Wednesday, August 5, 2026

ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 | by Shri Hit Ambrish ji

ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 | by Shri Hit Ambrish ji

First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.

00:00:00 सबसे पहला प्रश्न ऋषियों ने क्या पूछा है प्राय पाय स कल अमिन युगे जना मंदा सुमन मत मंद भाग्य

00:00:20 यप 00:00:25 दता कुछ ऐसा प्रश्न ऋषि पूछ रहे हैं जिसमें केवल उनका नहीं आप 00:00:30 का मेरा हम सबका कल्याण 00:00:35 है संत का ये ये एक विशिष्ट गुण है आप जपेगा और रा नाम जपा 00:00:51 है परम श्रद्धेय प्रात स्मरणीय श्री स्वामी रामसुख दास जी महाराज कई बार कहते थे बात कहते थे विचार करो 00:00:51 . 00:01:00 अगर प्रभु के मन में इस बात का संकल्प हो कि भाई सबका कल्याण हो जाए तो होही नहीं जाएगा 00:01:06 होही 00:01:09 जाएगा व तो पूर्ण काम है सत्य संकल्प है अगर भगवान का संकल्प हो भाई सबका कल्याण हो जाए तो 00:01:16 होही जाए जीव पर दया तो संत करता है इसीलिए भगवान कह रहे हैं भवान क भा हम तो देखो 00:01:24 आत्माराम है भगवान तो अपने स्वरूप में स्थित है 00:01:30 संत जब कहते ना बोले बार-बार मांगना प्रभु से यही बात मांगना पीछे लगे रहना इनके बड़ी देर के बाद 00:01:41 दीन दयाल के कान में भनक पड़ती है अभी तो संत कह रहे हरि नाम रटते रहो जब तक घट 00:01:47 में प्राण अरे कभी तो दीन दयाल के भनक पड़ेगी कान बड़ी देर के बाद भनक पड़ती है इनके कान 00:01:57 में क्योंकि हमको ऐसा लगता है ना भाई 00:01:59 बड़ा समय हो गया भजन करते करते अब यह तो भाई अनादि काल से हम जैसे जाने कितने कितने कितने 00:02:08 जीवों को देखते आ रहे हैं जैसा आपने चर्चा के आरंभ में कहा जीव सुधरता है फिर बिगड़ता है फिर 00:02:15 सुधरता है फिर बिगड़ता है और वहां श्रीमद वल्लभाचार्य महाप्रभु कह रहे बोले स्वभाव से ही दुष्ट है तो बहुत 00:02:26 जल्दी ध्यान नहीं देते ठाकुर जी 00:02:30 कोई लगा है लगा है ठीक है लगा है फिर उनके पास भी कई कई खिलौने हैं देते हैं खेलने 00:02:37 के लिए जीव भी खेलता है उनसे अच्छा ठाकुर जी जो खिलौना देते हैं ना व दो चार बरस में 00:02:44 नहीं टूटता है उससे दो चार वरस में अरुचि भी नहीं होती है कभी कभी तो जन्म जन्म खेलता है 00:02:49 जीव उन्ही खिलौनों से खेल ही रहा है यह तो कभी संत की कृपा होती है जब तब साधु तारसी 00:02:56 कभी संत कृपा करता है जीव पर दुरमति नष्ट हो 00:02:59 होती है तब यह बात समझ में आती है बहुत जन्म बिछड़े थे 00:03:10 माधो ये जन्म तुम्हारे 00:03:19 लेखे यह जन्म तुम्हारे ले बहुत जन्म बिछड़े थे तब कभी ये बात समझ में आती देर के बाद 00:03:32 इसलिए शास्त्र कह रहा है धीरज धरना धैर्य धारण किए रहना दीन दयाल के कान में कभी भनक 00:03:47 पड़ेगी और फिर गुरु साहिब तो वाणी में कह रहे सच्चा होकर कोई सच्चे साहिब के सच्चे दरबार में जाता 00:03:54 है तब सच को पहचानता है सच्चा होके हम 00:03:59 हमारे हमारे हमारे उर अंतर में हमारे भीतर प्रभु के अतिरिक्त कोई और चाह ना रहे आप देखो अभी तो 00:04:06 य बात असंभव सी मालूम पड़ती है अभी तो संसार के कितने संकल्प विकल्प उन्हीं में उलझा हुआ मन है 00:04:13 यह तो संतों की सत्संग की कृपा है थोड़ा बहुत आकर बैठ जाते हैं सुन लेते हैं कह लेते 00:04:20 हैं पर कल जैसा मैं आपको कह रहा था खारे पानी के कुए में चुटकी भर खांड कोई डाल दे 00:04:27 अरे चुटकी भर क्या बोरी भर खांड भी कोई 00:04:29 डाल दे जल थोड़ी मीठा हो जाता है तो खारा ही है ऐसे ये हमारा जो ये जो घट है 00:04:39 काम कामना वासना से भरा है कोई कोई सरल काम है इस इस सबको हटा 00:04:52 देना संत की कृपा है मैं तो आपसे बार-बार कहता हूं कहता रहता हूं कहता रहूंगा कहता 00:04:59 रहगा अंत तक एक ही बात कहता रहूंगा आपको संत ना होते जगत में जल मरता संसार जल मरता संसार 00:05:08 यही हमारे तैसी है इसलिए आपको अनेक बार निवेदन करता हूं हमारी तो इन संतों की वाणी में श्रधा है 00:05:15 संत क्या कहते हैं हमारे लिए वही मार्ग है जी मार्ग सब संत गया छ व मरग में जा स्या 00:05:26 मेरा रंग लागयो 00:05:29 नाम हरी और रंग अटक 00:05:38 परी सबसे पहले तो आपको अपने विश्वास को कहीं एक जगह पर समेटना पड़ेगा तब विश्वास सुदृढ़ होता 00:05:48 है और मैं मैं आपको वो अगर आप मुझसे पूछोगे वो एक स्थान क्या है तो मैं कहूंगा कि कि 00:05:53 संतों की वाणी में ले आइए आप अपने मन को यहां यहां है हमारे हित की बात जीव के हित 00:05:58 की बात तो संत करता है 00:06:00 नहीं तो सहजो भाई नहीं कहती कि हरि तो कुटुंब जाल में घेरी यही बात तो श्री स्वामी जी कहा 00:06:08 करते थे बोले अगर भगवानी संकल्प कर ले भाई सब जीवों का उद्धार हो जाए सब हमारे पास आ जाए 00:06:13 तो लो आही जाए फिर रोकने वाला कौन है भगवान के मन में ऐसा संकल्प नहीं होता ऐसा संकल्प संत 00:06:19 के मन में होता है इसलिए श्री रघुनाथ जी को कहना पड़ा सातम सम मोहिम 00:06:29 जग देखा दो बातें कही है भगवान ने य पर सातम सम मोही 00:06:39 मैं ममता राम सो समता सब संसार एक तो भगवान क भाई सबको समान मानना और फिर क मोही मैं 00:06:49 जग देखा सिराम मैं सब जग जानी कर प्रणाम जोर जुग पानी पर शायद भगवान ने सोचा हो सब सबको 00:06:58 समान देखेंगे 00:06:59 संत कहां रहेंगे तो श्री रघुनाथ जी कह रहे हैं सातम सम मोही मैं जग देखा मोते अधिक संत करी 00:07:17 लेखा मोते अधिक संत करी मैं तो भाई अपने जीवन में देखता हूं 00:07:30 अब भाई प्रारब्ध बसात पूर्व के संस्कार से कभी वातावरण के प्रभाव से कभी-कभी हो जाता है मन में विक्षेप 00:07:38 हो जाता है अकारण विक्षेप हो जाता है उसकी क्या औषधि है इ संतों के पास कुछ देर बैठ जाने 00:07:47 से इन्हीं की वाणी का चिंतन कर लेने से कुछ स्वाध्याय कर लेने से ही मन का विक्षेप दूर हो 00:07:54 जा होता है भव रोग की औषधि तो भाई इन्ही संतों के शबद 00:08:02 जन्म जन्म का सोया मनवा सतगुरु शबद सुन 00:08:09 जागा तो सब ऋषियों ने कुछ ऐसा प्रश्न पूछा जिससे जिसे उनका भी मंगल हो पर इस समस्त लोक में 00:08:17 आस्तिक भाव की वृद्धि हो शुभ मंगल का संचार हो सब धर्म का अभ्युदय हो यही संत के जीवन का 00:08:28 लक्ष्य होता है 00:08:31 य दो पंक्तियां मुझे बड़ी प्रिय हैं श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने अमृतवाणी में कहा है वृद्धि आस्तिक भाव 00:08:44 की शुभ मंगल 00:08:50 संचार अभुदय सद धर्म का राम नाम 00:09:05 विस्तार और उन्होने तो युक्ति भी बताई है कैसे होगी आस्तिक भाव की वृद्धि कैसे शुभ मंगल का संचार होगा 00:09:11 कैसे सद धर्म का अभ्युदय होगा एक ही युक्ति संत कह राम नाम 00:09:19 विस्तार जोत से जोत जले कल मैं आपसे कह रहा था जो यहां पर बैठा है ना भाई मुझे तो 00:09:24 लगता है कि यदि युग का काल का और धर्म का भी यदि विचार किया जाए 00:09:29 तो आज तो भाई जीव मात्र के लिए प्राणी मात्र के लिए यही तो धर्म है यही एक धर्म है 00:09:35 आपका मेरा 00:09:38 सबका और ये यह सार्वभौमिक धर्म है यूनिवर्सल रिलीजन राम सिमर राम सिमर यही तेरो काज है राम 00:09:59 सिमर 00:10:05 राम य सार्वभौमिक धर्म है इसलिए मैं कई बार कह देता हूं यहां से अनेक अनेक कर्म कांडों में अनेक 00:10:16 अनेक विधियों रीति हों में किसी को ना उलझा करर सीधे-सीधे वह मार्ग दिया जाए जिससे लोक भी सुधरे और 00:10:22 परलोक भी सुध सीधा सधा ही रास्ता देना चाहिए ना भाई नाम जपि भगवन नाम जपि 00:10:34 मैं कहता डंके की चोट पर क्यों क्योंकि सब सब सत्पुरुष का एक मत है एक 00:10:44 मत कोई किसी भी मत संप्रदाय का हो फ यही धर्म कल्याण इसी से होगा राम नाम विस्तार मैं जपूं 00:10:56 आप जपे और ऐसे ही ऐसे 00:10:59 हमारे संपर्क में जो आए कहीं ना कहीं उसके जीवन में भी यह दीप जले इसी को कहते हैं जोत 00:11:04 से जोत जलाना इसी को कहते हैं दीप से दीप जलाना ऐसे ही तो दीपावली होती है ना दीप से 00:11:12 दीप जलता है ऐसे ही दीपोत्सव होता है और मैं तो आपसे यही कहूंगा प्रयास यही करना पहले तो हमारे 00:11:19 भीतर हमारे भीतर यह दीप जले और फिर उस दीप से कोई और दीप जले उस दीप से कोई और 00:11:25 दीप जले और ये ये दीपावली केवल एक दिन की 00:11:29 दीपावली बनकर ना रहे भला बुरा समय आता रहता है हमारा सौभाग्य है कि शुभ गड़ी हम देख रहे हैं 00:11:39 हमारा सौभाग्य है य मंगलमय य मंगलमय बेला हमारे जीवन काल में आई 00:11:48 है तो मैं तो एक बड़ा विनम्र सा निवेदन यहां से य कर रहा हूं कि व्यासपीठ पर जो भी 00:11:54 जो भी है व्यासपीठ का यह पवित्र 00:11:59 कर्तव्य है कि जनमानस के मन मानस को केवल हरि नाम से जोड़ा जाए सब सबके सबकी मत विचार का 00:12:08 आदर करते हुए सबकी श्रद्धा का आदर करते हुए सब अपने अपने कर्तव्य का पालन करें लेकिन इस बात पर 00:12:15 बल दिया जाना चाहिए इस एक सिद्धांत की एक मत से प्रतिष्ठा होनी चाहिए भाई आपका मेरा कल्याण तो भगवन 00:12:22 नाम से ही होगा यही सब संतो महापुरुषों का मत है मीरा हो सूर हो 00:12:29 हो कबीर हो रदास हो नानक हो सबका एक मत है सब कर मत खनायक 00:12:40 एहा करिए राम पद पंकज नेहा करिए राम पंकज ने क्योंकि भाई आपसे मुझसे मिलकर ही तो समाज बना है 00:12:59 हमारा मन सुधरेगा हमारे मन में शांति होगी तो समाज में शांति होगी समाज में सुख शांति कैसे होगी तो 00:13:06 मन में सुख शांति होगी किसी भी किसी भी कर्मकांड से समाज में शांति नहीं आ सकती 00:13:15 है समाज में शांति तो तब आएगी जब आपके मेरे मन में शांति होगी और जन्म जन्म के भटके इस 00:13:27 मन को 00:13:28 विश्राम देने वाला अगर कोई साधन है तो भाई संत तो यही कह रहे हैं अब अपनी मति से कोई 00:13:33 कुछ भी कहता रहे विचार रहे बात दूसरी है संत तो एक ही बात कहते राम सिमर राम सिमर ही 00:13:46 तेरो काज है राम सिमर राम सिमर 00:13:58 तो ऋषियों ने पूछा हे सूत जी आप सब शास्त्रों के पुराणों के ज्ञाता हैं सब शास्त्रों पुराणों में जीव 00:14:05 के कल्याण के जो जो साधन वर्णन किए गए हैं आप सबका सार जानते हैं पर ऋषियों ने कहा कि 00:14:12 कलयुग आ पहुंचा है सबसे पहले तो कहा है कि लोगों की आयु ही कम हो गई है माने हमारे 00:14:18 पास समय ही बहुत थोड़ा है और आपको याद हो कभी आपसे मैंने कहा था कि भाई दूर जाना हो 00:14:28 नियत समय पर पहुंचना भी आवश्यक हो मार्ग लंबा हो फिर क्या करना पड़ता है अपनी गति बढ़ानी पड़ती है 00:14:35 यही बात श्रीमद भागवत कहती हैं तीव्रे भक्ति योगेन भजे पुरुषम परम य बात श्री महाप्रभु जी भी कह रहे 00:14:43 हैं स्फुट वाणी में जि नाव नि मंगल लोक तिहुं सु हरि पद भज ना विलंब कर दो बातें कही 00:14:52 है महाप्रभु जी ने एक तो नर देही पाई चित चरण कमल दीज और कह रहे अब कोई 00:14:58 और विचार मत करो ना विलंब कर देर मत करिए क्योंकि नारायण य सुधि नहीं आज मरे के 00:15:11 भोर कितना कितना अस्थिर जीवन है एक क्षण में घटना घटती है सब कुछ जीवन में बदल जाता है मन 00:15:21 नहीं रहता साधन नहीं रहता सामर्थ नहीं रहती व्याधि 00:15:28 मंदिर इस इस शरीर को संतो ने कहा है खबर नहीं है किसके भीतर कौन सा रोग पल रहा है 00:15:35 एक एक क्षण में जीवन बदल जाता है इसलिए संत कह रहे हैं यात दुर्लभ काल ना वृथा गमा इए 00:15:49 ब्रज नागर नंदलाल सुनिस दिन 00:15:56 गा कहा कि भाई पहले तो 00:15:58 लोगों की आयु ही बहुत कम हो गई है अल्पायु मनुष्य है कलयुग 00:16:07 का और फिर साधन करने में रुचि और प्रवृत्ति भी कम है क्यों क्योंकि तमोगुण का प्रभाव है तमोगुण का 00:16:14 प्रभाव क्या है प्रमाद य तमोगुण का प्रभाव है हा कर लेंगे य तमो गुण का प्रभाव है जैसे आजकल 00:16:24 सुबह बिस्तर से निकलने में आधा घंटा लग जाता है लग जाता है कि 00:16:30 अब उठेंगे अब उठेंगे अब उठेंगे आधा घंटा बिस्तर से निकलने में लगता है फिर आधा घंटा नहाने में लग 00:16:36 जाता है कि भाई जल को छुए कि नहीं 00:16:44 छुए जाड़े का धर्म यही होता है ना और गति मंद पड़ जाती है जाड़े में क्या होता है गति 00:16:52 मंद पड़ जाती है ना कीर्तन होता आप लोग ताली भी नहीं बजाते ऐसे ही बैठे रहते हो 00:16:59 माने हिलने डुलने का मन नहीं करता ऐसा ऐसा जहां बैठे बस बैठे ही है हिलने डुलने की इच्छा नहीं 00:17:05 होती ऐसे मन को भी जब जड़ता का जाड़ लगता है ना मन भी हिलना डुलना नहीं चाहता व भी 00:17:10 साधन नहीं करना चाहता है तमो गुण की अधिकता हो जाती कलयुग में य युग का धर्म 00:17:23 है और वर्तते कस्य दूषण किसी का भी दोष नहीं भाई युग का ही धर्म है 00:17:29 जून के महीने में कितना भी 00:17:35 रहो महाराज जी भी लगता है पीछे से सुनते आ रहे हैं तभी मुस्कुराते आ रहे हैं जाड़ा है ना 00:17:42 भाई इसी को कह रहे जड़ता जाड़ विषम जब लागा तुलसी बाबा बड़ा सुंदर उदाहरण देते गया न मज जन 00:17:48 पाव 00:17:53 अभागा एक समय था जब लोग मीलों पैदल चलकर तीर्थ यात्रा करने जाते 00:17:58 जीवन में एक ही बार तीर्थ हो पाता था एक बार गंगा नहाए तो बस हो गया पर खैर तब 00:18:05 मैं कहूंगा कि तीर्थ के प्रति लोगों की श्रद्धा थी भावना थी लोग तीर्थ बुद्धि से ही जाते थे तप 00:18:10 करने के लिए तीर्थ में जाते थे अब तो सुविधा अधिक हो गई तो पिकनिक मनाने के लिए आते हैं 00:18:16 पर गोस्वामी जी कहते भाई एक व्यक्ति कोई गया मीलो चलके महीनों में जाकर पहुंचा गंगा किनारे अब जेठ के 00:18:24 महीने में यात्रा शुरू की थी मांग के महीने में पहुंचा 00:18:31 क जड़ता जाड़ विषम जब लागा गयो न मजन पाव अभागा इतनी दूर चल करर गया उसने कहा जाड़ा बहुत 00:18:37 है दूर से प्रणाम करके चलते हैं तो कलयुग में तमो गुण बढ़ता है और तमो गुण का प्रभाव क्या 00:18:45 है जीवन में प्रमाद आता है ऋषियों ने सबसे पहला प्रश्न यही किया है सू जी से आप आप संत 00:18:52 शिरोमणि है आप बताइए कि कलयुग में पहले तो मनुष्य अल्पायु हो जाएगा उसके पास अवधि 00:18:58 बहुत कम है और उस बहुत कम अवधि में भी सूरदास जी कहते हैं कि बालापन खेलत ही खोय और 00:19:06 यवन विषय रस भोई और वृद्ध भयो सुधि प्रगट मोक तब ये थोड़ी सी अकल आती हमने पीछे क्या कर 00:19:17 दिया इसलिए सूरदास जी तो कहते हैं दीनानाथ अब बार तुम्हारी अब तो आपकी बारी है हमारी हरि तुम ही 00:19:26 स सुधरेगी सौभाग्यशाली कोई 00:19:28 होता है जिसको समय पर चेत आ जाता है मैं कई बार आपसे कहता हूं भाई एक तो है सही 00:19:33 निर्णय लेना और फिर एक है सही समय पर सही निर्णय लेना सही निर्णय और सही समय में भी सही 00:19:40 समय अधिक महत्त्वपूर्ण है सही समय पर सही निर्णय लिया 00:19:54 जाए एक तो अवधि कम है और फिर साधन में प्रवृत्ति भी 00:19:58 साधन में रुचि भी नहीं है रुचि नहीं रही प्रवृत्ति नहीं है क्यों क्योंकि प्रमाद बढ़ गया आहार विहार बिगड़ 00:20:05 गया जीवन में कितना असंतुलन है तमोगुण बढ़ता ही जा रहा है बुद्धि मलीन होती चली जा रही है अब 00:20:15 तो भाई वह समय आ गया है जब आप देखो जब गलत करने वालों की संख्या अधिक दिखाई पड़ेगी सही 00:20:24 करने वाले थोड़े ही रह जाएंगे 00:20:31 प्रवर्तते कस दूषण युग धर्म युग का धर्म है इसको समझना पड़ेगा कर कुछ नहीं सकते हम हम इसमें कुछ 00:20:41 भी नहीं कर सकते पहले ही कह दिया महापुरुषों ने घोरे कलयुग प्राप्त सर्व धर्म विव जिते धर्म रहेगा ही 00:20:50 नहीं एक चरण धर्म का रह जाएगा और वो भी जीव मात्र पर दया दया राक धर्म को पाल 00:20:58 कबीर जी कह रहे हैं बो जो दया रखेगा वही धर्म का पालन कर सकता है दया राख धर्म को 00:21:06 पाले और घर में रहे कह देते कबीर जी वन में रहे नहीं घर में रहे उदासी पर घर में 00:21:15 रहे कैसे 00:21:20 उदासी चार दिन के लिए कहीं जाना हो और चार दिन वहां रहने की अच्छी व्यवस्था हो जाए बस इतना 00:21:26 ही बहुत है 00:21:28 घर क्या है भाई आए हैं यहां पर रहने के लिए प्रभु ने हमारी एक व्यवस्था कर दी है बस 00:21:32 इतना ही पर ये ये बात एक क्षण के लिए भी भूले नहीं रहना नहीं है देश बगाना है कहत 00:21:50 कबीर सुनो भाई साध सतगुरु नाम 00:21:58 ठिकाना है सतगुरु नाम 00:22:07 ठिकाना रहना नहीं है 00:22:16 देश कले पहले तो अवधि कम है उसम बुद्धि भी कम है साधन में प्रवृति तो है ही नहीं क्योंकि 00:22:24 तमोगुण बढ़ गया और बढ़ता ही जा रहा है प्रमा 00:22:28 मनुष्य हो गया है और जब उसमें भी जब बात भजन की आए माने जब किसी परमार्थिक किसी शुभ कार्य 00:22:33 की बात आए फिर तो फिर तो मन घोर प्रमाद का आश्रय ले लेता है प्रमाद से ग्रस्त है पहले 00:22:41 संत कहते थे भाई शुभ कार्य का संकल्प मन में हो ना तत्काल कर दीजिए उसी के लिए श्री कबीर 00:22:49 जी जैसे संतो ने कहारे पल में परलय होएगी फेर करेगा कब बड़ी अच्छी बात एक बार एक महात्मा ने 00:22:55 हमको बताई यहां के बड़े लोग कहते थे कि 00:22:58 दाया हाथ देना तो बाए को खबर नहीं पड़े पूछा कि ये ये कैसा देना होता है ऐसे कैसे संभव 00:23:04 है कि दाया हाथ दे रहा है बाए को खबर नहीं है तो कहते थ देने का भाव मन में 00:23:09 आए ना बस तत्काल दे दीजिए अरे अगले पल देने का मन नहीं रहेगा हमें कल महाराज जी से चर्चा 00:23:17 कर रहा था जो आज मैंने आपसे कहा ना भाई मन सुधरे और फिर सुधरा रहे क्योंकि मन तो सुधर 00:23:22 सुधर के बिगड़ता 00:23:26 है सुधरता