हे नाथ!! अपना सुदृढ़ भरोसा दीजिये!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 1 | by Shri Hit Ambrish ji
First the Transcript is given, then at the end, gist in Hindi with time stamps, followed by summary in English.
00:00:00 महापुरुषों का संत जनों का भक्त जनों 00:00:09 का जो अनुभव होता है प्रमाण होता है उसको किसी अन्य आश्रय की आवश्यकता नहीं होती व अपने आप में 00:00:17 पूर्ण है सिद्ध 00:00:23 है यह बात और है कि अनेक जन्मों के सुकृत जब संचित होते हैं तब संतों में गुरुजनों में श्रद्धा होती है 00:00:45 अगर हम श्री नारद जी के इस एक भक्ति सूत्र का विचार करें तो यही बात समझ में आती है कि पहले तो किसी भगवत प्राप्त महापुरुष 00:00:56 का मिलना ही कठिन है दुर्लभ 00:01:02 और दुर्लभ का इतना ही अर्थ हम समझ ले माने सुलभ नहीं है आसानी से नहीं मिलेगा 00:01:11 और उससे भी दुर्लभ है मिले हुए संत में श्रद्धा हो जाना 00:01:23 दीर्घ काल तक साधन करने के पश्चात साधक अर्जित क्या करता है कमाता क्या है कमाई क्या 00:01:31 महापुरुष का श्रद्धा और विश्वास यही कमाता है कोई व्यक्ति साधक की संचित संपत्ति क्या है उसकी श्रद्धा और उसका विश्वास 00:01:41 उसकी उज्जवल श्रद्धा और सुदृढ़ विश्वास 00:01:47 मानस का कहते हैं भवानी शंकर वंदे श्रद्धा विश्वास रूपण 00:02:00 और विश्वास 00:02:04 प्रभु के सन्मुख होकर संत क्या मांग रहे हैं मुझे भरोसा राम तू दे अपना अनमोल रहू मस्त निश्चिंत में कभी न जाऊ डोल 00:02:15 श्रद्धा और विश्वास के नेत्र प्राप्त होते ही वस्तु का साक्षात्कार हो जाता है वस्तु का अनुभव हो जाता है दर्शन हो जाता है इन्हीं नेत्रों से उस वस्तु का दर्शन होता है 00:02:29 या ब्याम बिना न पश्यंति श्री गोस्वामी जी कह भाई इनके बिना नहीं देखा जाता है उसको किसको उस सत्य को नहीं जाना जाता है नहीं अनुभव किया जाता है उसका दर्शन इन्ही दो नेत्रों से संभव है श्रद्धा और विश्वास 00:02:44 व कहते हैं ना संत कह रहे हैं बुल रबते त दूर नहीं पर तेरा भी कसूर नहीं वेखन वाली अख जड़ी उद विच नूर नहीं 00:03:01 और इन नेत्रों में दृष्टि कहां से आती है गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन नयन अम दृग दोष विभ 00:03:25 मुझे तो ऐसा लगता है कि जीवन में मंगल का आधान बस यही होता है 00:03:29 यही कहां सच्चे संत की शरण में बैठ मिले विश्राम 00:03:44 श्री सूरदास जी को श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु मिले अंतर्यामी ने संकेत कर दिया भाई यही तुम्हारा परम विश्राम है बस अब यहां से आगे नहीं जाना है यही विश्राम है बस विश्राम मिला 00:03:59 और सूरदास जी ने अपने हृदय में जो कुछ था सब जो का त्यों क्योंकि सत्य के मार्ग पर चलना है सत्य ही यहां की मांग है सांच बराबर तप नहीं जो मन में था व जो कात्य 00:04:17 श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु के चरणों में निवेदन कर दिया यह बात मैं क्यों कह रहा हूं गुरु के चरणों में बैठने की योग्यता क्या है सच्चे होकर जाइए 00:04:31 सच्चे जैसे हैं वैसे के वैसे जो के त्य वो आपको जो का त्यों स्वीकार करने को प्रस्तुत है 00:04:38 और मैं तो एक बात और भी कहूंगा जो के त्यों जाओगे तभी स्वीकार किए जाओगे 00:04:46 जो के त्यों प्रभु के दरबार में जाओगे तभी स्वीकार किए जाओगे अन्यथा प्रकृति जाने नहीं देगी प्रभु के निकट नहीं जाने देगी 00:05:02 लाग लपेट की आवश्यकता तो संसार को है संसार नहीं झेल सकता सत्य को जीवन में आप देखो व्यवहार में भी आप देखो संबंधों में आप इसका अनुभव कर सकते हैं 00:05:19 कभी-कभी नहीं लगता कोई आपको अच्छा और उसके साथ भी व्यवहार निभाना पड़ता है उसके साथ व्यवहार निभाना पड़ता है मन को नहीं सुहाता है फिर भी उसके साथ उठना बैठना पड़ता है बोलना बतलाना पड़ता सब करना पड़ता है 00:05:30 व्यवहार में सब करना पड़ता है क्यों क्योंकि आप जैसे हैं वैसे के वैसे अगर संसार के सामने चले जाएंगे तो बड़ा झंझट है संसार सत्य को झेल ही नहीं सकता संसार सत्य को स्वीकार ही नहीं कर सकता 00:05:45 अरे यहां तो यह देखा जाता है