Sunday, August 2, 2026

श्री कृष्ण चरणों में शरणागति - भक्ति की पहली और अंतिम सीढ़ी by Shri Kripalu ji

श्री कृष्ण चरणों में शरणागति - भक्ति की पहली और अंतिम सीढ़ी by Shri Kripalu ji

https://www.youtube.com/watch?v=K8fGElESLeM
First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given

1. शरणागति का रहस्य: बुद्धि छोड़कर भगवान की आज्ञा मानना | The Secret of Surrender: Giving Up the Intellect and Following God's Will 2. भगवत प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण क्यों आवश्यक है? | Why Is Complete Surrender Necessary for God-Realization? [00:38] सभी वेद-शास्त्रों और तर्कों से यह स्पष्ट होता है कि भगवान को पाने के लिए एक निश्चित शर्त है। भगवान सर्वव्यापक हैं और हर हृदय में विराजमान हैं फिर भी उनकी वास्तविक कृपा हमें अब तक इसलिए नहीं मिली क्योंकि हमारी भावनाएं मायावी मन से बंधी रही हैं। All the Vedas, scriptures, and reasoning make it clear that there is a definite condition for attaining God. Although God is omnipresent and resides in every heart, we have not yet received His true grace because our feelings have remained bound by the illusory mind. [02:57] केवल सिर झुकाकर प्रणाम कर लेना वास्तविक शरणागति नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को पूर्ण रूप से भगवान के प्रति समर्पित कर देना ही सच्ची शरणागति प्रपत्ति है। Simply bowing one's head in obeisance is not true surrender; completely dedicating the mind, intellect, and soul to God is true surrender, or Prapatti. [05:00] अर्जुन ने शुरुआत में शरणागत होने की बात कही थी, लेकिन फिर भी अपनी बुद्धि और तर्क लगाते रहे। इसी कारण भगवान श्री कृष्ण को पूरी गीता का 18 अध्यायों का उपदेश देना पड़ा ताकि वे उनके तर्कों को समाप्त कर सकें। Arjuna initially declared that he had surrendered, yet he continued to apply his own intellect and reasoning. Therefore, Lord Shri Krishna had to deliver the entire eighteen chapters of the Gita to resolve his arguments. [08:30] सांसारिक और आध्यात्मिक समर्पण: जैसे स्कूल में शिक्षक पर, अस्पताल में डॉक्टर पर [09:04], या बैंक में कैशियर पर बिना किसी बहस के पूर्ण विश्वास किया जाता है, उसी प्रकार भगवान के आगे भी अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिए। Worldly and spiritual surrender: Just as one places complete trust in a teacher at school, a doctor in a hospital, or a cashier at a bank without arguing, similarly, one should not impose one's own intellect before God. [11:02] शरणागति का अर्थ ही है अपनी बुद्धि और तर्कों का त्याग करके केवल भगवान और गुरु की आज्ञा का पालन करना। Surrender itself means giving up one's own intellect and arguments and simply following the instructions of God and the Guru. [13:08] हमारी सबसे बड़ी बाधा यह है कि हम गुरु और भगवान की आज्ञा के आगे "लेकिन" लगा देते हैं। जिन महापुरुषों ने अपनी चतुराई छोड़कर पूर्ण समर्पण किया, वे तर गए। Our greatest obstacle is that we place a "but" before the instructions of the Guru and God. Those great souls who gave up their cleverness and completely surrendered were delivered. [13:38] बिना पूर्ण शरणागति और भक्ति के न तो माया से मुक्ति मिल सकती है और न ही भगवत प्राप्ति हो सकती है। Without complete surrender and devotion, neither liberation from Maya nor God-realization is possible. --------
Full Transcript

