मन और माया की मिली-भगत - जो करती है आपको fail || Jagadguru Kripalu Ji Pravachan
https://youtu.be/XaY4qz9nPB0?si=LuVy-FT8LZYI17Kc
First the Gist in Hindi with timestamps, thereafter Full Transcript is given:
00:00 मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष (सुख और दुःख) का मूल कारण है।
01:59 वेदों और शास्त्रों के अनुसार, हमारे सभी कर्मों का असली कर्ता केवल मन ही है, इंद्रियां नहीं।
13:56 इंद्रियों के बिना भी मन स्वतंत्र रूप से स्वप्न की तरह हर प्रकार का अनुभव और कर्म कर सकता है।
16:58 जब मन संसार और भौतिक वस्तुओं में सुख खोजता है, तो वह जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र और दुःखों की ओर ले जाता है।
18:36 वही मन जब गुरु के सानिध्य में भगवान की भक्ति और चिंतन में लगता है, तो जीव को गोलोक और मुक्ति दिला देता है।
20:47 इस प्रकार सही दिशा मिलने पर मन सबसे बड़ा मित्र है और गलत दिशा में भटकने पर सबसे बड़ा शत्रु है।
Full Transcript:
01:06 अनंत दुख
01:10 बंधन से होता है कर्म बंधन
01:20 कर्म बंधन जन्म से होता है जन्म कर्म से होता है कर्म जन्म से होता है अनादि धारा है ये
01:37 हम अनादि हैं और मायाबद्ध हैं इसलिए हमारे जन्म भी अनंत हैं इसलिए हमारे कर्म भी अनंत हैं
01:59 यह जन्म और कर्म ये दोनों का कर्ता कौन है भगवान तो हो नहीं सकते भगवान तो परम कारुणिक हैं
02:18 दयालु हैं वो भला ऐसा क्यों करेंगे
02:26 और फिर संसार में भी कोई किसी से दुश्मनी करता है तो उसका रीजन होता है कारण होता है बिना
02:41 कारण के कोई किसी से दुश्मनी नहीं करता और कारण एक ही हो सकता है कि हमारा कोई अपकार कर
02:55 रहा हो हानि कर रहा हो
03:01 हमारा नुकसान कर रहा हो उससे हमारी दुश्मनी होती है तो भगवान का कोई नुकसान तो कर नहीं सकता अरे
03:14 वो दिखाई ही नहीं पड़ेगा तो नुकसान क्या करेगा और फिर लिमिटेड का नुकसान होता है सीमित वस्तु का नुकसान
03:31 हुआ करता है जैसे हमारे पास 1 लाख है उसमें से किसी ने 1000 छीन लिया तो कम हो गया
03:45 1000
03:49 और जिसके पास अनंत हो तो अनंत से तो अनंत निकालो तो भी अनंत बचेगा
04:07 तो भगवान से कोई कुछ छीन ले यही असंभव और अगर छीनने भी तो कुछ कमी नहीं होगी वो तो
04:22 ऐसा है भगवान कि पूर्णस पूर्ण माधाय पूर्ण मेवा वशिष्यते वेद कहता है पूर्ण से पूर्ण निकाल लो तो भी
04:37 पूर्ण बचेगा
04:41 इसलिए भगवान का कोई नुकसान कर ही नहीं सकता
04:48 अरे नुकसान तो बलवान करता है संसार में भी जब उसके बराबर कोई नहीं है न तत समस्याभ्यधिक दृश्यते श्वेतापनिषद
05:05 छ आठ वेद कह रहा है उसके समान ही कोई नहीं है बड़ा क्या होगा नत समोस कुतो ये गीता
05:21 कह रही है स्वयं तो साम्य अतिशय
05:28 भागवत कह रही है निरस्त साम्या अतिशय नराधसा भागवत कह रही है तो फिर उसके नुकसान का सवाल ही नहीं
05:40 तो फिर उसका कोई शत्रु हो इसका प्रश्न ही नहीं है तो यह मन जो है यह है कौन यह
05:53 माया का पुत्र है
06:00 माया जड़ वस्तु है ना माइक को आप देखते ही हैं यह संसार माइक है यह पृथ्वी जल तेज वायु