जो सच्ची बात कहता है उसी के पीछे अस्त्र शस्त्र लेकर भीड़ दौड़ पड़ती है 00:05:53 संत जीवन भर संसार में रहते कितनी प्रतिकूलता झेलते हैं क्योंकि संत सच्ची बात कहते हैं सच संसार को चाहिए नहीं कहने का तात्पर्य यहां पर यह है कि संसार को सत्य नहीं चाहिए 00:06:07 इसलिए मेरे तुलसी बाबा कह रहे हैं तुलसी ममता राम सो समता सब संसार ममता राम सु 00:06:32 यहां तो अच्छी बात तो यह है कि आवश्यकता से कम में निर्वाह करना सीख लीजिए आप आवश्यकता से कम में निर्वाह करने का प्रयास करोगे ना वो ध्यान से सुनना बड़ी महत्त्वपूर्ण बात मैं आपसे कह रहा हूं 00:06:45 आप आवश्यकता से कम में निर्वाह करने का प्रयास करोगे आपको व्यवहार भी आवश्यकता से कम करना पड़ेगा स्वार्थ ही व्यवहार की तरफ धकेल होता है जैसे जैसे आपके जीवन से स्वार्थ कम होता चला जाएगा व्यवहार भी कम होता चला जाएगा 00:06:59 और जितना व्यवहार कम होता चला जाएगा उतना जीवन से प्रपंच कम होता चला जाएगा व्यवहार में रहने वाले व्यक्ति को तो दिन रात प्रपंच करना पड़ता है हां जी हां जी आइए खाइए जाइए उसको बेचारे को दिन भर यही करना पड़ता है 00:07:18 यही बात तो मैं आपसे कह रहा हूं ना भाई सच्चा आदमी तो व्यवहार कर नहीं सकता कुल मिलाकर यह मिलना जुलना उठना बैठना य ये सब हमारे लिए तो भाई झंझट है हम तो नहीं कर सकते 00:07:31 कभी अपनी ओर में देखता हूं तो कभी लगता है भाई इतना हो रहा है य भी पता नहीं कब तक होगा हम तो नहीं कर सकते मैं तो कई बार ठाकुर जी के सन्मुख जाकर कह देता हूं भाई अब मैं नाचो थक गोपाल 00:07:46 तो यह थोड़ा सा अनुभव मिला कि भाई व्यवहार में रहने वाले को प्रपंच करना पड़ता है 00:07:54 और वहां दूसरी ओर साधु की व्याख्या साधु ही क्या दे रहे हैं मनस्य एकम वच एकम कर्मण एकम स साधु मन वचन कर्म से एक हो तो साधु है 00:08:06 मन में विचार कुछ और है जिव्या पर कुछ और हो करे कुछ और भक्ति कैसे होगी भाई क्योंकि कैसी भक्ति प्रभु को रिझा है मन क्रम वचन तुम्हारी आसा ऐसी भक्ति करे रदा 00:08:29 हमारा मन वचन कर्म एक हो इसका हमको अभ्यास करना पड़ेगा ना व्यवहार में दिन रात झूठ बोलना पड़े असत्य भाषण करना पड़े असत्य व्यवहार करना पड़े तो मन वचन कर्म एक होगा कैसे भक्ति होगी कैसे 00:08:45 तो अगर चाहते हो कि हमें कम से कम लिप्त होना पड़े प्रपंच में चाहते हो अगर प्रपंच की निवृत्ति फिर अपनी आवश्यकता घटाओ आवश्यकता घटेगी घटेगा व्यवहार घटेगा प्रपंच घटेगा 00:09:00 प्रपंच की निवृत्ति इसी प्रकार होती है दवदास जी भजन कुंडलिया में कहते हैं ना इस प्रकार एक रेखा खींच कर फिर पग बाहर जिन देव फ उससे बाहर पैर मत निकालना उसी के भीतर रहना 00:09:20 मैं तो कहता हूं भाई आ जाए थोड़ा दुख थोड़ा कष्ट सह लो कोई बात नहीं धर्म के 10 लक्षण में पहला लक्षण है तिही धैर्य धैर्य धरकर सह लीजिए कोई बात नहीं 00:09:35 आपको लग रहा है कि आपकी रेखा के बाहर बड़ा सुख है है नहीं आपको लग रहा है उस रेखा के बाहर बड़ा सुख है अगर गुरुजनों ने एक रेखा खींच कर दी है ना कभी कभी व्यक्ति को लगता है कि अरे य तो बंधन में पड़ गए हम 00:09:47 उस बंधन से छूट जाने में कोई सुख नहीं है केवल सुख का भ्रम है 00:10:01 सुदी प्रभु का वियोग सहा एक अवधि कटी रोते रोते तब जाकर बात समझ आई सोने के हिरण नहीं होते वो जो स्वर्ण मृग बाहर दौड़ रहा है ना वो माया मृगी तो है बड़ा सुंदर संकेत है ये बड़ा मार्मिक सिद्धांत छिपा है इसमें 00:10:29 कि वो जो माया मृग दौड़ रहा है वो स्वर्ण का दिखाई पड़ता है पर वो है तो नहीं ना है तो माया मृग 00:10:35 ऐसे ही ऐसे गुरुजन जो अनुशासन देते हैं ना कभी-कभी उसमें रहना व्यक्ति को बंधन मालूम पड़ता है अरे ये तो हमको बांध दिया ना यह करें ना वोह करे ना यहां जाए ना वहां जाए यह तो कैसा बंधन है 00:10:51 पर मैं तो कहता हूं भाई हां ठीक है भगवान भी कहते हैं तग्र कि जो अनुशासनात्मक जीवन जो है व बहुत सरल नहीं होता थोड़ा कभी कभी कठोर भी होता है कभी कभी थोड़ा नीरस भी हो जाता है 00:11:04 लेकिन फिर भी धीरज धरना धर्म का पहला लक्षण धैर्य है धीरज धरना उसमें बने रहना क्योंकि उससे पार भी