है। https://youtu.be/pUjfYi9IMFo ---
Full Transcript
00:00:02 नाथ 00:00:08 मोहि निज सेवक 00:00:17 जानी 00:00:21 सप्त 00:00:24 प्रश्न मम कहा ह. 00:00:38 बखानी नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रश्न मम कह 00:00:46 बखानी मंगल करण कलि मल 00:00:53 हर श्री रघुनाथ 00:00:58 गाथा. 00:01:00 श्री काग भूसुंडी जी के मुख से श्रवण करने के पश्चात गरुड़ जी यह बात कहते यह बात बड़ी विचित्र 00:01:11 है प्राय करके भोजन के बाद ही तो मिष्ठान पाया जाता है ना महा 00:01:25 मधुर परम विमल श्री राम कथा श्रवण करने के. 00:01:29 बा भी क्या कोई प्रश्न रह सकता है क्या कोई संशय रह सकता है क्या अभी कुछ और ऐसा है 00:01:36 जो गरुड़ जी को जानना है क्योंकि पूर्व में ही श्री काग सुंडी जी तीन बार यह बात कह चुके 00:01:43 कि जो मैं जानता हूं जो भगवत कृपा से मैंने अनुभव किया है सो सब मैंने आपको निवेदन कर 00:01:55 दिया भक्ति दयनी श्री हरि कथा है. 00:02:01 और जब श्री काग बसु जी जैसा वक्ता हो जिसकी स्तुति महादेव करते हैं और गरुड़ जी जैसा श्रोता हो 00:02:10 तो निश्चित रूप से निश्चित रूप से ऐसी कथा ऐसा सत्संग कहने वाले और सुनने वाले दोनों के हृदय में 00:02:20 विशुद्ध भक्ति भाव की प्रतिष्ठा कर देता है स्थापना कर देता 00:02:28 है. 00:02:30 कथा का अर्थ ही यही है कम 00:02:35 सुखम स्थापति इति कथा जो सुख की परम सुख की स्थापना कर दे हृदय में फिर भी गरुड़ जी प्रश्न 00:02:46 पूछते हैं तो महापुरुषों ने विचार किया है कि इतनी मीठी इतनी मधुर राम कथा सुनने के बाद फिर गरुड़ 00:02:56 जी ने प्रश्न किए हैं ऐसा क्यों. 00:03:00 दो कारण है एक तो सुनते सुनते गरुड़ जी को तृप्ति नहीं हो रही है व और सुनना चाहते हैं 00:03:10 और सुनना चाहते हैं और गरुड़ जी के प्रश्न बता रहे हैं कि गरुड़ जी को व जो रस विशेष 00:03:20 है उसकी प्राप्ति हो गई है जिसका संकेत श्री गोस्वामी जी करते हैं वैसे देखो कथा का परम फल तो 00:03:28 यही है सेवा का. 00:03:29 फल क्या है मैं आपसे पूछूं सेवा का फल क्या है सेवा ही है भजन का फल क्या है भजन 00:03:38 ही है भजन का फल भजन है सेवा का फल सेवा है ऐसी कथा श्रवण का फल क्या है कथा 00:03:45 श्रवण का फल कथा श्रवण का प्रसाद यही है कि श्रवण में अनुराग हो जाए नारद जी ने अपने भक्ति 00:03:51 सूत्र में इसे भी एक प्रकार की भक्ति कहा है जब भगवान की कथा श्रवण में अनुराग हो जाए प्रीति 00:03:58 हो जाए. 00:04:01 तो गरुड़ जी को कथा श्रवण में प्रीति हो गई 00:04:07 है और महादेव महादेव तो इसका प्रसाद यही बताते हैं बिन सत्संग न हरी कथा तेही बिन मोह न 00:04:24 भा मोह गए बिनु रा. 00:04:31 होही न दृढ़ 00:04:38 अनुरा यह यात्रा जो यहां से आरंभ होती है व प्रभु के श्री चरणारविंद का दृढ़ अनुराग प्रदान करके ही 00:04:45 विश्राम लेती है तो गरुड़ जी के मन में कथा के प्रति जो अनुराग है श्रवण के प्रति जो अनुराग 00:04:51 बहुत बड़ी बात है य देखो कहते सुनते तो आप मैं हम सब है ही परव जो रस विशेष. 00:05:01 कि कभी और अंतर को तृप्ति हुई नहीं आप देखो कथा के आदि वक्ता भगवान शंकर हैं और मैंने पूर्व 00:05:10 भी आपको शायद एक बार संकेत किया था कि या तो वह भजन में रहते हैं या तो ध्यान में 00:05:16 रहते हैं अन्यथा केवल एक ही कार्य करते हैं हरि की कथा सुनते हैं सुनाने वाला मिल जाए तो सुनते 00:05:25 हैं सुनने वाला मिल जाए तो सुनाते हैं. 00:05:32 रस रस विशेष जिसको प्राप्त हो जाए वही कृत कृत्य है तो एक तो गरुर जी को तृप्ति नहीं हो 00:05:38 रही व कह भाई ऐसा वक्ता मिला है और सुन ले और सुन ले और सुन ले और दूसरी बात 00:05:45 कि प्रसाद सदा बांट कर पाना चाहिए देखो यह जितना भी संतों के मुख से प्रकट हुआ है यह भगवान 00:05:54 का जस रस जो भी है जो आज तक हम जैसे जीवों का उद्धार कर रहा है कल्याण कर. 00:05:59 कल्याण का हेतु कारण बन रहा है उसके मूल में क्या है उसके मूल में संतों की कृपा ही है 00:06:06 उसके मूल में संतों का अनुग्रह है गरुड़ जी ने मन में विचार किया भाई ऐसा ऐसा संयोग बना है 00:06:13 और बार-बार तो बनत नहीं यह संजोग अनूप यह तो आप और मैं जाने कब समझेंगे पर जिन महापुरुषों ने 00:06:20 समझा वह तो कह रहे हैं धन दरा सुत लक्ष्मी तो पापी के भी हुए पर संत समागम हरि कथा 00:06:27 तुलसी दुर्लभ दोए. 00:06:29 फिर जाने कब मिलेगा बड़ी बात गोस्वामी जी कह रहे तात स्वर्ग अपवर्ग सुख और धरि तुला एक अंग तुलना 00:06:40 ताही सकल मिली जो सुख लव सतसंग जो की त्य बात भगवान वेदव्यास श्रीमद् भागवत में कहते हैं तुलम लवे 00:06:48 नापना स्वर्गम ना पुनर भव भगवत संगी संगस मृत नाम 00:06:58 किमता. 00:06:59 तो गरुड़ जी ने मन में विचार किया भाई ऐसा ऐसा वक्ता हमको प्राप्त हुआ है राम कथा के अद्भुत 00:07:06 अद्वितीय गायक हैं जिस दिन इस प्रसंग का आरंभ हुआ था मैंने आपको यही निवेदन किया था कि ऐसे तो 00:07:14 ऐसे तो सारी मानस ही महा मधुर है मैंने पहले भी आपको कहा कि व्यवहार जगत की छोटी से छोटी 00:07:23 बात से लेकर अध्यात्म जगत के श्रेष्ठतम सिद्धांत का समावेश श्री गोस्वामी जी ने मानस में कर दिया है. 00:07:30 ये तो भव सिंधु पार करने के लिए नौका है नौका है मंगल करण कलि मल हरण तुलसी कथा रघुनाथ 00:07:50 की एक और बड़ी सुंदर बात है मानस के विषय में मैं कहना चाहूंगा गोस्वामी जी कह तीन प्रकार के 00:07:58 जीव है. 00:07:59 संसार में विषय साधक सिद्ध सयाने त्रिविध जीव जग वेद पखा अच्छा तुलसी बाबा की मानस ऐसी है यह राम 00:08:10 कथा ऐसी है जो सबको प्रिय लगती है थोड़ी देर के लिए तो विषय को भी इसमें आनंद आता है 00:08:18 साधक तो रस प्राप्त करता ही है और सिद्ध है वह तो भाई उसके लिए तो ये ये शब्द नहीं 00:08:24 है उसके लिए तो यह अमृत है वैसे जहां जहां श्रीमद् भागवत में. 00:08:29 कथा की बात कही गई है ना वहां कथा सुनने की बात नहीं कही गई है पिवती भगवत आत्मन सता 00:08:36 कथामृत श्रवण पुटेन क श्रवण पुटो से इसका पान करिए और पान भी कैसे करिए कैसे कैसे पिए श्रवण पुटो 00:08:48 से इसको कैसे पिए करें बहुत सावधान होकर तस्म महन मुखरता मधु चरित्र पियूष शेष सरित परित श्रवंती और ताय 00:08:58 पिव. 00:09:00 नप गाढ करण स्तान भय शोक मोहा जो सावधान होकर कथा श्रवण करे सावधान माने कर एक शब्द भी एक 00:09:12 शब्द भी छूट नहीं जाए ऐसे दत चित होकर जो श्रवण पुटो से इस कथा अमृत का पान करता है 00:09:18 क व सुनते सुनते भूख प्यास भय शोक मोह नस भय शोक मोहा सुनते सुनते इन पंच क्लेश से. 00:09:29 हो जाता कथा अमृत है कथा अमृत है कभी पहले मैंने आपको निवेदन किया था प्रत्येक शब्द में एक ऊर्जा 00:09:39 होती है या तो सकारात्मक ऊर्जा होती है नकारात्मक ऊर्जा होती है शब्द जैसे स्पर्श करता है आपकी चेतना का 00:09:47 उस क्रिया की प्रतिक्रिया होती है शब्द में स्पंदन है व जैसे कान से भीतर जाएगा भीतर कुछ हलचल करेगा 00:09:54 एक शोभ उत्पन्न करता है शब्द जब भीतर जाता है क्योंकि शब्द में शक्ति है सकरा. 00:09:59 भी है नकारात्मक भी है लेकिन य जो कथा है इसमें ना सकारात्मक कोई ऊर्जा है ना नकारात्मक इसमें भगवती 00:10:06 ऊर्जा है इसमें भगवती शक्ति है इसीलिए इसलिए बड़े विश्वास से तुलसी बाबा कह रहे हैं मंगल करण कलि मल 00:10:21 हर तुलसी कथा रघुनाथ की. 00:10:30 मंगल करण कलि मल संसार की संसार की कोई वार्ता मैं कह रहा हूं संसार के शब्द कोश में से 00:10:41 कोई एक शब्द आप ऐसा ले आइए जो मन की हलचल को शांत कर सके देखो प्रशंसा सुनोगे तो भी 00:10:50 मन में क्षोभ होगा निंदा सुनोगे तो भी मन में क्षोभ होगा अच्छा सुन लो तो भी मन में हलचल 00:10:56 है बुरा सुन लो तो भी मन में हलचल है संसार की वार्ता. 00:10:59 तो मन में हलचल पैदा करने वाली है 00:11:04 ना नारद जी को मोह हुआ शब्द स्पर्श रूप रस गंध उसमें नारद जी ना तो स्पर्श से ना रूप 00:11:19 से ना रस से ना गंध से इनमें से किसी से भी नारद जी चलायमान नहीं हुए नारद जी कैसे 00:11:24 चलायमान हो गए नारद जी का मन कहां डोला शब्द से प्रशंसा सुन ली अपनी. 00:11:29 वो जो प्रशंसा के शब्द कान में गए ना उसने मन में शोभ पैदा कर दिया कितनी सुंदर अप्सराएं कामदेव 00:11:38 लेकर आया है अपने साथ में नार जी ने देखा भी नहीं उनकी तरफ दृष्टि उठाकर भी नहीं देखा व 00:11:45 जिस मादक वातावरण की रचना कामदेव ने की नारद जी उससे भी उससे भी हिले नहीं ना दृष्टि से देखा 00:11:55 ना ना उस उस गंध ने कोई विकार पैदा किया स्पर्श. 00:11:59 की भी इच्छा नारद जी के मन में नहीं हुई वो रूप देखकर स्पर्श की भी इच्छा नारद जी के 00:12:05 मन में नहीं हुई कहां कहां मन हिल गया वो जो प्रशंसा के शब्द कान में पड़े ना जाते जाते 00:12:12 कामदेव प्रशंसा करता गया कि आप जैसा कोई महापुरुष नहीं है आपसे मैं परास्त होकर जा रहा हूं मुझे आज 00:12:20 तक भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं हरा पाया आपने हरा दिया पर जाते जाते कामदेव यह बाण छोड़ता गया वो 00:12:26 पंच बाण तो नारद जी को नहीं लगे. 00:12:29 वो तो नारद जी का कुछ नहीं बिगाड़ सके लेकिन वो शब्द से जो प्रशंसा के शब्द भीतर गए कान 00:12:35 से व जो प्रशंसा के शब्द भीतर गए उसने मन में शोभ पैदा कर दिया और कहां जाकर पहुंचे नारद 00:12:42 जी मोह हो गया गोस्वामी जी ने यह नहीं कहा है कि नारद जी को काम विकार ने सताया या 00:12:50 लोभ हुआ नारद जी गोस्वामी जी कह रहे नारद जी को मोह हो गया तो शब्द एक शोभ पैदा करता 00:12:58 है अंदर. 00:12:59 केवल हरि की कथा ही है जो मन को शांत करती है संसार की वार्ता मन में विकार पैदा करती 00:13:04 है व भली बुरी कोई भी हो आपकी कोई बहुत प्रशंसा करे तब तो और सावधान रहना निंदा जो कर 00:13:12 रहा है वह तो आपका हिताशी है जो आपकी आलोचना कर रहा है जो आपकी निंदा कर रहा है जो 00:13:19 आपको कटुर शब्द कह रहा है व तो आपका हिताशी है जो प्रशंसा कर रहा है ना उससे सावधान रहना 00:13:25 कभी शायद मैंने आपको कहा भी था. 00:13:29 मुझे ऋषिकेश में एक महात्मा ने कहा था बोले बेटा जीवन में यि आध्यात्मिक उन्नति करनी है मुझे संत के 00:13:37 शब्द भली प्रकार से स्मरण है आज तक गूंजते हैं मेरे मेरे उर अंतर में बड़ी गहरी दृष्टि से मुझे 00:13:44 देखते हुए उन्होंने कहा था बोले बेटा जीवन में अगर आध्यात्मिक उन्नति चाहते हो तो अपनी प्रशंसा करने वाले लोगों 00:13:50 से दूर 00:13:54 रहना प्रशंसा स्वीकार ना करना. 00:13:58 प्रशंसा जैसे ही हो व सीधे-सीधे भगवान को निवेदन कर देना इस संसार में कोई ऐसा नहीं है जो प्रशंसा 00:14:05 पचा सके केवल प्रभु पचा सकते हैं यह सामर्थ्य केवल इन्हीं में ही 00:14:12 है मैं कई बार आपको उदाहरण देता हूं ना कितना महत कार्य करके श्री हनुमान जी आ गए भगवान तो 00:14:19 मन में यह विचार कर रहे कि अब मैं इनको क्या दूं और जब श्री रघुनाथ जी ने थोड़ी प्रशंसा 00:14:25 की तो हनुमान जी क्या कहकर उठते त्राहि त्रा. 00:14:29 भगवंत यही शब्द श्री हनुमान जी कह रहे हैं क प्रभु रक्षा करिए मेरी रक्षा करिए 00:14:41 नाथ ना कछु मोर 00:14:51 प्रभुताई सो सब तब. 00:15:05 रघुराई ऐसे कभी जब हो ना प्रशंसा आपकी ऐसे बस प्रशंसा भगवान को निवेदन करते चलना आप स्वस्थ रहोगे प्रशंसा 00:15:15 स्वीकार नहीं 00:15:19 करना तो मैं शब्द की बात कह रहा था आपसे इन शब्दों में भगवती ऊर्जा है ज्ञान और वैराग्य का 00:15:27 संस्कार. 00:15:28 पुष्ट करती है कथा जो भगवान की कथा है यह जो वार्ता है य ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को 00:15:37 पुष्ट करेगी और जो मलिन संस्कार हमारे भीतर जन्म जन्मांतर से हमने एकत्रित कर लिए हैं उनका क्षय करती है 00:15:46 इसीलिए गोस्वामी जी कह रहे हैं मंगल करनी क्या मंगल करती है जीव का मंगल कैसे होता है ज्ञान और 00:15:55 वैराग्य सेही तो जीव का मंगल होता है. 00:16:01 संसार के स्वरूप का ज्ञान हो जाए और उससे वैराग्य हो जाए इसी से ही तो जीव का मंगल है 00:16:08 इससे दृष्टि हटे तभी तो आत्म कल्याण की बात मन चित्त में आए संसार से दृष्टि तो हटे कभी आपसे 00:16:17 मैंने कहा था ना भाई भगवान से हमको आशा तो है पर अभी संसार से निराशा नहीं हुई अभी आशा 00:16:23 का बंधन यहां बंधा है अभी डोर यही पर बंधी है तो. 00:16:28 मंगल करती है ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को पुष्ट करती है मंगल करनी कलि मल और जो मैले कुचले 00:16:40 संस्कार हमारे भीतर है जो जन्म जन्मांतर से हमने अर्जित किए हैं उनको धो देती है यथा यथा आत्मा परि 00:16:49 मृते स मत पुण्य गाथा शव विधान तथा तथा पत. 00:16:58 तव सूक्ष्म चरवा जन सम प्रयुक्त भगवान का श्रीमुख वाक्य सुनते रहोगे सुनते रहोगे क्या होगा देखते देखते व मैले 00:17:13 कुचले संस्कार जो मन में है ना जो बारबार धकेल हैं अशुभ की ओर अपवित्र की ओर बड़ी विनम्रता पूर्वक 00:17:24 मैं आपसे कहूंगा सावधान रहना मन का एक अपवित्र स. 00:17:28 कल्प पतन के बड़े गहरे अंधकार में आपको धकेल सकता है एक अपवित्र संकल्प इसलिए वेदों की रचा है भगवती 00:17:37 श्रुति कह रही है तन में मन शिव संकल्प मस्तु प्रभु की कृपा हो हमारा संकल्प पवित्र हो हमारा संकल्प 00:17:47 शुभ 00:17:51 हो इसीलिए कहा जाता है आपसे शुभ कर्म करिए सत्कर्म करिए अवसर मिले करते. 00:17:58 चलिए सबकी सेवा करिए क्योंकि भाई ना जान छिन अंत कवन बुद्धि घट प्रकाशित आपको पता नहीं है हमको खबर 00:18:08 ही नहीं भाई हमारे भीतर अभी कौन-कौन सा बवाल भरा है कितने जन्म जन्म के संस्कार अर्जित है कभी कहा 00:18:16 था मैंने आपसे कौन कहता है कुछ साथ नहीं आया कुछ साथ नहीं जाएगा नहीं भाई मन साथ आया और 00:18:22 यह साथ ही जाएगा इसका ध्यान रखना है इसकी संभाल करनी है. 00:18:28 मन साथ आया है संस्कार साथ में आए हैं और ये साथ में ही जाएंगे तभी संत कह रहे हैं 00:18:35 मन ही मिलावे राम से जब तक प्रभु नहीं मिलेंगे तब तक इसकी दौड़ समाप्त नहीं होगी मन ही मिलावे 00:18:43 राम से तो मन साथ आया है संस्कार साथ में आए हैं कितने जन्मों के संस्कार भरे हैं भीतर वही 00:18:51 तो भजन नहीं करने देते हैं कभी आपने सोचा है कितने मन से आप माला लेकर बैठते हो कितना प्रयास 00:18:58 करते हो आप भजन में मन लग जाए लग जाए नहीं लगता है आप देखो आप रोज बैठ रहे हो 00:19:04 प्रयास कर रहे हो पर मन नहीं लग रहा है क्यों नहीं लग रहा है भाई पूर्व का संस्कार शोभ 00:19:09 पैदा करता है पूर्व के संस्कार के कारण ही विस्मृति गाड़ी होती चली जाती है आप और मैं तो बड़भागी 00:19:19 है नित्य प्रभु अपने चरणों में लाकर बैठा हैं हम संतों की वाणी का आश्रय लेकर कुछ कह सुन लेते 00:19:25 हैं आप देखो. 00:19:28 आप देखो संसार में लाखों करोड़ों मनुष्य जिनको सुधि नहीं है इस बात की जो शरीर के भोग से इतर 00:19:35 और कुछ भी संभव हैय जानते ही नहीं है उन्हीं को देखकर तो कबीर कहते हैं खाना पीना सोना और 00:19:46 ना कोई चीत सदगुरु शबद विसार आदि अंत का. 00:20:04 नारायण स्वामी जो फटकार लगाते हुए कहते हैं क चटक मटक नित छैल बन तकत फिरत च 00:20:15 और माया मरी न मन मरा और मर मर गए शरीर और आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर 00:20:26 शरीर वृद्ध हो जाता है. 00:20:28 जरजर हो जाता है लेकिन व्यक्ति उसको स्वीकार नहीं करता है व्यक्ति शरीर की जर जरता को कहां स्वीकार करता 00:20:34 है मैं बूढ़ा हो रहा हूं मैं वृद्ध हो रहा हूं मेरा सौंदर्य मेरा यवन सब जा रहा है इसको 00:20:41 व्यक्ति कहां स्वीकार करता है अंत तक प्रयास करता रहता है भाई कुछ बच जाए कुछ तो रह 00:20:52 जाए कि बचकर भागना नहीं है तो क्या है प्रकृति की व्यवस्था है बाल सफेद हो गए उ. 00:20:58 फिर काला कर रहा 00:21:03 है ये सत्य को स्वीकार ना करना ही तो है बचकर भागना ही तो है और क्या है कैसे कैसे 00:21:10 उपक्रम व्यक्ति करता है आज तो राम राम पूछो ही मत कैसी दशा हो गई 00:21:18 है संत को दया आती है तभी वह कहते हैं क्रोध ना छोड़ा मोह ना. 00:21:29 छोड़ा क्रोध ना छोड़ा मोह ना छोड़ा हरि का भजन क्यों छोड़ दिया रे मन नाम जपन क्यों छोड़ दिया 00:21:54 चटक मटक निद छैल बन तकत फिरत चहर. 00:21:58 नारायण ये सुध नहीं आज मरे के 00:22:06 भोर कह रहे हैं हाथ जोर ठा रयो ध्यान से सुनना क रे हाथ जोर ठाडो रयो जिनके सन्मुख काल 00:22:20 रे काल जिनके सन्मुख हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर खड़ा रहता था रे नारायण. 00:22:28 तेव बली और गए काल के 00:22:34 गाल अरे उनका भी बस आज लिखो रह गयो 00:22:41 नाम धर्म राय जब लेखा 00:22:49 मांगे क्या मुख लेके जाएगा रे मन राम सिमर. 00:22:58 पछताएगा रे मन राम सिमर 00:23:06 पछताएगा य यह जो शब्द है ना यह करते हैं ज्ञान और वैराग्य के संस्कार को पुष्ट करते हैं मैले 00:23:14 कुचले विचारों को धोते हैं इसलिए मेरे तुलसी बाबा कह रहे हैं हाथ जोड़कर कहिए भाव में भर कर कहिए 00:23:27 मंग. 00:23:29 करनी कलि मल हर यही प्रसाद हमको प्राप्त हो तुलसी कथा रघुनाथ की मंगल करनी कलि मल हर जी को 00:23:52 लगा भाई कथा का विश्राम नहीं होना चाहिए यह ऐसा शुभ संयोग बन गया है ऐसे ऐसे. 00:23:58 राम कथा के गायक हमको मिल गए हैं जितना सुन सके उतना सुने और फिर दूसरी बात गरुड़ जी के 00:24:03 मन में विचार हुआ भाई प्रसाद बांटना चाहिए हमने तो कथा सुन ली इनसे कुछ ऐसा भी पूछे जिससे आने 00:24:10 वाले समय में इस प्रसंग का चिंतन इस प्रसंग का श्रवण करने वाले का हित हो कल्याण देखो वास्तविक बात 00:24:21 तो यही है पूर्व में भी मैंने कभी आपको संकेत किया था कि. 00:24:27 अर्जुन को मोह नहीं हो सकता अर्जुन भ्रमित नहीं हो सकते तो भगवान की विभूति है भगवान अर्जुन को निमित्त 00:24:35 बनाते हैं गीता का ज्ञान देने के लिए जैसे किसी जननी की कोख का चयन करते हैं ना भगवान इस 00:24:44 संसार में आने के लिए कोई तो निमित्त बनता है ऐसे भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाया कि उस ज्ञान 00:24:51 का प्राकट्य कैसे हो संसार 00:24:56 में. 00:24:59 यही बात श्री गरुड़ जी ने मन में विचारी भाई अभी अवसर मिला है ऐसी चर्चा हो रही है थोड़ी 00:25:04 और बात पूछे इनसे कुछ ऐसा ज्ञान इनके हृदय से प्रकट हो जो अनंत काल तक अनंत काल तक जीवों 00:25:13 का कल्याण करता रहे और यही संत का लक्षण है मोरे मन प्रभु अस 00:25:25 विश्वासा राम. 00:25:28 अधिक राम कर दासा रामत 00:25:40 अधिक तो गरु जी ने कहा नाथ मोहि निज सेवक जानी सप्त प्रश्न मम क बखानी सात प्रश्न है मेरे 00:25:48 उनका उत्तर दीजिए प्रथम ही क नाथ मति धीरा. 00:25:58 सबते दुर्लभ कवन 00:26:04 शरीरा बड़ दुख कवन कवन सुख भारी सो संक्षेप ही कहु बचारी संत असंत मरम तुम जान तिन कर सहज 00:26:29 सुभव बखान कवन पुण्य श्रुति विदित विशाला कह कवन अघ परम करा पले तोय छह प्रश्न सबसे पहला प्रश्न सबते 00:26:50 दुर्लभ कवन शरीरा फिर पूछा सबसे बड़ा दुख कौन सा है और सबसे बड़ा सुख कौन सा है. 00:26:58 संत और असंत का लक्षण कहिए मुझसे ऐसा श्री गरुड़ जी पूछ रहे हैं संत का लक्षण क्या है और 00:27:04 असंत का लक्षण क्या 00:27:09 है और आपके मत में पाप क्या है और पुण्य क्या है और इसके बाद मानस रोग कह 00:27:23 समझाई तुम सर्वज्ञ कृपा. 00:27:30 अधिका तात सुनहु सादर अति प्रीति मैं संक्षेप कह यनी पहले प्रश्न का उत्तर शिका सुंडी जी कहते हैं नरस 00:27:51 नर तन सम नहीं कवन उ देही. 00:27:58 जीव चराचर जा चत 00:28:06 ते नरक स्वर्ग अपवर्ग नि सेनी ज्ञान विराग भगति सुभ दे बड़े संक्षेप में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात शि काग. 00:28:27 जी ने कह दी कि नर तन सम नहीं कवन देही सबसे पहली बात तो हम यहां यह विचार करें 00:28:37 कि देखो सब संत एक मत से एक स्वर से मनुष्य शरीर की महिमा गा रहे हैं सुर दुर्लभ सई 00:28:45 ग्रंथन गावा मैं स्वयं से भी पूछूं आपसे भी 00:28:54 पूछूं कितनी बार हमारे जीवन में. 00:28:57 ऐसा क्षण आया होगा जब हमने हृदय से प्रभु को धन्यवाद दिया होगा कि प्रभु आपने कृपा करके हमें इस 00:29:04 भारत भूमि पर मनुष्य का शरीर दिया 00:29:09 है किया है कभी ऐसा शायद नहीं जब हृदय से केवल इस बात का ही धन्यवाद दिया हो कितनी कृपा 00:29:19 है 00:29:24 आपकी क्योंकि दुर्लभ त्रय. 00:29:29 देवानुकू महापुरुष संशय भगवत पाद शंकराचार्य कह रहे 00:29:38 हैं ये कै कैसी दुर्लभ देन प्रभु ने सहज कृपा से प्रदान की है देखो यह जो आत्म कल्याण की 00:29:49 यात्रा है ना इसका प्रथम चरण यही है जो सबसे पहले इस जीवन का मूल्य समझेगा. 00:29:57 वही आत्म कल्याण का प्रयास करेगा वही पुरुषार्थ कर पाएगा जो सबसे पहले जीवन का मूल्य समझेगा कि कितनी मूल्यवान 00:30:05 वस्तु प्रभु ने कृपा करके मुझे दे 00:30:10 दी य एक एक तव स्वास का तीन लोक नहीं 00:30:19 दान कबीर कह रहे हैं ना जागन की कर चोप रे मन सोया क्या करे और जागन की कर चोप 00:30:29 हर दम हीरा लाल है गिन गिन गुरु को सौप सबसे पहली बात यह है साधक जीवन का सबसे पहला 00:30:38 गुण सबसे पहला लक्षण यही है कि उसको जीवन का मूल्य पता हो कि कितनी मूल्यवान वस्तु प्रभु ने मुझे 00:30:44 दिए और मूल्यवान ही नहीं अमूल्य इसका कोई मोल नहीं है एक एक तव स्वास का तीन लोक नहीं दान 00:30:54 प्रपंच से बचाने के लिए सबसे पहले तो इसी. 00:30:57 बात का चिंतन आवश्यक है ना कि भाई ये मनुष्य शरीर करुणा करके प्रभु ने मुझे प्रसाद दिया है जिसके 00:31:06 जिसके जीवन में जिसके जीवन में इस बात का इस भाव का प्रकाश हो जाएगा वह कभी समय व्यर्थ नहीं 00:31:15 कर सकता पहले भी मैंने आपसे कभी कहा था ना कि समय ही जीवन है और जीवन क्या है जन्म 00:31:23 और मृत्यु के बीच की जो अवधि है जो काल है जो समय है. 00:31:27 उसी का ही तो नाम जीवन है जीवन का आदर करने वाला समय का निरादर कैसे कर सकता है यही 00:31:35 बात तो संत कह रहे हैं अरे जो छोड़ना था वह नहीं छोड़ा क्रोध ना छोड़ा मोह ना छोड़ा क्रोध 00:31:49 ना छोड़ा मोह ना छोड़ा हरि का. 00:31:57 भजन क्यों छोड़ दिया रे मन नाम जपन क्यों छोड़ दिया अ मीरा सूर कबीर तुलसी नानक 00:32:15 रदास इन सबने जब जब भजन की बात की नाम जप पर बल दिया है नाम जपन क्यों छोड़ 00:32:25 दिया एक एक. 00:32:27 नाम जप ऐसा है कि आपका मन हो ना हो लगे ना लगे प्रणाम जपत मंगल दसी दस 00:32:40 हू कारण है क्यों पूछा क्या गरुड़ जी नहीं जानते आपको क्या लगता है जिनके पंखों से सामवेद की ध्वनि 00:32:50 प्रकट होती है वो गरुड़ जी इतनी सी बात नहीं जानते होंगे सबते दुर्लभ कवन शरीरा. 00:32:57 पर एक तो काग बसु जी बड़े अनुभवी हैं महादेव यही कहकर तो उनकी स्तुति करते हैं बहु कालीना बड़े 00:33:05 पुराने हैं वोह बड़े अनुभवी हैं एक वृद्ध व्यक्ति का आदर क्यों होता है क्योंकि उसके पास जीवन का अनुभव 00:33:13 अधिक है जीवन का अनुभव व्यक्ति को समृद्ध बनाता है उसके पास अनुभव 00:33:22 है इसीलिए तो बड़े बूढ़ों का सम्मान किया जाता है क्योंकि अनुभव में बड़े हैं. 00:33:27 उनके पास जीवन का अनुभव 00:33:33 है तो गरुड़ जी ने पूछा भाई अनुभवी व्यक्ति से भी सुन लो गरुड़ जी ने यह बात तो आपको 00:33:38 और मुझे सुनाने के लिए पूछी है जो भी प्रश्न गरुड़ जी ने पूछा है वह सब जानते हैं आप 00:33:43 और मैं सुन ले इन दो महापुरुषों की इन दो महा भागव तों की वार्ता से आपको मुझे कुछ प्राप्त 00:33:49 हो जाए आप पर मुझ पर कृपा करके गरुड़ जी ने ये प्रश्न पूछे क्योंकि मैंने कहा ना प्रसाद अकेले 00:33:55 नहीं पाना चाहिए बांट कर पाना. 00:33:57 चाए कर जी ने कहा भाई हमने तो प्रसाद पा लिया अब थोड़ा बांटना भी चाहिए तो इनसे कुछ ऐसी 00:34:01 बात पूछे जिससे जनमानस का मन मानस शुद्ध हो 00:34:11 जाए क सबते दुर्लभ कवन शरीरा नर तन सम नहीं कवन उ देही बो इसके जैसा तो कोई और देह 00:34:20 नहीं है जीव चराचर जाच तेही सुर दुर्लभ देवता लालायित रहते हैं. 00:34:32 श्रीमद भागवत में भगवान वेदव्यास क रहे अहो अमशाम किम का शोभन प्रसन्न य शमत स्वयं हरि जिसको भारत भूमि 00:34:41 पर मनुष्य का जन्म मिला है उस पर तो श्री हरि 00:34:49 सर्वात्मक भूमि में मनुष्य का जन्म मिला है मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है इस पवित्र. 00:34:57 भूखंड के अतिरिक्त ऐसे तो भाई हरि व्यापक सर्वत्र 00:35:04 समाना पर मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस पवित्र भूखंड के अतिरिक्त भी मनुष्य जन्म लेते हैं 00:35:12 लेकिन जन्म से मृत्यु पर्यंत यात्रा आगे बढ़ती है केवल विकारों के साथ एक यह देश ऐसा है एक यह 00:35:20 भूमि ऐसी है यहां पर जब कोई जन्म लेता है ना तो जन्म लेने से पहले ही हमारे यहां तो 00:35:27 जीव जब गर्भ में आता है तो गर्भाधान संस्कार होता है उससे पहले या जन्म से पहले और मृत्यु के 00:35:33 बाद तक भी जो क्रिया की जाती है उसे अंतिम संस्कार कहते हैं संस्कार जन्म से मृत्यु पर्यंत य संस्कारों 00:35:42 के साथ आपको अपनी यात्रा गौरव और गरिमा से आदर से सत्कार से आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है यह 00:35:51 ऋषि मुनियों की तप पूत भूमि है मैं कहा करता हूं. 00:35:56 कि इस इस धरती ने बड़े दुर्दिन देखे हैं भारत की भूमि ने बड़े कठिन बड़े कठोर दिन देखे हैं 00:36:06 ऐसा तो समय आया जब यहां सुख सुख चैन की घड़ियां नहीं थी लेकिन इस भूमि का सौभाग्य है कि 00:36:13 एक दिन भी आज तक यहां ऐसा नहीं आया जब इस भूमि पर कोई संत नहीं था जब सारे सारे 00:36:22 विश्व की मंगल कामना करने वाला कोई संत इस भूमि पर नहीं था ऐसा दिन अभी एक भी. 00:36:26 नहीं 00:36:30 आया मैं तो कल ही किसी से कह रहा था कि देखो हम कितने सौभाग्यशाली हैं हम मैं आप हम 00:36:37 सब कितने सौभाग्यशाली हैं भाई हमारे पूर्वजों ने तो मंदिर टूटते देखे हैं हम बड़भागी है कि हम मंदिर बनता 00:36:44 देख रहे हैं कितना कठिन समय रहा होगा हमारे पूर्वजों के लिए जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनी. 00:36:56 श और विश्वास के केंद्रों को क्षत विक्षत होते देखा होगा खंड खंड होते देखा होगा हम बड़भागी हैं हमको 00:37:03 ऐसे समय में जन्म मिला है जब हम मंदिर बनता देख रहे हैं जब हम जब हम सनातन धर्म का 00:37:12 यह धर्म ध्वज लहराता देख रहे हम सबका सौभाग्य है अब बात हुई है मुझे मुझे स्मरण हो आया है 00:37:21 तो एक बार प्रेम से दो क्षण के लिए भगवन नाम का उच्चारण कर दीजिए एक बार सब. 00:37:26 प्रेम से कहिए राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय 00:37:39 सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:37:52 राम जय राजा राम राम राम जय. 00:37:57 सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:38:09 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम देखो यह नाम तो ऐसा है मैं सोचता हूं कोई किसी भी 00:38:18 धर्म का किसी भी मत का हो व किसी भी विधि से. 00:38:27 साधन करता हो यह एक नाम तो ऐसा है भाई जो अनंत अनंत काल से इस भरत खंड की चेतना 00:38:37 में रमा है य इस देश में जो जो सूरज की पहली किरण फूट है ना उसके साथ ही केवल 00:38:45 पंछी नहीं चह चहाते चारों र एक शब्द और भी और भी गुंजित होता है और वो क्या है राम 00:38:52 राम जी राम राम जी राम राम. 00:38:56 जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम हरे रामा रामा राम 00:39:08 सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम 00:39:22 हरे रामा रामा राम सीता राम रा. 00:39:26 राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:39:40 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:39:53 राम हरे रामा रामा. 00:39:56 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:40:09 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:40:22 राम सीता राम राम राम. 00:40:26 हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम अरे रामा रामा राम 00:40:38 सीता राम राम राम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम राम राम जय राजा राम राम 00:40:49 राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम. 00:40:56 राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम 00:41:05 राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता 00:41:25 राम.