है 00:23:27 फिर बिगड़ता है जो छोड़कर आया है उसी को जाकर फिर लिपट 00:23:36 है तभी तो संत कह रहे हैं खरोई कठिन है भजन डिंग रिव तमक सिंदूर मेल माथे प साहस सिद्ध 00:23:45 सती को सु जरी सुनते नहीं हम पर संत तो कहते आ ही रहे हैं भक्ति करे कोई सूरमा जात 00:23:57 ब 00:24:06 इसीलिए अनेक अनेक प्रकार से अनेक अनेक उदाहरण देकर आपको यहां से निवेदन किया जाता है भाई सत कर्म करना 00:24:14 उससे क्या होगा जीवन में सत्व गुण बना रहेगा आपका आहार शुद्ध हो सात्विक हो पवित्र हो नहीं तो प्रमाद 00:24:25 आएगा नहीं तो प्रमाद आएगा 00:24:27 छोटा सा छेद छिद्र बड़े जहाज को डुबो देता है छोटा सा छिद्र हो जाए ना ऐसे भजन करने के 00:24:37 लिए भी एक व्यवस्था है संतों ने बताई है उस व्यवस्था में छोटा सा छिद्र हुआ डूब जाएगा 00:24:46 जहाज तो कहा पहले तो भाई इनकी इनकी आयु कम है अवधि कम है और वो अल्प आयु में भी 00:24:54 60 70 वर्ष की जो आयु है उसमें भी 00:24:58 बालापन खेलत ही खयो बचपन खेलने में गवा दिया और यवन विषय रस भोई आपको स्मरण हो कभी यहीं से 00:25:11 मैंने आपको कहा था जिसका बालपन संस्कारी रहेगा उसकी युवावस्था शुद्ध रहेगी पवित्र रहेगी जिसकी युवावस्था शुद्ध होगी उसी 00:25:27 की भजन भावना वृद्धावस्था में जाकर सिद्ध होगी और बाल्यावस्था में भजन कौन करेगा जिसकी माता संस्कारी होगी वही तो 00:25:39 बालक बाल्यावस्था में भजन करेगा जिसको गर्भ में भजन का संस्कार मिलेगा इसी को कहते हैं दीप से दीप जलाना 00:25:46 इसकी मैं आपसे अभी बात कर रहा था इसी को कहते हैं जोत से जोत 00:25:53 जलाना इसीलिए मैं कहता हूं यदि आप माता-पिता है 00:25:57 तो फिर अधिकार से पहले आपका कर्तव्य हैने बालक को संस्कारी बनाइए ईश्वर आपकी गोध में जब कोई बालक प्रसाद 00:26:07 स्वरूप देता है ना तो आप समझिए कि आपको इस इस इस सारे संसार की सेवा करने का अवसर ईश्वर 00:26:14 ने दिया है दीजिए अपने बालक को ऐसा संस्कार कि कल व जाकर देश के राष्ट्र के समाज के हित 00:26:21 में कल्याण में कुछ कर सके अपना भी कल्याण करें राष्ट्र और समाज के हित में कल्याण में 00:26:27 व अपना कुछ कुछ योगदान दे 00:26:36 सके अंग्रेजी की एक कहावत है यू कैन नॉट पोर फ्रॉम एन एमटी कप यदि हमारा ही बर्तन खाली है 00:26:43 दूसरे में क्या डालेंगे 00:26:47 कभी-कभी कोई पूछ लेता है ना कैसे लगाए बच्चे को भजन में आप करिए आप लगि कल ही शायद महाराज 00:26:53 जी मुझसे कह रहे थे सत्संग के बाद 00:26:57 कि भाई अब अब होता क्या है कि जो सही समय था अभी आपसे मैं कह रहा हूं ना सही 00:27:02 निर्णय और सही समय में भी सही समय पहले नंबर पर है पहले सही समय हो सही समय निकल गया 00:27:09 उस समय बालक को संस्कार दिया नहीं अब खींच खींच कर ला रहे हैं बालक को सत्संग में अब बात 00:27:16 बनेगी नहीं भाई वैसी बात नहीं बनेगी जब जो समय पर संस्कार दिया जाए पर हो सकता है अब आप 00:27:25 इतनी माताएं यहां पर बैठी हैं 00:27:27 और भी माताएं इसको सुनेंगे उनके मन में आए भाई अब वह समय निकल गया पर अब क्या करें अब 00:27:32 प्रार्थना करिए क्योंकि जो कार्य पुरुषार्थ से ना हो पाए उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना ही एकमात्र विकल्प है प्रार्थना 00:27:40 कर सकते हैं अब तो भाई कि हमारा बालक सद मार्ग पर चले ईश्वर इसको सद्बुद्धि दे आप माता पिता 00:27:48 है तो तो बड़े बड़े सीधे सच्चे ईमानदारी वाले भाव से आप बालक के लिए प्रार्थना कर सकते हैं प्रार्थना 00:27:56 करिए 00:27:57 हां पर जो जो क्रम मैंने आपको बताया ना कि जो बाल्यावस्था में बालक संस्कारी होगा उसकी युवावस्था शुद्ध रहेगी 00:28:06 पवित्र रहेगी जिसकी युवावस्था शुद्ध होगी उसकी वृद्धावस्था सिद्ध हो जाएगी लेकिन बाल्यावस्था में भजन कौन करेगा जिसकी माता संस्कारी 00:28:17 होगी इसको गर्भ में भजन का संस्कार मिलेगा अरे भाई बहुत पुरानी बात नहीं है 10 20 वर्ष पहले की 00:28:26 बात ले लो 00:28:28 कन्या आती थी ना तो मां उसके हाथ में गीता भागवत रामायण देती थी रामायण दी जाती थी कि बेटी 00:28:39 तुझे परिवार में संसार में रहना है पर संस्कार के साथ रहना उसको रामायण दी जाती थी गर्भ में गर्भ 00:28:48 में जीव आता था तो माता बालक संस्कारी बने इसीलिए उस गर्भावस्था में कुछ कुछ 00:28:57 नियम धारण करती थी कुछ जप करती थी कुछ तप करती थी स्वाध्याय करती थी ताकि कुछ संस्कार बालक को 00:29:07 मिले अब तो पता नहीं यह कहां आ गए हम और अभी और कहां जाएंगे पता नहीं अब तो वहां 00:29:16 आ गए कि भाई किसी को सुधारने की बात भूल जाओ अपना जीवन सुधरा रहे यही बहुत बड़ी बात है 00:29:22 यही बहुत बड़ी विजय है हम सीधे सच्चे मार्ग पर चलते रहे प्रभु ने जो रास्ता दिखा 00:29:27 दिया है हम उस पर चलते रहे भाई य यही जीवन की विजय है लो कहा समस्त सुखिनो भवंतु सर्व 00:29:35 के प्रति सद्भाव रखते हुए अपने जीवन को सीधे सच्चे मार्ग पर चलाते 00:29:42 रहे तो खैर यहां ऋषियों ने पूछा साधन करने में रुचि प्रवृत्ति है नहीं आलसी हो गए हैं लोग प्रमाद 00:29:51 हो गए हैं और बोले भाग्य भी उनका मंद है समझ भी थोड़ी है 00:29:57 सब कुछ अल्प ही अल्प तो है और क थोड़ा सा जो जीवन है वह भी अनेक अनेक प्रकार की 00:30:06 विघ्न बाधाओं से भरा हुआ है छोटा सा बालक छोटा सा बालक पहली दूसरी कक्षा में पढ़ता हुआ आज उसको 00:30:16 भी स्ट्रेस है मैंने शायद आपको सुनाया भी था एक छोटी सी नन्नी सी बच्ची मेरे पास आई थ शंभू 00:30:24 जी भी साथ में थे नन्नी सी बच्ची 00:30:27 और वो आकर मुझे कहती है कि अरे क्या बताए जेजे आपको हमको शाम तक बड़ा स्ट्रेस हो जाता है 00:30:34 छोटी सी बच्ची पाच छ वर्ष की अवस्था होगी उसकी यह बड़ी चिंता की बात है कैसी हमारी शिक्षा पद्धति 00:30:42 हो गई 10 20 किलो का तो बसता है बालक के पास 00:30:48 में कितना कितना दबाव है छोटे-छोटे बच्चों के मन चित पर और भगवान जाने स्कूलों में पढ़ाया क्या जा रहा 00:30:56 है 00:30:59 कैसी कैसी शिक्षा पद्धति कैसे कैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं कहां हमारे यहां गुरुकुल में वेद वेदांग पढ़ाया जाता 00:31:06 था शस्त्र शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी शास्त्र सिखाया जाता था कि कोई अपने मन की रक्षा कर सके 00:31:13 शस्त्र सिखाया जाता था अपने तन की रक्षा कर सके साथ साथ एक ही काल में शस्त्र और शास्त्र दोनों 00:31:21 सिखाया जाता था तन मन की रक्षा के लिए 00:31:28 हां ब बात यही है ना कि पहले पहले पहले गुरु के चरणों में बैठकर कोई विद्या अर्जित करता था 00:31:37 पहले पहले विद्या का उद्देश्य था मनुष्य को संस्कारी बनाना आज शिक्षा का उद्देश्य है मनुष्य को व्यापारी बनाना पहले 00:31:49 संस्कारी बनाने के लिए विद्या दी जाती थी आज आज केवल व्यापारी बनाने के लिए शिक्षा दी जाती है मैं 00:31:56 मैं 00:31:57 यह बात मैं केवल भारत देश का एक सामान्य नागरिक होते हुए कह रहा हूं अपने आसपास की परिस्थिति देखता 00:32:04 हूं देखता हूं कि किस किस दिशा में नई पीढ़ी जा रही है जब जब इनके पास इनके जीवन में 00:32:12 जब सदाचार नहीं होगा तो तो धर्म की बात समझ में ही कैसे आएगी समझ में नहीं आती है उसके 00:32:19 लिए भी तो संस्कार चाहिए ना एक ग्राहक चाहिए देर शुड बी रिसेप्टिविटी 00:32:30 अभी कुछ दिन पहले की बात है मुझसे किसी व्यक्ति ने पूछा कि मैंने वेज और नॉन वेज के विषय 00:32:40 में आप क्या कहते 00:32:44 हैं मैंने क भाई वैसे तो हम कुछ भी किसी से नहीं कहते हैं आपने पूछा है तो हम आपको 00:32:50 बता देते हैं मेरा मानना यह है कि आपके आसपास सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की 00:32:57 र्जा हमेशा रहती है आपके आसपास पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी हमेशा रहती है बड़ी बात ये है कि आप ग्रहण 00:33:03 किसको कर रहे हैं जब आप तामसी आहार करते हैं तामसी भोजन जब आप ग्रहण करते हैं जब आपका आहार 00:33:12 अशुद्ध हो जाता है तामसी हो जाता है फिर जो नकारात्मकता ग्रहण करने की आपकी वृत्ति है वो बढ़ जाती 00:33:19 है आप जैसा आहार ग्रहण करेंगे आपके भीतर उसी गुण का निर्माण होगा आपका आहार अपवित्र होगा 00:33:27 आहार में तमोगुण की प्रधानता होगी आपके भीतर भी तमोगुण बढ़ेगा तमोगुण बढ़ेगा तो क्या होगा उसी से मेल जोल 00:33:34 रखती हुई ऊर्जा जो है उसी से मेल खाती जो तरंगे हैं बाहर वही आपकी तरफ दौड़ दौड़ कर 00:33:45 आएंगी दुर्योधन के सामने भगवान खड़े हैं वह पहचान ही नहीं पा रहा है उसके पास आंख नहीं है आंख 00:33:51 तो है लेकिन उसके पास दृष्टि नहीं है उसके उसके सन्मुख विग्रह 00:33:57 धर्म खड़ा है उसके हित की बात उसको भगवान बता रहे हैं उसको समझ में ही नहीं आ रही क्यों 00:34:03 उसके पास ग्रहण करने की क्षमता ही नहीं है ग्रहण करने की क्षमता के लिए सात्विक जीवन चाहिए पवित्र आहार 00:34:09 चाहिए प्रकृति का आदर चाहिए क्यों मैं आप आपको बल देता हूं इस बात पर कहता हूं भाई प्रकृति का 00:34:15 आदर करना प्रकृति की अवहेलना करोगे तार टूट जाएगा अच्छी बात सुनकर भी समझ नहीं आएगी आप आप आप उसको 00:34:27 ग्रहण नहीं कर पाओगे कहने वाला कहता 00:34:32 रहेगा नहीं तो कोई आवश्यकता नहीं थी युद्ध के मैदान में श्री कृष्ण अर्जुन को युक्ता हार विहारस युक्त चेस 00:34:39 कर्मसु ये उपदेश कर रहे हैं भाई अपना खाना पीना और सोना जगना सुधारना दो बातें भगवान ने की खाना 00:34:47 और सोना ये नियमित संतुलित रहना चाहिए श्लोक है श्रीमद् भगवत गीता में भगवान क ना तो अधिक खाने वाले 00:34:56 का 00:34:58 ना अधिक सोने वाले का ना बहुत कम खाने वाले का ना बहुत कम सोने वाले का योग सधे का 00:35:04 उसके जीवन में संतुलन नहीं आएगा माने दो बातें महत्त्वपूर्ण होगी ना तभी तो भगवान कह रहे हैं जीवन में 00:35:12 तमोगुण बढ़ेगा आप बैठ जाओ समझ में आपको कुछ नहीं 00:35:19 आएगा अब आज आजकल के किसी बालक को आप यहां पर लाकर बैठा दो कभी-कभी कोई माता-पिता ले भी आते 00:35:26 हैं 00:35:26 ना फिर बाद में बच्चा मुझे अगर कभी मिले क सुना तो सब ऊपर से निकल गया हमरे तो कुछ 00:35:31 समझ में नहीं आया क्यों समझ में नहीं आया बड़ी बात ये नहीं कि आपको समझ में नहीं आया क्यों 00:35:38 समझ में नहीं आया क्योंकि धर्म की बात को समझने के लिए भी आपको भीतर से एक योग्यता चाहिए एक 00:35:46 पात्रता चाहिए वो पात्रता कहां से आएगी जब जीवन सात्विक होगा तब धर्म की बात समझ आएगी तब धर्म का 00:35:53 मर्म धर्म का जो सूक्ष्म तत्व है उसको आप अनुभव कर पाएंगे 00:36:00 हमारे यहां की शिक्षा पद्धति ऐसी थी उसका लक्ष्य केवल शरीर और शरीर का भोग नहीं था तन मन को 00:36:09 साधा जाता था जब गुरु के चरणों में कोई कोई बालक जाता था तो गुरु उसके तन मन को साध 00:36:16 था क्योंकि शरीर भी क्या है खल धर्म साधन शरीर भी धर्म साधन के लिए मिला है मन भी अनुकूल 00:36:23 हो उसके चरित्र का भी निर्माण हो उसके जीवन 00:36:26 का उसका आचरण पवित्र हो य सब बातें ये सब बातें एक एक एक उच्च एक श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति का 00:36:34 निर्माण करती थी आज तो भाई देखो ऐसा मैंने सुना है हमारे समय में तो ऐसा नहीं था पर आज 00:36:43 तो मैंने ऐसा सुना है कि बोले क्लास में टीचर बैठ नहीं सकता है ऐसा होता है ऐसा होता है 00:36:52 हा बालक बैठेगा लेकिन अध्यापक जो है वो बैठ नहीं सकता 00:36:57 बताओ य कितनी उल्टी खोपड़ी है इन लोगों की देखो जो जो जो बेचारा ग्रहण कर रहा है कायदे से 00:37:05 उसको नीचे बैठना चाहिए और गुरु को शिक्षक को ऊपर बैठना चाहिए पर यहां तो ऐसी अनीति है बालक बैठे 00:37:12 रहेंगे टांग पर टांग चढ़ाकर कुर्सी पर और अध्यापक है व बेचारा खड़ा 00:37:21 रहेगा पीड़ा क्या है हम लोगों की हम लोगों को लगता है 00:37:27 कि वेस्टर्न हो जाना मॉडर्न हो जाना मॉडर्न का अर्थ होता है समय के साथ 00:37:36 चलना युग धर्म को समझते हुए काल की गति का विचार करते हुए अपने जीवन में अपने जीवन में कुछ 00:37:44 परिवर्तन लाना इसको कहते हैं मॉडर्न हो जाना माने समय के साथ चलना इसकी बात तो श्री गीता जी में 00:37:49 भगवान ने भी कही है समय के साथ 00:37:54 चलना पर किसी 00:37:56 के जैसा हो जाना मॉडर्न हो जाना थोड़ी है मुझे भी कुछ दिन पहले यह बात किसी ने बताई बोले 00:38:02 आजकल टीचर बैठ नहीं सकते क्लास में बैठ नहीं सकते बच्चे बैठेंगे टीचर खड़ा रहेगा और धन्य ऐसे नियम बनाने 00:38:11 वाले भी और धन्य है वह माता-पिता भी जो जो ऐसी जगह पर अपने बच्चों को पढ़ाकर गर्व महसूस करते 00:38:20 हैं उनको लगता है बड़ी गौरव की बात अब भाई य चर्चा 00:38:26 होती है तो हर विषय पर बात होनी 00:38:36 चाहिए और यहां ऋषियों ने य ऋषियों ने इस चर्चा का आरंभ ही इस प्रश्न से किया है भाई ऐसी 00:38:44 ऐसी गति मति हो गई है कलयुग के मनुष्य की क्या करें उसके लिए कोई साधन बताइए क्योंकि उसका जीवन 00:38:51 विघ्न बाधाओं से घिरा है भीतर बाहर घोर तम 00:38:56 गुण है आचरण की पवित्रता नहीं है 00:39:03 धर्माचक्र भी बहुत है उसमें भी कोई एक साधन निश्चित नहीं है अनेक अनेक प्रकार के कर्मों का विधान है 00:39:13 आपकी मेरी तो क्या कहे या हरिराम व्यास जी जैसे पंडित प्रवर वो भी जीवन का जीवन का कितना काल 00:39:19 इन्हीं शास्त्रों में उलझे रहे और कह रहे कि वो तो इतने बड़े हैं 00:39:26 ऋषियों ने कहा कि बोले भाई ये शास्त्र पुराण आदि इतने विस्तृत है कि एक जीवन काल में तो उनका 00:39:33 एक अंश भी पूरा पूरा सुनना समझना संभव नहीं है सब शास्त्र पढ़कर फिर फिर उसमें से सार की बात 00:39:42 निकालना कोई हमारे सामर्थ्य की बात है हमारे सामर्थ्य की बात तो नहीं है मेरी तो नहीं है आपकी हो 00:39:47 तो आप करो हमारी तो नहीं है हमें तो हमारे संतों ने सिखाया बिलय खसम को कमायो 00:39:56 हमारे नागरी दस जी कहते बोले रस कों ने सार सार की बात निकाल कर दे दी इसको ग्रहण करिए 00:40:03 ध्रुव दस जी ने सिद्धांत विचार में यही तो कहा बोले विवेकी सोई जो सार की बात गहे साधु ऐसा 00:40:14 चाहिए जैसा सूप सुभा सार सार को गही रहे थूथा दे उड़ा 00:40:28 ऋषियों ने कहा आप सार की बात जानते हैं देखो यह कथा पदे पदे कुछ कहती चलेगी सुनना हमारा लक्ष्य 00:40:39 क्या है कहे कथा और अर्थ विचारे यह कथा पदे पदे कुछ कहती चलेगी ऐसे अंग्रेजी में कहते हैं कि 00:40:47 देर स्टोरी बिटवीन द लाइंस कुछ कुछ कह दिया गया है लेकिन कुछ इन शब्दों के गर्भ में है 00:40:57 कुछ रहस्य इन शब्दों के भीतर छिपा है कथा कुछ कहती चलेगी देखो जो ऋषि पूछ रहे हैं आप देखो 00:41:05 उन ऋषियों की सामर्थ्य क्या होगी 1000 वर्ष के अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं कि वह साधारण सामर्थ्य वाले 00:41:13 ऋषि तो इसका मतलब है नहीं उनकी सामर्थ्य दिव्य है उनके पास दिव्य शक्ति है उसी शक्ति के बल पर 00:41:20 ही तो एक सहस्त्र 1000 वर्ष के अनुष्ठान का संकल्प लेकर बैठे हैं ऐसा नहीं 00:41:26 वो शास्त्र पुराण नहीं जानते होंगे शास्त्रों पुराणों में क्या लिखा है ऐसा नहीं है कि वह नहीं जानते पर 00:41:34 व आपको मुझे बता रहे हैं कि कल्याण चाहते हो तो गुरुजनों के चरणों में बैठकर श्रद्धापूर्वक पहले अपने कल्याण 00:41:42 का मार्ग गुरुजनों से पूछना चाहिए यह पहला पहला चरण है व वो वो श्री भगवान के दिखाए मार्ग पर 00:41:54 पूरी निष्ठा से चलने का प्रयास 00:41:56 कर रहे आपको मुझे दिखा रहे हैं सिखा रहे हैं प्रथम भगति संतन करी संगा पहले तो शी सूत जी 00:42:07 के पास गए और सकतम सतमा सनम श्रेष्ठ आसन पर उनको बैठाया और फिर क्या कहा कथा सुनाई दूजी रती 00:42:17 मम कथा 00:42:25 प्रसंगा 00:42:27 प्र बहिन श्रद्धा नाना त्मा 00:42:38 संपसी आप अपनी बुद्धि से प्राणी मात्र का जिससे कल्याण हो वह विधि वह मार्ग हमको बताइए हम वह सुनना 00:42:48 चाहते हैं जिसको सुनने से अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो और कभी आपको मैंने संकेत किया था अत 00:42:56 की शुद्धि ही सबसे बड़ी सिद्धि है यही सबसे बड़ी सिद्धि है अंतःकरण की शुद्धि य मन हो निर्मल तुम्हारी 00:43:07 कृपा से वो सुनाइए जिसको सुनने से मन निर्मल हो जाए हो कोई ऐसो रे भेटे 00:43:19 सं मेरी ला है सगली चिं 00:43:27 कुरस मेरो रंग ला इससे पहले ही गुरु साहब ने एक बात कही है पढ़े रे सगले 00:43:39 वेद नहीं चूके मन खेद अभी आपसे जो मैं कह रहा हूं ना कि ऋषि मुनि साधारण तो नहीं है 00:43:49 हजारों हजार वर्ष की इनकी आयु है बड़ा श्रेष्ठ साधन यह लोग किए बैठे हैं पर कहीं ना कहीं 00:43:56 इनका यह प्रश्न पूछना यह बता रहा है यह बता रहा है पढ़े रे सगले वेद नहीं चूके मन खेद 00:44:09 एक खिन नाद रही मेरे घर के 00:44:16 पंचा लेकिन यह जो विकार है फिर फिर फिर अंकुरित हो जाते हैं फिर फिर अंकुरित हो जाते इसलिए 00:44:26 हो कोई ऐसो रे सुखदाई जिन हरि की कथा सुनाई सस भेटे गति हो 00:44:43 हमारी सस भेटे गति होए 00:44:52 हमा हे स जी कुछ ऐसी बात सुनाइए जि 00:44:56 जिसको श्रवण करके हमें हमें अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो तो आज की वार्ता यही श्री जी के चरणों में 00:45:03 निवेदन करते हैं महाराज श्री के चरणों में प्रणाम आप सबके हृदय स्त प्रभु को भाव प्रभु को 00:45:24 नमन

