Sunday, August 2, 2026

मन और माया की मिली-भगत - जो करती है आपको fail || Jagadguru Kripalu Ji Pravachan

मन और माया की मिली-भगत - जो करती है आपको fail || Jagadguru Kripalu Ji Pravachan

https://youtu.be/XaY4qz9nPB0?si=LuVy-FT8LZYI17Kc First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given:

00:00 मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष (सुख और दुःख) का मूल कारण है।  01:59 वेदों और शास्त्रों के अनुसार, हमारे सभी कर्मों का असली कर्ता केवल मन ही है, इंद्रियां नहीं।  13:56 इंद्रियों के बिना भी मन स्वतंत्र रूप से स्वप्न की तरह हर प्रकार का अनुभव और कर्म कर सकता है।  16:58 जब मन संसार और भौतिक वस्तुओं में सुख खोजता है, तो वह जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र और दुःखों की ओर ले जाता है।  18:36 वही मन जब गुरु के सानिध्य में भगवान की भक्ति और चिंतन में लगता है, तो जीव को गोलोक और मुक्ति दिला देता है।  20:47 इस प्रकार सही दिशा मिलने पर मन सबसे बड़ा मित्र है और गलत दिशा में भटकने पर सबसे बड़ा शत्रु है।
Full Transcript:

01:06 अनंत दुख  01:10 बंधन से होता है कर्म बंधन  01:20 कर्म बंधन जन्म से होता है जन्म कर्म से होता है कर्म जन्म से होता है अनादि धारा है ये  01:37 हम अनादि हैं और मायाबद्ध हैं इसलिए हमारे जन्म भी अनंत हैं इसलिए हमारे कर्म भी अनंत हैं  01:59 यह जन्म और कर्म ये दोनों का कर्ता कौन है भगवान तो हो नहीं सकते भगवान तो परम कारुणिक हैं  02:18 दयालु हैं वो भला ऐसा क्यों करेंगे  02:26 और फिर संसार में भी कोई किसी से दुश्मनी करता है तो उसका रीजन होता है कारण होता है बिना  02:41 कारण के कोई किसी से दुश्मनी नहीं करता और कारण एक ही हो सकता है कि हमारा कोई अपकार कर  02:55 रहा हो हानि कर रहा हो  03:01 हमारा नुकसान कर रहा हो उससे हमारी दुश्मनी होती है तो भगवान का कोई नुकसान तो कर नहीं सकता अरे  03:14 वो दिखाई ही नहीं पड़ेगा तो नुकसान क्या करेगा और फिर लिमिटेड का नुकसान होता है सीमित वस्तु का नुकसान  03:31 हुआ करता है जैसे हमारे पास 1 लाख है उसमें से किसी ने 1000 छीन लिया तो कम हो गया  03:45 1000  03:49 और जिसके पास अनंत हो तो अनंत से तो अनंत निकालो तो भी अनंत बचेगा  04:07 तो भगवान से कोई कुछ छीन ले यही असंभव और अगर छीनने भी तो कुछ कमी नहीं होगी वो तो  04:22 ऐसा है भगवान कि पूर्णस पूर्ण माधाय पूर्ण मेवा वशिष्यते वेद कहता है पूर्ण से पूर्ण निकाल लो तो भी  04:37 पूर्ण बचेगा  04:41 इसलिए भगवान का कोई नुकसान कर ही नहीं सकता  04:48 अरे नुकसान तो बलवान करता है संसार में भी जब उसके बराबर कोई नहीं है न तत समस्याभ्यधिक दृश्यते श्वेतापनिषद  05:05 छ आठ वेद कह रहा है उसके समान ही कोई नहीं है बड़ा क्या होगा नत समोस कुतो ये गीता  05:21 कह रही है स्वयं तो साम्य अतिशय  05:28 भागवत कह रही है निरस्त साम्या अतिशय नराधसा भागवत कह रही है तो फिर उसके नुकसान का सवाल ही नहीं  05:40 तो फिर उसका कोई शत्रु हो इसका प्रश्न ही नहीं है तो यह मन जो है यह है कौन यह  05:53 माया का पुत्र है  06:00 माया जड़ वस्तु है ना माइक को आप देखते ही हैं यह संसार माइक है यह पृथ्वी जल तेज वायु  06:14 आकाश इसके पांच विशेष तत्व हैं अरे आपका शरीर ही बना है पंचमहाभूत का बाहर क्यों जाएं अरे इसमें एक  06:33 भगवान का अंश आ गया तो यह चेतन का काम कर रहा है जब वह निकल जाता है जिसको आप  06:43 कहते हैं मर गया तो तो यह अपने असली रूप में आ जाता है अर्थात माया का तो ऐसे ही  06:58 मन है माया का  07:04 तो माया का सामान  07:10 दो विरोधी शक्तियों का दो विरोधी कार्यों का करता है हां बंधन का भी मोक्ष का भी आनंद का भी  07:26 दुख का भी ब्रह्म बिंदु उपनिषद का मंत्र है ये  07:34 और यह मंत्र त्रिपुरा तापनीयोपनिषद में भी है पांचवें अध्याय का तीसरा मंत्र यह मंत्र मैत्रायनी उपनिषद में भी है  07:50 छठवें अध्याय का 34वां मंत्र और यह मंत्र साठ्यायनी उपनिषद में भी है साठ्यायनी उपनिषद का पहला मंत्र  08:07 और इसी अर्थ में फिर वेद कहता है चित्त मेंव ही संसारा  08:18 चित्त ही संसार है  08:22 महोपनिषद ने चौथे अध्याय का 66वां मंत्र  08:33 चित्त मेंव संसारा मैत्रेय उपनिषद का यह पहले अध्याय का पांचवा मंत्र है साठ्यायनी उपनिषद का यह तीसरा मंत्र है  08:51 चित्त मेंव संसारा मैत्रायणी उपनिषद का छठवें अध्याय का 34वा मंत्र है  09:05 और इसी से मिलताजुलता फिर दूसरा मंत्र है मन एवह संसारा यह तेजो बिंदु उपनिषद के पांचवे अध्याय का 98  09:21 बेवा मंत्र है  09:28 इसे वेद मंत्र कह रहे हैं कि मन ही हमको गोलोक पहुंचा दे और मन ही नरक पहुंचा दे यह  09:42 जो लोग गोलोक चले गए हैं जिनको हम महात्मा संत महापुरुष कहते हैं ये मन ने इनके ऊपर कृपा की  09:55 है और जो नरक में निवास कर रहे हैं हमारे भाई लोग भाई माने जीव  10:07 उनको भी मन ने पहुंचाया है  10:15 भागवत भी कहती है चेत खलवस बंधाय मुक्तय चात्म मनो मतम इस आत्मा को गोलोक पहुंचाने वाला नरक पहुंचाने वाला  10:33 स्वर्ग पहुंचाने वाला यह चित्त है मन है  10:43 तीन 25 15 फिर भागवत कहती है मन परम कारण मामनंत मन ही प्रत्येक कर्म का कर्ता है आप गोलोक  10:59 जाने वाला कर्म करे मन गोलोक पहुंचा देगा