Sunday, August 2, 2026

माया का The End – सिर्फ एक Simple तरीका! | भगवत तत्त्व - 12/16 | Jagadguru Shri Kripalu Ji Pravachan:

माया का The End – सिर्फ एक Simple तरीका! | भगवत तत्त्व - 12/16 | Jagadguru Shri Kripalu Ji Pravachan:

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First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given:

08:12 प्रत्येक जीव का चरम लक्ष्य परमानंद प्राप्त करना है, जो केवल भगवान की प्राप्ति से ही संभव है। 09:39 भगवान इंद्रियों, मन और बुद्धि से परे हैं, इसलिए उन्हें केवल उनकी कृपा के माध्यम से ही जाना जा सकता है। 10:44 कर्म मार्ग के नियम अत्यंत कठिन हैं और इसका फल केवल क्षणिक स्वर्ग है, जिससे माया और दुखों का पूर्ण नाश नहीं होता। 11:46 ज्ञान मार्ग का अधिकार पाना अत्यंत दुष्कर है, जिससे केवल आत्मज्ञान हो सकता है किंतु पूर्ण भगवत प्राप्ति या मोक्ष नहीं। 13:19 वेदों और उपनिषदों के अनुसार भगवान एवं गुरु के प्रति अनन्य निष्काम भक्ति ही माया से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। 17:19 भगवान केवल भक्त के शुद्ध प्रेम और मिलने की आंतरिक व्याकुलता (भाव) से ही रीझते हैं। 19:46 समस्त वेद-मंत्र यह सिद्ध करते हैं कि केवल और केवल भक्ति मार्ग के द्वारा ही जीव भगवान को प्राप्त कर सकता है। ---- Full Transcript :
00:00:01 बरह 00:00:04 पीम 00:00:07 नटबर बरबु करणयो 00:00:16 करणकारिकम 00:00:25 विभवा 00:00:32 कनक कपिशम 00:00:38 ब जयंत 00:00:46 चमाला 00:00:53 रणो 00:00:59 रध सुधया 00:01:03 पूयन 00:01:08 गो वृंद 00:01:15 वृंदाण्यम 00:01:21 स्वपद रमणम 00:01:26 प्रा 00:01:31 गीत की 00:01:37 धम 00:01:41 सदा परिभवघ्नमभ 00:01:47 दोम 00:01:54 तीस पदम शिव बिन 00:02:03 चिनतम 00:02:06 शरण्यम 00:02:13 भत्याहम 00:02:19 प्रणत पाल भवापो 00:02:28 म वंदे महापुरुषते 00:02:38 चरणारविंदम 00:02:49 नमः कमलनाथ 00:02:57 भय 00:03:06 नमः कमल माने 00:03:18 नमः कमल पा 00:03:24 ाय 00:03:29 नमस्ते कमले क्षण यो ब्रह्माम विदधा पूर्वम जोव वेदा प्रहणो तस्मै त्व देवत्म बुद्धि प्रकाशम मुमुक्षु शरणमहम प्रपद 00:04:01 वेद वेदांत वेद वृंदारक वृंद वंद आनंद कंद सच्चिदानंद श्री कृष्ण चंद्र चरणारविंद मकरंद मिलिंद महानुभाव नियमानुसार थोड़ी देर हरि 00:04:18 नाम संकीर्तन कर लीजिए पश्चात विषय का उपसंहार किया जाएगा भजो गिरधर 00:04:34 गोविंद 00:04:37 गोपाला 00:04:55 भजो गिरधर 00:05:00 गोविंद 00:05:03 गोपाल 00:05:08 भजो 00:05:13 गोविंद 00:05:16 गोपाला 00:05:21 भजो गिरधर 00:05:26 गोविंद गोपाला 00:05:34 भजो 00:05:38 गोविंद 00:05:41 गोपाल 00:05:46 और भजो मेरे गिरिधर गोविंद 00:05:54 गोपाला 00:06:04 गोविंद 00:06:07 गोपाल 00:06:11 भजो गिरधर 00:06:16 गोविंद 00:06:19 गोपाला 00:06:26 राधे गोविंद गोपाल 00:06:35 भजो गिरधर 00:06:40 गोविंद गोपाला 00:06:51 गोविंद गोपाल 00:06:58 बोलिए लाडली लाल की जय 00:07:05 अब आप लोग सावधान हो जाए 00:07:13 आज बहुत भी महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डाला जाएगा किंतु 00:07:25 किसी विषय का विस्तार नहीं किया जा सकता 00:07:32 समय की न्यूनता के कारण संक्षेप में ही अनेक विषयों पर प्रकाश डाला जाएगा अत बहुत सावधान होकर