Gist in Hindi with timestamps & English

ऐसे विषम समय में कैसे हो भजन?? | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 5 |

http://www.youtube.com/watch?v=FiC1LhMa_q4

[00:00:30] ऋषियों ने ऐसा कल्याणकारी प्रश्न पूछा है जिससे केवल उनका ही नहीं बल्कि समस्त समाज और जीव मात्र का कल्याण हो सके।

The sages asked such a welfare-oriented question that it could benefit not only themselves but the entire society and all living beings.

[00:01:16] संत सदैव जीवों पर असीम दया करते हैं और प्रभु से निरंतर प्रार्थना करते हैं कि दीन दयाल तक जीवों की पुकार पहुँचे।

Saints always show boundless compassion toward living beings and continuously pray to the Lord that the cries of the distressed may reach the Merciful Lord.

[00:04:39] मानव मन सदा सांसारिक काम, वासना और कामनाओं से भरा रहता है, जिसे केवल संतों की कृपा और सत्संग से ही निर्मल किया जा सकता है।

The human mind is always filled with worldly desires, passions, and cravings, and it can be purified only through the grace of saints and Satsang.

[00:09:29] वर्तमान कलियुग में प्राणी मात्र के लिए सबसे सुलभ, श्रेष्ठ और सार्वभौमिक धर्म केवल भगवन नाम का निरंतर जप करना है।

In the present age of Kali, the easiest, highest, and universal spiritual practice for all living beings is the constant chanting of the Lord’s Name.

[00:10:59] सत्संग और भगवद्भाव के प्रभाव से हृदय में जोत से जोत जलती है, जिससे संपर्क में आने वाले अन्य लोगों का जीवन भी प्रकाशित होता है।

Through the influence of Satsang and God-consciousness, one lamp of the heart lights another, thereby illuminating the lives of those who come into contact with it.

[00:12:40] समाज का निर्माण व्यक्तियों से ही होता है, इसलिए जब प्रत्येक व्यक्ति का मन सुधरेगा और शांत होगा, तभी पूरे समाज में वास्तविक शांति आएगी।

Society is made up of individuals; therefore, true peace will come to the entire society only when the mind of each individual becomes refined and peaceful.

[00:14:12] कलियुग में मनुष्य की आयु अत्यंत कम है और साधन का समय सीमित है, अतः बिना विलंब किए तीव्र भक्ति मार्ग अपनाना चाहिए।

In the age of Kali, human life is extremely short and the time available for spiritual practice is limited. Therefore, one should adopt the intensive path of devotion without delay.

[00:16:14] कलियुग में तमोगुण और प्रमाद के अत्यधिक प्रभाव के कारण जीवों की रुचि और प्रवृत्ति भजन-साधन में कम होती जा रही है।

In the age of Kali, due to the overwhelming influence of the mode of ignorance and negligence, the interest and inclination of living beings toward devotional practice are gradually declining.

[00:25:11] बाल्यावस्था में दिए गए श्रेष्ठ संस्कार ही युवावस्था को पवित्र रखते हैं और वही वृद्धावस्था में भगवद्भक्ति को सिद्ध करते हैं।

The noble values and impressions given during childhood are what keep youth pure and ultimately establish devotion to God in old age.

[00:30:59] वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मात्र व्यापारिक न होकर गुरुकुल परंपरा की तरह संस्कारी, सात्विक और तन-मन को साधने वाली होनी चाहिए।

The present education system should not be merely commercial; like the Gurukul tradition, it should cultivate good values, purity, and discipline of both body and mind.

[00:33:12] तामसिक और अशुद्ध आहार से तमोगुण बढ़ता है, जबकि सात्विक आहार और जीवनशैली से ही आध्यात्मिक व धर्म के मर्म को ग्रहण करने की पात्रता आती है।

Tamasic and impure food increases the mode of ignorance, whereas only a Sattvic diet and lifestyle create the qualification to understand the essence of spirituality and Dharma.

[00:41:34] शास्त्रों के गहन सार को समझकर अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त करने के लिए श्रद्धापूर्वक संतों और गुरुजनों की शरण में जाना आवश्यक है।

To understand the profound essence of the scriptures and attain purity of the inner self, it is essential to respectfully take shelter of saints and revered Gurus.

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Tuesday, August 4, 2026

ये है कथा का असली प्रसाद | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 3 | Shree Hita Ambrish Ji

ये है कथा का असली प्रसाद | श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 3 | Shree Hita Ambrish Ji

First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.

