"बार बार प्रवचन सुनें - फिर देखें Result || Jagadguru Kripalu Ji Maharaj"
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1. संसार का प्रत्येक जीव जो भी कार्य करता है, वह केवल अपने स्वार्थ और आनंद की प्राप्ति के लक्ष्य से ही करता है [00:22]।
2. मनुष्य सांसारिक पदार्थों से परमानंद पाना चाहता है, जबकि संसार में आनंद है ही नहीं, ठीक वैसे ही जैसे चूने के पानी को मथने से कभी मक्खन नहीं निकल सकता [03:01]।
3. हमने अनंत जन्मों में संतों की वाणी और वेदों के उपदेश सुने तो बहुत, लेकिन उन्हें जीवन में आचरण में न लाकर केवल अनसुना कर दिया [05:33]।
4. केवल कानों से सुन लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जब मन उपदेश को गहराई से सुनकर स्वीकार करता है, तभी कल्याण संभव होता है [09:07]।
5. शास्त्रों और ग्रंथों में एक ही मुख्य सिद्धांत को बार-बार इसलिए दोहराया गया है ताकि वह बात मनुष्य की बुद्धि और मन में पूरी तरह दृढ़ हो सके [12:07]।
6. उपदेश सुनते समय हमारी जैसी चित्तवृत्ति और श्रद्धा की तीव्रता होती है, हमें उस उपदेश का लाभ भी उसी अनुपात में प्राप्त होता है [13:58]।
7. महर्षि वाल्मीकि का हृदय वैराग्य और तीव्र श्रद्धा से परिपूर्ण था, इसलिए गुरु के साधारण से निर्देश मात्र से ही उनका पूर्ण उद्धार हो गया [16:47]।
8. हमारी चित्तवृत्ति निरंतर बदलती रहती है, इसलिए उपदेश बार-बार सुनते रहना चाहिए ताकि अनुकूल समय पर वह ज्ञान मन में बीज की तरह अंकुरित हो सके [26:39]।
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Full Transcript
[00:00] एक तत्त्वज्ञ अपने मन से कहता है—अरे मन, एक काम की बात सुन।
[00:12] काम की बात का अभिप्राय क्या है? मतलब की बात, स्वार्थ की बात।
[00:22] तो विश्व का प्रत्येक जीव जो भी कार्य करता है, स्वार्थ को लक्ष्य में रखकर ही करता है। यह सिद्धांत है।
[00:38] जब तक जीव का स्वार्थ सिद्ध नहीं हो जाएगा, अर्थात अनंत, अपरिमेय, अपौरुषेय दिव्यानंद नहीं मिल जाएगा, तब तक कोई भी जीव कोई भी कार्य करेगा—
[00:56] वह कार्य मेंटल हो, फिजिकल हो, कोई कार्य हो—वह केवल स्वार्थ के लिए ही करेगा। यह अकाट्य नियम है।
[01:07] इस नियम को भूलिएगा नहीं। आप लोग तो डेली भूल जाते हैं और ऐसा समझ बैठते हैं कि अमुक व्यक्ति हमारे लिए यह अमुक काम कर रहा है।
[01:20] किसी के लिए कोई कुछ नहीं कर सकता। यह सिद्धांत बहुत ही इंपॉर्टेंट है और सदा साथ रखने का है।
[01:28] माँ हो, बाप हो, बेटा हो, स्त्री हो, पति हो, कोई हो—
[01:38] विश्व के सभी जीव स्वार्थ के लिए ही कार्य करते हैं।
[01:45] जब यह नियम है, तो फिर “काम की बात सुनने” को आप क्यों कहते हैं? सभी काम की बात सुन रहे हैं, कर रहे हैं।
[01:56] नहीं, स्वार्थ के लिए तो सभी प्रयत्न कर रहे हैं, यह सही है; लेकिन किसी का स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ—
[02:06] या इने-गिने महापुरुषों का ही स्वार्थ सिद्ध हुआ।
[02:18] इससे यह सिद्ध होता है कि हमने जितनी बातें अब तक सुनीं, अनादि काल से अब तक, अनंत जन्मों में—वह हमारे काम की बात नहीं थी;
[02:29] अर्थात हमारी स्वार्थ-सिद्धि वाली बात नहीं थी।
[02:42] आत्मा का जो ऐम है—परमानंद प्राप्त करना—इस सिद्धांत की बात हमने नहीं सुनी अब तक।
[02:47] संसार को प्राप्त करके परमानंद मिलेगा—इस सिद्धांत की बात सुनी; तो ये काम की बात तो हुई नहीं।
[03:01] कोई व्यक्ति चूने के पानी को मथे कि इससे मक्खन निकलेगा, तो भला मक्खन कैसे निकलेगा?