आपको सुख दिखाई पड़ रहा है पर है नहीं व तो बड़ी पीड़ा है 00:11:17 जो पीड़ा आपको आज हो रही है ना गुरु के अनुशासन में रहकर मान लो आप आपका मन नहीं है प्रसन्न आपको लग रहा है कि थोड़ा जीवन नीरस हो रहा है ऐसा कर लेते वैसा कर लेते हमारे जीवन में तो कोई मौज मस्ती नहीं है 00:11:29 ऐसा लगता है कई बार कि लो हमारे जीवन में तो कुछ भी नहीं है सीधा-सीधा दाल रोटी खा रहे हैं और बस भगवान का भजन कर रहे हैं 00:11:40 क्यों क्योंकि ऐसे विकारों से भरे संसार के मध्य में हम रहते हैं ना यहां वहां से कोई बात कोई विचार कभी-कभी मन में विक्षेप पैदा करती है पर धैर्य रखना 00:11:48 इसीलिए बार-बार आपको कहा जाता है भाई सत्संग में बने रहना गुरु चरणों से लगे रहना 00:11:59 य बातें आएंगी लेकिन आपको हिला नहीं पाएंगी अगर जीवन में संत ना हो जीवन में संत का सानिध्य ना हो जीवन में संत की वाणी ना हो तो आज गिरे नहीं तो कल गिरे गिरना तय है पथ पतन हो ही जाएगा 00:12:11 अभी इतने दिनों हमने जिस जिस प्रसंग का श्रवण किया बताओ भाई कौन-कौन भूल रहा है किसकिस से भूल हो रही है हमारी तो गिनती कहां है हम तो पहले ही भूले भटके हैं हमारी तो गिनती कहां है 00:12:31 सबसे पहला कार्य जो करना चाहिए हमको व ये कि अपनी आवश्यकता कम करें इसका परिणाम क्या होगा इसका परिणाम यह होगा हमारा व्यवहार कम हो जाएगा 00:12:38 ध्यान रखना चाहे कोई घर में रहता हो कोई आश्रम में रहता हो तीर्थ में रहता हो कहीं रहता हो अगर व्यवहार में है तो उसके जीवन में द्वंद होगा ही होगा उसके जीवन में प्रपंच होगा ही होगा 00:13:00 क्यों श्री डोंगरे जी महाराज श्री स्वामी रामसुख दास जी महाराज क्यों निर्लिप्त महापुरुष रहे चाहते तो बड़ी-बड़ी समाज सेवा की संस्थाएं बनाकर कर देते समाज का कल्याण पर ना ऐसा करने से साधु को प्रपंच में प्रवृत्त होना पड़ता है साधु छूट जाती है 00:13:19 और मैं कहता हूं मेरा ऐसा मानना है कि भाई समाज को सब समय अगर सबसे अधिक आवश्यकता रहती है ना सुख और शांति के लिए तो वह किसी वस्तु की नहीं रहती विचार की रहती है 00:13:37 संत के सद विचार की समाज को आवश्यकता है वस्तु की आवश्यकता नहीं व तो आपके पास भी बहुत है 00:13:42 मैं मान लो कोई बहुत बड़ा भवन यहां बना भी दूं सारी सुख सुविधाएं उसमें जुटा भी दूं अरे वह तो आपके पास ही है आप यहां उसके लिए थोड़ी आ रहे हो और अगर आ रहे हो तो आपके आने का प्रयोजन ही ठीक नहीं है 00:13:59 संत के पास तो व्यक्ति सद विचार के लिए जाता है ना मन की सुख शांति के लिए जाता है वस्तु तो थोड़ी घनी भाई सभी के पास में है 00:14:05 यही कारण था यही कारण था श्री महाप्रभु जी श्री स्वामी जी इन्होंने अपने आराध्य का मंदिर तक नहीं बनाया 00:14:14 क्यों क्योंकि मंदिर में मंदिर बनाने में मंदिर के निर्माण में जाने किस-किस का धन लगता किसकिस की अपेक्षा हो जाती 00:14:28 और मैं तो भाई एक और भी बात कहता हूं कोई इमारत या कोई संस्था बन जाने से काम खत्म नहीं होता काम शुरू होता है 00:14:35 बन जाता है जब कुछ तो कोई यह ना समझे कि भाई बन गया काम खत्म हो गया ना ना बन जाने के बाद तो काम शुरू होता है तो प्रपंच आरंभ होता है 00:14:49 और मैं तो भाई थोड़ा सा जो अनुभव यहां तक लेकर आया हूं क्योंकि भाई चारों ओर जो घट रहा है उससे देखकर मन ही मन सीखना तो चाहिए ना 00:14:58 अपने को किसी को कुछ कहना नहीं है किसी खंडन मंडन में नहीं पढ़ना है तेरे भावे जो करे भलो भुरो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन बुहार 00:15:04 पर लेकिन जो घटनाएं घट रही हैं उन घटनाओं को देखकर सीखना तो चाहिए ना तो हम तो यही सीखे भाई कि इस रेखा से पैर बाहर रखते ही प्रपंच खड़ा है मुंह बाए वो खड़ा है रावण साधु के वेष में 00:15:19 साधु का वेश माने व्यक्ति को लगता यही है कि मैं लोक का हित करूंगा 00:15:30 उसको यही लगता है कि मैं लोक का हित करूंगा और बस लोक का हित करने के विचार में उस रेखा को पार कर जाता है 00:15:36 कोई समर्थ महापुरुष हो भाई वो बिल्कुल संसार में व्यवहार में रहते हुए और सब करें उनकी सामर्थ अलग होगी मैं तो अपनी मैं बहुत साधारण