अपने दोषों को भूल कर भी अनदेखा ना करें ||41|| Shree Hita Ambrish Ji

अपने दोषों को भूल कर भी अनदेखा ना करें ||41|| Shree Hita Ambrish Ji 

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given

संत का स्वभाव और परोपकार | संतत्व की वास्तविक पहचान

The Nature of a Saint and Selfless Service | The True Mark of Sainthood https://youtu.be/4ozu5eEm584 [00:42] संत वही है जो दूसरों के दुख से दुखी होता है और परोपकार को ही अपना सहज स्वभाव मानता है। A saint is one who feels the pain of others and considers selfless service to be his natural disposition. [02:42] प्रभु के निकट वही जाता है जो परोपकारी है। जीवन केवल स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ के लिए मिला है। Only one who is benevolent draws near to the Lord. Life has not been given merely for selfish purposes, but for the welfare of others. [04:32] संत दूसरों के सुख के लिए कष्ट सहते हैं, जबकि असंत (दुष्ट) दूसरों के दुख का कारण बनते हैं। Saints endure hardships for the happiness of others, whereas wicked people become the cause of others' suffering. [06:29] वास्तविक आध्यात्मिकता मंदिर में नहीं, बल्कि आपके दैनिक व्यवहार में दिखती है। व्यवहार ही आपके चरित्र की असली परीक्षा है। True spirituality is not demonstrated merely in the temple, but in your daily conduct. Conduct is the real test of your character. [10:29] किसी का बुरा सोचने मात्र से मन भजन के अयोग्य हो जाता है। एक अपवित्र संकल्प पतन का कारण बन सकता है। Merely thinking ill of someone makes the mind unfit for devotion. A single impure thought can become a cause of downfall. [12:05] जैसे ही अपने भीतर कोई दोष दिखाई दे, उसे प्रार्थना और पुरुषार्थ से तुरंत दूर करने का प्रयास करें। As soon as you notice any fault within yourself, immediately make an effort to remove it through prayer and determined effort. [20:43] शरीर को सजाने से अधिक आवश्यक मन को सजाना है। राग, द्वेष और ईर्ष्या को हटाकर सद्गुणों को अपनाना ही असली श्रृंगार है। Adorning the mind is more important than adorning the body. Removing attachment, hatred, and jealousy and adopting virtues is the real adornment. [25:36] अहिंसा (मन, वचन और कर्म से) सबसे बड़ा धर्म है और परनिंदा (दूसरों की बुराई करना) सबसे बड़ा पाप है। Non-violence through thought, word, and deed is the greatest धर्म, while criticizing others is the greatest sin. [34:50] जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वे आध्यात्मिक धन खो देते हैं और अंधकारमय गतियों को प्राप्त होते हैं। Those who criticize others lose their spiritual wealth and attain dark and undesirable destinations. https://youtu.be/4ozu5eEm584 -----