सुनेंगे 00:07:49 सुनहु करहु जो तुम सुहाई 00:07:56 सुन लीजिए फिर करना आपके हाथ में है सेंट परसेंट कीजिए 50% कीजिए जीरो पर आ जाइए ये सब आपकी 00:08:12 इच्छा पर रहेगा हां प्रत्येक जीव का लक्ष्य है परमानंद प्राप्ति 00:08:31 जीव ब्रह्म माया तीन तत्व अनाद अनंत सनातन है 00:08:43 किंतु जीव अनादि काल से मायाबद्ध होने के कारण अनंत दुखों से युक्त होकर 84 लाख में घुमाया जा रहा 00:08:58 है 00:09:01 वह जीव आनंद चाहता है और आनंद की परिभाषा भी बताई गई आनंद अनंत मात्रा का होता है अनंत काल 00:09:19 के लिए होता है ऐसा अनिर्वचनीय अपरिमेय अपौरुषेय दिव्यानंद भगवान की प्राप्ति से ही प्राप्त हो सकता है 00:09:36 भगवान 00:09:39 के विषय में बहुत लंबी चौड़ी विस्तृत मीमांसा की गई कि यद्यपि भगवान हमारी इंद्रिय मन बुद्धि से परे है 00:09:56 किंतु वह जिस पर कृपा कर देता है वह उन भगवान को पा लेता है और सदा के लिए मालामाल 00:10:08 हो जाता है यह भी बताया गया कि उनकी कृपा से ही उनको जाना जा सकता है किंतु उनकी कृपा 00:10:20 की कुछ शर्तें हैं कुछ आधार है वह शर्त पूरा करने वाले पर ही कृपा होती है उस पर भी 00:10:31 विचार किया गया कि शास्त्रों वेदों में तीन मार्ग बताए गए हैं कर्म ज्ञान भक्ति एक एक मार्ग पर विचार 00:10:44 करते हुए आपको बताया गया कि कर्म धर्म के नियम अत्यंत कठिन है और यदि कोई कर भी ले तो 00:10:56 उसका फल स्वर्ग है स्वर्ग माया के अंतर्गत है वहां भी काम क्रोध लोभ मोह का आधिपत्य है और वह 00:11:07 भी कुछ दिन के लिए मिलता है अत धर्म से ना हमारे दुख की अत्यंतिक निवृत्ति हो सकती है ना 00:11:19 माया का अत्यंताभाव हो सकता है ना त्रिगुण त्रिकर्म त्रिदोष पंच क्लेश पंचकोष का अत्यंताभाव हो सकता है और ना 00:11:31 दिव्यानंद ही मिल सकता है अत ज्ञान मार्ग पर विचार किया गया और बताया गया कि किसी भी ज्ञान के 00:11:46 साधन से कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता पहले तो ज्ञान का अधिकारित्व ही अत्यंत कठिन है निर्भ 00:12:02 नाम ज्ञान योग भागवत में कहा गया 11व स्कंध के 20व अध्याय का सातवा श्लोक जो चार साधनों से संपन्न 00:12:16 हो वो ज्ञान मार्ग का अधिकारी होता है और चार साधनों में पहला आपको बताया गया था मन पर कंट्रोल 00:12:30 ये सब असंभव बातें हैं कलयुग में तो कल्पना भी करना गलत है और यदि कोई ज्ञान मार्ग की अंतिम 00:12:41 सीमा पर भी पहुंच जाए तो केवल आत्मक ज्ञान हो सकता है ब्रह्म ज्ञान नहीं हो सकता और बिना ब्रह्म 00:12:53 ज्ञान के माया नहीं जा सकती मोक्ष नहीं मिल सकता जो ज्ञानियों का लक्ष्य है अत ज्ञान मार्ग भी हमारे 00:13:05 लिए उपयोगी नहीं है अब एक मार्ग बचा भक्ति मार्ग उस पर विचार करना है पहले वेदों में चलिए यस 00:13:19 देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरु तसते कथिता यथा प्रकाशते महात्म प्रकाशते महात्म श्वेता चतुरोपनिषद छठव अध्याय का 23वा 00:13:38 मंत्र यह मंत्र कह रहा है कि जिस जीव की भक्ति भगवान के प्रति 00:13:53 अनन्य हो और जैसी भक्ति भगवान के प्रति हो वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति भी हो उसकी माया निवृत्ति 00:14:09 हो सकती है परमानंद प्राप्ति हो सकती है 00:14:16 मुंडकोपनिषद आया उसने कहा हमारी भी सुनो कहिए उपासते