00:00:00 आरंभ में ही आरंभ में ही भगवान वेदव्यास ने यह कह दिया है सर्व वेद इतिहासा नाम सारम सारम समुद्रत

00:00:09 मैंने सब वेदों का और पुराणों का जो सार है वह श्रीमद् भागवत में रख दिया है और फिर इसकी 00:00:18 महा महिमा क्या है इसके श्रवण मात्र की इच्छा यदि किसी के हृदय में हो जाए अनेक जन्मों का संचित 00:00:24 पुण्य हो संतो गुरुजनों की कृपा हो और कहीं मन में इच्छा हो जाए कि 00:00:30 एक बार हम भी श्रीमद् भागवत का श्रवण कर ले सुन ले क्योंकि वहां वहां गोपांगने कह रही है यह कथा 00:00:36 कैसी है श्रवण 00:00:43 मंगलम देखो हमारा कल्याण हो कि नहीं आपका हो जाएगा यह नहीं कहा है कथन मंगलम है श्रवण मंगलम आपका 00:00:53 हो जाएगा सुनने मात्र से शिव दम 00:01:01 शिवम ददाति शिवम जो कल्याण का दान करने वाली कथा कल्याणी है कल्याण कर देने वाली है और जीव का 00:01:10 कल्याण कब होता है संस्कृति से मुक्त होने पर ही जीव का कल्याण होता है जीव शिव स्वरूप कब होता 00:01:15 है जब आवागमन के द्वंद से सदा के लिए मुक्त हो जाए जब ये आना जाना ये भूलना भटकना सदा 00:01:21 के लिए समाप्त हो जाए जब सच्चे सुख की प्राप्ति हो जाए तभी कहना चाहिए भाई कल्याण हुआ है जब 00:01:27 मन के संशय दूर हो जाए 00:01:30 लक्ष्य दिखाई पड़ने लगे मार्ग पर निर्बाध गति हो जाए तब समझना चाहिए कल्याण हुआ है ये श्रीमद् भागवत उसी 00:01:39 उसी कल्याण का दान करने वाली है शिव दम और घोषणा कर रहे हैं भगवान वेदव्यास ताप त्रयोन्मूलन आदि 00:01:48 भौतिक आदि दैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के ताप शाप दूर करने वाली है आदि भौतिक ताप क्या है गोस्वामी 00:01:58 जी ने बताया 00:02:01 नहीं दरिद्र सम दुख जग 00:02:06 माही दरिद्रता है और आदि व्याधि है यह सब यह सब आदि भौतिक ताप 00:02:16 है और कभी-कभी आप देखते हो कि आप तो बिल्कुल सीधे रास्ते चल रहे थे एकाएक एकाएक कोई 00:02:22 भयानक दुख आकर सिर पर टूट 00:02:28 पड़ा यह सब क्या 00:02:30 ये आदि भौतिक ताप है फिर जो मन में विक्षेप है ये जो मन की मन की भटकन है जो 00:02:39 मन बार-बार खींच कर खींचकर विषय के अंधकूप में ले जाकर गिरा देता है ये क्या ये आदि दैविक ताप है 00:02:49 और आध्यात्मिक ताप तो एक ही है कि जीव भगवान से बिछड़ा है ये आध्यात्मिक ताप है ये तीनों प्रकार 00:02:57 के ताप दूर करने वाली ये कथा है 00:02:59 यह गाथा है जैसे तुलसी बाबा मानस के लिए कहते हैं ना मंगल करण कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ 00:03:18 की मंगल करण कलि मल हर मंगल करती है कलि मल हरती है 00:03:32 ऐसे कहा वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् और कल हमने विस्तार से चर्चा की वेद्यं जो 00:03:40 जानने योग्य है उसी को जना रही है और जानने योग्य क्या है जिसको जानकर सुख मिले शांति मिले जीवन 00:03:46 में स्थिरता आए अपने स्वरूप की सिद्धि हो जिसको जानकर जिसको जानने से अंतःकरण शुद्ध हो वही जानने योग्य 00:03:58 है 00:04:03 कितना कितना अनर्थ जन्य जिसको सुनने से जिसको जानने से अनर्थ होता है कितना अनर्थ 00:04:13 जन्य विचार हम अपने भीतर डाल लेते हैं यहां वहां से कुछ भी सुनकर कुछ भी सुनकर कल भी मैंने 00:04:21 कहा था मैं आज फिर दोहराता हूं कि अच्छा सुनोगे नहीं तो फिर अच्छा सोचोगे भी नहीं 00:04:29 अच्छा सोचोगे नहीं तो अच्छा समझ नहीं पाओगे और सोचना समझना ही यदि ठीक नहीं हुआ तो करना ठीक कैसे 00:04:37 होगा इसलिए बहुत विचार कर भक्ति मार्ग के आचार्यों ने भी और स्वयं भगवान ने भी कहा प्रथम भक्ति श्रवण 00:04:48 अच्छा सुनो पहली भक्ति है कि इस इंद्रिय को भजन में लगाइए इस इस इंद्रिय को खींच कर सन्मार्ग पर 00:04:56 लेकर जाइए कभी आप 00:04:59 को मैंने कहा था कि विषय का सेवन करने से भी ज्यादा भयानक है विषय का चिंतन करना विषय का 00:05:08 चिंतन कैसे होता है विषय की वार्ता श्रवण करने से ही विषय का चिंतन होता है आप देख लेना आप 00:05:13 इसका अनुभव कर लेना आप विषय वार्ता का श्रवण करोगे उससे आपका चिंतन दूषित हो जाएगा उससे आपका विचार दूषित 00:05:24 हो जाएगा जैसे 00:05:29 एक व्यक्ति आपके पास में खड़ा धूम्रपान कर रहा है आप नहीं कर रहे पर वो कर रहा है पर 00:05:35 उसकी थोड़ी बहुत क्षति तो आपको भी हो रही है इसको कह देते हैं पैसिव स्मोकिंग आपके साथ रहने वाला 00:05:45 व्यक्ति अगर धूम्रपान करता रहता है आप नहीं करते तो आपका स्वास्थ्य भी कहीं ना कहीं थोड़ा घना उससे प्रभावित 00:05:52 होगा ऐसे दो लोग व्यर्थ की वार्ता कर रहे हैं दो लोग विषय की चर्चा कर रहे हैं आपने कहा 00:05:57 भाई हम तो नहीं कर रहे हम तो केवल बैठे थे ना ना 00:05:59 बैठना भी ठीक नहीं है कान से वह भीतर जाएगा आपके चिंतन को आपके विचार को दूषित करेगा आप कभी 00:06:05 इसका अनुभव करना पर बात क्या है कि जीवन में सत्संग के अभाव में विवेक रहता नहीं और व्यक्ति सावधान 00:06:12 रह नहीं पाता और भूल तो ऐसी है कि भूलते भूलते व्यक्ति को यह भी भूल जाता है कि मैं 00:06:20 भूल कर रहा हूं भूल कैसी होती है भूल भूल क्या है भूलते भूलते व्यक्ति यह भी भूल जाता है 00:06:28 कि मैं गलत कर रहा हूं कि मैं 00:06:29 भूल रहा हूं यदि गलती को आप बार-बार दोहराते हैं आप ध्यान रखना आप वहां पहुंच जाओगे जहां गलत आपको 00:06:37 ठीक लगने लगेगा आपको लगने लगेगा यही ठीक 00:06:43 है इसलिए कल आपको मैंने निवेदन किया था तुलसी बाबा कह रहे हैं कि विधि सकल जीव जग रोगी 00:06:51 मानस रोग है तो सभी को ही पर बिरला कोई होता है जो जो पहचान लेता है कि कि मेरे 00:06:57 भीतर यह रोग है 00:06:59 कौन पहचानता है जिसके जीवन में विवेक का प्रकाश होगा जिसकी बुद्धि विवेक से प्रकाशित होगी वही पहचानेगा हां 00:07:07 भाई मैं रोगी हूं वही दौड़ेगा सदगुरु रूपी वैद्य के पास वही याचना करेगा गुरु से औषधि की वही पथ्य 00:07:18 कुपथ्य का विचार कर पाएगा जो पहले यह स्वीकार करे मेरे को रोग 00:07:28 है 00:07:30 तो घोषणा करते हुए कह रहे हैं भगवान वेदव्यास वेद वृक्ष का यह पका हुआ फल है और फिर इसके 00:07:37 माधुर्य का क्या कहना क्योंकि शुकमुखादमृतद्रव 00:07:44 संयुतम् भगवान की बात ऐसे कोई कहे तो कहानी लगती है और भगवान की बात जब कोई संत कहता है 00:07:55 जब कोई भक्त कहता है उसका प्रभाव कुछ और होता है 00:08:00 हमारे प्रातः स्मरणीय परम श्रद्धेय वात्सल्य भाव मूर्ति श्री गोपालाचार्य जी महाराज जब कथा सुनाते थे तो ऐसी ऐसी विचित्र 00:08:10 विचित्र कथाएं सुनाते थे जो किसी ने कहीं ना पढ़ी हो ना सुनी हो एक दिन उनसे किसी ने पूछा 00:08:17 बोले महाराज आप यह सब कथा सुनाते हो यह हमने कहीं किताब में तो पढ़ा नहीं है तो श्री महाराज 00:08:26 जी मुस्कुराते हुए कहने लगे बोले जैसे 00:08:29 बालक की सब बात मां के पेट में होती है ना ऐसे भगवान की सब बात भक्तों के हृदय में 00:08:35 होती है बोले पोथी किताब में नहीं लिखी रहती वो तो भक्त जानते हैं भगवान के पास तो भगवान के 00:08:40 भक्त रहते हैं वह जानते हैं इनका स्वरूप कैसा है इनका स्वभाव कैसा है भगवान की लीला का रहस्य केवल 00:08:46 भगवान का भक्त जानता है ना कोई और जानता है ना कोई और जान सकता है सोई जाने जेहि 00:08:59 देहु जनाई इसलिए रैदास कहते हैं बलिहारी उनकी है जो केवल कथा नहीं कहते कहे कथा और अरथ विचार और 00:09:18 अर्थ विचार तो लीला का रहस्य जानता है कभी आपको मैंने कहा था ये जो कथा शब्द है ना इसका 00:09:26 इसका उद्भव कथम से हुआ क्यों 00:09:30 कथा यह नहीं कहती क्या हुआ यह तो इतिहास भी बता देता है क्या हुआ राम आए कृष्ण आए श्री 00:09:41 राम ने यह लीला की श्री कृष्ण ने यह लीला की क्या हुआ कालक्रम में क्या हुआ यह तो इतिहास 00:09:48 भी बता देता है क्यों हुआ कथा तो वह रहस्य है लीनं लाति लीला 00:10:00 भगवान की लीला का अर्थ क्या है जो रहस्य है जो गुप्त है उसको प्रकट करना उसको उजागर करना 00:10:08 श्रुति भी नहीं जानती भगवान का स्वरूप क्या है भगवान का स्वभाव क्या है थोड़ा सा एक इशारा करके वो 00:10:14 मौन हो जाती है चुप हो जाती है इससे अधिक वो जानते नहीं इससे अधिक उनकी पहुंच नहीं है भगवान 00:10:19 के भक्त जानते हैं अभी कल परसों की तो बात है जब हम अर्जुन और भीष्म जी की चर्चा 00:10:29 कर रहे थे कल कल शायद मेरे से यहां पर किसी ने पूछा बोले जो आपने सुनाया ये कौन से 00:10:36 ग्रंथ में ग्रंथ में नहीं है भाई ग्रंथ में नहीं है भगवान की सब बात ग्रंथ में नहीं लिखी है 00:10:45 भगवान की सब बात तो भक्तों के हृदय में होती है जो आपसे हम कहते हैं ना नाम जपिए नाम 00:10:52 जपते जपते क्या होगा हृदय में रूप का प्रकाश होगा उस रूप के प्रकाश में प्रभु की लीला का 00:10:58 दर्शन होता है 00:11:01 क्यों मैं बार-बार आपसे कहता हूं भाई सारी शक्ति नाम जप में लगाओ सब सब साधन छोड़कर लग जाओ दिन 00:11:09 रात नाम जप में लग जाओ सास सास सिमरौ गोबिंद लक्ष्य यही होना चाहिए हमारा कि एक उश्वास बिना नाम 00:11:17 के नहीं जाए यह सोचोगे ना दिन रात भजन करें तब थोड़ा भजन हो पाएगा आप यह संकल्प करो कि 00:11:24 मैं दिन रात भजन करूंगा तब थोड़ा भजन हो पाएगा तब भजन में थोड़ी 00:11:29 निरंतरता आ पाएगी आप सोचो थोड़ा सुबह शाम समय मिलेगा कर लेंगे तो वो तो मैं आपको उदाहरण दिया करता हूं 00:11:36 भाई वह तो खारे पानी के कुएं में खांड की चुटकी डालने जैसा है उससे कुएं का जल मीठा नहीं 00:11:43 हो जाएगा वो तो खारा ही रहेगा ईमानदारी से यह संकल्प करोगे कि भाई दिन रात भजन करेंगे तब थोड़ा भजन 00:11:50 होगा तब थोड़ी भजन में निरंतरता आएगी तो निरंतर भजन करते-करते नाम 00:11:59 बीज है ना सेवक जी महाराज कह रहे ललितादिक श्यामा अरु श्याम श्री हरिवंश प्रेम रस धाम नाम प्रगट 00:12:08 जग जानिए नाम बीज है फिर झलकने लगता है पहले नाम क्या करता है पहले नाम हृदय के दर्पण को 00:12:17 स्वच्छ करता है वो जो दर्पण पर धूल जमी है ना जन्मों जन्मों की पहले नाम उसका मार्जन करता है 00:12:24 क्यों नाम जपते ही आपको मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है ना भाई क्यों आनंद नहीं आ रहा 00:12:29 सुना तो था नाम जपेंगे तो दर्शन होगा पर नहीं हो रहा है भाई पहले नाम क्या करेगा चेतोदर्पणमार्जनं 00:12:35 प्रक्रिया बताई है चैतन्य महाप्रभु ने प्रथम श्लोक में इस ये जो आठ श्लोक श्री चैतन्य महाप्रभु ने 00:12:46 कहे उसके प्रथम श्लोक में श्री महाप्रभु जी ने स्पष्ट किया है क्या होगा कैसे होगा कहा चेतोदर्पणमार्जनं 00:12:52 भवमहादावाग्नि निर्वापणं फिर कहा 00:12:59 कैरवचंद्रिका वितरणं विद्यावधू जीवनम् इसके बाद इसके बाद जब रूप का दर्शन होगा आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं 00:13:11 पूर्णामृतास्वादनं 00:13:19 सर्वात्मस्नपनं 00:13:24 संकीर्तनं भाई झटपट भी ये कार्य हो सकता है 00:13:28 थोड़ी देर भी लग सकती है पर देर लग रही हो बस यही यही सोचना चाहिए यही विचारना चाहिए भाई 00:13:37 कि मेरे मन के दर्पण पर बहुत धूल होगी पर वह व्यर्थ नहीं जा रहा है वो व्यर्थ नहीं जा 00:13:45 रहा है नाम का जप व्यर्थ नहीं जा सकता कोई भी कोई भी साधन कोई 00:13:59 विधि बंध्या हो सकती है नाम का जप व्यर्थ नहीं जा सकता आपको नहीं पता चल रहा कोई बात नहीं 00:14:04 बहुत भारी रोग होता है कोई दवा लेते तो तुरंत आराम नहीं आ जाता है ना बड़ा भारी रोग होता है 00:14:12 डॉक्टर कहता है भाई साल दो साल दवाई करनी पड़ेगी शुरू के दो चार महीने कोई आराम नहीं आता है 00:14:16 लेकिन दवा ने भीतर जाकर अपना कार्य करना आरंभ कर दिया है कल यही तो आपको मैं निवेदन कर रहा था 00:14:25 भाई श्रद्धा और विश्वास ही हमारी अर्जित संपत्ति है 00:14:28 गुरु के वचनों में श्रद्धा और भगवान के नाम में विश्वास बना रहे मतंग ऋषि ने शबरी जी को मंत्रराज 00:14:40 श्री राम का नाम जपने के लिए कहा और कहा तू प्रतीक्षा करना राम आएंगे राम आ गए गुरु ने 00:14:52 कहा था अपनी ओर देखती थी तो बड़ी निराशा होती थी स्वयं कह रही है 00:14:58 अधम ते अधम अधम अति नारी 00:15:06 तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी कहहु कवन बिधि 00:15:16 अस्तुति तोरी अपनी ओर देखती थी तो बड़ी निराशा होती थी कैसे आएंगे आसपास देखती थी तो और मन निराश हो 00:15:23 जाता था बड़े बड़े ऋषि 00:15:27 मुनि 00:15:30 नियम और कैसे कैसे कठिन साधनों से स्वयं को साध रहे हैं मैं क्या कर रही हूं बस सोहनी लेकर 00:15:37 और रोज मार्ग बुहारती हूं यहां वहां से जंगल से ऐसे थोड़े से कंद मूल फल बीन कर ले आती 00:15:44 हूं कहां देखो इनका साधन देखो योग यज्ञ जप तप व्रत पूजा षट संपत्ति से संपन्न ऋषि मुनि और कहां 00:15:53 देखो मैं इनके सन्मुख भी नहीं जा सकती उस 00:15:58 समय की व्यवस्था ऐसी थी कि शबरी को तो उन ऋषि मुनियों के दर्शन का भी अधिकार नहीं था कि 00:16:04 उनके सन्मुख चली जाऊं उनका दर्शन कर लूं अपनी ओर देखती थी बड़ी निराशा होती थी उस निराशा से कौन 00:16:12 बाहर निकालता था महाराज कहते हैं वाणी में बांह पकड़ि कढ़ि लीने अपने उस निराशा से कौन बाहर निकालता था 00:16:21 उस निराशा से गुरु का शब्द बाहर निकालता कि नहीं भाई अपनी ओर देखूं तो फिर तो कोई संभावना नहीं 00:16:27 है पर पता नहीं क्यों 00:16:29 मेरे गुरु मुझ पर ये अकारण कृपा करके चले गए हैं वो कह गए हैं राम आएंगे तेरी कुटिया में 00:16:35 राम आएंगे और राम आ 00:16:43 गए इसीलिए मैं तो आपको कई बार कहता हूं भाई मन बहुत उछल कूद करे आपको लगे भाई कोई परिणाम 00:16:50 हमारे जीवन में नहीं आ रहा है भजन का हम तो कुछ नहीं देख पा रहे हैं कोई आनंद नहीं 00:16:55 है कोई सुख नहीं है पर 00:16:58 गुरु की आज्ञा में बने रहना और मैं तो कहता हूं मन को एक ही बात कहनी है हमको नाम 00:17:03 जप क्यों करना है गुरु की आज्ञा है बस और विश्वास रखना कृपा पात्र सोई जानिए जो आज्ञावर्ती होय 00:17:13 गुरु की आज्ञा में बने रहने वाला एक दिन भगवत कृपा का पात्र अवश्य होता है अवश्य होता है होता 00:17:20 ही 00:17:24 है होता ही है श्री 00:17:28 विट्ठल दास जी को जब पत्र लिखा श्री महाप्रभु जी ने तो श्री प्रिया जी को महाप्रभु कह रहे तिहारे 00:17:36 स्थापेरु मार्ग विषय अविश्वास अज्ञानी को होता है वस्तुतः इस इस गुरु परंपरा के इस गुरु परंपरा के संस्थापक 00:17:47 स्वयं भगवान हैं इसकी रक्षा भगवान कर रहे हैं सदा हर काल में कर रहे हैं और करते रहेंगे जो 00:17:55 गुरु की आज्ञा में बना रहेगा एक दिन भगवत 00:17:58 कृपा का पात्र हो जाएगा नाम जपोगे जपते जपते एक समय ऐसा आएगा जब आंख बंद करोगे और प्रभु के 00:18:05 नामी के नामी के स्वरूप की झलक मन के दर्पण पर मन के मुकुर पर पड़ने लगेगी उसके उसके प्रकाश 00:18:15 में फिर लीला का दर्शन होता है फिर भगवान की लीला का रहस्य समझ में आता है जब रहस्य समझ 00:18:21 में आता है देखो आप स्टेडियम में बैठकर खेल देख रहे हो लेकिन आपको खेल का नियम पता नहीं 00:18:28 नहीं आपको आनंद आएगा नहीं आएगा खेल का आनंद तब आता है ना जब आपको खेलना भले ना आता हो 00:18:36 लेकिन खेल का नियम पता हो ऐसे श्री ठाकुर जी की लीला का आनंद तब आता है जब लीला का रहस्य 00:18:41 समझ में आ जाता 00:18:45 है कैसा कैसा प्रलाप लोग करते हैं श्री कृष्ण की लीला के विषय में रास लीला के विषय में जब 00:18:52 चीर हरण की बात आती है तब कैसा कैसा प्रलाप मूर्ख लोग करते हैं कैसी कैसी बातें लोग कहते 00:18:59 और वही उसी समय जो भगवान के भक्त हैं जिनको भगवत कृपा से भगवान की लीला का रहस्य समझ 00:19:06 में आ गया है जो कथा का अर्थ कथा का मर्म जान गए हैं उसी लीला का पुनः पुनः पुनः 00:19:15 पुनः गान करके आनंद में मगन रहते हैं अरे माया काल से परे हो जाते हैं कागभुशुंडि श्री 00:19:21 राम की कथा कहते कहते कैसी अद्भुत कैसी विलक्षण स्थिति को प्राप्त कर गए हैं 27 कल्पों 00:19:29 से राम कथा कह रहे हैं भगवान की आराधना कर रहे जब जब भगवान का अवतार होता है तब तब 00:19:35 जाते हैं और भगवान लीला का दर्शन करते हैं यह स्थिति यह सिद्धि कैसे पाई गरुड़ जी ने पूछा भाई 00:19:42 कैसे मिल गया आपको यह स्थान ऐसी सिद्धि कहां से प्राप्त हुई बोले भाई भगवान का गुण गाते हैं गाया 00:19:57 गाया 00:19:59 हरि गुण 00:20:02 गाया गाया गाया हरि गुण गाया गाया गाया हरि गुण गाया काल ब्याल सों बांचि माई री मैं 00:20:29 सांवरो 00:20:33 रंग राची सांवरो 00:20:39 रंग राची कह रहे भाई इस फल में ना छिलका है ना गुठली है रस ही रस है केवल रस ही है 00:20:47 इसमें इसलिए रसिकों के लिए है मुहुर्मुहो रसिका भुवि भावुका बार बार बार बार इसको 00:20:58 तो सुनना नहीं है इस रस का पान करना है पिबन्ति 00:21:05 कथामृतं श्रवणपुटेषु सम्भृतं पुनन्ति विषयविदूषिताशयं और कह रहे इसका इसका प्रताप क्या है व्रजन्ति ते चरणसरोरुहान्तिकं 00:21:17 बोले आपको कहीं नहीं जाना है आप तो बस बैठे बैठे कथा सुनते रहना इसलिए जिनकी कथा का 00:21:26 श्रवण कर रहे हो ना वो आ जाएंगे 00:21:29 वह आ जाएंगे वह व्रजन्ति ते चरणसरोरुहान्तिकं वो हृदय तक आ 00:21:37 जाएंगे ये यह यह साधन यह विधि अमोघ है तत्काल आनंद का दान करने वाली है शिव दम कल्याण कराने 00:21:49 वाली है त्रितापों का उन्मूलन कर देने वाली है सहज है सरल है सुगम है बस प्रभु की 00:21:58 कृपा इतनी हो क्योंकि पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता प्रभु की कृपा इतनी हो कि कोई ऐसो रे 00:22:12 सुखदाई जिहिं हरि की कथा सुनाई जासों भेंटे गति होय 00:22:26 हमारी कल जो हम 00:22:28 बात कर रहे थे जब तक मन लगा रहेगा ना बाहर किसी खटपट में मान लो कथा कहने वाले का 00:22:35 मन अगर लगा है बाहर किसी व्यवहार में किसी व्यापार में मन बुद्धि में कोई और व्यापार चल रहा है 00:22:45 जब तक तन्मयता नहीं होगी तब तक इसका रस प्रकट नहीं होता सेवक जी महाराज ने स्पष्ट किया है सोई 00:22:53 सेवक रसिक अनन्य विमल यश विस्तरै 00:22:59 कथा कहने वाले का केवल एक उद्देश्य हो भाई भगवान की विमल यश का विस्तार करना है केवल उसके मन 00:23:06 का एक ही भाव कि भाई हरि गुण गाना है बस इससे क्या होगा होगा या नहीं होगा यानी इसके 00:23:14 पीछे कोई कोई अन्य वासना कोई अन्य लालसा ना हो होते ही क्या होगा कथासारस्ततोगतः कथा का 00:23:22 जो सार है कथा का जो वास्तविक रस है कथा का जो आनंद है कथा का जो फल है 00:23:28 कथा का फल क्या है कथा का फल भगवान है कथा का फल भगवान की भक्ति है गरुड़ जी अंत 00:23:34 में यही कहकर तो गए मेरा मोह नष्ट हो गया मेरे सारे संशय दूर हो गए आपकी कृपा से आपकी 00:23:42 कृपा से श्री रघुनाथ जी के चरणों में मेरी नवीन भक्ति हो गई है मेरा अनुराग नवीन हो गया है 00:23:50 नया नित्य नवोन्मेषिणी भावना ये कथा का फल है 00:23:58 इसीलिए कभी आपसे मैंने कहा था कि अभी हमारे जीवन में नाम तो आया है पर नाम की खुमारी नहीं 00:24:03 आई है जिस नाम की खुमारी को पाकर पाकर संत गा रहे हैं नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात 00:24:19 यह जो जितने संतों के शब्द हैं ये सब नाम की खुमारी तो है अब ना रहूंगी अटकी एक स्थान 00:24:27 पर मीरा 00:24:27 कह रही कि सुन री सखी तू चेतन होके मैं मन की बात कहूं बरजी मैं काहू की नहीं रहूं मुझे 00:24:36 रोकने वाला कोई नहीं है हो मेरो कोई ना रोकन 00:24:44 हार मगन हुइ मीरा चली अब मुझे रोकने वाला कोई नहीं 00:24:55 है बस बड़ी बात है कि 00:24:57 ऐसा कोई सुनाने वाला मिल जाए और फिर ऐसा कोई श्रोता श्रोता सोई परम सुजान सुनत चित रति करै ऐसा 00:25:07 कोई श्रोता इसलिए तो दो दिन पहले आपसे कह रहा था कि भाई जो जो जिसको श्रवण की इच्छा हो 00:25:16 वो 00:25:20 आए हमको बहुत लोगों की भीड़ यहां नहीं चाहिए भीड़ में तो भीड़ में तो रस में विरस होता है 00:25:27 मैं देखता हूं शनिवार रविवार को जब बहुत अधिक संख्या में लोग होते हैं तब वातावरण और होता है थोड़ी 00:25:38 सी भी खटपट हो जाए तो तार टूट जाता है आपको मैं अबकी बार का अनुभव बताता हूं जब तीन 00:25:43 दिन के लिए बरसाना में चर्चा थी तो पहला दिन शायद पूर्णिमा थी कार्तिक पूर्णिमा थी बड़ी भारी भीड़ थी 00:25:54 अब जो चर्चा करने का भाव मैं मन में लेकर गया 00:25:57 था वो चर्चा मैं वहां पर कर ही नहीं पाया पहले दिन नहीं कर पाया दूसरे दिन जब मैंने देखा 00:26:07 कि हां भाई आज सब साधक लोग हैं आज सिर्फ सुनने वाले हैं श्रोता हैं जिज्ञासु हैं तब मैं तब 00:26:12 मैं उस दिशा में थोड़ा आगे बढ़ पाया अरे मैं तो सदा कहता हूं भाई यह जितनी बातें हम यहां 00:26:19 कह सुन रहे हैं यह बातें जब प्रकट हुईं तब एक कहने वाला था एक सुनने वाला था कोई एक 00:26:26 कहता था कोई एक सुनता था 00:26:28 यह सारा ज्ञान यह सारे रहस्य ये दो ये किन्हीं दो के मध्य का संवाद ही तो है कोई कह 00:26:35 रहा है कोई सुन रहा है महादेव सुना रहे हैं और और मां भवानी सुन रही हैं और गोस्वामी जी 00:26:43 कह रहे भाई हमको तो कोई भी नहीं मिला तो हम तो अपने मन को ही सुना रहे हैं स्वांतः 00:26:48 सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा रघुनाथगाथा 00:26:59 हमारे ध्रुवदास जी भी कहते हैं या मन के अवलंब हित कीनो आहि उपाय अपने मन को सहारा देने 00:27:07 के लिए हमको यह उपाय मिल गया है अपने मन को बिठाकर और प्रभु की हरि की कथा सुनाते हैं 00:27:16 हमारा लक्ष्य क्या हो हमारे लिए कथा का प्रसाद क्या हो हमारे लिए कथा का प्रसाद यह हो कि हमें 00:27:22 उस रस विशेष की प्राप्ति हो जाए जिसको प्राप्त करके 00:27:29 यत्प्राप्य न किञ्चिद् वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति जिसको प्राप्त करके वो चिर तृष्णा 00:27:40 हमको प्राप्त हो और सुनें और सुनें और सुनें जब सत्संग होता है ना सत्संग होता है तो सत्संग का 00:27:48 वास्तविक फल यही है और कसौटी भी यही है सत्संग हुआ है कि नहीं एक होता है 00:27:56 समागम 00:27:58 हम यहां से भी कुछ लोग आ गए वहां से भी कुछ लोग आ गए मिले बैठे हुआ सब ठीक 00:28:02 है वो भी ठीक है सत्संग सत्संग की कसौटी क्या है हमने सत्संग किया है कि नहीं उसको कैसे पहचानोगे 00:28:13 उसको तो यहीं से पहचानना पड़ेगा भाई कि थोड़ी प्यास बढ़ जाए एक पंक्ति में एक पंक्ति में तुलसी 00:28:23 बाबा ने बड़ी बात ये कह दी है राम चरित 00:28:29 जे सुनत 00:28:33 अघाहीं रस बिसेष तिन्ह 00:28:40 जाना नाहीं आप अपने ठाकुर जी की घर में सेवा करते हो कभी-कभी पहले धारण कराई हुई पोशाक धारण कराते हो 00:28:49 पहले धारण कराया हुआ श्रृंगार धारण कराते हो लेकिन अपने ठाकुर जी कभी पुराने तो नहीं लगते अगर लगते हों 00:28:56 तो फिर आप सेवा 00:28:57 नहीं कर रहे अपने ठाकुर जी नित्य नवीन लगते हैं यहां तो रसिक लोग मंगला से शयन पर्यंत सातों आरती 00:29:06 का दर्शन राधा वल्लभ लाल का करते हैं जब हम वृंदावन आए आज तो भाई जो जो वस्तुतः दर्शनार्थी हैं 00:29:15 ना जो वस्तुतः दर्शन करने ही जाते हैं दर्शन ही जिनका जीवन है आज तो भाई उन लोगों के लिए 00:29:21 बड़ी समस्या हो गई है जो जो दर्शन का सुख लेते हैं वो तो बेचारे अब दर्शन कर ही नहीं 00:29:26 पाते हैं 00:29:28 यहां से धक्का पड़ा और वहां से धक्का पड़ा जब हम आए थे यहां पर जब हमने देखा ऐसी ऐसी 00:29:35 वृद्ध माताएं एक कदम उनसे चला नहीं जा रहा है पर सातों आरती का उनका नियम है मंगला से लेकर 00:29:42 शयन पर्यंत प्रत्येक आरती का दर्शन करेंगी एक माता तो ऐसी थी जो गुस्से में रहती थी अब वो गुस्सा 00:29:50 क्या था वस्तुतः गुस्सा नहीं था वो बेचारी शारीरिक रूप से दुर्बल थी शरीर में 00:29:57 अनेक अनेक रोग लेकिन उसका नियम है अब जितनी बार वो दर्शन करने आए उतनी बार एक दो प्यार भरी 00:30:07 गाली ठाकुर जी को देकर ही 00:30:13 जाए एक बार तो मंगला आरती का समय था मुझे याद आ रहा है कि उनके पास जाकर हम लोग 00:30:19 बैठ गए वो गाया भी करती थी दर्शन दे दो राधा वल्लभ जी 00:30:28 कब की खड़ी गाया करती थी मुझे याद है दुर्बल सा शरीर था तब ऐसी भीड़ नहीं होती थी मंगला 00:30:39 का समय था अभी पट खुलने में समय था हम जाकर वहां पर बैठ गए वो गा रही है अब ने 00:30:44 नेक सा मेरा हाथ लग गया उसको मेरे को बोली देख लाला वहां चलो 00:30:53 जा हम चुपचाप चले गए 00:30:58 जब आरती हुई मैं फिर गया उनके पास मैंने श्री हरिवंश किया उस समय हाथ में किनका था किनका प्रसाद दिया 00:31:08 मेरा हाथ पकड़ कर वो बाहर आई और हाथ पकड़ के बाहर आते आते मुझे कह रही है बोली कितने 00:31:13 बरस हो गए मैं या तो कह रही हूं अब मोए ले जा अब मोए ले जा अपने संग अब 00:31:21 मेरो यहां का धरो है चलो मो पर जाए नहीं देख है है नहीं रोज जाते क आऊं 00:31:27 ले जा पर लेके ना जा रह्यो लेकिन उसका हमने देखा अंत तक नियम रहा सातों आरती का वो 00:31:32 दर्शन करती थी जो ऐसा दर्शन का सुख लेने वाले थे अब वो तो कम दिखाई पड़ते हैं क्योंकि ऐसे 00:31:42 वातावरण बदल गया धीरे धीरे और बदल रहा है खैर मैं क्या कह रहा था भूल 00:31:55 गया कुछ 00:31:57 और कह रहा था है 00:32:06 ना मैया की याद में कथा भूल गई 00:32:12 देखो चलो यहीं से आगे चलते हैं रस बिसेष तिन्ह जाना नाहीं मैं ये कह रहा था हां भाई हमारा 00:32:21 लक्ष्य क्या हो हमको भी किसी ऐसे भाव की प्राप्ति हो हां मैं ये कह रहा था 00:32:27 रोज दर्शन करो पर ठाकुर जी पुराने थोड़ी लगते हैं दर्शन करने वाले सुबह से लेकर रात तक सातों बार 00:32:34 दर्शन कर रहे हैं लेकिन उनका आनंद नवीन है ऐसे ही कथा भी हो कभी ऐसा ना लगे कथा पुरानी 00:32:41 है ये तो हमने पहले सुना है अगर आपको कभी ऐसा लगे ना पहले भी सुना है तो समझना केवल सुना 00:32:46 ही है केवल सुना ही है राम चरित जे सुनत अघाहीं 00:33:00 रस बिसेष तिन्ह जाना 00:33:23 नाहीं