[03:12] जब उस चूने के पानी में मक्खन है ही नहीं। वह तो दूध में होता है।
[03:21] ऐसे ही हम संसार से परमानंद चाहते हैं, और संसार में आनंद है ही नहीं।
[03:31] इसलिए हमने संसार की प्राप्ति का जो-जो साधन सुना या किया, सब गलत हो गया।
[03:44] उससे हमारा स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ। इससे यह निर्णय निकला कि हमने अनादि काल से अब तक काम की बात नहीं सुनी।
[03:54] सुनते तो रहते ही हैं अनादि काल से अब तक। प्रत्येक जन्म में अनंत बातें सुनीं,
[03:59] लेकिन सब संसारी वस्तुओं के पाने की बात सुनी।
[04:10] क्यों जी, हम ये कैसे मान लें कि अनादि काल से अब तक हमने संसारी वस्तुओं की प्राप्ति की ही बात सुनी?
[04:20] अनंत जन्म बीत गए, अनंत बार हम मानव भी बन चुके, मानव-देह प्राप्त कर चुके।
[04:31] तो अनंत बार संत भी मिले होंगे, अनंत बार भगवान के अवतार भी हुए होंगे,
[04:42] और अनंत बार हमने संतों की वाणी सुनी होगी, भगवान के प्रवचन भी सुने होंगे, वेदों, शास्त्रों, पुराणों के सिद्धांत भी सुने होंगे।
[04:53] जैसे आज सुन रहे हैं, ऐसे ही अनंत बार पहले भी सुन चुके होंगे।
[05:01] आप ये कैसे कहते हैं कि संसार के विषय की ही बात हमने अब तक सुनी?
[05:12] हाँ, सही है—सुना है, अनंत बार सुना है।
[05:22] सुनाया भी है; वेदों के सिद्धांत को सुनाया भी है, महापुरुषों से सुना, समझा, फिर लोगों को सुनाया—यहाँ तक हो चुका है।
[05:33] फिर आप नई बात क्या कहने जा रहे हैं? “एक काम की बात”—ये तो अनंत बार सुन चुके हैं।
[05:38] हाँ, लेकिन क्या हुआ है? सुनकर अनसुना कर दिया। ध्यान दीजिए इस पॉइंट पर।
[05:48] अनंत बार सुना, और उस समय माना भी, समझ में भी आया, लेकिन अनसुना कर दिया।
[06:05] दो प्रकार का सुनना होता है—एक, सुनकर तदनुसार प्रैक्टिकल वर्क करें;
[06:16] और एक, सुनकर उसकी उपेक्षा कर दें, यानी प्रैक्टिकल लाइफ में उसको न ढालें, क्रियात्मक स्वरूप न दें।
[06:34] “वहाँ मत जाना, गोली चल रही है।” सुना? “हाँ, सुना।”
[06:46] ये रमेश ने सुरेश से कहा। लेकिन सुरेश ने कहा, “वो क्या कह रहे हैं कि वहाँ मत जाना?