Full Transcript


00:00:00 तो सबसे बड़ा दुख दरिद्रता और दरिद्रता में भी जो भाव की दरिद्रता है वो सबसे बड़ा दुख है सबसे 00:00:08 बड़ी पीड़ा है और संत मिलन सब सुख जग नाही पर उपकार वचन मन काया संत सहज स्वभाव 00:00:28 खगरा. 00:00:30 संत सहज सुभा खगरा और संत का संत क्या है किरे जो पर दुख के लिए जो पर दुख से 00:00:42 कातर होकर जो पर पर पीड़ा से तप्त होकर स्वयं दुख सह रहा है कल एक छोटी सी बात मैंने 00:00:50 आपको निवेदन की थी जिस दिन पराई पीड़ा से आप भी पीड़ित हो जाओ उस दिन समझना अब हमारा मन 00:00:59 भगवान के भजन. 00:01:00 योग्य हो रहा है आप पराई पीड़ा से पीड़ित हो जाओ अपनी पीड़ा से तो भाई सभी पीड़ित है सब 00:01:06 रो लेते हैं इस दिन किसी का दुख आपको दुखी कर दे संत का सबसे पहला गुण यही बता रहे 00:01:14 परोपकार और किससे वचन मन काया शरीर से भी मन से भी और वचन से भी जो सतत परोपकार में 00:01:22 संलग्न है सेवक जी श्री महाप्रभु जी के अवतरण का हेतु क्या बताते. 00:01:30 देह धरण परोपकार के लिए जिन्होंने देह धारण किया है और कोई प्रयोजन नहीं है पलटू साहब कहते हैं पर 00:01:38 परमार्थ के कारण लियो संत 00:01:44 अवतार और श्रीमद भागवत तो कहती है भगवान की सबसे बड़ी आराधना यही है तपत लोक तापन बो जो संसार 00:01:53 के ताप से तप रहा है अर्थात जो संसार को दुखी देखकर दुखी है जो जीव को दुख. 00:02:00 पाता देखकर दुखी है वो साधु है और उस उस दुख को दूर करने का जो प्रयास कर रहा है 00:02:08 भगवान के नाम रूप लीला का गान करके जो यह प्रसाद जगत को बांट रहा है वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ 00:02:14 पुजारी है उपासक है आराधक 00:02:20 है आज जहां से हमने चर्चा आरंभ की जहां भी हम खड़े हैं जिस भी स्तर पर हम खड़े हैं 00:02:26 जो भी साधन हमारे पास है हम कम से कम वहीं से पर. 00:02:29 का आरंभ तो करें जो भी आपके पास हो शरीर से कर सको धन से कर सको आपके पास विद्या 00:02:37 हो विद्या से कर सक कोई गुण हो आपको प्रभु ने दिया उस गुण से सेवा कर सक पर आपके 00:02:42 जीवन में परोपकार आरंभ तो हो परोपकारी ही प्रभु के निकट जाता है 00:02:50 परोपकारी जब कुछ वर्ष पहले आपको मैंने निवेदन किया था ना भाई नाम जप करना सबके हित का विचार करके 00:02:57 केवल परमार्थ की भावना का. 00:02:59 बीज बोने के लिए यह बात मैंने आपसे कही थी कि हमारे भीतर ये परमार्थ का भाव तो अंकुरित हो 00:03:07 कि भाई कुछ हमको ऐसा भी करना है जो अपने लिए नहीं करना है सब कुछ स्वार्थ के लिए नहीं 00:03:14 करते चले जाना है जीवन तो परमार्थ के लिए मिला 00:03:22 है अब एक व्यक्ति जाकर भगवान से प्रार्थना करे प्रभु मेरे घर बारिश हो जाए एक. 00:03:30 केवल जाकर के प्रभु वर्षा हो जाए भाई वर्षा हो जाए तो अपने घर तो होही जाएगी आप यह ना 00:03:39 समझना कि भाई हम सबके लिए करते र जाएंगे तो हमारा कार्य कैसे होगा ना ना आपका तो पहले हो 00:03:45 ही जाएगा और मुझे तो लगता है आधा हो गया है तभी तो आप सबके लिए करने चले हो जिसके 00:03:51 मन में यह परमार्थ की भावना प्रतिष्ठित हो गई है उसका आधा कार्य तो होही गया है भाई तभी तो 00:03:58 व इस दिशा में चला. 00:03:59 निकला 00:04:03 है और यहां तुलसी बाबा तो संत का ही लक्षण बता रहे हैं पर उपकार वचन मन काया संत सहज 00:04:18 स्वभाव खगरा बो यही संत का सहज स्वभाव होता है संत सह ही दुख परही. 00:04:32 लागी पर दुख है तू असंत अभ अगले प्रश्न श्री गरुड़ जी ने यही पूछे थे ना संत का लक्षण 00:04:42 क्या है असंत का लक्षण क्या है संत सहाई दुख परहित 00:04:51 लागी संत कौन है क जो दूसरे के लिए दुख सह रहा है और असंत कर जो दूसरे के दुख 00:04:57 का कारण बन रहा है. 00:05:00 किसी भी प्रकार से जो दूसरे के दुख का कारण बन रहा है वही असंत है आपको याद हो कभी 00:05:09 मैंने आपको संकेत किया था भाई किसी की सेवा सहायता ना कर सको चलो कोई बात नहीं पर जीवन में 00:05:16 कभी किसी की कष्ट और पीड़ा का कारण तो बिल्कुल नहीं बनना कांटा तो बिल्कुल नहीं बनना साधक ना बन 00:05:24 सको तो कम से कम बाधक तो किसी के लिए आप बिल्कुल भी ना होना हो सकता है. 00:05:29 कि अभी हमारे पास इतना बड़ा मन ना हो हमारे पास इतना बड़ा हृदय ना हो कि हम सबका सम्मान 00:05:35 कर सके पर किसी का अपमान ना करें हमारे हमारे मुख से कभी कोई ऐसा कठोर ऐसा कठोर वचन कोई 00:05:45 कठोर शब्द ना निकले जो किसी का हृदय दुखा दे जो किसी के लिए पीड़ा का कारण बन जाए ऐसा 00:05:50 ऐसा तो प्रयास करना ही चाहिए क्योंकि हम साधक 00:05:56 हैं बुल्ले शाह एक बात कहते हैं. 00:05:59 कहते बुलिया ज तू कभ किसी द फट नहीं सीता बुलिया ज कद किसी का फट नहीं सीता फिर माला 00:06:12 तू कख नहीं कीता मैं तो कहता ही हूं भाई मंदिर में तो सभी भक्त हैं अपने मंदिर में या 00:06:21 भगवान के मंदिर में जो खड़े हैं भाई व तो सभी भक्त है पर आपके चरित्र का वास्तविक दर्शन. 00:06:29 व्यवहार में होता है व्यवहार में आप कैसे हैं जो दैनिक व्यवहार आप करते हैं उसमें आपकी चेष्टा कैसी है 00:06:37 उसमें आपकी वृत्ति कहां है शुद्ध है कि नहीं है इसलिए मैं कहता हूं भाई सब छोड़कर और एक और 00:06:45 बैठ जाना सरल है पर व्यवहार में रहकर स्वयं को साधे रखना यह बहुत कठिन कार्य है उसके लिए वास्तविक 00:06:51 आध्यात्मिक बल की आवश्यकता है परीक्षा तो व्यवहार में ही होती 00:06:58 है. 00:07:02 यहां तो भाई किसी को हम धक्का मार के और आगे आकर बैठते हैं व्यवहारी तो बताता है अब उसको 00:07:09 आप यह कहते हो भाई य तो हमारी भावना है आपके 00:07:15 लिए आज नहीं तो कल स्वयं को स्वयं के हृदय को कसौटी पर कसना पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा कभी तो 00:07:23 आओगे कसौटी पर किसी दिन तो भाई परीक्षा देनी पड़ती है क्योंकि उसके. 00:07:29 बिना तो अगली कक्षा में कोई बालक जा नहीं सकता है कब तक टा होगे किसी दिन तो कसौटी पर 00:07:36 खरा उतरना पड़ेगा ना आपका व्यवहार कैसा 00:07:44 है ये ये जो बात यहां कही गई है ना ये केवल संत के लिए नहीं है तो भाई आपके 00:07:50 मेरे सबके लिए कही जा रही है मैंने कल ही आपसे बात कही थी कि सब प्रश्नों के उत्तर गरुड़ 00:07:55 जी जानते हैं ऐसा हो ही नहीं सकता गरुड़ जी ना जानते हो आपके मेरे लिए पूछा है. 00:08:01 काक बु सुंडी जी जो उत्तर देंगे आपके मेरे काम की बात है इसलिए पूछी है इसलिए आपको मुझे सुना 00:08:06 रहे 00:08:10 हैं और हम हम अपनी बात करें तो भाई हित की यहां उपासना हित के हैं हम दास हमारे आचार्य 00:08:18 का तो पहला वाक्य और उसका भी पहला शब्द सब सोहित निष्काम मती आगे की बात बाद में करेंगे पहले 00:08:28 यहीं पर. 00:08:30 चर्चा कर लेते हैं है हमारे भीतर यह बात सब सोहित और सब में सिर्फ अपने अपने नहीं आते सब 00:08:38 में तो सब आते हैं सब में सब आते हैं श लाडली दास जी कह र चीटी सोले जुगल तक 00:08:47 सब सोहित 00:08:53 निष्काम अपने अपनों से तो भाई सभी कर रहे हैं ना पर सब सोहित. 00:09:02 और कम से कम इस उपासना के मार्ग पर तो कोई शॉर्टकट नहीं है कहीं होता हो तो पता नहीं 00:09:08 यहां तो नहीं है यहां तो भाई गुरुजन ने जो मार्ग बताया है उसी मार्ग पर चलकर ही कोई पग 00:09:16 पग आगे बढ़ सकता है पहला पहला वाक्य और उसका भी पहला शब्द सब सोहित निष्काम और उसमें भी टर्म 00:09:25 एंड कंडीशन अप्लाई है सबस हित निष्काम. 00:09:29 मति तब वृंदावन विश्राम उसके बाद तो कोई प्रभु का नाम लेने योग्य हो राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान 00:09:44 मुखना तभी आचार्यों ने कहा है जीवे दया नाम रुचि जीव मात्र पर दया आप कल्पना नहीं कर सकते किसी 00:09:55 के भी अहित की भावना किसी के भी अनादर की भावना. 00:09:59 किसी की भी अवज्ञा या अवहेलना की भावना आपके हृदय को आपकी भाव भावना को कितनी भारी क्षति पहुंचा सकती 00:10:07 है आपको याद हो तो कल मैंने कहा था एक अपवित्र संकल्प पतन के गहरे गर्द में ले जाकर छोड़ 00:10:16 सकता है एक अपवित्र संकल्प किसी की भी अवज्ञा अवहेलना की भावना किसी का भी अहित चिंतन अहित करना नहीं 00:10:27 अहित चिंतन मैला. 00:10:29 उछला कर देगा मलीन हो जाएगा मन कोई पूछे ना क्या होता है किसी का अहित चिंतन करने से क्या 00:10:35 होगा तो मैं कहता हूं और तु और तो मैं कुछ नहीं जानता पर मन भजन के योग्य नहीं रहेगा 00:10:41 इससे बड़ी हानि और क्या होगी इससे बड़ी क्षति हमारी और क्या होगी कि हमारा मन भजन के योग्य ना 00:10:48 रहे और कभी ऐसा मन हो जाए कभी ऐसा भाव आ भी जाए किसी के लिए तो दौड़कर प्रभु की 00:10:57 चरण शरण में चले जाना. 00:11:00 भक्तों ने कहा है कि दल बल के साथ माया घेरे जो मुझे आकर तुम देखते ना रहना झट आके 00:11:14 बचा 00:11:17 लेना दौड़ कर जाना मनी मन दौड़ कर जाना चरण पकड़ लेना प्रभु के प्रभु मैं मैं स्वयं को इस 00:11:26 पाप से बचा नहीं पा रहा हूं आप मेरी रक्षा करिए. 00:11:29 आप मुझे संभालिए और अपने प्रति सचेत भी रहना और अपने प्रति ईमानदार भी रहना कल एक छोटा सा उदाहरण 00:11:39 दिया था मैंने आपको किसान बीज डालता है ना अवांछित घास फूस भी पैदा हो जाती है उसको समय रहते 00:11:46 काटना पड़ता है समय रहते छटाई करनी पड़ती है उसकी नहीं तो भूमि की सारी उर्वरक शक्ति जो होती है 00:11:53 व घास खा जाती 00:11:57 है. 00:11:58 परिश्रम व्यर्थ चला जाता है समय रहते और मैं तो कहता हूं अपना दोष दृष्टि में आए तो उसी समय 00:12:05 लग जाओ जब तक दूर ना हो तब तक चैन से बैठना नहीं जैसे अपना दोष दृष्टि में आए सत्संग 00:12:14 करोगे तो यह घटना तो घटेगी अपना दोष दिखाई पड़ेगा लेकिन हम हम छोड़कर बचकर भाग जाते हैं ये मनुष्य 00:12:23 की वृत्ति है आपको उदाहरण दे रहा था ना मैं. 00:12:29 सफेद हो लो आपने काले कर लिए दूसरे को तो काले ही दिख रहे हैं है सफेद दिख काले रहे 00:12:38 हैं आपकी छोटी छोटी चेष्टा बताती है मन कैसा है मन कहां है मन कैसा है किस धरातल पर आपकी 00:12:46 चेतना खड़ी 00:12:53 है इससे बचना और ये जो बात मैंने अभी आपसे. 00:12:58 कही ना बड़ी महत्त्वपूर्ण है इसको आज साथ ले जाना जैसे अपना दोष दिखाई दे उसके लिए उसको दूर करने 00:13:04 के लिए प्रार्थना भी करना पुरुषार्थ भी करना प्रभु से प्रार्थना करना प्रभु मेरी रक्षा करिए और भगवान रक्षा करेंगे 00:13:15 सच्चे हृदय से यदि आप प्रभु से प्रार्थना करेंगे प्रभु मेरे हृदय का यह दोष दूर हो जाए प्रभु तत्काल 00:13:23 कृपा करते हैं उसी क्षण देव द्वार से कृपा अवतरित होती है ये बात में आपको. 00:13:28 अपना अनुभव बता रहा भाई हम संसार में रहते हैं व्यवहार में रहते हैं आ जाता है ऐसा कोई वैसा 00:13:35 कोई भाव ऐसा कोई विचार मन में आ जाता है उसको अनदेखा ना करें मैं यह कह रहा हूं इस 00:13:40 दोष को इस रोग को अनदेखा ना करें व जड़ पकड़ 00:13:50 लेगा क्या होता है भाई व्यक्ति अपना पुण्य देखता है दूसरे. 00:13:59 का पाप देखता है अपना पुण्य देखता है दूसरे का पाप देखता है और इसका परिणाम क्या होता है एक 00:14:11 पग भी जीवन में आगे नहीं बढ़ पाता मैं बड़ी विनम्रता पूर्वक यह बात आपको कह रहा हूं क्यक ऐसा 00:14:17 भी मैंने देखा कि 10 10 151 साल लगे हुए हैं अपनी ओर से साधन में लेकिन उनकी वृत्ति में 00:14:26 उनके व्यवहार में तनिक सा भी कोई परिवर्तन. 00:14:29 कल भी वही छोटी छोटी बातें थी जिनको पकड़ पकड़ कर और राग द्वेष में उलझे रहते थे आज भी 00:14:35 वही बातें खूब सेवा कर रहे हैं खूब सब कर रहे हैं लेकिन मन नहीं बदल रहा है जीवन में 00:14:41 परिवर्तन नहीं आ रहा है द्वंद का प्रभाव जो का त्य बना हुआ है जीवन पर यह बता रहा है 00:14:50 कि भाई गति नहीं हो रही है जीवन गतिमान नहीं है अटका है कहीं अटका है. 00:15:01 और मैं आपको उपदेश नहीं कर रहा हूं एक साधक की भाति आपको बड़ी विनम्रता पूर्व की बात कह रहा 00:15:07 हूं कि अगर आप मेरे इस अनुभव से थोड़ा लाभ ले सके आप सच्चे हृदय से प्रार्थना करो प्रभु से 00:15:13 कि प्रभु मेरे हृदय का यह दोष दूर हो जाए प्रभु तत्काल कृपा करेंगे कोई ना कोई विचार आपको मिलेगा 00:15:20 कोई ना कोई शब्द आपको मिलेगा कभी-कभी कोई ग्रंथ आ जाता है कभी-कभी कोई संत आ जाता है लेकिन आपके 00:15:26 भीतर परिवर्तन होगा. 00:15:29 एक बात तो मैं आपसे सदा से कहता ही हूं कि भाई अच्छा होना और अच्छा बने रहना यह दो 00:15:37 बातें हैं ऐसे मन अच्छा हो जाता है कभी-कभी अच्छा बना भी तो रहे मन शुद्ध हो जाए और फिर 00:15:43 शुद्ध बना रहे यह बड़ी बात है मन की शुद्धता बनी रहे शिखर पर पहुंचना आसान होता है शिखर पर 00:15:52 बने रहना कठिन होता है पहाड़ की चोटी पर जो लोग चढ़ते हैं ना बहुत देर वहां ठहर नहीं पाते 00:15:58 झंडा. 00:15:58 के वापस आ जाते हैं बहुत देर वहां कोई रह नहीं सकता है शिखर पर बने रहना कठिन होता है 00:16:05 ऐसी जीवन जीवन शिखर पर पहुंचे और फिर बना रहे बड़ी चुनौती है वहां पर बने 00:16:17 रहना इसके लिए लगे रहना पड़ेगा स्वयं के साथ स्वयं को ई देखते हुए स्वयं को ही संभालते हुए साधक 00:16:25 के जीवन में तो समय नहीं होता किसी दूसरे को देखने का दूसरे का विचार ही कैसे. 00:16:28 करेगा तो स्वयं को ई देख रहा है और मैंने कहा कि सत्संग करोगे ईमानदारी से अपने सुधार के लिए 00:16:37 सत्संग करोगे यह परिणाम तो जीवन में अवश्य आएगा ही आएगा अपना दोष आपको दिखाई पड़ेगा अपना दोष दिखाई 00:16:47 पड़ेगा और अगर आपने अपने मन को व्यस्त रखा अपना सुधार करने में तो आप देखो जितना अनुचित अवांछित जीवन 00:16:56 में है सब दूर हो जाएगा सब. 00:16:58 छिटक जाएगा क्योंकि आपका मन तो व्यस्त है मन एक है एक साथ दो स्थान पर वो रह नहीं सकता 00:17:04 मन आपका व्यस्त है अपनी संभाल करने में कल भी आपसे मैंने कहा था ना भाई पिछला जो है वह 00:17:13 सुधर जाए और अगला संवर जाए यही हमारा लक्ष्य हो यही हमारा उद्देश्य हो जो भूल हमसे होती आई है 00:17:21 अब वह सुधर जाए अब और ना हो क्यों ना हो क्योंकि भाई अब प्रभु की शरण में आ गए 00:17:27 हैं. 00:17:30 प्रभु का दरबार यही तो है सूरदास जी गाते हैं ना बैठे सब सभा हरि जू की बैठे सब सभा 00:17:47 हरि जू की कौन बड़ो को छोट बड़ी है. 