व्यक्ति हूं मैं अपनी बात कर रहा हूं 00:15:47 तो इतनी बात समझ में आई भाई कि सच्चा साधक अगर होगा तो भाई सद्विचार ढूंढ रहा है वो तो कोई ऐसी युक्ति ढूंढ रहा है कि उसके भटकते हुए मन को कोई ठोर मिल जाए ठिकाना मिल जाए 00:15:58 मन को विश्राम मिले मन का सुख यही तो खोज रहे हैं आप और मैं 00:16:08 और एक बूंद एक बूंद खटाई की बहुत बड़े पात्र में रखा सुंदर उत्तम दूध एक बूंद खटाई की सब बिगाड़ सकती है 00:16:20 इसीलिए इसीलिए मानस का कह रहे हैं संत विशुद्ध मिल ही परिते ही विशुद्ध संत जो आप जपे और नाम जपा वे चित वही राम कृपा करी 00:16:50 अभी कुछ दिन पहले ही जब मैंने यहां से संस्कृत के विषय में कुछ निवेदन किया था ना 00:16:58 मैंने क भाई मेरी ऐसी इच्छा है भावना है ऐसी कोई संकल्प तो नहीं है वैसा भाव है कि इस भाषा की सेवा के लिए हम कुछ करें 00:17:03 तो आए एक दो व्यक्ति शंभू जी के माध्यम से और किसी माध्यम से क्या आप बताएं क्या करें ऐसा करें वैसा करें 00:17:10 मैंने कहा भाई करना मुझे कुछ नहीं है मेरा काम तो आपको विचार देना है आप करिए आपकी इच्छा हो आप करिए मैं तो नहीं करूंगा कभी भी ना 00:17:29 हमको तो एक ही काम करना है एक ही काम एक ही काम राम सीमर राम स यही तेरो काज है राम सिर राम 00:17:54 बहू नई नई आती है ना जब तो सर झुका कर सब काम करती है दौड़ दौड़ कर सब काम करती है 00:18:08 फ जब थोड़ी पुरानी हो जाती है तो कभी-कभी पति को भी कह देती है अरे हमसे नहीं होता तुम कर लो है ना 00:18:19 तो ऐसे ही कभी कभी अब हम भी इनको कह देते हैं भाई यह काम हमसे नहीं होता तुम करो हमसे ये काम नहीं होता हमको नहीं करना है और हमसे होता भी नहीं तुम करो 00:18:28 आप समर्थ है जा की कृपा पंगु गिरी लंग है रंक चले सिर छत्र धराई हमने तो भाई संतों से यही सीखा इनसे दृष्टि हटे नहीं 00:18:44 जैसे ही मानसिंह गए ना कुंभन दास जी ने भेज दिया ठाकुर जी गोद में आकर बैठे थे जब मानसिंह ने द्वार खटखटा दिया था ठाकुर जी फिर आ गए 00:19:00 कुंभन दास जी ने कहा ज ज आप कछु कह रहे ठाकुर जी ने कहा त बो धत क्यों बोले 00:19:08 अरे हम यही तो कह रहे थे कि मान सिंह आएगा वह तुमको कुछ देगा व लेकर रख लेना कुंबन दस जी बोले ध ठाकुर जी बोले आप क्यों धत कर रहे हैं 00:19:19 कुंबन दास जी बोले बोले जय जय बात बताओ जो हम मान सिंह की भेट स्वीकार कर लेते आप लौट कर आते 00:19:28 ठाकुर जी के नेत्र सजल भी हो गए गोद में बैठे ही थे और दोनों भुजाओं से कुंभन दास जी का आलिंगन कर लिया कुंभन दास जी की प्रेम प्रवीणता जानकर 00:19:48 कि अगर हम वस्तु ले लेते तो आप लौट कर आते ु जी क फिर हम क्यों आते फिर हम नहीं आते 00:19:59 कुंबन दास जी जानते हैं यही उनकी प्रेम प्रवीणता है काग बुी जी का चरित्र चिंतन हम कर रहे थे 00:20:08 मैंने कहा एक ही बात तो एक ही बात तो हृदय को छू गई कि भगवान ने अनेक अनेक वरदान दिए पर भगवान ने यह नहीं पूछा कि भक्ति चाहिए कि नहीं 00:20:24 और काने प्रभु आपने अनेक अनेक बातें पूछ ली आपने अपनी भक्ति की बात नहीं कही 00:20:34 और वहां जब मुनि ने अनेक अनेक वरदान दिए कासुंडी जी धैर्य धारण किए रहे और जैसे ही आकाशवाणी हुई और प्रभु ने कहा यह हमारा है 00:20:42 कासुंडी जी का रोम रोम हर्षित हो गया बोलेस यही हम सुनना चाहते थे आपके अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहते आपको ही चाहते हैं 00:20:48 और मैं आपसे भी कहता हूं और आपसे पहले मैं य अपने आप से कहता हूं 00:20:58 आपको जो कहता हूं वह बाद में कहता हूं पहले अपने आप से कहता हूं कि भाई आज मन ऐसा है यह एक बात है मन ऐसा बना रहे यह दूसरी बात है 00:21:03 तो आज तो प्रभु की कृपा है संतों की कृपा है और सत्संग की कृपा है 00:21:09 आज तो मन ऐसा कहता है कि जाही न चाही कव कछु तुम संग सहज सनेह 00:21:15 पर सत्संग की कृपा रहे संतो की कृपा रहे और मैं तोगा आप सबकी भी मुझ पर कृपा रहे आप सबका भी आशीर्वाद रहे और ये भाव बना 00:21:21 हमको कुछ मिले नहीं मिले इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं है मैं तो दो दिन से आपसे कह रहा हूं भाई हमने तो जो सोचा था वो