[06:50] अरे, गोली कहीं यहाँ-वहाँ चल रही होगी। हम तो जाएंगे।”
[06:58] और गया, और गोली लग गई।
[07:07] यानी सुना, लेकिन सुनकर अनसुना कर दिया; क्रियात्मक रूप नहीं दिया, उसके विपरीत कार्य किया और दंड मिला।
[07:17] तो उसी प्रकार हमने महापुरुषों की वाणी सुनी, फिर अपनी मीटिंग में, अपने भाइयों की मीटिंग में चर्चा की—
[07:31] “वो महात्मा जी आए थे न?” “हाँ, उन्होंने ऐसा बताया।” “हाँ, बात ठीक कही।”
[07:44] “लेकिन ऐसा है कि अपन लोग गृहस्थ हैं, कोई बाबा थोड़ी हैं।”
[07:54] “वो कहते हैं कि खाने-पीने में संयम रखो, आँख के विषय में संयम रखो, कान के विषय में संयम रखो,
[08:03] किसी की निंदा न सुनो, निंदा न करो, हर इंद्रिय के सब्जेक्ट को संभालो, मन को भगवान में लगाओ।”
[08:12] “ये तो साहब, ऐसा है कि बात तो ठीक है, बात तो ठीक है; लेकिन भाई, ऐसा है कि वो बुढ़ापे में कर लेंगे, अभी जल्दी क्या है?”
[08:22] और फिर, “साहब, देखो, जो भाग्य में होगा तो अपने-आप हो जाएगा।”
[08:31] तीसरा कहता है, “साहब, समय आएगा तो करा लेगा।” चौथा कहता है, “जी, भगवान की दया होगी तो अपने-आप हो जाएगा।”
[08:41] इस प्रकार मीटिंग करके हम लोगों ने वह सुना अनसुना कर दिया।
[08:53] और प्रैक्टिकल हमारा जीवन संसार-संबंधी रहा। इसलिए यहाँ लेखक सबसे पहले कहता है—“सुनो मन, सुनो कान नहीं।”
[09:07] अरे, कान ने तो अनंत बार सुना। कान का सुना काम नहीं देगा। अगर मन सुन ले, तो काम बन जाए।
[09:21] इसलिए हेडिंग है—“सुनो मन।” ऐ मन, तू सुन। अर्थात मन, एक काम की बात बता रहे हैं।
[09:36] एक बात यहीं पर और समझ लीजिए—ये जो सुनना है,
[09:43] इस सुनने के विषय में हमारे यहाँ वेद-वेदांत कहते हैं—“आवृत्तिरसकृदुपदेशात्।”
[09:55] यह जो हम लोगों को भ्रम होता है कि “ये तो मैंने सुना है, ये तो मैं जानता हूँ”—ये बहुत बड़ी भूल है।
[10:03] देखिए, वेद में, गीता में, रामायण में—अगर कोई व्यक्ति न्यूट्रल होकर के इन ग्रंथों को पढ़े,
[10:18] तो ये पाएगा कि इतना बड़ा ग्रंथ बनाने की आवश्यकता ही नहीं थी। ये सब विचित्र लोग हैं—
[10:30] इतना बड़ा पोथा बना दिए! एक लाख श्लोक का एक ग्रंथ महाभारत आज भी है।
[10:43] एक लाख के श्लोक के मैटर को सौ श्लोक में कोई भी विद्वान रख सकता है। निरर्थक एक लाख श्लोक लिखे हैं।
[10:56] क्या निरर्थक है उसमें? निरर्थक यह कि एक ही बात को पच्चीस बार लिखा, पचास बार लिखा, सौ बार लिखा।
[11:06] हर ग्रंथ में—भागवत हो, रामायण हो, गीता हो, वेद हो।
[11:13] एक पॉइंट को, जैसे आत्मा नित्य है—इस एक बात को हजारों वेद-मंत्रों में, सैकड़ों गीता के श्लोकों में,
[11:30] सैकड़ों चौपाइयों में बार-बार, बार-बार।
[11:43] अब कोई पूछे कि इन लोगों का दिमाग खराब है क्या? ये तो दोष है, बार-बार किसी बात को दोहराना।
[11:52] इसका मतलब उनकी मेमोरी बड़ी खराब थी, जो एक बात को लिखा और फिर भूल गए होंगे, तो दोबारा फिर लिख दिया।
[12:07] फिर भूल गए तो तीसरी बार फिर लिख दिया—ऐसा क्यों?