00:17:59 हरि नाम की ओट ऐसे प्रभु के नाम की ओट में तो आप में यहां पर आकर बैठे य प्रभु 00:18:07 का दरबार ही तो है क्योंकि भाई प्रभु के दरबार में आप पहुंचे हैं अब हमसे ना हो वो भूल 00:18:12 ना हो जो जो जो भूल होती आई व अब सुधर जाए और अगला जीवन संवर जाए इस जीवन को 00:18:23 प्रभु के लिए सजाना है इस जीवन का वास्तविक श्रृंगार करना है तन का श्रृंगार नहीं करना है जीवन. 00:18:28 का श्रंगार कर अपने आप को हार्ड मास का पुतला समझते हो तो अपने तन को 00:18:37 सजाओ अगर आप अपने आप को केवल हार्ड मास का पुतला ही समझते हो तो फिर इसको सजाओ और गुरु 00:18:44 की कृपा से आंख खुल गई है गुरु की कृपा से अंतर दृष्टि प्राप्त हो गई है देख पाते हो 00:18:50 अपने आप को इससे इससे अतिरिक्त कुछ 00:18:56 और कहते तो हो कि. 00:18:58 क् होती है नया जन्म होता है किसका जन्म होता है आपके भीतर एक साधक का जन्म होता है सत्संग 00:19:04 से जो भाव देह प्राप्त होता है दीक्षा के समय उसकी पुष्टि की जाती है उसको सजाना है य ये 00:19:10 यह हाड़ चाम का पुतला प्रभु से नहीं मिलेगा कौन सा निंद गृहित ऐसा कर्म है जो इस शरीर से 00:19:17 नहीं होता है बार-बार नहीं होता है किसी भी दृष्टि से क्या यह प्रभु के योग्य है ना ना यह 00:19:22 तो प्रभु के योग्य नहीं 00:19:26 है क्योंकि ऐसे कई बार. 00:19:28 देखने में आता है ना बात आई है तो मैं कह रहा हूं हम कहते हैं भाई कल उत्सव 00:19:35 है कल उत्सव है अपना श्रृंगार करके आना तो देखने में आता है कि कुछ लोग केवल इसी इसी पुतले 00:19:43 को ही सजाकर आ जाते हैं सत्संग में जो बात कही जा रही है उसका तात्पर्य उसका प्रयोजन समझना चाहिए 00:19:50 ना उसका समझना चाहिए प्रयोजन क्या है किसको कहा जा रहा है मैं यहां जो आपसे सब बात कह रहा 00:19:57 हूं मैं. 00:19:58 मैं किसी स्त्री या पुरुष से बात थोड़ी कह रहा हूं किसी बालक या वृद्ध से थोड़ी कह रहा हूं 00:20:03 आपके शरीर को देखकर यह बात थोड़ी कही जा रही है यहां तो जो बैठा है वह प्रभु का है 00:20:09 प्रभु के दरबार में तो जीव आता है यह बात तो जीव से कही जा रही है उसके कल्याण के 00:20:14 लिए सुनना चाहिए ना यह बात किसको कही जा रही है किसका श्रृंगार होना चाहिए कैसा श्रृंगार होना 00:20:23 चाहिए संत कहते आ रहे क मन ना रंग आए रंग. 00:20:28 जोगी कपड़ा य बहुत आसान है ना यह सब कर लेना बड़ा आसान 00:20:37 है ना पर अपने जीवन का श्रृंगार करना है अपने मन को सजाना है मन जाएगा प्रभु के पास मन 00:20:43 ही मिलावे राम से मन जाएगा प्रभु के पास मन मिलेगा प्रभु से इस मन को सजाना है राग द्वेष 00:20:53 ईर्ष्या मद मास अभिमान काम क्रोध जितने विकार है. 00:20:58 दुर्गुण य दूषण बने हुए हैं इन सबको 00:21:04 हटाकर इन सबको इन सद्गुणों से सजाना है जिनकी बात भगवत रस देव कह रहे हैं हरि को भजन साधु 00:21:11 की सेवा सर्व भूत पर दाया तृष्णा दम लोभ छल त्यागे विस सम देखे माया सहनशील आशय उदार अति धीरज 00:21:21 सहित विवेक सत्य वचन सबको सुखदायक गह अनन्य व्रत एक. 00:21:34 तो कहा संत सह दुख परहित लागी और पर दुख हेतु असंत अभागी भूज तरु सम संत कृपाला परहित निति 00:21:50 सह वि पति 00:21:57 विसा. 00:21:59 देवता आए हैं दधीच ऋषि के 00:22:05 पास आपकी हड्डियों से वज्र 00:22:11 बनेगा ऋषि क्या कहते हैं कि सर्वा भगवान मुझ पर प्रसन्न हो गए हैं मेरी तपस्या सफल हो गई है 00:22:20 कि यह शरीर जो किसी भी काम का नहीं है य शरीर भी परोपकार में लग जाएगा इससे बड़ा जीवन 00:22:26 का फल और क्या हो सकता है. 00:22:30 किसी भी काम का नहीं है शरीर अगर परोपकार में ना लगे अगर जीवन में सेवा सुमिर ना हो तो 00:22:37 फिर किस काम का है क सर्वात्मका मेरे पास में आना इस इस बात का संकेत है भगवान मुझ पर 00:22:50 प्रसन्न है प्रभु मुझे स्वीकार अंगीकार करने को तैयार हो गए हैं तभी तो आप मेरे पास में आए हैं 00:22:57 किय शरीर जो. 00:22:58 किसी भी काम का नहीं य परोपकार में लगेगा इससे बड़ा कोई फल नहीं है जीवन का इसलिए पूर्व में 00:23:05 तुलसी बाबा मानस में कहते हैं परहित सरस धर्म नहीं भाई पर पीरा सम नहीं 00:23:21 अधमा संत होते हैं तुलसी बाबा तो कहते हैं कि दूसरे के हित के लिए. 00:23:28 भारी विपत्ति सहते अपनी खाल तक उधड़ वा लेते कैसा होता है संत का हृदय उसी को देखकर उसी को 00:23:37 विचार कर प्रभु कह रहे मोते अधिक संत करि 00:23:44 लेखा तो यह संत और असंत का लक्षण बताया तीन प्रकार के लोग होते हैं प्राय करके संसार में एक 00:23:52 साधारण एक मध्यम एक अधम. 00:23:58 साधारण कैसे होते हैं भाई हमारा भी काम बन जाए किसी का भी बन जाए य साधारण है इनको भी 00:24:04 अच्छा नहीं माना गया है साधारण है उत्तम संत होते हैं यह साधारण है भाई चलो हमारा भी काम बन 00:24:10 जाए आपका भी बन जाए फिर एक होते हैं मध्यम भाई हमारा बन जाए किसी का बने ना बने फिर 00:24:20 एक है अधम वो कह र हमारा बने ना बने इसका बिगड़ना चाहिए हमारा बने ना बने. 00:24:28 इसका काम नहीं बनना चाहिए इसका बिगड़ना चाहिए और बोले अधम क्या करते बोले स्वयं दुख सहकर भी दूसरे का 00:24:35 काम बिगड़ते इसका इसका बिगड़ना चाहिए काम इसका ना बन जाए फर य अधम है तो एक साधारण है एक 00:24:42 मध्यम है एक अधम है फिर उत्तम कौन है बोले जो जो जिसका जीवन परोपकार को समर्पित है जो परोपकार 00:24:50 के लिए जीवन धारण कर रहा है जिसके जीवन का लक्ष्य उद्देश्य परमार्थ है भाई अपने पास में जो है 00:24:57 किसी के. 00:24:57 काम आ जाए जितनी हो सके अपने से सेवा हो जाए हमारे पास जो है उससे बन जाए किसी का 00:25:06 काम बनता हो तो खूब बन जाए तेरे जन के हित लगे तन मन धन सब ठाट आत्मा तुझ में 00:25:19 ही रमे मुख में तेरा 00:25:26 पाट. 00:25:29 और फिर कहते हैं भाई संत उदय संतत सुख कारी विश्व सुखद जिम इंदु तमारी परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा 00:25:36 पर निंदा सम अगन गरीसा भले भाई ऐसे संतों का उदय लोक के कल्याण के लिए होता है फिर दो 00:25:42 प्रश्न और पूछे सबसे बड़ा पुण्य कौन सा है सबसे बड़ा पाप कौन सा है तो क परम धर्म श्रुति 00:25:50 विदित अहिंसा जिसकी चर्चा हम करते ही आ रहे हैं रे अहिंसा परमो धर्म ये सबसे बड़ा धर्म है. 00:26:00 और अहिंसा केवल तन से नहीं मन से भी अहिंसा मन से भी अहिंसा हमारे हमारे हृदय में दूर तक 00:26:10 लेश मात्र भी किसी का अहित चिंतन ना रहे देखो भाई यहां बीच में कुछ नहीं है या तो आप 00:26:20 धार्मिक हैं या नहीं है बीच में कोई खेल नहीं है यहां पर. 00:26:28 धर्म को धारण करने वाला धार्मिक है धर्म की बात करने वाला धार्मिक नहीं है धर्म को धारण करने वाला 00:26:34 धार्मिक है और धर्म क्या है क परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा य गोस्वामी जी बिल्कुल वेद शास्त्र सम्मत बात 00:26:43 कह रहे हैं भाई बोले भाई वेदों शास्त्रों का मत है कि अहिंसा सर्वश्रेष्ठ धर्म है परम धर्म है अब 00:26:50 भाई जिसने जीवन में इस धर्म को धारण किया वही तो धार्मिक हुआ मुझे याद है बंबई. 00:26:57 की बात है शायद य सात आ साल हो गए किसी के यहां गए एक व्यक्ति आया उसने कहा कि 00:27:04 आशीर्वाद दीजिए आशीर्वाद दीजिए अब मैं तो इस व्यापार में कोई पढ़ा ही नहीं अब मैंने से विनोद के लिए 00:27:13 पूछ लिया मैंने किसके लिए चाहिए आशीर्वाद बताओ ऐसे तो आशीर्वाद कैसे दे दे अरे बताओ क्यों चाहिए आशीर्वाद छोटे 00:27:23 भाई पर मुकदमा किया है मैं जीत जाऊ इसलिए आशीर्वाद दे दीजिए. 00:27:28 आशीर्वाद भी इसके लिए मांग रहा है अब मांग तो आशीर्वाद रहा है बड़ी लंबी दंडवत प्रणाम भी कर रहा 00:27:33 है दूर से तो देखेगा भाई बड़ा धर्मात्मा है बड़ा धार्मिक है साधु संतो की सेवा भी कर रहा है 00:27:38 प्रणाम भी कर रहा है मन की वृत्ति क्या है मन की गति किस और है किसी का अहित चिंतन 00:27:45 करने में लगा है तो इसलिए धर्म की बात करने वाला धार्मिक नहीं है धर्म को धारण करने वाला धार्मिक 00:27:52 है और धर्म क्या है अहिंसा प्राणी मात्र के. 00:27:57 दया का भाव जीवे दया बड़ी बड़ी स्पष्ट रीति से श्री सेवक जी ने समझाया है सब जीवनस प्रीत रीत 00:28:09 निहत आपनी श्रवण कथन परती यह जो कृपा हरिवंश की आचार्य की कृपा का लक्षण है पहले सब जीवन स 00:28:22 प्रीत माने अहिंसा सब सोहित निष्काम मति माने अहिंसा. 00:28:28 यह परम धर्म 00:28:34 है अब जाकर आज विचार करना हमारे मन में है तो नहीं ऐसा विचार किसी के लिए मिलेगा अवश्य मिलेगा 00:28:45 और जैसा कुछ देर पहले मैंने आपसे कहा कि अपना दोष देखो अनदेखा नहीं करना छोटा सा रोग भी अगर 00:28:54 समय रहते उसकी औषधि ना की जाए तो असाध्य हो जाता है. 00:28:57 प्राणों पर संकट उपस्थित हो सकता है जाकर देखना आत्म चिंतन करना कहीं ऐसी कोई बात है तो नहीं मेरे 00:29:07 मन में और अगर दिखाई दे फ प्रभु से प्रार्थना करना थोड़ा नाम जप करना कल आपसे कह ही रहा 00:29:14 था मैं ऐसी कोई बात हो जो अपने हाथ में ना हो फ प्रभु से कहना चाहिए ये मन हो 00:29:24 निर्मल तुम्हारी कृपा. 00:29:28 से इसे शुद्ध करने में हम तो है हारे मैंने तो मैं तो बहुत बार प्रभु से कहता हूं अपनी 00:29:42 करुणा का जल तू बहा दे कर दे पावन हर एक मन का कोना हम चले. 00:29:57 नेक रास्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल 00:30:09 होना बो सबसे बड़ा पुण्य है यह सबसे बड़ा धर्म है अ फिर कह रहे सबसे बड़ा पाप परनिंदा सम 00:30:22 अघन गरी निंदा से जैसा बड़ा कोई दूसरा पाप नहीं. 00:30:32 थोड़ी घनी निंदा तो भाई हम सब करते सुनते ही रहते हैं उससे पहले हम कह देते हैं भाई कहना 00:30:41 तो नहीं चाहिए पर चलो कह देते हैं ऐसे दो लोग बात करते हैं तो कह रहे कि अच्छा तुमको 00:30:47 एक बात बताए देखो वैसे से कहना तो नहीं चाहिए पर देखो ऐसा हो रहा है देखो इसको कहते हैं 00:30:54 अब आत्म विवेक का अनादर इसको. 00:30:57 कहते आत्म ज्ञान का अनादर आपको पता है नहीं कहना चाहिए फिर भी कह रहे हो आप और मुझे लगता 00:31:04 है किसी के अनादर से बड़ा तो अपना ही अनादर है अपना ही अनादर व्यक्ति करता है जानता है कि 00:31:09 मार्ग ठीक नहीं है फिर चलता है यह काम ठीक नहीं है फिर करता 00:31:16 है अभी बात सुनकर सब मुस्कुरा दिए थे माने सब ऐसा करते हैं ना थोड़ी बहुत कहने सुनने में ऐसे 00:31:24 निंदा हो जाती है. 00:31:28 अच्छा फिर कभी-कभी हम यह भी कह देते हैं भाई सत्य है इसमें निंदा क्या है तो सत्य है हम 00:31:33 कह रहे हैं पर संत कहते हैं संतों की रहनी संतों की कहनी कुछ और है संत क रे भलो 00:31:45 बरो संसार तेरे भावे जो करे भलो बरो 00:31:56 संसार. 00:31:57 नारायण तू बैठ के अपनो भवन 00:32:06 बुहा अरे निर्णय करने वाला न्याय करने वाला कोई बैठा है जा की जैसी भावना ऐ सोही फल 00:32:17 दे और फिर ध्रुव दस जी तो बहुत सावधान करते हैं पर निंदा के किए ते आवत कछु नहीं हाथ 00:32:17 . 00:32:27 ये ये ये पंक्ति सदा स्मरण रखनी चाहिए क मूर्ख पर्वत पाप को ले चलो अपने 00:32:36 साथ भगवान ने भी नवदा भक्ति का उपदेश करते हुए बात कही है सुपने नहीं देख पर दूष निंदा के 00:32:44 मूल में क्या है निंदा के मूल में प्रदोष दर्शन ही तो है तभी तो आप निंदा कर रहे हो 00:32:51 निंदा के मूल में क्या है प्रदोष दर्शन है भगवान ने सीधी निंदा की बात ना कह के मूल काटने 00:32:56 की बात कही है. 00:32:57 इसका मूलो छेद किया जाए पर दोष दर्शन हुही 00:33:04 नहीं करनी हो तो अपनी निंदा करो चार लोगों में बैठक अपनी निंदा 00:33:12 करो निंदा ही करनी है तो अपनी निंदा करो संत संत अपनी बात कहकर सुनाता है मौसम कौन कुटिल खल 00:33:21 कामी कहे जा रहे हैं सूरदास जी हो सब पति तन को राजा सूरदास कह रहे हो सब. 00:33:27 पति तन को राजा क को कर सके बराबरी मेरी बो पाप में मेरी बराबरी कौन कर सकता है सामर्थ 00:33:35 हो तो फिर ऐसी अपनी निंदा करो अपना दोष 00:33:43 बखान पर पर निंदा के किए ते आवत कछु नहीं हाथ और यहां तो गोस्वामी जी कह भाई इसके जैसा 00:33:50 पर निंदा सम अघन गरीसा इसके समान कोई भारी पाप नहीं है. 00:33:59 कितना पुरुषार्थ करके परिश्रम करके कितनी मेहनत करके आप भजन साधन करते हो थोड़ी देर किसी की निंदा की जो 00:34:07 किया था सब सब गांठ का धन गवा दिया और केवल गांठ का धन ही नहीं गवाया क मूर्ख पर्वत 00:34:15 पाप को ले चलो अपने 00:34:20 साथ निंदा करना कि जीभ से किसी का मल साफ करना है जीभ से. 00:34:27 से निंदा करते हो ना ऐसा ऐसा निंदनीय है ये कैसा गणित है ये क पर निंदा सम अघन गरीसा 00:34:36 और फिर आगे तो गोस्वामी जी ने कहा है क्या गति होती है उसकी सबके निंदा जे जड़ करही ते 00:34:50 चमगादर होई अवतर सबकी निंदा करने वाला. 00:34:57 बो चमगादड़ होकर आता है गोस्वामी जी कह रहे हैं अ वो तो त्रिकालदर्शी महापुरुष है ठीक ही कह रहे 00:35:05 होंगे य जो मूर्ख मनुष्य सबकी निंदा करते हैं चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं चमगादड़ माने जिसके हिस्से अंधकार ही 00:35:14 अंधकार आता है अंधकार ही 00:35:22 अंधकार एक और बात है भाई होता क्या है फिर. 00:35:26 ऐसे कहते सुनते यह वृत्ति हमारा अभ्यास बन जाती है फिर वही बात स्वभाव में आ जाती है जो बात 00:35:35 स्वभाव में आए उससे छुटकारा पाना लगभग लगभग असंभव हो जाता है बहुत कठिन तो है ही जो बात स्वभाव 00:35:42 में आ जाए इसलिए मैंने कहा थोड़ा सा भी अपना दोष देखो दौड़ कर जाओ प्रभु से प्रार्थना करो दो 00:35:51 माला करो नाम जप करो नाम की ओट लीजिए. 00:35:56 प्रभु मैं अपनी संभाल नहीं कर पा रहा हूं मैं अपने बल अपनी शक्ति से इस दोष को दूर नहीं 00:36:01 कर पा रहा हूं आप कृपा करो और मैं वाणी को विराम देने से पहले फिर आपसे कह रहा हूं 00:36:05 अपना अनुभव आपसे बांट रहा हूं आप सच्चे हृदय से प्रार्थना करोगे प्रभु तुरंत स्वीकार करते हैं कोई ना कोई 00:36:12 मानक बनेगा कोई ना कोई घटना घटेगी या तो भीतर घटेगी या बाहर घटेगी कि आपको आपको उस वृत्ति से 00:36:20 आपको उस दूषित वृत्ति से प्रभु बाहर निकालेंगे.

कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji |

कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji | 

First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given

1. हरि भक्ति की संजीवनी और सत्संग की महिमा The Life-Giving Power of Hari Bhakti and Satsang 2. भवसागर पार करने का एकमात्र उपाय: हरि भजन The Only Way to Cross the Ocean of Worldly Existence: Hari Bhajan https://www.youtube.com/watch?v=azHpbv6BXgg [00:18] श्रद्धा की औषधि: गुरु द्वारा दी गई हरि भक्ति की संजीवनी जड़ी को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए। The Medicine of Faith: The life-giving herb of Hari Bhakti given by the Guru should be received with complete faith and trust. [01:23] मन की निर्मलता: करोड़ों यत्न करने के बाद भी मन तब तक निर्मल नहीं होता जब तक प्रभु की कृपा और सच्चे संत का मार्गदर्शन न मिले। Purity of the Mind: Even after making millions of efforts, the mind does not become pure until one receives the grace of the Lord and the guidance of a true saint. [02:49] भजन का महत्व: अम्बरीष जी स्पष्ट करते हैं कि बिना हरि के भजन के जीवन के क्लेश और कष्ट कभी समाप्त नहीं हो सकते। The Importance of Bhajan: Ambrish Ji clearly explains that the troubles and sufferings of life can never come to an end without Hari Bhajan. [06:26] राम कथा और मर्यादा: डोंगरे जी महाराज का प्रसंग सुनाते हुए वे कहते हैं कि कृष्ण कथा का अधिकारी बनने के लिए पहले राम कथा के संयम और मर्यादा को अपनाना आवश्यक है। Ram Katha and Discipline: While narrating an incident involving Dongre Ji Maharaj, he explains that to become qualified to hear Krishna Katha, one must first adopt the restraint and discipline taught through Ram Katha. [12:49] असंभव को संभव: कागभुशुण्डि जी कहते हैं कि जल मथने से घी निकलना या बालू से तेल निकलना भले ही संभव हो जाए, पर हरि भजन के बिना भवसागर पार करना असंभव है। Making the Impossible Possible: Kakbhushundi Ji says that churning water to produce ghee or extracting oil from sand may somehow become possible, but crossing the ocean of worldly existence without Hari Bhajan is impossible. [16:47] भक्त का दैन्य भाव: भगवान का सच्चा भक्त अत्यंत विनम्र होता है। कागभुशुण्डि जी स्वयं को 'अधम पक्षी' कहकर अपनी विनम्रता और प्रभु की असीम कृपा को दर्शाते हैं। The Humility of a Devotee: A true devotee of God is extremely humble. Kakbhushundi Ji calls himself an 'inferior bird,' expressing his humility and acknowledging the Lord's infinite grace. [25:05] सत्संग की महिमा: शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि सत्संग के समान जगत में दूसरा कोई लाभ नहीं है, और यह केवल हरि की कृपा से ही सुलभ होता है। The Glory of Satsang: Lord Shiva tells Mother Parvati that there is no greater benefit in the world than Satsang, and it is accessible only through the grace of Hari. [32:04] गुरु के प्रति कृतज्ञता: गरुड़ जी कागभुशुण्डि जी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वे उनका ऋण कभी नहीं चुका सकते, बस उनके चरणों में बार-बार प्रणाम कर सकते हैं। Gratitude Toward the Guru: Garuda Ji expresses his gratitude toward Kakbhushundi Ji, saying that he can never repay his debt to him and can only repeatedly offer obeisances at his feet. https://www.youtube.com/watch?v=azHpbv6BXgg -----