Gist in Hindi with timestamps & English

1. श्रीमद्भागवत का वास्तविक सार The Essence of Shreemad Bhagwat 2. श्रवण और नाम जप की महिमा The Power of Listening and Chanting https://youtu.be/QnECp92fmV8 [00:00] श्रीमद्भागवत का सार: भगवान वेदव्यास ने सभी वेदों और पुराणों का सार श्रीमद्भागवत में समाहित किया है। The Essence of Shreemad Bhagwat: Lord Ved Vyas has incorporated the essence of all the Vedas and Puranas into the Shreemad Bhagwat. [01:10] कल्याण (शिवम): जीव का वास्तविक कल्याण संसार के आवागमन के चक्र से मुक्त होकर सच्चे सुख की प्राप्ति में है। Welfare (Shivam): The true welfare of the soul lies in becoming free from the cycle of worldly birth and death and attaining true happiness. [01:48] ताप-त्रय का निवारण: यह कथा तीनों प्रकार के कष्टों—आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक—को दूर करती है। Relief from the Threefold Miseries: This discourse removes the three types of suffering—Adhibhautika, Adhidaivika, and Adhyatmika. [04:48] श्रवण भक्ति: प्रथम भक्ति "श्रवण" (सुनना) है। अच्छी बातें सुनने से ही विचार और कर्म शुद्ध होते हैं। Shravan Bhakti: The first form of devotion is "Shravan" (hearing). By listening to good things, our thoughts and actions become purified. [06:45] मानस रोग और विवेक: संसार में सभी किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त हैं, लेकिन विवेक होने पर ही हम अपनी कमियों को पहचान पाते हैं। Mental Ailments and Discrimination: Everyone in the world is afflicted by one mental ailment or another, but only through discrimination can we recognize our shortcomings. [08:29] भक्तों का हृदय: भगवान की गुप्त बातें पोथियों (किताबों) में नहीं, बल्कि उनके भक्तों के हृदय में होती हैं। The Hearts of Devotees: The Lord's secret truths are not merely found in books, but reside in the hearts of His devotees. [11:15] नाम जप की महिमा: निरंतर नाम जप से हृदय का दर्पण साफ होता है, जिससे प्रभु की लीलाओं का अनुभव होने लगता है। The Glory of Naam Jap: Constant chanting of the Divine Name cleanses the mirror of the heart, allowing one to begin experiencing the Lord's divine pastimes. [18:41] लीला का रहस्य: ठाकुर जी की लीलाओं का आनंद तभी आता है जब उनका आध्यात्मिक रहस्य समझ में आ जाए। The Mystery of Leela: One can truly enjoy Thakur Ji's divine pastimes only when their spiritual mystery is understood. [22:53] कथा का फल: कथा का वास्तविक फल भगवान की अनन्य भक्ति और हृदय में प्रेम का जागृत होना है। The Fruit of Katha: The true fruit of spiritual discourse is exclusive devotion to God and the awakening of love within the heart. [28:29] नित्य नवीनता: जैसे ठाकुर जी का दर्शन रोज करने पर भी पुराना नहीं लगता, वैसे ही सच्ची कथा भी हर बार नई लगती है। Ever-Fresh: Just as the darshan of Thakur Ji never feels old even when experienced every day, true spiritual discourse also feels new every time. https://youtu.be/QnECp92fmV8