[12:21] नहीं, भूल नहीं गए। इसलिए बार-बार लिखा कि इसके मस्तिष्क में यह बात बैठ जाए।
[12:36] तो इसके लिए एक ब्रह्मसूत्र बना दिया गया कि “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्”—देखो, उपदेश बार-बार सुनो, बार-बार सुनो।
[12:49] उसमें दो बातें हैं। बार-बार सुनने से एक तो पक्का होगा, क्योंकि श्रवण के बाद मनन करो—
[13:01] वेद कहता है, सुनने के बाद उसका मन से चिंतन का रिवीजन करो। तो वह तो हम लोग करते नहीं—टाइम नहीं, केयर नहीं।
[13:11] तो अगर बार-बार सुनेंगे, तो उतनी देर तो चिंतन होगा।
[13:21] एक तो ये प्रत्यक्ष लाभ है बार-बार सुनने का। दूसरा एक और इंपॉर्टेंट पॉइंट।
[13:33] हम लोग जिस समय सुनते हैं कोई शास्त्र-वेद का उपदेश—देखिए, मेरे एक-एक शब्द पर ध्यान दीजिएगा, बहुत सावधान होकर के।
[13:42] आप लोग समझते तो हैं कि हम समझ रहे हैं, लेकिन हम नहीं समझते हैं कि आप समझ रहे हैं—यही हम में-आप में झगड़ा है।
[13:47] अब हमारा कन्फ्यूजन होगा, वो बात अलग है; ओवर-कॉन्फिडेंस गलत है। एक-एक शब्द पर ध्यान दीजिए।
[13:58] हाँ, दूसरा पॉइंट यह है—हम जिस समय महापुरुषों का उपदेश सुनते हैं,
[14:15] उस समय हमारी चित्तवृत्ति जिस प्रकार की होती है, उसी प्रकार से हम उपदेश को ग्रहण करते हैं।
[14:29] अगर उस समय हमारी श्रद्धा, हमारी रुचि \(50\%\) है, तो वह उपदेश \(50\%\) काम करेगा।
[14:41] अगर वह \(80\%\) है, तो \(80\%\) उसका लाभ मिलेगा; और अगर \(100\%\) हमारी श्रद्धा उस समय है,
[14:52] तो एक ही उपदेश में हम पार हो जाएंगे, हमारा काम बन जाएगा।
[15:04] इतिहास में आप लोग पढ़ते हैं—इतना बड़ा पापी था वाल्मीकि। हाँ, उसके गुरु ने कहा, “राम कहो, राम-राम-राम ध्यानवान।”
[15:16] तो तुम क्या करोगे? खाली मुँह से बोलो—“राम, राम, राम।”
[15:27] वो राम नहीं बोल सकता। आज पाँच अरब आदमी में ऐसा कोई पापी है? इंपॉसिबल!
[15:37] या तो गूँगा होगा कि, भाइयों, “राम” क्या हो, “काम” भी नहीं बोल सकता, “ग्राम” भी नहीं बोल सकता।
[15:46] अगर क, ख, ग कोई बोल सकता है, तो वो बात क्या है कि “राम” नहीं बोल सकता?
[15:55] और अगर कहो कि ‘रा’ और ‘म’ बोलने में उसके गले में कोई दोष होगा, तो ये बात भी नहीं; क्योंकि “मरा” तो बोल रहा है।
[16:05] ‘रा’ और ‘म’ इन दो अक्षरों का उच्चारण तो कर रहा है, लेकिन उल्टा कर सकता है, सीधा नहीं कर सकता—ये पाप है।
[16:12] इसका कारण गले का दोष नहीं, बुद्धि का दोष नहीं; वो नॉर्मल आदमी है।
[16:22] लेकिन ध्यान दीजिए—जब गुरु ने उपदेश दिया कि “तुम हमारी आज्ञा मानोगे?” “हाँ, गुरुजी।”
[16:30] “मैंने देख लिया संसार क्या है। मैंने अपनी श्रीमती से पूछा कि मैंने इतनी हत्याएँ की हैं तुम्हारा पेट पालने के लिए—तुम लोग पाप में शरीक होगी?”