Full Transcript


कुछ भी हो सकता है, पर बिना हरि भजन सुख नहीं !! || 43|| Shree Hita Ambrish Ji |  00:00:00 रघुपति भगति सजीवन 00:00:07 मूरी अनु पान श्रद्धा मति पूरी आइए श्री रघुनाथ जी की भक्ति यही संजीवनी जड़ी है जो गुरु ने दी 00:00:18 है श्रद्धा के साथ इसका पान करना है य औषधि श्रद्धा के साथ लेनी है मैं तो कई बार आपको 00:00:28 कहता हूं भाई प्रभु की हमसे मिलने की इच्छा नहीं होती तो हमारे जीवन में मानक बनता ही कैसे हम 00:00:36 कोई ऐसे भारी पुण्य आत्मा है जो अपने पुण्य के बल से यहां पहुंच गए कोई है जो यहां तक 00:00:45 लाया है और जो यहां तक लाया है जोर से बोलो वो आगे भी लेकर जाएगा क्योंकि वो पूर्ण है 00:00:57 जो भी कार्य करता है पूर्ण ही करता है 00:01:03 जो गुरु ने व जो हरि भक्ति की संजीवनी जड़ी दी है गुरु के वचन पर विश्वास करके श्रद्धा सहित 00:01:11 नित्य निरंतर उस औषधि का पान करना है यही विधि भले सो रोग न 00:01:23 साही नात जतन कोटि नहीं जा कह रहे गरु सावधान क्योंकि आप बड़े ज्ञानी है आप आप समर्थ है आप 00:01:37 भगवान के पार्षद है पर फिर भी ध्यान रखिए क ही विधि भले ही सरोग न साई ऐसे तो भले 00:01:46 यह रोग नष्ट हो जाए बोले नहीं तो जतन कोटि नहीं नहीं तो कोटि जत्न करने से भी मन स्वस्थ 00:01:54 नहीं होता मन निर्मल नहीं होता नहीं होता इसलिए तो कहते भाई यह गुण साधन ते नहीं हुई क श 00:02:06 श्री रघुनाथ जी की कृपा हो कोई सच्चा संत मिल जाए और फिर सच्चा संत भी मिले और उसके वचन 00:02:11 में विश्वास भी हो जाए श्रद्धा भी हो जाए तभी नारद जी भक्ति सूत्र में कह रहे मत संगस तु 00:02:18 दुर्लभ हो फिर कह र अगम्य अमोग कहने से पहले यह दो बातें कही है पहले तो दुर्लभ है मिलेगा 00:02:26 ही नहीं अग मिल भी जाए तो व्यक्ति अपनी ता से अपनी मूर्ता से संत को पहचानता नहीं है संत 00:02:34 मिल भी जाए तो उसके वचन में श्रद्धा नहीं होती विश्वास नहीं 00:02:40 होता हम तो भाई देखो कहीं से भी आरंभ करें आपको बात तो एक ही बताएंगे बिन हरि भजन न 00:02:49 जाही 00:02:52 कलेसा बिन हरि 00:02:58 भजन 00:03:03 और फिर अंत में क्योंकि अब चर्चा को विश्राम की ओर ले जाना है फिर कागस जी अंत में कह 00:03:12 रहे हैं सब करमत खग नायक यहा आरंभ में क्या कहा था निज अनुभव अब कह खगे सा हरि भजन 00:03:31 न जाही कले हा हा गाओ गाओ बिन हरि 00:03:44 भजन बस रोज अपने मन को भी सुनाते रहना यह बात रोज आप अपने मन को भी सुनाते रहना कि 00:03:52 बिन हरि भजन न जाही कलेसा आरंभ में यह कहा था और फिर अब क्या कह रहे हैं सब कमत 00:04:02 खग नायक 00:04:06 यहा करय राम पद पंकज नेहा करि राम पद पंकज श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहा श्रुति पुराण 00:04:35 सब रघुपति भगति बिना सुख 00:04:43 नाही 00:04:48 भ ये दो चौपाई याद कर लो निज अनुभव अब कह खगे सा 00:05:06 बिन हरि भजन न जाही 00:05:12 कलेसा 00:05:18 ह श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहा 00:05:28 हीरा 00:05:32 बहारी रघुपति भगति बिना सुख नाही 00:05:46 ख राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:05:59 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजाराम राम राम जय 00:06:13 सीताराम राम राम जयीता राम राम जय राजा राम राम राम जय सीता राम एक 00:06:26 बार प्रात स्मरणीय श्री डोंगरे जी महाराज बंबई कथा कहने के लिए गए श्रीमद् भागवत की कथा होनी थी पांडाल 00:06:37 में पहुंचे व्यासपीठ पर विराजमान 00:06:42 हुए और ऐसा विशुद्ध संत शताब्दियों में कभी एक बार आता है इस धरा धाम को पवित्र करने के लिए 00:06:51 और उने राम कथा आरंभ कर दी अब जो यजमान थे उन्होंने स कथा के बाद पूछा कथा तो भागवत 00:07:05 जी की होनी थी आपने राम कथा आरंभ कर दी उन्होने उत्तर दिया कि भागवत में अगली बार कहूंगा यहां 00:07:18 के जन समूह को देखकर मुझे लगा पहले इनको राम कथा सुननी चाहिए फिर मैं आकर इनको कृष्ण कथा सुनाऊ 00:07:26 श्रीमद् भागवत में भी कृष्ण के पावन चरित्र से पहले श्री रघुनाथ जी का चरित्र 00:07:35 है जब तक जब तक ऐसी मर्यादा ऐसा संयम ऐसा आचरण ना हो तब तक जीव कृष्ण कथा का अधिकारी 00:07:47 नहीं है दुख होता है कभी मैं देखता हूं कल ही मुझे कौन दिखा रहा था किसी विश्व प्रसिद्ध संस्था 00:07:59 का एक सन्यासी जो अपने आप को वैष्णव कहते हैं मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता यहां से विश्व 00:08:08 प्रसिद्ध वह संस्था है और उसका एक सन्यासी और जब व श्री कृष्ण और गोपियों की बात कर रहा है 00:08:16 तो क्या उदाहरण दे रहा है गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड यही वो लोगों को सिखा रहा है लोग भी बैठकर ताली 00:08:23 पीट रहे हैं इसलिए इसलिए कहा है कि भाई अधिकारी से बात ना करें अनाधिकार स चर्चा ना करें श्रीमद् 00:08:36 भागवत के प्रत्येक अध्याय के विश्राम के समय लिखा य परम हंसों की संगिता है यह तो परम हंसों का 00:08:45 चिंतनीय विषय है जो अमला अपमा जन है व वो पुनः पुनः इस पावन चरित्र का चिंतन करते हैं और 00:08:51 मैं देख रहा हूं माथे पर वैष्णव तिलक है गले में तुलसी की कंठी है विश्व प्रसिद्ध वो संस्था उसका 00:08:57 वो सन्यासी और देखा मैंने बड़ा प्रसिद्ध भी है और जब श्री कृष्ण और गोपियों की बात कर रहा है 00:09:03 तो यह उदाहरण दे रहा है यह 00:09:10 उदाहरण तो मुझे बड़ा दुख हुआ मुझे बड़ी पीड़ा हुई और फिर धीरे धीरे संतों का सिद्धांत हृदयम हो रहा 00:09:20 है देखो भाई राम कथा हो या कृष्ण कथा है तो हरि की कथा ना मन को निर्मल पावन करने 00:09:28 वाली पर अनेक अनेक सिद्धांत श्री राम कथा में ऐसे हैं जो हमारी भक्ति की भाव की जो भूमिका है 00:09:39 उसको सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है परम आवश्यक है और फिर आज तो जैसा अब भाई समय की गति 00:09:47 है जैसा हो रहा है अब तो मैं तो बहुत स संकोच बोलता हूं कि भाई क्या कहना चाहिए क्या 00:09:55 नहीं कहना चाहिए क्यों क्योंकि हमको संत सावधान कर चुके हैं कि अधिकारी से बात करे तो रस आप जाए 00:10:02 अंतर परे निसंदेह कल से यहां श्रीमद् भागवत की चर्चा आरंभ होगी और मैंने कहा यह परम हंसों की संगीता 00:10:13 है केवल आचार्यों की गुरुजनों की कृपा का बल लेकर 00:10:20 ही हम इस पावन अनुष्ठान में प्रवेश कर सकते 00:10:27 हैं मैं तो फिर भी सब सब विचार कर अंत में अंत में धन्यवाद देता हूं प्रभु का कि उसके 00:10:34 गुण उपकार का पा सकू नहीं पा य श्री काग बसु जी ने कहा ना कि श्री रघुनाथ जी की 00:10:43 कृपा और संयोग बन जाए ऐसे यहां हम पर लाड़ली लाल की कृपा हुई और यह संयोग बन गया है 00:10:51 य संयोग बन 00:10:55 गया राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम 00:11:07 राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम राम राम जय राजा राम राम राम जय सीताराम हरे रामा रामा 00:11:19 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:11:33 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:11:47 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:12:01 राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा 00:12:14 राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम हरे रामा रामा राम सीता राम राम 00:12:28 राम रामा रामा राम सीता राम राम राम बारी मथे गृत हो बरु सताते 00:12:49 बरते श काग ब सुंडी जी कह रहे बोले जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए जो 00:12:59 किसी भी काल में असंभव है क भले ऐसा हो जाए बारी मथे गृत 00:13:12 होई और कह बालू को पेरने से भले तेल कोई निकाल ले यह तो हो सकता है हो सकता है 00:13:21 कासुंडी कह र भले यह हो जाए 00:13:26 पर बारी मथे त होई ब सताते 00:13:38 रुते बिन हरि भजन न भव तरिए यह सिद्धांत अपे यह सिद्धांत कले बर्फ से अग्नि प्रकट हो जाए ये 00:13:57 सब अनहोनी बातें हो जाए हो जाए शी श्री राम जी से विमुख होकर कोई सुखी नहीं हो सकता बिन 00:14:05 हरि भजन ना भव तरिए यह सिद्धांत 00:14:12 अपे मस कहीं करई रंच प्रभु अजही म सकते 00:14:23 ही और सावधान कर रहे गरुड़ जी को क्योंकि गरुड़ जी जाएंगे शुभकामना दे रहे हैं बड़ी विनम्रता पूर्वक गणु 00:14:34 जी ध्यान 00:14:38 रखिए य जो प्रभु है क मस कही कर रंच प्रभु मसक माने मच्छर बोले प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर 00:14:51 दे और ब्रह्मा को नहीं ब्रह्मा को मच्छर 00:14:58 नहीं 00:15:02 तुलसी बाबा तो तुलसी बाबा है कर मस कही करई बिरंचि प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर दे और ब्रह्मा को 00:15:10 अजही मसक ते हीन और बोले उसको मच्छर से भी हीन कर सकते हैं एक क्षण में अस विचार तज 00:15:20 संशय कह रहे दोबारा ऐसा संशय ना करना प्रभु को नाग पाश में बंदे देखकर ही तो आपको मोह हुआ 00:15:27 था अरे वो करतु करतु मन्य था तु कुछ भी कर सकते हैं भाई इसलिए जो भी हो रहा हो 00:15:33 उसको देखकर तेरी माया का ना पाया कोई पार के लीला तेरी तू ही जाने तेरी माया का ना पाया 00:15:55 कोई पर भाई प्रभु कृपा करते हैं जब किसी को अपने ऐसे स्वरूप का अनुभव कराते हैं सोई जाने ही 00:16:05 देहु जनाई सोही जाने जो प्रभु की कृपा से प्रभु को जानता है और जिसको प्रभु समझाना चाहते हैं इसको 00:16:17 दिखाते हैं प्रभु अपना निज स्वरूप अपना विशुद्ध स्वरूप का बसु जी बड़भागी है इसलिए कह रहे कि हे गरुड़ 00:16:26 जी सचा तज 00:16:32 संशय राम ही भज 00:16:37 प्रवी राम ही भज और अंत में श्री काग ब सुंडी जी ने अपने लिए जो कहा है व यह 00:16:47 बताता है कि भगवान की भक्ति कैसा दैन्य प्रसाद स्वरूप देती है भगवान का भक्त कितना दीन कितना विनम्र होता 00:16:55 है आप देखिए हमने चर्चा आरंभ की थी कहां से कि महादेव 00:17:05 देवादित्य में क्या कहते हैं देख गरुड़ निज हृदय 00:17:15 विचारी मैं रघुवीर भजन अधिकारी रे गरुड़ जी आप अपने मन में विचार करके देखिए कि क्या मैं किसी भी 00:17:30 प्रकार से भगवान के भजन का अधिकारी हूं सकुना धम अरे पहले तो पक्षी हूं और पक्षियों में भी पक्षियों 00:17:42 में भी अधम हूं सकुना 00:17:57 धम 00:18:03 सखु ना धम सब भाति 00:18:10 अवन प्रभु मोहि की विदित 00:18:27 जग सकुना धम सब भाति 00:18:38 अवन प्रभु मोहि की विदित जग पा देखो एक तो मैं अधम पक्षी सब भाति अपवित्र और देखो कैसे प्रभु 00:18:51 ने मुझे जगत को पावन करने वाला प्रसिद्ध कर दिया महादेव मेरी स्तुति करते हैं आप कहते हैं और मैं 00:19:00 मन में यह विचार करता हूं कि किसी भी प्रकार से क्या मैं किसी भी प्रकार से श्री रघुनाथ जी 00:19:07 के भजन का अधिकारी हूं अ आप ही विचार करिए देख गरुड़ निज हृदय बचारी का बुी जी के शब्द 00:19:18 बता रहे भगवान का भक्त कैसा होता है कैसा भक्त का हृदय होता है कैसे भक्त सदा प्रभु के निकट 00:19:27 रहते हैं 00:19:34 बड़ा ना जाने पाए हैं साहिब के 00:19:44 दरबार द्वारे ही पे लागी है सहजो मोटी मा यही तो कल मैं आपको कह रहा था भाई संत मिले 00:20:00 जिसमें संत 00:20:05 हो भगवान का भक्त जिसको भगवत सत्ता की अनुभूति है जो अनुभव प्राप्त है व तो भाई किसी भी प्रकार 00:20:13 से कोई श्रेय कोई प्रतिष्ठा कोई सम्मान स्वीकार नहीं कर सकता है कर ही नहीं सकता 00:20:22 है आप देखो गरुड़ जी कौन है भगवान के पार्षद उनको मोह उनके मोह को दूर काग बु सुंडी ने 00:20:30 किया है कैसी सामर्थ्य श्री काग बु सुंडी जी की मैं कई बार विचार करता हूं जब श्री विठल दास 00:20:37 जी ने एक विषय राजा को अपने रोम रोम में वृंदावन का दर्शन करवा दिया दर्शन करा 00:20:47 दिया और जब राजा ने कहा कि मैं आपके शरणागत हूं तो श्री विठ्ठल दास क्या कहते हैं कि मेरे 00:20:57 गुरुदेव विराजमान ने शरण ग्रहण करनी हो तो उन्हीं की ग्रहण करिए आप देखो विठ्ठल दास जी समर्थ है तभी 00:21:03 तो उस राजा को दर्शन करा दिया जो वस्तु का दर्शन करा रहा है साधिकारथा होगी और उनके हृदय का 00:21:12] ैन्य देखिए कि हम तो उनके उनके चरणों के सेवक हैं आपको शरण ग्रहण करनी है तो फिर हमारे स्वामी 00:21:21 की ग्रहण करिए गरुड़ जी के मोह का नाश श्री काग बसु जी ने अपनी वाणी से किया है गुरु 00:21:29 की सामर्थ्य है इसीलिए इसीलिए पहले ही श्री गरुड़ जी ने कागी जी को गुरु के स्थान पर बैठा दिया 00:21:35 और बड़ी विनम्रता पूर्वक य सब प्रश्न पूछा है शास्त्र का विधान तो यही कहता है बिना गुरु बुद्धि के 00:21:41 प्रश्न नहीं करना चाहिए आपको स्मरण हो तो मैंने गत सत्र में निवेदन किया था पहले पहले गरुड़ जी श्रोता 00:21:50 बन के कथा सुनते रहे पर फिर फिर उन्होने श्री काग बसु जी को गरुड़ गुरु के स्थान पर बैठाया 00:21:58 स्वयं शिष्य के स्थान पर बैठे तो काग बुजी जी गुरु है और किसके गुरु गरुड़ जी के गुरु हो 00:22:03 गए काग बुजी उनके उनके मोह का नाश कर दिया अपने शब्द से अपनी वाणी से य तो गुरु का 00:22:10 ही लक्षण है ना महा मोह तम पुंज जहा सु वचन रवि कर बंद गुरु पद कंज और कृपा सिंधु 00:22:18 नर रूप हरि और व काग बसु अब कथा विश्राम हुई है अब यह संवाद विश्राम की ओर जा रहा 00:22:27 है 00:22:30 राई के दाने जितना भी श्रे लेने को तैयार नहीं है गरुड़ जी बारबार प्रणाम कर रहे हैं और वह 00:22:35 कह रहे हैं देख गरुड़ निज हृदय विचारी मैं रघुवीर भजन अधिका सकुना धम सब भाति अवर प्रभु मोही की 00:23:01 विदित जग पा और इससे पहले गरुड़ जी कुछ कहते कासुंडी जी ने दोनों हाथ जोड़ लिए भाई कथा तो 00:23:09 पूरी हो गई अपने आसन से उतर आए हैं आज धन्य में धन्य अति जदपि सब विधि हीन निज जन 00:23:22 जानी राम मोही संत समा 00:23:31 संत समागम यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन हू और एक और बात जिनका मन लीन है हरि भक्ति में 00:23:46 लीन है उनके लिए श्री सेवक जी महाराज कह रहे हरिवंश नाम लीन जे अजात शत्रु ते सदा प्रपंच दंभ 00:23:54 आदि द तहा कछु न पखी ये सब बातें तो हम लोग भी कभी कभी कहते हैं पर हम लोगों 00:24:01 का कहना दंब मात्र है जब भक्त कह रहा है तो वैसा ही अनुभव कर रहा है व वैसा ही 00:24:08 अनुभव कर रहा है तभी कह रहा है संत वही तो है ना जिसकी जिसकी कथनी करनी एक हो मनस्य 00:24:15 एकम वस्य एकम कर्मण्य एकम स साधु जिसकी कथनी करनी एक हो वही तो साधु है इनकी कथनी करनी एक 00:24:24 है वो कह रहे हैं यद मैं सब विधि जद सब विधि हीन निज जन जानी राम मोही संत समागम 00:24:41 दी संत समागम य तो प्रभु ने केवल मुझ पर कृपा की है मुझे अपना जन जान के सत्संग दिया 00:24:51 है संत समागम दीन आगे महादेव कहेंगे गिरिजा संत समा समना लाभ 00:25:05 कछुआ संतो की कृपा से गुरु कृपा से मन अनुभव करता है मैं अपनी बात कहूं मन अनुभव करता है 00:25:14 कि गिरिजा संत समागम समन लाभ कचुवा पर क्या करू मेरे पास वैसी वाणी वैसे शब्द नहीं है जो मैं 00:25:20 आपको बता सकू समझा सकू कैसा लाभ है य कैसा सुख है संत मिलन सम सुख जग नाही जन्म जन्म 00:25:29 का अनादि काल से भटकता हुआ जीव सदमा पर आ जाता है यह यह सत्संग का फल है तभी ध्रुव 00:25:38 दस जी ने कहा मोल तोल सब फिर गयो और पायो नाम फुलेल कहान होई सत्संग देखो तिल और तेल 00:25:47 कहा जन्म जन्म से भटक भटक रहे थे हम संत मिला सद मार्ग मिल गया मोल तोल सब बदल जाता 00:25:57 है किसकी महिमा है सत्संग की महिमा है गिरिजा संत समागम समना लाभ 00:26:11 कछुवा बिन हरि कृपा ना होई सो गाव ही वेद पुराण गाव ही वेद पुराण शिव अज पूज्य चरण 00:26:35 रघुराई मो पर कृपा परम मृदु लाई अस सुभव कह सुन ना देख केही खगे रघुपति समले कैसी अपने इष्ट 00:26:57 के प्रति भावना हो ऐसा दर्शन य तुलसी बाबा करा रहे हैं जिन श्री रघुनाथ जी के चरण शिवजी और 00:27:04 ब्रह्मा जी के द्वारा पूज्य हैं उनकी मुझ पर ऐसी ऐसी कोमल करुणा है ऐसी कृपा है कह रहे हे 00:27:13 गरुड़ जी मेरे श्री रघुनाथ जी जैसा स्वभाव ना तो मैंने कभी देखा है और ना मैंने कभी सुना है 00:27:23 सुन भूसुंडी के वचन शुभ देख राम पद ने बोले प्रेम सहित गिरा गरुड़ विगत 00:27:42 संदे तब गरुड़ जी बोले श कासुंडी जी का व दिव्य प्रेम वैभव देखकर प्रेम का भी तो अपना एक 00:27:50 वैभव होता है वो प्रेम वैभव देखकर श्री गरुड़ जी बोले मैं कृत कृत्य य तब बानी सुन रघुवीर भगति 00:28:05 रस सानी राम चरण नूतन रती भई माया जनित विपत सब गई य मेरी नवीन प्रीति हो गई है प्रभु 00:28:22 के चरणों में तो इसी कारण जो नित्य बना रहता है ना सत्संग में उसका प्रेम उसका अनुराग उसका भाव 00:28:32 भी नित्य नवाय मान रहता है एक बार मुझसे किसी ने पूछा था बोले वही तो कथा है मैंने क 00:28:42 गैया वही दूध तो देती है रोज देखने में एक जैसा ही होता है स्वाद भी एक जैसा है और 00:28:48 उसका नित्य पान करने से पोषण तो नित्य नवीन प्राप्त होता है ऐसे ही भगवान की कथा है ऐसे ही 00:28:54 भगवत चरित्र है पर जब कोई प्रणाम करता है त आशीर्वाद देना चाहिए गरुड़ जी ने प्रणाम किया है कागस 00:29:06 आशीर्वाद भी देते हैं तो देखो कैसे भगवान का भक्त कैसा है कैसी उसकी चेष्टा है कैसे उसका कैसा उसका 00:29:15 एक एक आचरण 00:29:21 है जा सु नाम भव भेषज हरण 00:29:31 यस जिनका नाम जन्म मरण रूपी रोग की औषध और आदि दैविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की भयंकर 00:29:42 पीड़ा और ताप को हरने वाला है कासुंडी आशीर्वाद दे रहे हैं गरुड़ जी प्रणाम कर रहे हैं और व 00:29:51 व्यासपीठ पर भी बैठे हैं पर कैसे दे रहे हैं आशीर्वाद ज सु नाम भव भे सज हरण घोर त्रय 00:30:03 सूल सो कृपाल मोहितो पर सदा रह अनुकूल सदा रह अनुक वो श्री रघुनाथ जी पहले तो मुझ पर मैं 00:30:22 दीन हीन हूं मैं कृपा पात्र हूं पहले मुझ पर और फिर आप पर भी सदा अनुकूल रहे हैं ऐसा 00:30:29 आशीर्वाद काग ब सुंडी दे रहे मुझे मुझे इतना आनंद हुआ जब ये पंक्ति मैंने पढ़ी कि काग बसु आशीर्वाद 00:30:37 देरहे पर कैसे बोले श्री रघुनाथ जी पहले तो मुझ पर अनुकूल हो और फिर आप पर अनुकूल रहे 00:30:48 हैं मुझसे कोई पूछे कि एक शब्द बताइए इस मानस का सार क्या है एक शब्द तो जैसे श्री गोसाई 00:30:57 विट्ठलनाथ जी कहते ना हे गोकुलेश आपकी कृपा का हेतु एक मात्र दैन्य है वो दैन्य इस मानस का सार 00:31:04 है अंतिम बात मेरे तुलसी बाबा यही कह रहे हैं मोसम दीन न दीन हित तुम समान 00:31:18 रघुवीर अस विचार रघुवंश मणि हर भ 00:31:37 भीर फिर गरु जी अंत में कह रहे हैं मो पही होईना प्रति 00:31:56 उपकाराची प्रति उपकार करो का तोरा मैं आपका ऋण तो नहीं चुका सकता सदा सदा आपका आपका ऋणी हूं बस 00:32:04 बंदे तब पद 12 ही बारा बस बार बार बार बार बार बार आपके चरणों में प्रणाम करता हूं यही 00:32:13 मैं आपको सदा कहता हूं भाई गुरु को बस ऐसे भाव से प्रणाम ही तो किया जा सकता है और 00:32:17 क्या ही निवेदन करेंगे 00:32:22 उसको जिसने मन को स्वस्थ किया है जिसने दुरंत मोह का भंजन किया है जिसने इस जीवन को प्रभु के 00:32:32 योग्य बनाया है जिसकी कृपा से प्रभु अनुकूल हुए हैं उसको क्या निवेदन किया जाएगा इन संतों का इन भक्तों 00:32:41 का इन भागव तों का आचरण आपको मुझे बता रहा है कह रहे गरुड़ जी मो पही होई ना प्रति 00:32:55 उपकाप बारही 00:33:01 इसलिए श्री हरदास जी कहते हैं कहे कथा और अर्थ 00:33:11 विचारे आप तरे औरन को 00:33:25 तारे कहर मिले 00:33:40 हरिदासा जनम जनम की पूरी 00:33:54 आशा क्या कहकर गरुड़ जी विदा ले जीवन जन्म सुफल मम 00:34:07 भय सफल मम भय तब प्रसाद सब संशय गय जाने ह सदा मोहि निज किंक पुनि पुनी उमा 00:34:31 महादेव मां भवानी से कह रहे हैं यह कहकर गरुड़ जी प्रस्थान किए हैं हे नाथ मैं आपका ऋण तो 00:34:40 नहीं चुका सकता प्रति उपकार तो नहीं कर सकता बस इतना ही आपको निवेदन करके प्रस्थान करता हूं कि आप 00:34:50 सदा सदा के लिए मुझे अपना सेवक जानिए देखो जो नारायण के पर् वो नारायण स्वरूपी होते हैं जो भगवत 00:35:01 पार्षद है वो भगवत स्वरूपी हैं गरुड़ जी भगवत पार्षद 00:35:10 है यहां इस लीला के माध्यम से अंतिम सिद्धांत भगवान क्या प्रतिष्ठित कर रहे हैं राम ते अधिक राम करि 00:35:24 दासा राम ते अधिक राम करि दासा दासु चरण सिर नाय कर प्रेम सहित मति धीर गय गरुड़ बैकुंठ तब 00:35:43 हृदय राख रघुवीर महादेव कह रहे भाई इसके बाद गरुड़ जी बैकुंठ को गए और मां भवानी ने कहा हमसे 00:35:53 भी आप कुछ कह दीजिए काग बुस जी ने कथा के अंत में एक सिद्धांत कहा ना कि बिन हरि 00:36:01 भजन न भव तरी यह सिद्धांत अपेल आपने भी हमको कथा सुनाई है आप भी अंत में हमको कोई एक 00:36:06 बात कह दीजिए महादेव मुस्कुराकर क्या बात कह रहे हैं गिरिजा संत समागम समना लाभ कछु आन बिन हरि कृपा 00:36:22 ना होई सो गाव ही वे पुराण गाव ही वेद पुराण कहा कि हे गिरजे संत समागम के समान कोई 00:36:39 दूसरा लाभ नहीं है प्रभु जब अनुकूल होते हैं विशुद्ध कृपा भगवान की होती है तब कोई ऐसा संत मिलता 00:36:48 है तब ऐसा कोई संयोग बनता है सार की बात एक बार पुनः आपको निवेदन करूं भु सुंडी जी सावधान 00:36:58 करते हुए कह रहे भाई ये मानस रोग अनेक अनेक अनेक प्रकार की औषधियां युक्तियां करने पर भी समूल नष्ट 00:37:05 नहीं होते और कह रहे बड़े-बड़े मुनियों के मन में फिर विषय सुख और उसकी संभावना अंकुरित हो जाती है 00:37:14 तो बेचारा मनुष्य क्या है मनुष्य की गिनती किसम है यह शब्द तुलसी बाबा ने प्रयोग किया का नर बापुरे 00:37:22 बेचारा मनुष्य क्या करेगा जो बड़े-बड़े धीर मती मुनि है तपस्वी है उनके मन में भी विषय सुख की कामना 00:37:32 अंकुरित हो जाती 00:37:36 है तो जब गरुड़ जी थोड़े निराश हुए भाई फिर करें क्या बोले राम की कृपा हो राम कृपा से 00:37:43 बोले संयोग बन जाए सदगुरु बैद वचन 00:37:50 विश्वासा गुरु के पहले तो गुरु मिल जाए और फिर गुरु के वचन पर विश्वास हो जाए तब ये तब 00:38:00 रोग नष्ट होता है और एक और बात कही है भूलना नहीं इस विधि भले हो जाए तो हो जाए 00:38:07 जैसे श्री नाभादास जी महाराज जब श्री महाप्रभु जी का परिचय देते हैं तो क व्यास सुवन पथ अनुसरे सोई 00:38:15 भले पहचान ये जो भले कहा है ना माने इस पथ पर चलने वाला तो भले पहचान ले तो पहचान 00:38:21 ले ऐसे अंत में कह रहे हैं बोले हरि की कृपा से भले येय मन निर्मल हो जाए तो हो 00:38:27 जाए भले अन्यथा अन्यथा तो कोई साधन नहीं है कोई युक्ति नहीं ये मन हो निर्मल तुम्हारी कृपा से इसे 00:38:43 शुद्ध करने में हम तोहे हारे अगर नाथ 00:38:56 देखो 00:39:14 माए तो हम कैसे भव से लगेंगे 00:39:23 किनाए ये पावन चरित्र प्रभु की कृपा से प्रभु की प्रेरणा से प्रभु के प्रसाद से कहकर सुनकर हम यहां 00:39:35 प्रभु के चरणों में निवेदन करते हैं ऐसे तो यह भाव जगत की बात है कहने की बात नहीं है 00:39:41 फिर भी मैं कह रहा हूं कि जैसा मैंने आपको कहा था इस जीवन में इस जन्म में इस जीवन 00:39:52 में मेरा पहला परिचय श्री रामचरित मानस जी से हुआ इसलिए मैं प्रथम प्रणाम इन्हीं को निवेदन करता हूं और 00:40:04 जब संतों की कृपा से इस स्थान पर बैठने को मिला तो मैंने सबसे पहली कथा श्री हनुमान जी को 00:40:11 लक्ष्य करके सुनाई थी मेरे जन्म स्थान में हनुमान जी का एक सिद्ध स्थान है वही श्री हनुमान जी को 00:40:19 लक्ष्य करके मैंने भक्त माल की कथा सुनाई थी और तब से लेकर आज के दिन तक इस क्षण तक 00:40:31 उनकी कृपा उनका आशीर्वाद किसी ना किसी प्रकार से मुझे सदा मिलता रहा है ज मैंने यह प्रसंग आरंभ किया 00:40:39 था तो मन ही मन भाव से उनको निवेदन किया था पहली बात तो प्रभु चरित्र सुनि वे को रसिया 00:40:50 राम लखन सीता मन बसिया आपकी कृपा से आप अनुग्रह से ही कोई पवित्र अनुष्ठान सफल होता है यहां काग 00:41:02 बसु जी जैसे वक्ता है यहां महादेव जैसे वक्ता है यहां तुलसी बाबा जैसे वक्ता है वही बात मुझे कहनी 00:41:11 है प्रथम दिन मैंने भाव से उनको निवेदन किया था कि आप आप कृपा करके यहां पर विराजमान रहना आपकी 00:41:19 सन्निधि रहेगी तो हम हम हम कुछ कह सुन पाएंगे यहां कुछ कुछ यहां पर प्राप्त कर पाएंगे ऐसे तो 00:41:26 उनको निमंत्रण दे आवश्यकता नहीं होती जहां मंगल करण कलि मल हरण तुलसी कथा रघुनाथ की जहां यह पावन रघुनाथ 00:41:35 गाथा गाई जाती है वहां वह स्वत आकर विराजमान हो जाते हैं पर बीच में दो बार ऐसा श्री हनुमान 00:41:44 जी महाराज ने मुझे अपनी अपनी उपस्थिति का अनुभव कराया उनकी कृपा से ही मैं जो कह पाया उनकी कृपा 00:41:52 से कह पाया हूं कि यह कहना सुनना जो भी है इसके मूल में केवल केवल केवल आचार्यों की गुरुजनों 00:41:58 की संतों की कृपा है जो भी कहा गया इसमें जो सुंदर है वह भगवान का यश है और जो 00:42:04 त्रुटियां है वो मेरी है यही कहकर आज की चर्चा में लाली लाल जी के चरणों में निवेदन करता हूं 00:42:09 महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हृदयस्पर्शी