http://www.youtube.com/watch?v=K8fGElESLeM 00:00 वेद से लेकर रामायण तक  00:07 सभी ग्रंथ  00:11 और संसार के जितने भी धार्मिक मत हैं पंथ है वे सब पंथ प्लस लॉजिक से भी  00:32 यह बात समझ में आती है  00:38 कि भगवान को प्राप्त करने में कोई ना कोई शर्त होगी  00:47 अन्यथा सभी जीव भगवत प्राप्ति कर लेते  00:55 भगवान सबके अंदर बैठे हैं फिर भी भगवान का लाभ नहीं मिल रहा है नंबर दो भगवान सर्वव्यापक हैं फिर  01:13 भी भगवान का लाभ नहीं मिल रहा है नंबर तीन भगवान के अवतार काल में हमने अनंत बार भगवान को  01:25 देखा है रामकृष्ण को भगवान हमसे सीनियर नहीं है जब जब अवतार हुआ होगा तब तक हम लोग भी रहे  01:38 होंगे  01:42 लेकिन भगवान का लाभ कभी नहीं मिला  01:51 जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी अपनी ही भावना का फल मिला भगवान का फल नहीं मिला  02:08 और अपनी भावना तो माई है क्योंकि भावना तो मन से होगी होगी और मन माया का बना हुआ है  02:25 तो शास्त्र वेद तो कहते ही हैं अर्जुन से भगवान ने कहा मामेजे प्रपद्यते  02:39 माया मेंताम तरतीते अर्जुन जो मेरी प्रपत्ति में आ जाएगा प्र पत्त खाली पत्ती नहीं  02:57 एक तो पत्तन होता है पत्तन माने सिर को गुरु के चरण में भगवान के चरण में गिरा देना  03:14 नकली शरणागति मन को नहीं गिराया बुद्धि को नहीं गिराया  03:26 आत्मा को नहीं गिराया सिर को गिराया उसको प्रणाम कहते हैं लोग  03:36 रिवाज है बाप को मां को गुरु को मंदिर में लोग सिर को नीचे रखते हैं चरण में उसको प्रणाम  03:48 कहते हैं तो वो प्रपत्ति प्रपत्ति नहीं प्र माने प्रकृष्टम यानी मन बुद्धि की शरणागति हो तो वो प्रपद्यंते है  04:10 और वहां भी एव शब्द लिखा है माम एवल  04:20 मेरी शरणागति यानी मन मुझ में ही रहे संसार में ना जाए  04:32 जैसे हम लोगों का मन जितने यहां बैठे हैं भगवान में भी है संसार में भी है दोनों जगह है  04:46 तो भगवान कहते हैं ये नहीं चलेगा सारी गीता 18 अध्याय का लेक्चर दिया अर्जुन को और अंत में वहीं  05:00 के वहीं पहुंच गए अर्जुन ने प्रारंभ में कहा शिष्यस्तेहम  05:10 साध  05:13 माम तम प्रपन्नम  05:20 मैं आपके प्रपन्न हूं शरणागत हूं बताइए क्या करूं तो उसी समय अगर वह प्रपन्न होता तो भगवान कहते प्रपन्न  05:35 है हां युद्ध कर  05:40 बात खत्म गीता खत्म ये 18 अध्याय का लेक्चर क्यों देते लेकिन अर्जुन अर्जुन कहता तो है कि प्रपन्न हूं   05:53 पर है नहीं वो बुद्धि लगा रहा अपनी देखिए महाराज ऐसा है कि है तो आप हमारे गुरु जी ठीक  06:04 है लेकिन इन सबको मारूंगा इनकी स्त्रियां विधवा होंगी  06:15 ये पाप पृथ्वी के लिए राजा बनने के लिए मैं नहीं करता हमारे पूज्य लोग हैं यह दुश्मन जो विरोधी  06:28 पार्टी में युद्ध में खड़े हैं दादा परदादा कोई चाचा कोई मामा कोई ताऊ इनको मार के और हम राजा  06:41 बने मुझे नहीं चाहिए ऐसा राज्य क्योंकि राजा बन भी जाएंगे तो आनंद तो मिलेगा नहीं आप कह रहे हैं  06:54 कि हतो प्राप्त से स्वर्गम जित्वावा भोसे महम  07:03 237 गीता अर्जुन अगर तू मर गया युद्ध में तो स्वर्ग मिलेगा और अगर जीत गया तो पृथ्वी मिलेगी दोनों  07:17 हाथ लड्डू तो अर्जुन ने कहा महाराज आज हमको बेवकूफ बना रहे हैं आप अरे स्वर्ग में भी सुख नहीं  07:26 है दिव्यानंद और संसार में तो है ही नहीं मैं देख ही रहा हूं तो आप क्या हमको लालच दे  07:39 रहे हैं  07:44 तो अर्जुन अगर प्रपन्न होता तो फिर जैसे आप लोग पढ़ने जाते हैं स्कूल में तो टीचर ने जो कहा  07:57 आपने मान लिया देखो ए की शक्ल ऐसी होती है यस ऐसी उसकी शक्ल होती है और इसको ए बोलते  08:09 हैं हां बोलो बोलो  08:16 देखो इस इंग्लिश के शब्द की ये स्पेलिंग होती है रटो हां रटेंगे  08:30 तब तो कोई विद्वान बनता है डॉक्टर ने कहा तुमको यह बीमारी है यह दवा खानी तीन बार और देखो  08:44 डायबिटीज है मिठाई नहीं खाना बिल्कुल  