[16:36] सबने जवाब दे दिया कि, “हम पाप में शरीक नहीं होंगे। तुमने विवाह के समय यह प्रतिज्ञा नहीं की थी कि हम मर्डर करके तुम्हारा पेट भरेंगे।”
[16:47] सब स्वार्थी हैं। यह जो वैराग्य उसको हुआ, और उस वैराग्य से जो श्रद्धा उत्पन्न हुई, वह टॉप की हुई।
[17:00] उसकी लिमिट बड़ी पावरफुल थी। इसलिए जब गुरु ने यह उपदेश दिया—“अच्छा, तुम ‘मरा-मरा’ कहते रहो, जब तक मैं लौट के न आऊँ।”
[17:07] “ठीक है, हाँ गुरुजी।” ये “मरा-मरा” क्यों कहूँ—इन्होंने पूछा नहीं। “आप लौट के कब आएँगे?”—इन्होंने पूछा नहीं।
[17:22] मन में सोचा नहीं। इतनी बड़ी श्रद्धा!
[17:25] ये असली सुनना है। इसको सुनना कहते हैं।
[17:32] तो किस समय हमारी चित्तवृत्ति की भूख कितनी है, ये तो हम जान नहीं सकते।
[17:42] अगर हम बार-बार सुनते रहेंगे, तो क्या पता किसी समय हमारी चित्तवृत्ति बहुत अच्छी क्लास की हो,
[17:52] और अच्छे क्लास की चित्तवृत्ति में वह उपदेश पड़े।
[18:03] तो जैसे कोई बीज होता है—गेहूँ का, चने का—अगर अच्छी मिट्टी में, उपजाऊ मिट्टी में डाल दिया जाए,
[18:12] उसमें सब खाद और सब चीजें ठीक-ठीक पड़ जाएँ, तो वह तीन दिन में अंकुर पैदा हो जाता है।
[18:20] और अगर वही बीज ऊसर में डाल दिया जाए, तो वह बीज ही नष्ट हो जाता है; उससे अंकुर पैदा ही नहीं होता।
[18:24] “न चेतसि उपदेशः प्ररोहवत्”—हमारे यहाँ शास्त्र कहते हैं कि उसमें फिर उपदेश का प्ररोह, माने अंकुर, नहीं पैदा होता।
[18:38] तो क्योंकि हमारी चित्तवृत्ति परिवर्तनशील है, बार-बार बदल रही है,
[18:41] इसलिए बार-बार हम सुनें तो क्या पता किस समय का सुनना कितना काम कर जाए।
[18:53] बहुत पुरानी बात है, मैं अपनी लाइफ बता रहा हूँ—लगभग \(45\) साल पुरानी बात।
[19:06] मैं मथुरा में एक जज के यहाँ ठहरा हुआ था। नगर में जज साहब श्रीकृष्ण के बड़े भक्त थे।
[19:18] तो उनके यहाँ मैं जब ठहर जाया करता था, उन्हीं के सगे भाई कलेक्टर थे।
[19:33] एक बार ऐसा संयोग हुआ कि मैं उनके यहाँ ठहरा था और कलेक्टर साहब भी वहीं आ गए।
[19:44] और वो कलेक्टर साहब प्रकांड विरोधी! दो भाइयों में इतना बड़ा अंतर।
[19:56] संत नाम सुना कि उनको आग लग गई। “बाबा, संत, महात्मा, साधु”—ये शब्द उनके कान में न पड़ें।
[20:07] “सब ढोंगी होते हैं, बदमाश होते हैं, लफंगे होते हैं”—इतनी गाली बकते थे।
[20:15] लेकिन ये जज साहब बड़े भाई थे, रिटायर हो गए थे, वो उनके यहाँ। अब वो आ ही गए।
[20:24] अचानक हम वहाँ पहले से उपस्थित थे। तो अब क्या करते? वो बहुत ही चटक-मटक के साथ, अंदर गुस्सा भरे हुए—
[20:32] कि “ये क्या भाई साहब चक्कर में पड़े हैं बाबाओं के?” और फिर बाबा भी क्या—उस समय हमारी उम्र ही क्या थी?