गुरु से परे कोई तत्व नहीं है | गुरु तत्त्व क्या है? - 1 /3 Jagadguru Shri Kripalu Ji

First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given

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00:03:00 प्रवचन की शुरुआत हरि नाम संकीर्तन और गुरु तत्व की महिमा का परिचय देकर की गई है। 00:06:44 वेदव्यास जी के कथनानुसार गुरु से परे कोई तत्व नहीं है, जबकि वेदों में परब्रह्म श्री कृष्ण को ही सर्वोत्तम बताया गया है। 00:08:22 उपनिषदों के अनुसार सृष्टि में ब्रह्म, जीव और माया—ये तीन अनादि, अनंत एवं शाश्वत तत्व विद्यमान हैं। 00:12:44 भगवान श्री कृष्ण की माया से मुक्ति केवल उनकी और गुरु की शरणागति एवं कृपा से ही संभव है। 00:14:17 ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप 'आनंद' है और प्रत्येक जीवात्मा उसी आनंद का अंश होने के कारण सदैव केवल सुख की ही खोज करती है। 00:19:36 तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार जब तक जीवात्मा उस परम आनंद (ईश्वर) को प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक उसे वास्तविक सुख नहीं मिल सकता। Https://www.youtube.com/live/pPhHilwAuAE Full Transcript :

00:00:01 के 00:00:05 धरपण मारजनम 00:00:13 भव महा 00:00:17 दावा 00:00:21 अग्नि निर्वापणम 00:00:29 श्रेय कव चंद्रिका वितरणम 00:00:40 विद्या बधु जीवनम 00:00:52 आंदा 00:00:58 बुद्धि वर्धनम प्रतिपदम 00:01:05 पूर्णता 00:01:10 स्वाधनम 00:01:16 सर्वात्मपनम 00:01:20 परम विजयते 00:01:26 श्री कृष्ण संकीर्तनम 00:01:38 नमः कमलना 00:01:54 नमः कमल माने 00:02:05 नमः कमल पाय 00:02:16 नमस्ते कमले क्षण यो ब्रह्माम विधा पूर्वम जो वेदा प्रहणो तस्मै त देवात्म बुद्ध प्रकाशम मुमुक्षुर शरणमह प्रपदे 00:02:42 वृंदारक वृंद बंद आनंद कंद सच्चिदानंद श्री कृष्ण चंद्र चरणारविंद मकरंद मिलिंद महानुभाव थोड़ी देर हरि नाम संकीर्तन कर लीजिए 00:02:57 पश्चात 00:03:00 गुरु तत्व पर कुछ प्रकाश डाला जाएगा भजो गिरधर 00:03:10 गोविंद गोपाला 00:03:21 गोविंद गोपाल 00:03:29 जो गिरधर 00:03:34 गोविंद गोपाला 00:03:45 गोविंद गोपाला 00:03:53 भज 00:03:58 गोविंद गोपाला 00:04:08 गोविंद गोपाल 00:04:16 भजो गिरधर गोविंद गोपाला 00:04:32 गोविंद गोपाल 00:04:39 भज गिरध 00:04:43 गोविंद गोपाला 00:04:53 गोविंद गोपाला 00:04:59 भज गिरिधर 00:05:04 गोविंद गोपाला 00:05:13 गोविंद गोपाला 00:05:19 बोलिए वृषभान नंदिनी राधा रानी की जय 00:05:27 अब आप लोग सावधान हो हो जाए आप लोग इसी आशा से आए होंगे कि गुरु तत्व पर कुछ प्रकाश 00:05:38 डाला जाएगा 00:05:43 किंतु गुरु तत्व पर प्रकाश डालने की सामर्थ्य केवल श्रोतय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष के पास ही है और कोई गुरु तत्व 00:06:01 पर प्रकाश नहीं डाल सकता फिर भी जब आप लोगों की इच्छा है तो हमको सेवा करना है कुछ ऐणा 00:06:12 बहणा जो कुछ होगा आपके सामने प्रस्तुत करेंगे 00:06:20 सबसे बड़ी अथॉरिटी वेदभ्यास है वेद के ज्ञाता 00:06:30 और 4 लाख श्लोक के रचयिता वेदांत के रचयिता गीता के रचयिता 18 पुराण के रचयिता उन वेदव्यास ने कहा 00:06:44 है नास्त तत्वम गुरु परम बड़ा भयानक वाक्य है गुरु से परे कोई तत्व नहीं 00:07:00 अब कोई ऐसे कैसे कह दे कि वेदव्यास भांग पी के ले गए होंगे अरे भगवान के अवतार हैं वेदव्यास 00:07:13 थोड़ा विचार करें इस पर ऐसा क्यों लिखा क्यों इसलिए कि समस्त वेद उपनिषद कहते हैं कि परात पर तो 00:07:24 ब्रह्म है श्री कृष्ण उससे परे और कोई नहीं है देखो वेद कह रहा है कि तीन तत्व हैं संजुक्त 00:07:37 में ततक्षर व्यक्तम भरते विश्व अनीष्यात्मा बते भोक्त भावा ज्ञात्वा देवम मुते सर्वपाश श्वेताकरोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा का यह उपनिषद 00:08:01 है 00:08:04 यह पहले अध्याय का आठवां मंत्र है अर्थात तीन तत्व हैं एक वो एक मैं एक ये वह माने ब्रह्म 00:08:22 भगवान परमात्मा अनेक नाम और मैं माने जीव आत्मा और यह माने माया ये तीन तत्व अनाद अनंत शाश्वत हैं 00:08:40 इन तीनों में किसी ने किसी को बनाया नहीं और कोई किसी का नाश नहीं कर सकता 00:08:49 कहने को तो माया जड़ है लेकिन है अनाध्य अनंत भगवान उसको समाप्त नहीं कर सकते अगर कर सकते होते 00:09:03 तो हम सब लोगों का क्या सौभाग्य होता आनंदमय हो जाते 00:09:11 तो यह तीन तत्व अनादि है इसके आगे फिर कहा श्वेतापनिषद ने ज्ञजा भीष भजा हेका भोक्त भोग्यार्थ युक्त अनंतत्मा 00:09:30 विश्व रूप्ता त्रयं जदा ब्रह्म में तत ये श्वतापनिषद का पहले अध्याय का नौवा मंत्र है इसमें कहा एक ज्ञ 00:09:46 है ज्ञ माने सर्वज्ञ और एक अज्ञ है सर्वज्ञ भगवान और अज्ञ जीव और एक माया है वो जड़ है 00:10:03 ये जीव उसका उपभोग करती है जीवात्मा उस माया का उपभोग करती है यानी संसार का भगवान नहीं करते वह 00:10:16 दृष्टा है देखते रहते हैं और जीवात्मा भोगता है और आगे चलिए क्षरम प्रधानमता क्षरम हर क्षरात्मते देव एक तस्याना 00:10:34 जो तत्व भावात भूते विश्व माया निवत्त ये भी श्वेता उपनिषद का मंत्र है पहले अध्याय का दवां मंत्र यह 00:10:49 भी कहता है एक क्षर है माया प्रधान भी कहते हैं उसको और अमृताक्षरम हर और अमृत अक्षर जो है 00:11:00 वो जीव है 00:11:04 और इन दोनों का जो शासक है गवर्नर नियामक वह भगवान है तीसरा तत्व और आगे स्पष्ट किया एतम नित्यवा 00:11:21 संस्थ ना परम वेदव्यम कििंचित भोक्ता भोग्यम प्रेरित्वा सर्वम प्रोक्तम त्रिविध ब्रह्म में तत ये श्वेतापनिषद का है ये पहले 00:11:38 अध्याय का 12वा मंत्र है इसमें कहते हैं देखो भाई बस तीन तत्व को जान लो और कुछ जानना नहीं 00:11:49 वही तीन तत्व ब्रह्म जीव माया तीनों को ब्रह्म कहा वेद ने त्रिविध ब्रह्म में तत ये तीन प्रकार का 00:12:02 ब्रह्म है अनादि है शाश्वत है कहने को तो माया जड़ है और बहुत से तो सर फिरों ने कहा 00:12:11 है मिथ्या है यहां तक कह दिया है लेकिन दवी हे गुणमई मम माया दुरतया मामेव ये प्रपद्यते माया मेंता 00:12:27 तरते गीता सातव अध्याय का 14वा श्लोक ये मेरी दैवी माया मेरी माया है मेरी ध्यान मेरी माया है बिना 00:12:44 मेरी शरणागति के बिना मेरी कृपा के कोई भी योगी ऋषि मुनि तपस्वी माया से उत्तीर्ण नहीं हो सकता स्वर्ण 00:12:58 अक्षरों में लिख लो कोई हो ब्रह्मा विष्णु शंकर भी क्यों ना हो बिना मेरी शरणागति और मेरी कृपा के 00:13:12 ना माया निवृत्ति होगी ना मुझको कोई जान सकता है ना मुझको कोई पा सकता है 00:13:22 तो तीन तत्व है इन्हीं को जान लेना है बस इतनी सी बात है और इन तीन में दो तत्व 00:13:31 ऐसे हैं जो शास्त्र है और एक तत्व है शासक नियामक भगवान जीव और माया पर नियामन करते हैं शासन 00:13:45 करते हैं 00:13:49 क्यों जी इन तीनों को जानने से लाभ क्या है क्यों जाने हम इन तीनों को तो वेद ने कहा 00:14:02 आनंदो ब्रह्मानात आनंदा देव खलमान भूतानी जायंते आनंद जातानी जीवती आनंदम प्रयंतम विषती वो जो है वो जिसको हम कह 00:14:17 रहे हैं ब्रह्म भगवान परमात्मा उसका एक खास नाम है आनंद पर्यायवाची है वो आनंद कहो चाहे भगवान कहो चाहे 00:14:28 परमात्मा कहो गॉड कहो कुछ कहो उस सुप्रीम पावर का नाम है आनंद बस तो हम उसके अंश हैं इसलिए 00:14:42 नेचुरल आनंद चाहते हैं विश्व में भले ही हजारों मत चल रहे हैं आस्तिकों के भी नास्तिकों के भी भौतिकवादियों 00:14:56 के भी अध्यात्मवादियों के भी लेकिन इसमें दो मत नहीं है कि हम आनंद नहीं चाहते ऐसा कोई कहने को 00:15:08 तैयार नहीं क्यों देखो किसी दो व्यक्ति की शक्ल नहीं मिलती अकल क्या मिलेगी अंगूठा छाप नहीं मिलता लेकिन इस 00:15:21 मामले में एक चींटी से ले ब्रह्मा तक सब एक रहा है आनंद चाहिए सुखम में भूयात दुखम में माभूत 00:15:32 हमको सुख मिले दुख ना मिले और प्रैक्टिकल रूप से भी जब हम मां के पेट से नीचे गिरे तो 00:15:43 पहला काम क्या किया नारा लगाया नारा हां रोए रोने का अभिप्राय क्या भले ही मां विभोर रो रही है 00:15:57 हां जिंदा है बच्चा बड़ा अच्छा हुआ लेकिन बच्चे को क्या दुख मिल रहा है पैदा होने का जो कष्ट 00:16:07 मिल रहा है उसको निकाल कर रोकर निकाल रहा है और यह कह रहा है कि मुझे दुख नहीं चाहिए 00:16:17 ये क्या मुसीबत संसार में आने आते ही मुसीबत दुख दबाव में दुख होता है वो दुख भूल गए होंगे 00:16:27 आप लोग बहुत बड़ा दुख होता है लेकिन मां खुशी मनाती है बाप खुशी मनाता है और तमाम प्रकार के 00:16:37 ढोल बजते हैं बच्चा रोता रहे तो हमने पैदा होते ही यह बताया संसार को कि हमको आनंद चाहिए दुख 00:16:51 नहीं चाहिए तब से पूरी लाइफ आनंद आनंद कैसे मिले किसी ने कहा ऐसे हो ऐसे मिल जाएगा उधर गए 00:17:03 नहीं मिला इन कहा अरे वो बेवकूफ है इधर आओ इधर गए नहीं मिला सब जगह चप्पल जूते मिले दुख 00:17:11 मिला अशांति मिली अतृप्ति मिली अपूर्णता मिली बड़ी-बड़ी पोस्ट पर गए प्राइम मिनिस्टर हो गए बड़े-बड़े पैसे कमाने में गेट 00:17:24 वगैरह हो गए लेकिन अंदर अशांति टेंशन नींद की गोली खा के तो नींद आती है 00:17:37 लेकिन हम भाग रहे हैं उसी तरफ देख लो इसके पास 10 कार है 10 कोठी है तो अगर मेरे 00:17:45 हो जाए तो तो क्या होगा इससे जरा पूछ लो क्यों भाई तुम्हारा क्या हाल है अरे पहले पूछ लो 00:17:53 इसकी जल्दी क्या है भागने की नो नो दिख रहा है क्या पूछे अजी सुख दिखता नहीं है वो तो 00:18:02 रियलाइज किया जाता है फीलिंग में आता है इसकी क्या फीलिंग है ये तुम देख कर नहीं जान सकते ये 00:18:10 तो आदत है सबकी कहो भाई क्या हाल है ऑल राइट एक भी राइट नहीं है सब रॉन्ग है और 00:18:18 बकबक करता है ऑल राइट सभ्यता है ऐसा बोलने की बोल दिया किसी से हाथ मिलाया मुस्कुरा दिया माने सब 00:18:29 ठीक है तो हम केवल आनंद चाहते हैं क्यों हो क्यों ये सब एक मत क्यों है इसलिए कि हम 00:18:41 भगवान के आनंद के अंश है 00:18:47 ये वेद कह रहा है आनंद ब्रह्मजाना 00:18:57 रसो वैसा ये उपनिषद कह रहा है तैत उपनिषद दूसरी बल्ली का सातवां मंत्र है ये रसोव स बड़ा इंपॉर्टेंट 00:19:13 मंत्र है रसो वैसा आनंद वो है उसमें तुम्हें आनंद है नहीं कह रहा है वेद रसो व स नहीं 00:19:23 तो कहता रसो व तस्मिन ऐसा नहीं कहा वह रस है वह आनंद है और रसग्वम हेवयं उसको प्राप्त करके 00:19:36 ही लगा दिया एव अम ये जीवात्मा आनंदमय हो सकता है बस एक उपाय है 00:19:51 और फिर वेद यह भी कहता है कि देखो भाई वो जो ब्रह्म है उससे परे कुछ नहीं है यस्मात 00:20:04 परम ना परमस्त कििंचित यस्म नाणियों नजयोस्त कश्चित श्वेता शतरोपनिषद के तीसरे अध्याय का नौवा मंत्र है 00:20:24 कोई पर तत्व इसके आगे नहीं है गुरु कहां से आठ अफक पड़ा वेद कह रहा है कि उससे परे 00:20:30 कोई तत्व नहीं अरे गीता तो आप लोगों ने पढ़ी होगी मत परम्य किंचित धनंजय अर्जुन मुझसे परे कुछ नहीं 00:20:42 है सातवें अध्याय का सातवां मंत्र श्लोक तो भगवान से परे कोई तत्व नहीं है फिर ने