Monday, August 3, 2026

"जन्माष्टमी के दिन इस नाम का जाप कर लिया तो सभी पापा से मुक्ति मिल जाएगी" by Premanand ji

"जन्माष्टमी के दिन इस नाम का जाप कर लिया तो सभी पापा से मुक्ति मिल जाएगी" by Premanand ji

First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given

https://www.youtube.com/watch?v=7vYzE3C3pI0

00:00:00 भगवान का प्राकट्य उत्सव तभी सार्थक होता है जब वे हमारे हृदय और प्रत्येक श्वास में बस जाएं, क्योंकि वे भक्तों को सुख देने और पापियों का विनाश करने के लिए ही अवतार लेते हैं। 00:01:40 देवकी और वसुदेव के विवाह उपरांत विदाई के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा, जिससे भयभीत होकर कंस ने दोनों को बंदी बना लिया। 00:03:07 भगवान ने योगमाया को आदेश देकर अपने सातवें अंश शेषनाग (बलराम जी) के गर्भ को देवकी के उदर से गोकुल में रोहिणी जी के उदर में स्थानांतरित करवाया। 00:04:40 भाद्रपद मास की अर्धरात्रि रोहिणी नक्षत्र में भगवान ने चतुर्भुज रूप में देवकी और वसुदेव के समक्ष प्रकट होकर अपने पूर्व जन्मों के वचनों का स्मरण कराया। 00:07:11 प्रभु की आज्ञा मिलते ही कारागार के ताले टूट गए, सभी बेड़ियां स्वतः कट गईं, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए और वसुदेव जी बाल रूप कृष्ण को लेकर गोकुल की ओर निकल पड़े। 00:08:09 मूसलाधार वर्षा के बीच यमुना जी ने उफान लेकर जैसे ही प्रभु के श्रीचरणों का स्पर्श किया, वे तुरंत शांत हो गईं और वसुदेव जी ने गोकुल पहुँचकर बालक को यशोदा जी के पास सुरक्षित पहुँचा दिया। -------

Full Transcript :

00:00:00 यह करुणा करके समस्त जीवों को परमानंद प्रदान करने के लिए ही प्रकट हुए और यह प्राकट्य उत्सव सार्थक तभी 00:00:09 हो जब हमारे हृदय में प्रकट हो मेरे मन में मेरे प्राणों में एक एक शवास में एक एक नस 00:00:18 नाड़ी कृष्ण कृष्ण कृष्ण भगवत स्वरूप हो जाए हमारे हृदय में प्रभु का अवतार हो हमारे हृदय में भय प्रगट 00:00:30 कृपाला दीन दयाला देवकी वसुदेव जी ने महान तप किया संसार का स्वामी भगवान मेरा पुत्र बने नंद यशोदा जी 00:00:40 ये सब महान तप संपन्न इनको सुख प्रदान करने के लिए भगवान प्रकट हुए ये दुराचार्यों का विनाश तो बहुत 00:00:48 साधारण सी बात है श्री सुखदेव जी कहते हैं कि उस समय की बात है जब लाखों राक्षसों ने असुरों 00:00:58 ने दैत्यों ने राजाओं का रूप धारण करके पृथ्वी में आतंक मचा रखा था अहंकार से भरे हुए बल से 00:01:07 भरे हुए पृथ्वी को आकांत कर रखा था आक्रांत पृथ्वी त्राण (रक्षा) पाने के लिए रो रही थी यह उस समय 00:01:17 की बात है जब यदुवंशी राजा शूरसेन मथुरा मंडल सुरसेन मंडल का मथुरा पुरी में रहकर के शासन करते थे 00:01:30 ये मथुरा समस्त यदुवंशी नरपतियों की राजधानी थी मथुरा में सदैव भगवान की उपस्थिति पाई गई है मथुरा में सूर्य 00:01:40 के पुत्र वसुदेव जी का विवाह देवकी जी के साथ हुआ ये उस समय की बात है जब नव विवाहिता 00:01:50 पत्नी देवकी को रथ पर विराजमान करके वासुदेव जी ले जा रहे थे कंस बड़ा बलवान स्वभाव में धूर्तता वसुदेव 00:02:04 जी से कहा मैं रथ हाकूंगा मेरी बहन है और रथ के घोड़ों की लगाम पकड़ ली स्वयं रथ हाकने 00:02:14 लगा रथ चल पड़ा जिस समय घोड़ों की लगाम पकड़ कर कंस रथ हांक रहा था ok उसी समय स्पष्ट आकाशवाणी 00:02:22 हुई अरे मूर्ख जिसको तू रथ में बैठा  कर लिए जा रहा है उसकी आठवें  गर्भ की संतान तुझे 00:02:31 मार डालेगी भोज वंश का कलंक आकाशवाणी सुनते ही कूद पड़ा रथ से तलवार खींच ली और बाल पकड़े देवकी 00:02:41 के अनंत महिमा अनंत बलशाली भगवान शेष जी पधारे देवकी जी के गर्भ में अनंत भगवान जब सातवें गर्भ के 00:02:51 रूप में देवकी के उदर में पधारे बड़ा आनंद पर देवकी जी को लगा कि कंस इसे भी मार डालेगा 00:02:59 इसलिए रुदन करने लगी विश्वात्मा भगवान ने देखा कि माता को बहुत दुख है और यदुवंशियों को कंस सताए 00:03:07 ही जा रहा है तो अपनी योग माया का स्मरण किया और योग माया को आदेश किया देवी कल्याणी तुम 00:03:15 ब्रज में जाओ वह प्रदेश ग्वालों और गौओं से सुशोभित है वहां नंद बाबा के गोकुल में वसुदेव जी की 00:03:21 पत्नी रोहिणी गुप्त रूप से निवास कर रही उनकी और भी पत्नियां कंस के डर से गुप्त स्थानों में रह 00:03:27 रही हैं इस समय मेरा महान अंश जिसे अनंत शेष जी कहते हैं देवकी के उदर में गर्भ रूप से विराजमान 00:03:35 है तुम जाओ वहां से उस गर्भ को रोहिणी के उदर में रखो मैं स्वयं आ रहा हूं अब विलंब 00:03:40 सहा नहीं जा रहा अब मैं समस्त ज्ञान बल अंशो के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा और नंद बाबा की पत्नी 00:03:47 यशोदा के गर्भ से तुम प्रकट हो योग माया को आदेश किया जब योग माया ने देवकी का गर्भ ले 00:03:53 जाकर रोहिणी के उदर में रख दिया तब समस्त द्वारपाल और सब जगह खबर पहुंच गई गर्भ नष्ट हो गया 00:03:59 देवकी किसी को आंतरिक पता तो है नहीं नगरवासी बहुत बेचारी के छह तो मार डाले गए और सातवां गर्भ 00:04:07 नष्ट हो गया हाय कितना कष्ट देवकी को है देवकी जी भगवान का निवास स्थान बन गई परीक्षित अब समस्त 00:04:16 शुभ गुणों से युक्त बहुत सुहावना समय आया रोहिणी नक्षत्र था आकाश के सभी नक्षत्र ग्रह और तारे सौम्य हो रहे थे  00:04:27 अब तो काले-काले मेघ आकर मंडराने लगे 00:04:33 और धीरे-धीरे गर्जना करते हैं भारी वर्षा प्रारंभ 00:04:40 जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले जनर्धान भगवान का अवतार समय निशचित रात के 12:00 बजे 00:04:49 उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान देवरूपिणी देवकी के सामने प्रकट हुए 00:04:56 श्री भगवान ने कहा देवी स्वायंभुव मन्वंतर में जब तुम्हारा पहला जन्म हुआ था उस समय तुम्हारा नाम था पृश्नि 00:05:04 जैसा मैं आज तुम्हारे सामने प्रकट हुआ हूं ऐसा उस समय भी प्रकट हुआ था और तुमसे कहा वरदान मांगो 00:05:10 तब तुम दोनों ने कहा आप जैसा पुत्र मुझे चाहिए तो 00:05:15 मेरे जैसा तो सिर्फ मैं ही हूं 00:05:21 तो मेरे जैसा पुत्र तो मैंने यह वरदान दिया कि मैं ही स्वयं तुम्हारा पुत्र बनकर आऊंगा यह छोटी-मोटी तपस्या का फल नहीं है आप देख लीजिए 00:05:30 अगर आप जीवन भर राम कृष्ण हरि भगवत नाम जपते हुए भगवत प्राप्त हो जाते हैं तो कितना सरल है 00:05:35 कितना सरल है इसलिए धन्य है यह कलयुग जो कम समय में भगवत प्राप्ति केवल भगवत नाम जप और थोड़ा सा केवल पापाचरण से अपने को बचा लो तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी 00:05:47 हे माता जी मैंने देखा कि संसार में शील स्वभाव उदारता अन्य गुणों में मेरे जैसा कोई नहीं इसलिए मैं ही तुम्हारा पुत्र हुआ, मैं ही 00:05:59 पृश्निगर्भ से वामन रूप से और इस समय तुम देवकी वसुदेव हुए 00:06:07 वासुदेव के रूप से एक बार मैं वचन बोलता हूं उसे तीन बार पूरा करता हूं 00:06:13 यह भगवान का नियम मेरी वाणी त्रिकाल सत्य है एक बार तुमने मांगा पुत्र तो पृश्निगर्भ वामन रूप और इस समय वासुदेव रूप 00:06:23 कश्यप अदिति के रूप में वामन रूप 00:06:28 और मैंने यह रूप इसलिए प्रकट किया कि जब मैं अवतार लेकर मनुष्य शरीर में लीला करूंगा तो मुझे पहचान पाना बड़ा बहुत कठिन है 00:06:34 इसलिए तुम लोग ध्यान रखना मैं कौन हूं यह खास बात 00:06:38 यह खास बात ध्यान देने योग्य बात है भगवान कह रहे हैं कि तुम दोनों मेरे प्रति पुत्र भाव और निरंतर ब्रह्म भाव रखना 00:06:45 युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत् चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम् तब तुम मेरे परम पद को प्राप्त होगी 00:06:54 चिंतन कौन हैं गोपाल जी कौन हैं लाल जी कह रहे तुम मेरे प्रति पुत्र भाव और निरंतर ब्रह्म भाव 00:07:02 इस प्रकार के चिंतन द्वारा तुम मेरे पद को मेरे प्रिया प्रीतम हैं कौन भगवान की आज्ञा का पालन करने के लिए ज्यों ही चेष्टा की ध्यान दीजिए 00:07:11 भगवान की आज्ञा का पालन करने के लिए ज्यों ही चेष्टा की तो अपने आप हथकड़ी बेड़ियां कट गई 00:07:16 माया की हथकड़ी बेड़ियां कट जाएंगी ज्यों ही भगवान की आज्ञा का पालन कर और बड़े-बड़े दरवाजे कोई एक दो नहीं थे कई दरवाजे थे कंस के कारागार के 00:07:26 फटाफट सब ताले टूट गए दरवाजे खुल गए अद्भुत चमत्कार और जितने पहरेदार घोर राक्षसी स्वभाव के जिंदा खा जाएं ऐसे पहरेदार थे सब मूर्छित घोर निद्रा में 00:07:38 अब हथकड़ी बेड़ी कट गई लाला को 00:07:43 लेकर के चले 00:07:46 उस समय घोर बादल छाए हुए 00:07:51 यमुना जी ने देखा कि प्रभु पधार रहे हैं तो पहला चरणामृत तो हमारा ही अधिकार बनता है 00:07:57 अरे जिनके चरणों का ध्यान बड़े-बड़े महापुरुष शिव आदि करते हैं आज वही प्रभु मेरे पास आ रहे हैं आनंद में भर गई यमुना जी और उफान 00:08:09 यमुना जी ने जब उफान आनंद का लिया तो वसुदेव जी के प्राण बहुत घबरा रहे हैं कि अब क्या करें लौट सकते नहीं कोई नौका आदि है नहीं 00:08:18 चलो प्रभु ने आज्ञा करी है तो वही देखेंगे अब मेरे प्राण चाहे चले जाएं मेरे लाला को कुछ न हो ऐसे यमुना जी उफान कर रही कि चरण छू ले और वसुदेव जी उल्टा सोच रहे कि यमुना जी बढ़ रही तो लाला को बचाएं 00:08:32 देखो यह समर्पण है मेरे प्राण भले चले जाएं बस आज्ञा का पालन प्रभु को पहुंचाना है और सुरक्षित पहुंचाना है 00:08:42 यमुना जी ऐसे थपेड़े जोर-जोर से बढ़ रही 00:08:48 भगवान ने कहा बाबा तो और ऊपर उठाते चले जा रहे हैं तो यमुना जी और बढ़ती चली जाएंगी 00:08:56 एक श्री चरण यह वसुदेव जी को पता नहीं ज्यों ही यमुना जी को श्री चरण प्रभु के स्पर्श हुए तो 00:09:04 तुरंत नाभि भर हो गई और ऐसे एकदम शांत 00:09:10 वसुदेव जी बाबा के नगर में गोकुल में गए तो डर रहे थे कि कोई देख न ले लेकिन वहां कोई देखने वाला था ही नहीं सब सोए हुए थे 00:09:19 उन्होंने अपने पुत्र अब वह ऐसे देख रहे ऐसे और जहां सुलाया तो वहां भी पुत्र था 00:09:26 पार्श्व में योगमाया और वही पुत्र भगवान के इस अवतार में दो अवतार हुए 00:09:31 एक हुआ चतुर्भुज नारायण भगवान का अवतार जो वसुदेव देवकी के सामने और एक हुआ पीछे आपने सुना है नंद 00:09:40 बाबा और यशोदा मैया बहुत ऐश्वर्य समृद्धि सब रिद्धियां सिद्धियां अठखेलियां कर रही ब्रज तो 00:09:50 यहां रिद्धियां सिद्धियां अठखेलियां कर रही कौन पूछता है अवस्था ढल गई थी नंद बाबा की चौथापन था 00:10:01 और ब्रजवासी बाबा की इस दशा को देखकर सह नहीं पा रहे थे बाबा खिन्न रहते थे 00:10:09 उपनंद आदि वृद्ध गोपों ने परामर्श करके पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन किया सबने यज्ञ पुरुष गोपराज नंद को पुत्र प्रदान करने की 00:10:17 प्रार्थना की भगवान से पुत्रेष्टि यज्ञ हुआ जैसे महाराज दशरथ जी की अवस्था ढल चुकी थी तो श्रृंगी ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया उससे खीर फिर 00:10:27 भगवान चारों रूपों में प्रकट हुए राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान हुआ नंद बाबा के यहां अब उच्च कोटि के ब्रह्मऋषि वेद ध्वनि आकाश में मुखरित हो रही थी 00:10:41 गोपराज ऋषि नंद बाबा अंतःपुर में यशोदा मैया के पास बैठे हुए कहा यशोदा रानी इस बार पूरे ब्रजवासियों का आशीर्वाद है और सब ब्रह्मऋषि हैं कई बार हो चुके इसका मतलब पुत्र के लिए कई बार उपाय किए जा चुके थे 00:10:55 इस बार फल स्वरूप में मेरे पुत्र होगा