06:14 आकाश इसके पांच विशेष तत्व हैं अरे आपका शरीर ही बना है पंचमहाभूत का बाहर क्यों जाएं अरे इसमें एक
06:33 भगवान का अंश आ गया तो यह चेतन का काम कर रहा है जब वह निकल जाता है जिसको आप
06:43 कहते हैं मर गया तो तो यह अपने असली रूप में आ जाता है अर्थात माया का तो ऐसे ही
06:58 मन है माया का
07:04 तो माया का सामान
07:10 दो विरोधी शक्तियों का दो विरोधी कार्यों का करता है हां बंधन का भी मोक्ष का भी आनंद का भी
07:26 दुख का भी ब्रह्म बिंदु उपनिषद का मंत्र है ये
07:34 और यह मंत्र त्रिपुरा तापनीयोपनिषद में भी है पांचवें अध्याय का तीसरा मंत्र यह मंत्र मैत्रायनी उपनिषद में भी है
07:50 छठवें अध्याय का 34वां मंत्र और यह मंत्र साठ्यायनी उपनिषद में भी है साठ्यायनी उपनिषद का पहला मंत्र
08:07 और इसी अर्थ में फिर वेद कहता है चित्त मेंव ही संसारा
08:18 चित्त ही संसार है
08:22 महोपनिषद ने चौथे अध्याय का 66वां मंत्र
08:33 चित्त मेंव संसारा मैत्रेय उपनिषद का यह पहले अध्याय का पांचवा मंत्र है साठ्यायनी उपनिषद का यह तीसरा मंत्र है
08:51 चित्त मेंव संसारा मैत्रायणी उपनिषद का छठवें अध्याय का 34वा मंत्र है
09:05 और इसी से मिलताजुलता फिर दूसरा मंत्र है मन एवह संसारा यह तेजो बिंदु उपनिषद के पांचवे अध्याय का 98
09:21 बेवा मंत्र है
09:28 इसे वेद मंत्र कह रहे हैं कि मन ही हमको गोलोक पहुंचा दे और मन ही नरक पहुंचा दे यह
09:42 जो लोग गोलोक चले गए हैं जिनको हम महात्मा संत महापुरुष कहते हैं ये मन ने इनके ऊपर कृपा की
09:55 है और जो नरक में निवास कर रहे हैं हमारे भाई लोग भाई माने जीव
10:07 उनको भी मन ने पहुंचाया है
10:15 भागवत भी कहती है चेत खलवस बंधाय मुक्तय चात्म मनो मतम इस आत्मा को गोलोक पहुंचाने वाला नरक पहुंचाने वाला
10:33 स्वर्ग पहुंचाने वाला यह चित्त है मन है
10:43 तीन 25 15 फिर भागवत कहती है मन परम कारण मामनंत मन ही प्रत्येक कर्म का कर्ता है आप गोलोक
10:59 जाने वाला कर्म करे मन गोलोक पहुंचा देगा आपको आपको आत्मा को और अगर यही मन पाप कर्म करे तो
11:14 नरक पहुंचा देगा आपको
11:21 11 23 43 नारद पुराण में भी यह मंत्र है मन एव मनुष्यणाम कारणम बंध मोक्षयो पंचदशी में भी यह
11:35 मंत्र है मनो मनुष्यणाम कारणम बंध मोक्षयो आप लोग इन नंबरों के द्वारा इनको वेदों में भागवत में सर्वत्र मिला
11:51 के देख लेना मैं गप नहीं झोंक रहा हूं चैलेंज कर रहा हूं
12:03 तुम मैं नहीं शत्रु है हमको पाप कर्म करके नरक भेज दे वेद कहता है पुण्यन पुण्यम लोकम नयति पापेन
12:25 पापम उभा्या में मनुष्य लोकम
12:38 तो यह मन
12:42 प्रत्येक कर्म का करता है आत्मा कुछ नहीं करता इंद्रियां और जो है मन के अलावा वे भी कुछ नहीं
12:55 करती
12:58 इंद्रियों से तो करवाता है मन अपने आप इंद्रियां कुछ नहीं पाप पुण्य या भक्ति कुछ नहीं कर सकती
13:15 बिना इंद्रियों के मन कर्म करता है ना
13:21 इंद्रियों से कर्म इंद्रियों को लेकर ध्यान दो इंद्रियों को लेकर मन मन करता है जागृत अवस्था में इस समय