कलयुग में श्रीराम नाम की सबसे गोपनीय महिमा - Indresh ji Maharaj

कलयुग में श्रीराम नाम की सबसे गोपनीय महिमा | indresh maharaj katha | indresh ji maharaj

Https://youtu.be/9KyvtKKJeaE 
First the Gist in Hindi with timestamps & English, thereafter Full Transcript is given कलयुग में श्रीराम नाम की महिमा  1. The Secret Glory of Lord Ram's Name & The Law of Nature कलयुग में श्रीराम नाम की गुप्त महिमा और प्रकृति का न्याय 2. Swami Ramanandacharya’s Divine Test: Why Vengeance is Demonic स्वामी रामानंदाचार्य की राम-नाम परीक्षा: बदला लेना राक्षसत्व क्यों है? https://youtu.be/9KyvtKKJeaE  [00:00] स्वामी रामानंदाचार्य जी के बाल्यकाल की घटना का प्रारंभ और प्रवचन में "राम जी के भरोसे रहने" की बात सुनना। [00:53] महाराज जी द्वारा स्पष्टीकरण कि सामान्य कर्तव्य (नौकरी, भोजन, प्यास) करते रहना चाहिए, केवल अनावश्यक चिंताएं ईश्वर पर छोड़नी चाहिए। [01:30] बालक रामानंदाचार्य जी का व्यास जी से तर्क करना और व्यास जी का क्रोध में आकर कहना कि "राम नाम रोटी भी खिला देगा"। [02:13] रामानंदाचार्य जी की प्रतिज्ञा—24 घंटे बिना प्रयास के भोजन मिलने पर जीवनभर श्री राम का गुलाम बनने का संकल्प। [03:09] एक अज्ञात स्थान पर जाकर बरगद के पेड़ पर बैठकर निरंतर "राम-राम" नाम जप करना। [03:32] तीर्थयात्रियों का नदी किनारे आना, भोजन (पूरी, सब्जी, गुलाब जामुन) निकालना और डाकुओं का आक्रमण। [04:52] डाकुओं के सरदार को भोजन में जहर होने का संदेह होना और पेड़ पर बैठे रामानंदाचार्य जी को देखना। [05:35] डाकुओं द्वारा उन्हें गुप्तचर मानकर पकड़ना और हाथ-पैर बांधकर जबरदस्ती सारा भोजन उनके मुंह में ठूंसना। [06:34] रामानंदाचार्य जी का रोना और राम नाम की महिमा को स्वीकार करना कि राम जी हाथ-पांव बांधकर भोजन कराते हैं। [07:33] रामानंदाचार्य जी का संपूर्ण जीवन प्रभु श्री राम एवं राम नाम को समर्पित करना। [09:11] श्रीमद्भागवत कथा का प्रारंभ, वेदव्यास जी द्वारा रचना और राजा परीक्षित-सुखदेव जी का प्रसंग। [10:00] महाभारत युद्ध का अंत, दुर्योधन का पतन और उसके मन में उपजी बदले (Revenge) की भावना। [11:09] सनातन धर्म में बदला लेने की मनाही का सिद्धांत—बदला मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति (पंचमहाभूत) लेती है। [12:03] बदला लेने की सोच को राक्षसत्व (राक्षसी प्रवृत्ति) और ईर्ष्या का लक्षण बताना। [15:34] समाज में अपराध (स्त्री, बालक, बुजुर्गों पर अत्याचार) और सामान्य व्यक्तिगत घटनाओं में अंतर समझाना। [17:40] कुछ लोगों में सहनशीलता बिल्कुल नहीं होती। रात को नींद नहीं आती कि कैसे इसका बदला लूं।  रावण और शूर्पणखा का उदाहरण—बदले की भावना के कारण पूरी लंका का विनाश होना। [22:08] सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप—अपराध पर दंड देना धर्म है, पर व्यक्तिगत अहंकार में बदला न लेकर आगे बढ़ना ही साधुता है। https://youtu.be/9KyvtKKJeaE 

Full Transcript:
00:00] जगदाचार्य कौन? श्री रामानंदाचार्य।  00:04] रामानंद संप्रदाय के प्रवर्तक और उनको प्रभु श्री राम का ही अवतार माना जाता है। तो श्री रामानंदाचार्य जी जब अपने बाल्यकाल में थे, अपनी युवा अवस्था में थे (बहुत ध्यान से सुनिएगा, जब भक्ति के बीजारोपण नहीं हुए थे उनके में), उस समय की बात है नगर में कोई प्रवचन चल रहा था और श्री रामानंदाचार्य जी बैठकर के सुन रहे थे।  00:33] तो प्रवचनकर्ता ने कहा— "राम के भरोसे बैठ जाओ, राम जी सब आनंद करा देंगे।" जैसे अभी हम कह रहे हैं, ठाकुर जी पर छोड़ो सारी इच्छाएं, ऐसे ही कोई वक्ता कह रहे थे कि राम जी के भरोसे हो जाओ, राम जी सब करेंगे।  00:53] अच्छा, एक बात सुनिएगा। कई लोग यहां बैठे हुए कहीं ऐसा अनुमान मत लगा लेना कि हाथ पर हाथ धर के बैठे रहो, सब आलसी बन जाओ, सब काम राम जी करेंगे। ऐसा नहीं कह रहे हम। सामान्य कर्तव्यों का निर्वहन आपको करना है—प्यास लगेगी पानी पीना है, भूख लगेगी भोजन करना है, कर्म करते हो तो अपने दफ्तर जाना, हॉस्पिटल जाना, क्लीनिक जाना, इधर जाना, उधर जाना... ये सब करना है। एक्स्ट्रा जो इच्छाएं आपके चित्त में प्रकट होती हैं, जिसकी वजह से आप ओवरथिंक करते हो, वो सब खत्म करनी हैं, वो सब ठाकुर जी पर छोड़नी हैं।  01:30] लेकिन यहां पर रामानंदाचार्य जी ने यही अर्थ लगा लिया कि राम-राम करो तो राम जी पूरा जीवन पालन करा देंगे। तो रामानंदाचार्य जी ने जाकर के उन व्यास जी से कहा— "भगवान, आप व्यास मंच पर बैठे हैं, हम आपसे कुछ कह तो नहीं सकते, आपकी सारी बातें स्वीकार रहे हैं। पर आप कह रहे हैं राम जी के भरोसे बैठ जाओ, राम जी रोटी खवा देंगे क्या?"  01:52] तो व्यास जी थोड़े से क्रोध में आ गए और क्रोध में आकर उन्होंने कहा— "हां! अगर राम जी के बस में आ जाए तो राम जी रोटी भी खवा देंगे, तुमको कोई कुछ नहीं करना पड़ेगा। राम-राम जपो बस, राम जी रोटी भी खवा देंगे।"  02:13] रामानंदाचार्य जी ने सारे गांव के लोगों को बुलाया— "भैया देखो, हमारी बात सुनो। मैं अपने गांव से कोसों दूर एकांत, एक अज्ञात स्थान पर जा रहा हूं। ना रोटी लेकर जाऊंगा, ना दाल, कुछ नहीं लेकर जाऊंगा अपने साथ। केवल राम-राम जपूंगा। 24 घंटे के अंदर अगर राम जी ने मुझको रोटी खवा दी, तो मैं स्वयं आप सबके सामने वचन लेता हूं कि जीवन भर राम नाम और प्रभु श्री राम का गुलाम बन के रहूंगा। लेकिन शर्त यह है, 24 घंटा में रोटी राम जी खिला जाएं। मैं कोई प्रयास नहीं करूंगा, मैं केवल राम-राम जपूंगा अज्ञात जगह जाकर, ताकि कोई परिचित पहुंच ना जाए, कहीं व्यास जी पहुंच ना जाएं, कोई व्यवस्था मेरे लिए भोजन की ना कर दे।"  03:09] रामानंदाचार्य जी चले गए और कहीं दूर पहाड़ों के पास, नदी के किनारे पहुंचे। वहां पर एक विशाल वट का वृक्ष था। उस घने वृक्ष के अंदर चले गए, ऊपर बैठ गए और ऊपर बैठकर के राम-राम-राम-राम जपने लगे।  03:32] जपते-जपते थोड़े ही घंटे बीते, इतने में ही कोई तीर्थयात्री आए। तीर्थयात्रियों ने आकर के नदी में स्नान किया, स्नान आदि करके अपना झोला रखा, वस्त्रादि पहने और कहा— "भैया, बहुत भूख लगी है। पिछले गांव से कुछ प्रसादी लेकर के आए हैं, उसको पा लें यहीं पर, फिर आगे चलेंगे।"  03:56] तीर्थयात्रियों ने प्रसाद खोला, उसमें पूरी, सब्जी, गुलाब जामुन आदि सब था जो गांव के लोगों ने दिया था। प्रसाद खोल के सामने रखा ही था, इतने में ही एक डाकू आ गया। डाकू अपनी सेना के साथ आया और आकर बोला— "इन सबको बंदी बनाओ, इनके पास जो कुछ हो सब कुछ लूट लो।"  04:21] वे बेचारे खा भी नहीं पाए, हाथ ऊपर करके खड़े हो गए। झोला आदि देखा तो उसमें कुछ कपड़े, दक्षिणा, ग्रंथ मिले। तभी एक सिपाही बोला— "महाराज, छप्पन भोग भी है। आपकी आज्ञा हो तो पा लें? बढ़िया गुलाब जामुन, पूरी, सब्जी सब दिख रही है।" डाकू बोला— "हां-हां, बैठो सब लोग उड़ाना शुरू करो।"  04:52] सब लोग जैसे ही बैठे, इतने में ही डाकुओं के सरदार ने कहा— "रुको-रुको! 1 मिनट, थोड़ा जांच कर लो कि ये प्रसाद में कहीं जहर तो नहीं है? टटोल लो व्यवस्थित, कहीं ऐसा तो नहीं हमको मारने के लिए किसी ने षड्यंत्र किया हो?"  05:11] पूछने पर तीर्थयात्रियों ने कहा— "नहीं-नहीं महाराज, कुछ नहीं है, आप प्रेम से पाओ।" डाकू बोला— "नहीं, मुझे तो कुछ गड़बड़ लगती है।" उसने जैसे ही ऊपर देखा, पेड़ पर रामानंदाचार्य जी बैठकर राम-राम कर रहे थे और नीचे देख रहे थे।  05:35] डाकू बोला— "मिल गया षड्यंत्रकारी! इसको नीचे उतार के लाओ।" नीचे उतार कर लाए, रामानंदाचार्य जी हाथ जोड़े राम-राम जप रहे थे। डाकू बोला— "यह इसी की चाल है। यह किसी राजा का गुप्तचर है, इसने हमारे लिए विषैला भोजन रखवा दिया ताकि हम खाएं और मर जाएं या बेहोश हो जाएं।"  06:03] डाकू ने कहा— "इसके हाथ-पैर बांधो और जबरदस्ती इसी को खिलाओ।" दो सिपाहियों ने पांव बांध दिए, दो ने हाथ बांध दिए। रामानंदाचार्य जी का कीर्तन चल रहा था। डाकुओं ने जबरदस्ती मुंह खोला और गुलाब जामुन, पूरी, सब्जी, कचौड़ी, रायता सब ठूंस दिया।  06:34] रामानंदाचार्य जी के आंसू आ गए, बोले— "भैया, राम नाम केवल खिलाता नहीं है, जबरदस्ती हाथ-पांव बांध के खिलाता है! यह राम नाम का प्रभाव है।"  07:01] डाकुओं ने देखा कि इन्हें कुछ नहीं हुआ, तो उन्होंने भी प्रसाद पाया और हाथ-पैर खोल दिए। पूछा— "तुम ऊपर क्यों बैठे थे?" उन्होंने कहा— "मैं राम नाम के अधीन बैठा था कि बिना प्रयास के भोजन मिलता है या नहीं, और आप लोगों ने मुझे पवा दिया।" उसी क्षण रामानंदाचार्य जी ने पूरा जीवन राम नाम को अर्पित कर दिया।  07:52] महाराज जी समझाते हैं कि राम नाम में इतनी सामर्थ्य है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि घर बैठकर आलसी हो जाओ। भगवत नाम और कथा की कृपा से ही सब पोषण और आनंद है।  09:11] इसके बाद श्रीमद्भागवत जी की रचना (वेदव्यास जी द्वारा) और सुखदेव जी महाराज द्वारा राजा परीक्षित को कथा सुनाने का प्रसंग आता है।  10:00] महाभारत का युद्ध अंतिम पड़ाव पर था, भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ दी। दुर्योधन बदले की आग में जलने लगा।  11:09] महाराज जी बताते हैं कि हमारे सनातन धर्म में बदला (Tit for Tat) नहीं लिया जाता; बदला व्यक्ति नहीं, प्रकृति (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) लेती है। बदला लेने की इच्छा रखना राक्षसत्व का लक्षण है।  13:03] वैष्णव का स्वभाव बदला लेना नहीं होता, वह घटना को भगवत इच्छा मानकर प्रकृति पर छोड़ देता है।  15:34] हालांकि, बालकों, महिलाओं या वृद्धों पर अत्याचार/पाप होने की स्थिति में शांत बैठना मना है; वहां action लेना धर्म है। लेकिन सामान्य व्यक्तिगत अपमान या छोटी बातों को 'लेट गो' (छोड़ देना) चाहिए।  17:40] कुछ लोगों में सहनशीलता बिल्कुल नहीं होती। रात को नींद नहीं आती कि कैसे इसका बदला लूं।  उदाहरण के लिए रावण का विनाश बदले की भावना (शूर्पणखा के प्रसंग) के कारण ही हुआ। शूर्पणखा की गलती होने पर भी रावण ने बिना सोचे-समझे बदला लेने की कोशिश की और पूरी लंका का नाश करवा बैठा।  22:08] निष्कर्ष: पाप और अपराध पर दंड देना सनातन धर्म का लक्षण है, परंतु व्यक्तिगत अहंकार में बदला लेना राक्षसत्व है।

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