भी हुआ जो नहीं सोचा था वो भी हो गया 00:21:33 अस प्रभु छाड़ भज ज आना ते नर पशु बिन मुछ समा 00:21:47 श्रीमद् भागवत के प्रथम स्कंद के प्रथम अध्याय में सबसे पहली बात ही यही कही गई है क्यों श्रीमद् भागवत श्रेष्ठ है 00:21:59 क्यों निष्कपट धर्म की प्रतिष्ठा श्रीमद् भागवत करती है निष्कपट धर्म अर्थात इसमें स्वार्थ का लेश भी ना हो अनकल कृष्णा अनुशीलन से भक्ति उत्तमा मन क्रम वचन तुम्हारी आशा तुम्हारी आशा 00:22:32 अरे भगवान की माया के पास जीव को लुभाने के लिए एक नहीं अनेक अनेक अनेक खिलौने हैं 00:22:43 और मन तो इतना दुर्बल है मन तो इतना शुद्र है कि संसार की छोटी सी शुद्र सी तुच्छ सी वस्तु में अटक जाता है 00:22:55 एक बार कोई ऐसे भजन गायक भजन गा रहे थे तेरी मंद मंद मुस्कनिया पर स्वर्ग बार डलू बैकुंठ बार डार और ऐसे जाने क्या क्या गा रहे 00:23:07 एक महात्मा बैठे थे उसने कहा तेरे बाप का है ना स्वर्ग बैकुंठ बार डालू बार डालू बो बोल दुकान बार डालू मकान बार डू ऐसा बोल 00:23:29 क्या कह रहा था इससे पहले निष्कपट भक्ति चौथी भक्ति मम गुण गन करई कपट तज न 00:23:33 निष्कपट भक्ति प्रभु के अतिरिक्त कुछ भी कोई भी कुछ भी कहीं भी चाहना 00:23:54 प्रभु के अतिरिक्त कहीं भी कभी भी कुछ भी चाहना यह स्वयं से किया गया कपट है य अपने आप से किया जाने वाला कपट है 00:24:04 देखो संसार के किसी विषय सुख से आकर्षित होकर आप उसके पीछे दौड़ते हो उसको प्राप्त करने का प्रयास करते हो असत्य के मार्ग पर चलना पड़ता है छल करना पड़ता है कपट करना पड़ता है 00:24:23 नहीं तो संसार में किसी को रिझाने के लिए असत्य भाषण करना पड़ता है मिथ्या भाषण करना पड़ता है प्रपंच करना पड़ता है 00:24:33 उस सबका परिणाम क्या होता है उस सब का परिणाम होता है आत्मा पीड़ित होती है 00:24:39 जब आप विषय के सुख के पीछे भागते हो ना ध्यान रखना आप अपनी आत्मा को पीड़ित कर रहे हो इसको आत्म पीड़न कहा है महापुरुषों ने य आत्म पीड़न है स्वयं को पीड़ित करना है 00:24:51 जैसे किसी को पीड़ा देना पाप है ऐसे अपनी आत्मा को सताना भी पाप है ना किसी की हत्या पाप है तो आत्महत्या उससे बड़ा पाप है 00:24:57 जैसे किसी को सताना पाप है किसी को पीड़ा देना पाप है ऐसे अपनी आत्मा को पीड़ा देना भी तो पाप है 00:25:03 जब जब भागते हो विषय सुख के पीछे तब तक अपनी आत्मा को ही तो पीड़ा देते हो क्योंकि आत्मा व नहीं चाहती 00:25:08 मैंने सदा आपसे कहा मन अटक जाएगा कहीं भी बुद्धि भी कर लेगी कहीं भी समझौता पर यह जो यह जो आत्मा है ना यह तो जन्म जन्म से अपने स्वामी को खोज रही है 00:25:26 ये तो उसी के चरणों में जाकर परम विश्राम पाना चाहती है 00:25:27 इसलिए परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुख दास जी महाराज कहा करते थे कहते थे अरे तुम पर इष्ट की कृपा है भगवान की कृपा है तुमको मनुष्य का शरीर मिला है 00:25:42 तुम पर आचार्यों गुरुजनों की कृपा है कि तुमको भारत भूमि में मनुष्य का शरीर मिला है तुम पर संतों की कृपा है कि तुम सत्संग में आकर बैठते हो 00:25:48 अब तो केवल तुमको स्वयं पर कृपा करनी है तुम्हारे जीवन में अगर कृपा नहीं है ना तो अपनी कृपा नहीं है स्वयं पर कृपा करो आत्म पीड़कनाशी 00:26:01 अब तो कृपा करो अपने आप पर 00:26:15 पानी में से घी नहीं निकल सकता आप उसको मथ रहे हो संसार को कोई मथता रहे मत्ते मते पसीना आ जाए और मैं कहत हू पसीना क्या मत्ते मते पसीना क्या खून पसीना सब बह जाए पर भाई पानी में से तो घी नहीं निकल सकता है कैसे निकलेगा 00:26:44 बिन हरि भजन ना भव तरिए यह सिद्धांत अपे 00:27:00 श्रीमद भागवत के प्रथम स्कंद के प्रथम अध्याय में भगवान वेदव्यास यही कह रहे हैं धर्म प्रोत कत परमो निर्म सराणा सता वेदम वास्तव मत्र वस्तु शिवम ताप मलन 00:27:27 अरे जानने योग्य वस्तु क्या है जिसको जानकर य ज्ञात मतो भवति स्तब्ध भवति आत्मा रामो भवति 00:27:39 जैसे अभी आपसे मैं कह रहा हूं ना भगवान के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी किसी को भी चाहना य अपने आप से किया जाने वाला कपट है यह अपनी आत्मा को पीड़ा देने की व्यवस्था