08:54 पास चुपचाप मान लो बहस नहीं बुद्धि नहीं लगाना हम नहीं लगाते  09:04 कंप्लीट सरेंडर करते हैं और अगर नहीं करेंगे तो मरेंगे चोरी चोरी मिठाई खाएंगे  09:18 खाओ मरो  09:22 तो संसार में जैसे हम शरणागत होते हैं 1 लाख एक करोड़ रुपया दे दिया बैंक में अंदर डाल दिया  09:34 छोटे से छेद से और कह दिया रसीद बना दो अरे विश्वास कर लिया उस आदमी का वो कह दे  09:48 कि नहीं है जी मैंने गिना था और उसको सरका दे और किसी तरह  09:56 बड़े संसारी आदमी है गरीब भी है कौन 100 मिलते हैं उसको लेकिन सारा संसार चल रहा है इसी प्रकार  10:12 तो अर्जुन अगर वास्तव में शरणागत होता तो फिर यह क्वेश्चन ना करता कि इनको मारूंगा तो पाप होगा  10:25 हमारे देश में पुलिस होती है मिलिट्री होती है तो उसका बॉस जो आर्डर देता है उसका वो पालन करता  10:35 है वो बुद्धि नहीं लगाता गोली चला दो मजिस्ट्रेट ने कहा चला दिया गोली चार आदमी मर गए तुम्हारी गोली  10:47 से मरे जी हां तुमको फांसी होनी चाहिए क्यों अरे तुमने चार आदमी मारा है अरे तो साहब मजिस्ट्रेट से  10:56 पूछो उसने आर्डर दिया तो हमने मारा  11:02 हमारा कोई दुश्मन थोड़ी है तो शरणागति का मतलब बुद्धि ना लगाना  11:12 जैसे हम संसार में पढ़ते समय बुद्धि नहीं लगाए अपनी तो विद्वान बन गए अस्पताल में डॉक्टर के इलाज कराते  11:23 समय बुद्धि नहीं लगाया तो हम स्वस्थ हो गए ऐसे ही अर्जुन को बुद्धि नहीं लगाना चाहिए था अगर प्रपन्न  11:36 है तो  11:40 लेकिन लगाया उस बुद्धि लगाने को मिटाने के लिए 18 अध्याय का लेक्चर और आखिर में क्या बोले जरा सुनो  11:54 तो हसेंगे आप लोग मामेकम शरणम ब्रज  12:02 मामेकम शरणम ब्रज वो तो कह रहा है माम प्रपन्नम शादी मैं प्रपन्न हूं हां प्रपन्न तो हो लेकिन माम  12:21 एकम  12:25 केवल मेरे शरणागत हो एकम अपनी बुद्धि में नहीं केवल एकम माम मेरा ऑर्डर मानो बस  12:39 वाल्मीकि के गुरु ने कहा बस मरा मरा कहते रहो जब तक मैं लौट के ना आऊं वाल्मीकि ने नहीं  12:49 पूछा आप कब लौट के आएंगे  12:56 आर्डर का पालन करना बस ये शरणागति है अपनी बुद्धि ना लगाना ये शरणागति हमको अनंत जन्म में अनंत संत  13:08 मिले लेकिन हर जगह हमने अपनी बुद्धि लगाई गुरु जी ने ऐसा कहा है लेकिन ऐसा है कि एक लेकिन  13:22 लगा दिया हमने  13:26 बस उसका परिणाम भोग रहे हैं 84 लाख में और जिसने लेकिन नहीं लगाया वो तुलसीदास सूरदास मीरा कबीर नानक  13:38 तुकाराम शंकराचार्य वल्लभाचार्य ये सब बड़े-बड़े महात्मा बन गए बस एक लेकिन की बात है सारा झगड़ा एक लेकिन में  13:50 है ये हमारी जो बुद्धि है दो पैसे की भी नहीं है माया की बनी हुई गंदी ये लेकिन लगाए  14:02 बिना नहीं मानते  14:07 हां ये बात तो उन्होंने ठीक कही लेकिन अपना ख्याल तो ऐसा है  14:21 अपनी प्राइवेसी  14:24 ये प्राइवेसी जो अपनी है ये हमको बर्बाद कर रही है अनादि काल से अब तक चोरी चोरी सोचते हैं  14:34 गुरु के आगे बैठ के भी भगवान अंदर है यह मानते हुए भी चोरी कर रहे हैं  14:46 करें अपनी जीव कर्म करने में स्वतंत्र है लेकिन फल भोगना पड़ेगा कर्म के अनुसार वहां नहीं चलेगी यहां नहीं  15:01 भोगते जी  15:05 वो भीतर बैठा है महाशक्ति भगवान वो भगवाएगा  15:15 तो शरणागति से ही भगवत कृपा होगी मामेव जे प्रपद्यते माया मेंताम तरंतते सात 14 गीता कहती है सव भगवान  15:34 दय दता सर्वात्मना पदो यदि निर्लीम ते दुरा तरती च देव माया भागवत दो सात 42 यानी शरणागति से ही  15:56 काम चलेगा तस्मात उद्धवज चोदना प्रतिशोधना प्रवत्त श्रोतम माव शरण महात्म सर्व नाम या  16:20 11 12 14 15 भागवत  16:33 मन क्रम वचन छाड़ी चतुराई भजतह कृपा करत रघुराई बिना भक्ति बिना शरणागति के भगवत कृपा नहीं होगी बिना कृपा  16:52 के ना माया जाएगी ना भगवत प्राप्ति होगी ना आनंद मिलेगा ना दुख जाएगा ना त्रिगुण त्रिकर्म त्रिदोष पंच कक्लेश  17:01 कोई नहीं जाएंगे ये अकाट्य नियम