[20:40] और कोई बाबा के ड्रेस भी नहीं, जगद्गुरु भी नहीं थे, कुछ बाल-वॉल भी नहीं थे। ऐसे जैसे आप लोग रहते हैं, ऐसे ही कपड़े पहनते थे।
[20:48] और इतने अलूल-जुलूल व्यवहार करते थे कि आप लोग उस समय की लाइफ को अगर कहीं सुने हो तो आइडिया लगा सकते हैं।
[20:56] कोई नियम-संयम कुछ नहीं। खा रहे हैं—पचास रोटी खा गए; नहीं खाया—दस-दस दिन तक नहीं खाया।
[21:05] सब अंड-बंड व्यवहार। और अपने हाथ से भी नहीं खाते थे; जो जितना खिला दे, हमारे मुँह में ठूँसता जाए, उतना खा लिया—छुट्टी हुई।
[21:11] एक कपड़ा नहीं पहनने को। हमारे साथ आपके यहाँ गए, आपके कपड़े पहन लिए; धोती नहीं है तो पाजामा पहन लिया,
[21:20] नहीं—लेडीज़ धोती पहन लिया। ये हाल थे हमारे।
[21:29] तो वो कलेक्टर साहब—हम बोल रहे थे ऐसे प्राइवेट, कोई स्पीच नहीं, कुछ समझा रहे थे। पच्चीस-तीस आदमी थे।
[21:39] वो कलेक्टर साहब बरामदे में घूम रहे थे, गुस्से में; लेकिन कान में पड़ रहा था, सुनते जा रहे थे।
[21:48] वो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, वो गुस्सा कम होता गया।
[21:56] और उनको ऐसी फील हुई कि बात तो बड़ी इंपॉर्टेंट करते हैं। ये उम्र तो कुछ नहीं है, लेकिन बात तो बड़ी योग्यता की कर रहे हैं।
[22:03] ज़रा खड़े होकर सुनने लगे। और एक चांस की बात है कि दो-ढाई घंटे हम बोलते रहे।
[22:11] हमारा बोलना भी उस जमाने में ऐसे था—एक बार हम शाम को \(8:00\) बजे बोलना शुरू किया तो सवेरे \(4:00\) बजे तक बोले।
[22:20] सब सो गए, और आँख बंद करके बोलते थे उस जमाने में। कौन चला गया, कौन सो गया या सब चले गए—हमको इससे मतलब नहीं।
[22:28] आँख बंद करके बोलते जा रहे हैं, पागल तरीके से।
[22:36] ये तो सन \(55\) से, जब चित्रकूट में सम्मेलन हुआ है, तब से आँख खोल के बोलना शुरू किया हमने।
[22:45] तो उसके बाद थोड़ा कीर्तन वगैरह हुआ। फिर \(12:00\) बजे रात को सब जाने लगे।
[22:53] तो सबने प्रणाम-प्रणाम किया, जैसा करते हैं सत्संगी लोग। तो कलेक्टर साहब भी आए तब के बाद में प्रणाम करने।
[23:04] तो हम उनकी तरफ खास तौर से देख रहे थे, क्योंकि हमको बता दिया जज साहब ने कि, “महाराज जी, ऐसा बदतमीज़ है ये,
[23:10] बहुत गाली बकते हैं। वो राक्षस पैदा हुआ है हमारा भाई है, क्या कहें!”