करते हैं आप 00:27:52 बिन हरि भजन न भव तरिए यह सिद्धांत अपेल 00:27:57 इसलिए कल यह दो पंक्तियां मैंने आपको याद कराई थी याद है कल मैंने कहा था ना दो चौपाई याद कर लो कौन सी 00:28:04 निज अनुभवा अब कऊ खगेसा बिन हरि भजन न जाही कले 00:28:26 दूसरी श्रुति पुराण 00:28:43 चलो श्रुति पुराण सब ग्रंथ कहाई जोर से बोलो राम भगति बिना सुख नाही 00:29:10 य जो इतने दिन हमने यह इस संवाद का चिंतन किया ना यहां कहां से आरंभ हुआ था निज अनुभव अब कह खसा बिन हरि भजन न जाही कलेसा 00:29:28 कहां पर आकर विश्राम हुआ सब वेद ग्रंथ श्रुति पुराण यही कह रहे हैं सब करमत खग नायक यहा करिए राम पद पंकज ने करिए राम पद पंकज 00:29:53 अभी कुछ दिन पहले की बात है ऐसे ही किसी महात्मा से चर्चा हो रही थी 00:30:01 तो उन्होंने मुझे कहा कि अरे भजन करने वाले को नहीं डरना चाहिए आप क्यों ऐसा सोचते हैं क्यों आपने उन्होंने तो इसी शब्द का प्रयोग किया बोले क्यों आपने अपने आप को बंद कर लिया कि क्यों सोचते हैं आप ऐसा भजन करने वाले को नहीं डरना चाहिए 00:30:27 मैंने कहा नहीं भाई सबसे पहली बात गुरु की आज्ञा में रहना चाहिए और हमको हमारे गुरु की आज्ञा है ही डर डर हरिवंश हित जिन अब ब्रम गुण स हमको तो हमारे आचार्य ने आज्ञा दी भाई इससे डर कर ही रहना 00:30:42 डर भी एक स्वाभाविक वृत्ति है ना मनुष्य में जैसे काम क्रोध आदि सब वृतिया होती से भय भी एक स्वाभाविक वृत्ति है पंच क्लेश में एक भय है 00:30:57 हमारे साथ ही आया है तो मैंने कहा भाई इसको भी तो कहीं लगाना है भई को कहां लगाएंगे भूत से हमको डर नहीं लगता किसी अस्त्र शस्त्र से हमको कोई भय नहीं है 00:31:16 संतों की कृपा है मृत्यु का भय भी यह जानकर समाप्त हो गया कि मृत्यु होती ही नहीं है मृत्यु होती ही नहीं है तो भाई इस भय का क्या करें 00:31:28 तो हमारे आचार्य ने हमको सिखाया भाई इस भय का भी सदुपयोग करना ही डर रप हरिवंश हित जिन अब भ्रम ही गुण सलिल पर जिही नाम नि मंगल लोक सु हरि पद भज न विल धर्म प्रोत कत परम निर्म सराणा सता 00:31:57 जो निष्कपट धर्म है ना उसकी बात श्रीमद् भागवत करती निष्कपट माने रे मोक्ष पर्यंत किसी फल की कामना नहीं केवल भगवान की इच्छा है भगवान की कामना है 00:32:08 इसीलिए इसको भागवत धर्म कहा गया है उत्तम भक्ति का निरूपण करने वाली श्रीमद् भागवत 00:32:20 उत्तम भक्ति इस पर पहले भी हम थोड़ी चर्चा कर चुके हैं भक्ति मार्ग के आचार्यों ने कहा है एक भावना है जो निकृष्ट कोटि की है जो कोई तमो गुणी व्यक्ति करता है 00:32:36 एक है जिसमें अपने सुख की जिसमें स्वार्थ की कामना है पर एक है जो भगवान के सुख के लिए है जिम प्रभु के सुख का विचार है अन्या अभिला सिता शून्यम कोई अन्य अभिलाषा नहीं है न चाही कबहु कछु और ज्ञान कर्मा नावत सब सब भूल गए यहां रोम रोम श्याम है 00:32:57 श्री कृष्ण ने गोपांगने से जो कहा था भा वो शास्त्र की दृष्टि से तो ठीक ही कहा था ना भगवान ने कहा आधी रात का समय है तुम अच्छे कुल की स्त्रियां हो क्यों आ गई हो यहां 00:33:11 अब भगवान ने जो जो कहा था शास्त्र आदि की दृष्टि से व बिल्कुल ठीक है शास्त्र यही कहता है पर गोपियों की भक्ति भावना इतनी प्रगा हो गई है 00:33:27 जैसे धारा जब बड़ी तीव्र गति से बहती है फिर मार्ग में आने वाले किसी अवरोध को वो नहीं रहने देती ऐसे जो गोपियों की भक्ति है जिको श्रीमद् भागवत कहती है तीव्रे भक्ति योगेन भत पुरुषम परम ऐसे गोपियों की तीव्र भक्ति भावना है 00:33:54 मार्ग में आने वाला ज्ञान कर्म जन्य कोई अवरोध भी उसको रोक नहीं पाता है 00:33:57 जैसे हमारी बाईसा कहती है मेरो मन लागयो हरि जी सु अब ना रहूंगी अटकी 00:34:07 गुरु मिला रे दास जी दीनी ज्ञान की गुट की गुरु मिला रदास जी दीन ज्ञान की गुट की 00:34:22 गुरु मिल रे दास जी दीन ज्ञान की गुट की गुरु मिला रे दास जी दीन ज्ञान की गुट की 00:34:38 चोट लगी निज नाम हरि की चोट लगी निज नाम हरि की मार ही अड़ खटकी मेरो मन लाग्यो हरि जी सु अब ना रहूंगी मैं 00:34:58 मेरो मन लाग्यो हरि जी सु अब ना रह की मैं अटकी मेरो मन लाग्यो हरी जी सु अब ना रहूंगी मैं अटकी मेरो