पुरुषम जे जकामास्ते शुक्रमेत दति बरत धीरा तीसरे मुंडक के दूसरे 00:14:31 खंड का पहला मंत्र ये मंत्र कह रहा है कि समस्त कामनाओं को छोड़कर जो भगवान की भक्ति करता है 00:14:44 वह इस माया से उत्तीर्ण हो सकता है उसको परमानंद मिल सकता है ठीक वही जो श्वेता चतुरोपनिषद कह रहा 00:14:54 है वही मुंडकोपनिषद भी कह रहा है 00:15:01 और आगे चलिए क्षरम प्रधानमताक्षर हरक्षरत्मा देव तस्या विद्याना योजनात तत्व भावात भूते विश्व माया निवत्त श्वेता चतुरोपनिषद पहले अध्याय 00:15:21 का दसवा मंत्र ये मंत्र कह रहा है देखो जी एक भगवान है एक माया है और एक तुम हो 00:15:33 अर्थात जीव अब यह जीव या तो भगवान की ओर जाएगा या तो माया की ओर जाएगा तीसरी कोई चीज 00:15:44 है ही नहीं तो अगर भगवान के प्रति कोई शरणागत होता है उनकी भक्ति करता है तो उसकी माया निवृत्ति 00:15:56 हो जाएगी परमानंद मिल जाएगा और कोई मार्ग नहीं है तो उसके लिए तीन शब्द लिखा वेद में अभ्याना 00:16:10 योना तत्व भावात उनका ध्यान करने से और निरंतर ध्यान करने से मन के द्वारा और लीन हो जाने से 00:16:26 इतना प्यार हो जाए ये विश्व माया निवत्ति माया का अत्यता भाव हो जाएगा 00:16:38 यो ब्रह्मा विदधा पूर्वम जो वेद प्रो तस्मै तंग देव बुद्ध प्रकाशम मुक्षव शरणम प्रपदे छठवे अध्याय का श्वतापनिषद 18वा 00:16:56 मंत्र ये मंत्र कह रहा है जो भगवान के शरणापन्न होगा सेंट परसेंट उसकी माया निवृत्ति हो जाएगी भगवत प्राप्ति 00:17:09 हो जाएगी अत आनंद प्राप्ति हो जाएगी तप प्रभाववा देव प्रसादाच 00:17:19 श्वेतापनिषद छठव अध्याय का 21वा मंत्र ये कहता है कि भगवान के वियोग में जो तपे उनके बिरहाग में ऐसी 00:17:35 भक्ति करें तो उस पर भगवत कृपा होगी और उसको आनंद मिल जाएगा दुख निवृत्ति हो जाएगी भाव ग्राह्य मनी 00:17:48 डाख्यम भावा भाव करम शिवम 00:17:56 पांचव अध्याय का श्वेता शतरोपनिषद 14वा मंत्र है यह कह रहा है कि देखो भगवान को पाने के लिए कर्म 00:18:08 धर्म की तरह तमाम नियम नहीं ज्ञान मार्ग की तरह तमाम मन को बस में करने वगैरह का शर्त नहीं 00:18:18 कुछ भाव ग्राहजम केवल भाव से तुम उनसे मिलने को व्याकुल हो जाओ बस वे भी तुमसे मिलने को व्याकुल 00:18:32 हो जाएंगे 00:18:36 बहुत भोले बनकर 00:18:43 फिर ऋग्वेद कहता है आद्या गम श्रव शणीभूति भी अरे मनुष्यों भगवान तो तुम्हारे हैं और बड़े दयालु हैं तुम 00:18:58 रो कर पुकारो वह हजारों शक्तियों के साथ भागे हुए आएंगे 00:19:06 अर्चा सक्राय शाकिने ऋग्वेद भर्गो देवस्य धीमहि ऋग्वेद त्र्यंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम उर्वकम बंधन मृत्य मुखी यमामृतात ऋग्वेद जो देव 00:19:26 मुक्तवंत मुसाते सनातनम अथर्व वेद कसून कतस्या नाम मनामहे चारु देवस नाम ऋग्वेद अग्न वयं प्रथमस्या नाम मनामहे चारु देवस 00:19:46 नाम ऋग्वेद तमस्माकम तवस्मस तवस्मस ऋग्वेद महस्ते विष्णु सुमति भजामहे ऋग्वेद ये तमाम वेद मंत्र कह रहे हैं कि भक्ति 00:20:04 रेवेनम नयति भक्ति रेवन पश्चति भक्ति रेवेनम दर्शति भक्ति रेम गमयति भक्ति वस पुरुष भक्ति रे भूसी माठर श्रति ये 00:20:20 वेद मंत्र कह रहा है भक्ति से ही ए शब्द बार-बार लगाया जा रहा है ए माने ही केवल भक्ति 00:20:30 से ही भगवान मिलेंगे 00:20:36 और कोई मार्ग नहीं 00:20:44 अब शास्त्रों में आइए