आपको आपको आत्मा को और अगर यही मन पाप कर्म करे तो  11:14 नरक पहुंचा देगा आपको  11:21 11 23 43 नारद पुराण में भी यह मंत्र है मन एव मनुष्यणाम कारणम बंध मोक्षयो पंचदशी में भी यह  11:35 मंत्र है मनो मनुष्यणाम कारणम बंध मोक्षयो आप लोग इन नंबरों के द्वारा इनको वेदों में भागवत में सर्वत्र मिला  11:51 के देख लेना मैं गप नहीं झोंक रहा हूं चैलेंज कर रहा हूं  12:03 तुम मैं नहीं शत्रु है हमको पाप कर्म करके नरक भेज दे वेद कहता है पुण्यन पुण्यम लोकम नयति पापेन  12:25 पापम उभा्या में मनुष्य लोकम  12:38 तो यह मन  12:42 प्रत्येक कर्म का करता है आत्मा कुछ नहीं करता इंद्रियां और जो है मन के अलावा वे भी कुछ नहीं  12:55 करती  12:58 इंद्रियों से तो करवाता है मन अपने आप इंद्रियां कुछ नहीं पाप पुण्य या भक्ति कुछ नहीं कर सकती  13:15 बिना इंद्रियों के मन कर्म करता है ना  13:21 इंद्रियों से कर्म इंद्रियों को लेकर ध्यान दो इंद्रियों को लेकर मन मन करता है जागृत अवस्था में इस समय  13:37 आप लोग देख रहे हैं आंख से  13:44 यह मन कर रहा है लेकिन आंख की हेल्प ले रहा है कान की हेल्प ले रहा है लेकिन अगर  13:56 आंख कान नाक रसना आदि सब चैलेंज कर दे मन को वो भी चैलेंज एडमिट कर लेता है ठीक है  14:07 तुम लोगों की जरूरत नहीं हमको हमारे पास सब कुछ है  14:15 बिना हमारे यानी आंख कहती है बिना हमारे तुम देख सकते हो  14:26 हां  14:30 हम नहीं मानते नहीं मानते अच्छा तुम सो जाते हो जब तो सपना देखते हो ना हां देखते हैं तो  14:42 सपने में क्या इन आंखों से देखते हैं  14:49 ये तो रजाई के अंदर बंद रहता  14:54 और कितना संसार आप देखते हैं सपने में अरे जागृत में आप उतना नहीं देख सकते  15:06 एक जंप करके आकाश पहुंच जाते हैं आप सपने में जागृत में तो जंप करके आप 10 फुट भी नहीं  15:15 उछल सकते  15:21 आप देखते हैं सुनते हैं सूंघते हैं रसगुल्ला खाते हैं हंसते हैं रोते हैं डरते हैं सब कुछ करते हैं  15:32 सपने में बिना इंद्रियों के अब मान गए ना इंद्रियों से जुक्त होके भी मन ही करता है बिना इंद्रियों  15:48 के भी मन करता है देखो मन से भगवान का चिंतन करके अनंत जीव महापुरुष बन गए भगवान के लोक  16:03 चले गए  16:08 मुख से कुछ नहीं बोले  16:12 आंख बबी बंद कर लिया था मन से केवल ध्यान किया  16:24 चिंतन मन का काम चिंतन  16:30 बड़ा कमाल है मन में यही मन वहां पहुंचा देता है अगर कोई गुरु की शरण में होकर भगवान की  16:43 भक्ति करता है  16:50 भगवान से प्यार करता है  16:58 और वही मन अगर संसार से प्यार करता है तो संसार अपना फल दे देता है अरे भाई एक लड़की  17:13 है दो बहनें हैं एक बहन ने एक लड़के को चुना  17:28 वह भी बीए एलएलबी था दूसरे ने चुना वो भी बीए एलएलबी था लेकिन एक लड़की का चुना हुआ लड़का  17:44 आईएएस में आ गया वो कलेक्टर कमिश्नर हो गया उसकी बीवी को सारी जनता मैम साहब कहने लगी  18:04 अपन गवार बीवी को भी सलाम करने लगे बड़े-बड़े  18:13 दूसरी लड़की ने जिसको चुना वो किसी कंपटीशन में नहीं आया शराबी हो गया यहां वहां पड़ा रहता है उसकी  18:29 बीवी भिखारिन हो गई  18:36 ऐसे ही यह मन है अगर इसने यह डिसाइड कर लिया डिसाइड पक्का निश्चय भगवान में ही आनंद है जो  18:54 आत्मा चाहती है और भिड़ गया भगवान की ओर जाने में उसने आत्मा को भगवान के पास पहुंचा दिया मन  19:11 माया का पहुंचा दिया दिव्य भगवान के पास कमाल देखो  19:20 माया का मन जिसका चिंतन मायिक उसने दिला दिया दिव्य भगवान को  19:35 और जिसने संसार में आनंद डिसाइड किया पक्का निश्चय किया यहां आनंद है हमको नहीं मिला यह बात अलग है  19:51 हमारी मां खराब है हमारा बाप खराब है हमारी बीवी हमारा पति खराब है लेकिन आनंद है  20:04 पढ़े चलो और संसार इकट्ठा करो और इकट्ठा करो तो आनंद मिलेगा  20:18 एक दिन सुरपति इंद्र हो गया मान लो फिर भी आनंद नहीं मिला क्योंकि उसने दिव्य भगवान को नहीं चुना  20:31 उसके मन ने मायिक जगत के सामानों में आनंद चुना उसको वही मिला  20:43 वो भिखारी रह  20:47 अत मन ही सबसे बड़ा शत्रु है मन ही सबसे बड़ा मित्र है यह इस दोहे का भावार्थ है थैंक  21:01 यू