मन लाग्यो हरि जी सो क ना रहूंगी ब अठती 00:36:15 भाग खुला मारा साद संगत सु सांवरिया केवट की भाग खुला मारा साध संगत सो केट की भाग खुला मारा साध संगत सु सांवरिया के वट की भाग खुला मारा साध संगत सु सावरिया के ब 00:36:40 नित उठ हरि जीरा मंदिर जास नित उठ हरि जीरा मंदिर जास नित उठ हरि जीरा मंदिर जा स्या हरा मंदिर जा नाचा दे चुटकी 00:36:56 मेरो मन लागयो हरि जी सु अब ना रहूंगी मैं अटकी मेरो मन लागयो हरी जी सु अब ना रह की अटकी ओ मेरो मन लाग्यो हरि जी सु अब ना रहूंगी मैं अटकी मेरो मन लागयो हरिजी अब ना रहर 00:37:27 मीरा के प्रभु गिरधर नागर रा के प्रभु गिरिधर नगर नीरा के प्रभु गिरिधर नागर रा के प्रभु गिरिधर नागर जन्म मरण सु छुटकी मेरो मन लाग्यो हरि जी सु अब ना रहूंगी मैं मेरो मन लागयो री जी सो अब ना रहू की मैं अटकी 00:37:56 मेरो मन लाग्यो हरि जी सु अब ना रहूंगी मैं अटकी मेरो मन लागयो हरि जी सो अब ना रहूंगी मैं अटकी मेरो मन लाग्यो हरि जी सु त ना रहूंगी 00:38:28 मेरो मन का क्यों हरि जी स अब ना रह
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हे नाथ!! अपना सुदृढ़ भरोसा दीजिये!! श्रीमद्भागवत के गूढ़ रहस्य | प्रथम स्कन्ध | 1 | सुदृढ़ श्रद्धा और भक्ति का गूढ़ रहस्य The Secret of Firm Faith and Devotion गुरु कृपा से मुक्ति का मार्ग Finding Liberation Through the Guru's Grace https://youtu.be/n6qewaV_ETc 00:00 - सच्चे संत की शरण में बैठ मिले विश्राम! 05:02 - इसी प्रकार होती है प्रपंच से निवृति! 09:22 - संत के अनुशासन के बिना जीव का पतन निश्चित है! 13:00 - भजन मार्ग की इस ''रेखा'' के अंदर ही भाव सुरक्षित रहेगा! 16:52 - बस प्रभु से दृष्टि हेट नहीं! 21:55 - प्रभु के अतिरिक्त कुछ भी चाहना स्वयं से किया गया कपट है! 24:06 - आत्मपीड़क नहीं आत्मचिन्तक बनिए! 27:00 - बिनु हरि भजन ना जाए कलेशा! 29:55 - ''भय'' का सदुपयोग! 31:46 - उत्तम भक्ति की सुन्दर व्याख्या! 34:08 - मेरो मन लाग्यो - मीराबाई सा पद [00:00] - [01:11] | संतों का सानिध्य और श्रद्धा: महापुरुषों का अनुभव अपने आप में पूर्ण प्रमाण है। अनेक जन्मों के पुण्य के बाद ही संतों में श्रद्धा होती है। नारद भक्ति सूत्र के अनुसार, भगवत प्राप्त संत का मिलना दुर्लभ है। The company of saints and faith: The experience of great souls is itself complete proof. Faith in saints develops only after the accumulated merits of many births. According to the Narada Bhakti Sutra, meeting a God-realized saint is extremely rare. [01:23] - [02:44] | श्रद्धा और विश्वास: साधक की असली संपत्ति उसकी श्रद्धा और सुदृढ़ विश्वास है। इनके बिना ईश्वर का दर्शन या अनुभव संभव नहीं है। गुरु की चरणों की धूल ही इन दिव्य नेत्रों को दृष्टि देती है। Faith and trust: The true wealth of a seeker is faith and firm conviction. Without these, the vision or experience of God is not possible. The dust of the Guru's feet alone gives vision to these divine eyes. [03:14] - [04:46] | गुरु की शरण और सत्यता: सच्चे संत की शरण में ही परम विश्राम मिलता है। गुरु के सामने व्यक्ति को 'जो के त्यों' (बिल्कुल वैसा ही जैसा वह है) जाना चाहिए, क्योंकि परमात्मा निष्कपटता स्वीकार करते हैं। Taking shelter of the Guru and authenticity: The ultimate rest is found only in the shelter of a true saint. One should approach the Guru 'as one truly is' (exactly as one is), because the Supreme accepts sincerity and guilelessness. [05:02] - [06:54] | संसार और सत्य का संघर्ष: संसार सत्य को झेल नहीं सकता, इसलिए व्यवहार में हमें अक्सर दिखावा करना पड़ता है। संत सच्ची बात कहते हैं, इसलिए उन्हें प्रतिकूलता झेलनी पड़ती है। स्वार्थ ही हमें व्यर्थ के व्यवहारों में धकेलता है। The conflict between the world and truth: The world cannot tolerate truth, which is why we often have to put on appearances in our dealings. Saints speak the truth, and therefore they have