Sunday, August 2, 2026

श्री कृष्ण चरणों में शरणागति - भक्ति की पहली और अंतिम सीढ़ी by Shri Kripalu ji

श्री कृष्ण चरणों में शरणागति - भक्ति की पहली और अंतिम सीढ़ी by Shri Kripalu ji

https://www.youtube.com/watch?v=K8fGElESLeM
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1. शरणागति का रहस्य: बुद्धि छोड़कर भगवान की आज्ञा मानना | The Secret of Surrender: Giving Up the Intellect and Following God's Will 2. भगवत प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण क्यों आवश्यक है? | Why Is Complete Surrender Necessary for God-Realization? [00:38] सभी वेद-शास्त्रों और तर्कों से यह स्पष्ट होता है कि भगवान को पाने के लिए एक निश्चित शर्त है। भगवान सर्वव्यापक हैं और हर हृदय में विराजमान हैं फिर भी उनकी वास्तविक कृपा हमें अब तक इसलिए नहीं मिली क्योंकि हमारी भावनाएं मायावी मन से बंधी रही हैं। All the Vedas, scriptures, and reasoning make it clear that there is a definite condition for attaining God. Although God is omnipresent and resides in every heart, we have not yet received His true grace because our feelings have remained bound by the illusory mind. [02:57] केवल सिर झुकाकर प्रणाम कर लेना वास्तविक शरणागति नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को पूर्ण रूप से भगवान के प्रति समर्पित कर देना ही सच्ची शरणागति प्रपत्ति है। Simply bowing one's head in obeisance is not true surrender; completely dedicating the mind, intellect, and soul to God is true surrender, or Prapatti. [05:00] अर्जुन ने शुरुआत में शरणागत होने की बात कही थी, लेकिन फिर भी अपनी बुद्धि और तर्क लगाते रहे। इसी कारण भगवान श्री कृष्ण को पूरी गीता का 18 अध्यायों का उपदेश देना पड़ा ताकि वे उनके तर्कों को समाप्त कर सकें। Arjuna initially declared that he had surrendered, yet he continued to apply his own intellect and reasoning. Therefore, Lord Shri Krishna had to deliver the entire eighteen chapters of the Gita to resolve his arguments. [08:30] सांसारिक और आध्यात्मिक समर्पण: जैसे स्कूल में शिक्षक पर, अस्पताल में डॉक्टर पर [09:04], या बैंक में कैशियर पर बिना किसी बहस के पूर्ण विश्वास किया जाता है, उसी प्रकार भगवान के आगे भी अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिए। Worldly and spiritual surrender: Just as one places complete trust in a teacher at school, a doctor in a hospital, or a cashier at a bank without arguing, similarly, one should not impose one's own intellect before God. [11:02] शरणागति का अर्थ ही है अपनी बुद्धि और तर्कों का त्याग करके केवल भगवान और गुरु की आज्ञा का पालन करना। Surrender itself means giving up one's own intellect and arguments and simply following the instructions of God and the Guru. [13:08] हमारी सबसे बड़ी बाधा यह है कि हम गुरु और भगवान की आज्ञा के आगे "लेकिन" लगा देते हैं। जिन महापुरुषों ने अपनी चतुराई छोड़कर पूर्ण समर्पण किया, वे तर गए। Our greatest obstacle is that we place a "but" before the instructions of the Guru and God. Those great souls who gave up their cleverness and completely surrendered were delivered. [13:38] बिना पूर्ण शरणागति और भक्ति के न तो माया से मुक्ति मिल सकती है और न ही भगवत प्राप्ति हो सकती है। Without complete surrender and devotion, neither liberation from Maya nor God-realization is possible. --------
Full Transcript

http://www.youtube.com/watch?v=K8fGElESLeM 00:00 वेद से लेकर रामायण तक  00:07 सभी ग्रंथ  00:11 और संसार के जितने भी धार्मिक मत हैं पंथ है वे सब पंथ प्लस लॉजिक से भी  00:32 यह बात समझ में आती है  00:38 कि भगवान को प्राप्त करने में कोई ना कोई शर्त होगी  00:47 अन्यथा सभी जीव भगवत प्राप्ति कर लेते  00:55 भगवान सबके अंदर बैठे हैं फिर भी भगवान का लाभ नहीं मिल रहा है नंबर दो भगवान सर्वव्यापक हैं फिर  01:13 भी भगवान का लाभ नहीं मिल रहा है नंबर तीन भगवान के अवतार काल में हमने अनंत बार भगवान को  01:25 देखा है रामकृष्ण को भगवान हमसे सीनियर नहीं है जब जब अवतार हुआ होगा तब तक हम लोग भी रहे  01:38 होंगे  01:42 लेकिन भगवान का लाभ कभी नहीं मिला  01:51 जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी अपनी ही भावना का फल मिला भगवान का फल नहीं मिला  02:08 और अपनी भावना तो माई है क्योंकि भावना तो मन से होगी होगी और मन माया का बना हुआ है  02:25 तो शास्त्र वेद तो कहते ही हैं अर्जुन से भगवान ने कहा मामेजे प्रपद्यते  02:39 माया मेंताम तरतीते अर्जुन जो मेरी प्रपत्ति में आ जाएगा प्र पत्त खाली पत्ती नहीं  02:57 एक तो पत्तन होता है पत्तन माने सिर को गुरु के चरण में भगवान के चरण में गिरा देना  03:14 नकली शरणागति मन को नहीं गिराया बुद्धि को नहीं गिराया  03:26 आत्मा को नहीं गिराया सिर को गिराया उसको प्रणाम कहते हैं लोग  03:36 रिवाज है बाप को मां को गुरु को मंदिर में लोग सिर को नीचे रखते हैं चरण में उसको प्रणाम  03:48 कहते हैं तो वो प्रपत्ति प्रपत्ति नहीं प्र माने प्रकृष्टम यानी मन बुद्धि की शरणागति हो तो वो प्रपद्यंते है  04:10 और वहां भी एव शब्द लिखा है माम एवल  04:20 मेरी शरणागति यानी मन मुझ में ही रहे संसार में ना जाए  04:32 जैसे हम लोगों का मन जितने यहां बैठे हैं भगवान में भी है संसार में भी है दोनों जगह है  04:46 तो भगवान कहते हैं ये नहीं चलेगा सारी गीता 18 अध्याय का लेक्चर दिया अर्जुन को और अंत में वहीं  05:00 के वहीं पहुंच गए अर्जुन ने प्रारंभ में कहा शिष्यस्तेहम  05:10 साध  05:13 माम तम प्रपन्नम  05:20 मैं आपके प्रपन्न हूं शरणागत हूं बताइए क्या करूं तो उसी समय अगर वह प्रपन्न होता तो भगवान कहते प्रपन्न  05:35 है हां युद्ध कर  05:40 बात खत्म गीता खत्म ये 18 अध्याय का लेक्चर क्यों देते लेकिन अर्जुन अर्जुन कहता तो है कि प्रपन्न हूं   05:53 पर है नहीं वो बुद्धि लगा रहा अपनी देखिए महाराज ऐसा है कि है तो आप हमारे गुरु जी ठीक  06:04 है लेकिन इन सबको मारूंगा इनकी स्त्रियां विधवा होंगी  06:15 ये पाप पृथ्वी के लिए राजा बनने के लिए मैं नहीं करता हमारे पूज्य लोग हैं यह दुश्मन जो विरोधी  06:28 पार्टी में युद्ध में खड़े हैं दादा परदादा कोई चाचा कोई मामा कोई ताऊ इनको मार के और हम राजा  06:41 बने मुझे नहीं चाहिए ऐसा राज्य क्योंकि राजा बन भी जाएंगे तो आनंद तो मिलेगा नहीं आप कह रहे हैं  06:54 कि हतो प्राप्त से स्वर्गम जित्वावा भोसे महम  07:03 237 गीता अर्जुन अगर तू मर गया युद्ध में तो स्वर्ग मिलेगा और अगर जीत गया तो पृथ्वी मिलेगी दोनों  07:17 हाथ लड्डू तो अर्जुन ने कहा महाराज आज हमको बेवकूफ बना रहे हैं आप अरे स्वर्ग में भी सुख नहीं  07:26 है दिव्यानंद और संसार में तो है ही नहीं मैं देख ही रहा हूं तो आप क्या हमको लालच दे  07:39 रहे हैं  07:44 तो अर्जुन अगर प्रपन्न होता तो फिर जैसे आप लोग पढ़ने जाते हैं स्कूल में तो टीचर ने जो कहा  07:57 आपने मान लिया देखो ए की शक्ल ऐसी होती है यस ऐसी उसकी शक्ल होती है और इसको ए बोलते  08:09 हैं हां बोलो बोलो  08:16 देखो इस इंग्लिश के शब्द की ये स्पेलिंग होती है रटो हां रटेंगे  08:30 तब तो कोई विद्वान बनता है डॉक्टर ने कहा तुमको यह बीमारी है यह दवा खानी तीन बार और देखो  08:44 डायबिटीज है मिठाई नहीं खाना बिल्कुल  08:54 पास चुपचाप मान लो बहस नहीं बुद्धि नहीं लगाना हम नहीं लगाते  09:04 कंप्लीट सरेंडर करते हैं और अगर नहीं करेंगे तो मरेंगे चोरी चोरी मिठाई खाएंगे  09:18 खाओ मरो  09:22 तो संसार में जैसे हम शरणागत होते हैं 1 लाख एक करोड़ रुपया दे दिया बैंक में अंदर डाल दिया  09:34 छोटे से छेद से और कह दिया रसीद बना दो अरे विश्वास कर लिया उस आदमी का वो कह दे  09:48 कि नहीं है जी मैंने गिना था और उसको सरका दे और किसी तरह  09:56 बड़े संसारी आदमी है गरीब भी है कौन 100 मिलते हैं उसको लेकिन सारा संसार चल रहा है इसी प्रकार  10:12 तो अर्जुन अगर वास्तव में शरणागत होता तो फिर यह क्वेश्चन ना करता कि इनको मारूंगा तो पाप होगा  10:25 हमारे देश में पुलिस होती है मिलिट्री होती है तो उसका बॉस जो आर्डर देता है उसका वो पालन करता  10:35 है वो बुद्धि नहीं लगाता गोली चला दो मजिस्ट्रेट ने कहा चला दिया गोली चार आदमी मर गए तुम्हारी गोली  10:47 से मरे जी हां तुमको फांसी होनी चाहिए क्यों अरे तुमने चार आदमी मारा है अरे तो साहब मजिस्ट्रेट से  10:56 पूछो उसने आर्डर दिया तो हमने मारा  11:02 हमारा कोई दुश्मन थोड़ी है तो शरणागति का मतलब बुद्धि ना लगाना  11:12 जैसे हम संसार में पढ़ते समय बुद्धि नहीं लगाए अपनी तो विद्वान बन गए अस्पताल में डॉक्टर के इलाज कराते  11:23 समय बुद्धि नहीं लगाया तो हम स्वस्थ हो गए ऐसे ही अर्जुन को बुद्धि नहीं लगाना चाहिए था अगर प्रपन्न  11:36 है तो  11:40 लेकिन लगाया उस बुद्धि लगाने को मिटाने के लिए 18 अध्याय का लेक्चर और आखिर में क्या बोले जरा सुनो  11:54 तो हसेंगे आप लोग मामेकम शरणम ब्रज  12:02 मामेकम शरणम ब्रज वो तो कह रहा है माम प्रपन्नम शादी मैं प्रपन्न हूं हां प्रपन्न तो हो लेकिन माम  12:21 एकम  12:25 केवल मेरे शरणागत हो एकम अपनी बुद्धि में नहीं केवल एकम माम मेरा ऑर्डर मानो बस  12:39 वाल्मीकि के गुरु ने कहा बस मरा मरा कहते रहो जब तक मैं लौट के ना आऊं वाल्मीकि ने नहीं  12:49 पूछा आप कब लौट के आएंगे  12:56 आर्डर का पालन करना बस ये शरणागति है अपनी बुद्धि ना लगाना ये शरणागति हमको अनंत जन्म में अनंत संत  13:08 मिले लेकिन हर जगह हमने अपनी बुद्धि लगाई गुरु जी ने ऐसा कहा है लेकिन ऐसा है कि एक लेकिन  13:22 लगा दिया हमने  13:26 बस उसका परिणाम भोग रहे हैं 84 लाख में और जिसने लेकिन नहीं लगाया वो तुलसीदास सूरदास मीरा कबीर नानक  13:38 तुकाराम शंकराचार्य वल्लभाचार्य ये सब बड़े-बड़े महात्मा बन गए बस एक लेकिन की बात है सारा झगड़ा एक लेकिन में  13:50 है ये हमारी जो बुद्धि है दो पैसे की भी नहीं है माया की बनी हुई गंदी ये लेकिन लगाए  14:02 बिना नहीं मानते  14:07 हां ये बात तो उन्होंने ठीक कही लेकिन अपना ख्याल तो ऐसा है  14:21 अपनी प्राइवेसी  14:24 ये प्राइवेसी जो अपनी है ये हमको बर्बाद कर रही है अनादि काल से अब तक चोरी चोरी सोचते हैं  14:34 गुरु के आगे बैठ के भी भगवान अंदर है यह मानते हुए भी चोरी कर रहे हैं  14:46 करें अपनी जीव कर्म करने में स्वतंत्र है लेकिन फल भोगना पड़ेगा कर्म के अनुसार वहां नहीं चलेगी यहां नहीं  15:01 भोगते जी  15:05 वो भीतर बैठा है महाशक्ति भगवान वो भगवाएगा  15:15 तो शरणागति से ही भगवत कृपा होगी मामेव जे प्रपद्यते माया मेंताम तरंतते सात 14 गीता कहती है सव भगवान  15:34 दय दता सर्वात्मना पदो यदि निर्लीम ते दुरा तरती च देव माया भागवत दो सात 42 यानी शरणागति से ही  15:56 काम चलेगा तस्मात उद्धवज चोदना प्रतिशोधना प्रवत्त श्रोतम माव शरण महात्म सर्व नाम या  16:20 11 12 14 15 भागवत  16:33 मन क्रम वचन छाड़ी चतुराई भजतह कृपा करत रघुराई बिना भक्ति बिना शरणागति के भगवत कृपा नहीं होगी बिना कृपा  16:52 के ना माया जाएगी ना भगवत प्राप्ति होगी ना आनंद मिलेगा ना दुख जाएगा ना त्रिगुण त्रिकर्म त्रिदोष पंच कक्लेश  17:01 कोई नहीं जाएंगे ये अकाट्य नियम

सारे Tension की केवल एक जड़ और एक इलाज | Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj Pravachan

सारे Tension की केवल एक जड़ और एक इलाज | Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj Pravachan


Https://youtu.be/nfdzA24zM5oOnly
First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given:

00:07 भगवान और सिद्ध संतों को छोड़कर संसार का प्रत्येक जीव दुखी है, जिसका एकमात्र कारण सांसारिक कामनाएं बनाना है। 01:11 राजा देवता बनना चाहता है और देवता इंद्र बनना चाहता है, अर्थात सांसारिक कामनाएं कभी समाप्त नहीं होतीं बल्कि निरंतर बढ़ती जाती हैं। 04:02 काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे सभी मानसिक विकार केवल कामना से ही जन्म लेते हैं। 05:24 कामना पूरी होने पर लोभ पैदा होता है और पूरी न होने पर क्रोध व अवसाद उत्पन्न होता है। 06:57 वेद और उपनिषद कहते हैं कि यदि मनुष्य सांसारिक कामनाओं का त्याग कर दे, तो वह समस्त दुखों से मुक्त होकर ब्रह्म के समान शांत हो जाता है। 13:45 प्रहलाद जी ने भगवान नृसिंह से यही वरदान मांगा कि उनके मन में कभी किसी वस्तु को मांगने की कामना ही उत्पन्न न हो। 21:03 प्रत्येक जीव स्वाभाविक रूप से आनंद चाहता है क्योंकि वह सच्चिदानंद भगवान का ही अंश है। 23:31 बुद्धि के निर्णय के कारण जीव सांसारिक नाशवान वस्तुओं में सुख ढूंढता है और भ्रमित होकर भटकता रहता है। 31:30 सांसारिक कामनाएं ही समस्त दुखों की जड़ हैं, जबकि भगवान से संबंधित कामना मनुष्य को सदा के लिए परमानंद से परिपूर्ण कर देती है। ------------
Full Transcript:
00:01 विश्व का प्रत्येक  00:07 जीव अथवा यों कहिए भगवान को छोड़कर अथवा भगवान को प्राप्त किए हुए महापुरुषों को छोड़कर शेष सब दुखी  00:26 है सब दुखी है  00:35 क्यों संसारी कामनाएं बनाने के  00:42 कारण रीजन  00:49 कामना चक्र धरो प सुरम सुरत लाभे सकल सुर पतिम सुरपति रू गतिम तथापि न निवत  01:11 तृष्णा संपूर्ण विश्व का अगर कोई राजा हो जाए एक देश का नहीं तो वह देवता बनना चाहता है कि  01:29 मृत्यु लोक में शरीर भी गंदा संसार भी गंदा स्वर्ग लोक में सब चीजें दिव्य  01:48 दिव्य और जब देवता बन जाता है तो कहता है बन तो गया देवता लेकिन इंद्र के अंडर में रहना  01:59 पड़ता है उसको नमस्कार करना पड़ता है पूजा करनी पड़ती है उसकी आज्ञा माननी पड़ती है इंद्र बन जाता अगर  02:14 अगर इंद्र बन गया तो सुरपति ब्रह्मम पदम या चते ब्रह्मा बन जाता अगर  02:27 में ये कामनाएं चली जाती है ऐसे ही बढ़ती हुई और हम लोग कितने मूर्ख है कि एक भिखारी सोचता  02:42 है एक लाख मिल जाए अगर कहीं पड़ा  02:50 हुआ आनंद ही आनंद एक लाख वाला कहता है 50 लाख मिल जाए एक करोड़ मिल  03:12 जाए लेकिन जरा अपने आगे वाले से पूछ लो अपने भारत में ही एक आदमी 20 अरब डॉलर का है  03:24 मुकेश अंबानी जरा उनसे पूछ लो भाई तुम्हारा क्या  03:32 अगर वह कह दे साहब ठीक है तो चलो मुकेश की सीट पर पहुंचने के लिए  03:45 भागो अरे जब सुरपति नहीं तृप्त है तो फिर इंडिया या दुनिया का कोई आदमी क्या तृप्त होगा शरीर भी  04:02 रोगी मन भी रोगी सबसे बड़ी मुसीबत तो मन की है क्योंकि कामना तो मन से बनती है काम क्रोध  04:13 लोभ मोह यह सारे दोष कामना से पैदा होते हैं कामना माने इच्छा  04:27 ख्वाहिश यह जननी है मां है सबकी इसी के बच्चे हैं सब क्यों कामना पूरी हो गई आनंद मिल गया  04:42 एक सेकंड को जैसे जलती हुई आग में घी डाला तो आग नीचे को हुई ला और फिर तिनी  04:58 बढ़ी ऐसे ही कामना पूरी होने पर क्षणिक सुख मिला अब क्या करना चाहिए एक करोड़ तो मिल गया अब  05:12 इसका ऐसा प्लान बनाया जाए कि एक अरब हो जाए ब लग गई बीमारी यानी लोभ पैदा हुआ कामना की  05:24 पूर्ति में लोभ खड़ा है और अगर ना पूरी हुई घाटा हो गया शेर डाउन हो गया तो क्रोध फीलिंग  05:42 आत्महत्या य सब हो रहा है संसार में आप सब लोग जानते हैं यानी कामना पैदा हुई कि बस हम  05:52 मर गए अब नहीं बच सकते पूरी हो तो लोभ आया ना पूरी हो तो क्रोध या अब दो में  06:01 एक तो  06:05 होगा इसलिए वेद कहता है यदा सर्वे प्रम चते कामा यस हद शता अथ मर्त्य मृतो भवत त्र ब्रह्म  06:24 समते कठोपनिषद दूसरे अध्याय के ती श्री बल्ली का 14वां मंत्र यह मंत्र बृहदारण्यक उपनिषद में भी है चौथे अध्याय  06:41 के चौथे ब्राह्मण का 17 वा मंत्र यह मंत्र सायनी उपनिषद में भी है 27 वा मंत्र ये सब वेद  06:57 मंत्र कह रहे हैं कि अगर कामनाएं आप ना बनावे छोड़ दे कामना बनाना आप ब्रह्म के बराबर हो जाए  07:09 सब दुख खत्म  07:16 आनंद ऐसा कभी किया है आप लोगों ने हां जी रोज करते हैं रोज करते हैं हां कब जब आप  07:28 गहरी नींद में में सोते हैं गहरी नींद जिसमें सपना भी नहीं देखते ऐसी नींद उस समय कोई कामना नहीं  07:41 होती नहीं जी मन ही नहीं रहता कोई फीलिंग नहीं होती ना भीतर की ना बाहर की ना अपनी ना  07:53 दूसरे की आनंद आनंद एक झलक मिलती है हम लोगों को कामना रहित अवस्था की भगवान देते हैं वह सबको  08:09 गधे को भी कुत्ते बिल्ली को भी देते हैं फुटपाथ पर सोने वाला वो भी गहरी नींद में थोड़ी देर  08:20 को सही सोता  08:28 है  08:36 एक बड़ा सुंदर प्रकरण है भागवत  08:43 में आप लोगों ने सुना होगा प्रहलाद के पिता हिरण कसप ने प्रहलाद पर बड़ा अत्याचार किया तो भगवान का  09:00 अवतार हुआ था नरसिंहा अवतार तो जब नरसिंह भगवान ने हिरण कश्यप को मार दिया और सब ब्रह्मा विष्णु शंकर  09:17 इंद्र  09:20 सब  09:24 पहुंचे अभिनंदन करने धन्यवाद देने नरसिंह भगवान को कि आपने बड़ी कृपा की बड़ा भयानक राक्षस थाव तो प्रहलाद ही  09:40 आगे बढ़े और किसी की हिम्मत नहीं पड़ी शंकर जी त्रिनेत्र से संसार को भस्म कर देने वाले वह भी  09:51 नहीं जा सके आगे नरसिंह के तो सबने कहा प्रहलाद से कि बेटा तुम जाओ तुम्हारे ऊपर तो गुस्सा करेंगे  10:03 नहीं वो तुम्हारे कारण तो आए हैं तो वो छोटे से थे छोटे बच्चे डरते नहीं किसी से देखो आप  10:14 लोग बड़े-बड़े जो है वो हम हमारे स्वरूप से जगतगुरु नाम को सोच कर के डरते हैं दूर से प्रणाम  10:25 करते हैं और छोटे बच्चे चढ़ जाते हैं ऊपर हाथ  10:34 मिलाओ तो प्रहलाद चले गए सीधे डायरेक्ट नरसिंह भगवान ने उठा लिया गोद में चिपटा  10:47 लिया फिर बिठा दिया हां बेटा बर मांगो बरम बण स्वाभि मतम जो तुम्हारी इच्छा  11:02 मा सातव स्कंद के नौवे अध्याय का बावा श्लोक प्रहलाद का माथा ठनका य प्रहलाद जब मां की पेट में  11:16 थे तब नारद जी ने उनको उपदेश दिया था वैराग ज्ञान भक्ति सबका तो सब उनको नॉलेज थी इसलिए उन्होंने  11:32 सोचा ये क्या कह रहे हैं  11:38 मांगो इसका मतलब या तो मेरे अंदर कोई कामना होगी अया तो यह गुस्से में है कुछ नॉर्मल नहीं  11:52 है दो में एक कारण  11:58 है क्या करना है हमको अपन चुप रहो अरे मैं कह रहा हूं बेटा भर मांगो सब मांगते  12:09 हैं तो प्रहलाद ने कहा आप तो बोलना पड़ेगा तो प्रहलाद ने कहा यत आशिष आस्ते न सत स बण  12:24 सातवे स्कंद के दव अध्याय का चौथा श्लोक  12:31 महाराज जो अपने स्वामी से कुछ मांगता है वो तो बनिया है व्यापारी है बिजनेसमैन  12:43 है तो मैं व्यापारी नहीं हूं मैं तो आपका दास हूं तो दास का काम है स्वामी की सेवा करना  12:51 कि स्वामी से  12:58 मांगना ससंग भगवान मुस्कुराए बड़ी योग्यता है बड़ा ज्ञान छाट रहा है चरा सा चो कर हा हा ठीक है  13:09 ठीक है फिर भी सब मांगते हैं बेटा तुम भी  13:16 मांगो फिर कहा तो प्रहलाद कहता है और जवाब कड़ा देना पड़ेगा तो प्रहलाद ने कहा अहम तो काम भक्त  13:30 स्वान पा श्रय मैं आपका दास हूं आप मेरे स्वामी है सुना हां हां य तो मालूम है तो देखिए  13:45 मैं ऐसा दास हूं जो कोई कामना नहीं रखता आपकी सेवा करना चाहता हूं और आप भी हमसे कुछ नहीं  13:58 चा क्योंकि आप भगवान है परिपूर्ण है अरे कोई जीव क्या देगा भगवान को उसके पास है क्या शरीर गंदा  14:11 मन गंदा बुद्धि माश अल्लाह सब गड़बड़ तो है उसके पास भगवान को क्या देगा वो भगवान के काम की  14:19 तो कोई चीज है ही नहीं हमारे पास तो महाराज आपको हमसे कुछ नहीं चाहिए और हमको आपसे कुछ नहीं  14:26 चाहिए फिर ये क्या है मांगा की बात आप बारबार किए जा रहे हैं हां हां ठीक है ठीक है  14:35 बड़ा ज्ञान भग रहा है देख जितने भक्त हुए हैं जब मेरे सामने आते हैं तो सब बर मांगते  14:48 हैं अरे अब तो मांग नहीं पड़ेगा य पीछे ही पड़ गए तो प्रहलाद कहता है कामा नामद रोह भवत  15:01 बण  15:05 बरम सातवे अध्याय के स्कंद के दसवे अध्याय का सातवा श्लोक मैं यह बर मांगता हूं कि आपसे कभी कुछ  15:19 ना मांगू  15:23 हेलो बोलती बंद कर दिया भगवान की अब तो बर देना प आपको मैं कभी कुछ मांगू ही ना मांगे  15:35 मांगने की प्रवृत्ति ना पैदा हो कभी य गारंटी य बर  15:44 दो नसंग भगवान चुप हो गए और कुछ कह महाराज अच्छा कहो कहो इंद्रिया मन प्राण आत्मा धर्म ति मति  16:01 ह्री श्री तेज मृति सत्यम यस्य नसत जन्मना कामना पैदा हुई तो शरीर मन बुद्धि प्राण धैर्य धर्म लज्जा कांति  16:30 तेज ये सब नष्ट हो जाते हैं महाराज मांगने वाले का मैं ऐसी बीमारी नहीं  16:44 पालता सिर लाया भगवान ने और कह कुछ कहो कहो कर डालो जो कहना चाहो इस साथ में स्कंद के  16:59 दव अध्याय का आठवा श्लोक था अब अंतिम बात कह रहे हैं प्रहलाद विमु चत यदा कामा मानवो मन स्थिता  17:11 तव पुंडरीकाक्ष भगवत वाय कल्प सातवे स्कंद के दसव अध्याय का नौवा श्लोक महाराज अगर कोई व्यक्ति अपनी सब कामनाओं  17:28 को छोड़ दे तो आपके बराबर हो जाए हो आपके बराबर भगवत वाय कल्प वो भगवान के बराबर हो  17:49 जाए अच्छा एक बात बता तू मत मांग कुछ लेकिन मेरी आज्ञा तो मानेगा आ य तो दास का धर्म  18:00 है आज्ञा पालन करना आज्ञा जो देंगे आप वो तो मानना ही है हम नहीं मांगेंगे कुछ अच्छा तो मेरी  18:10 आज्ञा है एक मन्वंतर राज्य कर एक मन  18:24 मनतर 4 लाख 32000 वर्ष का कलयुग इसका दूना द्वापर इसका तिगुना त्रेता इसका चौगुना सतयुग सब मिलाकर के 43  18:43 लाख बज वर्ष का चार युग और 71 बार चार युग बीत जाए इतना बड़ा होता है मन्वंतर यानी हम  18:56 लोगों की उम्र के हिसाब से 30 करोड़ 67 लाख 200 हज वर्ष का एक मन्वंतर इतने दिन राज्य कर  19:11 मेरी आज्ञा ने कहा जब तक कहे हम राज्य करें आप कहिए नरक में रहे जो आप आज्ञा दे दास  19:21 का तो धर्म है स्वामी की आज्ञा का पालन  19:27 करना  19:31 यह भागवत का है और गीता में देख लो अर्जुन से भगवान ने कहा विहाय का मान जस्तर मान कुमान  19:45 चरती निया निर्मम निरह कारा सति मदि गति अर्जुन जो सब कामनाओं को छोड़ देता है शांत हो जाता है  20:01 जैसे भगवान सदा शांत है कोई टेंशन डिप्रेशन वगैरा की बीमारी नहीं  20:21 होती कामनाएं ही समस्त दुखों की जननी है  20:31 तो कामनाए को छोड़ दिया जाए अच्छा छोड़नी है कैसे छोड़ दिया जाए कैसे छोड़ दिया जाए बताओ पहले यह  20:45 बताओ कामना हम करते क्यों हैं कामना का भी कोई रीजन होगा हां एक रीजन है क्या आनंद हमको आनंद  21:03 चाहिए आनंद क्यों चाहिए इसका भी कोई रीजन होगा ना क्यों आनंद पाने का हमारा नेचर है नेचर स्वभाव क्यों  21:21 हम आनंद ब्रह्म के अंश है भगवान का नाम है आनंद आनंदो ब्रह्मे बजाना वेद कहता है उनके अंश है  21:36 इसलिए नेचुरल हम भगवान का आनंद चाहते हैं चाहना पड़ेगा वो चाहे चीटी हो चाहे ब्रह्मा हो कोई हो सबको  21:54 आनंद ही चाहना पड़ेगा चाहता है नास्तिक है आस्तिक है भगवान को गाली देता है क्यों आनंद के लिए आप  22:09 लोग दो विरोधी काम करते हैं बैठे हैं क्यों आनंद के लिए अच्छा बैठे रहो रात भर ऐसा नहीं है  22:22 फिर अरे थक गए खड़े होंगे अच्छा खड़े रहो ऐ नहीं थक गए बैठेंगे अच्छा बैठे रहो नहीं सोएंगे  22:38 विरोधी क्रियाएं कर रहे हैं आप हसते हैं हा कभी रोते हैं हां य विरोधी क्रिया है हा क्यों हंसने  22:50 वाले से पूछो क्यों हंसते हो आनंद के लिए तुम रोते क्यों हो जी दुख के लिए अरे भला कोई  23:00 दुख के लिए रोएगा आनंद के लिए रोते हैं और इतना अधिक दुख हो गया कि वह सहा नहीं जा  23:09 रहा है तो रो के निकाल रहे हैं उसको ताकि आनंद  23:16 मिले सोते हैं आनंद के लिए जागते हैं आनंद के लिए हर चीज आनंद के लिए  23:31 तो आनंद की कामना हमारी जा ही नहीं शक्ति तो तो फिर आनंद कहां है यह हमारी बुद्धि जहां कहेगी  23:47 हम उसी की कामना बनाएंगे बनाना पड़ेगा ये हमारी बुद्धि पर डिपेंड है और एरिया है दो जीव के अलावा  24:01 दो एरिया बचा एक भगवान का एक माया का अगर बुद्धि कहती है कि माया के एरिया में आनंद है  24:12 तुम्हारा वाला तो हम माया के एरिया की कामना बनाएंगे संसार संबंधी करोड़पति बने अरबपति बने मां मिले बाप मिले  24:25 बेटा मिले बीवी मिले पति मिले रसगुल्ला मिले साब संसार मिल जाए हमको तो आनंद मिल जाएगा य गलत फहमी  24:37 हो कुछ हो बुद्धि ने कह दिया यहां है बस मन को वैसे ही करना पड़ेगा इंद्रियों को वैसे वर्क  24:46 करना पड़ेगा अब बुद्धि ने गलती की की तो भोगे सब अरे भाई एक ड्राइवर है और तांगा चलाता है  25:00 व जिधर को घोड़ों को ले जाएगा उधर तांगा जाएगा अब वह शराब पिए है लूल जलूल जगह पर ले  25:10 जा रहा है लड़ा रहा है उसको तो यात्री भोगे पैसेंजर को भोगना पड़ेगा तो उसी प्रकार यह बुद्धि हमारी  25:21 जो है यह ड्राइवर है गवर्नर है ये पूरी मशीन को गव करती है दो एरिया है या तो भगवान  25:33 में आनंद है यह बुद्धि का डिसीजन बनेगा या तो संसार में आनंद है यह बुद्धि का डिसीजन बनेगा अब  25:44 क्योंकि संसार प्रत्यक्ष है और भगवान परोक्ष है व दिखाई नहीं पड़ता उसका आनंद क्या होता है कोई आया नहीं  26:00 कोई महापुरुष भी मिलता है तो हमारी तरह व भी चलता फिरता खाता पीता देखता हंसता रोता है उसको आनंद  26:10 मिल रहा है हम कैसे  26:15 जाने और सब जा रहे हैं इसी साइड में तो सब बेवकूफ है क्या व 10 ब जो बोल रहे  26:23 हैं उधर आनंद है तो ऐसे बात इधर ही होगा सब इधर ही भाग रहे  26:37 हैं देवता लोग भी भाग रहे हैं मनुष्य भी भाग रहा है पशु पक्षी भी भाग रहे हैं तो हमारा  26:48 डिसीजन बुद्धि का यही सदा से रहा कि संसार में सुख है हमको नहीं मिला हमारा बाप खराब है हमारी  26:58 मां खराब है हमारी बीवी खराब है हमारा बेटा खराब है लेकिन संसार में आनंद है और हमको भी एक  27:09 दिन मिलेगा लगे  27:15 रहो रेगिस्तान  27:21 में हवा से बालू उड़ती है ऊपर को तो सूरज की किरण से चमकती है तो हिर समझता है वहां  27:35 पानी है दौड़ता है वहां नहीं है वो आगे है फिर दौड़ता है दौड़ते दौड़ते मर जाता है वहां पानी  27:49 है ही नहीं ऐसे ही हम  27:56 लोग एक के बाद एक के बाद एक चीजें मिलती गई आनंद नहीं मिला कितनी कामनाएं पूरी हो चुकी हमारी  28:10 जब से हम पैदा हुए अरे एक दिन में 10 कामना बनती है पूरी होती है भूख लगी है रसगुल्ला  28:21 मिला आनंद आ गया फिर चला गया आनंद फिर भूख लगी मां को चिपया बाप को चिपटा बीवी को चिपटा  28:35 आनंद मिल गया फिर चला गया आनंद और फिर वो भूख आई ये क्या बीमारी है जी पता नहीं क्या  28:45 है है जरूर एक कोई भयंकर  28:51 बीमारी तो इस प्रकार संसार संबंधी कामना हमने गलती से बुद्धि की गलती से की और उसका परिणाम भोग रहे  29:05 हैं दुख अगर यही कामना भगवान संबंधी कर लेते देखिए कामना बस पाच ही है देखने की कामना सुनने की  29:24 कामना सूंघने की कामना रस लेने की खाने की कामना स्पर्श करने की कामना एक पांच ज्ञानेंद्रियां है सबके पास  29:41 कुत्ते बिल्ली गधे मनुष्य देवता सब के पास यही पांच है यही पांच कामनाओं के लिए इतना बड़ा संसार भगवान  29:53 ने बनाया कि सब बेवकूफ बने रहे इसी में  30:01 कोई इधर कोई उधर कोई उधर सब अलग अलग ढंग से एक घर में चार पांच आदमी है बच्चे हैं  30:13 एक कहता है हमको बैंगन चाहिए एक कहता है टमाटर चाहिए एक कहता है हम तो आलू ही खाएंगे एक  30:23 मां परेशान है किस किस की बात सुने इतना पैसा उसके पास है ही नहीं कि सब बच्चे के अनुसार  30:31 बनावे खाना सबके अलग-अलग संस्कार अलग-अलग रुचि कोई फोटोग्राफर फोटो लिए पहाड़ों में घूम रहा है कोई पिक्चर की ओर  30:45 भाग रहा है कोई पहलवानी कर रहा है कोई पंडित जी बना कथा बाच रहा है सब अलग अलग और  30:56 सब एक दूसरे को बेवकूफ क  31:00 क्या तुम भी वहा दुकान पर दिनरात बैठे रहते हो देखो हम शेयर खरीदते हैं और एकदम अर पति हो  31:08 जाते हैं और जब डाउन हो गया तो क्या हाल है मत  31:20 पूछो 13000 था अब 8000 हो  31:26 गया  31:30 तो ये संसार संबंधी कामना ही दुख का कारण है और भगवान संबंधी यही पांच कामना आनंद से सराबोर कर  31:45 देगा सदा को यानी जैसे माया है ऐसे आपको बना देगी माया जैसे भगवान है ऐसे आप को बना देंगे  31:59 भगवान यानी जिसकी कामना करोगे उसी के समान हो जाओगे यह कामनाओं का रहस्य है बोलिए लाडली लाल की जय