[23:20] तो जब वो पैर छूने लगे, तो हँसी-मजाक में ऐसे ही मैंने पहले उनके पैर छू लिए।
[23:27] तो कहते हैं, “अरे स्वामीजी, आप हमें क्यों नर्क में डालते हैं? आप तो त्यागी हैं।”
[23:36] तो हमने कहा, “भाई देखो, हम त्यागी हैं—अगर तुम्हारा कहना ठीक भी है—तो हमने क्या छोड़ा है? संसार?
[23:44] और संसार तो सबको छोड़ना पड़ेगा एक दिन। अगर तुम ऐसे त्यागी नहीं बनते, तो जबरदस्ती यमराज त्यागी बनाएगा।”
[23:54] अरे, त्यागी तो सबको बनना पड़ेगा। कौन ऐसा विश्व में पैदा हुआ है जो कहे कि मैं संसार का त्याग नहीं कर सकता?
[24:02] संसार का त्याग सबको करना है।
[24:05] लेकिन आपका कमाल है कि आपने भगवान को भी त्याग रखा है। तो वो कौन-सी पावर है आपके पास,
[24:15] जिसके बल पर आपने भगवान को त्याग दिया?
[24:23] मैंने तो भगवान के अवलंब के लिए संसार का त्याग किया, जिसका त्याग होना ही है, वैसे भी होगा।
[24:41] “अंतहु तोहि तजेंगे पामर, तू तजे अब ते मन पछत है अवसर बीते।”
[24:50] तो महात्माओं के वाक्य हैं—अरे, छोड़ना ही है। वो तो सीधे नहीं छोड़ोगे, तो टेढ़े तो छोड़ना पड़ेगा एक दिन।
[25:03] बड़े-बड़े आए, सिकंदर वगैरह, आपने नाम सुने होंगे, और बड़ी लूटमार की; लेकिन जाना सबको है, छोड़ना सबको है।
[25:12] शरीर तक छोड़ना है, बाकी बाहरी चीज को कौन कहे।
[25:21] तो ये हमारा हँसी-मजाक का वाक्य इतना असर कर गया कि वो मेरे ऊपर ऐसा गिर पड़ा जैसे किसी ने किसी को पटका हो,
[25:31] और फूट-फूटकर रोने लगा। खैर, कहने का तात्पर्य यह कि वो जज साहब से भी आगे निकल गया।
[25:44] अब ये देखिए—वही व्यक्ति है, लेकिन आज उसकी चित्तवृत्ति पर इस उपदेश का इतना प्रभाव पड़ा।
[25:55] तो बार-बार सुनने से ये हमारा मन किस समय कितनी मात्रा में उसकी इंपॉर्टेंस रियलाइज करे—यह मेन बात है।
[26:02] बहुत-सी बातें हमारे घर में होती हैं। माँ-बाप, बेटा, स्त्री, पति से किसी ने कुछ कह दिया—कड़ी बात भी—हम लोग हँस देते हैं।
[26:11] और कभी-कभी वैसी ही बात सुनकर ऐसा वो लग जाता है हृदय में वज्रपात सरीखा,
[26:22] कि उसका चिंतन करते हैं, फिर उसकी खिलाफत करते हैं, फिर क्या-क्या नहीं कर डालते।
[26:31] हमने कई आत्महत्याओं का हाल सुना है, प्रत्यक्ष उनके घरवालों से सुनकर आश्चर्य हो कि इसने आत्महत्या क्यों किया?
[26:39] वो कुछ नहीं—वो बात एक इतनी छोटी-सी बात हुई थी, और बस वो कर लिया।
[26:50] तो चिंतन कर-करके वो इतनी बड़ी अवस्था में पहुँच गया कि संसार से ही समाप्त कर लिया अपने को।
[27:00] तो इसलिए उपदेश बार-बार सुनते रहना चाहिए। पता नहीं किस समय हमारा वह आधार, हमारा वह बर्तन, हमारा वह खेत बढ़िया हो,
[27:10] और उस समय वह बीज जाए, अंकुर पैदा हो जाए, और हमारा काम बन जाए।