13:37 आप लोग देख रहे हैं आंख से
13:44 यह मन कर रहा है लेकिन आंख की हेल्प ले रहा है कान की हेल्प ले रहा है लेकिन अगर
13:56 आंख कान नाक रसना आदि सब चैलेंज कर दे मन को वो भी चैलेंज एडमिट कर लेता है ठीक है
14:07 तुम लोगों की जरूरत नहीं हमको हमारे पास सब कुछ है
14:15 बिना हमारे यानी आंख कहती है बिना हमारे तुम देख सकते हो
14:26 हां
14:30 हम नहीं मानते नहीं मानते अच्छा तुम सो जाते हो जब तो सपना देखते हो ना हां देखते हैं तो
14:42 सपने में क्या इन आंखों से देखते हैं
14:49 ये तो रजाई के अंदर बंद रहता
14:54 और कितना संसार आप देखते हैं सपने में अरे जागृत में आप उतना नहीं देख सकते
15:06 एक जंप करके आकाश पहुंच जाते हैं आप सपने में जागृत में तो जंप करके आप 10 फुट भी नहीं
15:15 उछल सकते
15:21 आप देखते हैं सुनते हैं सूंघते हैं रसगुल्ला खाते हैं हंसते हैं रोते हैं डरते हैं सब कुछ करते हैं
15:32 सपने में बिना इंद्रियों के अब मान गए ना इंद्रियों से जुक्त होके भी मन ही करता है बिना इंद्रियों
15:48 के भी मन करता है देखो मन से भगवान का चिंतन करके अनंत जीव महापुरुष बन गए भगवान के लोक
16:03 चले गए
16:08 मुख से कुछ नहीं बोले
16:12 आंख बबी बंद कर लिया था मन से केवल ध्यान किया
16:24 चिंतन मन का काम चिंतन
16:30 बड़ा कमाल है मन में यही मन वहां पहुंचा देता है अगर कोई गुरु की शरण में होकर भगवान की
16:43 भक्ति करता है
16:50 भगवान से प्यार करता है
16:58 और वही मन अगर संसार से प्यार करता है तो संसार अपना फल दे देता है अरे भाई एक लड़की
17:13 है दो बहनें हैं एक बहन ने एक लड़के को चुना
17:28 वह भी बीए एलएलबी था दूसरे ने चुना वो भी बीए एलएलबी था लेकिन एक लड़की का चुना हुआ लड़का
17:44 आईएएस में आ गया वो कलेक्टर कमिश्नर हो गया उसकी बीवी को सारी जनता मैम साहब कहने लगी
18:04 अपन गवार बीवी को भी सलाम करने लगे बड़े-बड़े
18:13 दूसरी लड़की ने जिसको चुना वो किसी कंपटीशन में नहीं आया शराबी हो गया यहां वहां पड़ा रहता है उसकी
18:29 बीवी भिखारिन हो गई
18:36 ऐसे ही यह मन है अगर इसने यह डिसाइड कर लिया डिसाइड पक्का निश्चय भगवान में ही आनंद है जो
18:54 आत्मा चाहती है और भिड़ गया भगवान की ओर जाने में उसने आत्मा को भगवान के पास पहुंचा दिया मन
19:11 माया का पहुंचा दिया दिव्य भगवान के पास कमाल देखो
19:20 माया का मन जिसका चिंतन मायिक उसने दिला दिया दिव्य भगवान को
19:35 और जिसने संसार में आनंद डिसाइड किया पक्का निश्चय किया यहां आनंद है हमको नहीं मिला यह बात अलग है
19:51 हमारी मां खराब है हमारा बाप खराब है हमारी बीवी हमारा पति खराब है लेकिन आनंद है
20:04 पढ़े चलो और संसार इकट्ठा करो और इकट्ठा करो तो आनंद मिलेगा
20:18 एक दिन सुरपति इंद्र हो गया मान लो फिर भी आनंद नहीं मिला क्योंकि उसने दिव्य भगवान को नहीं चुना
20:31 उसके मन ने मायिक जगत के सामानों में आनंद चुना उसको वही मिला
20:43 वो भिखारी रह
20:47 अत मन ही सबसे बड़ा शत्रु है मन ही सबसे बड़ा मित्र है यह इस दोहे का भावार्थ है थैंक
21:01 यू