to face adversity. Selfishness is what pushes us into meaningless dealings. [07:05] - [09:12] | साधु की परिभाषा और आवश्यकताएं: साधु वह है जो मन, वचन और कर्म से एक हो। यदि प्रपंच से बचना है तो अपनी भौतिक आवश्यकताओं को कम करना होगा, जिससे व्यवहार और प्रपंच स्वयं कम हो जाएंगे। The definition and requirements of a saint: A saint is one whose mind, words, and actions are in harmony. If one wants to avoid worldly entanglements, one must reduce one's material needs, which will naturally reduce dealings and complications. [09:29] - [11:12] | धैर्य और अनुशासन: धर्म का पहला लक्षण 'धैर्य' है। गुरु द्वारा निर्धारित मर्यादाओं को कभी-कभी बंधन मान लिया जाता है, लेकिन वह बंधन नहीं, बल्कि माया रूपी 'स्वर्ण मृग' से बचने की रक्षा रेखा है। Patience and discipline: The first characteristic of religion is 'patience'. The boundaries established by the Guru are sometimes considered restrictions, but they are not restrictions; rather, they are a protective line against the 'golden deer' of Maya. [12:31] - [14:05] | विचारों की महत्ता: समाज को वस्तुओं से अधिक संतों के 'सद्विचारों' की आवश्यकता है। वस्तुओं और संस्थाओं के निर्माण में अक्सर साधुता खो जाती है और प्रपंच शुरू हो जाता है। The importance of thoughts: Society needs the 'noble thoughts' of saints more than material things. In the creation of objects and institutions, saintliness is often lost and worldly entanglements begin. [16:15] - [18:39] | निष्कपट भक्ति: श्रीमद्भागवत निष्कपट धर्म की बात करती है, जहाँ कोई स्वार्थ न हो। मनुष्य का एकमात्र कार्य प्रभु का स्मरण करना है। भक्ति में चतुरता नहीं, सरलता आवश्यक है। Guileless devotion: Shrimad Bhagwat speaks of selfless religion, where there is no selfish motive. The only duty of a human being is to remember the Lord. Devotion requires simplicity, not cleverness. [19:00] - [20:57] | कुंभनदास जी और कागभुशुण्डि जी के उदाहरण: कुंभनदास जी ने प्रभु के सानिध्य के लिए राजा मानसिंह की भेंट ठुकरा दी। काकभुशुण्डि जी ने केवल प्रभु की भक्ति मांगी, अन्य कोई वरदान नहीं। Examples of Kumbhandas Ji and Kakbhushundi Ji: Kumbhandas Ji rejected King Mansingh's gift for the sake of the Lord's association. Kakbhushundi Ji asked only for devotion to the Lord and no other boon. [22:10] - [25:08] | आत्मा की पीड़ा और विषय सुख: संसार के पीछे भागना आत्मा को पीड़ित करना है। मन कहीं भी भटक सकता है, लेकिन आत्मा केवल अपने परमात्मा को खोजती है। स्वयं पर कृपा करना ही भक्ति का मार्ग है। The suffering of the soul and worldly pleasures: Running after the world causes suffering to the soul. The mind may wander anywhere, but the soul seeks only its Supreme Lord. Showing grace to oneself is the path of devotion. [26:44] - [31:49] | हरि भजन की अनिवार्यता: बिना प्रभु के भजन के संसार सागर को पार करना असंभव है। गुरु की आज्ञा में रहकर भय का भी सदुपयोग (प्रभु से विमुख होने का भय) करना चाहिए। The necessity of Hari Bhajan: Without devotion to the Lord, it is impossible to cross the ocean of worldly existence. While remaining under the Guru's command, one should also make proper use of fear—the fear of becoming separated from the Lord. [32:04] - [38:54] | उत्तम भक्ति और मीरा बाई का पद: भक्ति का उच्चतम स्तर प्रभु के सुख में सुखी होना है। अंत में मीरा बाई के पद "मेरो मन लाग्यो हरि जी सु" के माध्यम से अनन्य प्रेम का वर्णन किया गया है। The highest devotion and Mirabai's verse: The highest level of devotion is to be happy in the happiness of the Lord. Finally, the verse of Mirabai, "Mero man lagyo Hari ji su," describes exclusive and wholehearted love. https://youtu.be/n6qewaV_ETc